Sunday, June 29, 2014

बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना :जब पंचम ने पकड़ा शास्त्रीयता का दामन ( Beeti na Bitai Raina...)

27 जून यानि परसों पंचम का पचहत्तरवाँ जन्म दिन मनाया गया। पंचम के बारे में एक बात लगातार कही जाती रही है कि ‌उन्होंने नई आवाज़ और बीट्स से सबका परिचय कराया। पुराने साजों के अलग तरीके से इस्तेमाल के साथ साथ उन्होंने कई नए वाद्य यंत्रों का भी प्रचलन किया। दरअसल यही पंचम की शैली थी। अपने बाबा सचिन देवबर्मन से उन्होंने बहुत कुछ सीखा पर वो उनसे हमेशा कुछ अलग करना चाहते थे। 

पर राग और रागिनियों के बारे में पंचम की जानकारी बिल्कुल नहीं हो ऐसा भी नहीं था। बचपन में उन्होंने ब्रजेन विश्वास से तबला सीखा। सरोद सीखने के लिए उन्हें अली अकबर खान के पास भेजा गया। अली अकबर खान और पंडित रविशंकर के बीच की सरोद और सितार के बीच की लंबी जुगलबंदी को भी उन्हें लगातार सुनने का मौका मिला। यही वज़ह है कि पंचम ने जब भी राग आधारित गीतों की रचना की, अपने प्रशंसकों की नज़र में खरे उतरे।

पंचम और गुलज़ार का आपसी परिचय बंदिनी से शुरु हुआ जिसमें पंचम सचिन दा के सहायक का काम निभा रहे थे और गुलज़ार गीतकार का (वैसे तो फिल्म के अन्य गीत शैलेंद्र से लिखवाए गए थे पर मोरा गोरा अंग लई ले के लिए गुलज़ार को याद किया गया था)। पर बतौर निर्देशक गुलज़ार ने पंचम के साथ पहली बार सत्तर के दशक में फिल्म परिचय के लिए काम किया। इस फिल्म के सारे गीत काफी चर्चित हुए। पर उनमें एक गीत बाकियों से पंचम के लिए इन अर्थों में भिन्न था कि वो पहली बार शास्त्रीय राग आधारित किसी युगल गीत का संगीत निर्देशन कर रहे थे। ये गीत था बीते ना बिताई रैना...। 


कई बार गीत की धुन इतनी प्यारी होती है कि हम बिना उसका अर्थ समझे भी उसे गुनगुनाने लगते हैं। स्कूल के समय पहली बार सुने इस गीत को मैं कॉलेज के ज़माने तक चाँद की बिन दीवाली बिन दीवाली रतिया  :) समझकर गाता रहा। मुझे कुछ ऐसे लोग भी मिले जो इसे 'चाँद के बिन दीवानी बिन दीवानी रतिया..' समझते रहे। ख़ैर किसी संगीत मर्मज्ञ ने जब ये बताया कि गुलज़ार यहाँ चाँद की बिंदी वाली रतियों की बात कर रहे हैं तो गीत के प्रति मेरी आसक्ति और बढ़ी।

पंचम ने राग यमन और खमाज़ को मिला जुलाकर जो धुन तैयार की उसमें सितार और तबले को प्रमुखता से स्थान मिला। एक ओर पंचम की मधुर धुन थी तो दूसरी ओर गुलज़ार के बेमिसाल शब्द। क्या क्या उद्धृत करूँ? भींगे नयनों से रात को बुझाने की बात हो या फिर रात को चाँद की बिदी जैसा दिया गया विशेषण। पंचम दा ने स्वर कोकिला लता मंगेशकर के साथ इस गीत में भूपेंद्र की धीर गंभीर आवाज़ का प्रयोग किया जो फिल्म में संजीव कुमार पे खूब फबी। आज भी जब रात में नींद कोसों दूर होती है और मन अनमना सा रहता है तो इस गीत को गुनगुनाना बेहद सुकून पहुँचाता है। वैसे भी गुजरी ज़िदगी के बीते हुए लमहों और उन्हें खास बनाने वाले लोग अगर किसी गीत के माध्यम से याद आ जाएँ तो आँखों में उभर आए आँसुओं के कतरे ओस की बूँदों की तरह मन के ताप को हर ही लेते हैं। तो आइए सुनते हैं इस गीत को...


