Tuesday, January 31, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 15 : आख़िर कैसे बना "तेरे संग यारा..." ? Tere Sang Yara

वार्षिक संगीतमाला की पन्द्रहवी पायदान पर गाना वो जो पिछले साल इतना लोकप्रिय हुआ कि अब तक इंटरनेट पर नौ करोड़ बार सुना जा चुका है। ज़ाहिर है आप ने भी इसे कई बार सुना होगा। पर क्या आप जानते हैं कि ये गाना अपने इस स्वरूप में कैसे आया यानि इस गीत के पीछे की कहानी क्या है? 

पर ये कहानी जानने के पहले ये तो जान लीजिए कि इस गीत को संगीतबद्ध किया अर्को प्रावो मुखर्जी ने और बोल लिखे एक बार फिर से मनोज मुन्तशिर ने। अर्को पहली बार 2014 में अल्लाह वारियाँ और दिलदारा जैसे गीतों की वज़ह से वार्षिक संगीतमाला का हिस्सा बने थे। तभी मैंने आपको बताया था कि अर्को शैक्षिक योग्यता के हिसाब से एक डॉक्टर हैं पर संगीत के प्रति उनका प्रेम उन्हें सिटी आफ जॉय यानि कोलकाता से मुंबई की मायानगरी में खींच लाया है। मैंने तब भी लिखा था कि अर्कों की धुनें कमाल की होती हैं पर ख़ुद अपने गीत लिखने का मोह उनकी कमज़ोर हिंदी की वज़ह से वो प्रभाव नहीं छोड़ पाता। पर इस गीत में मनोज मुन्तशिर के साथ ने उनकी उस कमी को दूर कर दिया है।



अर्को ने ये धुन और मुखड़ा भी पहले से बना रखा था और जी म्यूजिक के अनुराग बेदी ने उसे सुना था। जब फिल्म के सारे गीत लिखने की जिम्मेदारी मनोज मुन्तशिर को मिली तो उनसे अनुराग ने कहा कि मुझे  एक ऐसा गीत चाहिए जो फिल्म के लिए एक इंजन का काम करे यानि जो तुरंत ही हिट हो जाए और अर्को के पास ऐसी ही एक धुन है। 

अब एक छोटी सी दिक्कत ये थी कि अर्को ने उस गीत में विरह का बीज बोया हुआ था जबकि फिल्म में गीत द्वारा रुस्तम की प्रेम कहानी को आगे बढ़ाना था। तब गीत के शुरुआती बोल कुछ यूँ थे तेरे बिन यारा बेरंग बहारा है रात बेगानी ना नींद गवारा। मनोज ने इस मुखड़े में खुशी का रंग कुछ यूँ भरा तेरे संग यारा, खुशरंग बहारा..तू रात दीवानी, मैं ज़र्द सितारा। एक बार मुखड़ा बना तो अर्को के साथ मिलकर पूरा गीत बनाने में ज्यादा समय नहीं लगा।

अर्को  व मनोज मुन्तशिर

गीत तो बन गया पर मनोज इस बात के लिए सशंकित थे कि शायद फिल्म के निर्माता निर्देशक ज़र्द जैसे शब्द के लिए राजी ना हों क्यूँकि सामान्य सोच यही होती है कि गीत में कठिन शब्दों का प्रयोग ना हो। पर अर्को अड़ गए कि नहीं मुझे इस शब्द के बिना गीत ही नहीं बनाना है। गीत बनने के बाद जब निर्माता नीरज पांडे के सामने प्रस्तुत हुआ तो अर्को ने कहा कि आप लोगों को और कुछ बदलना है तो बदल लीजिए पर  ज़र्द सितारे से छेड़छाड़ मत कीजिए।  ऐसा कुछ हुआ नहीं और नीरज को मुखड़ा और गीत दोनों पसंद आ गए।

बहरहाल इससे ये तो पता चलता है कि फिल्म इंडस्ट्री में अच्छी भाषा और नए शब्दों के प्रयोग के प्रति कितनी हिचकिचाहट है। वैसे मनोज मुन्तशिर ने जिस परिपेक्ष्य में इस शब्द का प्रयोग किया वो मुझे उतना नहीं जँचा। ज़र्द का शाब्दिक अर्थ होता है पीला और सामान्य बोलचाल में इस शब्द का प्रयोग नकारात्मक भावना में ही होता है। जैसे भय से चेहरा ज़र्द पड़ जाना यानि पीला पड़ जाना। पर अगर आप गीत में देखें तो मनोज प्रेमी युगल के लिए दीवानी रात व पीले तारे जैसे बिंब का प्रयोग कर रहे हैं। मनोज की सोच शायद पीले चमकते तारे की रही होगी जो मेरी समझ से ज़र्द के लिए उपयुक्त नहीं लगती। बेहतर तो भाषाविद ही बताएँगे।

इस गीत को गाया है आतिफ़ असलम ने। आतिफ की सशक्त आवाज़, पियानो के इर्द गिर्द अन्य वाद्यों का बेहतरीन संगीत संयोजन इस गीत की जान है। इंटरल्यूड्स की विविधताएँ भी शब्दों के साथ मन को रूमानी मूड में बहा ले जाती हैं। मेरी इस गीत की सबसे प्रिय पंक्ति गीत के अंत में आती है, जी हाँ ठीक समझे आप मैं बहता मुसाफ़िर. तू ठहरा किनारा




तेरे संग यारा, खुशरंग बहारा
तू रात दीवानी, मैं ज़र्द सितारा

ओ करम खुदाया है, तुझे मुझसे मिलाया है
तुझपे मरके ही तो, मुझे जीना आया है

ओ तेरे संग यारा.....ज़र्द सितारा
ओ तेरे संग यारा ख़ुश रंग बहारा
मैं तेरा हो जाऊँ जो तू कर दे इशारा

कहीं किसी भी गली में जाऊँ मैं, तेरी खुशबू से टकराऊँ मैं
हर रात जो आता है मुझे, वो ख्वाब तू..
तेरा मेरा मिलना दस्तूर है, तेरे होने से मुझमें नूर है
मैं हूँ सूना सा इक आसमान, महताब तू..
ओ करम खुदाया है, तुझे मैंने जो पाया है
तुझपे मरके ही तो, मुझे जीना आया है

ओ तेरे संग यारा ...मैं ज़र्द सितारा
ओ तेरे संग यारा ख़ुश रंग बहारा
तेरे बिन अब तो ना जीना गवारा

मैंने छोड़े हैं बाकी सारे रास्ते, बस आया हूँ तेरे पास रे
मेरी आँखों में तेरा नाम है, पहचान ले..
सब कुछ मेरे लिए तेरे बाद है, सौ बातों की इक बात है
मैं न जाऊँगा कभी तुझे छोड़ के, ये जान ले
ओ करम खुदाया है, तेरा प्यार जो पाया है
तुझपे मरके ही तो, मुझे जीना आया है

ओ तेरे संग यारा.....ज़र्द सितारा
ओ तेरे संग यारा, ख़ुश रंग बहारा
मैं बहता मुसाफ़िर. तू ठहरा किनारा





वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक

Saturday, January 28, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 16 : तुझमें खोया रहूँ मैं, मुझ में खोयी रहे तू ..ख़ुद को ढूँढ लेंगे फिर कभी Phir Kabhie

