Thursday, April 23, 2015

कहूँ दोस्त से दोस्त की बात क्या.. क्या.. आबिदा परवीन Kahoon Dost se Dost Ki Baat Kya Kya : Abida Parveen

कल आबिदा परवीन जी को सुन रहा था। बाबा ज़हीन साहब ताजी का लिखा कलाम गा रही थीं "कहूँ दोस्त से दोस्त की बात क्या.. क्या.." । ग़ज़ल तो मतले के बाद किसी और रंग में रंग गयी पर इस मिसरे ने माज़ी के उन लमहों की याद ताजा कर दी जब जब इस शब्द की परिभाषा पर कोई ख़रा उतरा था। बचपन के दोस्तों की खासियत या फिर एक सीमा कह लीजिए कि वो जीवन के जिस कालखंड में हमसे मिले बस उसी के अंदर की छवि को मन में समाए हम जीवन भर उन्हें स्नेह से याद कर लिया करते हैं। ख़ुदा ना खास्ता उनसे आज मिलना हो जाए तो खुशी तो होगी पर शायद ही आप उनसे उस सहजता से बात कर पाएँ क्यूँकि उनके बदले व्यक्तित्व में शायद ही वो अंश बचा हो जिसकी वज़ह से वो कभी आपके खास थे। शायद यही बदलाव वो मुझमें भी महसूस करें।

मुझे याद है कि बचपन में एक छोटी बच्ची से इसलिए दोस्ती थी क्यूँकि वो अपने घर के सारे खिलौनों से मुझे खेलने देती थी। दूसरी से पाँचवी कक्षा तक राब्ता बस उन्हीं बच्चों से था जो रिक्शे में साथ आया जाया करते थे। हाईस्कूल के दोस्तों में दो तीन से ही संपर्क रह पाया है। बाकी सब कहाँ है पता नहीं। पर उनका ख्याल रह रह कर ज़हन में आता रहता है। ये नहीं कि वे मेरे बड़े जिगरी दोस्त थे पर बस इतना भर जान लेना कि वो कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं मन को बड़ा संतोष देता है।

हॉस्टल और वो भी कॉलेज हॉस्टल के दोस्तों की बात जुदा है। वो जब भी मिलें जितने सालों के बाद मिले उनसे गप्प लड़ाना उन बेफिक्र पलों को फिर से कुछ देर के लिए ही सही पा लेना होता है। वो पढ़ाई का तनाव, साझा क्रश, फालतू की शैतानियाँ, नौकरी पाने की जद्दोज़हद कितना कुछ तो हमेशा रहता है फिर से उन स्मृतियों में गोते लगाने के लिए।

ये तो हुई गुजरे वक़्त की बातें। आज तो अंतरजाल पर हजारों किमी दूर बैठे किसी शख्स को आप चुटकियों में दोस्त बना लेते हैं। पर दोस्तों की इसभारी भीड़ में अगर कोई ये पूछे कि इनमें से कितनों के साथ आपके मन के तार जुड़े हैं? कौन हैं वो जो बिना बोले आपकी मन की भावनाओं को समझ लेते हैं? अपनी हताशा अपनी पीड़ा को किसके सामने बिना झिझक के बाँट सकते हैं आप? तो लगभग एक सा ही जवाब सुनने को मिलेगा।

हममें से हर किसी के लिए ये संख्या उँगलिओं पे गिनी जा सकती है। ऐसे दोस्तों के बारे में जितनी भी बात की जाए कम है। दरअसल हम अपने चारों ओर अपना अक्स ढूँढने की जुगत में रहते हैं। जानते हैं जो शख़्स हमारी तरह का होगा उसे उतनी ही मेरी भावनाओं की कद्र होगी। पर इस दोस्ती में गर प्रेम का रंग मिल जाए तो ? तो फिर मन की भावनाएँ कुछ वैसी ही हो जाती हैं जो बाबा ज़हीन साहब ताजी इस कलाम में व्यक्त कर रहे हैं।


बाबा के लिए तो वो दोस्त अराध्य सा हो जाता है, वो उसे जब चाहे देख लेते हैं जब चाहें बातें कर लेते हैं और यहाँ तक कि उस के जलवों की कल्पना कर मन ही मन उल्लासित भी होते रहते हैं। सूफ़ियत के चश्मे से देखें तो इन पंक्तियों में छलकता प्रेम ईश्वर से है पर सभी को ऊपरवाला तो नहीं मिल सकता ना, हाँ इक अच्छा दोस्त जरूर मिल सकता है जो मन के तारों को जोड़ते जोड़ते हृदय की गहराइयों तक पहुँच जाए। तो आइए गौर करें बाबा की लिखी इन पंक्तियों पर

कहूँ दोस्त से दोस्त की बात क्या.. क्या..
रही दुश्मनों से मुलाकात क्या क्या

आख़िर मैं उस दोस्त के बारे में क्या कहूँ जिसने मेरे दिल को अपना घर बना लिया है। अब उससे ये भी तो नहीं कहा जा सकता कि उसका ख्याल दिल में रहते हुए किसी रकीब से मिलने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता।

वो इश्वे वो ग़मज़े वो नग्मे वो जलवे
तलब कर रहे हैं हम आफात क्या क्या
कहूँ दोस्त से दोस्त की बात क्या.. क्या..