बीती ना बिताई रैना, बिरहा की जाई रैना
भीगी हुई अँखियों ने लाख बुझाई रैना

बीती हुयी बतियाँ कोई दोहराए
भूले हुए नामों से कोई तो बुलाये
चाँद की बिंदी वाली, बिंदी वाली रतिया
जागी हुयी अँखियों में रात ना आयी रैना

युग आते है, और युग जाए
छोटी छोटी यादों के पल नहीं जाए
झूठ से काली लागे, लागे काली रतिया
रूठी हुयी अँखियों ने, लाख मनाई रैना


जया जी ने एक बार अमीन सायनी को दिये साक्षात्कार में कहा था कि हम लोग इस गाने की शूटिंग करते समय इतने डूब गए थे कि ऐसा लग रहा था कि गाने के भाव हमारी असल ज़िंदगी में घटित हो रहे हैं। हालात ये थे कि मैं, संजीव कुमार और सेट पर मौज़ूद टेकनीशियन सब की आँखें भींगी हुई थी शूट के बाद।

इस गीत के लिए उस साल यानि 1972 का सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का पुरस्कार लता मंगेशकर को मिला। पंचम भले ही कोई इस फिल्म या गीत के लिए पुरस्कार ना जीत पाएँ हों पर उन्होंने बतौर संगीतकार उन लोगों के मन में आदर का भाव जागृत कराया जो उन्हें सिर्फ पश्चिमी संगीत के भारतीयकरण करने में ही पारंगत मानते थे।

Monday, June 23, 2014

ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए..मज़रूह की यादों में सचिन दा Aise to na Dekho .. Majrooh remembers S D Burman

पिछली पोस्ट में तीन देवियाँ फिल्म के गीत के बारे में चर्चा करते वक़्त बात हुई थी मज़रूह साहब के बारे में। आज आपसे गुफ़्तगू होगी इसी फिल्म के एक और गीत के बारे में। पर रफ़ी साहब के गाए इस नाज़ुक से नग्मे का जिक्र करूँ, उससे पहले आपको ये बताना चाहूँगा कि मज़रूह साहब कैसे याद करते थे सचिन देव बर्मन साहब के साथ गुजरे उन सालों को।

आपको बता ही चुका हूँ मज़रूह कम्यूनिस्ट विचारधारा से काफी प्रभावित थे। सचिन दा से उनकी पहली मुलाकात वामपंथियों के एक सम्मेलन में कोलकाता में हुई थी। सचिन दा ने मज़रूह से पहले साहिर लुधयानवी के साथ कुछ फिल्मों में काम किया। फिर किसी बात पर उनकी साहिर से अनबन हो गई तो उन्होंने मज़रूह को फिल्म Paying Guest के गाने लिखने के लिए बुलाया। 

मज़रूह को परिस्थिति दी गयी कि एक वकील अपनी महबूबा के लिए गा रहा है। मज़रूह ने सोचा वकील है थोड़ा सौम्य होगा तो उसी मिजाज़ का गाना लिख कर दे दिया। निर्देशक उनके इस प्रयास से तनिक भी खुश नहीं हुए कहा पहले फिल्म देखिए फिर गाना लिखिए। मज़रूह ने फिल्म देखी और अपना सिर ठोक लिया। उन्होंने कहा कि आपने मुझसे वकील के लिए गाना लिखने को क्यूँ कहा? सीधे कहते कि एक लोफ़र के लिए गाना लिखना है जो इक लड़की के पीछे पड़ा है और तब मज़रूह ने लिखा माना जनाब ने पुकारा नहीं, क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं जो बेहद लोकप्रिय हुआ।

