Thursday, February 22, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान # 10 : कान्हा माने ना .. Kanha

एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला  में अगला गाना वो जो अपने लाजवाब संगीत और बेहद मधुर गायिकी के दम पर जा पहुँचा है ग्यारहवीं पायदान पर। शुभ मंगल सावधान के इस सुरीले गीत को संगीतबद्ध किया और लिखा है तनिष्क वायु की जोड़ी ने और इसे गाया है नवोदित गायिका शाशा तिरुपति ने।


तो आखिर क्या खास है इसके संगीत संयोजन में। पानी की लहर की तरह इस गीत की धुन शुरु होती है और एक कोरस से गुजरते हुए सरोद की मीठी झनकार तबले की संगत में श्रोताओं को मुखड़े तक ले आती है। गीत की पहली पंक्ति के उतार चढाव  के साथ ही आप शाशा तिरुपति की आवाज़ के कायल हो जाते हैं। पहले इंटरल्यूड का 23 सेकेंड का टुकड़ा  इस साल की सबसे सुरीली पेशकश में से  एक गिने जाने का हक़दार है ।

क्या कमाल रचा है तनिष्क बागची और वायु श्रीवास्तव की जोड़ी ने राग भीम पलासी से प्रेरित इस रचना में। वॉयलिन की धुन आपके रोंगटे खड़े करती है और फिर सरोद और उसके पीछे की बाँसुरी दिल के कोरों को सहलाते हुए निकल जाती है। गीत के अंत में वायलिन की धुन उसी मिठास की याद दिलाती हुई दुबारा बजती है और मन वाह वाह किए बिना नहीं रह पाता। इस गीत में वॉयलिन पर मानस हैं और सरोद बजाया है प्रदीप बारोट ने। आप दोनों को मेरा दिल से नमस्कार और बधाई।

शाशा तिरुपति इस साल की सबसे उभरती हुई गायिका हैं। श्रीनगर में जन्मी और कनाडा की नागरिकता प्राप्त शाशा एक बहुमुखी प्रतिभा की धनी कलाकार  हैं। वैसे तो हिंदी फिल्मों में पिछले सात आठ सालों से इक्के दुक्के गीत गाती रहीं। पर इस साल ओके जानू के गाने हम्मा ने लोगों का ध्यान उनकी ओर आकृष्ट किया। दस साल की उम्र से ही शास्त्रीय संगीत सीखने वाली शाशा को फिल्मों में गाने की इच्छा गुरु के गीत तेरे बिना बेस्वादी रतियाँ सुन कर हुई।



वे ए आर रहमान की जबरदस्त प्रशंसक रही हैं। कोक स्टूडियो 3 के दौरान उनका रहमान से परिचय हुआ। ए आर रहमान ने ही उन्हें तमिल फिल्मों में गाने का मौका दिया और फिर उनका कैरियर चल निकला । तीस वर्षीय शाशा अब तक दस अलग अलग भाषाओं में गा चुकी हैं। कान्हा के लिए उन्हें इस साल की बेहतरीन गायिका के लिए कई पुरस्कारों में नामांकित भी किया गया।

तनिष्क बागची वैसे तो संगीतकार हैं ही पर वे अपने जोड़ीदार वायु श्रीवास्तव  के साथ गीत भी साथ ही लिखते हैं। शुभ मंगल सावधान का ये गाना एक ऐसे युगल की कहानी बयाँ करता है  जिनकी शादी होने वाली है पर भावी दूल्हे राजा पहले से ही मिलन को व्याकुल हैं। तनिष्क वायु ने बड़ी चतुरता से नायक  के लिए नटखट कान्हा वाला रूप चुना और ब्रज की मीठी बोली के माध्यम से  इशारों ही इशारों में कान्हा की बेसब्री को शब्दों में बाँधा। फिल्म और नायक के मूड के हिसाब से गीत में हास्य का  पुट भरने के लिए उन्होंने मुखड़े और अंतरे में ट्रिक और क्विक जैसे अंग्रेजी शब्दों का इस्तेमाल किया।

