Sunday, August 31, 2014

जब कोई प्यार से बुलाएगा.. तुमको एक शख़्स याद आएगा Jab koyi pyar se bulayega... Mehdi Hassan

पिछले दो हफ्तों से मेरे शहर का मौसम बड़ा खुशगवार है। दिन में हल्की फुल्की बारिश और फिर रात में खुले आसमान के नीचे मंद मंद बहती प्यारी शीतल हवा। ऐसी ही इक रात में इंटरनेट की वादियों में भटकते भटकते ये गीत सुनाई दिया। गीत तो सरहद के उस पार का था जहाँ से चलती गोलियों ने पिछले कुछ हफ्तों से सीमा पर रहने वाले लोगों का जीवन हलकान कर दिया है। गीत में आवाज़ उस शख्स की थी जिसकी गायिकी ने दोनों देशों के आवाम को अपना मुरीद बनाया है। जी हाँ मैं मेहदी हसन की बात कर रहा हूँ। सोचता हूँ कि अगर इन दोनों देशों की हुकूमत मेहदी हसन व गुलज़ार सरीखे कलाकारों के हाथ होती तो गोलियों का ये धुआँ गीत संगीत की स्वरलहरियों की धूप से क्षितिज में विलीन हो गया होता।


अमूमन मेहदी हसन का नाम ग़ज़ल सम्राट के रूप में लिया जाता रहा है पर अपने शुरुआती दिनों में गायिकी का ये बादशाह साइकिल और फिर कार व ट्रैक्टर का मेकेनिक हुआ करता था। पर आर्थिक बाधाओं से जूझते हुए भी कलावंत घराने के इस चिराग ने रियाज़ का दामन नहीं छोड़ा। रेडियो में ठुमरियाँ गायीं । उससे कुछ शोहरत मिली तो शायरी से मोहब्बत की वज़ह से ग़ज़लें भी गाना शुरु किया। साठ के दशक में इसी नाम के बल पर पाकिस्तानी फिल्मों के नग्मे गाने का मौका मिला। उनकी रुहानी आवाज़ को मकबूलियत इस हद तक मिली कि साठ से सत्तर के दशक की कोई भी फिल्म उनके गाए नग्मे के बिना अधूरी मानी जाती रही। 

मेहदी हसन के गाए जिस गीत की गिरफ्त में मैं आजकल हूँ उसे उन्होंने फिल्म ज़िंदगी कितनी हसीन है के लिए गाया था। गीत में अपनी महबूबा से दूर होते विकल प्रेमी की पीड़ा है। गीत की धुन तो सुरीली है ही पर मेहदी हसन की आवाज़ को इस अलग से सहज अंदाज़ में सुनने का आनंद ही कुछ और है। तो चलिए उसी आनंद को बाँटते हैं आप सब के साथ

जब कोई प्यार से बुलाएगा
तुमको एक शख़्स याद आएगा

लज़्ज़त-ए-ग़म से आशना होकर
अपने महबूब से जुदा हो कर
दिल कहीं जब सुकून न पाएगा
तुमको एक शख़्स याद आएगा


तेरे लब पे नाम होगा प्यार का
शम्मा देखकर जलेगा दिल तेरा
जब कोई सितारा टिमटिमाएगा
तुमको एक शख़्स याद आएगा


ज़िन्दग़ी के दर्द को सहोगे तुम
दिल का चैन ढूँढ़ते रहोगे तुम
ज़ख़्म-ए-दिल जब तुम्हें सताएगा
तुमको एक शख़्स याद आएगा।





पर गीत को सुनने के बाद उसकी मूल भावनाओं से भटकते हुए मुझे तुमको एक शख़्स याद आएगा वाली पंक्ति ने दूसरी जगह ले जा खींचा।  जीवन की पगडंडियों में चलते चलते जाने कितने ही लोगों से आपकी मुलाकात होती है। उनमें से कुछ के साथ गुजारे हुए लमहे चाहे वो कितने मुख्तसर क्यूँ ना हों हमेशा याद रह जाते हैं। रोज़ की आपाधापी में जब ये यादें अचानक से कौंध उठती हैं तो आँखों के सामने ऐसे ही किसी शख़्स का चेहरा उभर उठता है और मन मुस्कुरा उठता है। फिर तो घंटों उस एहसास की खुशबू हमें तरोताज़ा बनाए रखती है..

बहरहाल बात सरहद, मेहदी हसन और गुलज़ार से शुरु हुई थी तो उसे गुलज़ार की मेहदी हसन को समर्पित पंक्तियों से खत्म क्यूँ ना किया जाए..

