Wednesday, November 26, 2014

ये सराय है यहाँ किसका ठिकाना लोगों : इब्न ए इंशा एक उदास शायर या ज़िदादिल व्यंग्यकार ? Ye Sarai Hai by Ibn e Insha

कुछ लोग इब्न ए इंशा को बतौर शायर जानते हैं तो कुछ उनके सफ़रनामों को याद करते हैं। फिर उनके व्यंग्य लेखन को कौन भूल सकता है? इन तीनों विधाओं में उन्होंने जो भी लिखा उसमें एक तरह की सादगी और साफगोई थी। पर गंगा जमुनी तहज़ीब से भिगोयी उनकी लेखनी में जब आप इंशा के भीतर का शख़्स टटोलने की कोशिश करते हैं तो  उनके बारे में कोई  राय बना पाना  बेहद मुश्किल होता है। उर्दू की आख़िरी किताब के हर पन्ने को पढ़ कर आप उनके मजाकिया व्यक्तित्व से निकलते हर तंज़ पर दाद देने को आतुर हो उठते हैं, वहीं चाँदनगर में उनकी शायरी को पढ़कर लगता है कि किसी टूटे उदास दिल की कसक रह रह कर निकल रही है। ये बच्चा किसका बच्चा है, बगदाद की इक रात, सब माया है जैसी कृतियाँ उनके वैश्विक, सामाजिक और आध्यात्मिक सरोकारों की ओर ध्यान खींचती हैं। जब जब लोगों ने उनसे इस सिलसिले में प्रश्न किये उन्होंने बात यूँ ही उड़ा दी या फिर साफ कह दिया कि मुझे उन बातों को सबसे बाँटने की कोई इच्छा नहीं। इंशा जी की ही पंक्तियों में अगर उनके मन की बात कहूँ तो...

दिल पीत की आग में जलता है
हाँ जलता रहे इसे जलने दो
इस आग से लोगों दूर रहो
ठंडी ना करो पंखा ना झलो

कल इंटरनेट पर बरसों पहले किया हुआ उनका एक साक्षात्कार सुन रहा था। इंटरव्यू लेने वाले हज़रत उनकी तारीफ़ में एक से एक नायाब विशेषणों का इस्तेमाल कर रहे थे और इ्ंशा जी अपने उसी खुशनुमा अंदाज़ में श्रोताओं को उन तारीफ़ों के वज़न को कम करने की सलाह दे रहे थे। ये तो मैं आपको पहले भी बता चुका हूँ कि 1927 में जालंधर जिले में जन्मे इब्न ए इ्ंशा का वास्तविक नाम शेर मोहम्मद खाँ था। पर इंशा जी का इस नाम से सरोकार बहुत कम रहा। आपको जान कर ताज्जुब होगा कि जनाब ने छठी कक्षा से ही अदब की ख़िदमत करनी शुरु कर दी थी, पर शेर मुहम्मद खाँ के नाम से नहीं बल्कि इब्ने इंशा के नाम से।   हाई स्कूल के दिनों में रूमानियत दिल पर हावी थी। वैसे भी जब वो गाँव से पहली बार लुधियाना शहर आए तो अकेलापन और उदासी उनके ज़ेहम में समा सी गई। इसका असर ये हुआ कि उन्होंने अपना तखल्लुस यानि उपनाम बदल कर मायूस अदमाबादी रख दिया। बाद में किसी उस्ताद ने धर्म की दुहाई देकर उन्हें ये समझाया कि ऐसा नाम रखना गुनाह है तो उन्होंने अपना नाम क़ैसर सहराई कर लिया।

क़ैसर का शाब्दिक अर्थ बादशाह होता है। पर इ्ंशा जी का जीवन इस बादशाहत से कोसों दूर था। अपनी किताब चाँदनगर की भूमिका में उन्होंने कविता के प्रति अपने झुकाव के बारे में लिखा है

मैं स्वाभाव से रोमंटिक रहा हूँ पर मेरा जीवन किसी राजकुमार सा नहीं था। मेरी लंबी नज़्में ज़िदगी की कड़वी सच्चाईयों को रेखांकित करती हैं। मेरी कविताएँ मेरी रूमानियत और ज़माने के सख़्त हालातों के संघर्ष से उपजी है।

पिछली दफ़े मैंने उर्दू की आख़िरी किताब का जिक्र करते है उनके बेहतरीन  sense of humor को उभारा था। आज उनकी जिस नज़्म को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ वो उसके उलट उनके व्यक्तित्व के दूसरे पहलू को सामने लाती है। ये सराय है... उन मुसाफ़िरों की दास्तान है जिन्हें हालात ने रिश्तों के धागे तोड़ते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ने को मज़बूर कर दिया।  शायद इंशा जी भी कभी इस मजबूरी का शिकार रहे होंगे..बहरहाल इस नज़्म और उसमें छुपे दर्द को आप तक अपनी आवाज़ में पहुँचाने की कोशिश की है। कुबूल फरमाइएगा..