शाशा की इस बात के लिए दाद देनी होगी कि उन्होंने अपनी गायिकी में गीत की शास्त्रीयता भी बरकरार रखी और जहाँ शोख होने की जरूरत हुई वैसे ही अपनी आवाज़ को ढाल दिया। तो आइए सुनें उनकी आवाज़ में ये नग्मा जो कि कान्हा की तरह ही नटखट मिज़ाज का है।


ऊँची ऊँची डोरियों पे बाँधो रे गगर 
पर ना माने ना ...कान्हा माने ना 
जग जो बिछाये हर जाल काट ले 
मक्खन चुराए हर माल छाँट ले 
मुरली से करे ऐसी ट्रिक टिक टिक टिक 
पनघट की है बड़ी.. पनघट की है बड़ी कठिन डगर 
पर ना माने ना ...कान्हा माने ना 

रोके मोहे, टोके मोहे 
काटे रे डगर ओ रे यमुना के तट की 
लाज नाही, काज नाही मारे जो कंकरिया 
तो फूटे मोरी मटकी 
वाक चतुर भरमाए प्रेम जाल उलझाए.. 
जो भी करे, करे सब quick quick quick quick 
कहूँ मैं पिया जी थोडा कर लो सबर 
पर ना माने ना ...कान्हा माने ना 



जिस तरह शाशा कान्हा के नहीं मानने की बात करती हैं वैसे ही आप भी इस गीत के खत्म होते ही कहेंगे बस इतना ही! अभी तो  मन ही नहीं भरा था।  कोई बात नहीं जनाब आपके लिए इस गीत का और अंतरा मैं जोड़ दिए देता हूँ जो कि फिल्म में नहीं है पर जिसे  आयुष्मान खुराना ने अपनी आवाज़ दी है।

बृज आवे लाज काहे
बदरा बुलाए काहे धीर धरे सजनी
सुरमयी रुत भई, आ जा दोनों यमुना के तीर चलें संगनी
मन में भ्रमर गुनगुनावे 
काहे सखी तू घबरावे 
प्रेम तेरा मेरा बड़ा फिट फिट फिट
आज तू बहाने चाहे कितने भी कर पर ना माने ना..कान्हा माने ना

वार्षिक संगीतमाला 2017

Monday, February 19, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान #11 ज़िन्दगी तेरे रंगों से, रंगदारी ना हो पायी.. Rangdari

वार्षिक संगीतमाला में दूसरी बार प्रवेश ले रहा है लखनऊ सेंट्रल का एक और गीत जिसमें मायूसी भी है और जीवटता भी। इसे फिर अपनी आवाज़ से सँवारा है अरिजीत सिंह ने। पर इस गीत के साथ जो नया नाम जुड़ा है वो है युवा संगीतकार अर्जुन हरजाई का। 


अर्जुन की मुंबई फिल्म जगत में संघर्ष गाथा करीब एक दशक पुरानी है। घर में संगीत का माहौल था। माँ पिताजी गायिकी से जुड़े थे । 2006 की बात है जब  इंटर के बाद  मुंबई में संगीत सीखने के लिए उन्होंने  सुरेश वाडकर के संगीत संस्थान में दाखिला लिया। साथ ही साथ साउंड इंजीनियरिंग की विधा में उनकी सीखने की पहल ज़ारी रही।  फिर कुछ दिनों बाद उनका काम माँगने का सिलसिला शुरु हुआ। ख़ैर फिल्मों में काम तो नहीं मिला पर जिंगल को संगीतबद्ध करने का प्रस्ताव मिला जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। फिर तो विज्ञापनों के लिए संगीत देने के प्रस्तावों की झड़ी लग गयी।  फिल्मों में बतौर संगीत निर्देशक पहली बार वो 2014 TITU MBA और फिर गुड्डू इंजीनियर में नज़र आए। पर उन्हें बड़ा ब्रेक टीवी धारावाहिक POW बंदी युद्ध के में मिला।

