Sunday, March 30, 2014

एक शाम मेरे नाम ने पूरे किए अपने आठ साल (2006-2014) !

एक शाम मेरे नाम ने पिछले हफ्ते अपने अस्तित्व का आठवाँ साल पूरा किया। आठ साल की इस यात्रा में ब्लॉगिंग ने मुझे बहुत कुछ दिया है। आज मेरे मित्रों और जानने वालों की फेरहिस्त में संगीत और साहित्य से स्नेह रखने वाले सैकड़ों जन हैं जिनमें से कईयों की प्रतिभा का मैं क़ायल हूँ। भला बताइए पेशे से एक इंजीनियर के लिए ब्लॉगिंग के बिना क्या ये संभव होता ? इसलिए मैं इस माध्यम का और इससे जुड़े मित्रों व पाठकों का तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ। सच मानिए मेरी इन आठ सालों की मेहनत का प्रतिफल बस आपके प्रेम की पूँजी है।

साल दर साल इस ब्लॉग से जुड़ने वाले लोगों का काफ़िला बढ़ता रहा है। सात लाख के करीब पेज लोड, हजार से ऊपर ई मेल सब्सक्राइबर्स, आठ सौ के करीब नेटवर्क ब्लॉग फौलोवर्स और तीन सौ के करीब गूगल फौलोवर्स और पिछले साल नवाज़ा गया इंडीब्लॉगर एवार्ड.. ये सभी इस इस बात का द्योतक है कि संगीत और साहित्य के प्रति अपनी रुचियों को आप तक पहुँचाने का जो तरीका मैंने चुना है वो आप सब को भा रहा है।

आजकल सब लोग सवाल करते हैं कि क्या सोशल मीडिया के आने के बाद ब्लॉगिंग का औचित्य समाप्त नहीं हो गया? सच बताऊँ तो मुझे ये प्रश्न बेतुका लगता है। ब्लॉग और सोशल मीडिया पर लेखन की प्रकृति और उद्देश्य दोनों भिन्न हैं। अगर क्रिकेट के खेल से इसकी तुलना करूँ तो मैं यही कहूँगा कि जहाँ ब्लॉग पर लिखना टेस्ट क्रिकेट है तो वही फेसबुक पर वन डे और ट्विटर पर T 20। ज़ाहिर सी बात है भीड़ T 20  ज्यादा जुटती है।   पर इनमें कितने क्रिकेट देखने वाले होते हैं और कितने तमाशाबीन उसका फैसला आप ख़ुद कर सकते हैं।पर जिसने ये खेल खेला हुआ है या जिसे क्रिकेट से सच्चा प्यार है वो ये भली भांति जानता है कि टेस्ट क्रिकेट ही इस खेल की असली धरोहर है।

मैं ख़ुद भी सोशल मीडिया पर सक्रिय रहा हूँ पर उसका उद्देश्य एक ओर तो पाठकों तक इस ब्लॉग की पहुँच का विस्तार करना है तो दूसरी तरफ़ वैसी महान विभूतियों से सीधा संपर्क साधना रहा है जिनके बारे में मैं इस ब्लॉग पर लिखता रहा हूँ। मुझे इस बात की खुशी है कि मुझे अपने इन दोनों उद्देश्यों में अच्छी सफलता मिली है।

वार्षिक संगीतमालाओं के महीने को छोड़ दें तो इस ब्लॉग पर प्रति हफ्ते मैं एक पोस्ट लिखने की कोशिश करता हूँ क्यूँकि यही कोशिश मुझे अपने यात्रा ब्लॉग मुसाफ़िर हूँ यारों के लिए भी करनी पड़ती है। अब कुछ रिसालों के लिए भी नियमित रूप से लिखना शुरु किया है। ज़ाहिर है ये सारी बातें आपका वक़्त माँगती हैं जो दिन भर की नौकरी के बाद नाममात्र ही बच पाता है। दरअसल एक ब्लॉगर के लिए सीमित समय ही उसके लेखन की विविधता और गुणवत्ता को बनाए रखने में सबसे बड़ी बाधा है। नित इसी संघर्ष के बीच आप तक अपनी पसंद को पहुँचाता रहा हूँ और आपका प्रेम इस ब्लॉग के लिए यूँ ही बना रहा तो भविष्य में भी पहुँचाता रहूँगा। एक बार फिर एक शाम मेरे नाम के पाठकों को मेरा ढेर सारा प्यार !

