Saturday, December 01, 2018

किसी गाँव में इक हसीना थी कोई..वो सावन का भीगा महीना थी कोई Jagjit's journey as music director !

प्रेम गीत और अर्थ के बाद अस्सी और नब्बे के दशक में जगजीत सिंह को करीब दर्जन भर फिल्मों के संगीत निर्देशन का मौका मिला। इस सिलसिले में उनकी गीतकार गुलज़ार के साथ संगीत निर्देशित  फिल्म सितम का जिक्र तो मैंने इस श्रृंखला की पिछली कड़ी में किया ही था। इसके आलावा उन्होंने बिल्लू बादशाह, कानून की आवाज़, जिस्म का रिश्ता, आज, आशियाना, यादों का बाजार और खुदाई में संगीत दिया। मुझे भरोसा है कि एक दो को छोड़ शायद ही आप सबने इनमें किसी फिल्म का नाम सुना हो।

जगजीत सिंह कभी भी मुख्यधारा के संगीतकार नहीं रहे। अस्सी के दशक में ग़ज़ल गायिकी में उनका सितारा जिस बुलंदी पर था उसमें फिल्म संगीत पर ज्यादा ध्यान देना मुमकिन भी नहीं था। अगर इनमें महेश भट्ट द्वारा निर्देशित फिल्में आज और आशियाना को अपवाद स्वरूप छोड़ दें तो उन्होंने जिस तरह की फिल्में कीं उन्हें देख के तो यही लगता है कि ये काम तब पैसों के लिए कम बल्कि अपने मित्रों का मन रखने के लिए उन्होंने ज़्यादा किया।


इन गुमनाम सी फिल्मों में भी कुछ गीत अपना अगर छोटा सा भी मुकाम बना पाए तो उसमें ज्यादातर में उनकी आवाज़ का हाथ रहा। आज ऐसे ही चार अलग अलग गीतों का का जिक्र आपसे करूँगा जिसमें दो को ख़ुद जगजीत ने अपनी आवाज़ से सँवारा था। ये तो नहीं कहूँगा कि ये गीत हर दृष्टि से अलहदा थे पर हाँ इतना तो हक़ बनता ही था इनका कि ये संगीत के सुधी श्रोताओं तक पहुँचते।

फिल्म "आज" में उस दौर के युवा अभिनेता कुमार गौरव और राजकिरण की मुख्य भूमिकाएँ थीं। आज के बड़े सितारे अक्षय कुमार ने भी इसी फिल्म में एक छोटी सी भूमिका से अपनी फिल्मी पारी की शुरुआत की थी। जगजीत ने इस फिल्म अपनी पुरानी रचना वो क़ाग़ज की कश्ती के आलावा तीन गीत रचे जिनमें घनशाम वासवानी, विनोद सहगल और जुनैद अख्तर के सम्मिलित स्वर में गाई मदन पाल की ग़ज़ल ज़िंंदगी के बदलते रंगों की तस्वीर को कुछ यूँ पेश करती है।

ज़िंंदगी रोज़ नए रंग में ढल जाती है, 
कभी दुश्मन तो कभी दोस्त नज़र आती है

कभी छा जाए बरस जाए घटा बेमौसम 
कभी एक बूँद को भी रुह तरस जाती है.... 


जगजीत मुखड़े के पहले अपने संगीत में भांति भांति के वाद्यों का इस्तेमाल करते हैं। बाकी का काम उनके शागिर्द रहे घनशाम और अशोक बखूबी कर जाते हैं।

इसी फिल्म में जगजीत का गाया गीत फिर आज मुझे तुमको इतना ही बताना है..हँसना ही जीवन है हँसते ही जाना है भी सुनना मन में आशा की ज्योति जला लेने जैसा लगता है।


आशियाना में जगजीत का रचा और गाया नग्मा आज भी हम सब की जुबाँ पर आज भी गाहे बगाहे आता ही रहता है। मदन पाल के लिखे इस गीत का मुखड़ा था हमसफ़र बन के हम, साथ हैं आज भी.... फिर भी है ये सफ़र अजनबी अजनबी। नजदीक रह कर भी दो इंसान मानसिक रूप से दूर हो जाएँ तो साथ साथ रहना भी कितना पीड़ादायक हो जाता है ये गीत उस दर्द की गवाही देता है। 


मजे की बात ये है कि इस गीत में मार्क जुबेर के साथ जगजीत सिंह फिल्मी पर्दे पर भी नज़र आए।

जगजीत सिंह से जुड़ी इस श्रृंखला का अंत मैं उस नज़्म से करना चाहूँगा जिसे गाया था दिलराज कौर ने। राजेश खन्ना और दीपिका पर फिल्मायी इस नज़्म की लय और दिलराज जी की सुरीली आवाज़ इसे बार बार सुनने को मजबूर करती है। सुदर्शन फाकिर के शब्द किस तरह मोहब्बत से महरूम एक लड़की का दर्द बयाँ करते हैं वो उनकी लिखी इन पंक्तियों में देखिए...

किसी गाँव में इक हसीना थी कोई
वो सावन का भीगा महीना थी कोई 
जवानी भी उस पर बड़ी मेहरबां थी
मोहब्बत ज़मीं है तो वो आसमां थी 
वो अब तक है जिन्दा वो अब तक जवां है
किताबे मोहब्बत की वो दास्तां  है
उसे देखकर मोम होते थे पत्थर 
मगर हमसे पूछो न उसका मुकद्दर 
न घर की बहू वो बनाई गई थी 
अलग उसकी महफ़िल सजाई गई थी 
वो गाँव के लड़कों को चाहत सिखाती 
सबक वो मोहब्बत का उनको पढ़ाती

मगर वक़्त कोई नया रंग लाया 
न पूछो कहानी में क्या मोड़ आया 
हुआ प्यार उसको किसी नौजवां से 
नतीजा न पूछो हमारी जुबां से 
मोहब्बत की राहों पे जिस दिन चली वो
ज़माने की नज़रों में मुजरिम बनी वो 
नसीबों  में उसके मोहब्बत नहीं थी 
मोहब्बत की उसको इजाज़त नहीं थी 

ज़माने ने आखिर उसे जब सजा दी 
हसीना ने अपनी ये जां तक लुटा  दी 
वही आसमां है वही ये जमीं है 
जवां  वो हसीना कही भी नहीं है 
मगर रुहे उल्फत की मंजिल जुदा है 
मोहब्बत की दुनिया का अपना खुदा है 


वो अब तक है ..महीना थी कोई


दिलराज कौर की आवाज़ से मेरी मुलाकात उनकी गायी ग़ज़ल इतनी मुद्दत बाद मिले हो.. से हुई थी। इसके आलावा उनकी आवाज़ में इक्का दुक्का गीत सुनता रहा हूँ। इतनी प्यारी आवाज़ से हमारा राब्ता नब्बे के दशक में छूट सा गया। दिलराज़ इस नज़्म में भी नाममात्र के वाद्य यंत्रों के बावज़ूद अपनी आवाज़ का दिल पर गहरा असर छोड़ती हैं।

नब्बे के दशक में पुत्र की असमय मौत ने जगजीत को हिला कर रख दिया। वे ग़ज़लों और फिल्मी दुनिया से दूर होते चले गए। ग़ज़लों से तो उन्होंने दुबारा नाता जोड़ा पर फिल्मों में उन्होंने बतौर संगीतकार उसके बाद नाममात्र का काम किया।