अर्जुन अपने कैरियर में सबसे बड़ा योगदान गीतकार कुमार का मानते हैं जिन्होंने उनकी भेंट निर्माता व निर्देशक निखिल आडवाणी से करायी। POW के बाद निखिल ने लखनऊ सेंट्रल के लिए तीन गीतों को संगीतबद्ध करने का जिम्मा अर्जुन को सौंपा। इसी फिल्म के एक और चर्चित गीत तीन कबूतर में अर्जुन ने गिटार के आलावा आम जरूरत की चीजों से बाकी का संगीत तैयार किया क्यूँकि गाना जेल के अंदर क़ैदियों पर फिल्माना था जिनके पास गिटार के आलावा कुछ भी नहीं था। जहाँ तक रंगदारी की बात है ये एक शब्द प्रधान गीत है जिसमें अर्जुन द्वारा  गिटार और बाँसुरी पर आधारित संगीत संयोजन  कुमार यानि गीतकार राकेश कुमार के भावों को उभारने में मदद करता है।

इस गीत को लिखा कुमार ने जो पंजाबी फिल्मों के जाने माने गीतकार हैं और हिंदी पंजाबी मिश्रित डांस नंबर्स लिख लिख कर हिंदी फिल्मों में खासा नाम कमा चुके हैं। पर मैं उनसे तब ज्यादा प्रभावित हुआ हूँ जब उन्होंने अपने गीतों में दर्द के बीज बोए हैं। उनके लिखे दो गीत मुझे खास तौर पर दिल के बेहद करीब लगे थे। एक तो शंघाई फिल्म का गाना जो भेजी थी दुआ और दूसरे Oh My God का मेरे निशाँ हैं कहाँ

इसी कड़ी में जुड़ा है लखनऊ सेंट्रल का ये गीत जो एक ऐसे इंसान की व्यथा का चित्रण कर रहा है जों जिंदगी के रंगों से अपना तारतम्य नहीं बैठा पाया है। फिर भी नायक ने  जिंदगी से प्रेम करना नहीं छोड़ा है।  जिंदगी ने कभी उससे दुश्मनी निभाई भी है तो कभी वो बिल्कुल पास आ कर धड़कन की तरह धड़की भी है। इसीलिए वो ज़िदगी से परेशान जरूर है पर नाउम्मीद नहीं। उसके मन की ऊहापोह को कुमार कुछ यूं व्यक्त करते हैं... 

ज़िन्दगी तेरे रंगों से, रंगदारी ना हो पायी
लम्हा लम्हा कोशिश की, पर यारी ना हो पायी
तू लागे मुझे दुश्मन सी, कभी लगे धड़कन सी
जुड़ी जुड़ी बातें हैं, टूटे हुए मन की..रंगदारी..



कुमार कहते हैं कि अगर ख़्वाबों को पूरा करना कठिन हो जाए तो इसका ये मतलब नहीं कि आँखें ख़्वाब देखना छोड़ दें। आखिर मंजिल की राह दुर्गम ही क्यूँ ना हो सच्चा राही तो उन पर चलता ही चलेगा । इन भावों में रंगदारी शब्द का प्रयोग अनूठा भी है और सार्थक भी।


रंगदारी..रंगदारी.. रंगदारी रंगदारी
आँखों से ना छूटेगी, ख़्वाबों की रंगदारी
रंगदारी..रंगदारी.. रंगदारी रंगदारी
राहों से ना रूठेगी, मंजिल की रंगदारी.. रंगदारी..

चाहे मुझे तोड़ दे तू, दर्दों में छोड़ दे
मेरी ओर आते हुए, रास्तों को मोड़ दे
मोड़ दे.. मोड़ दे
तोहमतें लगा दे चाहे, सर पे इल्ज़ाम दे
कर दे  ख़ुदा से दूर, काफिरों का नाम दे
नाम दे.. नाम दे
ये ख्वाहिशें है पागल सी, आसमां के बादल सी
बरसी तो धुल जाएगी, रौशनी ये काजल सी

ज़िन्दगी तेरे रंगों से...