Wednesday, March 26, 2014

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा : वसीम बरेलवी / चंदन दास

अस्सी के दशक में जब जगजीत सिंह ग़ज़ल गायिकी को एक नया स्वरूप दे रहे थे तो उनके साथ साथ ग़जल गायकों की एक अच्छी पौध तैयार हो रही थी। उस दौर में पंकज उधास, पीनाज़ मसानी, तलत अज़ीज़ के साथ जो एक और नाम चमका वो चंदन दास का था। 

आप सोच रहें होंगे कि अचानक चंदन दास की याद मुझे कैसे आ गई। दरअसल पिछले हफ्ते चंदन दास का जन्मदिन था। अंतरजाल पर एक मित्र ने उनकी एक ग़ज़ल बाँटी। जबसे वो ग़ज़ल सुनी है तबसे उसी की ख़ुमारी में जी रहे हैं। ख़ैर ग़ज़ल सुनी तो फिर शायर पर भी ध्यान गया। शायर थे वसीम बरेलवी साहब।


ज़ाहिर है बरेलवी साहब का ताल्लुक उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से है। जनाब रुहेलखंड विश्वविद्यालय में उर्दू के प्राध्यापक भी रहे। कुछ ही साल पहले वे फिराक़ इ्टरनेशनल अवार्ड से सम्मानित हुए हैं।  वसीम साहब से सबसे पहला तआरुफ जगजीत सिंह की गायी ग़ज़लों से ही हुआ था। अब भला  मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो, कि मैं जमीं के रिश्तों से कट गया यारों या फिर अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे जैसी ग़ज़लों को कोई कैसे भूल सकता है। वैसे जगजीत की गाई ग़ज़लों में में ये वाली ग़ज़ल मुझे सबसे पसंद है जिसमें वसीम कहते हैं

आपको देख कर देखता रह गया
क्या कहूँ और कहने को क्या रह गया
 
आते-आते मेरा नाम-सा रह गया
उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया

दिल हुआ कि जनाब वसीम बरेलवी को कुछ और पढ़ा जाए। पिछले चार पाँच दिनों में उनकी कई ग़ज़ले पढ़ डालीं। बरेलवी साहब का अंदाजे बयाँ मुझे बहुत कुछ बशीर बद्र साहब जैसा लगा यानि लफ्ज़ ऐसे जो कोई भी सहजता से समझ ले और गहराई ऐसी कि आप वाह वाह भी कर उठें। तो आइए आज की इस पोस्ट में उनके कुछ चुनिंदा अशआर आप की नज़र।

आज के दौर में समाज में बड़बोले और अपनी बेज़ा ताकत इस्तेमाल करने वालों का ही बोलबाला है। बरेलवी साहब बड़ी खूबसूरती से समाज के इस तबके पर इन अशआरों में तंज़ कसते नज़र आते हैं...

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है
समन्दरों ही के लहजे में बात करता है

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है


मैं हमेशा ये मानता हूँ कि व्यक्ति किसी विधा के बारे में कितना भी जान ले सीखने की गुंजाइश बनी रहती है। जैसे ही ये दंभ आया कि हम तो महारथी हो गए.. औरों की मेरे आगे क्या औकात तो समझो कि अपने सीखने की प्रक्रिया तो वहीं बंद हो गई। वसीम बरेलवी विनम्रता की जरूरत को कितने प्यारे ढंग से अपने इस शेर में समझाते नज़र आते हैं

अपने हर इक लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा


एक जगह और वो लिखते हैं
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

ये तो हुई हमारे आचार और व्यवहार की बातें। अब ज़रा देखें कि इंसानी रिश्तों और प्रेम के बारे में वसीम बरेलवी की कलम क्या कहती है? अव्वल इश्क़ तो जल्दी होता नहीं और एक बार हो गया जनाब तो उसकी गिरफ्त से निकलना भी आसान नहीं। इसीलिए बरेलवी साहब कहते हैं

बिसाते -इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते


और रिश्तों के बारे में उनके इन अशआरों की बात ही क्या
कितना दुश्वार है दुनिया ये हुनर आना भी
तुझी से फ़ासला रखना तुझे अपनाना भी

ऐसे रिश्ते का भरम रखना बहुत मुश्किल है
तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी


तो आइए अब उस ग़ज़ल की ओर रुख किया जाए जिसकी वज़ह से ये पोस्ट अस्तित्व में आई...
क्या मतला लिखा है बरेलवी साहब ने ! और अंत के दो शेर तो भई कमाल ही कमाल हैं ..एक बार सुन लीजिए फिर दिल करता है कि अपने ''उन'' के ख़यालों में डूबते हुए बार बार सुनें। क्यूँ आपको नहीं लगता ऐसा?


मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा 


ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल (बिना ताकत /हुकूमत के) है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता, बता ना देना उसे
लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा


हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा




चंदन दास और उनकी ग़ज़लों में कुछ और डूबना चाहते हों तो उनकी पसंदीदा ग़ज़लों से जुड़ी मेरी फेरहिस्त ये रही....

Saturday, March 15, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 सरताज गीत : सपना रे सपना, है कोई अपना... (Sapna Re Sapna..Padmnabh Gaikawad)

वक़्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला 2013 के सरताजी बिगुल के बजने का ! यहाँ गीत वो जिसमें लोरी की सी मिठास है, सपनों की दुनिया में झाँकते एक बाल मन की अद्भुत उड़ान है और एक ऐसी नई आवाज़ है जो उदासी की  चादर में आपको गोते लगाने को विवश कर देती है। बाल कलाकार पद्मनाभ गायकवाड़ के हिंदी फिल्मों के लिए गाए इस पहले गीत को लिखा है गुलज़ार साहब ने और धुन बनाई विशाल भारद्वाज ने। Zee सारेगामा लिटिल चैम्स मराठी में 2010 में अपनी गायिकी से प्रभावित करने वाले पद्मनाभ गायकवाड़ इतनी छोटी सी उम्र में इस गीत को जिस मासूमियत से निभाया है वो दिल को छू लेता है।

पद्मनाभ गायकवाड़

ये तीसरी बार है कि गुलज़ार और विशाल भारद्वाज की जोड़ी एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं में के सरताज़ गीत का खिताब अपने नाम कर रही है। अगर आपको याद हो तो वर्ष 2009 मैं फिल्म कमीने का गीत इक दिल से दोस्ती थी ये हुज़ूर भी कमीने और फिर 2010 में इश्क़िया का दिल तो बच्चा है जी ने ये गौरव हासिल किया था।

विशाल भारद्वाज सपनों की इस दुनिया में यात्रा की शुरुआत गायकवाड़ के गूँजते स्वर से करते हैं। गिटार और संभवतः पार्श्व में बजते पियानो से निकलकर पद्मनाभ की ऊँ ऊँ..जब आप तक पहुँचती है तो आप चौंक उठते हैं कि अरे ये गीत सामान्य गीतों से हटकर है। गुलज़ार के शब्दों को आवाज़ देने  में बड़े बड़े कलाकारों के पसीने छूट जाते हैं क्यूँकि उनका लिखा हर एक वाक्य भावनाओं की चाशनी में घुला होता है और उन जज़्बातों को स्वर देने, उनके अंदर की पीड़ा को बाहर निकालने के लिए उसमें डूबना पड़ता है जो इतनी छोटी उम्र में बिना किसी पूर्व अनुभव के पद्मनाभ ने कर के दिखाया है।


गुलज़ार को हम गुलज़ार प्रेमी यूँ ही अपना आराध्य नहीं मानते। ज़रा गीत के अंतरों पर गौर कीजिए सपनों की दुनिया में विचरते एक बच्चे के मन को कितनी खूबसूरती से पढ़ा हैं उन्होंने। गुलज़ार लिखते  हैं भूरे भूरे बादलों के भालू, लोरियाँ सुनाएँ ला रा रा रू...तारों के कंचों से रात भर  खेलेंगे सपनों में चंदा और तू। काले काले बादलों को भालू और तारों को कंचों का रूप देने की बात या तो कोई बालक सोच सकता है या फिर गुलज़ार !अजी रुकिये यहीं नहीं दूसरे अंतरे में भी उनकी लेखनी का कमाल बस मन को चमत्कृत कर जाता है। गाँव, चाँदनी और सपनों को उनकी कलम कुछ यूँ जोड़ती है पीले पीले केसरी है गाँव, गीली गीली चाँदनी की छाँव, बगुलों के जैसे रे, डूबे हुए हैं रे, पानी में सपनों के पाँव...उफ्फ

