Friday, April 28, 2017

विनोद खन्ना : वे पाँच नग्मे जो मुझे उनकी सदा याद दिलाएँगे.. Vinod Khanna 1946 -2017

विनोद खन्ना हमारे बीच नहीं रहे। सोशल मीडिया पर कुछ हफ्ते पहले उनकी बीमारी की हालत में ली गयी तस्वीर उनके चाहने वालों को गहरा धक्का दे गयी थी। लोगों के मन में हमेशा उनके बाँके छबीले नौजवान हीरो की छवि तैरती रही भले ही उन्होंने उम्र  के इस पड़ाव में चरित्र अभिनेता का चोला पहन लिया था। उन पर फिल्माए कुछ गीत हमेशा किसी ना किसी वज़ह से मुझे याद रहे। आज उन्हीं चंद गीतों के माध्यम से उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियाँ ताजा करना चाहता हूँ।



उस वक्त सारी फिल्में मैं अपने परिवार के साथ सिनेमा हॉल में देखा करता था। विनोद खन्ना की फिल्मों की बात करूँ तो बचपन में मैंने  मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथोनी और कुर्बानी देखी थी। यानि तब तक विलेन से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले विनोद देश के चहेते हीरो बन चुके थे।

उस दौर में जब अमिताभ, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, शत्रुघ्न व संजीव कुमार जैसे नायकों का बोलबाला था, आकर्षक कद काठी पर मीठी सी मुस्कुराहट लिए  विनोद बिल्कुल अलग से दिखते थे। मुकद्दर का सिकंदर और अमर अकबर एंथोनी में तो अमिताभ इस क़दर छाए रहे कि विनोद का किरदार मेरी स्मृतियों में स्थायी रूप ना ले सका। पर कुर्बानी में फिरोज खान के साथ उनका रोल खासा लोकप्रिय हुआ। कुबुक कुबुक और तुझपे कुरबाँ मेरी जान से ज्यादा जो गीत लंबे समय तक यादों में शामिल रहा वो था जीनत अमान के साथ विनोद खन्ना पर फिल्माया नग्मा। जिसके बोल कुछ यूँ थे हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे.. अगर आपने इसे सुना भी हो तो मनहर उधास की आवाज़ में इसे फिर सुन लीजिए..


विनोद खन्ना के कैरियर के इस दौर में बहुत सारी  फिल्में हिट हुयीं पर  उनमें ज़्यादातर में एक से ज्यादा हीरो थे। ये वो दौर था जब उन्हें उतनी सही कहानियाँ नहीं मिल पायीं जिसके वो हक़दार थे। फिर भी गुलज़ार ने उन्हें जो  मौके मेरे अपने (1971), अचानक (1973) और मीरा  (1979) में दिए, उसके साथ उन्होंने पूरा न्याय किया। फिल्म मेरे अपने में  किशोर दा का गाया  गीत जिसे विनोद जी ने अभिनीत किया था, बरसों मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज के एकाकी दिनों का साथी रहा

कोई होता जिसको अपना
हम अपना कह लेते यारों
पास नहीं तो दूर भी होता
लेकिन कोई मेरा अपना



अपने कैरियर के चढ़ाव पर ओशो की शरण में संन्यास लेकर विनोद खन्ना ने अपने प्रशंसकों को चौंका दिया था। मेरे पिता भी ओशो से खासे प्रभावित थे और उनकी लगभग हर किताब उनकी अलमारी की शोभा  बढ़ाया करती थी। इसलिए अख़बार में जब भी विनोद के संन्यासी जीवन की ख़बरें आतीं मैं उन्हें चाव से पढ़ता।अमेरिका जाने के पहले उन्होंने गुलज़ार की फिल्म मीरा की थी। गुलज़ार से वो तब कहा करते थे कि मेरा तो मन मीरा का किरदार निभाने को करता है क्यूँकि मैं उसकी भक्ति को अपने भगवान से जोड़ कर देख सकता हूँ। ये उनकी अगाध श्रद्धा का ही परिचायक था कि उन्होंने ओशो के आश्रम में माली से लेकर टॉयलट साफ करने तक के काम किए। वो वापस क्यूँ लौटे ये तो कहना मुश्किल है। क्या गुरु से उनका मोह भंग हुआ या फिर आर्थिक परेशानियाँ इस पर तो अब क़यास ही लगाए जा सकते हैं।

