Tuesday, June 09, 2015

सफलता के सोपान पर जब थे अनजान : खई के पान.. से छू कर मेरे मन को तक का सफ़र ! Anjaan the lyricist...

साठ के दशक में गीतकार अनजान की संघर्ष गाथा को तो पिछली पोस्ट में बयाँ कर ही चुका हूँ आज आपसे बाते करूँगा उनके उत्कर्ष काल की यानि सत्तर के आखिर से लेकर अस्सी का दशक की। ये वो दौर था जब हम बचपन से किशोरावस्था की ओर प्रवेश कर रहे थे। लिहाज़ा अनजान के लिखे उन नग्मों को अपनी आँखों के सामने लोकप्रिय होते देखने का सौभाग्य मिला था मुझे। जैसा कि पिछली पोस्ट में मैंने आपको बताया कि संगीतकार कल्याण जी आनंद जी के साथ फिल्म बंधन के बनते वक़्त अनजान की जो मुलाकात हुई वो उन्हें 1978 में आई फिल्म डॉन के साथ सफलता की नई ऊँचाइयों पर ले गई।



डॉन  के गाने भी कल्याण जी आनंद जी इंदीवर से लिखवाने की सोच रहे थे। इंदीवर ने उसका एक गीत ये मेरा दिल.. लिखा भी पर फिर किसी बात से उनके बीच अनबन हो गई और बाकी गाने अनजान की झोली में आ गए। अनजान ने इस मौके को पूरी तरह भुनाया। जिसका मुझे था इंतजार..... से लेकर खई के पान बनारसवाला... तक हर गली मोहल्ले में अनजान के गीत बजने लगे। खई के पान... .के पीछे की भी एक मजेदार कहानी है जिसे उनके पुत्र समीर कई साक्षात्कारों में बता चुके हैं।

हुआ यूँ कि अनजान किशोर कुमार को गीत के बोल लिखवा रहे थे भंग का रंग जमा हो चकाचक...। किशोर दा ने ये पंक्ति सुनी और अपनी कलम रख दी और कहा कि अनजान तुम ये कहाँ कहाँ के शब्द ढूँढ के लाते हो.. मैंने तो सारी ज़िदगी ये "चकाचक" शब्द नहीं सुना।
किशोर दा की अगली आपत्ति गीत के मुखड़े को लेकर थी। कहने लगे अनजान, मैं खई के नहीं, खा के पान बनारसवाला ही गाऊँगा। पूरे गाने को सुनने के बाद किशोर दा ने कल्याण जी से कहा भाई ये बड़ा कठिन गाना है, ऊपर से इतने अटपटे से शब्द हैं मैं तो इसे एक एक बार ही गाऊँगा अगर सही रहा तो तुम्हारा नसीब नहीं हुआ तो किशोर कुमार भाग जाएगा
रिकार्डिंग के ठीक पहले किशोर दा ने पूछा कि आप लोग पान खाते खाते बात कैसे करते हैं? आनन फानन में पान के बीड़े और पीकदान मँगवाए गए। सबने पान खाए और उनकी बात करने के अंदाज़ को किशोर ने परखा और हू बहू गाने में उतार दिया। इतनी सब नौटंकी के बाद भी किशोर दा ने इस गीत के लिए जो बनारसी अदा दिखाई उसे कौन भूल सकता है?

खून पसीना और डॉन जैसी फिल्मों के गीत बजने बंद भी नहीं हुए थे कि अनजान के गीतों ने फिर एक बड़ा धमाका किया। फिल्म थी मुकद्दर का सिकंदर। मुझे अच्छी तरह याद है कि इस फिल्म को हॉल में देखने के बाद उसका हर एक गीत रोते हुए आते हें सब...., ज़िदगी तो बेवफ़ा है...., ओ साथी रे...., दिल तो है दिल ...., सलाम ए इश्क...., महीनों जुबान पर रहे थे ।  

अगले ही साल यानि 1979 में उनकी भोजपुरी फिल्म आई बलम परदेसिया । वो फिल्म इतनी हिट हुई थी कि दो रिक्शों में हमारा परिवार घर से पाँच छः किमी दूर पटना के अल्पना सिनेमा हाल में देखने गया था। फिल्म कैसी लगी थी उस वक्त याद नहीं पर जब ये गाना गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा जियरा उड़ उड़ जाए ....पर्दे पर आया था तो भाई लोग कमीज खोल खोल कर पर्दे तक नाचते हुए पहुँच गए थे। 

संगीतकार बदलते रहे पर अनजान की सफलता का ये सिलसिला अस्सी के दशक में भी जारी  रहा। अनजान, किशोर कुमार और अमिताभ बच्चन की तिकड़ी ने अस्सी के दशक में लावारिस, शराबी, और नमकहलाल जैसी फिल्मों में खूब धमाल मचाया। अनजान के गीतों में गज़ब की विविधता थी यशोदा का नंदलाला... जैसी लोरी लिखने वाले अनजान बप्पी दा के लिए I am a Disco Dancer लिख गए। एक ओर पिपरा के पतवा ..लिखा तो वहीं गोरकी पतरकी... भी। मानो तो हूँ गंगा माता ना मानो तो बहता पानी... जैसे भावपूर्ण गीत  लिखे तो आज रपट जाएँ ....जैसे मस्ती भरे तराने भी। इस दौर में लिखे उनके दो गीतों को आज भी मन से याद करता हूँ। एक तो डिस्को बीट्स पर रचा और अलीशा चिनॉय का गाया मेरा दिल गाए जा  जूबी जूबी जूबी जूबी जो उन दिनों मोहल्ले  में होने वाली दुर्गा और सरस्वती पूजा की शान हुआ करता था और दूसरा वो जिसे फिल्म याराना के लिए उन्होंने राजेश रोशन के लिए रचा था.