आँखो को वीसा नहीं लगता
सपनों की सरहद नहीं होती
बंद आँखों से रोज़ चला जाता हूँ
सरहद पर मिलने मेहदी हसन से

अब तो मेहदी हसन साहब बहुत दूर चले गए हैं, सरहदों की सीमा से पर उनकी आवाज़ कायम है और रहेगी जब तक ये क़ायनात है।

Sunday, August 24, 2014

डाली मोगरे की : नीरज गोस्वामी Dali Mogre Ki by Neeraj Goswami

नीरज गोस्वामी की ग़ज़लों को पिछले कुछ सालों से पढ़ता आ रहा हूँ। कुछ महीनों पहले उनकी ग़ज़लों का संग्रह एक किताब की शक़्ल में प्रकाशित हुआ तो बड़ी खुशी हुई क्यूँकि बहुत दिनों से उनके संग्रह के बाजार में आने की उम्मीद थी। नीरज की लेखन शैली की जो दो विशिष्टताएँ मुझे सबसे अधिक आकर्षित करती आई हैं वो हैं उनके कथ्य की सहजता और उसके अंदर का प्रवाह।   

चौसठ वर्षीय नीरज जी पेशे से इंजीनियर हैं और फिलहाल इस्पात उद्योग से जुड़ी एक निजी कंपनी में वरिष्ठ पद पर आसीन हैं। पर इंटरनेट जगत में उन्हें एक तकनीकी विशेषज्ञ या प्रबंधक के तौर पर कम और एक ग़ज़लकार के रूप में ज्यादा जाना जाता है। इसकी वज़ह ढूँढने के लिए आपको सिर्फ उनके ब्लॉग का एक चक्कर लगाना होगा। नीरज ना केवल ग़ज़ल लिखते हैं बल्कि अपने पाठकों को ग़ज़ल के तमाम नामचीन और अनसुने लेखकों की शायरी से रूबरू भी कराते हैं।

मुझे उम्मीद थी कि अपनी किताब डाली मोगरे की भूमिका में वो पाठकों को तकनीकी क्षेत्र से जुड़ा होते हुए भी ग़ज़लों के प्रति पनपे अपने प्रेम के बारे में कुछ लिखेंगे पर लगता है कि इसके लिए मुझे उनकी दूसरी पुस्तक का इंतज़ार करना पड़ेगा। बहरहाल जो उनके ब्लॉग को नियमित पढ़ते हैं वे जानते हैं कि ग़ज़ल विधा के छात्र से बतौर शायर के रूप में अपनी पहचान बनाने के लिए वो प्राण शर्मा और पंकज सुबीर का हमेशा आभार व्यक्त करते रहे हैं। 

शिवना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डाली मोगरे की में नीरज जी की लिखी सौ के लगभग ग़ज़लों का संग्रह है। आख़िर नीरज जी की शायरी किन बातों पर केंद्रित है? अपने एक शेर में नीरज इस बात का जवाब कुछ यूँ देते हैं ... कहीं बच्चों सी किलकारी..कहीं यादों की फुलवारी..मेरी ग़ज़लों में बस यही सामान होता है। अब इन यादों की फुलवारी में खिड़कियों से झाँकती वो आँखें भी हैं, चंद ख़्वाब और उनसे जुड़ी अधूरी चाहतें भी. और प्रेम का सच्चा अहसास भी।  संकलन से उनकी इन्ही भावनाओं को व्यक्त करते कुछ अशआर चुने हैं .मुलाहिज़ा फरमाएँ

जब तलक झाँकती आँख पीछे ना हो
क्या फ़रक़ बंद है या खुली खिड़कियाँ


ख़्वाब देखा है रात में तेरा
नींद में भी हुई कमाई है

चाहतें मेमने सी भोली हैं
पर ज़माना बड़ा कसाई है


वो जकड़ता नहीं है बंधन में
प्यार सच्चा रिहाई देता है


किसी का ख़ौफ दिल पर, आज तक तारी ना हो पाया
किया यूँ प्यार अपनों ने, लगा डरना जरूरी है


अब मान मुनौवल के बिना कौन सा प्रेम हुआ है, नीरज इस परिस्थिति को कुछ यूँ व्यक्त करते हैं

हो ख़फ़ा हमसे वो रोते जा रहे हैं
और हम रूमाल होते जा रहे हैं


पर इस किताब में इश्क़ की भावनाओं से जुड़े ये अशआर मुझे बेहद पसंद आए

जहाँ जाता हूँ मैं तुझको वहीं मौजूद पाता हूँ 
गर लिखना तुझे हो ख़त तेरा मैं क्या पता लिक्खूँ

