Monday, November 14, 2016

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा Arz e niyaz e ishq ... Ghalib

चचा ग़ालिब की शायरी से सबसे पहले गुलज़ार के उन पर बनाए गए धारावाहिक के ज़रिए ही मेरा परिचय हुआ था। हाईस्कूल का वक़्त था वो! किशोरावस्था के उन दिनों में चचा की ग़ज़लें आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक..., हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पर दम निकले...., दिल ही तो है ना संगो ख़िश्त ...और कोई दिन गर जिंदगानी और है ... अक्सर जुबां पर होती थी। जगजीत चित्रा की आवाज़ का जादू तब सिर चढ़कर बोलता था।


पर ग़ालिब की शायरी में उपजी ये उत्सुकता ज़्यादा दिन नहीं रह पाई। जब भी उनका दीवान हाथ लगा उनकी ग़ज़लों को समझने की कोशिश की पर अरबी फ़ारसी के शब्दों के भारी भरकम प्रयोग की वज़ह से वो दिलचस्पी भी जाती रही। मिर्जा के समकालीन साहित्यकार फ़ारसी में ही कविता करने और यहाँ तक की पत्र व्यवहार करने में ही अपना बड़प्पन समझते थे और ख़ुद मिर्जा ग़ालिब का भी ऐसा ही ख़्याल था। पचास की उम्र पार करने के बाद उन्होंने उर्दू में दिलचस्पी लेनी शुरु की। पर शायरी कहने का उनका अंदाज़ भाषा के मामले में पेचीदा ही रहा।

मरने के सालों बाद ग़ालिब को जो लोकप्रियता मिली उसका नतीजा ये हुआ कि अपनी शायरी चमकाने के लिए बहुतेरे कलमकारों ने अपने हल्के फुल्के अशआरों में मक़्ते के तौर पर ग़ालिब का नाम जोड़ दिया। चचा के नाम पर इतने शेर कहे गए कि उन्हें  देखकर उनका अपनी कब्र से निकलने कर जूतमपाज़ी करने  का जी चाहता होगा। इंटरनेट पर ग़ालिब के नाम से इकलौते शेरों को जमा कर दिया जाए तो उसका एक अलग ही दीवान बन जाएगा। ये दीगर बात है कि उसमें से दस से बीस फीसदी शेर चचा के होंगे।

बहरहाल एक बात मैंने गौर की कि चचा ग़ालिब की ग़ज़लों को जब जब गाया गया वो सुनने में बड़ी सुकूनदेह रहीं। उनकी ऐसी ही एक ग़ज़ल मैंने पिछले दिनों सुनी पहले जनाब मेहदी हसन और फिर जगजीत सिंह की आवाज़ों में। अब ये फ़नकार ऐसे हैं कि किसी ग़ज़ल में जान डाल दें और ये ग़ज़ल तो चचा की है।


आपकी सहूलियत के लिए चचा ग़ालिब की इस ग़ज़ल का अनुवाद भी साथ किए दे रहा हूँ।

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे, वो दिल नहीं रहा

हालात ये हैं कि अब ये दिल प्रेम की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के भी लायक नहीं रहा। अब तो इस जिस्म में वो दिल ही नहीं रहा जिस पर कभी गुरूर हुआ करता था।

जाता हूँ दाग़-ए-हसरत-ए-हस्ती लिये हुए
हूँ शमआ़-ए-कुश्ता दरख़ुर-ए-महफ़िल नहीं रहा

कितनी तो ख़्वाहिशें थीं! कहाँ पूरी होनी थीं? जीवन की उन अपूर्ण ख़्वाहिशों का दाग़ मन में लिए रुख़सत ले रहा हूँ  मैं। मैं तो वो बुझा हुआ दीया हूँ जो किसी महफिल की रौनक नहीं बन पाया।

मरने की ऐ दिल और ही तदबीर कर कि मैं
शायाने-दस्त-ओ-बाज़ू-ए-कातिल नहीं रहा

अब तो लगता है कि इस दिल को लुटाने का कुछ और बंदोबस्त करना होगा। अब तो मैं अपने क़ातिल के कंधों और बाहों में क़ैद होकर मृत्यु का आलिंगन कर सकने वाला भी नहीं रहा।

वा कर दिये हैं शौक़ ने बन्द-ए-नक़ाब-ए-हुस्न
ग़ैर अज़ निगाह अब कोई हाइल नहीं रहा

अब कहाँ मेरा हक़ उन पर सो मेरी चाहत ने भी स्वीकार कर लिया है उन पर्दों को खोलना जिनमें उनकी खूबसूरती छिपी थी। अब उन पर गैरों की निगाह पड़ने की रुकावट भी नहीं रही।