MS Dhoni The untold story का संगीत पिछले साल के कुछ लोकप्रिय एलबमों में रहा। फिल्म के संगीतकार अमाल मलिक के लिए ये एक बड़ी उपलब्धि रही क्यूँकि ये उनका बतौर संगीतकार पहला एकल एलबम था। वैसे अगर अमाल मलिक से आप अब तक परिचित नहीं हैं तो ये बता दूँ कि वे संगीतकार सरदार मलिक के पोते, अनु मलिक के भतीजे, व डबू मलिक के पुत्र हैं। अब जिस घर में संगीत संयोजन से जुड़े इतने महारथी एक साथ हों तो उस घर के तो उस घर के चिराग संगीतं दक्ष तो होंगे ही। 

अमाल पियानो पर तो सिद्धस्थ हैं ही, साथ ही उन्होंने पश्चिमी शास्त्रीय संगीत की विधिवत पढ़ाई भी की है। 2014 में जय हो के गीत से अपनी बॉलीवुड की पारी शुरु करने वाले अमाल ने इस साल MS Dhoni The untold story के गीतों के आलावा  अज़हर में बोल दो ना ज़रातू ही ना जाने, सरबजीत में सलामत और सनम रे में ग़ज़ब का ये दिन जैसे मधुर गीत दिए जिस श्रोताओं ने खूब सराहा।


जहाँ तक धोनी के गीतों की बात है मुझे फिर कभी और बेसब्रियाँ सबसे ज्यादा अच्छे लगे जबकि इस फिल्म का गीत कौन तुझे आम जनता में सबसे ज्यादा सुना गया। बहरहाल अमाल को इस फिल्म के गीतों को बनाने के लिए धोनी की जीवन यात्रा को आत्मसात करना पड़ा। इस प्रक्रिया में उन्हें डेढ़ साल का वक़्त लगा। इस दौरान सत्ताइस धुनें निर्देशक नीरज पांडे के समक्ष रखी गयीं जिनमें छः को अंत में चुना गया। सूरज डूबा, मैं हूँ  हीरो और नैना जैसे चंद गीतों से जाने जाने वाले अरमान के लिए कहानी के साथ गीतों को रचना एक बड़ी चुनौती था जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक संपादित किया।

धोनी के गीतों को सुनते समय फिर कभी के बोल और संगीत और अरिजीत की गायिकी पहली बार सुनते ही मेरे दिमाग में चढ़ से गए थे और यही वज़ह है कि ये गीत वार्षिक संगीतमाला में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा है।

गीत के बोल रचने में अमाल मलिक का  साथ दिया मनोज मुन्तशिर ने। गीत का पहला मजबूत पक्ष है इस गीत की गिटार पर आधारित कर्णप्रिय शुरुआती धुन जो पहले बीस सेकेंड्स में ही आपको एक अच्छे मूड में ले आती है और फिर तो मनोज के शब्द प्यार में डूबे हुए दिल के जज़्बातों की कहानी सहज शब्दों में व्यक्त कर देते हैं। प्रेम  में एक दूसरे के व्यक्तित्व के नए पहलुओं को परखते और सराहते कभी कभी हम ख़ुद को भूल से जाते हैं। इसी बात को मनोज गीत के मुखड़े में यूँ व्यक्त करते हैं

ये लम्हा जो ठहरा है, मेरा है या तेरा है
ये लम्हा मैं जी लूँ ज़रा

तुझमें खोया रहूँ मैं, मुझ में खोयी रहे तू
ख़ुद को ढूँढ लेंगे फिर कभी
तुझसे मिलता रहूँ मैं, मुझसे मिलती रहे तू
ख़ुद से हम मिलेंगे फिर कभी
हाँ फिर कभी

क्यूँ बेवजह गुनगुनाएँ, क्यूँ बेवजह मुस्कुराएँ
पलकें चमकने लगी है, अब ख़्वाब कैसे छुपायें
बहकी सी बातें कर लें, हँस हँस के आँखें भर लें
ये बेहोशियाँ फिर कहाँ..
तुझमें खोया रहूँ मैं...हाँ फिर कभी

दिल पे तरस आ रहा है, पागल कहीं हो ना जाएँ
वो भी मैं सुनने लगा हूँ, जो तुम कभी कह ना पाए
ये सुबह फिर आएगी, ये शामें फिर आएँगी
ये नजदीकियाँ फिर कहाँ...
तुझमें खोया रहूँ मैं...हाँ फिर कभी

वहीं मनोज का ये कहना पलकें चमकने लगी है, अब ख़्वाब कैसे छुपायें अंतरों की सबसे बेहतर पंक्तियों में लगता है। अंतरे में अमाल का संगीत संयोजन प्रीतम की याद दिलाता है और ये स्वाभाविक भी हैं क्यूँकि अमाल प्रीतम के तीन वर्षों तक सहायक रह चुके हैं। अरिजीत ने  यहाँ भले  कुछ नया कुछ नहीं किया हो पर  हमेशा की तरह उनकी गायिकी सधी हुई है । गीत का फिल्मांकन सुशांत सिंह राजपूत के साथ दिशा पटानी पर हुआ। दिशा अपने हाव भावों और खूबसूरती से गाने के प्रभाव को बढ़ाती नज़र आती हैं।



वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक

Thursday, January 26, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान संख्या 17 : पल्लवी जोशी जब पहुँची माइक के पीछे Chand Roz Meri Jaan...

आपको याद होगा कि कुछ साल पहले फिल्म हैदर में विशाल भारद्वाज ने फ़ैज़ की ग़ज़ल गुलो में रंग भरे का इस्तेमाल किया था और वो भी अरिजीत सिंह की आवाज़ में। इस साल फिर फ़ैज वार्षिक संगीतमाला का हिस्सा बने हैं एक नज़्म के साथ जिसे आवाज़ दी है एक अभिनेत्री ने।हिंदी फिल्मों में अभिनेत्रियों द्वारा गायिकी की कमान सँभालने के दृष्टांत हमेशा से रहे हैं और आजकल तो प्रियंका चोपड़ा, आलिया भट्ट व श्रद्धा कपूर ने इस प्रवृति को और गति प्रदान की है। पुराने ज़माने में भी सुरैया, गीता दत्त और सुलक्षणा पंडित ने नायिका व गायिका के रूप में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। उमा देवी यानि टुनटुन ने हास्य अभिनय के साथ कुछ बेहद मशहूर नग्मे गाए। बाद में शबाना आज़मी की आवाज़ में कुछ गीत रिकार्ड हुए। इसी सिलसिले में एक नया नाम जुड़ा है पल्लवी जोशी का।


जो लोग पल्लवी जोशी के फिल्म जगत के आरंभिक दिनों से परिचित ना हों उन्हें बताना चाहूँगा कि हिंदी फिल्मों में सत्तर और अस्सी के शुरुआती सालों में सिनेमा के रूपहले पर्दे पर वो बतौर बाल कलाकार नज़र आयीं। अस्सी के उत्तरार्ध और नब्बे के दशक में हिंदी फिल्मों में भी वो यदा कदा दिखती रहीं। कला फिल्मों और बाद में टीवी धारावाहिकों में अपने जानदार अभिनय से वो एक जाना पहचाना चेहरा बन गयीं। फिर उन्हें गुनगुनाते हुए अनु कपूर के साथ मैंने जी टीवी के लोकप्रिय कार्यक्रम अंत्याक्षरी में देखा गया। तभी पता चला कि उन्होंने अभिनय के साथ शास्त्रीय संगीत भी सीखा हुआ है।