बिमल दा की फिल्म में मज़रूह ने सचिन दा के लिए एक गाना लिखा जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये...। इस कालजयी गीत (जो मुझे बेहद प्रिय है) के बारे में मैंने पहले यहाँ भी लिखा था पर फिल्म में इस गीत को फिल्माने पर विवाद खड़ा हो गया। फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से ये गीत नायक नायिका द्वारा टेलीफोन करते हुए फिल्माया जाना था पर विमल दा जैसे यथार्थवादी निर्देशक फिल्म के नाम पर इतनी सिनेमेटिक लिबर्टी लेने के लिए तैयार नहीं थे। मज़रूह बताते हैं आमतौर पर डरपोक समझे जाने वाले सचिन दा इस बार बहादुरी से अड़ गए और थोड़ी देर इधर उधर टहलने के बाद बिमल दा से बोले "अगर तुम इस फिल्म में मेरा गाना नहीं लेगा तो हम पिक्चर नहीं करेगा"। सचिन दा के इस रूप को देखने के बाद बिमल दा को उनकी बात माननी पड़ी और इतिहास गवाह है कि इस गीत ने कितनी वाहवाहियाँ बटोरीं।

सचिन दा के बारे में मशहूर था कि वो अपने यहाँ आने वालों को चाय नाश्ते के लिए ज़्यादा नहीं पूछते थे। इसी मद्देनज़र मज़रूह साहब ने एक किस्सा बयाँ किया था। वाक़या ये था कि
एक बार सचिन दा , उनका सहायक, साहिर और मज़रूह गाड़ी से चर्चगेट से कहीं जा रहे थे। रास्ते में सचिन दा ने एक केला निकाला और खाने लगे। फिर उन्होंने साहिर से पूछा "कोला लेगा"? साहिर और मज़रूह अचरज़ में पड़ गए कि कहाँ से सचिन दा का दरिया - ए  -रहमत जोश मारने लगा ? अभी दोनों इसी असमंजस में थे कि सचिन दा ने कहा ड्राइवर गाड़ी रोको और फिर साहिर की ओर मुख़ातिब होकर बोले जाओ ओ दिखता है... जा कर ले लो।

सचिन दा के बारे में मज़रूह की याद की पोटलियों से निकले कई किस्से और भी हैं पर वो फिर कभी। आइए अब बात की जाए तीन देवियों के इस बेहद प्यारे से नग्मे की।

 
सचिन दा इस बाद के हिमायती थे कि गीत में उतना ही संगीत दिया जाए जितनी जरूरत हो। कहीं बेख्याल हो कर कहीं छू लिया किसी ने में आप इसका नमूना देख ही चुके हैं पर जहाँ तक ऐसे तो ना देखो की बात है यहाँ सचिन दा की शुरुआती धुन और इंटरल्यूड्स गीत के मूड में और जान डाल देते हैं। राग ख़माज पर आधारित इस गीत को हिंदुस्तानी ज़ुबान की जिस रससिक्त चाशनी में घोला है मज़रूह ने कि बोलों को पढ़कर ही मन में एक ख़ुमार सा छाने लगता है। अब इसी अंतरे को लीजिए यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें..बढ़ के बेखुदी हँसीं गेसू खोलें..खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

अब आप ही बताइए काजल से सजी आँखों के बीच किसी की बेसाख्ता सी हँसी उनके बालों की लटों को लहरा दे तो आसमान में बदली छाए ना छाए दिल तो इन काली घटाओं के आगोश में भींग ही उठेगा ना। रफ़ी ने इसी चाहत को गीत के हर अंतरे में अपनी अदाएगी के द्वारा इस तरह उभारा मानो वो ख़ुद मदहोशी की हालत में गाना गा रहे हों। तो आइए आज की शाम जाम के तौर पर इस गीत का रसपान किया जाए


ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए
ख़ूबसूरत सी कोई हमसे ख़ता हो जाए

तुम हमें रोको फिर भी हम ना रुकें
तुम कहो काफ़िर फिर भी ऐसे झुकें
क़दम-ए-नाज़ पे इक सजदा अदा हो जाये

ऐसे तो न देखो....

यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें
बढ़ के बेखुदी हँसीं गेसू खोलें
खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

ऐसे तो न देखो.....

हम तो मस्ती में जाने क्या क्या कहें
लब-ए-नाज़ुक से ऐसा ना हो तुम्हें
बेक़रारी का गिला हम से सिवा हो जाये
ऐसे तो न देखो
.....