गो मैं रहा रहीन-ए-सितम-हाए-रोज़गार
लेकिन तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं रहा

यूँ तो ज़िदगी ही दुनिया के अत्याचारों से पटी रही मगर फिर भी तुम्हारी यादें मेरे दामन  से कभी अलग नहीं हुईं ।

दिल से हवा-ए-किश्त-ए-वफ़ा मिट गया कि वां
हासिल सिवाये हसरत-ए-हासिल नहीं रहा

दिल की ज़ानिब आती वो हवा जो हमारी वफ़ाओं की नाव को किनारे लगाने वाली थी वही  रुक सी गयी जैसे । ठीक वैसे ही जैसे तुम तक पहुँचने की वो हसरत, वो तड़प ना रही बस तुम रह गई ख़यालों में ।

बेदाद-ए-इश्क़ से नहीं डरता मगर 'असद'
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा

प्यार का ग़म झेलने सेे कभी डरा नहीं मैं पर अब तो प्यार करने का वो जिगर ही नहीं रहा जिस पर कभी मुझे नाज़ था।

ग़ालिब की ये ग़ज़ल मायूस करने वाली है। सोचिए तो जिसे हम दिलों जाँ से चाहें और फिर कुछ ऐसा हो कि वो चाहत ही मर जाए तो फिर दिल उस शख़्स के बारे में सोचकर कैसा खाली खाली सा हो जाता है। भावनाएँ मर सी जाती हैं, कुछ ऐसी ही कैफ़ियत , कुछ ऐसे ही अहसास दे जाती है ये ग़ज़ल... इस ग़ज़ल को मेहदी हसन साहब की आवाज़ में सुनने में बड़ा सुकून मिलता है।

 

Friday, November 04, 2016

पहिले पहिल हम कइलीं, छठी मइया व्रत तोहार : शारदा सिन्हा का गाया मधुर छठ गीत Pahele Pahil Hum Kaili

चार दिन चलने वाले छठ पर्व का शुभांरभ हो चुका है और छठ के आगमन के पहले ही छठ मइया के पारम्परिक गीतों से बिहार, झारखंड, नेपाल के तराई और पूर्वी उत्तरप्रदेश के इलाके गुंजायमान हैं। बचपन में पटना में रहते हुए इस पर्व को अपने चारों ओर मनते हुए एक बाहरी दर्शक के तौर पर देखा है। सारे पर्व त्योहारों में मुझे यही एक पर्व ऐसा दिखता है जिसमें आस्था की पवित्रता किसी दिखावे से ज्यादा प्रगाढ़ता से दिखाई देती है।
कामकाजी बहू की भूमिका में Kristine Zedek
छठ के गीत बिहार के सबसे लोकप्रिय लोकगीतों में अपना स्थान रखते हैं। एक ही मूल धुन में गाए जाने वाले आस्था के इन सरल गीतों में एक करुणा है, एक मिठास है, जिससे हर कोई जुड़ता चला जाता है। यूँ तो छठ के गीतों को अनुराधा पोडवाल से लेकर कल्पना पोटवारी और देवी जैसे कलाकारों ने अपनी आवाज़ दी है पर छठ गीतों में जान फूँकने में लोक गायिका व पद्मश्री से सम्मानित शारदा सिन्हा का अभूतपूर्व योगदान है।
शारदा सिन्हा Sharda Sinha
उत्तर बिहार में जन्मी 63 वर्षीय शारदा सिन्हा ने संगीत की आरंभिक शिक्षा रघु झा, सीताराम हरि डांडेकर और पन्ना देवी से ली थी। शारदा जी की आवाज़ में जो ठसक है वो लोक गीतों के सोंधेपन को सहज ही श्रोताओं के करीब ले आती है। बिहार की आंचलिक भाषाओं भोजपुरी, मगही व मैथिली तीनों में उनके कई एलबम बाजार में आते रहे हैं। हिंदी फिल्मों में भी उनकी आवाज़ का इस्तेमाल किया गया है और कई बार ये गीत खासे लोकप्रिय भी रहे हैं। मैंने प्यार किया काकहे तोसे सजना, ये तोहरी सजनियापग पग लिये जाऊँ, तोहरी बलइयाँहम आपके हैं कौन का बाबुल जो तुमने सिखाया, जो तुमसे पाया और हाल फिलहाल में गैंग आफ वासीपुर 2  में तार बिजली से पतले हमारे पिया ने खूब धूम मचाई थी। पर छठ के मौके पर आज मैं आपसे उनके उस छठ गीत की बात करने जा रहा हूँ जो पिछले हफ्ते यू ट्यूब पर रिलीज़ किया गया है और खूब पसंद भी किया जा रहा है।