गणित ये प्यार का यारों किसी के तो समझ आए
सिफ़र बचता अगर तुझको कभी ख़ुद से घटा लिक्खूँ


नीरज गोस्वामी की ग़ज़लें सिर्फ प्रेम से लबरेज़ नहीं पर उससे कहीं ज्यादा इनकी लेखनी का सरोकार आज के सामाजिक हालातों और घटते मानवीय मूल्यों से है।  उनकी इस चिंता को उनके तमाम शेर जगह जगह व्यक्त करते हैं। उनमें से कुछ की बानगी नीचे दे रहा हूँ

डाल दीं भूखे को जिसमें रोटियाँ
वो समझ पूजा की थाली हो गई

झूठ सीना तानकर चलता हुआ मिलता है अब
सच तो बेचारा है दुबका, काँपता डरता हुआ

साँप को बदनाम यूँ ही कर रहा है आदमी
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी

इस पाप की परत को है उम्र भर चढ़ाया
अब चाहते हटाना गंगा में बस नहाकर

रोटियाँ देकर कहा ये शहर ने
गाँव की अब रुत सुहानी भूल जा
जिस्म की गलियों में उसको ढूँढ अब
इश्क़ वो कल का रुहानी, भूल जा

कब तक रखेंगे हम भला इनको सहेज कर
रिश्ते हमारे शाम के अखबार हो गए
हमने किये जो काम उन्हें फ़र्ज कह दिया
तुमने किये तो यार उपकार हो गए


जीवन की विसंगतियों को उनके रूपकों के माध्यम से देखना कभी मन को लाजवाब कर देता है

जिस शजर ने डालियाँ पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते जाते बस उसको पत्थर दिए


कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ़्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए


तो कहीं प्रकृति के आचरण को सूक्ष्मता से अवलोकित कर वो आपको धनात्मक उर्जा से भर देते हैं।

अपनी बदहाली में भी मत मुस्कुराना छोड़िए
त्यागता ख़ुशबू नहीं है फूल भी मसला हुआ


नीरज गोस्वामी की सहज लेखन शैली हर उस पाठक को पसंद आएगी जो ग़ज़लों में रूचि तो रखता है पर उसमें प्रयुक्त उर्दू व फ़ारसी शब्दों की अनिभिज्ञता से अपने आपको उससे जोड़ पाने में अक्षम है। नीरज गोस्वामी ने अपनी ग़ज़लों में ऐसी भाषा का प्रयोग किया है जो उर्दू का ज्ञान ना रखने वालों को भी समझ आ सके। राजस्थान के जयपुर से ताल्लुक रखने वाले नीरज गोस्वामी  ने मुंबई के पास अपना कार्यक्षेत्र होने की वज़ह से अपने इस संकलन में कुछ मुंबइया जुबान की ग़ज़लें कही हैं जो भले ग़ज़ल पंडितों को कुछ खास आकृष्ट ना करे पर उनकी आम जनता तक ग़ज़ल के कलेवर को ले जाने की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।  चलते चलते मैं उनकी एक ग़ज़ल को सुनाना चाहूँगा जिसे पढ़कर मन एक जोश से भर उठता है.. वैसे इस ग़ज़ल का सबसे प्यारा शेर मुझे ये लगता है..

चमक है जुगनुओं में कम, मगर उधार की नहीं
तू चाँद आबदार (चमकदार) हो तो हो रहे, तो हो रहे

 

पुस्तक के बारे में
नाम : डाली मोगरे की,  लेखक : नीरज गोस्वामी
प्रकाशक : शिवना प्रकाशन, मूल्य : Rs.150  

पुनःश्च : एक शाम मेरे नाम के पाठकों के लिए खुशखबरी..
नीरज गोस्वामी जी ने सूचित किया है जो इस पुस्तक को पढ़ने में रुचि रखते हैं वो अपना पोस्टल अड्रेस उनके मोबाइल न 9860211911 पर एस एम एस करें या उन्हें neeraj1950@gmail.com पर मेल से भेज दें । पुस्तक उपहार स्वरुप आपके दिए अड्रेस पर भिजवा दी जाएगी।

Monday, August 18, 2014

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है : गुलज़ार Raat Pahadon Par by Gulzar