चार भागों तक चली इस श्रृंखला का आज यहीं समापन होता है। कैसी लगी आपको जगजीत जी से जुड़ी ये श्रृंखला। अपनी राय देना ना भूलिएगा।

Friday, November 16, 2018

साँस लेती हुई आँखों को ज़रा सोने दो ..जब पहली बार फिल्मों में मिला जगजीत को गुलज़ार का साथ

जगजीत सिंह के संगीत निर्देशन में कई गीत ऐसे बने जिसमें गायक के तौर पर जगजीत सिंह ने अपनी और चित्रा जी की आवाज़ का इस्तेमाल नहीं किया। सुरेश वाडकर, भूपेन हजारिका, विनोद सहगल, घनशाम वासवानी से लेकर शोभा गुर्टू और आशा भोसले जैसे पार्श्व गायक उनके गीतों की आवाज़ बने। इनमें कुछ गीत ऐसे हैं जो फिल्मों के ना चलने की वज़ह से अनमोल मोती की तरह सागर की गहराइयों  में डूबे रहे।



ऐसा ही एक गीत आपके लिए लाया हूँ फिल्म सितम का जो 1984 में रिलीज़ हुई थी। इस गीत को लिखने वाले कोई और नहीं बल्कि हम सब के प्रिय गीतकार गुलज़ार थे। जगजीत और गुलज़ार ने जब भी साथ काम किया नतीजा शानदार ही रहा है। आप उनके साझा एलबम "मरासिम" या "कोई बात चले" को सुनें या फिर मिर्जा गालिब धारावाहिक जिसे गुलज़ार ने निर्देशित किया था, उसमें जगजीत का काम देखें। ग़ज़ब की केमिस्ट्री थी इनके बीच। सच तो ये है कि  नब्बे के दशक में जगजीत फिल्म संगीत के पटल से गायब हुए पर   2002 में लीला में गुलज़ार के लिखे गीतों में अपने संगीत से फिर जान फूँकने में सफल हुए।

आपको जानकर ताज्जुब होगा कि जब मुंबई  में जगजीत फिल्मों में पार्श्व गायक बनने के लिए संघर्ष कर रहे थे तो संगीत के मर्मज्ञ समझे जाने वाले ओम सेगान ने जगजीत की मुलाकात गुलज़ार से कराई थी और उनकी गुलज़ार से अपेक्षा थी कि शायद वे जगजीत को फिल्मों में काम दिलवा सकते हैं। तब गुलज़ार ख़ुद बतौर गीतकार अपनी जड़े ज़माने में लगे थे। वे जगजीत की आवाज़ से प्रभावित तो थे पर उनके मन में जरूर कहीं ना कहीं ये बात थी कि उनकी आवाज़ फिल्मों के लिए नहीं बनी और इसलिए उन्होंने जगजीत के लिए तब किसी से सिफारिश भी नहीं की़। बाद में इन दोनों महारथियों ने साथ काम किया और क्या खूब किया।


फिल्म सितम का ये गीत जितना जगजीत का है उतना ही आशा जी और गुलज़ार का भी। मैंने सितम नहीं देखी थी पर इस गीत पर लिखने के पहले उसे देखना जरूरी समझा। अपने समय से आगे की कहानी थी सितम की, फुटबाल के खिलाड़ियों से जुड़ी हुई। एक मैच के दौरान गोल किक बचाते हुए सिर पर चोट लगने से गोलकीपर की मौत हो जाती है और उसकी पत्नी गहन शोक में गोल किक लगाने वाले को इतना भला बुरा कहती है कि वो अपने आप को पूरी तरह अपराधी मान कर गहरे अवसाद में चला जाता है। स्थिति तब जटिल हो जाती है जब डाक्टर मृतक खिलाड़ी की पत्नी से ही अनुरोध करते हैं कि वो उसे समझाये कि गलती उसकी नहीं थी। उनका मानना  है कि  नायिका की कोशिश से ही वो ग्लानि मुक्त होकर सामान्य ज़िंदगी में लौट सकता है।

पति की मौत से आहत एक स्त्री के लिए उसकी मौत का कारण बने मरीज को मानसिक रूप से उबारने का कार्य सोचकर ही कितना कष्टकर लगता  है। नायिका फिर भी वो करती है जो डाक्टर कहते हैं क्यूँकि उसे भी अहसास है कि मरीज की इस हालत के लिए वो भी कुछ हद तक जिम्मेदार है। 

गुलज़ार ने मरीज को सुलाती नायिका के जीवन के नैराश्य को गीत के बोलों में व्यक्त करने की कोशिश की है।  गीत में आँखों के बुझ जाने से उनका तात्पर्य किसी के जीवन से अनायास निकल जाने से है। उसके बाद भी तो ज़िंदगी जीनी पड़ती ही है वो कहाँ बुझती है? उसका तो कोई ठिकाना भी नहीं कब किस करवट बैठे? कब कैसी कठिन परीक्षा ले ले? अब देखिए ना जिस शख़्स के कारण पति दूसरी दुनिया का वासी हो गया उसी की तीमारदारी का दायित्व वहन करना है नायिका को अपने ख़्वाबों की चिता पर।

इसीलिए गुलज़ार लिखते हैं..आँखे बुझ जाती हैं ये देखा है, ज़िंदगी रुकती नहीं बुझती नहीं..  ख्वाब चुभते हैं बहुत आँखों में,नींद जागो तो कभी चुभती नहीं।।।डर सा रहता है ज़िंदगी का सदा, क्या पता कब कहाँ से वार करे,आँसू ठहरे हैं आ के आँखों में नींद से कह दो इंतज़ार करे

मुखड़े और अंतरे  में गुलज़ार के गहरे बोलों के पीछे जगजीत जी का शांत संगीत बहता है और इंटरल्यूड्स में फिर उभर कर आता है। आशा जी की आवाज़ गीत के दर्द को आत्मसात किए सी चलती है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को जो कि फिल्म में स्मिता पाटिल और विक्रम पर फिल्माया गया है



सारा दिन जागे तो बेजान सी हो जाती हैं
साँस लेती हुई आँखों को ज़रा सोने दो 

साँस लेती हुई आँखें अक्सर
बोलती रहती है गूँगी बातें
सारा दिन चुनती हूँ सूखे पत्ते
रात भर काटी है सूखी रातें

आँखे बुझ जाती हैं ये देखा है
ज़िंदगी रुकती नहीं बुझती नहीं
ख्वाब चुभते हैं बहुत आँखों में
नींद जागो तो कभी चुभती नहीं

डर सा रहता है ज़िंदगी का सदा
क्या पता कब कहाँ से वार करे
आँसू ठहरे हैं आ के आँखों में
नींद से कह दो इंतज़ार करे

बतौर संगीतकार जगजीत सिंह का फिल्मी सफ़र

Saturday, October 27, 2018

कैसा रहा बतौर संगीतकार जगजीत सिंह का फिल्मी सफ़र? : ज़ख़्म जो आप की इनायत है Zakhm jo aapki inayat hai