पर इससे पहले कि इस गीत की बात करूँ इस पर्व की जटिलताओं से आपका परिचय करा दूँ। सूर्य की अराधना में चार दिन चलने वाले इस पर्व की शुरुआत दीपावली के ठीक चार दिन बाद से होती है। पर्व का पहला दिन नहाए खाए कहलाता है यानि इस दिन व्रती नहा धो और पूजा कर चावल और लौकी मिश्रित चना दाल का भोजन करता है। पर्व के दौरान शुद्धता का विशेष ख्याल रखा जाता है। व्रती बाकी लोगों से अलग सोता है। अगली शाम रत रोटी व गुड़ की खीर के भोजन से टूटता है और इसे खरना कहा जाता है। इसे मिट्टी की चूल्हे और आम की लकड़ी में पकाया जाता है। इसके बाद का निर्जला व्रत 36 घंटे का होता है। दीपावली के छठे दिन यानि इस त्योहार के तीसरे दिन डूबते हुए सूरज को अर्घ्य दिया जाता है और फिर अगली सुबह उगते हुए सूर्य को। इस अर्घ्य के बाद ही व्रती अपना व्रत तोड़ पाता है।
छठ के दौरान पूजा की तैयारी 
त्योहार में नारियल, केले के घौद, ईख  का चढ़ावा चढ़ता है, इसलिए छठ के हर गीत में आप इसका जिक्र जरूर पाएँगे। ये व्रत इतना कठिन है कि इसे लगातार कर पाना कामकाजी महिला तो छोड़िए घर में रहने वाली महिला के लिए आसान नहीं है। पर पूरा परिवार घुल मिलकर ये पर्व मनाता है तो व्रतियों में वो शक्ति आ ही जाती है। एकल परिवारों में छठ मनाने की घटती परंपरा को ध्यान में रखते हुए शारदा जी ने एक खूबसूरत गीत रचा है जिसके बोल हैं हृदय मोहन झा के और संगीत है आदित्य देव  का। गीत के बोल कुछ यूँ हैं

पहिले पहिल हम कइलीं , छठी मइया व्रत तोहार
करिह क्षमा छठी मइया, भूल-चूक गलती हमार
गोदी के बलकवा के दीह, छठी मइया ममता-दुलार
पिया के सनेहिया बनइह, मइया
दीह सुख-सार.
नारियल-केरवा घउदवा, साजल नदिया किनार.
सुनिहा अरज छठी मइया, बढ़े कुल-परिवार.
घाट सजेवली मनोहर, मइया तोरा भगती अपार.
लिहिना अरगिया हे मइया, दीहीं आशीष हजार.
पहिले पहिल हम
कइलीं , छठी मइया व्रत तोहार
करिहा क्षमा छठी मइया, भूल-चूक गलती हमार


वैसे तो भोजपुरी हिंदी से काफी मिलती जुलती है पर जो लोग इस भाषा से परिचित नहीं है उन्हें इस गीत के मायने बता देता हूँ

छठी मैया मैं पहली बार आपकी उपासना में व्रत कर रही हूँ। अगर कोई भूल हो जाए तो मुझे माफ कर देना। ये जो मेरी गोद में नन्हा-मुन्हा खेल रहा है, माँ तुम उसे अपनी ममता देना। माँ तुम्हारे आशीर्वाद से पति का मेरे प्रति स्नेह और मेरे जीवन की खुशियाँ बनी रहें। तुम्हारी आराधना के लिए नारियल व केले के घौद को सूप में सुंदरता से सजाकर मैं नदी घाट किनारे आ चुकी हूँ। मेर विनती सुनना मैया और मेरे घर परिवार को फलने फूलने का आशीष देना। (यहाँ छठी मैया से तात्पर्य सूर्य की पत्नी उषा से है।)

वीडियो में एक जगह घर की बहू इस बात को कहती है कि घर में जो छठ मनाने की परंपरा है उसे मैं खत्म नहीं होने दूँगी। अच्छा होता कि पति पत्नी दोनों मिलकर यही बात कहते क्यूँकि छठ एक ऐसा पर्व है जिसे पुरुष भी करते हैं। आख़िर परंपरा तो पूरे परिवार के लिए हैं ना,  तो उसके निर्वहन की जिम्मेवारी भी पूरे परिवार की है।



इस वीडियो में नज़र आए हैं भोजपुरी फिल्मों के नायक क्रांति प्रकाश झा और दक्षिण भारतीय फिल्मों और टीवी पर नज़र आने वाली अभिनेत्री क्रिस्टीन जेडक। संगीतकार आदित्य देव का गीत में बाँसुरी का प्रयोग मन को सोहता है। तो बताइए कैसा लगा आपको ये छठ गीत ?
 

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