Wednesday, September 30, 2015

जगजीत और जावेद : साथ साथ, सिलसिले और सोज़ का वो साझा सफ़र! Tamanna phir machal jaye...

जावेद अख़्तर और जगजीत सिंह यानि 'ज' से शुरु होने वाले वे दो नाम जिनकी कृतियाँ जुबान पर आते ही जादू सा जगाती हैं। अस्सी के दशक के आरंभ में एक फिल्म आई थी साथ साथ जिसके संगीतकार थे कुलदीप सिंह जी। इस फिल्म के लिए बतौर गायक व गीतकार, जगजीत और जावेद साहब को एक साथ लाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। तुम को देखा तो ख्याल आया.. तो ख़ैर आज भी उतना ही लोकप्रिय है जितना उस समय हुआ था। पर फिल्म के अन्य गीत प्यार मुझसे जो किया तुमने तो क्या पाओगी.... और ये तेरा घर ये मेरा घर... तब रेडियो पर खूब बजे थे।

फिल्मों के इतर इन दो सितारों की पहली जुगलबंदी 1998 में आए  ग़ज़लों के एलबम 'सिलसिले ' में हुई। क्या कमाल का एलबम था वो। सिलसिले की ग़ज़ले जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया.., दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं.. और नज़्म मैं भूल जाऊँ तुम्हें, अब यही मुनासिब है... अपने आप में अलग से एक आलेख की हक़दार हैं पर आज बात उनके सिलसिले से थोड़ी कम मक़बूलियत हासिल करने वाले एलबम सोज़ की जो वर्ष 2001 में बाजार में आया।


सोज़ का शाब्दिक अर्थ यूँ तो जलन होता है पर ये एलबम श्रोताओं के सीने में आग लगाने में नाकामयाब रहा। फिर भी सोज़ ने शायरी के मुरीदों को दो बेशकीमती तोहफे जरूर दिये जिन्हें गुनगुनाते रहना उसके प्रेमियों की स्वाभावगत मजबूरी है। इनमें से एक तो ग़ज़ल थी और दूसरी एक नज़्म। मजे की बात ये थी कि ये दोनों मिजाज में बिल्कुल एक दूसरे से सर्वथा अलग थीं। एक में अनुनय, विनय और मान मनुहार से प्रेमिका से मुलाकात की आरजू थी तो दूसरे में बुलावा तो था पर पूरी खुद्दारी के साथ।

पर पहले बात ग़ज़ल  तमन्‍ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ.. की।  ओए होए क्या मुखड़ा था इस ग़ज़ल का। समझिए इसके हर एक मिसरे में चाहत के साथ एक नटखटपन था जो इस ग़ज़ल की खूबसूरती और बढ़ा देता है। आज भी जब इसे गुनगुनाता हूँ तो मन एकदम से हल्का हो जाता है तो चलिए एक बार फिर सुर में सुर मिलाया जाए..


तमन्‍ना फिर मचल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ
यह मौसम ही बदल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

मुझे गम है कि मैने जिन्‍दगी में कुछ नहीं पाया
ये ग़म दिल से निकल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

नहीं मिलते हो मुझसे तुम तो सब हमदर्द हैं मेरे
ज़माना मुझसे जल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ

ये दुनिया भर के झगड़े, घर के किस्‍से, काम की बातें
बला हर एक टल जाए, अगर तुम मिलने आ जाओ 

सोज़ की ये ग़ज़ल भले दिल को गुदगुदाती हो पर उसकी इस नज़्म के बारे में आप ऐसी सोच नहीं रख पाएँगे। प्रेम किसी पर दया दिखलाने या अहसान करने का अहसास नहीं। ये तो स्वतःस्फूर्त भावना है जो दो दिलों में जब उभरती है तो एक दूसरे के बिना हम अपने आप को अपूर्ण सा महसूस करते हैं। पर इस मुलायम से अहसास को जब भावनाओं का सहज प्रतिकार नहीं मिलता तो बेचैन मन खुद्दार हो उठता है। प्रेमी से मिलन की तड़प को कोई उसकी कमजोरी समझ उसका फायदा उठाए ये उसे स्वीकार नहीं। तभी तो जावेद साहब कहते हैं कि अहसान जताने और रस्म अदाएगी के लिए आने की जरूरत नहीं.... आना तभी जब सच्ची मोहब्बत तुम्हारे दिल में हो..