पहाड़ों पर कौन नहीं जाता ? कभी मैदानों की भीषण गर्मी से निज़ात पाने, तो कभी बर्फ के गिरते फाहों के बीच अपने दिल को थोड़ी ठंडक पहुँचाने। या फिर निकल जाते हैं लोग यूँ ही बैठे ठाले प्रकृति के नैसर्गिक रूप का एक दो दिन ही सही.. स्वाद चख़ने। सारा दिन घूमते हैं। कभी जानी तो कभी अनजानी राहों पर। शाम आती है तो थोड़ी बाजार की तफ़रीह और थोड़ी पेट पूजा के बाद यूँ थक के चूर हो रात बिस्तर पे गिरते हैं कि पता ही नहीं चलता कब सुबह हो गई? इसलिए एक आम घुमक्कड़ कहाँ जान पाता है कि रात पहाड़ों की कैसी होती है? और गाहे बगाहे अगर ऐसा अवसर मिला भी तो क्या वो हम देख पाते हैं जो इस नज़्म में गुलज़ार साहब हमें दिखा रहे हैं?

अपनी कहूँ तो मुन्नार की वादी में गुजारी वो रात याद आती है जिसकी सुंदरता को व्यक्त करते हुए शब्दों ने भी साथ छोड़ दिया था। पर गुलज़ार तो जब चाहें जहाँ चाहें शब्दों का ऐसा तिलिस्म खड़ा करने में माहिर हैं जिसके जादू से प्रकृति के वो सारे देखे और महसूस किए गए रूप एकदम से आँखों के सामने आ जाते हैं। अंधकार मयी रात को प्रकाशित करते चंद्रमा और तारों, पास बहती नदी का कलरव, बालों को उड़ाती और पत्तों को फड़फड़ाती हवा का संगीत और कहीं दूर गिरते झरनों की चिंघाड़ से आप भी कहीं ना कहीं रूबरू अवश्य हुए होंगे। पर देखिए तो गुलज़ार ने इन सबको को कितनी खूबसूरती से पिरोया है एक लड़ी में इस नज़्म के माध्यम से

रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है
आस्मान बुझता ही नहीं
और दरिया रौशन रहता है
इतना ज़री का काम नज़र आता है फ़लक़ पे तारों का
जैसे रात में प्लेन से रौशन शहर दिखाई देते हैं


पास ही दरिया आँख पे काली पट्टी बाँध के
पेड़ों की झुरमुट में
कोड़ा जमाल शाही, "आई जुमेरात आई..पीछे देखे शामत आई
दौड़ दौड़ के खेलता है

कंघी रखके दाँतों में
आवाज़ किया करती है हवा
कुछ फटी फटी...झीनी झीनी
बालिग होते लड़कों की तरह !


इतना ऊँचा ऊँचा बोलते हैं दो झरने आपस में
जैसे एक देहात के दोस्त अचानक मिलकर वादी में
गाँव भर का पूछते हों..
नज़म भी आधी आँखें खोल के सोती है
रात पहाड़ों पर कुछ और ही होती है।



आज जबकि हम सभी गुलज़ार का 80 वाँ जन्मदिन मना रहे हैं यही गुजारिश है कि साहब ऐसे अनेकानेक लमहे यूँ ही अपने गीतों, नज़्मों और ग़ज़लों के माध्यम से इन सफ़हों पर परोसते रहें। पहाड़ भले बूढ़े हो जाएँ पर ये शायर कभी बूढ़ा ना हो। ( Gulzar's 80 th birthday )

 एक शाम मेरे नाम पर गुलज़ार की पसंदीदा नज़्में

Wednesday, August 06, 2014

मदन मोहन की सांगीतिक प्रासंगिकता : लग जा गले .. सनम पुरी Lag Ja Gale .... Sanam Puri

मदन मोहन से जुड़ी पिछली पोस्ट में बात खत्म हुई थी इस प्रश्न पर कि क्या आज की पीढ़ी भी मदन मोहन के संगीत को उतना ही पसंद करती है? इस बात का सीधा जवाब देना मुश्किल है। मेरा मानना है कि हिंदी फिल्मों में ग़ज़लों के प्रणेता समझे जाने वाले मदन मोहन अगर आज हमारे बीच होते तो उनके द्वारा रचा संगीत भी अभी के माहौल में ढला होता। आज उन दो प्रसंगों का जिक्र करना चाहूँगा जो मदन मोहन के संगीत की सार्वकालिकता की ओर इंगित करते हैं।