ये सराय है यहाँ किसका ठिकाना लोगों
याँ तो आते हैं मुसाफ़िर, सो चले जाते हैं

हाँ यही नाम था कुछ ऐसा ही चेहरा मोहरा
याद पड़ता है कि आया था मुसाफ़िर कोई
सूने आँगन में फिरा करता था तन्हा तन्हा
कितनी गहरी थी निगाहों में उदासी उसकी
लोग कहते थे कि होगा कोई आसेबज़दा
हमने ऐसी भी कोई बात न उसमें देखी

ये भी हिम्मत ना हुई पास बिठा के पूछें
दिल ये कहता था कोई दर्द का मारा होगा
लौट आया है जो आवाज़ न उसकी पाई
जाने किस दर पे किसे जाके पुकारा होगा
याँ तो हर रोज़ की बाते हैं ये जीती मातें
ये भी चाहत के किसी खेल में हारा होगा

एक तस्वीर थी कुछ आपसे मिलती जुलती
एक तहरीर थी पर उसका तो किस्सा छोड़ो
चंद ग़ज़लें थीं कि लिक्खीं कभी लिखकर काटीं
शेर अच्छे थे जो सुन लो तो कलेजा थामो
बस यही माल मुसाफ़िर का था हमने देखा
जाने किस राह में किस शख़्स ने लूटा उसको


गुज़रा करते हैं सुलगते हुए बाकी अय्याम
लोग जब आग लगाते हैं बुझाते भी नहीं
अजनबी पीत के मारों से किसी को क्या काम
बस्तियाँवाले कभी नाज़ उठाते भी नहीं
छीन लेते हैं किसी शख्स के जी का आराम
फिर बुलाते भी नहीं , पास बिठाते भी नहीं
एक दिन सुब्ह जो देखा तो सराय में न था
जाने किस देस गया है वो दीवाना ढूँढो
हमसे पूछो तो न आएगा वो जानेवाला
तुम तो नाहक को भटकने का बहाना ढूँढो
याँ तो आया जो मुसाफ़िर यूँ ही शब भर ठहरा
ये सराय है यहाँ किस का ठिकाना ढूँढो ।


 आसेबज़दा : प्रेतों के वश में, अय्याम : दिन


दरअसल हर इंसान का व्यक्तित्व इंशा जी की ही तरह अनेक परतों में विभाजित रहता है। कार्यालय. मोहल्ले, परिवार, मित्रों, माशूक और फिर अकेलेपन के लमहों में इस फर्क को आप स्वयम् महसूस करते होंगे। कम से कम अपने बारे में मैं तो ऐसा ही अनुभव करता हूँ। आप क्या सोचते हैं इस बारे में ?

एक शाम मेरे नाम पर इब्ने इंशा

Wednesday, November 19, 2014

क्या वाकई प्रेम वक्त की बर्बादी है ? : Come waste your time with me !

बड़ीं विडंबना है ना कि ज़िंदगी में जिस चीज़ की सबसे ज्यादा किल्लत हो उसे ही हम व्यर्थ गँवाने को तैयार हो जाएँ। पर इतना तो आपको भी मानना पड़ेगा कि सबकी नज़रों में फालतू गँवाए ये क्षण किन्हीं दो ज़िंदगियों के लिए एक अनमोल धरोहर बन जाते हैं हैं। ये पल उन दानों का काम करते हैं जिन्हें हमारा दिल रूपी पंक्षी जब चाहे चुग आता है और कुछ देर के लिए ही सही  तृप्ति के अहसास से सराबोर हो उठता है।