जगजीत सिंह से जुड़ी इन कड़ियों में आपसे बात हो रही थी ऐसी हिंदी फिल्मों की जिनके संगीतकार की भूमिका निभाई जगजीत सिंह नेप्रेम गीत की शानदार सफलता के बाद अगले ही साल 1982 में एक और फिल्म जगजीत की झोली में आई और वो थी अर्थ। जगजीत सिंह ने जितनी भी फिल्मों का संगीत निर्देशन किया उसमें सबसे अधिक सफल यही फिल्म रही। फिल्म महेश भट्ट की थी और फिल्म का कथानक पति पत्नी व प्रेमिका के टूटते जुड़ते रिश्तों पर आधारित था। जगजीत ने कहानी की परिस्थितियों को कैफ़ी आज़मी की लिखी ग़ज़लों और नज़्मों में ऍसा ढाला कि फिल्म का हर एक गीत यादगार बन गया। झुकी झुकी सी नज़र और तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो और तू नहीं तो ज़िदगी में और क्या रह जाएगा..तो क्या आम क्या खास सबके दिलों में छा गया। अपनी बात करूँ तो उन दिनों एकाकी पलों में इस फिल्म की नज़्म कोई ये कैसे बताया कि वो तन्हा क्यूँ है आँखों में नमी पैदा कर देती थी। 


जगजीत जी के सम्मान में हुए एक कार्यक्रम में फिल्म की नायिका शबाना आज़मी ने अर्थ के संगीत को याद करते हुए कहा था कि "मैं बहुत खुशकिस्मत हूँ कि अर्थ के तीन गाने मेरे ऊपर फिल्माए गए थे। उन्होंने संगीत के साथ शब्दों में दर्द को इस तरह पिरोया था कि मेरे पास करने लायक कुछ रह नहीं गया था।"

फिल्म साथ साथ में भी जगजीत व चित्रा की गायिकी सराही गयी पर इस फिल्म का संगीत जगजीत ने नहीं बल्कि उनके मित्र कुलदीप सिंह ने दिया था। जगजीत जी को अर्थ की सफलता के बाद फिल्म संगीत रचने के जितने मौके मिलने चाहिए थे उतने नही मिले। शायद इसकी वज़ह जगजीत का अपने निजी एलबमों को ज्यादा तवज्जोह देना भी रहा हो। उन्हें जो मौके मिले भी वो छोटे बैनर या लीक से हटकर बनी फिल्मों के लिए मिले। 

1983 में शत्रुघ्न सिन्हा ने एक फिल्म कालका बनाई जिसमें अपनी गायिकी और संगीत के ज़रिए जगजीत ने शास्त्रीयता का एक अलग ही रूप दिखाया। अगर आपको अर्धशास्त्रीय संगीत पसंद है तो जगजीत के रचे "कैसे कैसे रंग दिखाए कारी रतिया", "तराना" और "बिदेशिया" को सुनना ना भूलिएगा। 

इसी साल उन्होंने निर्वाण का भी संगीत दिया। इसका एक गीत चित्रा सिंह ने गाया है जिसके संगीत में आपको जगजीत के चिरपरिचित ग़ज़ल वाले संगीत की छाया तक नहीं मिलेगी। राही मासूम रज़ा के लिखे इस गीत का मुखड़ा था "रातें थीं सूनी सूनी, दिन थे उदास मेरे..तुम मिल गए तो जागे सोए हुए सवेरे "। बाद में इसे जगजीत ने अपने एलबम Rare Moments में शामिल कर लिया। 

एक साल बाद उन्हें एक और फिल्म मिली जिसका नाम था रावण। इसी फिल्म के लिए उन्होंने अपनी मशहूर ग़ज़ल "हम तो यूँ अपनी ज़िंदगी से मिले अजनबी जैसे अजनबी से मिले....." रची थी जो आप सबने सुनी ही होगी। 

निर्वाण,रावण और उसके बाद संगीत निर्देशित तुम लौट आओ के गीत तो ज्यादा चर्चित नहीं रहे पर ये इतनी छोटे बजट की फिल्में थी कि इनके संगीत तक आम जनता की कभी पहुँच ही नहीं हुई। पर इन फिल्मों के कुछ गीत निश्चय ही श्रवणीय थे। आज इन्हीं फिल्मों में से "तुम लौट आओ" का एक प्यारा सा नग्मा आपको सुनवाने जा रहा हूँ जिसे लिखा था सुदर्शन फ़ाकिर साहब ने और जिसका शुमार जगजीत चित्रा के कम सुने गीतों में होता है।

फिल्म में नायक विदेश जाने की तमन्ना में अपने प्यार और उससे अंकुरित बीज को प्रेमिका के गर्भ में छोड़ कर जाने को तत्पर हो जाता है। सुदर्शन जी ने प्रेम में टूटी और दिग्भ्रमित नायिका की बात को बड़ी खूबी से इन लफ़्ज़ों में बयाँ किया है रात सपना बहार का देखा, दिन हुआ तो ग़ुबार सा देखा..बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला, बेज़ुबानी को नाम क्या दें हम। वहीं नायक इसे अपनी नहीं बल्कि जवानी की भूल बताकर जीवन में आगे बढ़ने को लालायित है। गीत के तीनों अंतरे इस परिस्थिति की दास्तान को बखूबी श्रोताओं के समक्ष रख देते हैं। 


ज़ख़्म जो आप की इनायत है, इस निशानी को नाम क्या दें हम
प्यार दीवार बन के रह गया है, इस कहानी को नाम क्या दें हम

आप इल्ज़ाम धर गये हम पर, एक एहसान कर गये हम पर
आप की ये भी मेहरबानी है, मेहरबानी को नाम क्या दें हम

आपको यूँ ही ज़िन्दगी समझा, धूप को हमने चाँदनी समझा
भूल ही भूल जिस की आदत है, इस जवानी को नाम क्या दें हम

रात सपना बहार का देखा, दिन हुआ तो ग़ुबार सा देखा
बेवफ़ा वक़्त बेज़ुबाँ निकला, बेज़ुबानी को नाम क्या दें हम



ग़ज़ल के बारे में लिखते हुए जगजीत का गाया ये अंतरा गुनगुनाने का मन हुआ तो उसे यहाँ शेयर कर रहा हूँ..




मुझे आशा है कि इस आलेख में उल्लेख किए गए कुछ गीत आपके लिए भी अनसुने होंगे। फिलहाल तो इजाज़त दीजिए। फिर लौटूँगा जगजीत जी की  संगीत निर्देशित कुछ और फिल्मों के साथ।

Sunday, October 14, 2018

प्रेम गीत जिसने जगजीत सिंह को दी एक संगीत निर्देशक की पहचान : होठों से छू लो तुम Hothon se Chhulo Tum...