पिछले साल मई महीने में विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित एक फिल्म प्रदर्शित हुई Buddha in a Traffic Jam जो कि सामाजिक एवम् राजनीतिक ख़ामियों की ओर इशारा करती एक फिल्म थी। सामाजिक प्रताड़ना चाहे वो जबरन नैतिक आचार संहिता थोपने के रूप में हो या कट्टरवाद कै तौर पर उसका प्रतिरोध जरूरी है। यही इस फिल्म का संदेश था और इसके लिए विवेक एक गीत की तलाश में थे। स्वाभाविक रूप से उनकी खोज फ़ैज़ की इस नज़्म पर आकर समाप्त हुई। आख़िर फ़ैज की शायरी अपने ज़माने में सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का स्वर बन कर उभरी थी और आज भी लोगों को प्रेरणा देती रही है। ये नज़्म भी फ़ैज़ ने तब लिखी थी जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली खाँ की सरकार के तख्तापलट करने की साजिश रचने के जुर्म में उन्हें जेल भेज दिया गया था।


पल्लवी बताती हैं कि उनके पति व निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने उनसे कहा कि इस नज़्म के लिए उन्हें एक कच्ची या अपरिष्कृत आवाज़ की जरूरत है जो वो बखूबी पूरा कर सकती हैं। पल्लवी ने संगीत की तालीम जरूर ली थी पर कभी इस तरह गाने का ख़्याल उनके मन में नहीं आया था। पर विवेक के ज़ोर देने से वो मान गयीं और उन्हें इसे निभाने में कोई दिक्कत भी नहीं हुई। उनके लिए ये सुखद अनुभव रहा। ये अलग बात है कि घर का मामला होने की वज़ह से उन्हें इस नज़्म को गाने के लिए पैसे नहीं मिले।

इस गीत को संगीतबद्ध किया रोहित शर्मा  ने। वैसे जहाँ शब्द महत्त्वपूर्ण हो और फ़ैज़ जैसे शायर के लिखे हों वहाँ वाद्य यंत्रों की गुंजाइश कम ही रह जाती है और इसीलिए पूरी नज़्म में आपको पल्लवी की आवाज़ के साथ मात्र हारमोनियम ही बजता सुनाई देगा। तो आइए सुनते हैं पल्लवी जोशी की आवाज़ में ये संवेदनशील नज़्म

चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने
पे मजबूर हैं हम
इक ज़रा और सितम सह लें तड़प लें रो लें
अपने अजदाद  की मीरास है माज़ूर हैं हम

जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरे हैं 
फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं

और अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिये जाते हैं
ज़िन्दगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है
जिसमें  
हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं

बस कुछ ही दिनों की बात है मेरे हमदम सिर्फ कुछ दिनों की। अभी तो ये जुल्म ओ सितम सहना होगा। क्या करें अपने बाप दादा की इस धरोहर में हम फिलहाल लाचार हैं। शरीर तो क़ैद कर ही लिया इन्होंने और अब मन की भावनाओ को जकड़ना चाहते हैं। यहाँ तो सोचने, चिंतन करने और यहाँ तक कि बातचीत पर भी पाबंदी है। फिर भी मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी है भले ही ये ज़िंदगी के उस गरीब की फटी पुरानी पोशाक बन गयी है जिस पर जब तब दर्द के पैबंद लगते रहते हैं।  
 
लेकिन अब ज़ुल्म की मीयाद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं

अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
हम को रहना है पर यूँ ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों का बेनाम गराँ-बार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है



ये तेरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार

चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़ 

पर इस जुल्म की मीयाद लंबी नहीं। न्याय मिलने का दिन दूर नहीं। अत्याचार से झुलसे दुनिया के इस मैदान में हम इन हालातों में और नहीं रह सकते। आज इन पराए लोगों द्वारा मन को बोझिल कर देने वाला सितम हमेशा तो नहीं सहना है। तेरी सु्ंदरता में लिपटे इन ग़मों की धूल,  दिल की अनुत्तरित तड़प, जिस्म की भोली जरूरतें, चाँदनी रातों का उमड़ता दर्द  इन्हें इंतज़ार करना होगा। कुछ दिन और, सिर्फ कुछ दिन और!

यूँ तो पल्लवी जोशी ने पूरी नज़्म ही रिकार्ड की है पर फिल्म में गीत के वीडियो में नज़्म का एक हिस्सा कटा हुआ है।


वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक

Monday, January 23, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #18 : ले चला दिल कहाँ, दिल कहाँ... ले चला Le Chala

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर गाना वो जिसकी मधुरता पिछले कुछ हफ्तों में मुझे उसे लगातार सुनने को मजबूर करती रही है। हाल ही में कच्छ की यात्रा पर निकला तो वहाँ खान पान के साथ चल रहे Live Music के दौरान मैंने इस गीत की फर्माइश की और बड़ा आनंद आया जब गायक ने इसका मुखड़ा और एक अंतरा सुनाकर मेरी वो फर्माइश पूरी की। रूमानी गीतों से मुझे हमेशा प्रेम रहा है। पर यहाँ तो प्रेम में रससिक्त शब्दों के साथ गायक की आवाज़ में जो सुकून है और संगीत में जो ठहराव, वो तो दिल ही ले जाता है।



आइए वार्षिक संगीतमाला में स्वागत करें संगीतकार जीत गांगुली व गीतकार मनोज मुन्तसिर के साथ उभरते हुए उत्तराखंडी गायक जुबिन नौटियाल का। दरअसल पिछले साल जब मैंने जुबीन का बजरंगी भाईजान में गाया नग्मा  कुछ तो बता ज़िंदगी अपना पता ज़िंदगी सुना था तो मुझे ये भ्रम हो गया था कि कहीं ये जुबिन असम वाले तो नहीं हैं।

जुबिन नौटियाल
27 वर्षीय जुबिन की पैदाइश देहरादून में हुई। उनके पिता को गाने का शौक था। ये शौक जब उन तक पहुँचा तो उन्होंने संगीत को अपने स्कूल में एक विषय की तरह ले लिया। स्कूल के बाद उन्होंने अपनी गुरु वंदना श्रीवास्तव जी से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली।  बनारस में कुछ वक़्त उन्होंने छन्नूलाल मिश्रा जी के साथ भी बिताया तो चेन्नई में रहकर पाश्चात्य संगीत पर अपनी पकड़ मजबूत की। बॉलीवुड में पिछले पाँच सालों से सक्रिय जुबिन की आवाज़ को बजरंगी भाईजान के आलावा दि शौकीन्स के गीत मेहरबानी से भी सांगीतिक हलकों में पहचाना जाने लगा। इस साल फिल्म One Night Stand के इस गीत के आलावा फितूर के लिए सुनिधि चौहान के साथ उनका गाया युगल गीत तेरे लिए भी चर्चा का केंद्र रहा।

अमिताभ भट्टाचार्य की तरह ये साल अमेठी से ताल्लुक रखने वाले गीतकार मनोज मुन्तशिर के लिए भी बेहद अच्छा रहा है और क्यूँ ना रहे उनके शब्द प्यार में डूबे बेसब्र बेचैन दिलों की जुबान जो रहे हैं। आप ही देखिए ज़रा मनोज ने कितना प्यारा मुखड़ा रचा है इस गीत का

छू गयीं उँगलियाँ जाने किस ख़्वाब से
आज क्यूँ नींद से उठ गयीं ख्वाहिशें
ये ख़लिश है नयी ये जुनूँ है नया
ले चला... दिल कहाँ..., दिल कहाँ... ले चला..


