Thursday, October 06, 2016

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये... घुम भूलेछी Hum Bekhudi mein tumko .. Ghum bhulechhi nijhum

सन 1958 में इक फिल्म आई थी काला पानी। नवकेतन का बैनर था और फिल्म के संगीतकार थे, देव आनंद के दिलअजीज़ सचिन देव बर्मन। बतौर नायक देव आनंद ने इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता था। फिल्म का संगीत भी काफी मशहूर हुआ था। ये वो दौर था जब सचिन दा और लता दी के बीच की अनबन ज़ारी थी। यही वज़ह थी  कि फिल्म में नायिका के सभी गीत आशा जी ने गाए थे। देव आनंद और मधुबाला की मीठी नोंक झोंक से भरा  गीत अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना को तो लोग आज भी याद करते हैं। वहीं नज़र लागी राजा तोरे बँगले पर..होठों पर एक मुस्कुराहट जरूर ले आता है। पर इस फिल्म का सबसे शानदार नग्मा था मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में। याद आया ना आपको हाँ वही हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये


पर जानते हैं इस गीत की धुन सचिन दा ने कब रची थी? फिल्म के रिलीज़ होने के करीब एक साल पहले। दरअसल बंगाल में ये परंपरा रही है कि वहाँ के संगीतकार हर साल दुर्गा पूजा के समय अपनी नई धुनों के साथ एक एलबम जरूर निकालते थे। सन 1957 के दशहरे में रिलीज़  किये गए एलबम के  एक गीत के बोल थे ..घुम भूलेची निझुम इ निशिथे जेगे थाकी और इन्हें लिखा था गौरीप्रसाद मजुमदार ने।सचिन दा ने अपनी इस  संगीतबद्ध रचना को खुद ही आवाज़ दी थी । तो सचिन दा की आवाज़ में इस गीत  को सुनने के पहले क्यूँ ना इस गीत के भावों से आपका परिचय करा दिया जाए?

घुम भूलेछी  निझुम इ निशिथे.. जेगे थाकी
आर आमरी मोतोन, जागे नींदे, दूती पाखी, घुम्म....


पिछले कई दिनों से मैं नींद को भूल सा गया हूँ, रात भर जागता रहता हूँ ठीक उसी तरह जिस तरह प्यार में डूबे ये दो पंक्षी सूने आकाश को ताकते हुए जग रहे हैं।

कोथा दिये चिले, आसिबे गो फीरे
चाँद जाबे दूरे, आकाशरो तीरे
ताय, तोमारे आमि, बारे बारे पीछू डाकी
घुम भूलेची..घुम्म...


तुम कहाँ चले गए लौटने का वादा करके! देखो अब तो चाँद भी खिसकता हुआ आकाश के कोने में जा चुका है और उसके साथ भटकता मेरा मन तुम्हें बार बार पुकार रहा है

ऐके ऐके ओइ डूबे गेलो तारा
तबू तूमी ओगो दिले ना तो शारा
हाय एलेया जेनो, आलो होए, दिलो फांकी
घुम भूलेची..घुम्म...


एक एक कर सारे तारे डूबने लगे हैं और सुबह के धुँधलके में मैं तुम्हें ढूँढ रहा हूँ। रात के इस अंतिम प्रहर में मृगतृष्णा सी तुम्हारी झलक का छलावा रोशनी के आने के बाद टूट चुका है।

  

काला पानी के गीत में सचिन दा ने इसी धुन का इस्तेमाल किया। अपनी किताब सरगमेर निखद में वे कहते हैं "मैंने इस गीत का मुखड़ा ग़ज़ल की तरह और अंतरा गीत की तरह रचा। मैं जैसा चाहता था रफ़ी ने इस गीत को वैसा ही निभाया।"

सच, रफ़ी साहब ने मजरूह सुल्तानपुरी के बोलों पर जिस तरह इस गीत की अदायगी की उसके लिए प्रशंसा के जितने भी शब्द लिखे जाएँ, कम होंगे। नशे में अपना ग़म गलत करते देव आनंद के दिल की करुण पुकार को पर्दे पर रफ़ी ने अपनी आवाज़ से जीवंत कर दिया था। सचिन दा ने बंगाली गीत में शुरुआत सरोद से की थी पर काला पानी में रफ़ी की आवाज़ के साथ नाममात्र का संगीत रखा। सचिन दा के "घुम्म.." के बाद की कलाकारी को रफ़ी आलाप के साथ "हम.." के बाद ले आए। "चले गए" को वो दुबारा जिस तरह गाते हैं तो कलेजा मुँह को आ जाता है। मजरूह का लिखा दूसरे अंतरा मुझे गीत की जान लगता है खासकर तब जब वो कहते हैं डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले...शीशे में आपको भी उतारे चले गये

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये
साग़र में ज़िन्दगी को उतारे चले गये

देखा किये तुम्हें हम, बनके दीवाना
उतरा जो नशा तो, हमने ये जाना
सारे वो ज़िन्दगी के सहारे चले गये
हम बेखुदी में...

तुम तो ना कहो हम, खुद ही से खेलें
डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले
शीशे में आपको भी उतारे चले गये
हम बेखुदी में...

 तो आइए एक बार फिर सुनते हैं रफ़ी साहब के इस गीत को..

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5 comments:

Amita Maurya on October 06, 2016 said...

Love all ur selection of songs

Manish Kumar on October 06, 2016 said...

जानकर खुशी हुई अमिता :)

Mukesh Kumar Giri on October 12, 2016 said...

वाह मनीष जी वाह दिल खुश हो गया।

Manish Kumar on October 12, 2016 said...

शुक्रिया मुकेश !

www.AchhiAdvice .com on October 14, 2016 said...

nice

 

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