पिछले हफ्ते जगजीत जी की सातवीं पुण्य तिथि थी जिसे लोग अक्सर किसी की याद का दिन भी कहते हैं पर जगजीत जी कब यादों से जुदा हुए हैं। उनकी आवाज़ का अक़्स तो रुह में नक़्श हो चुका है। जब तब कानों में गूँजती ही रहती है। ग़ज़लों के बेताज बादशाह थे वे। मैंने उनकी पसंदीदा ग़ज़लों के बारे इस ब्लॉग पर विस्तार से लिखा भी है और उसका प्रमाण ये है कि ये उन पर लिखा जाने वाला चालीसवाँ आलेख है।

एक ग़ज़ल गायक के आलावा जगजीत जी ने एक डेढ़ दशक तक फिल्मों में भी संगीत दिया। उनके द्वारा संगीत निर्देशित फिल्मों में से ज्यादातर बड़े बजट की फिल्में नहीं थीं। कुछ तो ठीक से देश भर में प्रदर्शित भी नहीं हुई इसलिए उनके गाने भी आम लोगों तक उस तरह नहीं पहुँचे जैसे उनके एलबम्स की ग़ज़लें पहुँचती थीं। इसलिए मैंने सोचा कि क्यूँ ना आपको उनके कुछ सुने और अनसुने संगीतबद्ध फिल्मी गीतों से मिलवाया जाए। इस सिलसिले की शुरुआत एक ऐसे गीत जिसे शायद ही किसी ने ना सुना हो और जिससे मेरी व्यक्तिगत यादें जुड़ी हैं।


बतौर संगीत निर्देशक उनकी पहली और सबसे नामी फिल्म प्रेम गीत (1981) थी। ऐसा नहीं है कि प्रेम गीत से पहले सत्तर के दशक में उन्होंने संगीत निर्देशन नहीं किया था। उन्हें इस दौरान कुछ फिल्में मिली भी पर वो कभी रुपहले पर्दे का मुँह नहीं देख पायीं और बनने के पहले ही बंद हो गयीं। उनकी गायी मशहूर नज़्म "बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी.." को तो उन्होंने एक फिल्म के लिए गायक भूपेंद्र की आवाज़ में रिकार्ड भी कर लिया था। उनके ऐसे कई संगीतबद्ध नग्मे अनसुने ही रह गए।

प्रेम गीत ने सब कुछ बदल कर रख दिया। The Unforgettables की सफलता के बाद उनकी आवाज़ और संगीत की जादूगरी की खनक फिल्मी दुनिया में फैल चुकी थी। जहाँ तक मुझे याद है कि जगजीत जी का गाया सबसे पहला फिल्मी गीत जो मैंने सुना था वो इसी फिल्म का था। जी हाँ होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो। मैं तब छठी कक्षा में रहा हूँगा। उस वक़्त क्या रेडियो क्या नुक्कड़ और क्या स्कूल सब जगह इसी गीत के चर्चे थे। इतने प्यारे, सहज और सच्चे शब्द थे इस गीत के कि उस छोटी उम्र में भी सीधे दिल पर लगे थे।

इसी गीत से जुड़ा एक वाकया है जिसे आपके साथ यहाँ बाँटना चाहूँगा। मैं कभी स्कूल में गाता  नहीं था पर एक कार्यक्रम के लिए मेरी कक्षा से गायकों की तलाश हो रही थी़। जब क्लॉसटीचर ने इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए गायकों का चुनाव करने के लिए इच्छुक छात्रों का नाम पूछा तो पता नहीं मुझ जैसे संकोची बालक ने कैसे हाथ उठा दिया। जिन दो लोगों को अंततः शिक्षिका ने गाने के लिए चुना उनमें एक मैं भी था।  कमाल की बात ये थी  कि हम दोनों ही छात्रों ने होठों से छू लो तुम को ही गाने के लिए चुना था । मैंने कक्षा में उठकर पहली बार इसी गीत को गाया पर मेरे मित्र ने इसे और बेहतर निभाया और उसका कार्यक्रम के लिए चुनाव हो गया।

गीतकार के लिहाज से इंदीवर मेरे कभी प्रिय नहीं रहे पर इस गीत के लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम होगी। जिस तरह शैलेंद्र आम से लहजे में गहरी बात कह देते थे उसी तरह इंदीवर ने  इतने सीमित शब्दों में इस गीत के माध्यम से सच्चे प्रेम की जो परिभाषा गढ़ी वो नायाब थी

ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन
जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन
नई रीत चलाकर तुम, ये रीत अमर कर दो...

गीत के बाकी अंतरे भी एक ऐसे टूटे हुए इंसान का दर्द बयाँ करते हैं जो अब अपनी सूखी बिखरी ज़िदगी में अपनी प्रेयसी के प्रेम की फुहार पाकर फिर से जी उठना चाहता है।

इस गीत में जगजीत की आवाज़ और संगीत इस तरह घुल मिल गए है कि उन पर अलग अलग टिप्पणी करना संभव नहीं। भगवान ने जगजीत जी की आवाज़ बनाई ही ऐसी थी जिससे दर्द यूँ छलकता था जैसे लबालब भरी हुई मटकी से पानी और इसीलिए आज भी लोग इसे सुनते हैं तो भावुक हो जाते हैं। 

जहाँ तक फिल्मी गीतों की बात है ये उनकी सबसे सुरीली पेशकश रही है। इस फिल्म के लिए जगजीत ने एक और संगीत रचना की थी जो सराही गयी थी। गीत के बोल थे आओ मिल जाएँ सुगंध और सुमन की तरह। वैसे जगजीत ने अगले ही साल फिल्म अर्थ में जो संगीत दिया वो सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ गया लेकिन अर्थ में सिर्फ ग़ज़लों और नज्मों का इस्तेमाल हुआ था जिसमें जगजीत जी की माहिरी जगज़ाहिर थी। जगजीत की संगीत निर्देशित फिल्मों की चर्चा आगे भी ज़ारी रहेगी। फिलहाल तो प्रेम गीत का ये अजर अमर गीत सुनिए।

होठों से छू लो तुम, मेरा गीत अमर कर दो
बन जाओ मीत मेरे, मेरी प्रीत अमर कर दो

ना उम्र की सीमा हो, ना जन्म का हो बंधन
जब प्यार करे कोई, तो देखे केवल मन
नई रीत चलाकर तुम, ये रीत अमर कर दो
होठों से छू लो तुम  ...

आकाश का सूनापन, मेरे तनहा मन में
पायल छनकाती तुम, आ जाओ जीवन में
साँसें देकर अपनी, संगीत अमर कर दो
होठों से छू लो तुम  ...

जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा
सब जीता किये मुझसे, मैं हर दम ही हारा
तुम हार के दिल अपना, मेरी जीत अमर कर दो

होठों से छू लो तुम  ...