फिल्म तीन देवियाँ में ये गीत देव आनंद और नंदा पर फिल्माया गया था।

Saturday, June 14, 2014

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने... जब मज़रूह की ग़ज़ल परवान चढ़ी रफ़ी की आवाज़ में (Mazrooh, Rafi in Teen Deviyan)

पिछले हफ्ते गुजरे सालों के सुपरस्टार देवानंद पर फिल्माए गानों को देख रहा था। साठ के दशक में किशोर को देव आनंद की आवाज़ का पर्याय माना जाने लगा था , पर अगर गौर किया जाए तो इसी दौरान मोहम्मद रफ़ी को भी पर्दे पर देव आनंद की आवाज बनने के मौके मिले जिन्हें उन्होंने खूबसूरती से निभाया भी। ऐसी ही एक फिल्म थी 1965 में प्रदर्शित हुई 'तीन देवियाँ' जिसके संगीतकार थे सचिन देव बर्मन और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी। फिल्म तो निहायत औसत दर्जे की थी पर इसका संगीत इतना मशहूर हुआ कि फिल्म को हिट करा गया।


मज़रूह साहब कमाल के गीतकार थे। अब आप ही बताइए कि जिस शख़्स ने 1946 में 'शाहजहाँ' के गीतों को लिख कर शोहरत पाई हो और जो उसके पाँच दशकों के बाद भी 'क़यामत से क़यामत तक' और 'जो जीता वही सिंकदर' जैसी फिल्मों के गीतों को लिखकर युवा दिलों पर राज करता रहा ऐसी उपलब्धि उनसे पहले किस गीतकार के हाथ लगी थी? यही वज़ह थी कि किसी गीतकार को अगर फिल्म जगत का सबसे बड़ा 'दादा साहब फालके पुरस्कार' सबसे पहले मिला तो वो मज़रूह साहब ही थे।

पर वास्तव में मज़रूह साहब को अंत तक इस बात का मुगालता रहा कि पुरस्कार मिला भी तो गीतकार की हैसियत से जबकि उनका सपना हमेशा अपने समकालीन फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तरह एक प्रतिष्ठित ग़ज़लकार बनने का ही था। चालीस के दशक में वो मुंबई एक मुशायरे में शिरक़त करने ही आए थे और उनकी ग़ज़लों से प्रभावित हो कर एक निर्माता नेजब उन्हें गीतकार बनने का मौका दिया तो उन्होंने उसे ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि ये इज़्ज़त की नौकरी नहीं है। पर जिगर मुरादाबादी के ये समझाने पर कि बतौर जीविका चलाने के लिए तुम ये काम करो, बाकी ग़ज़लें लिखते रहो....वो मान गए। पचास के दशक के बाद से ये धारदार कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा को कार्यान्वित ना होते देख उसमें सक्रिय भागीदारी से तो विमुख हो ही गया था, साथ ही वक़्त के साथ ग़ज़लों से भी दूर होता चला गया।

गीतकार के रूप में इतनी सफलता हाथ लगी कि उन्हें अपने हुनर पर और समय देने का अवसर ही नहीं मिला। पर जब जब फिल्मों में ग़ज़ल लिखने का उन्हें मौका मिला उन्होंने अपना कौशल दिखाने में कोताही नहीं की। अब तीन देवियाँ फिल्म के इस गीत को लें क्या मतला (प्रारंभिक शेर) लिखा था मज़रूह ने

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने

मैं तो कहता हूँ बस इसी शेर को गुनगुनाते हुए घंटों निकालें जा सकते हैं। कितनी आम सी बात को इस करीने से पकड़ा मज़रूह साहब ने कि तन मन गुदगुदा उठे। वैसे बाकी के मिसरे भी अच्छे भले हैं और रफ़ी की आवाज़ का साथ पाकर और फड़क उठे हैं।

वैसे मज़रूह अगर सामने होते तो एक बात जरूर पूछता उनसे जब गाना देव आनंद गा रहे थे तो फिर चौथे मिसरे में 'किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने' कैसे कह गए? कोई स्त्रीसूचक शब्द जैसे महज़बीं/दिलनशीं और मुनासिब होता। शायद शेर के बहर यानि मीटर की बंदिशों को तोड़ना उन्हें गवारा ना लगा हो।

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने , कहीं बेख़याल होकर

मेरे दिल मैं कौन है तू, कि हुआ जहाँ अँधेरा
वहीं सौ दिये जलाये, तेरे रुख़1 की चाँदनी ने
 
कभी उस परी का कूचा, कभी इस हसीं की महफ़िल
मुझे दरबदर फिराया, मेरे दिल की सादगी ने

