Thursday, December 17, 2015

दिल ढूँढता है फिर वही.. जब रसोई में बनी एक सदाबहार धुन ! Dil Dhoondta Hai..

वो कौन होगा जिसे अपने बीते हुए खुशगवार लम्हों में झाँकना अच्छा नहीं लगता? खाली पलों में अपने नजदीकियों से की गई हँसी ठिठोली, गपशप उस लमहे में तो बस यूँ ही गुजारा हुआ वक़्त लगती है। पर आपने देखा होगा की इस बेतहाशा भागती दौड़ती ज़िदगी के बीच कभी कभी  वो पल अनायास से कौंध उठते हैं। मन पुलकता है और फिर टीसता भी है और हम उन्हीं में घुलते हुए खो से जाते हैं। मन की इसी कैफ़ियत के लिए  बस एक ही गीत ज़ेहन में उभरता है  दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...। ग़ालिब के मिसरे पर गुलज़ार ने जो गीत गढ़ा वो ना जाने कितनी पीढियों तक गुनगुनाए जाएगा। अब देखिए ख़ुद गुलज़ार का क्या कहना है इस बारे में
"मिसरा गालिब का और कैफ़ियत अपनी अपनी। दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन। ये फुर्सत रुकी हुई नहीं है। कोई ठहरी हुई जमी हुई चीज़ नहीं। एक जुंबिश है। एक हरकत करती हुई कैफ़ियत"
(दिल की कैफ़ियत - मनोस्थिति,  जुंबिश  -हिलता डुलता हुआ)

गीत के मुखड़े की बात छोड़ भी दें तो इस गीत के हर अंतरे को आपने जरूर कभी ना कभी जिया होगा या मेरी तरह अभी भी जी रहे होंगे। यही वज़ह है कि जाड़ों की नर्म धूप, गर्मियों में तारों से सजा वो आसमान या फिर दूर जंगल के सन्नाटे में बीती वो खामोश रात जैसे गीत में इस्तेमाल किये गए बिंब मुझे इतने अपने से लगते हैं कि क्या कहें?


अपनी बात तो कर ली अब थोड़ी गीत की बात भी कर लें। 1975 में आई फिल्म मौसम के इस गीत की बहुत सारी बाते हैं जो मुझे आपके साथ आज साझा करनी है। पहली तो ये कि इस फिल्म का संगीत पंचम ने नहीं बल्कि मदनमोहन ने दिया था। गुलज़ार को मदनमोहन के साथ सिर्फ दो फिल्में करने का मौका मिला। एक तो कोशिश और दूसरी मौसम। मौसम के संगीत की सफलता को ख़ुद मदनमोहन नहीं देख पाए। 

इस गीत के लिए धुन रचने का काम  कैसे हुआ ये किस्सा भी मज़ेदार है। मदनमोहन पर विश्वनाथ चटर्जी और विश्वास नेरूरकर  की लिखी किताब Madan Mohan: Ultimate Melodies में गुलज़ार ने इस बात का जिक्र किया है..
"मदनमोहन का संगीत रचने का तरीका एकदम अनूठा था। वो हारमोनियम बजाते हुए गीत के बोल गुनगुनाते थे। संगीत रचते हुए जब मूड में होते थे तो सामिष या नॉन वेजीटेरियन भोजन पकाने में लग जाते थे। दिल ढूँढता है......  के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। मैं उनके घर के अंदर बैठा था और मदनमोहन किचन में मटन बना रहे थे और उसके रस के लिए उन्होंने उसमें थोड़ी विहस्की भी मिला दी थी। साथ ही साथ वो इस गीत की धुन भी तैयार कर रहे थे। बीच बीच में वो किचन से बाहर आते और पूछते कि ये धुन कैसी है? मैं उन्हें अपनी राय बताता और वो फिर किचन में चले जाते ये कहकर कि चलो मैं इससे बेहतर कुछ सोचता हूँ।"

कहते हैं कि इस गीत के लिए मदनमोहन जी ने कई अलग अलग धुनें तैयार की और दशकों बाद इसी गीत की एक धुन को फिल्म वीर ज़ारा में यश चोपड़ा ने गीत तेरे लिए हम हैं जिये के लिए इस्तेमाल किया। इस गीत के मुखड़े को लेकर भी काफी बातें चलती रहीं। उसी किताब में गुलज़ार ने ये भी लिखा है कि गीत का मुखड़ा ग़ालिब की ग़ज़ल के हिसाब से जी ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन  था पर मदन मोहन उसे दिल ढूँढता है ..गाते रहे। जब गुलज़ार ने उनसे कहा कि मिसरे के मौलिक रूप से छेड़छाड़ करना सही नहीं तो वो मान भी गए। पर रिकार्डिग के दिन वो अपने साथ ग़ालिब का दीवान ले कर आए और उसमें उन्होंने दिखलाया कि वहाँ  दिल ढूँढता है.. ही लिखा हुआ था।