सचमुच उनके शब्द हमें कुछ क्षणों के लिए ही सही प्रेम की वादियों में भटकने के लिए प्रेरित जरूर कर देते हैं। कभी प्रीतम दा के सहयोगी रहे जीत गाँगुली पियानो के नोट्स से गीत की शुरुआत करते हैं और यही मधुर धुन पहले इंटरल्यूड् में फिर प्रकट होती है। जीत का संगीत संयोजन कभी गायिकी और लफ़्जों से आपको दूर नहीं जाने देता। जुबिन की आवाज़ में इस गीत को सुनना हवा में तैरना जैसा है।  जीवन में कभी आपको किसी से प्रेम हुआ हो ना तो ये फिर इस गीत को गुनगुनाते हुए अपने प्रिय को याद कर लीजिए। एकदम से मूड हल्का ना हो जाए तो कहिएगा..

बस अभी तो मिले, और चले दो क़दम
कैसे फिर आ गए हाँ इस क़दर पास हम
सच है ये या वहम, क्या ख़बर, क्या पता
ले चला... दिल कहाँ..., दिल कहाँ... ले चला..

यूँ लहर की तरह, ज़िन्दगी बह गयी
खो गया मैं कहीं, सिर्फ तू रह गयी
क्या यही है सफ़र जिस्म से रुह का
ले चला... दिल कहाँ..., दिल कहाँ... ले चला..


वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक

Friday, January 20, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #19 : हक़ है मुझे जलने का...हक़ है मुझे जीने का Haq Hai

वार्षिक संगीतमाला 2016 में साल के पच्चीस शानदार गीतों की श्रंखला में अगली पेशकश से जुड़ी हैं ऐसी दो शख़्सियत जिन्होंने पिछले साल अपने गीत और संगीत से आम और खास सबका दिल जीता है। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य और संगीतकार एवम गायक  क्लिंटन सेरेजो की । अगर आप वर्षों से इस संगीतमाला के साथ हैं तो बतौर गीतकार अमिताभ के लिखे कई गीतों से रूबरू हो चुकेंगे। पर बतौर संगीतकार क्लिंटन सेरेजो का वार्षिक संगीतमालाओं में ये पहला कदम है।


साथ  ही ये बता दूँ कि इस साल के प्रथम दस गीतों में क्लिंटन के संगीतबद्ध दो नग्मे हैं। क्लिंटन सेरेजो वैसे तो एक दशक में भी ज्यादा से बॉलीवुड में सक्रिय रहे हैं, पर गायक के रूप में बीड़ी, यारम या सूरज की बाहों में जैसे गीतों को छोड़ दें तो मुझे याद नहीं आता उनकी आवाज़ ने ज्यादा लोकप्रियता हासिल की हो। पर गायिकी के आलावा जबसे उन्होंने संगीत संयोजन, निर्माण और वादन में भी अपना दखल बढ़ाया है, उनकी प्रतिभा के नए रंग श्रोताओं तक पहुँचे हैं।

मुंबई के पोद्दार कॉलेज के छात्र रहे क्लिंटन के मध्यम वर्गीय परिवार का संगीत से दूर दूर तक कोई नाता नहीं था। पिता एक निजी कंपनी में इंजीनियर थे तो माँ फ्रेंच भाषा की प्रोफेसर। बाकी भाई बहन भी पढ़ाई लिखाई में अव्वल रहे।  ऐसे हालातों में में संगीत के प्रति रुचि जागृत करना और बाद में क्लिंटन का उसे अपनी जीविका का ज़रिया  बना लेना उनके परिवार  के लिए  किसी अजूबे से कम नहीं था। 

क्लिंटन सेरेजो व अमिताभ भट्टाचार्य
क्लिंटन के संगीतबद्ध TE3N के जिस गीत की बात मैं आपसे आज करने जा रहा हूँ उसमें एक गहरा दुख है पर साथ में एक उम्मीद भी। ये गीत एक ऐसे शख़्स की कहानी कहता है जो बुरी तरह टूट चुका है और जीवन में  लाचारियों के दौर से गुजरा रहा  है...  जिसकी ज़िंदगी की  खुशियों से दूर दूर तक का नाता नहीं है पर फ़िर  भी उम्मीद के एक कतरे की रोशनी उसे  जिलाए हुए है।

अमिताभ भट्टाचार्य ने कमाल के बोल रचे हैं फिल्म के किरदार की इन मनोभावनाओं को व्यक्त करने के लिए। रौशनी की इक बूँद पर जिंदा रहने की बात हो या हौसले की कुछ तीलियों को पकडे रहने की, उनके बिंब गीत की उदासी में भी आशा की ज्योत जला देते हैं। क्लिंटन का संगीत संयोजन गीत के उदास मूड को आत्मसात करता हुआ बोलों के पीछे मंद मंद बहता है। प्रील्यूड हो या इंटरल्यूड पियानो, गिटार और हल्के ताल वाद्यों के माध्यम से क्लिंटन गीत का माहौल रचते हैं । हक़ है तक पहुँचते पहुँचते वे द्रुत लय और कोरस का बेहतरीन प्रयोग करते हैं। संगीत संयोजन और गायन के आलावा गीत में जो मजीरा बजता है वो क्लिंटन ने ख़ुद बजाया है।




घोर अँधेरा, कहता रहा, हार जा
एक सितारा माना नहीं, ना डरा
रौशनी की इक बूँद पे, जिंदा रहा वो, जिंदा रहा वो
ज़िन्दगी की कुछ डोरियों को जकड़े हुए, कहता रहा
हक़ है मुझे जलने का
हक़ है मुझे जीने का
हक़ है मेरा अम्बर पे, ले के रहूँगा हक़ मेरा
ले के रहूँगा हक़ मेरा, करता हूँ वादा

मेरे लहू का क़तरा अभी गर्म है, एक अधूरा मेरा अभी कर्म है
दिन महीने हर साल की गिनता रहा वो, गिनता रहा वो
हौसले की कुछ तीलियों को पकड़े हुए, कहता रहा
हक़़ है मुझे जलने का.....

मैं जानता हूँ मुझे आख़िर एक ना एक दिन, मरना है
पर जब तलक भी जीऊँ वो जीना कैसा, तय करना है
मिटटी की काया में लोहे का है इरादा
हक़ है मुझे जलने का.....

वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक

Monday, January 16, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 20 :जब गुलज़ार ने देखा साहिबा को इक नदी के रूप में.. Ek Naadi Thi

वार्षिक संगीतमाला 2016 के सफ़र को तय करते हुए हम आ पहुँचे हैं संगीतमाला के प्रथम बीस गीतों की तरफ़ और बीसवीं पायदान पर गाना वो जिसे लिखा है गुलज़ार ने, संगीतबद्ध किया शंकर अहसान लॉय ने और अपनी आवाज़ दी हे नूरा बहनों के साथ के. मोहन ने। 

साढ़े तीन मिनट के इस गाने में सच पूछिए तो गुलज़ार ने एक भरी पूरी कहानी छुपा रखी है जिसे आप तब तक नहीं समझ सकते जब तक आपकी मुलाकात साहिबा से ना करा दी जाए। पंजाब की तीन मशहूर प्रेम कहानियों में हीर रांझा, सोहनी महीवाल के बाद मिर्जा साहिबा की जोड़ी का नाम आता है। इसी मिर्जा साहिबा की प्रेम कहानी से प्रेरित होकर राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने मिर्जया बनाई। मिर्जा साहिबा की कहानी बहुत लंबी है पर उसके अंतिम प्रसंग का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा क्यूँकि उसका सीधा संबंध इस गीत से है।