पाँच साल के इस  लंबे इंटरवल के बाद फिर बतौर नायक फिल्मों में आने लगे। 1989 में उन्होंने ॠषि कपूर व श्रीदेवी  के साथ फिल्म चाँदनी में एक प्यारा सा किरदार निभाया और उन पर फिल्माया ये नग्मा बरसों बेवज़ह आँखें नम करता रहा। बारिश की छनछनाहट के बीच सुरेश वाडकर की डूबती आवाज़..मन तब गुम हो जाता था इस गीत में

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है
वही आग सीने में फिर जल पड़ी है




कॉलेज के ज़माने में जितना समय किशोर, जगजीत और गुलज़ार को सुनने में लगाया उतना पढ़ने में भी लगाया हो इस पर विश्वास तो नहीं होता। शायद लगाया भी हो...पढ़ाई तो भूल भी गयी पर जो वक़्त इनके साथ गुजरा वो हमेशा हमेशा के लिए दिल पे नक़्श हो गया।

अपनी दूसरी पारी में गुलज़ार निर्देशित सिर्फ एक फिल्म की वो थी लेकिन। उस दौर के अभिनेताओं में संजीव कुमार मेरी पहली पसंद थे। देखने वाली बात है कि गुलज़ार ने संजीव कुमार के साथ तो काफी काम किया ही, विनोद को भी कम मौके नहीं दिये। विनोद खन्ना में अपने अन्तर्मन को तलाश करने का जो भाव रहा उसे गुलज़ार ने बारहा टटोलने की कोशिश की।  गुलज़ार ने विनोद के अभिनय का वो स्वरूप उभारा जिनसे उनके चाहने वाले अनजान ही रहे हैं। फिल्म लेकिन में ही एक गीत था सुरमयी शाम इस तरह आए साँस लेते हैं जिस तरह साए। सुरेश वाडकर का गाया गीत मेरे लिए क्यूँ खास रहा है उसके बारे में यहाँ मैने लिखा है। गीत का वीडियो यू ट्यूब पर तो है पर शेयर करने के लिए उपलब्ध नहीं है। आज विनोद जी की यादों में इस गीत को  भी  शामिल कीजिएगा।

कोई आहट नहीं बदन की कोई
फिर भी लगता है तू यहीं हैं कहीं
वक़्त जाता सुनाई देता है
तेरा साया दिखाई देता है
जैसे खुशबू नज़र से छू जाए
साँस लेते हैं जिस तरह साए


जगजीत की आवाज़ और गुलज़ार के बोलों के साथ सिनेमा के रुपहले पर्दे पर विनोद खन्ना 2002 में फिल्म लीला में नज़र आए । इस फिल्म के तमाम नग्मे शानदार थे पर कल अचानक उनके चले जाने से उस गीत की ये पंक्तियाँ बार बार मन को गीला कर रही थीं..

जाग के काटी सारी रैना
नैनों में कल ओस गिरी थी

क्या पता था कि उनका हँसता मुस्कुराता चेहरा यूँ अचानक ही दृष्टिपटल से ओझल हो जाएगा।



बिंदास, खुशमिजाज़, दोस्तों की कद्र और हमेशा मदद करने वाले विनोद खन्ना को ये दुनिया एक छैल छबीले हीरो के रूप में हमेशा याद रखेगी। विनोद खन्ना से जुड़ी आपकी भी कुछ व्यक्तिगत यादे हैं तो जरूर बाँटें..

Sunday, April 23, 2017

चाँद फिर निकला, मगर तुम न आए : सचिन दा व मजरूह की जुगलबंदी का कमाल Chand Phir Nikla

1957 में एस डी बर्मन साहब की तीन फिल्में प्रदर्शित हुई थीं। प्यासा, पेइंग गेस्ट और नौ दौ ग्यारह। हिट तो ये तीनों फिल्में रहीं। पर इनमें गुरुदत्त की प्यासा हर लिहाज़ से अलहदा फिल्म थी। फिल्म का संगीत भी उतना ही चला। फिल्म के गीतकार थे साहिर लुधियानवी। अक्सर जब गीतकार संगीतकार मिलकर इस तरह की सफल फिल्में देते हैं तो उनकी जोड़ी और पुख्ता हो जाती है  पर सचिन दा की उसी साल रिलीज़ फिल्मों में साहिर का नाम नदारद था और उनकी जगह ले ली थी मजरूह सुल्तानपुरी ने।