 

अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना
सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना

मैंने पलकों पे तमन्‍नाएँ सजा रखी हैं
दिल में उम्‍मीद की सौ शम्‍मे जला रखी हैं
ये हसीं शम्‍मे बुझाने के लिए मत आना

प्‍यार की आग में जंजीरें पिघल सकती हैं
चाहने वालों की तक़दीरें बदल सकती हैं
तुम हो बेबस ये बताने के लिए मत आना


अब तुम आना जो तुम्‍हें मुझसे मुहब्‍बत है कोई
मुझसे मिलने की अगर तुमको भी चाहत है कोई
तुम कोई रस्‍म निभाने के लिए मत आना  


जगजीत तो अचानक हमें छोड़ के चले गए पर अस्पताल में भर्ती होने से केवल एक दिन पहले उन्होंने जावेद साहब के साथ अमेरिका में एक साथ शो करने का प्रोग्राम बनाया था जिसमें आपसी गुफ्तगू के बाद जावेद साहब को अपनी कविताएँ पढ़नी थीं और जगजीत को ग़ज़ल गायिकी से श्रोताओं को लुभाना था। जगजीत के बारे में अक्सर जावेद साहब कहा करते थे कि उनकी आवाज़ में एक चैन था., सुकून था। इसी सुकून का रसपान करते हुए आज की इस महफ़िल से मुझे अब आज्ञा दीजिए पर ये जरूर बताइएगा कि इस एलबम से आपकी पसंद की ग़ज़ल  कौन सी है ?

Monday, September 21, 2015

कैसे तय किया ओ पी नैयर ने संघर्ष से सफलता का सफ़र :जा जा जा जा बेवफ़ा, कैसा प्यार कैसी प्रीत रे ! Ja Ja ja Ja Bewafa !

आजकल कई बार ऐसा देखा गया है कि पुराने मशहूर गीतों व ग़ज़लों को नई फिल्मों में फिर से नए कलाकारों से गवा कर या फिर हूबहू उसी रूप में पेश किया जा रहा है। हैदर में गुलों में रंग भरे गाया तो अरिजित सिंह ने पर याद दिला गए वो मेहदी हसन साहब की। वहीं पुरानी आशिकी में कुमार सानू का गाया धीरे धीरे से मेरी ज़िदगी में आना को तोड़ मरोड़ कर हनी सिंह ने अपने रैप में ढाल लिया है। शुक्र है तनु वेड्स मनु रिटर्न में फिल्म के अंत में कंगना पर आर पार के गाने जा जा जा जा बेवफ़ा का मूल रूप ही बजाया गया। इससे ये हुआ कि कई युवाओं ने पुरानी फिल्म आर पार के सारे गीत सुन डाले। आज आर पार की इस सुरीली और उदास गीत रचना का जिक्र छेड़ते हुए कुछ बातें रिदम किंग कहे जाने वाले नैयर साहब के बारे में भी कर लेते हैं।

ये तो सब जानते है कि आर पार ही वो फिल्म थी जिसने सुरों के जादूगर ओ पी नैयर की नैया पार लगा दी थी। पर उसके पहले नैयर साहब को काफी असफलताएँ भी झेलने पड़ी थीं।  नैयर लाहौर में जन्मे और फिर पटियाला में पले बढ़े। घर में सभी पढ़े लिखे और उच्च पदों पर आसीन लोग थे सो संगीत का माहौल ना के बराबर था। ऊपर से उन्हें बचपन में ही ढ़ेर सारी बीमारियों ने धर दबोचा। पर इन सब से जूझते हुए कब संगीत का चस्का लग गया उन्हें ख़ुद ही पता नहीं चला। ये रुझान उन्हें रेडियो तक ले गया जहाँ वे गाने गाया करते थे। 

मज़े की बात है कि ओ पी नैयर साहब ने मुंबई का रुख संगीत निर्देशक बनने के लिए नहीं बल्कि हीरो बनने के लिए किया था। स्क्रीन टेस्ट में असफल होने के बाद उन्हें लगा कि वो इस लायक नहीं हैं। फिर संगीत निर्देशक बनने का ख़्वाब जागा पर मुंबई की पहली यात्रा में अपने संगीत निर्देशन वो दो गैर फिल्मी गीत ही रिकार्ड कर पाए जिसमें एक था सी एच  आत्मा का गाया प्रीतम आन मिलो। काम नहीं मिलने की वज़ह से नैयर साहब वापस चले गए। पर वो गाना बजते बजते इतना लोकप्रिय हो गया कि उस वक़्त आसमान का निर्देशन कर रहे पंचोली साहब ने उन्हें मुंबई आने का बुलावा भेज दिया। कहते हैं कि नैयर साहब के पास ख़ुशी की ये सौगात ठीक उनकी शादी के दिन पहुँची।