साहिबा के परिवार वालों के यहाँ से मिर्ज़ा उसकी शादी के दिन भगाकर बहुत दूर ले जाता है। जब  सफर की थकान से चूर हो कर मिर्ज़ा रास्ते में विश्राम करते हुए सो जाता है तो साहिबा उसके तरकश के तीर तोड़ देती है। उसे लगता है कि भाई उसकी हालत को देख उन दोनों पर दया करेंगे और अगर ये तीर रहने दिए तो यहाँ व्यर्थ का खून खराबा होगा। पर ऐसा कुछ होता नहीं है। साहिबा के भाई वहाँ पहुँचते ही मिर्जा पर आक्रमण कर देते हैं और जैसे ही वो अपने धनुष की ओर हाथ बढ़ाता है टूटे तीरों को देखकर साहिबा को अचरज से देखता है। तीरों की बौछार अब साहिबा अपने ऊपर लेती है और दोनों ही मारे जाते हैं।

फिल्म बनाने के दौरान राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने पटकथा लेखक गुलज़ार से यही सवाल किया था कि आख़िर साहिबा ने वो तीर क्यूँ तोड़े ? गुलज़ार ने स्क्रिप्ट के लिए उस समय मन में जो खाका खींचा उसी ने बाद में गीत की शक़्ल ले ली। क्या करती साहिबा ? एक साथ दो नावों में सवार जो थी एक ओर मिर्जा क प्यार तो दूसरी ओर घर परिवार का मोह। गुलज़ार की कल्पना ने साहिबा को एक नदी का रूप दे दिया और उन्होंने साहिबा के बारे  में लिखा
क नदी थी दोनो किनारे
थाम के बहती थी
इक नदी थी...
इक नदी थी कोई किनारा छोड़ ना सकती थी
इक नदी थी ..

तोड़ती तो सैलाब आ जाता
तोड़ती तो सैलाब आ जाता
करवट ले तो सारी ज़मीन बह जाती
इक नदी थी..
इक नदी थी दोनो किनारे
थाम के बहती थी
इक नदी थी दोनो किनारे
थाम के बहती थी, इक नदी थी....

आज़ाद थी जब झरने की तरह
झरने की तरह..
आज़ाद थी जब झरने की तरह
झरने की तरह.., झरने की तरह.. झरने की तरह..

एम्म.. आज़ाद थी जब झरने की तरह
चट्टानो पे बहती थी
इक नदी थी.. इक नदी थी..
इक नदी थी दोनो किनारे
थाम के बहती थी, इक नदी थी...

हाँ . दिल इक ज़ालिम
हाकिम था वो
उसकी ज़ंजीरों में रहती थी
इक नदी थी..

इक नदी थी दोनो किनारे...इक नदी थी...




शंकर अहसान लॉय ने इस गीत में नाममात्र का संगीत संयोजन रखा है। चुटकियों, तालियों के बीच गिटार की टुनटुनाहट के आलावा कोई वाद्य यंत्र बजता नज़र नहीं आता। बजे भी क्यूँ? नूरा बहनों और मोहन की बुलंद आवाज़ के बीच पूरे गीत में चतुराई से प्रयुक्त कोरस (जिसमें शंकर महादेवन ने ख़ुद भी योगदान दिया है।) उसकी जरूरत ही महसूस नहीं होने देता। गुलज़ार के शब्द दिल को छूते हैं क्यूँकि हम सभी साहिबा की तरह कभी ना कभी जीवन में दो समानांतर धाराओं के बीच अपनी भावनाओं को घिरा पाते हैं। ना किसी के पास जा पाते हैं ना किसी को छोड़ सकते हैं। इनसे सामंजस्य बिठाना दिल के लिए बड़ा तकलीफ़देह होता है। ये गीत सुनते हुए साहिबा की मजबूरी और दिल की पीड़ा बड़ी अपनी सी लगने लगती है। शायद आपको भी लगे...

ये वादियाँ दूधिया कोहरे की इनमें सदियाँ बहती हैं
मरता नहीं ये इश्क ओ मिर्ज़ा सदियों साहिबा रहती हैं….

वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक

Sunday, January 15, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #21 : तेरे बिना जी ना लगे..जब एक राजनीतिज्ञ ने थामी गीत की डोर Tere Bina Jee Na Lage...

शोरगुल इस फिल्म का नाम आपने सुना क्या? सुनें भी तो कैसे? अपने लचर निर्देशन की वज़ह से देश के अधिकतर भागों में ये फिल्म पहले हफ्ते से ज्यादा का सफ़र तय नहीं कर पाई थी। पर वार्षिक संगीतमाला की इक्कीसवीं सीढ़ी पर जो गीत खड़ा है वो  इसी फिल्म का है । 



वैसे इस गीत से जुड़ी दो बातें आपको चौंकने पर मजबूर कर देंगी। पहली तो इसके गीतकार का नाम और दूसरी इसके संगीतकार द्वारा बजाया जाने वाला एक अनूठा वाद्य यंत्र। इस गीत को रचा है कपिल सिब्बल ने। जी आपने ठीक सुना वही सिब्बल साहब जो कांग्रेस सरकार में केन्द्रीय मंत्री का पद सँभाल रहे थे। एक धुरंधर वकील और राजनीतिज्ञ से ऐसे रूमानी गीत के लिखे जाने की कल्पना कम से कम मैंने तो नहीं की थी। कपिल साहब को कविताएँ लिखने का भी शौक़ है और जब उन्हें इस फिल्म के गीतों को लिखने का अवसर मिला तो उन्होंने खुशी खुशी हामी भर दी।

नीलाद्रि कुमार
इस गीत को रचने के लिए कपिल सिब्बल ने मशहूर सितार वादक नीलाद्रि कुमार जो इस फिल्म के संगीतकार भी हैं और कपिल के चहेते वादक भी के साथ नौ महीने का वक़्त लिया। नीलाद्रि कुमार संगीत की दुनिया में उभरता हुआ नाम हैं और अपने द्वारा विकसित किए गए वाद्य यंत्र जिटार के लिए वे काफी चर्चा में रहे थे। आप सोच रहे होंगे कि आख़िर ये जिटार क्या बला है? दरअसल जिटार एक इलेक्ट्रिक सितार है। जिटार को विकसित करने में नीलाद्रि की सोच के पीछे दो कारण थे। पहले तो सितार के प्रति विश्व के संगीतज्ञों का ध्यान आकर्षित करना और दूसरे ताल वाद्यों के शोर में से सितार की ध्वनि को मुखरित करना । नीलाद्रि कहते हैं कि जिटार का एक अपना मुकाम है और इसे सितार और गिटार का संकर नहीं मानना चाहिए।

नीलाद्रि ने इस गीत में पियानो की धुन के बीच उभरते कोरस के साथ गीत की शुरुआत की है।  यूँ तो जिटार गीत के पार्श्व में जब तब अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहता है पर गीत में डेढ़ मिनट के बाद इसकी आवाज़ आप स्पष्टता से सुन सकते हैं। ज़िंदगी में बहुत सारे लोग ऐसे होते हैं जो आपके आस पास तो नहीं रहते पर जिनसे दिल का नाता बरसों का रहता है। कपिल ऐसे ही एक किरदार के दिल की बेचैनी को गीत में व्यक्त करते हैं।  प्रेम और विरह की बातें बड़े सहज शब्दों में कहते इस गीत को अरिजीत सिंह अपनी गायिकी के शास्त्रीय अंदाज़ से खास बना देते हैं।