विशाल भारद्वाज का संगीत संयोजन सपनों की रहस्यमयी दुनिया में सफ़र कराने सा अहसास दिलाता है। पता नहीं जब जब इस गीत को सुनता हूँ आँखें नम हो जाती हैं। पर ये आँसू दुख के नहीं संगीत को इस रूप में अनुभव कर लेने के होते हैं।

सपना रे सपना, है कोई अपना
अँखियों में आ भर जा
अँखियों की डिबिया भर दे रे निदिया
जादू से जादू कर जा
सपना रे सपना, है कोई अपना
अँखियों में आ भर जा.....


भूरे भूरे बादलों के भालू
लोरियाँ सुनाएँ ला रा रा रू
तारों के कंचों से रात भर  खेलेंगे
सपनों में चंदा और तू
सपना रे सपना, है कोई अपना
अँखियों में आ भर जा


पीले पीले केसरी है गाँव
गीली गीली चाँदनी की छाँव
बगुलों के जैसे रे, डूबे हुए हैं रे
पानी में सपनों के पाँव
सपना रे सपना, है कोई अपना
अँखियों में आ भर जा....

वार्षिक संगीतमाला 2013 का ये सफ़र आज यहीं पूरा हुआ। आशा है मेरी तरह आप सब के लिए ये आनंददायक अनुभव रहा होगा । होली की असीम शुभकामनाओं के साथ...

Thursday, March 13, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 : पुनरावलोकन (Recap)

तो इससे पहले कि वार्षिक संगीतमाला के सरताज गीत की घोषणा करूँ एक बार पीछे पलट कर देख तो लीजिए कि मेरे लिए इस साल के पच्चीस शानदार गीत कौन से रहे ? अगर इस फेरहिस्त के हिसाब से साल के गीतकार का चयन करूँ तो वो तमगा इरशाद क़ामिल को ही जाएगा। इरशाद ने इस साल कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे जैसे मधुर गीत लिखे तो दूसरी ओर जिसको ढूँढे बाहर बाहर वो बैठा है पीछे छुपके जैसे सूफ़ियत के रंग में रँगे गीत की भी रचना की। इतना ही नहीं इरशाद क़ामिल ने आमिर खुसरो की कह मुकरनी की याद ऐ सखी साजन से ताज़ा तो की ही, दो प्रेम करने वालों को पिछले साल शर्बतों के रंग और मीठे घाट के पानी जैसे नए नवेले रूपकों से नवाज़ा। 


 वार्षिक संगीतमाला 2013 संगीत के सितारे

इरशाद क़ामिल के आलावा अमिताभ भट्टाचार्य ने भी  सँवार लूँ, ज़िदा, कबीरा व तितली जैसे कर्णप्रिय गीत रचे। प्रसून जोशी ने भी भाग मिल्खा भाग के लिए कमाल के गीत लिखे। पर धुरंधरों में जावेद अख़्तर की अनुपस्थिति चकित करने वाली थी। मेरे पसंदीदा गीतकार गुलज़ार ने विशाल भारद्वाज की फिल्मों मटरू की बिजली.. और एक थी डायन के गीत लिखे। उनका लिखा गीत ख़ामख़ा मुझे बेहद पसंद है पर विशाल अपनी आवाज़ और धुन से उन बोलों के प्रति न्याय नहीं कर सके वैसे भी गुलज़ार की कविता कभी कभी गीत से ज्यादा यूँ ही पढ़ने में  सुकून देती है..विश्वास नहीं होता तो गीत के इस अंतरे को पढ़ कर देखिए

सारी सारी रात का जगना
खिड़की पे सर रखके उंघते रहना
उम्मीदों का जलना-बुझना
पागलपन है ऐसे तुमपे मरना
खाली खाली दो आँखों में
ये नमक, ये चमक, तो ख़ामख़ा नहीं...