बतौर संगीतकार जगजीत सिंह का फ़िल्मी सफ़र  


Tuesday, October 02, 2018

लगाया दिल बहुत पर दिल लगा नहीं.... Lagaya Dil

बहुत दिनों से एक शाम मेरे नाम पर जो चुप्पी छाई थी उसकी वज़ह थी यात्राएँ और उनकी तैयारियाँ। इस बीच में कई अच्छी फिल्में आई हैं जिनका संगीत काफी सराहा गया है। उनमें एक तो है अनु मलिक की सुई धागा जिसके कुछ गाने आप अगली वार्षिक संगीतमाला में जरूर सुनेंगे। इसी तरह पटाखा और मंटो के अलग तरह के विषयों पर आधारित होने के कारण श्रोताओं को इन फिल्मों से नया सुनने को मिल सकता है। ये तो हुई हिंदी फिल्मों की बात लेकिन आज मैं आपको एक हल्का फिल्मा गैर फिल्मी गीत सुनाने जा रहा हूँ जो सुनने में तो मधुर है ही और युवाओं को तो और भी पसंद आएगा।


ये गीत है लगाया दिल बहुत पर दिल लगा नहीं..जो इस साल अप्रैल में रिलीज़ हुआ था । गीत के बोल तो बेहद सहज थे पर मशहूर गायक सज्जाद अली की आवाज़ का जब इन शब्दों का साथ मिला तो उनका वज़न ही कुछ और हो गया। आप तो जानते ही हैं कि सज्जाद की आवाज़ का मैं शैदाई रहा हूँ। इस ब्लॉग में आप उनकी आवाज़ में गाए कुछ बेमिसाल नग्मे दिन परेशां है रात भारी है, हर जुल्म तेरा याद है भूला तो नहीं हूँ, मैंने इक किताब लिखी है, तुम नाराज़ हो पहले भी सुन चुके हैं।

सज्जाद की आवाज़ में जो ठहराव है वो श्रोताओं को अपनी ओर खींच ही लेता है। आप बस उनकी आवाज़ सुनते हैं खो जाते हैं। अपने गीतों में वो गिटार का बेहद खूबसूरत इस्तेमाल करते हैं। कई दफ़े अपने गीतों को वो लिखते भी ख़ुद हैं। इस गीत को भी उन्होंने ही लिखा और शायद अपने स्कूल और कॉलेज के उन दिनों को याद कर के लिखा होगा जब बतौर इंसान समझने की कोशिश में लगे रहते हैं कि इश्क़ आख़िर चीज़ क्या है पर उसका अक़्स समझते समझते ज़िदगी बीत जाती है। उम्र के इस दौर में युवाओं के मन में चलते उहापोह को सज्जाद ने
 इस गीत के ज़रिए टटोलना चाहा है।

लगाया दिल बहुत पर दिल लगा नहीं
तेरे जैसा कोई हमको मिला नहीं

ज़माने भर की बातें उनसे कह दीं
जो कहना चाहिए था वो कहा नहीं

वो सच में प्यार था या बचपना था
मोहब्बत हो गयी थी क्या पता नहीं

वो मुझको लग रहा था प्यार मेरा
वो जैसा लग रहा था वैसा था नहीं

ना रोया था बिछड़ने पर मैं उनके
मगर हाँ ज़िदगी में फिर हँसा नहीं

ये तोहफे हैं जो अपनों से मिले हैं 
हमें गैरों से कोई भी गिला नहीं


इस गीत की रचना के समय सज्जाद ने कुल आठ अशआर लिखे थे जिसमें तीन गीत की लंबाई को कम रखने के लिए हटा दिए गए। पर जो अशआर हटाए गए उनमें एक में सज्जाद शायर जॉन एलिया की तारीफ करते नज़र आए हैं कि उनके जैसा कुछ पढ़ा नहीं..

गलत निकला जो बचपन में सुना था
वफ़ा का अज्र मिलता है सजा नहीं

अगर कुछ रह गया है तो बता दो
कहो क्या रह गया है क्या किया नहीं

अगर पढ़ने लगो तो जॉन पढ़ना
बड़े शायर पढ़े ऍसा पढ़ा नहीं





वैसे बतौर गायक सज्जाद की आवाज़ आपको कैसी लगती है और उनका गाया आपका पसंदीदा नग्मा कौन सा है?

Sunday, September 02, 2018

अटल बिहारी बाजपेयी : क्या खोया, क्या पाया जग में... Kya Khoya Kya Paya Jag Mein

स्कूल के ज़माने से जब भी मुझसे पूछा जाता कि तुम्हारे सबसे प्रिय राजनेता कौन हैं तो हमेशा मेरा उत्तर अटल बिहारी बाजपेयी होता था। शायद उस वक़्त मेरी जितनी भी समझ थी वो मुझे यही कहती थी कि एक नेता को दूरदर्शी, मेहनती, कुशल वक्ता और लोगों से सहजता से घुलने वाला हँसमुख इंसान होना चाहिए। मोरारजी, इंदिरा, चरण सिंह, आडवाणी, नरसिम्हा राव, चंद्रशेखर जैसों की भीड़ में मुझे ये गुण सिर्फ अटल जी में ही नज़र आते थे।

मुझे लगता है कि अगर नब्बे के दशक की शुरुआत से बहुमत के साथ प्रधानमंत्री पद की जिम्मेवारी मिली होती तो उनके नेतृत्व में देश एक सही दिशा और दशा में अग्रसर होता। ख़ैर वो हो न सका और अपनी पहली पारी में कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में काम करने के बाद भी वो अपनी दूसरी पारी में पराजित हो गए। फिर तो ढलते स्वास्थ ने उन्हें राजनीतिक परिदृश्य से बाहर ही कर दिया और पिछले महीने वो इस लोक से ही विदा ले गए।

अटल जी एक राजनीतिज्ञ तो थे ही, विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह ही उनके मन में एक कवि हृदय बसता था। प्रकृति से उनके प्रेम का आलम ये था कि प्रधानमंत्री के कार्य का दायित्व निर्वाह करते हुए भी वो साल में एक बार मनाली की यात्रा करना नहीं भूलते थे।
1977 की बात है जब इमंरजेसी के बाद हुए चुनाव में मोरारजी भाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। अटल जी उस ज़माने में देश के विदेश मंत्री थे। उन्हीं दिनों का एक रोचक प्रसंग है जो मैंने और शायद आपने भी कई बार पढ़ा हो। जब जब मैं ये किस्सा पढ़ता हूँ तो चेहरे पर मुस्कान के साथ बतौर इंसान अटल जी के प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ जाती है इसलिए इस पत्राचार को आज अपने ब्लॉग पर सँजो लिया है।

अटल जी ने तब एक कविता लिखी थी और अपने मातहत के जरिये उन्होंने उसे साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपने के लिए उसके तात्कालिक संपादक मनोहर श्याम जोशी को भेजा। जब बहुत दिनों तक जोशी जी की ओर से कोई जवाब नहीं आया तो अटल जी से रहा नहीं गया और उन्होंने एक कुंडली के माध्यम से बड़े मोहक अंदाज़ में जोशी जी से अपनी शिकायत दर्ज करवाई।
"प्रिय संपादक जी, जयराम जी की…समाचार यह है कि कुछ दिन पहले मैंने एक अदद गीत आपकी सेवा में रवाना किया था। पता नहीं आपको मिला या नहीं...नीका लगे तो छाप लें नहीं तो रद्दी की टोकरी में फेंक दें। इस सम्बंध में एक कुंडली लिखी है..
कैदी कवि लटके हुए, संपादक की मौज,
कविता 'हिंदुस्तान' में, मन है कांजी हौज,
मन है कांजी हौज, सब्र की सीमा टूटी,
तीखी हुई छपास, करे क्या टूटी-फूटी,
कह क़ैदी कविराय, कठिन कविता कर पाना,
लेकिन उससे कठिन, कहीं कविता छपवाना!"
मनोहर श्याम जोशी भी एक जाने माने लेखक व पत्रकार थे। बाजपेयी जी ने कविता के माध्यम से शिकायत की थी तो वो भला क्यूँ पीछे रहते। उन्होंने भी जवाब में एक कविता लिख मारी जिसका मजमूँ कुछ यूँ था।
"आदरणीय अटलजी महाराज,
आपकी शिकायती चिट्ठी मिली, इससे पहले कोई एक सज्जन टाइप की हुई एक कविता दस्ती दे गए थे कि अटलजी की है। न कोई खत, न कहीं दस्तखत...आपके पत्र से स्थिति स्पष्ट हुई और संबद्ध कविता पृष्ठ 15 पर प्रकाशित हुई। आपने एक कुंडली कही तो हमारा भी कवित्व जागा -  
कह जोशी कविराय नो जी अटल बिहारी,
बिना पत्र के कविवर,कविता मिली तिहारी,
कविता मिली तिहारी साइन किंतु न पाया,
हमें लगा चमचा कोई,ख़ुद ही लिख लाया,
कविता छपे आपकी यह तो बड़ा सरल है,
टाले से कब टले, नाम जब स्वयं अटल है।"
अटल जी की कविताओं को सबसे पहले जगजीत सिंह ने अपने एलबम संवेदना में जगह दी थी। इस एलबम में अटल जी की कविताओं का प्राक्कथन अमिताभ बच्चन की आवाज़ में था। बाद में लता मंगेशकर जी ने भी अटल जी की कविताओं को अपना स्वर दिया। मुझे जगजीत जी से ज्यादा लता की आवाज़ में अटल जी की कविताओं को सुनना पसंद है। तो आइए आज आपको सुनाएँ लता जी की आवाज़ में उनकी कविता क्या खोया क्या पाया जग में..