तेरे बिना जी ना लगे , तेरे बिना जी ना लगे

नज़रों में भी तू ही दिखे, तुम ना मिले रातों जगे
ख़ामोशी में सब कह गए हैं, जहां मिल गया, जब तुम मिले
आगे बढ़े सब जान के, तेरे लिए हम जी रहे

है याद मुझे तेरी हर अदा, तेरी बातों में नशा ही नशा
खयालों में मैं तेरे खो गया, रहूँ न रहूँ तेरा हो गया
साथी बना साया ही रहा, दूरी में भी करीब ही रहा
मिलने पे भी जी ना भरा, तुम ना रहे सब खो गया
तेरे बिना जी ना लगे , तेरे बिना जी ना लगे


हाँ चलते चलते इस गीत से जुड़े कुछ और रोचक तथ्य। गीत के कोरस में समाज के वंचित वर्गों के बच्चों को प्रशिक्षित कर उनकी आवाज़ का इस्तेमाल किया गया है। पानी के अंदर गीत के एक बड़े हिस्से को फिल्माया गया है तुर्की की मशहूर मॉडल और इस फिल्म की नायिका सूहा पर !

Saturday, January 07, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #22 : टुक टुक टुक टुक करती चलती, मीठी थारी ज़िंदगी Tuk Tuk

संगीतकार विशाल शेखर के लिए साल 2015 कोई बहुत अच्छा नहीं रहा था। पर इस साल फिल्म सुल्तान के लिए दिया गया उनका संगीत औसत से बेहतर था। प्रेम की बाती में भींगा राहत फतेह अली खाँ का गाया जग घूमेया, सुखविंदर का जोश दिलाता सुल्तान का  शीर्षक गीत और नूरा बहनों की आवाज़ में ज़िदगी की टुक टुक से रूबरू कराता नग्मा मुझे इस एलबम के कुछ खास नगीने लगे थे ।  पर इन गीतों में 22वीं पॉयदान पर अपनी जगह बनाने में कामयाब हुआ है नूरा बहनों का गाया ये नग्मा। नूरा बहनों के  सांगीतिक सफ़र के बारे में यहाँ  पहले भी लिख चुका हूँ। 
 


दो साल पहले पटाखा गुड्डी से अपना पहला पटाखा फोड़ने वाली जालंधर की नूरा बहनें ने इस साल तीन नामी फिल्मों मिर्जया, दंगल और सुल्तान में अपनी दमदार आवाज़ श्रोताओं तक पहुंचाई है। नूरा बहनों का बिंदास अंदाज़ मुझे हाइवे में उनके गाए गीत में इतना फबा था कि उसने सीधे साल के दस बेहतरीन गीतों में जगह बना ली थी। इस बार भी नूरा बहनों के गाए दो गीत इस संगीतमाला में हैं।

विशाल शेखर को संगीत में नए नए प्रयोग करने में हमेशा आनंद आता रहा है। हालांकि मुझे विशाल की हर गीत में घुसायी जाने वाली रॉक  रिदम उतनी पसंद नहीं आती पर संगीत संयोजन में उनके नित नए प्रयोग कई बार मेलोडी से भरपूर होते हैं। टुक टुक के संगीत संयोजन के लिए विशाल शेखर अलग से नहीं बैठे। मीका के गाने चार सौ चालीस वोल्ट के संगीत को अंतिम रूप देने के पहले अचानक ही शेखर को टुक टुक की आरंभिक धुन सूझी और फिर  कुछ घंटों में ही इस  गीत ने अपनी शक्ल ले ली ।

गीत का आरंभिक संगीत संयोजन जहाँ मन में मस्ती का मूड ले आता है वहीं गायिकाओं का हो.. सजके दिखाएगी....  हो.. हँस के बुलाएगी कहना बड़ा प्यारा लगता है। अलग से सुनते वक़्त  विशाल का रैप खाने में कंकड़ की तरह लगता है पर फिल्म देखते समय लगा कि वो पश्चिमी रंग में रँगे हुए एक शहरी किरदार के लिए शायद गीत की जरूरत बन गया हो। फिल्म में ये गीत पार्श्व से आता है जब दर्शकों को निर्देशक हरियाणा के कस्बों देहातों से मिलवा रहे होते हैं।

इरशाद कामिल
इरशाद कामिल के लिए पंजाब हरियाणा की भूमि एक 'होम टर्फ' की तरह है जिसकी जुबान, ठसक, लोक रंग सबसे वो भली भांति परिचित हैं। इसलिए उनके बोल ज़मीन से जुड़े हुए दिखते हैं। हाल ही में उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि आप अपनी जड़ों से कटकर आसमान नहीं छू सकते। कम से कम कामिल में आसमान छूने की काबिलियत पूरी तरह से है। ज़िदगी के फलसफ़े के बारे में इरशाद क़ामिल ने सहजता के साथ कितनी प्यारी पंक्तियाँ रची हैं। ज़रा गौर फरमाइए ओ पारे जैसी चंचल है, रेशम है या मलमल है...या फिर गहरी दलदल है, ज़िंदगी या रा रा रा…दिन दिन घटती जाती है, फसल ये कटती जाती है..नज़र से हटती जाती है, ज़िंदगी या रा रा रा… 


दूरी दर्द, मिलन है मस्ती, दुनिया मुझको देख के हँसती
इश्क़ मेरा बदनाम हो गया, करके तेरी हुस्न परस्ती

कोई जोगी, कोई कलंदर, रहता है अपणे में
कोई भुला हुआ सिकंदर, रहता है अपणे में

हो.. सजके दिखाएगी. हो.. हँस के बुलाएगी
हो.. रज्ज के नचाएगी, टुक टुक टुक करती चलती
थारी म्हारी ज़िंदगी, रे बोले, रे बोले ढोला ढोल धड़क धिन, धड़क धिन, धड़क धिन
रे टुक टुक टुक टुक करती चलती, मीठी थारी ज़िंदगी
रे बोले, रे बोले ढोला ढोल धड़क धिन, धड़क धिन, धड़क धिन

अपनी मर्ज़ी से बणती बिगड़ती, बणती बिगड़ती
धुआँ नही, आग नही फिर भी है जलती
ओये होये, ओये होये, ओये होये, ओये…

ओ पारे जैसी चंचल है, रेशम है या मलमल है
या फिर गहरी दलदल है, ज़िंदगी या रा रा रा…
दिन दिन घटती जाती है, फसल ये कटती जाती है
नज़र से हटती जाती है, ज़िंदगी या रा रा रा…

दिल समझे नही पतंदर, रहता है अपने में
बस बनता फिरे धुरंधर रहता है अपने में
हो.. सजके दिखाएगी. हो.. हँस के बुलाएगी...धड़क धिन

तो ज़िदगी का ये गीत आप भी गुनगुनाइए मेरे साथ..

Wednesday, January 04, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 23 : पत्ता पत्ता जानता है, इक तू ही ना जाने हाल मेरा Tu Hi Na Jaane..