1952 में उन्हें आसमान के आलावा दो फिल्में और मिलीं छम छमा छम और गुरुदत्त की बाज। दुर्भाग्यवश उनकी ये तीनों फिल्में बुरी तरह पिट गयीं। गीता जी नैयर साहब के साथ आसमान में देखो जादू भरे मोरे नैन के लिए काम कर चुकी थीं और उन्हें ऐसा लगा कि नैयर साहब उनकी आवाज़ का सही इस्तेमाल कर पाने की कूवत रखते हैं। जब ओ पी नैयर गुरुदत्त से बाज के लिए अपना बकाया माँगने गए तो उन्होंने उन्हें पैसे तो नहीं दिए पर गीता जी के कहने पर उन्हें अपनी अगली फिल्म आर पार के लिए अनुबंधित कर लिया। नैयर साहब ने बाबूजी धीरे चलना...., सुन सुन सुन जालिमा...., मोहब्बत कर लो जी भर लो अजी किसने देखा है.... जैसे गीतों के बल पर वो धमाल मचाया कि पचास के दशक में आगे चलकर किसी फिल्म के लिए एक लाख रुपये लेने वाले पहले संगीत निर्देशन बन गए।

सुन सुन सुन जालिमा.... का ही एक उदास रूप था जा जा जा ऐ बेवफ़ा... ! पर गीत के मूड के साथ साथ दोनों गीतों के संगीत संयोजन में काफी फर्क था। सुन सुन की तरह जा जा जा में ताल वाद्यों का कहीं इस्तेमाल नहीं हुआ। पूरे गीत में पार्श्व में हल्के हल्के तार वाद्यों की रिदम चलती रहती है जो गीत की उदासी को उभारती है। मजरूह ने गीत के मुखड़े और अंतरों में नायिका के शिकायती तेवर को बरक़रार रखा है। उलाहना भी इसलिए दी जा रही है कि कम से कम वही सुन कर नायक का दिल पसीज़ जाए। 

नैयर साहब ने गज़ब का गाना रचा था।  मुखड़े का हर जा.. दिल की कचोट को गहराता है वहीं अगली पंक्ति का प्रश्न हताशा के भँवर से निकलता सुनाई देता है।आज भी मन जब यूँ ही उदास होता है तो ये गीत बरबस सामने आ खड़ा होता है.. तो आइए सुनते हैं इस गीत को

जा जा जा जा बेवफ़ा, कैसा प्यार कैसी प्रीत रे
तू ना किसी का मीत रे, झूठी तेरी प्यार की कसम

दिल पे हर जफ़ा देख ली, बेअसर दुआ देख ली
कुछ किया न दिल का ख़याल, जा तेरी वफ़ा देख ली

क्यों ना ग़म से आहें भरूँ, याद आ गए क्या करूँ
बेखबर बस इतना बता, प्यार में जिऊँ या मरूँ




और अब देखिए हाल ही में आई फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न में कंगना पर इसे कैसे फिल्माया गया है..


Monday, September 14, 2015

बहुत दिनों से बहुत दिनों से..बहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना : गजानन माधव मुक्तिबोध Gajanan Madhav Muktibodh

गजानन माधव मुक्तिबोध हिन्दी के एक प्रखर कवि थे। पर स्कूल में बिहार बोर्ड की भाषा सरिता के दसवीं तक के सफ़र में ना उनकी किसी कविता से साबका पड़ा ना उसके बाद ही। इंटर के बाद तो वैसे ही कॉलेज में हिंदी से नाता टूट गया सो मुक्ति बोध को जानते कैसे? सच पूछिए तो मेरे लिए  हिंदी कविता भक्ति, श्रंगार, प्रेम, वीर रस से होती हुई जयशंकर प्रसाद, महादेवी, पंत व निराला जैसे छायावादी कवियों तक ही  सिमट गई। हिंदी कविता में छायावाद से प्रयोगवाद के जिस सफ़र में गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे कवियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई उससे कम से कम मैं तो अनजान ही रहा।

