Monday, December 29, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2014 का आगाज़ ग्यारह गीतों की दावत ए इश्क़ के साथ Varshik Sangeetmala 2014

एक शाम मेरे नाम पर साल के अंत के साथ वक़्त आ गया है वार्षिक संगीतमाला 2014 की शुरुआत का। अगर विकिपीडिया पर दी इस सूची पर गौर करें तो इस साल करीब 140 फिल्में रिलीज़ हुई। अगर हर फिल्म में औसत गीतों की संख्या को चार भी मानें तो समझिए साल में पाँच सौ से छः सौ के बीच नए गीत बने। वैसे अगर मैं आपसे ये पूछूँ कि इस साल प्रदर्शित फिल्मों के गीतों में अपनी पसंद बताइए तो शायद ही वो सूची बीस से ऊपर तक पहुँचे। 

दरअसल होता ये है कि अधिकतर फिल्म निर्माता प्रदर्शन के समय अपने एक या दो गानों को टीवी के माध्यम से खूब प्रचारित करते हैं। निर्माता भी अक़्सर वही गीत चुनता है जिसकी Visual appeal ज्यादा हो। सो सारे आइटम नंबरों की तो बारी आ जाती है पर फिल्मों के बहुत सारे गीत अनसुने रह जाते हैं। एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला में कोशिश यही रहती है कि साल के लोकप्रिय गीतों के साथ वैसे भी गीत बाहर निकाले जाएँ जो मधुर या अनूठे होते हुए भी श्रोताओं की नज़र से ओझल रह जाते हैं। 


पर सोचिए पाँच सौ से ऊपर गीतों में अपनी पसंद के पच्चीस गीतों को छाँटना कितना मुश्किल है। वैसे भी गीतों के मामले में हर व्यक्ति की पसंद का नज़रिया अलग होता है। मेरे लिए गीत की धुन और गायिकी के साथ साथ उसके बोल भी उतने ही महत्त्वपूर्ण होते हैं और मैं इसी आधार पर अपना चुनाव करता हूँ।  पिछले महीने मैंने सारी फिल्मों के गीत सुनने शुरु किए और उनमें से लगभग पचास को अलग किया। मुझे अपने पसंदीदा दस गीतों को चुनने में कभी दिक्कत नहीं होती पर नीचे की पॉयदानों के गीतों में अंतर करना एक दुष्कर कार्य लगता है। 

वार्षिक संगीतमाला में शुरुआती पच्चीस गीतों की क्रमवार प्रस्तुति तो जनवरी से होगी। पर उसके पहले आपके साथ उन ग्यारह गीतों का जिक्र करना चाहूँगा जो भले ही अंतिम पच्चीस में जगह ना बना पाए हों पर ये थे उनके बेहद करीब। इन गीतों में एक समानता है और वो कि ये सभी रूमानियत के अहसासों से लबरेज़ हैं। इन सबकी धुनें भी बेहद कर्णप्रिय है और हल्के फुल्के मूड में इन्हें गुनगुनाना आपको जरूर भाएगा। तो आइए देखें कि एक शाम मेरे नाम की इस दावत ए इश्क़ में प्यार की फुलझड़ियाँ छोड़ते कौन कौन से नग्मे हैं?

36. मेहरबानी 

फिल्म शौकीन के इस गीत में संगीतकार और गीतकार अर्को मुखर्जी हैं और गाया है इसे जुबीन ने। अगर कोई मँजा हुआ गीतकार इस धुन पर काम करता तो अंतरे और बेहतर हो सकते थे। मुखड़ा तो ठीक ठाक ही बन पड़ा है इस गीत का। है साज तू, तेरा तर्ज मैं तू है दवा और मर्ज मैं दिलदार तू, खुदगर्ज मैं .. ।वैसे अगर किसी में इतनी ख़ामियाँ रहेगी तो उनकी नज़रें इनायत तो होने वाली नहीं इसीलिए अर्को इन्हें उनकी मेहरबानी मान रहे हैं। :)

  

35. साँसों को 
शरीब साबरी और तोशी साबरी कोआपने बतौर गायक रियालटी शो में देखा होगा। तोशी को मैंने सबसे पहले सा रे गा मा 2005 में गाते सुना था। संगीत से जुड़े राजस्थान के साबरी परिवार के इन चिरागों ने भले ही बतौर गायक पिछले एक दशक में कुछ खास ना कर दिखाया हो पर बतौर संगीतकार पिछले कुछ सालों से उनका किया काम प्रशंसनीय है। गीतकार शकील आज़मी के बोल भले औसत दर्जे के हैं पर ज़िद के दो गीतों साँसों को जीने का इशारा मिल गया और तू जरूरी सा है मुझको जिंदा रहने के लिए की धुन शानदार है। इस गीत को अावाज़ दी है अरिजित सिंह ने