आजकल टीवी के पर्दे पर आमिर खाँ और अनुष्का शर्मा भी हल्के फुल्के अंदाज़ में हम सबसे यही तो कह रहे हैं। पर मेरी ये पोस्ट पीके (PK) के इस चुलबुले गीत पर नहीं बल्कि इसी बात को बेहद खूबसूरती से व्यक्त करते उस गीत की है जो आज से अठारह साल पहले पहली बार अस्तित्व में आया था। इस गीत का जनक था अमेरिका का रॉक बैंड फिश (Phish)।

पहली बार 1996 में हुए एक कान्सर्ट में इस गीत को बैंड ने जनता के सामने पेश किया। पर मेरी मुलाकात इस  से चंद महीने पहले हुई जब एक मित्र के ज़रिए ये गीत मेरे पास पहुँचा और सच पहली बार सुनकर ही इस गीत में निहित भावनाओं का मैं कायल हो गया। इस गीत की शुरुआत में बजती गिटार की मधुर धुन और मुलायम सी गायिकी के  पीछे कलाकार थे Trey Anastasio । गीत में उनका सहयोग दिया था समूह के अन्य सदस्य माइक गोर्डन (Mike Gordon), पेज मैकानल  और जोन फिशरमेन (Jon Fisherman) ने। तो पहले सुनें इस गीत को...


और फिर देखें कि कि ऐसा क्या है इस गीत के शब्दों में..

Don't want to be an actor pretending on the stage
Don't want to be a writer with my thoughts out on the page
Don't want to be a painter 'cause everyone comes to look
Don't want to be anything where my life's an open book

A dream it's true
But I'd see it through
If I could be
Wasting my time with you

Phish Rock Band group members
Don't want to be a farmer working in the sun
Don't want to be an outlaw always on the run
Don't want to be a climber reaching for the top
Don't want to be anything where I don't know when to stop

A dream it's true
But I'd see it through
If I could be
Wasting my time with you

So if I'm inside your head
Don't believe what you might have read
You'll see what I might have said
To hear it

Come waste your time with me
Come waste your time with me

नहीं मैं नहीं चाहता कि मैं अभिनेता बनकर मंच पर अपनी भाव भंगिमा का प्रदर्शन करूँ। ना ही मैं ये चाहता हूँ कि एक ऐसा लेखक बनूँ जिसके विचार कागज़ के पन्नों पर बिखर कर सब तक पहुँचे। मैं तो वो चित्रकार भी नहीं बनना चाहता जिसकी कला को देखने के लिए सब लालायित हों। दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए मैं अपने जीवन को खुली किताब बना दूँ ये भी मुझे गवारा नहीं है। मुझे नहीं बनना किसान या एक विद्रोही, नहीं चढ़नी सफलता की सीढ़ियाँ, नहीं करना ऐसा कोई भी काम जहाँ ये ही ना पता हो कि रूकना कहाँ है ? मैंने तो बस एक ही सपना देखा है। पर उस सपने को पूरा करने के लिए मुझे तुम्हारे साथ अपना समय निरुद्देश्य बिताना होगा।

अरे तुमने तो वक़्त जाया करने वाली बात को सच ही मान लिया। अगर मैंने तुम्हारे दिलो दिमाग में अपना घर बना लिया है तो फिर वो सुनो जो तुम सुनना चाहती हो। हाँ मुझे तुम्हारे साथ समय नष्ट करना पसंद है क्यूँकि जिंदगी में किसी भी मुकाम तक पहुँचने के लिए तुम्हारा साथ मेरे लिए सबसे जरूरी है। ये संगत ही हमें उन सपनों तक भी पहुँचाएगी जो हमारे साझे होंगे।



वैसे आपका क्या मत है क्या प्रेम वाकई में समय की बर्बादी है ? क्या प्यार हमें उस राह से भटका देता है जो हम अपने हुनर के बल पर ज़िदगी में प्राप्त करने योग्य थे? तो दूसरी ओर क्या ये सही नहीं कि सब कुछ पा लेने के बाद भी व्यक्ति के जीवन में मोहब्बत ना हो तो सारा प्राप्य खोखला लगने लगता है? आपको इन प्रश्नों में उलझा कर मैं तो आमिर का राग ही अलापना पसंद करूँगा

फिर भी सोच लिया हूँ मन मा
एक बार तो इस जीवन मा
कर लें भेस्ट आफ टाइम
करना है भेस्ट आफ टाइम
I want to waste my time..I love this waste of time..