गजानन माधव मुक्तिबोध Gajanan Madhav Muktibodh
जो लोग मेरी तरह मुक्तिबोध के लेखन से उतने परिचित नहीं रहे हैं उन्हें ये बताना आवश्यक रहेगा कि उनकी पैदाइश   शिवपुरी में हुई थी जो मध्यप्रदेश के मुरैना जिले का हिस्सा है। वे एक मध्यमवर्गीय खानदान से ताल्लुक रखते थे। पिता माधवराव यूँ तो पुलिस में थे पर ईमानदारी से जीवन जीने में विश्वास रखते थे। उज्जैन में वो इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत हुए और वहीं मुक्तिबोध की प्रारंभिक शिक्षा भी शुरु हुई। स्नातक की डिग्री लेने के बाद पहले वे स्कूल में पढ़ाने लगे। बाद में राजनंदगाँव से जब परास्नातक (MA) की डिग्री हासिल हुई तो कॉलेज में प्राध्यापक पद पर नियुक्त हुए।

माता पिता की सहमति के बगैर उन्होंने शादी तो की पर अपनी पत्नी से उनका तारतम्य ना बैठ सका। लकवे की वज़ह से वे अपनी ज़िदगी का अर्धशतक भी पूरा ना कर पाए। ये विडंबना ही रही कि वे अपने ज्यादातर काव्य संग्रहों को ख़ुद छपते और सम्मान पाते नहीं देख पाए।  पिछले हफ्ते उनकी पुण्यतिथि पर जब उनकी कविताओं की चर्चा हुई तो उनकी प्रमुख रचनाओं को पढ़ने की इच्छा हुई। उनकी दो कविताएँ जो मन के किसी कोने को छू गई को आज अपनी आवाज़ में प्रस्तुत करने की एक कोशिश कर रहा हूँ।

मुक्तिबोध कि जो पहली कविता मैंने यहाँ चुनी है उसकी भावनाओं से आपमें से ज्यादातर अपने आप को जोड़ पाएँगे। कोई हमें कितना प्यारा है? कितना दिलअजीज़ है? हमारे मन में उसके लिए कितनी कद्र है? क्या हम हमेशा उसको सीधे सीधे बतला पाते हैं.. नहीं ना! अंदर से ख़्वाहिश तो बहुत रहती है कि वो हमारी भावनाओं को पढ़ लें पर प्रत्यक्ष में हम वो कह नहीं पाते। रिश्तों की ऐसी पेंच में फँसे होते हैं कि कह सुन कर उनकी गिरहों को ऐसा नहीं बना देना चाहते कि उनमें हमेशा हमेशा के लिए गाँठ लग जाए। पर पूरी चुप्पी भी बेचैन हृदय को कहाँ बर्दाश्त होने वाली है। सो संकेतों व प्रतीकों का सहारा लेने लगते हैं  अपने भीतर अंकुरित होती कोमल भावनाओं के संप्रेषण के लिए। ये छोटे छोटे इशारे ही काफी होते हैं दिल की मिट्टी को आपसी स्नेह से भिंगोए रखने के लिए। मुक्तिबोध की इस कविता के नायक नायिका आसमान और धरती हैं। धरती के प्रति अपनी आत्मीयता को आसमान किस तरह व्यक्त कर रहा है आइए देखते हैं इन पंक्तियों में..


बहुत दिनों से बहुत दिनों से
बहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना
और कि साथ यों साथ-साथ
फिर बहना बहना बहना
मेघों की आवाज़ों से
कुहरे की भाषाओं से
रंगों के उद्भासों से ज्यों नभ का कोना-कोना
है बोल रहा धरती से
जी खोल रहा धरती से
त्यों चाह रहा कहना
उपमा संकेतों से
रूपक से, मौन प्रतीकों से

मैं बहुत दिनों से बहुत-बहुत-सी बातें
तुमसे चाह रहा था कहना!
जैसे मैदानों को आसमान,
कुहरे की मेघों की भाषा त्याग
बिचारा आसमान कुछ
रूप बदलकर रंग बदलकर कहे।