  

34. जो तू मेरा हमदर्द है 
ये गीत है फिल्म एक विलेन का। संगीतकार मिथुन ने आजकल अपने गीतों के बोल भी ख़ुद लिखने शुरु कर दिए हैं। गीत के मुखड़े पर गौर फरमाएँ। पल दो पल की है क्यूँ ज़िदगी ...इस प्यार को है सदियाँ काफी नहीं... तो ख़ुदा से माँग लूँ मोहलत मैं इक नई... रहना है बस यहाँ..... अब दूर जाना नहीं .....जो तू मेरा हमदर्द है... सुहाना हर दर्द है... सही तो कह रहे हैं ना मिथुन। अगर प्यार की राहों में कोई दर्द बाँटने वाला मिल जाए तो फिर दर्द भी तो सगा लगने लगता है ना। मिथुन के सहज भावों को अरिजित सिंह ने अपनी आवाज़ में बखूबी उभारा है।

  

33. मनचला 
फिल्म हँसी तो फँसी इस साल के उन चुनिंदा एलबमों में से हें जिनके सारे गीत औसत से ऊपर वाली कोटि के हैं। संगीतकार विशाल शेखर ने एक बार फिर दिखाया है कि मेलोडी पर उनकी पकड़ कमज़ोर नहीं हुई। शफ़कत अमानत अली का हुनर तो जगजाहिर है। मुझे इस गीत की आरंभिक धुन और अमिताभ भट्टाचार्य के लिखे बोल दिल को छूते से लगते हैं जब वो लिखते हैं..कभी गर्दिशों का मारा.. कभी ख्वाहिशों से हारा.. रूठे चाँद का है चकोर.. ज़रा सी भी समझो कैसे.. यह परहेज़ रखता है क्यूँ.. माने न कभी कोई जोर.. दुनिया जहाँ की बंदिशों की यह कहाँ परवाह करे जब खींचे तेरी डोर ..खींचे तेरी डोर ..मनचला मन चला तेरी ओर

  

32. तू जरूरी 
ये साल सुनिधि चौहान के लिए गायिकी के लिहाज़ से फीका ही रहा है पर इस गीत की लोकप्रियता शायद उनके गिरते कैरियर ग्राफ को कुछ सहारा प्रदान करे। इस युगल गीत में उनका साथ दिया है शरीब साबरी ने। धुन तो ऐसी है जिसे आप बार बार गुनगुनाना चाहें.. 


31. इश्क़ बुलावा 
गायिकी के लिहाज़ से सनम पुरी का नाम इस साल की नई खोजों में लिया जा सकता है। हँसी तो फँसी में विशाल शेखर द्वारा दिए मौके को उन्होंने पूरे मन से निभाया है। जब वो इश्क़ बुलावा जाने कब आवे ...मैं ता कोल तेरे रहना ..तैनू तकदा रवाँ ..बातों पे तेरी हँसदा रवाँ ..तैनू तकदा रवाँ गाते हैं तो एक प्रेमी का मासूम चेहरा उभर कर सामने आ जाता है।

  

30. सावन आया है 
अभी तो ख़ैर ठंड आ गई है पर Creature 3 D का ये प्यारा सा नग्मा सावन में आग लगा चुका है। वैसे लगता है बॉलीवुड में भी पश्चिमी रॉक बैंड की तरह ख़ुद ही गीत लिखकर उसकी धुन बनाने का चलन जोर शोर से शुरु हो गया है। मिथुन और अर्को मुखर्जी के बाद टोनी कक्कड़ ने भी इस गीत और संगीत की कमान अपने पास रखी है। धुन तो कमाल की है जो सहज बोलों को चला ले जाती है। अरिजित सिंह ने इस गीत को गाया भी बड़े प्यार से है।


29 सज़दा 
कैसे कैसे नाम हो गए हैं फिल्मों के किल दिल और गीतकार के रूप में गुलज़ार हम्म थोड़ा अजीब सा लगता है ना। ये फिल्म उनके बोलों लायक नहीं थी बहरहाल सज़दा के माध्यम से पानी में आग तो गुलज़ार साहब भी लगा रहे हैं.. इक ख्वाब ने आँखें खोली हैं, क्या मोड़ आया है कहानी में वो भीग रही है बारिश में और आग लगी है पानी में..