क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

जन्म-मरण का अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा
अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!


संवाद की जो गरिमा अटल जी की खासियत थी वो आज के माहौल में छिन्न भिन्न हो चुकी है। अटल जी को सच्ची श्रद्धांजलि तो यही होगी कि नेता उनकी तरह व्यक्तिगत आक्षेप लगाए बिना वाकपटुता और हास्य के पुट के साथ बहस करना सीख सकें।
सदन और उसके बाहर दिए गए उनके भाषण, उनके व्यक्तित्व का चुटीलापन और उनकी ओजपूर्ण वाणी में पढ़ी उनकी कविताएँ व्यक्तिगत रूप से हमेशा मेरी स्मृतियों का हिस्सा रहेंगी..शायद आपकी भी रहें। चलते चलते उनके इस जज्बे को सलाम..

मैं जी भर कर जिया, मैं मन से मरूँ
लौटकर आऊँगा कूच से क्यूँ डरूँ

Tuesday, August 07, 2018

घने बदरा... चलिए याद करें बारिश के गीतों को सोना महापात्रा की इस मानसूनी पेशकश के साथ Ghane Badra

सावन की रिमझिम मेरे शहर को आए दिन भिंगो रही है। पिछले महीने शादी में पटना जाना हुआ तो गर्मी और उमस में एक पल चैन की नींद ले पाना दूभर हो गया। वहीं यहाँ राँची में जब से सावन की झड़ी शुरु हुई तो फिर रुक रुक कर फुहारें तन को शीतल कर  ही रही हैं। पिछले हफ्ते से तो आलम ये है कि अगर खिड़की खोल दें तो पंखे बंद कर मोटी चादर ओढ़ने की नौबत आ जा रही है। अब ये सब कह के आपको जलाने का मन नहीं था मेरा। मैं तो आपके मूड को थोड़ा मानसूनी बनाना चाहता था ताकि जब मैं आपसे बरसाती गीतों की चर्चा करूँ तो आप भी कानों में उनकी फुहार सुन मेरे साथ भींगते चलें।



हिंदी फिल्मों में अगर ऐसे गीतों को याद करूँ तो सबसे पहले लता दी के गाए गीत ही ज़हन में मँडराने लगते हैं।  अब भला ओ सजना बरखा बहार आई और रात भी कुछ भींगी भींगी चाँद भी है कुछ मद्धम मद्धम और रिमझिम गिरे सावन जैसे बेमिसाल गीतों को कैसे भुलाया जा सकता है। किशोर दा के गाए बरसाती गीतों का जिक्र तो यहाँ किया ही था। तलत महमूद का लता जी के साथ गाया अहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिए मुझे बेहद प्रिय है। मुकेश ने भी बरखा रानी ज़रा जम के बरसो..मेरा दिलवर जा ना पाए ज़रा झूम कर बरसो से बहुतों का दिल जीता था वहीं रिमझिम के तराने ले के आई बरसात में रफ़ी की आवाज़ थी।

बरसात की यादों से ग़ज़लें भी अछूती नहीं रही हैं। तलत अज़ीज़ की गाई ग़ज़ल रसात की भींगी रातों में फिर कोई सुहानी याद आई हो या फिर जगजीत सिंह की वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी हमेशा से संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करती रही हैं।

वैसे बिना बादल कैसी बारिश? बादल ही तो ये अहसास कराते हैं कि आने वाली बारिश का क्या रूप होगा? इसलिए फिल्मी गीतों में बरखा की तरह काली घटाओं और बादलों का जिक्र आम है और उन्हें पुकारने का सबसे कोमल शब्द रहा है बदरा। बदरा में जितना अपनापन है वो बादल या मेघ में कहाँ? बदरा की बात से मुझे दो और गीत तुरंत याद पड़ते हैं। पहला तो लता जी का गाया नैनों में बदरा छाए, बिजली सी चमके हाए..ऐसे में सजन मोहे गरवा लगा ले और दूसरा आशा जी का गाया फिर से अइयो बदरा बिदेसी तेरे पंखों पे मोती जड़ूँगी भर के जइयो हमारी कलैया मैं तलैया किनारे मिलूँगी।  क्या कमाल के गीत थे ये दोनों भी। जितना भी सुनों मन नहीं भरता।

पर ये तो गुज़रे दिनों की बातें थीं। इस मौसम का मिज़ाज ही कुछ ऐसा है कि आज भी ये लोगों को नए नए गीत रचने को बाध्य कर रहा है और आज ऐसे ही एक गीत को सुनवाने का इरादा है जो कि एक बार फिर  "बदरा" के इर्द गिर्द रचा गया है। इस गीत को गाया है सोना महापात्रा ने और धुन बनाई है राम संपत ने। जी हाँ ये गीत लाल परी मस्तानी श्रृंखला का हिस्सा है जिसमें हर महीने सोना अपनी एक नई पेशकश श्रोताओं के सामने ला रही हैं।
पता नहीं बरखा की बूँदों में ऐसा क्या है कि उनका स्पर्श हमें कभी खुशी के अतिरेक में ले जाता है तो कभी टिप टिप गिरते पानी की ध्वनि मन में उदासी की लहरें पैदा करने लगती हैं और मन उसमें डूबने सा लगता है। मुन्ना धीमन ने बादलों का बिंब लेते हुए ऐसा ही कुछ भाव रचना चाहा है इस गीत में।

अगर इस गीत की भावनाओं को समझना चाहते हैं तो किसी मानसूनी दिन में सफ़र पर निकलिए। जब इन बादलों की नर्म मुलायम बाहें आपका रास्ता काटेंगी आप खुशी से अंदर तक नम हो जाएँगे। वहीं कभी आपको ये बादल ऐसा भी आभास देगा कि वो अपनी कालिमा के भीतर ढेर सारे दुख समेटे है ठीक वैसे ही जैसे आप अपनी पीड़ा आँखों की कोरों में छुपाए घूमते हैं। इसलिए मुन्ना लिखते हैं