मुक्तिबोध की दूसरी कविता इस बात को पुरज़ोर तरीके से रखती है कि इस संसार में बिना किसी कलुष के निर्मल हृदय रखने वाले इंसान को ख़ुद कितनी व्यथा से गुजरना पड़ता है। वो तो सबकी अच्छाई में विश्वास कर लेता है। सबकी पीड़ा को अपना लेता है। हर मुस्कुराहट में उसे एक पवित्रता नज़र आती है। किसी के हृदय की बेचैनी महसूस कर वो ख़ुद अधीर हो उठता है। पर फिर भी वो बार बार छला जाता है। वास्तविकता तो ये है कि इस कपटी संसार को तो वो निरा मूर्ख ही नज़र आता है। 

पर वो करे भी तो क्या करे अंदर का रुदन छुपाकर  हँसे भी तो किसके लिए? जिस संसार से भावनाओं के तार उसने जोड़ रखे थे वो तो उसका इस्तेमाल कर आगे बढ़ चुका है। अब उसके सहारे की जरूरत जो नहीं रह गई है । पर नहीं अभी सारे रास्ते बंद नहीं हुए। उसका जीवन व्यर्थ नहीं है क्यूँकि वो मन का सच्चा है।  नई पगडंडियाँ अब भी बाँह पसारे बुला रहीं हैं उसे।

शायद उनमें उसके अस्तित्व, उसके वज़ूद के पीछे की कई और कहानियाँ दफन हों।

शायद इन पंगडंडियों पर चलकर बटोरी कहानियों से वो जीवन के उपन्यास को एक मूर्त रूप दे सके ..



मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहें फैलाए!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ,
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने....
सब सच्चे लगते हैं,
अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाए!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है,
हर एक छाती में आत्मा अधीरा है
प्रत्येक सस्मित में विमल सदानीरा है,
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य पीडा है,
पलभर में मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ,
इस तरह खुद को ही दिए-दिए फिरता हूँ,
अजीब है जिंदगी!
बेवकूफ बनने की खातिर ही
सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ,
और यह देख-देख बडा मजा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ...
हृदय में मेरे ही,
प्रसन्नचित्त एक मूर्ख बैठा है
हँस -हँसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,
कि जगत.... स्वायत्त हुआ जाता है।
कहानियाँ  लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहाँ  ज़रा खडे होकर
बातें कुछ करता हूँ
.... उपन्यास मिल जाते ।

Wednesday, September 09, 2015

'नदिया से दरिया' से 'मैं शायर बदनाम' तक : नमक हराम का संगीत कब दूर गया है दिल से ? Songs of Namak Haraam

सत्तर के दशक का शुरुआती दौर पंचम के लिए उनके स्वर्णिम दौर के रूप में जाना जाता रहा है। सत्तर से पचहत्तर के छः सालों में उनकी करीब सत्तर फिल्में रिलीज़ हुई। यानि हर साल ये आंकड़ा दहाई छूता रहा। पंचम ने इस दौरान जिन फिल्मों को हाथ लगाया वे भले ख़ुद चली ना चली हों पर उनके संगीत को खासी वाहवाही मिली। दरअसल काम मिलने का ये सिलसिला फ़िल्म कटी पतंग की सफलता के बाद ही शुरु हो गया था। मनोहारी सिंह जो बतौर वादक उनके आर्केस्ट्रा का अहम हिस्सा हुआ करते थे ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था..
"उस व्यस्त दौर में कई बार महीने में पंचम ने तीस से ज्यादा गानों को रिकार्ड किया। कई बार तो एक ही दिन में दो गाने रिकार्ड कर लिए जाते थे। हम लोग दिन रात काम करते। संगीत सिर्फ गानों के लिए ही नहीं बल्कि फिल्म में बजते पार्श्व संगीत पर भी साथ ही काम चलता। अब सोचता हूँ तो लगता है आख़िर हमने वो सब कैसे किया। सचमुच वे दिन अविस्मरणीय थे।.… "

1973 में ऐसी ही एक फिल्म मिली पंचम को नाम था नमक हराम। पर आपको जान कर आश्चर्य होगा कि पंचम निर्माता सतीश वागले की पहली पसंद नहीं थे। सतीश ये जिम्मेदारी संगीतकार शंकर को सौंपना चाहते थे पर अपने जोड़ीदार राजाराम के कहने पर ये फिल्म पंचम की झोली में आ गई और पंचम ने किशोर कुमार और गीतकार आनंद बख़्शी के साथ मिलकर जो काम किया उसे किसी संगीत प्रेमी के लिए भूलना मुश्किल है।