कॉलेज के दिनों में मेरे मित्र वार्षिक संगीत संध्या पर पूरी आर्केस्टा के साथ ये गीत बजाते और हम घंटों इस गीत की धुन और शब्दों की ख़मारी में झूमते रहते। गीत तो आप पहचान ही गए होंगे चलिए आपको फिर से सुनवा भी देते हैं..


छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा
बदला ये मौसम लगे प्यारा जग सारा

तू जो कहे जीवनभर तेरे लिए मैं गाऊँ
गीत तेरे बोलों पे लिखता चला जाऊँ
मेरे गीतों में तुझे ढूंढ़े जग सारा

आजा तेरा आँचल ये प्यार से मैं भर दूँ
खुशियाँ जहाँ भर की तुझको नजर कर दूँ
तू ही मेरा जीवन तू ही जीने का सहारा

अनजान के इन सहज भोले शब्दों को गुनगुनाते हुए मन आज भी प्रेम की इस निर्मल हवा में झूम जाता है।

लंबे समय के संघर्ष के बाद मिली इस जबरदस्त सफलता के बाद भी अनजान को ज़िंदगी से दो मलाल रह गए थे। पहला तो तीन दशकों के संगीत सफ़र में एक बार भी फिल्मफेयर एवार्ड ना जीत पाने का ग़म और दूसरे बतौर साहित्यकार समाज को कुछ ना दे पाने की पीड़ा। पर भगवान की कृपा ये जरूर रही कि इस संसार को छोड़ने के पहले वो अपने पुत्र समीर को फिल्मफेयर पुरस्कार लेते हुए देख सके और बीमारी के बीच अपना कविता संग्रह 'गंगा तट का बंजारा' भी लिख पाए जिसका विमोचन खुद अमिताभ जी ने किया। अनजान के नाम से भले आप अनजान पर उनके रचे गीतों से आप और आने वाली पीढ़ियाँ अनजान रहेंगी इसकी कल्पना भी नामुमकिन है।
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10 comments:

HARSHVARDHAN on June 10, 2015 said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन दर्द पर जीत की मुस्कान और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Annapurna Gayhee on June 10, 2015 said...

कहा जाता है कि खई के पान गीत पहले बनारसी बाबू फिल्म के लिए देव ( आनन्द ) साहब को दिया गया था जो उन्हें पसन्द नहीं आया इसकी जगह उन्होने दूसरा गीत लिया हम है बनारसी बाबू

Anil Kumar Saharan on June 10, 2015 said...

jo geet hamre itne pasandida h unke gitkar se aaj prichy hua. sbse umda parstuti aapki.

Manish Kumar on June 10, 2015 said...

हर्षवर्धन शुक्रिया इसे ब्लॉग बुलेटिन में स्थान देने के लिए !

Annapurna jee ये तो बड़ी दिलचस्प बात साझा की आपने !

सराहने का शुक्रिया अनिल

Fiza Dawn on June 11, 2015 said...

Meri tippani mobile ke chakkar mein kaheen khogaya....

Accha laga Anjaan ke baare mein padhkar... kuch khas batein bhi darshayee gayeen accha laga....
Waqai aaj bhi ek gudgudahat pahunchate hain jab bhi unke likhe geet hum sunte hain ...

shukriya

fiza

रश्मि शर्मा on June 11, 2015 said...

बहुत बढ़ि‍या पोस्‍ट...कई नई जानकारी मि‍ली। धन्‍यवाद

संदीप द्विवेदी on June 11, 2015 said...

अन्नपूर्णा जी की बात बिलकुल सच है Manish भाई! खई के पान बनारस वाला गीत मूल रूप से 'बनारसी बाबू' फ़िल्म के लिए ही बनाया गया था कल्याण जी आनंद जी द्वारा किन्तु देवानंद द्वारा इसे रिजेक्ट कर देने के बाद कल्यानजी आनंद जी ने इस गीत को फ़िल्म डॉन में प्रयोग किया और फिर इसी गीत के लिए किशोरे दा ने फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी जीता..

Seema Singh on June 14, 2015 said...

Chu kar mere man ko one of my favorite song thanks manish ji for this post

lori ali on June 14, 2015 said...

bahut rochak lafzo me baht see jankaaree
shukriyaa!!!!

Manish Kumar on June 15, 2015 said...

डॉन, सीमा, रश्मि व लोरी आप सबने इस पोस्ट को सराहा इसके लिए धन्यवाद। मैं यही समझूँगा कि इन जानकारियों को बटोरने में लगी मेहनत सार्थक हुई।

संदीप शुक्रिया इन तथ्यों का यहाँ साझा करने के लिए

 

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