है भला सा नाम उसका, मैं अभी से क्या बताऊं
किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने

अरे मुझपे नाज़ वालों, ये नयाज़मन्दियाँ2 क्यों
है यही करम तुम्हारा, तो मुझे ना दोगे जीने

कई ख्वाब.....कहीं बेख़याल होकर

1. चेहरा, 2.अहसान


सचिन देव बर्मन के साथ इसी फिल्म में मजरूह ने एक और प्यारा गीत लिखा था जो मुझे इससे भी प्यारा लगता है। पर अभी मैं आपको इस गीत की ख़ुमारी से जगाना नहीं चाहता तो उस गीत की बातें अगली प्रविष्टि में।

Sunday, June 08, 2014

सीखो ना नैनों की भाषा पिया. Seekho Na Nainon Ki Bhasha Piya

करीब तीन हफ्तों के लंबे अंतराल के बाद इस ब्लॉग पर लौट रहा हूँ। क्या करूँ घर की एक शादी, फिर कनाडा का अनायास दौरा और वापस लौटकर कार्यालय की व्यस्तताओं ने यहाँ चाह कर भी आने की मोहलत नहीं दी। पर कभी कभी इन व्यस्तताओं के बीच भी कुछ मधुर सुनने को मिल जाता है। अब इसी गीत की बात लीजिए। इसे पिछले हफ्ते अपने कार्यालयी दौरों के बीच एक शाम मित्रों के साथ गाने गुनगुनाने की बैठक में पहली बार सुना और तबसे ही इसकी गिरफ्त में हूँ। तो सोचा आप तक इसे पहुँचा कर इस गिरफ़्त से आज़ादी ले लूँ। 

इस गीत को गाया है हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ हिंदी पॉप में भी अपना दखल देने वाली शुभा मुद्गल जी ने। शुभा जी की आवाज़ जहाँ एक ओर पारंपरिक ठुमरी, ख़याल और दादरा की याद दिला देती है वहीं अली मोरे अँगना, अब के सावन, प्यार के गीत सुना जा रे जैसे गैर फिल्मी गीतों की भी, जो दस पन्द्रह साल पहले बेहद लोकप्रिय हुए थे और आज भी लोगों के दिलो दिमाग से गए नहीं हैं। 1999 में उनका एक एलबम आया था 'अब के सावन' जिसे संगीतबद्ध किया था शान्तनु मोइत्रा ने । इस एलबम का एक गीत था 'सीखो ना नैनों की भाषा पिया..' जिसे लिखा था प्रसून जोशी ने।


काव्यात्मक गीतों की रचना में आज प्रसून जोशी अग्रणी गीतकारों में माने जाते हैं। ये गीत इस बात को साबित करता है कि उनका ये हुनर उनके शुरुआती दिनों से उनके साथ रहा है।  रूपा पब्लिकेशन द्वारा पिछले साल अपनी प्रकाशित पुस्तक Sunshine Lanes में इस गीत की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है..
"मैंने इस गीत पर दिल्ली में काम करना शुरु किया क्यूँकि उस वक़्त वही मेरा ठिकाना था। पर जब 'अब के सावन' एलबम के गीतों की रिकार्डिंग शुरु हुई तो मुझे रिकार्डिंग टीम के साथ मुंबई जाना पड़ा। वहीं जुहू के शांत होटल के एक कमरे में ये गीत अपनी आख़िरी शक़्ल ले सका। ठुमरियाँ लिखना मुझे हमेशा से प्रिय रहा है। ये गीत भले ठुमरी की परिभाषा में पूरी तरह ख़रा नहीं उतरता पर फिर भी उसकी सुगंध को गीत की अदाएगी के साथ आप महसूस कर सकते हैं।
किसी भी प्रेमी की सबसे बड़ी हसरत उसे समझे जाने की होती है। सिर्फ शब्दों के ज़रिए नहीं पर उन छोटी छोटी बातों से जो उसकी भावनाओं और भाव भंगिमाओं में रह रह कर प्रकट होती हैं। मैंने इस गीत में इसी भाव को और गहराई से परखने की कोशिश की। वैसे तो ये गीत नारी मनोभावों को ज़रा ज्यादा छूता है पर ऐसा भी नहीं है कि पुरुषों में अपने आप को समझे जाने की चाहत नहीं होती।"
प्रसून की बातें तो आपने पढ़ लीं। ज़रा देखिए उन्होंने इस गीत में लिखा क्या है..