सचिन दा और साहिर की अनबन की पीछे उनके अहम का टकराव था। साहिर को एक बार ओ पी नैयर ने एक फिल्मी पार्टी में ये कहते सुना था कि मैंने ही सचिन दा को बनाया है। ज़ाहिर है साहिर के मन में ये बात रही होगी कि गीतकार के रूप में उनका योगदान संगीतकार से ज्यादा है। ऐसा कहा जाता है कि प्यासा के निर्माण के दौरान वे अपना पारिश्रमिक सचिन दा से एक रुपये ज्यादा रखने पर अड़े रहे। शायद उनके इस रवैये से सचिन दा खुश नहीं थे।

सचिन दा की मजरूह के साथ आत्मीयता थी। इसलिए जब पेइंग गेस्ट में गीतकार को चुनने का वक़्त आया तो उन्होंने मजरूह को बुला लिया। सचिन दा मजरूह को मुजरू कह कर बुलाते थे। चाय, काफी और पान के साथ दोनों की घंटों सिटिंग चलती। सचिन दा धुन रचते और बोलों से धुन का तालमेल बिठाते। कभी कभी तो एक ही गीत के लिए दस या बीस धुनें बनती। ये सिलसिला तब तक चलता जब तक सचिन दा खुद संतुष्ट नहीं हो जाते। अगर कहीं दिक्कत होती तो मुजरू को बोल बदलने को कहते।


पेइंग गेस्ट के लिए सचिन दा ने एक बेहद मधुर धुन  बनाई थी जिस पर मजरूह ने मुखड़ा दिया था चाँद फिर निकला मगर तुम ना आए। विरह की भावना से ओतप्रोत इस गीत में जिस तरह मजरूह ने चाँद जैसे बिम्ब का प्रयोग किया था वो इस गीत को अनुपम बना देता है।

चाँद फिर निकला, मगर तुम न आए
जला फिर मेरा दिल, करुँ क्या मैं हाय
चाँद फिर निकला …


पर मुझे इस गीत की सबसे दिल को छूती पंक्ति वो लगती है जब मजरूह पहले अंतरे में कहते हैं

ये रात कहती है वो दिन गये तेरे
ये जानता है दिल के तुम नहीं मेरे

खड़ी मैं हूँ फिर भी निगाहें बिछाये
मैं क्या करूँ हाय के तुम याद आए
चाँद फिर निकला …


रात के साथ दिन के इस सहज मेल से अच्छे दिन चले जाने का जो भाव पैदा किया मजरूह ने उसका जवाब नहीं।
 
सुलगते सीने से धुँआ सा उठता है
लो अब चले आओ के दम घुटता हैं
जला गये तन को बहारों के साये
मैं क्या करुँ हाय के तुम याद आए
चाँद फिर निकला …


मजरूह अपने साक्षात्कारों में अक्सर कहा करते थे कि सचिन दा को ज्यादा साज़ और साज़िंद पसंद नहीं थे। वे  अक्सर कोशिश करते कि कम से कम वाद्य यंत्रों से काम चलाया जाए। शंकर जयकिशन से उलट आर्केस्ट्रा के प्रयोग से वो दूर रहना पसंद करते थे। सचिन दा का मानना था कि गाने पर अगर ज्यादा  जेवर चढ़ेगा तो गाना तो फिर दिखेगा ही नहीं। प्रील्यूड व इंटरल्यूड्स को छोड़ दें तो इस गीत में लता की आवाज़ के साथ घटम के आलावा कोई ध्वनि नहीं आती। पर मजरूह के बोल और सचिन दा की मेलोडी इतनी जबरदस्त थी कि वहाँ  संगीत का आभाव ज़रा भी नहीं खटकता। यही वजह है कि ये गीत छः दशकों बाद भी हम सबके दिलों पर अपनी गिरफ्त बनाए हुए है।

फिल्म में देव आनंद की प्रतीक्षा करती नूतन के गीत को भावों को अपनी भाव भंगिमा से जोड़ा है कि लता की आवाज़ का दर्द पर्दे पर भी बखूबी उभर आता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को..

Friday, April 14, 2017

बता मेरे यार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया Bata Mere Yaar Sudama Re...