ओह उनकी वो कातिल निगाहें ,वो नाज़ , वो नखरे, उनके होठों पर थिरकते गीत  व उनकी अदाएँ ...देखिए हम सब जानते हुए भी इन क़यामतों के तलबगार बन बैठे हैं।

जहाँ मुझ को आया ख्याल...आ गए वो
दिखाई हैं दिल ने करामात क्या क्या
कहूँ दोस्त से दोस्त की बात क्या.. क्या..

अब तो  ये हालत है कि उनके बारे में कभी कुछ सोचूँ तो जनाब एक दम से सामने ही दिखने लगते हैं अगर ये शुरुआत है तो पता नहीं ये दिल आगे कौन कौन से चमत्कार दिखाने वाला है

न थी गुफ्तगू दरमियाँ भी उनसे
पस ए पर्दा ए दिल हुई बात क्या क्या
कहूँ दोस्त से दोस्त की बात क्या.. क्या.

अब देखिए ना, पर्दे की ओट में दिलों ने जो प्यार भरी  गुफ्तगू की उसे आमने सामने बात ना हो पाने के मलाल को मिटा दिया

आबिदा जी की गायिकी हमेशा से बेमिसाल रही है। इस गीत में जिस तरह से उन्होंने 'कहूँ',  'क्या क्या' या 'गुफ्तगू' जैसे टुकड़ों को अलग अलग तरीके से भावनाओं  डूब कर दोहराया है कि मन सुन कर गदगद हो जाता है। अगर आपने कोक स्टूडियो के सीजन सात में उनकी ये प्रस्तुति नहीं देखी तो जरूर देखिए..

Sunday, April 12, 2015

खिली चाँदनी ..दिल को द्रवित करती वॉयलिन पर कार्तिक अय्यर की धुन Karthik Iyer's violin adaptation of Rahman's Nila Kaikiradhu

एक शाम मेरे नाम पर अक्सर कोई गीत, कोई ग़ज़ल या रिकार्डिंग आपको सुनवाता रहा हूँ। पर आज इन सबसे अलग एक ऐसी धुन सुनवाने जा रहा हूँ जो मूलतः तो एक तमिल गीत के लिए बनाई गई थी पर पिछले एक हफ्ते से मेरे दिलो दिमाग पर कब्ज़ा जमाए बैठी है। किसी धुन के अंदर बहते संगीत पर किसी सरहद की मिल्कियत नहीं होती। सरहदें तो हम भाषा के आधार पर बना लेते हैं पर किसी वाद्य यंत्र पर बजती रागिनी तो संसार के किसी कोने में बैठे संगीतप्रेमी के ह्रदय का स्पर्श कर सकती है। जब हम कोई धुन सुनते हैं तो उससे मन में एक मूड, एक कैफ़ियत सी बनने लगती है। उस मूड से जो भावनाएँ मन में उभरती हैं वो बिल्कुल अपनी होती हैं। वही धुन जब शब्दों का जामा पहन कर गीत का रूप धारण कर लेती हैं तो हम उन चरित्रों की परिस्थितियों को अपने अनुभवों के परिपेक्ष्य में तौलते हैं। पर गीत हमें अपनी कहानियाँ में डूबने की ये आज़ादी हमेशा नहीं देते जो धुनें हमें सहज ही प्रदान कर देती हैं।

Karthik Iyer कार्तिक अय्यर
ये धुन आधारित है 1995 में आई तमिल फिल्म इंदिरा से और इसे संगीतबद्ध किया था भारत के मोजार्ट कहे जाने वाले संगीतकार ए आर रहमान ने। उन की इस धुन को परिमार्जित किया युवा वॉयलिन वादक कार्तिक अय्यर ने। अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर मैं ये कहूँ कि कार्तिक अय्यर ने मूल धुन के साथ जो अंश जोड़े हैं वो उसमें चार चाँद लगाते हैं।