  

28.दावत ए इश्क़ 
एक खानसामे के प्यार को गीतकार क़ौसर मुनीर और संगीतकार साजिद वाजिद ने बेहतरीन शब्द रचना और संगीत से बाँधा है इस गीत में। जावेद अली और सुनिधि चौहान की जोड़ी भी पूरे रंग में है। हम भी आपसे यही कहेंगे कि दिल ने दस्तरखान बिछाया, दावत ए इश्क़ है. 


27.हम तुम्हें कैसे बताएँ तुममें क्या क्या बात है
इस गीत को आपने पहले सुना हो इसमें मुझे संशय है। राम सम्पत की संगीतबद्ध और संदीप नाथ के लिखे इस गीत को आवाज़ दी है अमन तिरखा और तरन्नुम मलिक ने। एक सुकून है इस सहज से गीत में। फिल्म है इकतीस तोपों की सलामी..एक बार सुनिएगा जुरूर

  

26.Love is a waste of time 
और अगर आपको लगता है कि इन प्यार मोहब्बत की बाते कहने वाले गीतों को सुनवाकर मैंने आपका वक़्त ज़ाया किया है तो उसके लिए मैं कुछ नहीं कर सकता। आख़िर पीके अब दूसरे हफ्ते में चल रही है। अब तक तो
आपको तो पता होना चाहिए कि  Love is a waste of time :)


आशा है इन गीतों ने आपको प्रेम के रंग में रँग दिया होगा। वार्षिक संगीतमाला 2014 का सफ़र ज़ारी रहेगा अगले साल। मेरी तरफ़ से एक शाम मेरे नाम के पाठकों को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!

वार्षिक संगीतमाला 2014

    Friday, December 19, 2014

    पेशावर हमले पर प्रसून जोशी की कविता...समझो कुछ गलत है Samjho Kuch Ghalat Hai ...

    कभी कभी सोचता हूँ कि आख़िर भगवान के मन में ऐसा क्या आया होगा कि उसने मानव मात्र की रचना करने की सोची। क्या फर्क पड़ जाता अगर इस दुनिया में पेड़ पौधे, पर्वत, नदियाँ, सागर और सिर्फ जानवर होते? आख़िर जिस इंसान को प्रेम, करुणा, वातसल्य से परिपूर्ण एक सृजक के रूप में बाकी प्रजातियों से अलग किया जाता है उसी इंसान ने आदि काल से विध्वंसक के रूप में घृणा, द्वेष, क्रूरता और निर्ममता के अभूतपूर्व प्रतिमान रचे हैं और रचता जा रहा है।

    आख़िर इंसानों ने आपने आप को इस हद तक गिरने कैसे दिया है? मानवीय मूल्यों के इस नैतिक पतन की एक वज़ह ये भी है कि हमने अपने आप को परिवार, मज़हब, शहर, देश जैसे छोटे छोटे घेरों में बाँट लिया है। हम उसी घेरे के अंदर सत्य-असत्य, न्याय अन्याय की लड़ाई लड़ते रहते हैं और घेरे के बाहर ऐसा कुछ भी होता देख आँखें मूँद लेते हैं क्यूँकि उससे सीधा सीधा नुकसान हमें नहीं होता। यही वज़ह है कि समाज के अंदर जब जब हैवानियत सर उठाती है हम उसे रोकने में अक़्सर अपने को असहाय पाते हैं क्यूँकि हम अपने घेरे से बाहर निकलकर एकजुट होने की ताकत को भूल चुके हैं।

    पेशावर हमले में मारे गए मासूम

    पेशावर में जो कुछ भी हुआ वो इसी हैवानियत का दिल दहला देने वाला मंज़र था। पर ये मत समझिएगा कि ये मानवता का न्यूनतम स्तर है। हमारी मानव जाति में इससे भी ज्यादा नीचे गिरने की कूवत है। ये गिरावट तब तक ज़ारी रहेगी जब तक ये दुनिया है और जब तक इंसान अपने चारों ओर बनाई इन अदृश्य दीवारों को तोड़कर एकजुट होने की कोशिश नहीं करता।

    पेशावर से जुड़ी इस घटना पर प्रसून जोशी जी की दिल को छूती इस कविता को पढ़ा तो लगा कि मेरी भावनाओं को शब्द मिल गए। आज मन में उठती इन्हीं भावनाओं को अपनी आवाज़ के माध्यम से आप तक पहुंचाने की कोशिश की है..'