पिछले कुछ वर्षों में हरियाणा अक्सर गलत कारणों से ज्यादा में चर्चा में रहा है। भ्रूण हत्या की बात हो  या  खाप पंचायत के अमानवीय फैसले, जाटों का मनमाना उपद्रव या जगतविदित हरियाणवी अक्खड़पन ये सभी मुद्दे ही मीडिया में सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं। । पर विगत कुछ महीनों से इस राज्य के कुछ सकरात्मक पहलू भी हमारे सामने आए हैं जिनकी वजह से यहाँ की छवि को एक नई रौशनी में देख कर पूरा देश प्रभावित हुआ है। इसका पहला श्रेय तो यहाँ के पहलवानों, खासकर महिला पहलवानों को जाता है जिन्होंने ना केवल ओलंपिक, एशियाई व कॉमनवेल्थ खेलों में पदक जीत कर देश का नाम रोशन किया बल्कि अपनी इस सफलता से बॉलीवुड के निर्माता निर्देशकों को हरियाणवी ग्रामीण संस्कृति के प्रति आकृष्ट किया।

नतीजा ये हुआ कि वही बोली जो हमें थोड़ी रूखी लगती थी उसमें हमें गाँव का सोंधापन आने लगा। हरियाणवी जुमले हमारी जुबां पर चढ़ गए। हाल ही में आई फिल्म दंगल इस भाषा और परिवेश को हमारे और करीब ले आई। ये सब हो ही रहा था कि कुछ स्कूली छात्राओं द्वारा गाया एक हरियाणवी भजन यू ट्यूब पर इस क़दर लोकप्रिय हुआ कि कुछ हफ्तों में वो पूरे देश में करोड़ लोगों द्वारा देखा और सराहा गया।


कृष्ण सुदामा की मित्रता की कहानियाँ तो हम बचपन से पढ़ते आए हैं। पर रोहतक के खिल्लौड़ गाँव से ताल्लुक रखने वाली विधि ने कृष्ण सुदामा  संवाद के उन किस्सों को फिर से पुनर्जीवित कर दिया है।  मुख्य गायिका विधि  भजन के इस रूप में सामने आने की कहानी अपने एक साक्षात्कार में बड़े भोलेपन से कुछ यूँ बयाँ करती हैं
"मेरी मम्मी को गाणा पसंद था। वो जाती थी सत्संग में गाणे। तो फिर मम्मी ने मुझे सिखाया। फिर मैंने अपने म्यूजिक टीचर को बताया तो सर को भी अच्छा लगा। हमने स्कूल में गाया तो सबको अच्छा लगा।  सर ने कहा इसको नया म्यूजिक देते हैं। फिर सर ने तैयार करा के इसे यू ट्यूब पर डलवा दिया और ये प्रसिद्ध हो गया। ये जितनी भी मेहनत है हमारे सर की है। उनके सामने हमारी मेहनत तो कुछ भी नहीं है।"

सोमेश जांगड़ा
सही मायने में विधि की आवाज़ को हम तक पहुँचाने में संगीत शिक्षक सोमेश जांगड़ा का सबसे बड़ा हाथ है। सोमेश कहते हैं कि विधि की आवाज़ में जो टोन है वो बिल्कुल लोकगायिकी के अनुरूप है। जब इस गीत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का विचार उनके मन में आया तो उन्होंने दो हफ्तों में इसे फिर से संगीतबद्ध किया। दो दिन में इस भजन की डबिंग हुई। बाकी समय कोरस और गायिकी को अलग रिकार्ड कर मिक्स करने में लगा। एक बार जब यू ट्यूब में ये अपलोड हुआ तो लोग इतने प्रभावित हुए कि हरियाणा के कार्यक्रमों में इन बच्चियों को बुलाया जाने लगा। अलग अलग जगहों पर लाइव परफारमेंस के दौरान वीडियो रिकार्डिग हुई जो इंटरनेट पर साझा होती चली गयी।