Tuesday, November 11, 2014

सारा आकाश : राजेंद्र यादव Sara Aakash by Rajendra Yadav

राजेंद्र यादव मेरे प्रिय लेखक कभी नहीं रहे। कॉलेज के दिनों में कई बार उनकी कहानियों से साबका पड़ा और वो मुझ पर कोई खास असर नहीं छोड़ पायीं। पिछली बार उन्हें मैंने तब पढ़ा, जब उन्होंने मन्नू भंडारी के साथ उपन्यास एक इंच मुस्कान संयुक्त रूप से लिखा था। उस उपन्यास को पढ़ते हुए भी मन्नू जे के हिस्से तो तेजी से निकल जाते थे पर राजेंद्र जी के अध्यायों पर पढ़ाई की गाड़ी किसी पैसैंजर ट्रेन की माफ़िक घिसटती चलती थी। पर इतना सब होते हुए भी मुझे उनकी लिखी मशहूर किताब सारा आकाश को पढ़ने की इच्छा थी़। हाल भी में अपने मित्रों की पसंदीदा सूची में इसका नाम देखकर ये इच्छा फिर जोर पकड़ने लगी। बाकी  काम आनलाइन बाजार ने कर दिया।



राजेंद्र जी ने ये किताब 1952 में लिखी थी यानि आज से करीब साठ साल पहले। वैसे उसके करीब 8 साल पहले वे इसी पुस्तक को प्रेत बोलते हैं के नाम से लिख चुके थे। सारा आकाश में प्रेत बोलते हैं कि भूमिका और अंत दोनों को बदल दिया गया। राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में पाठकों की जिज्ञासा को देखते हुए प्रेत बोलते हैं के वे अंश भी दिए गए हैं जिन्हें सारा आकाश में बदला गया। अगर दोनों अंतों की तुलना करूँ तो सारा आकाश का अंत मुझे ज्यादा बेहतर लगा। निम्नमध्यम वर्गीय समाज को जिसने करीब से देखा हो या उसके अंग रहे हो वे बड़ी सहजता से इस कथा से अपने को जोड़ पाएँगे।  

बकौल राजेंद्र यादव सारा आकाश एक निम्नमध्यवर्गीय युवक के अस्तित्व के संघर्ष की, आशाओं, महत्त्वाकांक्षाओं और आर्थिक सामाजिक, सांस्कारिक सीमाओं के बीच चलते द्वन्द्व, हारने थकने और कोई रास्ता निकालने की बेचैनी की कहानी है। पुस्तक की भूमिका में लेखक बताते हैं कि किशोर मन में गूँजती रामधारी सिंह 'दिनकर' की ये पंक्तियाँ उपन्यास के नामाकरण का स्रोत बनीं

सेनानी, करो प्रयाण अभय, भावी इतिहास तुम्हारा है
ये नखत अमा के बुझते हैं, सारा आकाश तुम्हारा है

इन्हीं पंक्तियों के संदर्भ में ये उपन्यास अपनी सार्थकता खोजता है और इसलिए राजेंद्र जी कहते हैं कि इस कहानी के ब्याज, इन पंक्तियों को पुनः विद्रोही कवि को लौटा रहा हूँ कि आज हमें इनका अर्थ भी चाहिए। राष्ट्रकवि दिनकर ने राजेंद्र जी की इस बात का क्या जवाब दिया वो भी इस पुस्तक में है। सारा आकाश पर बाद में बासु चटर्जी द्वारा एक फिल्म भी बनाई गई जो आशा के विपरीत सफल रही। इस पुस्तक के भी कई संस्करण छपे। आठ लाख से ऊपर प्रतियाँ बिकीं।

बहरहाल लौटते हैं इस उपन्यास पर। इंटर की परीक्षा के ठीक पहले कथा के नायक समर के अनिच्छा से किए गए विवाह से उपन्यास की शुरुआत होती है। परीक्षा के तनाव के बीच आई इस नई मुसीबत को मानसिक रूप से झेलने में समर अपने आप को असमर्थ पाता है। माता पिता द्वारा लादे गए इस निर्णय का विरोध वो अपनी पलायनवादी रणनीति से करता है। ना वो अपनी पत्नी से कोई संबंध रखता है ना घर के अंदर घट रहे मसलों से। ज़ाहिर है ये परिस्थिति घर में आई नई बहू के लिए बेहद कठिन होती है पर प्रभा ना अपना धैर्य खोती है ना आत्मसंयम। पति पत्नी में बोलचाल ना होने का ये सिलसिला एक दिन टूटता है। 