बदरा के सीने में, सीने में जल धड़के
बैठा है नयनों में नयनों में चढ़ चढ़ के
बरसेगा बरसेगा आज नहीं तो कल



सोना की गहरी आवाज़ का मैं हमेशा से शैदाई रहा हूँ। राम संपत की मधुर धुन के बीच वो एक मरहम का काम करती है। संजय दास का बजाया गिटार मूड को अंत तक बनाए रखता है। हालांकि मुझे लगता है कि मुखड़े में एक ही भाव के दोहराव से मुन्ना बच सकते थे। फिर भी कुल मिलाकर ये गीत कानों में एक मीठी छाप छोड़ जाता है। सोना इस गीत के बारे में लिखती हैं कि इसे मुंबई के एक मानसूनी दिन में रचा गया था और आज भी मेरी खिड़की के बाहर बादल ठंडी हवाओं के साथ अठखेलियाँ कर रहे हैं। तो आइए कुछ पल ही सही उड़ें इस घने बदरा के साथ.

बदरा.... बदरा.... बदरा....
छाये रे घने बदरा, छाये रे घने बादल
छाये क्यूँ घने बदरा, छाये क्यूँ घने बादल
कहीं पे बरसने को घूमे ये हुए पागल

अपनी हँसी में भी शामिल किया मुझको
अपनी खुशी में भी हिस्सा दिया मुझको
जहाँ तू अकेला है वहाँ भी मुझे ले चल
छाए रे घने बदरा, छाए रे घने बादल....

बदरा के सीने में, सीने में जल धड़के
बैठा है नयनों में नयनों में चढ़ चढ़ के
बरसेगा बरसेगा आज नहीं तो कल

बदरा.... बदरा.... बदरा....

Friday, July 27, 2018

जब नूरजहाँ की दिलकश आवाज़ का साथ मिला नासिर काज़मी की ग़ज़लों को.. Nasir Kazmi and Noor Jehan

पिछले हफ्ते आपको मैंने नूरजहाँ का गाया एक गीत सुनवाया था और ये वादा भी किया था कि उन्हीं की आवाज़ में मकबूल शायर नासिर काज़मी साहब की कुछ ग़ज़लों को आपके सामने लाऊँगा। नासिर साहब की पैदाइश पंजाब के अंबाला की थी। आजादी के बाद वो लाहौर जाकर बस गए। फिर पहले कुछ साल पत्रकारिता और साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन का काम किया। बाद में वो रेडियो पाकिस्तान से भी जुड़े।

यूँ तो नासिर साहब की लिखी ग़ज़लों को लगभग हर बड़े फ़नकार ने गाया है पर मेरा उनकी शायरी से प्रथम परिचय गुलाम अली की वज़ह से अस्सी के दशक में हुआ। ये वो जमाना था जब कैसेट्स की जगह बाजार में एल पी रिकार्ड बिका करते थे। तब पैनासोनिक के टेपरिकार्डर भी नेपाल से मँगाये जाते थे। हमारे भी एक रिश्तेदार नेपाल से सटे बिहार के मोतिहारी जिले से ताल्लुक रखते थे। काम के सिलसिले में उनका नेपाल में आना जाना लगा रहता था। उन्हीं से कहकर हमारे घर में तब कुछ कैसेट्स मँगवाए गए थे। इनमें ज्यादातर कैसेट्स भारत और पाकिस्तानी कलाकारों द्वारा लंदन के रॉयल अलबर्ट हॉल में किये गए कार्यक्रमों के थे।


उसी में एक कैसेट था गुलाम अली साहब का था जिसमें अकबर इलाहाबादी की हंगामा हैं क्यूँ बरपा, मोहसीन नकवी की इतनी मुद्दत बाद मिले हो और आवारगी के साथ नासिर काज़मी साहब की मशहूर ग़ज़ल दिल में इक लहर सी उठी है अभी..कोई ताज़ा हवा चली है अभी.... भी शामिल थी। गुलाम अली ने अपने खास अंदाज़ में इस ग़ज़ल को यूँ गाया था मानो आवाज़ में लहरे उठ रही हों। छोटी बहर की ग़ज़लों में नासिर साहब को कमाल हासिल था। उनकी इस ग़ज़ल के चंद शेर जो मुझे बेहद पसंद आए थे वो थे

कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी
और ये चोट भी नई है अभी

भरी दुनिया में जी नहीं लगता
जाने किस चीज़ की कमी है अभी

सो गये लोग उस हवेली के
एक खिड़की मगर खुली है अभी

अस्सी के दशक में ही गुलाब अली साहब ने आशा जी के साथ मिल कर एलबम किया। एलबम का नाम था मेराज ए ग़ज़ल। एलबम की बारह ग़ज़लों में एक तिहाई पर नासिर काज़मी का नाम था। उस एलबम में नासिर साहब की जो ग़ज़ल सबसे ज्यादा बजी उसका मतला कुछ यूँ था गए दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो...अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो।  बड़ी बहर की इस ग़ज़ल में नासिर साहब ने जो शेर लिखे थे वो वाहवाही के हक़दार थे। अब देखिये एक ही ग़ज़ल में दो ऐसे शेर थे जो ख़्याल में एक दूसरे से बिल्कुल जुदा हैं। 

पहले शेर में आलम ये है कि नासिर साहब को ग़म और खुशी दोनों में अपने हमदम की यादें बेचैन करती थीं । बाग का हर फूल उसकी खुशबू की गवाही देता था। कानों में सुनाई देने वाला हर गीत मानो ऐसा लगता कि उसी के लिए लिखा गया हो।

ख़ुशी की रुत हो कि ग़म का मौसम नज़र उसे ढूँढती है हर दम
वो बू-ए-गुल था कि नग़मा-ए-जान मेरे तो दिल में उतर गया वो

वहीं एक अलग ही रंग सामने आ जाता है दूसरे शेर में जब वही प्रियतम यादों से उतरने लगता है। अब तो ना उसकी यादें परेशान करती हैं और ना ही उन उदास सावन की रुतों में उसका इंतज़ार खलता है। हाँ एक हल्की सी कसक दिल में उठती है जब उसका जिक्र आता है पर ये कसक अब कोई पीड़ा नहीं देती। कष्ट हो तो कैसे उसके दिए जख्म भर जो चुके हैं।

न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा
यूँ ही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो

नासिर साहब को घुड़सवारी और शिकार तो भाते  थे ही उन्हें घूमने का भी बड़ा शौक था। गाँवों में विचरना, नदी के किनारे टहलना, पेड़ों और पंक्षियों को निहारना और पहाड़ों में वक़्त बिताना उन्हें खासा पसंद था। वे कहा करते थे कि यही वो वक़्त होता था जब वो प्रकृति के करीब होते और कविता हृदय में आकार लेती। प्रकृति के बदलते रूपों पर मनुष्य की कभी पकड़ तो रही नहीं पर उन गुजरते खूबसूरत लमहों को शब्दों के जाल में तो बाँधा जा ही सकता था। नासिर साहब ने इन्हीं पलों को क़ैद करने के लिए कविता लिखनी शुरु की।