चेन्नई से ताल्लुक रखने वाले कार्तिक ने नौ साल की उम्र से ही वॉयलिन बजाना शुरु कर दिया था। तेरह साल की छोटी उम्र में उन्होंने अपना पहला कान्सर्ट किया। पर तब तक वो इसे मात्र अपना शौक़ मानते थे। पर अपने इस शौक़ को अपनी रोज़ी रोटी का ज़रिया बनाने का निर्णय उन्होंने तब लिया जब वे इंजीनियरिंग के तीसरे वर्ष में थे। उन्हें उस वक़्त इंजीनियरिंग छोड़ संगीत के अनिश्चित कैरियर को अंगीकार करने की अनुमति देना उनके पिता के लिए बेहद कठिन निर्णय था। तीस वर्षीय कार्तिक अब तक दस देशों में दस हजार से भी अधिक कन्सर्ट कर चुके हैं और रहमान, रघु दीक्षित और शंकर महादेवन जैसे नामी संगीतकारों के साथ काम भी। शास्त्रीय संगीत के साथ देश विदेश की नई शैलियों को मिश्रित करने में उन्हें कभी गुरेज़ नहीं रहा। उनका ये नज़रिया भारतीय संगीत के प्रति उनकी इस सोच में सामने आता है

"भारतीय सभ्यता ने समय के थपेड़ों को सहा है और इस प्रक्रिया में अपने में कितनी ही नई संस्कृतियों का स्वागत और समावेश किया है और ऐसा करते हुए वो हर बार एक नए स्वरूप में बिना अपनी गहराई खोए हुए उभरी है। ठीक उसी तरह मेरे बैंड ने संगीत को किसी एक विधा के दायरे में ना रखकर उसमें दूसरे तरह के संगीत प्रभावों को इस तरह अपनाया है कि उसकी भारतीयता अक्षुण्ण रहे।"

इलेक्ट्रिक वॉयलिन पर बजती इस धुन की शुरुआत के पहले एक मिनट चालीस सेकेंड का मधुर टुकड़ा कार्तिक और रामप्रसाद सुंदर की बेहतरीन भागीदारी का नतीज़ा हैं। ये शुरुआत के सौ सेकेंड एक ऐसी स्वरलहरी की रचना करते हैं जिसे सुन मन में एक नीरवता सी छाने लगती है। फिर आती है गीत की मूल धुन जो जैसे जैसे आगे बढ़ती है आप अपने को गुमसुम होता पाते हैं और धुन का 2.15 से 2.40 का हिस्सा सुनते सुनते मन के अंदर की नमी आँखों तक पहुँच जाती है। 3.55 से अगले आधे मिनट तक आप कार्तिक की वॉयलिन पर की गई अपनी जादूगरी का नमूना सुनते हैं जो फिर गीत की मूल धुन में समाविष्ट हो जाती है।

कुल मिलाकर इस धुन को सुनना मन को मलिन करती ख़्वाहिशों व अंदर पलती बेचैनियों के खारेपन को धो कर उनसे कुछ देर के लिए ही सही अपने आप को मुक्त कर लेने जैसा है।


इस गीत को तमिल फिल्म इंदिरा में Nila Kaikiradhu के रूप में हरिहरण और हरिनी ने एकल गीत के रूप में गाया था। बाद में फिल्म का हिंदी रूपांतरण प्रियंका के नाम से हुआ जिसमें वैरामुथु के शब्दों का अनुवाद गीतकार पी के मिश्रा ने किया। अब इस धुन में लीन होने के बाद कम से कम मैं तो इस गीत को तुरंत सुनने की सलाह नहीं दूँगा। पर बाद में अगर सुनना चाहें तो हरिहरण की आवाज़ में गाया गीत ये रहा

खिली चाँदनी, हमें कह रही
गाओ सभी मिल के
इस दिल के तुम्हीं हो उजाले
खिली पूर्णिमा चली ये हवा
शबनम यहाँ बरसे
इस दिल के तुम्हीं हो उजाले
गाए मेरा मन, यूँ ही रात दिन
फिर भी प्यार तरसे
आ आ.. वो ही भूमि है 
वो ही आसमाँ, अपना दुख भला 
किसको सुनाएँ..खिली चाँदनी, हमें कह रही....



वैसे कार्तिक अय्यर की बजाई ये धुन आपके दिल से क्या कहती है?

Monday, April 06, 2015

नैना नीर बहाए.. राग भटियार पर आधारित एक मर्मस्पर्शी गीत Naina Neer

हिंदी फिल्मों में भारतीय शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत बनाए जाते रहे हैं और वे बेहद लोकप्रिय भी हुए हैं। विगत कुछ दशकों में अगर ये संख्या घटी है तो इसका एक कारण संगीतकारों को ऐसी कहानियों का ना मिल पाना है जिसमें ऐसे गीतों को फिल्म की परिस्थिति के साथ जोड़ा जा सके।  फिर भी हर साल ऐसे इक्के दुक्के गीत बनते ही रहते हैं। वर्ष 2007 में दीपा मेहता की एक फिल्म आई थी वॉटर, संगीतकार थे ए आर रहमान। इस फिल्म में रहमान साहब ने राग भटियार पर आधारित एक बेहद खूबसूरत धुन रची थी। शास्त्रीयता अपने साथ एक गंभीरता, एक गहराई लाती है जिसमें डूबे बगैर उसके अंदर बहते रस का स्वाद नहीं लिया जा सकता। रहमान की इस सांगीतिक रचना में आप अगर एक बार डूबे तो सच मानिए आपको जल्दी किनारा नहीं मिलेगा या दूसरे शब्दों में कहूँ तो आप जल समाधि से बाहर नहीं निकलना चाहेंगे।