     

    जब बचपन तुम्हारी
    गोद में आने से कतराने लगे
    जब मां की कोख से झांकती जिंदगी
    बाहर आने से घबराने लगे
    समझो कुछ गलत है।

    जब तलवारें फूलों पर जोर आजमाने लगें
    जब मासूम आँखों में खौफ़ नजर आने लगे
    समझो कुछ गलत है।

    जब ओस की बूँदों को हथेलियों पर नहीं
    हथियारों की नोक पर तैरना हो
    जब नन्हे नन्हे तलवों को
    आग से गुजरना हो
    समझो कुछ गलत है...।

    जब किलकारियाँ सहम जाएँ
    जब तोतली बोलियाँ खामोश हो जाएँ
    समझो कुछ गलत है।

    कुछ नहीं बहुत कुछ गलत है
    क्योंकि जोर से बारिश होनी चाहिए थी
    पूरी दुनिया में

    हर जगह टपकने चाहिए थे आँसू
    रोना चाहिए था ऊपर वाले को
    आसमान से, फूटफूटकर।

    शर्म से झुकनी चाहिए थी
    इंसानी सभ्यता की गर्दनें
    शोक नहीं, सोच का वक्त है
    मातम नहीं, सवालों का वक्त है।

    अगर इसके बाद भी
    सर उठाकर खड़ा हो सकता है इंसान
    समझो कुछ गलत है।


    वे बच्चे तो इस दुनिया में नहीं है पर शायद उनकी असमय मौत हममें से कुछ को जरूर सोचने में मदद करे कि हम कहाँ गलत थे।

    Sunday, December 07, 2014

    इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा..कैसे बना 21 रूपकों वाला ये गीत ? Ek ladki ko dekha...

    तकरीबन बीस साल हो गए इस बात को। इंजीनियरिंग कॉलेज से निकले हुए एक साल बीता था। नौकरी तो तुरंत लग गई थी अलबत्ता काम करने में मन नहीं लग रहा था। मार्च का महीना था। फरीदाबाद में उस वक़्त गर्मियाँ आई नहीं थी। कार्यालय की मगज़मारी के बाद रात को ही फुर्सत के कुछ पल नसीब होते थे। रात्रि भोज ढाबे में होता था और वहीं दोस्त यारों से बैठकी का अड्डा जमा करता था। कभी कोई नहीं मिला तो यूँ ही सेक्टर चौदह के छोटे से बाजार के चक्कर अकेले मार दिया करता था। ऐसी ही चहलकदमी में एक छोटी सी दुकान में बजता ये गीत पहली बार कानों में पड़ा था और मेरे कदम वहीं ठिठक गए थे।

    गीत को पहली बार सुनते ही फिल्म देखने का मन हो आया था। आख़िर क्या खास था इस गाने में? जावेद अख्तर के लिखे वो इक्कीस रूपक जो दिल में एक मखमली अहसास जगाते थे, या फिर कुमार शानू जिनकी आवाज़ का सिक्का आशिकी (पहली वाली) के लोकप्रिय नग्मों के बाद हर गली नुक्कड़ पर चल रहा था। पर सच कहूँ तो दूर से आती इस गीत की धुन ही थी जिसने मेरा इस गीत की ओर उस रात ध्यान खींचा था। तब तो मुझे भी ये भी नहीं पता था कि इस गीत के पीछे पंचम का संगीत है। ताल वाद्यों से अलग तरह की आवाज़ पैदा करने में पंचम को महारत हासिल थी। यहाँ भी ताल वाद्यों के साथ गिटार का कितनी खूबसूरती से उपयोग किया था गीत के आरंभ में पंचम ने। ये गीत वैसे गीतों में शुमार किया जाता है जिसमें मुखड़े और अंतरे को एक साथ ही पिरोया गया है। इंटरल्यूड्स पर आप ध्यान दें तो पाएँगे कि हर एक मुखड़े अंतरे के खत्म होते ही गूँजते ढोल को बाँसुरी का प्यारा साथ मिलता है।


    पर क्या आपको पता है कि फिल्म में ये गीत कैसे आया? जावेद अख़्तर साहब ने कुछ अर्से पहले इस गीत के बारे में चर्चा करते हुए बताया था कि पहले ये गीत फिल्म में ही नहीं था। स्क्रिप्ट सुनते वक़्त जावेद साहब ने सलाह दी थी कि यहाँ एक गाना होना चाहिए। पंचम और निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने तब जावेद साहब से कहा कि अगर आपको ऐसा लगता है तो गाना लिखिए। अगर हमें अच्छा लगा तो फिल्म में उसके लिए जगह बना लेंगे।