संगीतकारों में इस साल की सफलताओं का सेहरा बँट सा गया। लुटेरा में अमित त्रिवेदी, रांझणा में ए आर रहमान और भाग मिल्खा भाग में शंकर एहसान लॉय ने कमाल का संगीत दिया। नये संगीतकारों में अंकित तिवारी ने सुन रहा है के माध्यम से काफी धूम मचाई। सचिन जिगर ने शुद्ध देशी रोमांस में अब तक का अपना सबसे बेहतर काम दिखाया। प्रीतम बर्फी जैसा एलबम तो इस साल नहीं दे पाए पर  ये जवानी है दीवानी, फटा पोस्टर निकला हीरो, Once upon a time in Mumbai दोबारा के उनके कुछ गीत बेहद सराहे गए।

गायकों में ये साल बिना किसी शक़ अरिजित सिंह के नाम रहा। तुम ही हो और लाल इश्क़ जैसे गीतों को जिस तरह डूब कर उन्होंने गाया है वो आम लोगों और समीक्षकों दोनों द्वारा सराहा गया है। वैसे कुछ नए पुराने कलाकारों ने पिछले साल अपनी खूबसूरत आवाज़ की बदौलत कुछ गीतों को यादगार बना दिया। चैत्रा अम्बादिपुदी द्वारा बेहद मधुरता से गाया कौन मेरा, मिल्खा के पैरों में जोश भरते आरिफ़ लोहार,मस्तों का झुंड में थिरकने पर मजबूर करते दिव्य कुमार, ये तूने क्या किया वाली कव्वाली में अपनी गहरी आवाज़ का जादू बिखेरते जावेद बशीर, अपनी आवाज़ की मस्ती से स्लो मोशन अंग्रेजा में झुमाने वाले सुखविंदर सिंह,भागन के रेखन की बँहगिया में एक प्यारी बन्नो का अपने परिवार से जुदाई का दर्द उभारती मालिनी अवस्थी  और झीनी झीनी में अपनी शास्त्रीय गायिकी से मन मोहते उस्ताद राशिद खाँ पिछले साल की कुछ ऐसी ही मिसालें हैं।

साल के सरताज गीत के बारे में तो आप अगली प्रविष्टि में जानेंगे (वैसे ये बता दूँ कि ऊपर के कोलॉज  में सरताज गीत से जुड़े सभी कलाकारों की तसवीर मौज़ूद है।) तब तक एक नज़र इस संगीतमाला के पिछले चौबीस गीतों पर एक नज़र...

वार्षिक संगीतमाला 2013

Saturday, March 08, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 रनर्स अप : तुझ संग बैर लगाया ऐसा, रहा ना मैं फिर अपने जैसा (Laal Ishq )

वार्षिक संगीतमाला के पिछले दो महीनों का सफ़र पूरा करने के बाद  आज बारी है शिखर से बस एक पॉयदान दूर रहने वाले गीत की और दोस्तों यहाँ पर गीत है फिल्म गोलियों की रासलीला यानि रामलीला का। संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्मों के संगीत से मेरी हमेशा अपेक्षाएँ रही हैं। इसकी वज़ह है हम दिल दे चुके सनम, देवदास और साँवरिया का मधुर संगीत। पर जब वार्षिक संगीतमाला के गीतों के चयन के लिए मैंने रामलीला का गीत संगीत सुना तो मुझे निराशा ही हाथ लगी सिवाए इस एक गीत के। पिछले महीने जब ये फिल्म टीवी पर दिखाई गयी तो मेरी उत्सुकता सबसे ज्यादा इस गीत का फिल्मांकन देखने की थी। भगवान जाने देश के अग्रणी समाचार पत्रों ने क्या सोचकर इस फिल्म को पाँच स्टार से नवाज़ा था। गीत का इंतज़ार करते करते मुझे पूरी फिल्म झेलनी पड़ी क्यूँकि पूरा  गीत फिल्म में ना होकर उसकी credits के साथ आया। 


फिल्म चाहे जैसी हो दूसरी पॉयदान के इस गीत को बंगाल के मुर्शीदाबाद से ताल्लुक रखने वाले अरिजित सिंह ने जिस भावप्रवणता से गाया है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। मुखड़े के पहले का उनका आलाप और फिर पीछे से उभरता कोरस आपका ध्यान खींच ही रहा होता है कि अरिजित की लहराती सी आवाज़ आपके दिल का दामन यूँ पकड़ती है कि गीत सुनने के घंटों बाद भी आप उसकी गिरफ़्त से मुक्त होना नहीं चाहते।