फिल्म का ये गीत था नैना नीर बहाए..  जिसे आवाज़ दी थी साधना सरगम ने। आज भी इसे साधना सरगम के गाए बेहतरीन गीतों में से एक माना जाता है। साधना सरगम जिनका मूल नाम साधना घाणेकर वैसे तो मराठी हैं पर आपको ये जानकर ताज्जुब होगा कि वसंत देसाई और पंडित जसराज जैसे गुरुओं के सानिध्य में शास्त्रीय और सुगम संगीत सीखने वाली ये गायिका हमारे देश की 27 भाषाओं के पन्द्रह हजार के लगभग गीत गा चुकी है। हिंदी फिल्मों में वैसे तो साधना ने सैकड़ों गीत गाए हैं पर जाबांज का हर किसी को नहीं मिलता यहाँ प्यार.. फिर तेरी कहानी याद आई का तेरे दर पर सनम..... , जुर्म का जब कोई बात बिगड़ जाए.... और फिल्म सपने के चंदा रे..... जैसे गीतों से आम जनता के बीच खासी मक़बूलियत मिली। पर मुझे तो वो हमेशा याद रहीं जो जीता वो सिंकदर के गीत पहला नशा पहला ख़ुमार.... और विश्वात्मा के गीत सात समंदर पार से...। मुझे अच्छी तरह याद है कि इंजीनियरिंग कॉलेज के उस पहले साल में हम इस गीत को बारहा सुना और गुनगुनाया करते थे। पर इन सब गीतों पर साथिया में उनका गाए गीत चुपके से.... भारी पड़ता है। वो गीत मुझे इस लिए भी अजीज़ हैं क्यूँकि उसकी भावनाओं को मेरी पूरी पीढ़ी ने दिल से जिया है। दरअसल ए आर रहमान के लिए किया उनका काम उन्हें बतौर पार्श्व गायिका एक अलग ही धरातल पर ला खड़ा करता है।

अब Water के इस गीत को ही लें। जैसा कि मैंने पहले जिक्र किया कि ये नग्मा राग भटियार पर आधारित है। राग भटियार पौ फटने की बेला के ठीक पहले यानि रात्रि के अंतिम प्रहर में गाया जाने वाला राग है। लोग ऐसा मानते हैं कि ये राग अँधेरे से निकल कर एक नई सुबह आने की उम्मीद का राग है। विरह की पीड़ा का दंश झेलती नायिका को राधा और मीरा के दृष्टांत ये विश्वास दिलाते हैं कि उसने सामाजिक प्रताड़ना का जो विष निगला है उसे प्रेम की शक्ति अमृत बना देगी। नायिका का दर्द हृदय की गहराइयों से उठता हुआ आँखों की कोर तक तो पहुँचता अवश्य है पर झर झर गिरती अश्रु धारा एक ऐसी वैतरणी का रूप लेती है जो प्रेम के सात सुरों को साथ पाकर अपने अराध्य की ओर उन्मुख हो जाती है़। 

सुखविंदर सिंह के लिखे बोलों में अंतरनिहित भावनाओं को ए आर रहमान ने एक ऐसी मधुर धुन में परिवर्तित किया है जिसे सुनकर व्यथित मन पर भी एक सुकून सा तारी होने लगता है। चित्त को शांत करती संतूर की तरंग के साथ बहती साधना सरगम की आवाज़ इंटरल्यूड्स में बाँसुरी और मृदंगम का साथ पा कर और प्रभावी हो जाती है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को...




नैना नीर बहाए 
मुझ बिरहन का दिल साजन संग
झूम झूम कर गाए
नैना नीर बहाए

विष का प्याला काम ना आया
मीरा ने पी के दिखलाया
प्रेम तो है गंगा जल इसमें
विष अमृत बन जाए

प्रेम है गिरिधर की बाँसुरिया
प्रेम है राधा की साँवरिया
ये है सात सुरों का दरिया
झर झर बहता जाए

चलते चलते रहमान की इस संगीतबद्ध रचना का आनंद फिर लीजिए विजय कानन द्वारा बाँसुरी पर बजाई इस गीत की धुन के माध्यम से..


 

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