वैसे मैंने कुछ किताबों में अभी भी जी ढूँढता है.. ही लिखा पाया है। मौसम में इस गीत के दो वर्जन थे एक लता व भुपेंद्र के युगल स्वरों में और दूसरे भूपेंद्र का एकल गीत। जब जब मैं इस गीत की भावनाओं में डूबता हूँ तो मुझे भूपेंद्र का गाया वर्सन और उसके साथ हौले हौले चलती वो धुन ही याद आती है। वैसे इस बारे में आपका ख़्याल क्या है? तो आइए एक बार फिर सुनते हैं इस गीत को..

दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन
बैठे रहे तसव्वुर-ए-जानाँ किये हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...

जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर
आँखों पे खींचकर तेरे आँचल के साए को
औंधे पड़े रहे कभी करवट लिये हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...

या गरमियों की रात जो पुरवाईयाँ चलें
ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागें देर तक
तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...

बर्फ़ीली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर
वादी में गूँजती हुई खामोशियाँ सुनें
आँखों में भीगे भीगे से लम्हे लिये हुए
दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिन...
 

Wednesday, December 09, 2015

जब दाग़ देहलवी ने याद दिलाई चचा ग़ालिब की : दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आये क्यूँ Dil hi to hai... Daagh and Ghalib

मिर्जा ग़ालिब मेरी ज़िंदगी में पहली बार उन पर बने टीवी सीरियल की वज़ह से आए थे। अस्सी का दशक ख़त्म हो रहा था। जगजीत सिंह की आवाज़ के साथ उनकी गाई ग़ज़लों का चस्का लग चुका था। ग़ालिब सीरियल देखने की वज़ह भी जगजीत ही थे। पर गुलज़ार के निर्देशन और नसीरुद्दीन शाह की कमाल की अदाकारी की वज़ह से चचा गालिब भी प्रिय लगने लगे थे। उर्दू जुबान के लफ्जों को समझने का दौर जारी था पर चचाजान की भाषा में इस्तेमाल अरबी फ़ारसी के शब्द सर के ऊपर से गुजरते थे। वो तो गुलज़ार ने उस सीरियल में उनके अपेक्षाकृत सरल शेर इस्तेमाल किए जिसकी वज़ह से ग़ालिब की कही बातों का थोड़ा बहुत हमारे पल्ले भी पड़ा और जितना पड़ा उसी में दिल बाग बाग हो गया। 

तब मैं इंटर में था। पढ़ाई लिखाई तो एक ओर थी पर किशोरावस्था में जैसा होता है एक अदद दोस्त की कमी से बेवज़ह दिल में उदासी के बादल मंडराते रहते थे। ऐसे में जब जगजीत की आवाज़ में हजारों ख़्वाहिशें ऐसी की हर ख़्वाहिश में दम निकले, आह को चाहिए बस उम्र बसर होने तक, दिल ही तो है ना संगो खिश्त सुनते तो मायूस दिल को उस आवाज़ में एक मित्र मिल जाता। सो जैसे ही वो दो कैसटों का एलबम बाजार में आया उसी दिन अपने घर ले आए।

आज उसी में से एक ग़ज़ल का जिक्र कर रहे हैं जिसे पहले पहल ग़ालिब ने लिखा और बाद में दाग़ देहलवी साहब  ने उसी ज़मीन पर एक और ग़ज़ल कही जो गालिब की कृति जैसी कालजयी तो नहीं पर काबिले तारीफ़ जरूर है। 

तो पहले आते हैं चचा की इस ग़ज़ल पर। चचा का जब भी जिक्र होता है तो एक अज़ीम शायर के साथ साथ एक आम से आदमी का चेहरा उभरता है। सारी ज़िदगी उन्होंने मुफ़लिसी में गुजारी। घर का खर्च चलाने के लिए जब तब कर्जे लेते रहे। सात औलादें हुई पर सब की सब ख़ुदा को प्यारी हो गयीं। लेकिन अपनी जिंदगी पर कभी उन्होंने इन तकलीफ़ों को हावी नहीं होने दिया। हँसते मुस्कुराते रहे और जीवन की छोटी छोटी खुशियों को जी भर कर जिया। फिर चाहे वो आम के प्रति उनका लगाव हो या फिर उनकी चुहल से भरी हाज़िर जवाबी। पर उनके भीतर की गहरी उदासी रह रह कर उनकी ग़ज़लों में उभरी और ये ग़ज़ल उसका ही एक उदाहरण है।