गीत के अंतिम अंतरे में जीवन से  लड़ने की नायक की जुझारु प्रवृति को उन्होंने उभारने  की कोशिश की है। बादलों से पागल ख़्वाहिशों की उनकी तुलना और फिर उसके बरसने से कालिमा के छँटने का  भाव श्रोताओं में एक धनात्मक उर्जा का संचार कर देता है। अरिजीत एक बार फिर नायक की पीड़ा को अपनी गायिकी से यूँ बाहर ले आते हैं कि सुनने वाला भी नायक के चरित्र से अपने आपको एकाकार पाता है। तो आइए सुनते हैं ये गीत.. 

वार्षिक संगीतमाला 2017

Sunday, February 18, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान #12 : तू ही मेरा मीत है जी, तू ही मेरी प्रीत है जी Meet

सचिन जिगर का नाम एक शाम मेरे नाम की संगीतमालाओं के लिए नया नहीं रहा है। पिछले पाँच छः सालों से वो बराबर अपने रचे संगीत के दम पर वार्षिक संगीतमालाओं में अपना स्थान बनाते रहे हैं। इससे पहले बदलापुर, हैप्पी एंडिंग, शुद्ध देशी रोमांस , शोर इन दि सिटी और इसक जैसी फिल्मों के गीतों ने उनके संगीत की ओे मेरा ध्यान आकर्षित किया था। 2016 उनके लिए कोई खास अच्छा साल नहीं था पर 2017 में उन्होंने जबरदस्त वापसी की है और उनके तीन गीत शुरुआती दर्जन भर पायदानों का हिस्सा बने हैं। बाकी के दो गीत कौन से हैं ये तो आपको बाद में पता चलेगा ही पर आज उनके रचे जिस गीत की बात कर रहा हूँ वो है फिल्म सिमरन का जिसके बोल लिखे हैं प्रिया सरैया ने और गाया है अरिजीत सिंह ने।



सचिन जिगर की खासियत है कि वो बड़े बैनरों के पीछे नहीं भागते। उन्होंने कम बजट की कई फिल्मों में अपना योगदान दिया है जो कभी सफल तो कभी असफल होती रही हैं। पिछले साल सितंबर में रिलीज़ हुई सिमरन भी एक ऐसी ही फिल्म थी जो ज्यादा तो नहीं चली पर कंगना के अभिनय और संगीत के लिए सराही गयी। सिमरन के ज्यादातर गीत तो फिल्म की परिस्थितियों से पनपे हैं पर मीत एक ऐसा रोमंटिक गीत है जिसे आप फिल्म से इतर भी सुनें तो भी आप इससे अपने को जोड़ पाते हैं। 

इस गीत में सचिन जिगर का संगीत संयोजन मुख्यतः गिटार और बाँसुरी में सिमटा हुआ है और शब्दों के बीच बहता हुआ मन को एक शांति, इक सुकून सा दे जाता है। इस गीत की खासियत है इसकी मधुरता और प्रिया के सहज पर जुबाँ पर शीघ्र चढ़ने वाले शब्द जिन्हें अरिजीत ने बड़े डूबकर गाया है। उनकी गायिकी में एक ईमानदारी है इसीलिए जब वो भावों को आपनी आवाज़ का पैरहन पहनाते हैं तो लगता है कि जो भी कहा जा रहा है सच्चे दिल से कहा जा रहा है।

प्रियतम के मिलने की तुलना जिस तरह प्रिया ने पहले कोरे काग़ज़ पर ग़ज़ल लिखने और फिर नर्म धूप से की है वो हृदय में एक मुलायम सा अहसास जगा जाती है। गीत का सबसे आकर्षक हिस्सा है इसका मुखड़ा जो गीत के सुनने के बाद भी होठों पर बना रहता है और आप उसे  बार बार गुनगुना चाहते हैं तू ही मेरा मीत है जी, तू ही मेरी प्रीत है जी..जो लबों से हो सके ना जुदा, ऐसा मेरा गीत है जी। 

तो आइए सुनते हैं. फिल्म सिमरन के इस गीत को .