    अगली सिटिंग में जब जावेद जी को जाना था तब उन्हें ख्याल आया कि मैंने सलाह तो दे दी पर लिखा कुछ भी नहीं। रास्ते में वो गीत के बारे में सोचते रहे और एक युक्ति उनके मन में सूझी कि गीत की शुरुआत इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ...से की जाए और आगे रूपकों की मदद से इसे आगे बढ़ाया जाए.. जैसे ये जैसे वो। जावेद साहब सोच रहे थे कि ये विचार शायद ही सबको पसंद आएगा और बात टल जाएगी। पर जब उन्होंने पंचम को अपनी बात कही तो उन्होंने कहा कि तुरंत एक अंतरा लिख कर दो। जावेद साहब ने वहीं बैठ कर अंतरा लिखा और पंचम ने दो मिनट में अंतरे पर धुन तैयार कर दी। जावेद साहब बताते हैं कि पहला अंतरा जिसमें सात रूपक थे तो उन्होंने वहाँ जल्दी ही मुकम्मल कर लिया था पर बाकी हिस्सों में चौदह बचे रूपको को रचने में उन्हें  तीन चार दिन लग गए।

    बताइए तो जिन गीतों के बारे में हम इतनी लंबी बातें कर लेते हैं। जिनकी भावनाओं में हम बरसों डूबते उतराते हैं वो इन हुनरमंदों द्वारा चंद मिनटों में ही तैयार हो जाती हैं. ये होता है कलाकार। ख़ैर आपको ये गाना इसके बोलों के साथ एक बार फिर सुनवाए देते हैं।


    इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
    जैसे खिलता गुलाब
    जैसे शायर का ख्वाब
    जैसे उजली किरण
    जैसे वन में हिरण
    जैसे चाँदनी रात
    जैसे नरमी की बात
    जैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया
    इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा!

    इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
    जैसे सुबह का रूप
    जैसे सरदी की धूप
    जैसे वीणा की तान
    जैसे रंगों की जान
    जैसे बल खाये बेल
    जैसे लहरों का खेल
    जैसे खुशबू लिये आये ठंडी हवा
    इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा!

    इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
    जैसे नाचता मोर
    जैसे रेशम की डोर
    जैसे परियों का राग
    जैसे सन्दल की आग
    जैसे सोलह श्रृंगार
    जैसे रस की फुहार
    जैसे आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता नशा
    इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा!


    फिल्म आई और इसके सारे गीत खूब बजे। मनीषा कोइराला फिल्म में गीत में बयाँ की गई लड़की सी प्यारी दिखीं। ये अलग बात है कि जावेद साहब ने ये गीत तब मनीषा को नहीं बल्कि माधुरी दीक्षित को ध्यान में रखकर लिखा था। यूँ तो मैं फिल्म दोबारा देखता नहीं पर इस फिल्म को तब मैंने एक बार अकेले और दूसरी बार दोस्तों के साथ देखा।

    पर फिल्म के संगीत निर्देशक पंचम स्वयम् इस गीत की लोकप्रियता को जीते जी नहीं देख सके। वैसे उन्हें इस फिल्म का संगीत रचते हुए ये यकीन हो चला था कि इस बार उनकी मेहनत रंग लाएगी। पंचम पर लिखी गई किताब R D Burman The Man The Music में इस गीत को याद करते हुए फिल्म के निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा बताते हैं कि
    31 दिसम्बर 1993 को फिल्म सिटी के टाउन स्कवायर में नए साल के उपलक्ष्य में इस एक पार्टी का आयोजन हुआ था। पार्टी में यूनिट के सभी सदस्यों और कामगारों ने हिस्सा लिया था। हमने साउंड सिस्टम पर इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा...बजाया। मुभे याद है कि सारे लोगों को उत्साह बढ़ाते और तालियाँ बजाते देख पंचम समझ चुके थे कि उनका काम इस बार जरूर सराहा जाएगा।

    शायद पंचम के लिए वो आख़िरी मौका था कि वो अपने रचे संगीत को सबके साथ सुन रहे थे। उसके तीन दिन बाद ही हृदयाघात की वज़ह से उनका देहांत हो गया था।पंचम भले आज हमारे बीच नहीं हों पर ये गीत, इसकी धुन इसके रूपक को हम हर उस सलोने चेहरे के साथ जोड़ते रहेंगे जिसने हमारे दिल में डेरा जमा रखा होगा। क्यूँ है ना?
     

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