फिल्म में पाँच गाने थे जिसमें तीन बेहद लोकप्रिय हुए। ये तीनों गीत एकल थे और इन सबको किशोर ने अपनी आवाज़ दी थी।

कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनके मुखड़े कुछ इस तरह ज़ेहन से चिपक जाते हैं कि आप उन्हें गुनगुनाते वक़्त अंतरों तक पहुँच ही नहीं पाते। बस मुखड़े को ही बार बार दोहराते रह जाते हैं। मेरे ख़्याल से नदिया से दरिया…  बख़्शी साहब का लिखा ऐसा ही एक नग्मा है। कितने सहज शब्दों में एक ज़ाम की गहराई नाप ली थी उन्होंने। मुखड़े के पहले पंचम का संगीत संयोजन कुछ अलग सा है। होली के मौके पे गाया ये नग्मा सामूहिक गीत ना होते हुए भी मस्ती से सराबोर है और उसकी वज़ह है खुले गले से गीत में घुलती किशोर दा की दमदार आवाज़।

 

नदिया से दरिया, दरिया से सागर
सागर से गहरा जाम
हो हो हो जाम में डूब गयी यारों मेरे,
जीवन की हर शाम...

वर्ग विभेद के बावज़ूद पलती बढ़ती दोस्ती की इस कहानी में एक गीत ऐसा है जो मुझे हमेशा अपने  प्यारे दोस्तों की याद दिला देता है। याद आया ना आपको वो गीत दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं...। ताल वाद्यों का गीत के बोलों के बीच में क्या बेहतरीन उपयोग किया था पंचम ने।

दीये जलते हैं, फूल खिलते हैं
बड़ी मुश्किल से मगर, दुनिया में दोस्त मिलते हैं

जब जिस वक़्त किसी का, यार जुदा होता हैं
कुछ ना पूछो यारों दिल का, हाल बुरा होता है
दिल पे यादों के जैसे, तीर चलते हैं....


आनंद बख्शी साहब के गीत एक आम आदमी की भाषा में आपसे मुख़ातिब होते हैं इसलिए जनता जनार्दन में वे इतने लोकप्रिय हुए। उनके प्रशंसक विजय अकेला जी ने उन के गीतों से जुड़ी एक किताब लिखी है मैं शायर बदनाम। पुस्तक में आशा जी बख्शी साहब के बारे में एक रोचक टिप्पणी करती हैं। वे कहती हैं.
"चाहे मजरूह सुल्तानपुरी हों या साहिर लुधियानवी, चाहे शकील बदायूँनी हों या शैलेंद्र इन सबों ने फिल्मी लिखा तो इल्मी भी। पर ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि इन सारे शायरों को इल्मी ज्यादा और फिल्मी कम माना गया। एक ही ऐसे शायर थे आनंद बख़्शी, जिन्हें सिर्फ और सिर्फ फिल्मी माना गया और मज़े की बात ये है कि उन्होंने कभी इल्मी बनने की कोशिश भी नहीं की बल्कि भागते रहे दूर इल्मी बनने से।.."

नमक हराम फिल्म के जिस गीत को सबसे ज्यादा सराहा गया वो था मैं शायर बदनाम। ज़िदगी में कौन ऐसा शख़्स होगा जिसने नाकामी नहीं सही होगी। कभी तो हम इनसे उबर जाते हैं तो कभी बिल्कुल टूट से जाते हैं। शायद यही वज़ह है कि एक असफल शायर का दर्द जब बख़्शी जी के शब्दों में उतरता है तो हमारे दिल का कोई घाव एकदम से हरा हो जाता है। बख़्शी साहब ने तो कमाल लिखा ही पर किशोर दा की आवाज़ और उदासी के साये में डूबती उतराती  पंचम की धुन का उन्हें साथ ना मिला होता तो ये गीत हमारे मन की गहराइयों में इतनी  पैठ नहीं बना पाता।

मैं शायर बदनाम, हो मैं चला, मैं चला
महफ़िल से नाकाम, हो मैं चला, मैं चला
मैं शायर बदनाम

मेरे घर से तुमको, कुछ सामान मिलेगा
दीवाने शायर का, एक दीवान मिलेगा
और इक चीज़ मिलेगी, टूटा खाली जाम
हो मैं चला, मैं चला, मैं शायर बदनाम



वैसे आप क्या सोचते हैं नमक हराम के संगीत के बारे में ?

 

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