मदन मोहन के संगीत में आने वाले कल को पहचानने की क्षमता थी वर्ना क्या कोई ऐसा संगीतकार है जिसकी धुनों को उसके मरने के तीस साल बाद किसी फिल्म में उसी रूप में इस्तेमाल कर लिया गया हो। 2004 में प्रदर्शित फिल्म वीर ज़ारा का संगीत तो याद है ना आपको। यश चोपड़ा विभाजन से जुड़ी इस प्रेम कथा के संगीत के लिए नामी गिरामी संगीतकारों के साथ बैठकें की। पर फिल्म के मूड के साथ उन धुनों का तालमेल नहीं बैठ सका। अपनी परेशानी का जिक्र एक बार वो मदन मोहन के पुत्र संजीव कोहली से कर बैठे। संजीव ने उन्हें बताया कि उनके पास पिता की संगीतबद्ध कुछ अनसुनी धुनें पड़ी हैं। अगर वे सुनना चाहें तो बताएँ। चोपड़ा साहब ने हामी भरी और संजीव तीस धुनों की पोटली लेकर उनके पास हाज़िर हो गए।


जैसे जैसे वो पोटली खुलती गई चोपड़ा साहब को फिल्म की परिस्थितियों के हिसाब से गीत और कव्वाली की धुनें मिलती चली गयीं। फिल्म के संगीत को आम जनता ने किस तरह हाथों हाथ लपका ये आप सबसे छुपा नहीं है। ये उदाहरण इस बात को सिद्ध करता है कि वक़्त से आगे के संगीत को परखने और उसमें अपनी मेलोडी रचने की काबिलियत मदन मोहन साहब में थी।

अब एक हाल फिलहाल की बात लेते हैं। अपनी धुनों में मदन मोहन जो मधुरता रचते थे उसके लिए इंटरल्यूड्स और मुखड़े के पहले किया गया संगीत संयोजन कई बार बेमानी हो जाता था। लता जी का गाया फिल्म 'वो कौन थी' का बेहद लोकप्रिय गीत लग जा गले .. तो आप सबने सुना होगा। हाल ही में मैंने इसी गीत को सनम बैंड के सनम पुरी को गाते सुना। मेलोडी वही पर गीत के साथ सिर्फ गिटार और ताल वाद्य का संयोजन। सच मानिए बहुत दिनों बाद एक रिमिक्स गीत में गीत की आत्मा को बचा हुआ पाया मैंने। सनम की आवाज़ का कंपन और इंटरल्यूड्स में उनकी गुनगुनाहट गीत में छुपी विकलता को हृदय तक ले जाती है



वैसे सनम पुरी अगर आपके लिए नया नाम हो तो ये बता दूँ कि मसकत में रहने वाले सनम ने विधिवत संगीत की शिक्षा तो ली नहीं। संगीत के क्षेत्र में आए भी तो परिवार वालों के कहने से। पाँच साल पहले SQS Supastars नाम का बैंड बनाया जिसका नाम कुछ दिनों पहले बदल के सनम हो गया। सनम बताते हैं कि लता जी के गाए इस गीत से उनके बैंड के हर सदस्य की भावनाएँ जुड़ी हैं और इसीलिए उन्होंने अपने इस प्यारे गीत को आज के युवा वर्ग के सामने एक नए अंदाज़ में लाने का ख्याल आया। तो आइए सुनते हैं सनम बैंड के इस गीत को।


लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो
शायद फिर इस जनम में मुलाक़ात हो न हो
लग जा गले  ...

हमको मिली हैं आज ये घड़ियाँ नसीब से
जी भर के देख लीजिये हमको क़रीब से
फिर आपके नसीब में ये बात हो न हो
शायद फिर इस जनम...लग जा गले..

पास आइये कि हम नहीं आएंगे बार-बार
बाहें गले में डाल के हम रो लें ज़ार-ज़ार
आँखों से फिर ये प्यार कि बरसात हो न हो
शायद फिर इस जनम...लग जा गले..


गीत में उनके भाई समर पुरी गिटार पर हैं, वेंकी ने बॉस गिटार सँभाला है जबकि केशव धनराज उनकी संगत कर रहे हैं पेरू से आए ताल वाद्य Cajon पर


जब लता जी रॉयल अलबर्ट हॉल में Wren Orchestra के साथ एक कार्यक्रम कर रही थीं तो कार्यक्रम में शामिल होने वाले गीतों के नोट्स लिख के भेजे गए। जो दो गीत उन्हें सबसे पसंद आए उनमें लग जा गले  भी था। आर्केस्ट्रा प्रमुख का कहना था कि वो धुनों की मेलोडी और उनके साथ किए नए तरह के संगीत संयोजन से चकित हैं। 

आशा है संगीतकार मदन मोहन से जुड़ी ये तीन कड़ियाँ आपको पसंद आयी होंगी। एक शाम मेरे नाम पर उनकी यादों का सफ़र आगे भी समय समय पर चलता रहेगा।
 

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