 सोमेश का मानना है कि इस भजन के इतने सराहे जाने की तीन वज़हें हैं। पहली तो ये भजन, जिसकी शब्द रचना बिल्कुल एक लोक गीत जैसी है। दूसरे विधि जिसकी आवाज़ में लोक गायिका की सभी खूबियाँ मौज़ूद हैं और तीसरी बात इसका संगीत जिसमें हारमोनियम के साथ लोक वाद्यों का ऐसा समावेश किया गया है जो हरियाणवी मिट्टी में रचा बसा सा लगता है। ये तीनों मिलकर मन में ऐसा सुकून जगाते हैं कि मन कृष्ण द्वारा बालसखा सुदामा के साथ दिखाए अपनत्व से श्रद्धा से भर उठता है।


बता मेरे यार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

बालक था रे जब आया करता, रोज खेल के जाया करता
हुई कै तकरार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

मन्ने सुना दे कुटुंब कहाणी, क्यों कर पड़ गयी ठोकर खानी
टोटे की मार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

सब बच्चों का हाल सुना दे, मिसराणी  की बात बता दे
रे क्यूँ गया हार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

चाहिए था रे तन्ने पहलम आना, इतना दुःख नहीं पड़ता ठाणा
क्यों भूला प्यार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

इब भी आगया ठीक बखत पे, आज बैठ जा म्रेरे तखत पै
जिगरी यार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

आजा भगत छाती पे लाल्यूँ, , इब बता तन्ने कड़े  बिठा लूँ
करूँ साहूकार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया
 (घणे दिनों : बहुत दिनों में, टोटा : गरीबी, बखत :वक़्त,  ठाणा :उठाना,  कड़े : किधर ,छाती पे लाल्यूँ  :छाती से लगा लूँ , इब  :अब, )

इस भजन की अपार सफलता से दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हो गयीं।  भारतीय संगीत से पश्चिमी संगीत के सम्मिश्रण यानि फ्यूजन के इस दौर में भी हमारी देशी संस्कृति में इतना कुछ है कि जिसे अगर ढंग से परोसा जाए तो देश के संगीतप्रेमी उसे सर आँखों पर बिठाते हैं। दूसरी बात ये कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में हुनर हर जगह बिखरा है। जरूरत है तो इक सहारे की और एक माध्यम की। सफलता की ऐसी कहानियाँ इंटरनेट जैसे सशक्त माध्यम से आगे भी दोहराई जाएँगी मुझे इसका पूरा भरोसा है।

Tuesday, April 04, 2017

हर ज़ुल्म तेरा याद है, भूला तो नहीं हूँ Har Zulm

कुछ महीने पहले WhatsApp और फेसबुक पर एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें ज़मीन पर बैठा एक शख़्स गा रहा था। उसके कपड़े पर चूने के छींटे थे और पीछे उसका साथी दीवारों की पुताई में व्यस्त था। पर दो मिनट के वीडियो में उसकी सधी हुई गायिकी ने मुझे ऍसा प्रभावित किया कि कुछ दिनों तक तो ये ग़ज़ल होठों से चिपकी ही रही। 

इंटरनेट पर तो ये तुरंत ही पता चल गया कि ये ग़जल सज्जाद अली की गायी है। वही सज्जाद अली जिनकी आवाज़ की ओर मेरा ध्यान बोल फिल्म के गीत दिन परेशां है, रात भारी है से गया था। सज्जाद ने पहली बार इस ग़ज़ल को अपने एलबम कोई तो बात हो....  में पन्द्रह वर्ष पहले 2002 में शामिल किया था।  चार साल पहले जब इसका वीडियो यू ट्यूब पर रिलीज़ हुआ लोगों ने इसे काफी पसंद किया। सज्जाद के बारे में पहले भी यहाँ काफी कुछ लिख चुका हूँ। संगीत में दशकों से सक्रिय रहते हुए पचास वर्षीय सज्जाद फिलहाल दुबई में रहते हैं और इक्का दुक्का ही सही अपने सिंगल्स रिलीज़ करते रहते हैं।

पर जैसा मैंने शुरुआत में कहा कि इस ग़ज़ल से मेरी मुलाकात उस शख़्स ने करवायी जो पाकिस्तान में पेंटर बाबा के नाम से अपनी गायिकी के लिए जाना जाता है पर उनका वास्तविक नाम है ज़मील अहमद। सज्जाद ने जब अपनी गायी इस ग़ज़ल को ज़मील की आवाज़ में सुना तो वो भी ज़मील के हुनर की दाद दिए बिना नहीं रह सके। वैसे ज़मील ने इस अचानक मिली लोकप्रियता के बाद ग़ुलाम अली की ग़ज़ल चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला को भी अपनी आवाज़ दी है।