कोरे से पन्ने, जैसे ये दिल ने, कोई गज़ल पायी 
पहली बारिश, इस ज़मी पे, इश्क ने बरसाई 
हर नज़र में, ढूँढी जो थी, तुझ में पाई वफ़ा 
जान मेरी बन गया तू ,जान मैंने लिया 

तू ही मेरा मीत है जी, तू ही मेरी प्रीत है जी 
जो लबों से हो सके ना जुदा, ऐसा मेरा गीत है जी
तू ही मेरा मीत है.. 

ओ.. खोलूँ जो आँखें सुबह को मैं चेहरा तेरा ही पाऊँ 
ये तेरी नर्म सी धूप में अब से जहां ये मेरा सजाऊँ 
ज़रा सी बात पे जब हँसती,  है तू ,हँसती है मेरी ज़िन्दगी 

तू ही मेरा मीत है जी .... गीत है जी.
तू ही मेरा मीत है.. 

वार्षिक संगीतमाला 2017

Friday, February 16, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान # 13 : आतिश ये बुझ के भी जलती ही रहती है..ये इश्क़ है. Ye Ishq Hai

वार्षिक संगीतमाला की अगली पेशकश है फिल्म रंगून से। पिछले साल के आरंभ में आई ये फिल्म बॉक्स आफिस पर भले ही कमाल ना दिखा सकी हो पर इसका गीत संगीत बहुत दिनों तक चर्चा का विषय रहा था। यूँ तो इस फिल्म में तमाम गाने थे पर मुझे सूफ़ियत के रंग में रँगा और मोहब्बत से लबरेज़ ये इश्क़ है इस फिल्म का सबसे बेहतरीन गीत लगा।

गुलज़ार के लिखे गीतों को एक बार सुन कर आप अपनी कोई धारणा नहीं बना सकते। उनकी गहराई में जाने के लिए आपको उनके द्वारा बनाए लफ़्ज़ों के तिलिस्म में गोते लगाने होते हैं और इतना करने के बाद भी कई बार कुछ प्रश्न अनसुलझे ही रह जाते हैं। विगत कुछ सालों से उनकी कलम का पैनापन थोड़ा कम जरूर हुआ है पर फिर भी शब्दों के साथ उनका खेल रह रह कर श्रोताओं को चकित करता ही रहता है।



तो चलिए साथ साथ चलते हैं गुलज़ार की इस शब्द गंगा में डुबकी लगाने के लिए।  मुखड़े में गुलज़ार ने  'सुल्फे ' शब्द का इस्तेमाल किया है जिसका अभिप्राय हुक्के या चिलम में प्रयुक्त होने वाली तम्बाकू की लच्छियों से हैं। जलने के बाद भी सुलगते हुए ये जो धुआँ छोड़ती हैं वो मदहोशी का आलम बरक़रार रखने के लिए काफी होता है। गुलज़ार कहते हैं कि इश्क़ की फितरत भी कुछ ऐसी है जिसकी जलती चिंगारी रह रह कर हमारे दिल में प्रेम की अग्नि को सुलगती रहती है।

ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..
सूफी के सुल्फे की लौ उठ के कहती है 
आतिश ये बुझ के भी जलती ही रहती है
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..ये इश्क़ है..

सदियों से बहती नदी को गुलज़ार की आँखें उस प्रेमिका के तौर पे देखती हैं जो अपने प्रेमी रूपी किनारों पर सर रखकर सोई पड़ी है। यही तो सच्चा इश्क़ है जो तन्हाई में भी अपने प्रिय की यादों में रम जाता है। अपने इर्द गिर्द उसकी चाहत की परछाई को बुन लेता है। उन रेशमी नज़रों  के अंदर के राज अपनी आँखों से सुन लेता है। इसलिए गुलज़ार लिखते हैं

साहिल पे सर रखके, दरिया है सोया है 
सदियों से बहता है, आँखों ने बोया है
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..
तन्हाई धुनता है, परछाई बुनता है 
रेशम सी नज़रों को आँखों से सुनता है
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..ये इश्क़ है...