दो सौ से ऊपर पृष्ठों की ये किताब पारिवारिक समस्याओं के चक्रव्यूह में उलझे समर और प्रभा की संघर्ष गाथा है। लेखक पुस्तक में संयुक्त परिवार की अवधारणा पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं। साथ ही शादी विवाह के आज के तौर तरीकों को पति पत्नी के बीच की मानसिक संवादहीनता का कारण मानते हैं।

निम्न मध्यम वर्गीय परिवार का खाका खींचते वक़्त लेखक ने उपन्यास में पुरुष और स्त्री पात्रों की मनोवृतियों को जिस तरह उभारा है उसका आकलन भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। आख़िर समर का प्रभा से साल भर ना बोलने का फैसला क्या इंगित करता है? समर जैसे पुरुष अपने दबंग पिता के सामने कितने निरीह क्यूँ ना हो पर स्त्री के सामने उनका अहंकार जागृत हो जाता है। ये घमंड उस परम्परागत  परिवेश से पनपता है जहाँ स्त्री को पुरुष से हमेशा नीचे समझा जाता है। इस निर्मूल अहंकार को स्त्रियों के खिलाफ़ हिंसा में तब्दील होने में देर नहीं लगती। पर ये प्रवृति पुरुषों तक सीमित है  ऐसा भी नहीं है। 

सत्ता हाथ में आते ही स्त्रियाँ भी नृशंसता की हदें पार कर जाती हैं और वो भी तब जब उन्होंने ख़ुद इसका दंश झेला हो। समर की माँ इसी तरह के चरित्र का एक रूप हैं। बहुओं के उत्प्रीड़न, बच्चों पर अपनी इच्छा को जबरदस्ती थोपने की प्रवृति से आज भी हमारा समाज मुक्त नहीं हो पाया है। 

आख़िर ऐसा क्यूँ है? पुराने ज़माने में लोग उतने पढ़े लिखे नहीं होते थे। पर शिक्षा का स्तर बढ़ने के बावज़ूद भी हमारी सोच का स्तर नहीं बढ़ा है। या यूँ कहें कि हम स्तर बढ़ाना नहीं चाहते। क्यूँकि वैसा करने से हमारी सहूलियत आड़े आती हैं। हमारी बरसों की जमाई पारिवारिक सत्ता छिन्न भिन्न होती नज़र आती है। सो हम रीति रिवाज़ो का सहारा लेने लगते हैं ताकि तार्किक प्रश्नों के जवाब में उनका आवरण ले सकें। 

पर आज के इस युग में नई पीढ़ी के लोग इतना तो कर सकते हैं कि दुनिया, समाज व परिवार के विचारों को आँख मूँद कर अनुसरण करने के बजाए इंसानियत के जज़्बे को ध्यान में रखकर अपना आचार व्यवहार विकसित कर सकें। अगर ऐसा वे नहीं करेंगे तो समर और प्रभा जैसी परिणति के वे भी शिकार होंगे। 

एक शाम मेरे नाम पर मेरी पढ़ी हुई पुस्तकों की सूची, मूल्यांकन और पुस्तक चर्चा सम्बंधित प्रविष्टियाँ आप यहाँ देख सकते हैं।

Sunday, November 02, 2014

गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले.. Gulon Mein Rang bhare...

दीवाली की छुट्टियों के दौरान विशाल भारद्वाज की फिल्म हैदर देखी। फिल्म में विशाल ने फैज़ की लिखी सदाबहार ग़ज़ल गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले फिर से जुबाँ पर ला दी। फिल्मों में किसी ग़ज़ल को खूबसूरती से पेश किया जाए तो उसमें अन्तरनिहित भावनाएँ दिल में बहुत दिनों तक बनी रहती हैं। सोचा था वार्षिक संगीतमाला 2014 में  अरिजित सिंह की गाई इस ग़ज़ल को तो स्थान मिलेगा ही तब ही लिखूँगा इसके बारे में। पर एक बार कोई गीत ग़ज़ल दिमाग पर चढ़ जाए फिर मन कहाँ मानता है बिना उसके बारे में लिखे हुए। मुझे मालूम है कि हैदर देखते हुए बहुत से लोगों का पहली बार इस ग़ज़ल से साबका पड़ा होगा और उसकी भावनाओं की तह तक पहुँचने की राह में उर्दू व फ़ारसी के कठिन शब्दों ने रोड़े अटकाए होंगे। मैंने यही कोशिश की है कि जो भावनाएँ ये ग़ज़ल मेरे मन में जगाती है वो इस आलेख के माध्यम से आप तक पहुँचा सकूँ। ये इस ग़ज़ल का शाब्दिक अनुवाद नहीं पर ग़ज़ल को समझने की मेरी छोटी सी कोशिश है। ग़ज़ल का मतला है..

गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

काश ऐसा हो कि वसंत की ये हवा चले और इस बागीचे के सारे फूल अपने रंग बिरंगे वसनों को पहन कर खिल उठें। पर सच बताऊँ इस गुलशन की असली रंगत तो तब आएगी जब तुम इनके बीच रहो।

कफ़स उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बह्र-ए-खुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

कभी तो सुब्ह तेरे कुन्ज-ए-लब से हो आगाज़
कभी तो शब् सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले


फ़ैज़ ने ये ग़ज़ल तब लिखी थी जब वो जेल की सलाखों के पीछे थे। उनके अशआरों में छुपी बेचैनी को इसी परिपेक्ष्य में महसूस करते हुए ऐसा लगता है मानो वे कह रहे हों इन सींखचों के पीछे मन में तैरती उदासी जाए तो जाए कैसे ? ऐ हौले हौले बहने वाली हवा भगवान के लिए तुम्हीं उनका कोई ज़िक्र छेड़ो ना। क्या पता उनकी यादों की खुशबू इस मायूस हृदय को सुकून पहुँचा सके। कभी तो ऐसा हो कि सुबह की शुरुआत तुम्हारे होठों के किनारों के छू जाने से होने वाली सिहरन की तरह हो। कभी तो रात का आँचल तुम्हारी घनी जुल्फो से आती खुशबू सा महके।

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब्-ए-हिजरां
हमारे अश्क तेरे आक़बत सँवार चले

जब हम प्रेम में होते हैं तो हमें अपने से ज्यादा अपने साथी की फिक्र होती है उसकी हर खुशी हमें अपने ग़म से बढ़कर प्रतीत होती हैं। फ़ैज अपने  शेर में इस भावना को कुछ यूँ बयाँ करते हैं.. मैं तो अपनी पीड़ा को किसी तरह सह लूँगा पर मेरे दोस्त मुझे इस बात का संतोष तो है कि विरह की उस रात में बहे मेरे आँसू बेकार नहीं गए। कम से कम आज तुम्हारारे भविष्य सही राहों पर तो है।

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
गिरह मे लेके गरेबां का तार-तार चले

आज उन्होंने बुलाया है मुझे, मेरे जुनूँ मेरी दीवानगी के सारे बही खातों पर गौर फ़रमाने के लिए और मैं हूँ कि अपने दिल रूपी गिरेबान कें अदर दर्द के इन टुकड़ो् की गाँठ बाँध कर निकल पड़ा हूँ।

मक़ाम फैज़ कोई राह मे जँचा ही नही
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

फ़ैज ने आपनी शायरी की शुरुआत तो रूमानियत से की पर माक्रसवादी विचारधारा के प्रभाव ने उन्हें एक क्रांतिकारी शायर बना दिया। अपनी ज़िदगी में उन्होंने कभी बीच की राह नहीं चुनी। मक़्ते में शायद इसीलिए वे कहते हैं इस दोराहे के बीच उन्हें कोई और रास्ता नहीं दिखा। प्रेमिका की गली से निकले तो फिर वो राह चुनी जो फाँसी के फंदे पर जाकर ही खत्म होती थी।

वैसे तो इस ग़ज़ल को तमाम गायकों ने अपनी आवाज़ दी है पर पर जनाब मेहदी हसन की अदाएगी की बात कुछ और है तो लीजिए सुनिए उनकी आवाज़ में ये दिलकश ग़ज़ल


वैसे अगर आप पूरी पोस्ट मेरी आवाज़ में सुनना चाहते हों तो इस पॉडकॉस्ट में सुन भी सकते हैं। बोलने में तीन चार जगह गलतियाँ हो गई हैं उसके लिए पहले से ही क्षमा प्रार्थी हूँ।

 

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