सज्जाद अली व आफ़ताब मुज़्तर
वैसे क्या आपको पता है कि इस ग़ज़ल को किसने लिखा? इसे लिखा है आफ़ताब मुज़्तर ने जो कराची से ताल्लुक रखते हैं और लेखक व शायर होने के साथ साथ एक रिसर्व स्कॉलर भी हैं। आफ़ताब साहब की इस ग़ज़ल में यूँ तो आठ अशआर थे पर सज्जाद ने गाने के लिए इनमें से चार को चुना। अपनी इस ग़ज़ल के बारे में आफ़ताब कहते हैं कि इस ग़ज़ल का वो शेर साहिल पे खड़े हो..  उनके उस्ताद ख़ालिद देहलवी को बेहद पसंद था और जब भी वे उनके पास जाते उस्ताद इस शेर की फर्माइश जरूर करते। तो आइए इस ग़ज़ल को सुनाने से पहले रूबरू कराते  हैं आपको इसके सारे अशआरों से..

हर ज़ुल्म तेरा याद है, भूला तो नहीं हूँ
ऐ वादा फ़रामोश मैं तुझ सा तो नहीं हूँ


ऐ वक़्त मिटाना मुझे आसान नहीं है
इंसान हूँ कोई नक़्श-ए-कफ़-ए-पा तो नहीं हूँ

तुम्हारा ढाया हर सितम मुझे याद है पर क्या करूँ मैं तुम्हारे जैसा तो हूँ नहीं जो अपने हर वादे से मुकर जाए। ऐ वक़्त मुझे उन पदचिन्हों की तरह ना समझो जिस पर चल कर तुम उसका निशां मिटा दो।

चुपचाप सही मसलेहतन वक़्त के हाथो,
मजबूर सही, वक़्त से हारा तो नहीं हूँ


उनके लिए लड़ जाऊँगा तक़दीर मैं तुझ से
हालांकि कभी तुझसे मैं उलझा तो नहीं हूँ

आज मैं सब कुछ जानते हुए किसी प्रयोजन से चुप हूँ।  मेरी इस मजबूरी, इस चुप्पी का ये मतलब मत लगा लेना कि मैंने तुम्हारे  सामने अपने घुटने टेक दिए हैं। यूँ तो भाग्य ने जिस ओर चलाया उसी ओर चलता रहा हूँ। पर जब बात उनकी हो तो फिर अपनी तक़दीर से  दो दो हाथ करने में मुझे परहेज़ नहीं।
ये दिन तो उनके तग़ाफ़ुल ने दिखाए
मैं गर्दिश ए दौरां तेरा मारा तो नहीं हूँ


साहिल पे खड़े हो तुम्हें क्या ग़म, चले जाना
मैं डूब रहा हूँ, अभी डूबा तो नहीं हूँ


मुझे तो बेहाली कभी छू भी नही सकी थी, ये दौर तो अब तेरी बेरुखी की वज़ह से आया है। तेरे ग़म में आज बदहवास सा मैं डूब रहा हूँ। और तुम हो कि बस बस यूँ ही दूर खड़े किनारे से देख भर रहे हो। जाओ, बस संतोष कर लो इस बात का कि मैं अभी तक डूबा नहीं हूँ।

क्यूँ शोर बरपा है ज़रा देखो तो निकल कर
मैं उसकी गली से अभी गुजरा तो नहीं हूँ

मुज़्तर मुझे क्यूँ देखता रहता है ज़माना
दीवाना सही उनका तमाशा तो नहीं हूँ


लो अभी मैं उसकी गली तक पहुँचा भी नहीं और पहले से ही छींटाकशी शुरु हो गयी। आख़िर ज़माना मुझ पर ही क्यूँ बातें बनाता है? मैंने कोई तमाशा तो नहीं सिर्फ प्यार ही तो किया है।

यूँ तो सज्जाद ने इस ग़ज़ल में गिटार का खूबसूरती से उपयोग किया है पर इस ग़ज़ल के बोलों में जो दर्द और इसकी धुन में जो मिठास है वो बिना किसी संगीत के ही दिल में बस जाने का माद्दा रखती है। तो आइए सुनते हैं इसे सज्जाद अली की आवाज़ में।

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

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