पिछले साल हमारा फिल्म उद्योग क्रिकेटरों पर बड़ा मेहरबान रहा। एक नहीं बल्कि दो दो फिल्में बनी हमारे भूतपूर्व क्रिकेट कप्तानों पर। हाँ भई अब तो अज़हर के साथ हमारे धोनी भी तो भूतपूर्व ही हो गए। बॉलीवुड ने इन खिलाड़ियों की जीवनियाँ तो पेश की हीं साथ ही साथ इनके व्यक्तित्व को भी बेहद रोमांटिक बना दिया। 

अब हिंदी फिल्मों में जहाँ रोमांस होगा तो वहाँ ढेर सारे गाने भी होंगे। सो इन दोनों फिल्मों के नग्मे  रूमानियत से भरपूर रहे। ऐसा ही एक गीत विराजमान है वार्षिक संगीतमाला की 23 वीं सीढ़ी पर फिल्म अज़हर से। पूरे एलबम के  लिहाज़ से अज़हर फिल्म का संगीत  काफी मधुर रहा। अमल मलिक का संगीतबद्ध और अरमान मलिक का गाया गीत बोल दो तो ना ज़रा मैं किसी से कहूँगा नहीं और अतिथि संगीतकार प्रीतम की मनोज यादव द्वारा लिखी रचना इतनी सी बात है मुझे तुमसे प्यार है खूब सुने और सराहे  गए।


मुझे भी ये दोनों गीत अच्छे लगे पर सोनू निगम की आवाज़ में अमल मलिक की उदास करती धुन दिल से एक तार सा जोड़ गई। काश इस गीत को थोड़े और अच्छे शब्दों और गायिका का साथ मिला होता तो इससे आपकी मुलाकात कुछ सीढ़ियाँ ऊपर होती। सोनू निगम की आवाज़ इस साल भूले भटके ही सुनाई दी। इस गीत के आलावा फिल्म वज़ीर के गीत  तेरे बिन में वो श्रेया के साथ सुरों का जादू बिखेरते रहे। समझ नहीं आता उनकी आवाज़ का इस्तेमाल संगीतकार और क्यों नहीं करते  ?

सदियों पहले मीर तक़ी मीर ने एक बेहतरीन ग़ज़ल कही थी जिसका मतला था पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, जाने ना जाने गुल ही ना जाने बाग़ तो सारा जाने है। इस मतले का गीत के मुखड़े के रूप में मज़रूह सुल्तानपूरी ने आज से करीब 35 वर्ष पूर्व फिल्म एक नज़र में प्रयोग  किया था। लता और रफ़ी की आवाज़ में वो गीत  बड़ा मशहूर हुआ था। 

गीतकार कुमार की प्रेरणा भी वही ग़ज़ल रही और सोनू ने क्या निभाया इसे। जब वो पत्ता पत्ता जानता है, इक तू ही ना जाने हाल मेरा तक पहुँचते हैं दिल में मायूसी के बादल और घने हो जाते हैं। सोनू अपनी आवाज़ से उस प्रेमी की बेबसी को उभार लाते हैं जो अपने प्रिय के स्नेह की आस में छटपटा रहा है, बेचैन है।

अमल मालिक और सोनू निगम
रही बात प्रकृति कक्कड़ की तो अपना अंतरा तो उन्होंने ठीक ही गाया है पर मुखड़े के बाद की पंक्ति में इक तेरे पीछे माही का उनका उच्चारण बिल्कुल स्पष्ट नहीं है। इस गीत को सुनते हुए अमल मलिक के बेहतरीन संगीत संयोजन  पर ध्यान दीजिए। गिटार और बाँसुरी के प्रील्यूड के साथ गीत शुरु होता है। इटरल्यूड्स में रॉक बीट्स के साथ बजता गिटार और फिर पंजाबी बोलों के बाद सारंगी (2.10) का बेहतरीन इस्तेमाल मन को सोहता है। अंतिम अंतरे के पहले गिटार, बाँसुरी और अन्य वाद्यों का मिश्रित टुकड़ा (3.30-3.45) को सुनकर भी आनंद आ जाता  है।

समंदर से ज्यादा मेरी आँखों में आँसू
जाने ये ख़ुदा भी है ऐसा क्यूँ

तुझको ही आये ना ख़्याल मेरा
पत्ता पत्ता जानता है
इक तू ही ना जाने हाल मेरा
पत्ता पत्ता जानता है
इक तू ही ना जाने हाल मेरा

नित दिन नित दिन रोइयाँ मैं, सोंह रब दी ना सोइयाँ मैं
इक तेरे पीछे माही, सावन दियां रुतां खोइयाँ मैं

दिल ने धडकनों को ही तोड़ दिया,
टूटा हुआ सीने में छोड़ दिया
हो दिल ने धडकनों को ही तोड़ दिया
टूटा हुआ सीने में छोड़ दिया

खुशियाँ ले गया, दर्द  कितने दे गया
ये प्यार तेरा..पत्ता पत्ता ...

मेरे हिस्से आई तेरी परछाईयां
लिखी थी लकीरों में तनहाइयाँ
हाँ मेरे हिस्से आई तेरी परछाईयां
लिखी थी लकीरों में तनहाइयाँ

हाँ करूँ तुझे याद मैं
है तेरे बाद इंतज़ार तेरा..., पत्ता पत्ता ...

Tuesday, January 03, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 24 : माया ठगनी नाच नचावे Maya Thagni Nach Nachave

वार्षिक संगीतमाला की साल के बेहतरीन पच्चीस गीतों की अगली कड़ी में है फिल्म जय गंगाजल का गीत। संगीतकार सलीम सुलेमान और गीतकार मनोज मुन्तशिर तो हिंदी फिल्म संगीत में किसी परिचय के मुहताज नहीं पर इस गीत के यहाँ होने का सेहरा बँधता है इस गीत के गायक प्रवेश मलिक के सिर। खासकर इसलिए भी कि ये गीत हिंदी फिल्मों में गाया उनका पहला गीत है।

प्रकाश झा की फिल्में हमेशा से हमारे आस पास के समाज से जुड़ी होती हैं। समाज की अच्छाइयों बुराइयों का यथार्थ चित्रण करने का हुनर उनकी फिल्मों में दिखता रहा है। पर अगर फिल्म के गीत भी समाज का आइना दिखलाएँ तो उसका आनंद ही कुछ अलग होता है। वार्षिक संगीतमाला की 24 वीं पॉयदान के गीत का चरित्र भी कुछ ऐसा ही है। समाज के तौर तरीकों पर व्यंग्य के तीर कसते गीत कम ही सही पर पिछले सालों में भी बने हैं और एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं का हिस्सा रहे हैं। मूँछ मुड़ानी हो तो पतली गली आना...... , पैर अनाड़ी ढूँढे कुल्हाड़ी....., सत्ता की ये भूख विकट आदि है ना अंत है...... जैसे गीत इसी कोटि के थे।


इस फिल्म का संगीत रचते समय सलीम सुलेमान को निर्देशक प्रकाश झा से एक विशेष चुनौती मिली। चुनौती ये थी कि फिल्म के नाटकीय दृश्यों पर अमूमन  दिये जाने वाले  पार्श्व संगीत के बदले उसे चित्रित करता हुआ गीत लिखा जाएगा। माया ठगनी भी इसी प्रकृति का गीत है जो फिल्म के आरंभ  में आता है और  दर्शकों को कथानक की पृष्ठभूमि से रूबरू कराता है। वैसे जीवन दर्शन से रूबरू कराते इसी फिल्म के गीत सब धन माटी में मनोज की शब्द रचना भी बेहतरीन है।

गीतकार मनोज मुन्तशिर ने गीत के बोलों में जिसकी लाठी उसकी भैंस के सिद्धांत पर चलते इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी पर अपने व्यंग्य बाण कसे हैं।  ये उल्टी पुल्टी व्यवस्था  एक डर भी जगाती है और साथ चेहरे पर एक विद्रूप मुस्कान भी खींच देती है । 