मेरे लिए ये आश्चर्य की बात थी कि इस फिल्म में संजय लीला भंसाली ने संगीत निर्देशन की कमान भी खुद ही सँभाली है। संजय ने  पूरे गीत में ताल वाद्यों के साथ  मजीरे का इस्तेमाल किया है। साथ ही अंतरों के बीच गूँजती शहनाई भी कानों को सुकून देती है। संजय कहते हैं कि गुजारिश के गीतों को संगीतबद्ध करने के बाद मुझे ऐसा लगा कि एक निर्देशक से ज्यादा कौन समझ सकता है कि पटकथा को किस तरह के संगीत की जरूरत है। मैं ऐसा संगीत रचने की कोशिश करता हूँ  जिसे मैं या मेरे साथ काम करने वाले गुनगुना सकें..गा सकें।

वार्षिक संगीतमाला में शामिल पिछले कुछ गीतों की तरह इस गीत के गीतकार द्वय भी फिल्म के पटकथा लेखक हैं। सिद्धार्थ और गरिमा की इस जोड़ी के लिए ये पहला ऐसा मौका था।

वैसे इस फिल्म के गीतों को लिखने और संजय के साथ काम करने का उनका अनुभव कैसा रहा ये जानना भी आपके लिए दिलचस्प रहेगा..संजय के साथ गीत संगीत को लेकर होने वाली तकरारों  के बारे में वे कहते हैं
"संगीत और बोल, सितार और तबले की तरह हैं। जुगलबंदी तो बनती है। कोई बोल सुनाने के बाद संजय सर की पहली प्रतिक्रिया एक चुप्पी होती थी। हम लोग उनसे पूछते थे सर वो अंतरा आप को कैसा लगा? उनका जवाब होता वो अंतरा नहीं संतरा था। और कुछ ही दिनों बाद संजय सर उस संतरे पर अपनी शानदार धुन बना देते। गीत के बोलों पर उनकी सामान्य सी प्रतिक्रिया कुछ यूँ होती थी तुम कितने cheap हो सालों !"
सिद्धार्थ गरिमा ने इश्क़ को इस गीत में लाल, मलाल, ऐब और बैर जैसे विशेषणों से जोड़ा है जो फिल्म की कथा के अनुरूप है। इश्क़  में मन के हालात को वो बखूबी बयाँ करते हैं जब वो लिखते हैं तुझ संग बैर लगाया ऐसा..रहा ना मैं फिर अपने जैसा। अब इस बैरी इश्क़ का खुमार ऐसा है कि दिल कह रहा है कि ये काली रात जकड़ लूँ ...ये ठंडा चाँद पकड़ लूँ आप मेरे साथ ये कोशिश करेंगे ना ?

ये लाल इश्क़, ये मलाल इश्क़
यह ऐब इश्क़, ये बैर इश्क़
तुझ संग बैर लगाया ऐसा
तुझ संग बैर लगाया ऐसा

रहा ना मैं फिर अपने जैसा
हो.. रहा ना मैं फिर अपने जैसा
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम, तेरा नाम
मेरा नाम इश्क़
ये लाल इश्क़, ये मलाल इश्क़
यह ऐब इश्क़, ये बैर इश्क़

अपना नाम बदल दूँ.. (बदल दूँ)
या तेरा नाम छुपा लूँ (छुपा लूँ)
या छोड़ के सारी याद मैं बैराग उठा लूँ
बस एक रहे मेरा काम इश्क़
मेरा काम इश्क़, मेरा काम इश्क़
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम, तेरा नाम...

ये काली रात जकड लूँ
ये ठंडा चाँद पकड़ लूँ
ओ.. ये काली रात जकड लूँ
ये ठंडा चाँद पकड़ लूँ
दिन रात के अँधेरी भेद का
रुख मोड के मैं रख दूँ
तुझ संग बैर लगाया ऐसा
रहा ना मैं फिर अपने जैसा
हो.. रहा ना मैं फिर अपने जैसा
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
मेरा नाम, तेरा नाम...