आख़िर इश्क़ के मुकाम क्या हैं? प्रेम की परिणिति एक दूसरे में जलते रहने के बाद उस ईश्वर से एकाकार होने की है जिसने इस सृष्टि की रचना की है। इसीलिए गुलज़ार मानते हैं कि इश्क़ की इस मदहोशी के पीछे उसका सूफ़ी होना है। इसलिए वो कभी रूमी की भाषा बोलता है तो कभी उनके भी गुरु रहे तबरीज़ी की।

सूफी के सुल्फे की लौ उट्ठी अल्लाह हू.
अल्लाह हू अल्लाह हू, अल्लाह हू अल्लाह हू अल्लाह हू
सूफी के सुल्फे की लौ उट्ठी अल्लाह हू.
जलते ही रहना है बाकी ना मैं ना तू

ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..
बेखुद सा रहता है यह कैसा सूफी है 
जागे तो तबरेज़ी बोले तो रूमी है
ये इश्क़ है.. ये इश्क़ है..ये इश्क़ है...

विशाल भारद्वाज के इस गीत में नाममात्र का संगीत संयोजन है। गिटार और बाँसुरी के साथ अरिजीत का स्वर पूरे गीत में उतार चढ़ाव के साथ बहता नज़र आता है। गायिकी के लिहाज़ से इस कठिन गीत को वो बखूबी निभा लेते हैं। एलबम में इस गीत का एक और रूप भी है जिसे रेखा भारद्वाज जी ने गाया है पर अरिजीत की आवाज़ का असर कानों में ज्यादा देर तक रहता है। तो आइए सुनें रंगून फिल्म का ये नग्मा


वार्षिक संगीतमाला 2017

Monday, February 05, 2018

वार्षिक संगीतमाला 2017 पायदान # 14 : ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको ना रहना साथ मेरे. Tere Mere

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर इस साल पहली बार प्रवेश कर रही है संगीतकार अमाल मलिक और गायक अरमान मलिक की जोड़ी। पिछले कुछ सालों में भाइयों की इस जोड़ी ने अलग अलग गीतकारों के साथ कुछ कमाल के गीत दिए हैं। पर जब जब रश्मि विराग यानि रश्मि सिंह और विराग मिश्रा की युगल गीतकार जोड़ी के साथ इन्होंने काम किया है बात कुछ और बनती नज़र आई है। 2016 में इनकी ही तिकड़ी ने मैं रहूँ या ना रहूँ तुम मुझमें कहीं बाकी रहना जैसा कमाल का गीत हम श्रोताओं को दिया था। इसके आलावा बोल दो, ना ज़रा, खामोशियाँ, मुस्कुराने की वज़ह तुम हो जैसे लोकप्रिय गीतों में भी ये टीम शामिल थी।



पिछले साल अक्टूबर में आयी सैफ़ अली खाँ की फिल्म शेफ में यही तिकड़ी एक बार फिर साथ आई। संगीतकार अमाल मलिक को जातीय तौर पर इस गीत से बहुत लगाव है। वो कहते हैं कि पिछले कुछ दिनों से उनकी ज़िदगी में जो अनुभव हुए उसका ही कुछ निचोड़ इस गीत में उभर के आया है।

गीतकार विराग मिश्र इस गीत में जो भाव पैदा कर सके हैं उसका वो बराबर का श्रेय अमाल को देते हैं। ये गीत उन्होंने अमाल के साथ मिल कर लिखा । अमाल के मन में एकदम साफ था कि वो गीत के शब्दों में कौन से भाव उत्पन्न करना चाहते हैं। संगीतकार अपने विचारों में इतना स्पष्ट हो तो ये एक चुनौती होती है गीतकार के लिए कि वो अपनी लेखनी से संगीतकार के जज़्बातों को शब्द दे सके।

विराग मिश्र और अमाल मलिक

ये गीत उस परिस्थिति को बयाँ करता है जब दो चाहने वाले हालात, अहम और गलतफहमियों के कुचक्र में फँसकर अलग हो जाते हैं।  गीत की पंक्ति ना तू ग़लत, ना मैं सही सुनते हुए मुझे येशेर याद आ जाता है..