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त1 दर्द से भर न आये क्यों
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यों
1. ईंट और पत्थर

दैर2 नहीं, हरम3 नहीं, दर नहीं, आस्तां4 नहीं
बैठे हैं रहगुज़र5 पे हम, ग़ैर हमें उठाये क्यों
2. मंदिर  3. काबा  4. चौखट 5.रास्ता

क़ैद- ए -हयात- ओ -बंद- ए -ग़म6 अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाये क्यों
6. जीवन की क़ैद और गम का बंधन

हाँ वो नहीं ख़ुदापरस्त, जाओ वो बेवफ़ा सही
जिसको हो दीन-ओं-दिल अज़ीज़, उसकी गली में जाये क्यों

"ग़ालिब"-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन-से काम बन्द हैं
रोइए ज़ार-ज़ार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों




आज भी जब गुमसुम होता हूँ तो इस ग़ज़ल को सुनना अच्छा लगता है। अपना ग़म हर मिसरे से छन के आते दर्द के विशाल सागर में मानो विलीन सा हो जाता है। तो सुनिए ये ग़ज़ल जगजीत सिंह और फिर चित्रा जी की आवाज़ों में...



पर आज ये ग़ज़ल याद आई जब मैंने इसी ज़मीन पर कही दाग़ देहलवी की ग़ज़ल पढ़ी। दाग रूमानी शायर थे सो उन्होंने शब्दों का धरातल तो वही रखा पर ग़ज़ल का मिजाज़ बदल दिया। जहाँ गालिब की ग़जल सुन जी भर उठता है वहीं दाग़ की चुहल मन को गुदगुदाती है। अब मतले को ही देखिए। दाग़ कहते हैं

दिल ही तो है ना आए क्यूँ, दम ही तो है ना जाए क्यूँ
हम को ख़ुदा जो सब्र दे तुझ सा हसीं बनाए क्यूँ


यानि ईश्वर ने हमें दिल दिया है तो वो धड़केगा ही और ये जाँ दी है तो जाएगी ही। अगर ख़ुदा ने तुम्हें ये बेपनाह हुस्न बख़्शा है तो मुझे भी ढेर सारा सब्र दिया तुम्हारे इस खूबसूरत दिल तक देर सबेर पहुँचने के लिए। 

गो नहीं बंदगी कुबूल पर तेरा आस्तां तो है
काबा ओ दैर में है क्या, खाक़ कोई उड़ाए क्यूँ


आख़िर तेरी आसमानी चौखट तो हमेशा मेरे सिर पर रहेगी फिर मंदिर और मस्जिद क्यूँ जाए तुझे पूजने? इसी वज़ह से कोई मेरी बेइज़्ज़ती करे क्या ये सही है?

लोग हो या लगाव हो कुछ भी ना हो तो कुछ नहीं
बन के फरिश्ता आदमी बज़्म ए जहान में आए क्यूँ
लोगों से भरी इस दुनिया में अगर इंसान आया है तो वो प्यार के फूल खिलायेगा ही। अगर तुम सोचते हो ऐसा ना हो तो फिर उसे इस संसार में भेजने की जरूरत ही क्या है?

जुर्रत ए शौक़ फिर कहाँ वक़्त ही जब निकल गया
अब तो है ये नदामतें सब्र किया था हाए क्यूँ


शायर को अफ़सोस है कि अपने दिल पर सब्र रखकर उसने वक़्त रहते इश्क़ नहीं किया। अब तो वो ऐसा सोचने से भी कतराते हैं ।

रोने पे वो मेरे हँसे रंज़ में मेरे शाद हो
छेड़ में है कुछ तो मज़ा वर्ना कोई सताए क्यूँ


उन्हें मुझे रोता देख हँसी आती है और तो और मेरी शिकायत से वो खुश हो जाते हैं। पर क्या सच में ऐसा है। उनके छेड़ने से मेरा हृदय भी तो पुलक उठता है नहीं तो वे सताते क्यूँ।

ग़ालिब की ग़ज़ल तो आपने जगजीत व चित्रा जी की आवाज़ में सुन ली दाग़ की ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में सुन लीजिए..

 

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