सीखो ना नैनों की भाषा पिया
कह रही तुमसे ये खामोशियाँ
सीखो ना
लब तो ना खोलूँगी मैं समझो दिल की बोली
सीखो ना नैनों की भाषा पिया...

सुनना सीखो तुम हवा को
सनन सन सनन सन कहती है क्या
पढ़ना सीखो.. सल..वटों को
माथे पे ये बलखा के लिखती हैं क्या

आहटों की है अपनी जुबाँ
इनमें भी है इक दास्तान
जाओ जाओ जाओ जाओ जाओ पिया

सीखो ना नैनों की भाषा...

ठहरे पानी जैसा लमहा
छेड़ो ना इसे हिल जाएँगी गहराइयाँ
थमती साँसों के शहर में
देखो तो ज़रा बोलती हैं क्या परछाइयाँ

कहने को अब बाकी है क्या
आँखों ने सब कह तो दिया
हाँ जाओ जाओ जाओ जाओ जाओ पिया

इसीलिए हुज़ूर अगली बार जब अपने प्रियतम के साथ हों तो बहती हवा की सनसनाहट में ये देखना ना भूलिए कि वो उन्हें गुदगुदा रही है या उकता रही है। अगर वो एकटक आपकी आँखों में आँखें डाले बैठे हों तो कुछ बोल कर प्रेम में डूबे उन गहरे जज़्बातों को हल्का ना कीजिए।बल्कि उनके साथ उनमें और डूबिए। वो लमहा तो गुजर जाएगा पर उसकी कसक, उसकी मुलायमियत आप वर्षों महसूस कर सकेंगे।

बहरहाल मैंने जिस दिन ये गीत सुना उस दिन ना तो फिज़ाओं में हवाएँ थीं और ना तो आकाश की गोद में उमड़ती घटाएँ। थी तो बस ढलती शाम में एक प्यारी सी आवाज़ जो गीत के बोलों के उतार चढ़ावों , उसकी भावनाओं को भली भांति प्रतिध्वनित करती हुई गर्मी की उस उष्णता को शीतलता में बदल रही थी। शायद यही कारण था कि शाखों से झूलते पत्ते भी बिना हिले डुले एकाग्रचित्त होकर इस गीत का आनंद ले रहे थे। 

इस गीत को सुनने के बाद मैंने तुरंत घर आकर शुभा मुद्गल की आवाज़ में इस गीत को सुना। पर अपने प्रिय संगीतकार शान्तनु मोइत्रा के संगीत संयोजन ने मुझे बेहद निराश किया। इस गीत को एक ठहराव और सुकून वाले न्यूनतम संगीत संयोजन की जरूरत थी जिसका मज़ा शान्तनु ने गीत के साथ चलती ताल वाद्यों की गहरी बीट्स से थोड़ा तो जरूर खराब कर दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो शुभा जी की गायिकी और निखर कर  सामने आती।

नेट पर मैंने इस गीत को बिना संगीत के सुनना चाहा और मुझे कई अच्छी रिकार्डिंग्स हाथ लगी। उनमें से एक थी निकिता दाहरवाल की सो वही आपको पहले सुना रहा हूँ। इसी गीत को युवा गायिका और फिलहाल इंग्लैंड में अपनी शिक्षा पूरी कर रही निकिता दहरवाल ने भी पूरे मनोयोग से गाया है। निकिता की आवाज़ की तुलना शुभा जी की खुले गले वाली गहरी आवाज़ से तो नहीं की जा सकती पर उसने गीत की भावनाओं को सहजता से अपनी आवाज़ में पकड़ने की कोशिश जरूर की है।



और अब सुनिए इसे शुभा मुद्गल की आवाज़ में..





वैसे लोचनों की इस भाषा को पढ़ने में आपका अनुभव कैसा रहा है? क्या ऐसा तो नहीं कि आपने समझ कर भी उसे नज़रअंदाज़ कर दिया हो या फिर उनमें निहित भावनाओं को जरूरत से ज्यादा आँका हो ?
 

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