कुछ तुमको भी अज़ीज़ हैं अपने सभी उसूल
कुछ हम भी इत्तिफाक़ से जिद के मरीज हैं

लेकिन अकेले रहकर नायक समझ पाता है कि उसे अपने हमसफ़र की कितनी ज्यादा जरूरत है। इसलिए विराग लिखते हैं ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको ना रहना साथ मेरे.. । बड़ी सहज पर दिल को छूने वाली पंक्तियाँ हैं ये। गीत के अंतरों  में विरह की मानसिक पीड़ा का चित्रण तो है ही, साथ ही ये उम्मीद भी कि राहों  से भटके हुए प्रेमी फिर मिलेंगे। 

अमाल खुद इस गीत के संगीत  संयोजन को पश्चिम और पूर्व का संगम मानते हैं। इस गीत को संगीतबद्ध करते समय उन्हें लगा कि इसमें एक भारतीयता होनी चाहिए और उसे उन्होंने Soft Rock Country Music वाली आवाज़(जिसे वे ख़ुद भी काफी पसंद करते हैं) से मिलाने की कोशिश की।गीत के प्रील्यूड में गिटार की टुनटुनाहट बड़ी प्यारी लगती हे और वो रह रह के पूरे गीत में आ आ कर कानों को सुकून देती हैं। गीत के बोलों के साथ ढोलक और सुराही जैसे ताल वाद्य संगत देते हैं। वहीं इंटरल्यूड्स में एक बार बाँसुरी की धुन भी उभर कर आती है। तो सुनिए अरमान मलिक की आवाज़ में ये नग्मा...

तेरे मेरे दरमियाँ हैं बातें अनकही
तू वहाँ है मैं यहाँ क्यूँ साथ हम नहीं
फैसले जो किये, फासले ही मिले
राहें जुदा क्यूँ हो गयी, ना तू ग़लत, ना मैं सही
ले जा मुझे साथ तेरे, मुझको ना रहना साथ मेरे..
ले जा मुझे.. ले जा मुझे..

थोड़ी सी दूरियाँ हैं थोड़ी मजबूरियाँ हैं
लेकिन है जानता मेरा दिल
हो.. इक दिन तो आएगा जब तू लौट आयेगा तब
फिर मुस्कुराएगा मेरा दिल सोचता हूँ यहीं
बैठे बैठे यूँ ही
राहें जुदा क्यूँ हो गयी  ले जा मुझे.. ले जा मुझे..

यादों से लड़ रहा हूँ, खुद से झगड़ रहा हूँ
आँखों में नींद ही नहीं है हो..
तुझसे जुदा हुए तो लगता ऐसा है मुझको
दुनिया मेरी बिखर गयी है
दोनों का था सफ़र, मंजिलों पे आकर
राहें जुदा क्यूँ हो गयी  ले जा मुझे.. ले जा मुझे..

सुन मेरे ख़ुदा, बस इतनी सी मेरी दुआ
लौटा दे हमसफ़र मेरा, जाएगा कुछ नहीं तेरा
तेरे ही दर पे हूँ खड़ा, जाऊँ तो जाऊँ मैं कहाँ
तकदीर को बदल मेरी मुझपे होगा करम तेरा..





वार्षिक संगीतमाला में अब तक

15. ये मौसम की बारिश... ये बारिश का पानी
16.  मेरे रश्के क़मर तूने पहली नज़र
17. सपने रे सपने रे
18. कि चोरी चोरी चुपके से चुपके से रोना है ज़रूरी 
19. नज़्म नज़्म 
20 . मीर ए  कारवाँ  
21. गुदगुदी गुदगुदी करने लगा  हर नज़ारा 
22. दिल उल्लू का पठ्ठा है 
23. स्वीटी  तेरा ड्रामा 
24. गलती से mistake 
25 .तेरी मेरी इक कहानी है
 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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