संगीतकार व निर्देशक को इस गीत के लिए ऐसे गायक की जरूरत थी जो लोकसंगीत में अच्छी तरह घुला मिला हो और प्रवेश ने उनकी वो जरूरत बखूबी पूरी कर दी। लोकधुन और पश्चिमी संगीत के फ्यूज़न में रचे बसे इस गीत को अगर प्रवेश ने अपनी देशी आवाज़ की ठसक नहीं दी होती तो ये गीत इस रूप में खिल नहीं पाता।

प्रवेश मलिक
नेपाल के जनकपुर धाम के एक मैथिल परिवार में जन्मे प्रवेश मलिक को अपने पिता से कविता और भाइयों से लोकगीत गायिकी का माहौल बचपन से मिला। बिहार और नेपाल में संगीत की शुरुआती शिक्षा के बाद प्रवेश ने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में परास्नातक की डिग्री भी हासिल की। अनेक गैर फिल्मी एलबमों में संगीत संयोजन से लेकर गायिकी तक करने वाले प्रवीण सूफी रॉक बैंड सानिध्य से भी जुड़े रहे हैं। माया ठगनी में बाँसुरी की धुन के साथ जब प्रवीण की आवाज़ ए य ऐ .. ए य ऐ. करती हुई लहराती है तो मन बस उस सोंधी मिठास में झूम उठता है।

 इस ज्यूकबॉक्स का पहला गीत ही माया ठगनी है। यहाँ आप पूरा गीत सुन पाएँगे।

 

माया ठगनी नाच नचावे , माया ठगनी नाच नचावे
इहे ज़माना चाले रे. अब इहे ज़माना चाले रे
डर लागे और हँसी आवे, अब इहे ज़माना चाले रे

डंका उसका बोलेगा,, डंडा जिसके हाथ में
घेर के पहले मारेंगे,बात करेंगे बाद में
हवा बदन में सेंध लगावे......, हवा बदन में सेंध लगावे
इहे ज़माना चाले रे, अब इहे ज़माना चाले रे
डर लागे और हँसी आवे, अब इहे ज़माना चाले रे

कोयल हुई रिटायर, कौवे गायें दरबारी
कौवे गाये दरबारी, कौवे गायें  दरबारी
आ…., दरबारी
कोयल हुई रिटायर, कौवे गायें  दरबारी

बिल्ली करती है भैया, यहाँ दूध की चौकीदारी
यहाँ दूध की चौकीदारी, यहाँ दूध की चौकीदारी
भोले का डमरू मदारी बजावे....., भोले का डमरू मदारी बजावे
इहे ज़माना चाले रे, अब इहे ज़माना चाले रे
डर लागे और हँसी आवे, अब इहे ज़माना चाले रे


और ये है गीत का संक्षिप्त वीडियो वर्सन

Sunday, January 01, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #25 : ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए Titli ne sare rang bech diye

स्वागत है आप सब का एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला के इस ग्यारहवें संस्करण में जिसकी पहली पेशकश है फिल्म बॉलीवुड डायरीज़ से। पिछले साल फरवरी 2016 में प्रदर्शित बॉलीवुड डायरीज़ फिल्म अपने यथार्थ को छूते कथानक के लिए सराही गयी थी। इस गीत के संगीतकार हैं विपिन पटवा और गीत के बोल लिखे हैं डा. सागर ने। विपिन पटवा का संगीत और सागर द्वारा रचे बोल इस फिल्म के लिए  निश्चय ही ज्यादा सुर्खियाँ बटोरने की ताकत रखते थे। पर फिल्म और उसका संगीत ज्यादा ध्यान खींचे बिना ही सिनेमाघर के पर्दों से बाहर हो गया।


उत्तर प्रदेश के एक व्यापारी परिवार से जन्मे विपिन को बचपन से ही शास्त्रीय संगीत में रुचि थी। पंडित हरीश तिवारी से आरंभिक शिक्षा लेने वाले विपिन स्नातक करने के बाद कुछ दिनों तक आकाशवाणी के लिए काम करते रहे। सात आठ साल पहले उन्होंने मायानगरी में कदम रखा और तीन चार छोटी मोटी फिल्में भी कीं। पर बॉलीवुड डायरीज़ मेरी समझ से उनका संगीत निर्देशित अब तक का सबसे बेहतर एलबम है। तितली के आलावा इस फिल्म के अन्य गीत  मनवा बहरुपिया और मन का मिरगा ध्यान आकर्षित करते हैं। मनवा बहरुपिया सुनकर मुझे कभी अलविदा ना कहना के चर्चित गीत मितवा कहे धड़कनें तुझसे क्या की याद आ गयी।

विपिन पटवा
तो बात करते हैं तितली की। दरअसल ये फिल्म मुंबई की फिल्मी दुनिया में पहुँचने की हसरत लिए तीन अलग अलग किरदारों की कहानी है जिनके सपनों के तार उन्हें एक दूसरे से जोड़ देते हैं। इन सपनों को पूरा करने के लिए वे क्या कुछ खोते हैं इसी व्यथा को व्यक्त करता है पच्चीसवीं पॉयदान का ये गीत। डा. सागर जिनकी शिक्षा दिक्षा जे एन यू से हुई है ने इस गीत के लिए जो बोल लिखे हैं उनमें ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए वाली पंक्ति मन को सीधे कचोट जाती है। 

बाहर से ये दुनिया हमें जितनी रंग बिरंगी दिखती है उतनी अंदर से होती नहीं। पर जब तक उसके इस रूप का दर्शन होता है हम बहुत कुछ दाँव पर लगा देते हैं। उस दलदल को पार करना ही एक रास्ता बचता है वापस लौटना नहीं। ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति अंदर ही अंदर घुलता जाता है पर कुछ कह नहीं पाता। सागर इन मनोभावों को गीत के अंतरे में बखूबी व्यक्त करते हैं।

पियानो और सारंगी के मधुर संगीत संयोजन से गीत के मुखड़े की शुरुआत होती है। इंटरल्यूड्स में भी विपिन भारतीय वाद्यों सारंगी और सरोद का खूबसूरत इस्तेमाल करते हैं। पापोन की शुरुआती तान गीत की पीड़ा को सामने ले आती है। वैसे इस गीत को एलबम में सोमेन चौधरी ने भी गाया है पर पापोन अपनी गायिकी से कहीं ज्यादा प्रभावित करते हैं।

कैसा ये कारवाँ, कैसे हैं रास्ते
ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए...

सारा सुकूँ हैं खोया खुशियों की चाहत में
दिल ये सहम सा जाए छोटी सी आहट में
कुछ भी समझ ना आये जाना हैं कहाँ
ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए...

अलफ़ाज़ साँसों में ही आ के बिखरते जाए
खामोशियों में बोले ये आँखे बेजुबान
परछाइयाँ हैं साथी, चलता ही जाए राही
कोई ना देखे अब तो ज़ख्मों के निशान
कुछ भी समझ ना आये जाना हैं कहाँ
ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए...

ना रौशनी हैं कोई, आशाएँ खोयी खोयी
टूटा फूटा हैं ये उम्मीदों का ज़हाँ
ना बेकरारी कोई, बंदिश रिहाई कोई
अब तो निगाहों में ना कोई इंतज़ार
कुछ भी समझ ना आये जाना हैं कहाँ
ख़्वाबों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए...



 

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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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