Sunday, March 02, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान # 3 : कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे (Kaun Mera...Chaitra )

वार्षिक संगीतमाला की तीसरी पायदान पर एक ऐसा गीत है जिसके मुखड़े को गुनगुना कर उसमें छुपी मधुरता को आप महसूस कर लेते हैं। पिछले छः महिने से इस गीत की गिरफ्त में हूँ और आज भी इसे सुनते हुए मेरा जी नहीं भरता। ये गीत है फिल्म स्पेशल 26 से और इसके संगीतकार हैं एम एम करीम ( M M Kreem)। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इस नाम का वो प्रयोग सिर्फ हिंदी फिल्मों के लिए करते हैं। वैसे उनका असली नाम एम एम कीरावानी (M M Keeravani)  है। 


आँध्रप्रदेश से आने वाले करीम ने सभी दक्षिण भारतीय भाषाओं में संगीत दिया है। हिंदी फिल्मों में अपना हुनर दिखाने का पिछले दो दशकों में जब भी उन्हें मौका मिला है, उन्होंने अपने प्रशंसकों को कभी निराश नहीं किया है। याद कीजिए नब्बे के दशक मैं फिल्म क्रिमिनल के गीत तुम मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए ने क्या धमाल मचाया था। फिर फिल्म इस रात की सुबह नहीं का उनका गीत तेरे मेरे नाम नहीं है और चुप तुम रहो बेहद चर्चित हुए थे। इसके बाद जख़्म, सुर, जिस्म और रोग जैसी फिल्मों में उनका संगीत सराहा गया।

फिल्म स्पेशल 26 के लिए करीम ने बतौर गीतकार इरशाद क़ामिल को चुना और देखिए क्या मुखड़ा लिखा उन्होंने..
कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे
क्यों तू बाँधे, मन से मन के धागे
बस चले ना क्यों मेरा तेरे आगे

समझ नहीं आता ना कि जब हम किसी अनजान को पसंद करने लगते हैं तो फिर दिल के तार उसकी हर बात और सोच से जुड़ने से लगते हैं और फिर ये असर इतना गहरा हो जाता है कि अपने आप पर भी वश नहीं रहता।

एम एम करीम ने इस रूमानी गीत को तीन अलग अलग कलाकारों पापोन, सुनिधि चौहान और चैत्रा से गवाया है। पर मुझे इन सबमें चैत्रा अम्बादिपुदी (Chaitra Ambadipudi) का गाया वर्सन पसंद है। करीम गीत की शुरुआत पिआनो और फिर बाँसुरी से करते हैं। इंटरल्यूड्स में वॉयलिन की धुन आपका ध्यान खींचती है पर इन सब के बीच चैत्रा अपनी मीठी पर असरदार आवाज़ से श्रोताओं का मन मोह लेती हैं।

तेलुगु फिल्मों में ज्यादातर गाने वाली बाइस वर्षीय चैत्रा के लिए हिंदी फिल्मों में गाने का ये पहला अवसर था। दिलचस्प बात यह भी है कि चैत्रा एक पार्श्व गायिका के साथ साथ सॉफ्टवेयर इंजीनियर भी हैं और फिलहाल माइक्रोसॉफ्ट में कार्यरत हैं। अपनी गुरु गीता हेगड़े से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने वाली चैत्रा दक्षिण भारतीय फिल्मों में सौ से भी ज़्यादा नग्मों में अपनी आवाज़ दे चुकी हैं। वैसे उन्हें जितना संगीत से लगाव है उतना ही सॉफ्टवेयर से भी है और वे दोनों क्षेत्रों में अपना हुनर दिखाना चाहती हैं। तो आइए पहले सुनें उनकी सुरीली आवाज़ में ये बेहद मधुर नग्मा


कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे
क्यों तू बाँधे, मन से मन के धागे
बस चले ना क्यों मेरा तेरे आगे


छोड़ कर ना तू कहीं भी दूर अब जाना
तुझको कसम हैं
साथ रहना जो भी हैं तू
झूठ या सच हैं, या भरम हैं
अपना बनाने का जतन कर ही चुके अब तो
बैयाँ पकड़ कर आज चल मैं दूँ, बता सबको

ढूंढ ही लोगे मुझे तुम हर जगह अब तो
मुझको खबर हैं
हो गया हूँ तेरा जब से मैं हवा में हूँ
तेरा असर है
तेरे पास हूँ, एहसास में, मैं याद में तेरी
तेरा ठिकाना बन गया अब साँस में मेरी


इस गीत का पापोन वाला वर्सन भी श्रवणीय है। उनकी आवाज़ का तो मैं हमेशा से कायल रहा हूँ। एम एम करीम ने बस यहाँ संगीत का कलेवर पश्चिमी रंग में रँगा है।

 

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स्पष्टीकरण

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