ख़ैर हम बातें कर रहे थे उनकी ग़ज़लों की। नासिर साहब की लिखी एक ग़ज़ल जो उदासी के लमहों में हमेशा मेरे साथ होती थी वो थी दिल धड़कने का सबब याद आया .. वो तेरी याद थी अब याद आया। इसे  पहली बार मैंने पंकज उधास की आवाज़ में सुना था और तभी से इसका मतला जुबाँ पर चढ़  गया  था। बाद में इसे जब नूरजहाँ की दिलकश आवाज़ में सुना तो इस ग़ज़ल का दर्द और उभर आया। 

नासिर काज़मी की ग़ज़लों की खासियत उनका सरल लहजा है़। पर इस सरल लहजे में गहरी बात कहने का जो हुनर उनके पास था वो आप इन अशआरों में ख़ुद ही महसूस कर सकते हैं। जब किसी की याद बुरी तरह सताए तो बस इस ग़ज़ल के साथ अपने को बहा दीजिए, आँसुओं के साथ साथ दिल का खारापन भी जाता रहेगा।

दिल धड़कने का सबब याद आया 
वो तेरी याद थी अब याद आया 

आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त 
तू मुसीबत में अजब याद आया 

दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से 
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया 

तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा 
मर रहेंगे अगर अब याद आया 

फिर कई लोग नज़र से गुज़रे 
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया 

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन 
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया

बैठ कर साया-ए-गुल में "नासिर"
हम बहुत रोये वो जब याद आया 


यूँ तो इस ग़ज़ल को नूरजहाँ के आलावा गुलाम अली, जगजीत सिंह, आशा भोसले और पंकज उधास ने भी  गाया है पर जो असर नूरजहाँ की आवाज़ का है वो और कहीं नहीं मिलता।


नासिर साहब की लिखी और नूरजहाँ की गाई एक और मशहूर ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है। ये ग़ज़ल है नीयत-ए-शौक़ भर न जाये कही.....  तू भी दिल से उतर न जाये कहीं । दरअसल हम जिसे चाहते हैं उसे कोसते भी हैं तो कभी उसकी चिंता में घुलते रहते  हैं। ऐसे ही विपरीत मनोभावों को नासिर ने इस ग़ज़ल में जगह दी है। मतले में अपने प्रिय से जी भर जाने की बात करते हैं और फिर ये आरजू भी व्यक्त कर देते हैं कि प्रियतम जब लौट कर आए तो उन्हें छोड़ कर ना जाए। 


नीयत-ए-शौक़ भर न जाये कहीं 
तू भी दिल से उतर न जाये कहीं 

आज देखा है तुझे देर के बाद 
आज का दिन गुज़र न जाये कहीं 

न मिला कर उदास लोगों से 
हुस्न तेरा बिखर न जाये कहीं 

आरज़ू है के तू यहाँ आये 
और फिर उम्र भर न जाये कहीं 

आओ कुछ देर रो ही लें "नासिर"
फिर ये दरिया उतर न जाये कहीं


नासिर साहब की लिखी कोई और ग़ज़ल जो आपको पसंद हो तो बताएँ। मुझे जानकर खुशी होगी।

Monday, July 09, 2018

जो न मिल सके वही बेवफा, ये बड़ी अजीब सी बात है Jo Na Mil Sake Wahi Bewafa

पिछले हफ्ते मशहूर शायर नासिर काज़मी की कुछ ग़ज़लें तलाश कर रहा था कि भटकते भटकते इस गीत पर जा कर मेरे कानों की सुई अटक गयी। इक प्यारा सा दर्द था इस गीत में जो एकदम से दिल में उतरता चला गया। पहली बार सुना था ये नग्मा तो उत्सुकता हुई पता करने कि इसे किसने  लिखा है? कुछ जाल पृष्ठों पर गीतकार ख़्वाजा परवेज़ का नाम देखा। बाद में ये जानकारी हाथ लगी कि मलिका ए तरन्नुम नूरजहाँ के गाए सैकड़ों गीतों में ख़्वाजा परवेज़ ही गीतकार रहे हैं।

जिन्होंने ख़्वाजा परवेज़ का नाम पहली बार सुना है उनको बता दूँ कि ख़्वाजा परवेज़ का वास्तविक नाम गुलाम मोहिउद्दीन था और उनकी पैदाइश पंजाब के अमृतसर जिले में हुई थी। परवेज़ साहब का नाम पाकिस्तान के अग्रणी गीतकारों में लिया जाता है। अपने चार दशकों के फिल्मी जीवन में उन्होंने पंजाबी और उर्दू में करीब आठ हजार से ऊपर गीत लिखे। वे एक संगीतकार भी थे। उनके लिखे तमाम गीतों को नूरजहाँ के आलावा मेहदी हसन, नैयरा नूर, रूना लैला जैसे अज़ीम फनकारों ने अपनी आवाज़ दी। मेहदी हसन का गाया गीत जब कोई प्यार से बुलाएगा.. तुमको एक शख़्स याद आएगा  भी ख़्वाजा परवेज़ का ही लिखा है।



परवेज़ साहब ने इस गीत किसी के ज़िदगी में आकर चले जाने के बाद की मनःस्थितियों को सहज शब्दों में बड़ी बारीकी से पकड़ा है। ऐसे किसी शख़्स को एकदम से भूल कहाँ पाते हैं। वो नज़रों से ओझल तो रहता है पर उसके साथ बिताए लमहों की गर्माहट दिल को रौशन करती रहती है। ये रोशनी रह रह कर हमारा मन पुलकित करती रहती है और इस दौरान हम इस बात को भी भूल जाते हैं कि वो इंसान अब हमारे साथ नहीं है। इसीलिए परवेज़ लिखते हैं..

मेरी जुस्तज़ू को खबर नहीं, न वो दिन रहे न वो रात है
जो चला गया मुझे छोड़ कर वही आज तक मेरे साथ है

जब हम आपनी ख्यालों की दुनिया से बाहर निकलते हैं तो अपने अकेलेपन का अहसास  दिल में इक हूक सी उठा देता  है और मन में दर्द का सैलाब उमड़ पड़ता है। एक साथ कई शिकायतें सर उठाने लगती हैं पर फिर भी उसके अस्तित्व का तिलिस्म टूटता नहीं। देखिए गीतकार की कलम क्या खूब चली है इन भावों को व्यक्त करने में.

करे प्यार लब पे गिला न हो, ये किसी किसी का नसीब है
ये करम है उसका ज़फा नहीं, वो जुदा भी रह के करीब है
वो ही आँख है मेरे रूबरू, उसी हाथ में मेरा हाथ है
जो चला गया मुझे छोड़ कर वही आज तक मेरे साथ है

नूरजहाँ ने तो अपनी आवाज़ से परवेज़ जी के इस गीत को यादगार बनाया ही है। पर उनकी आवाज़ में जो ठसक है उसे सुनकर ऐसा लगता है कि किसी महीन मुलायम सी आवाज़ में ये गीत और जमता। हालांकि इंटरनेट पर मैंने कई अन्य गायकों को भी इस गीत पर अपना गला आज़माते सुना पर उनमें नूरजहाँ का वर्सन ही सबसे शानदार लगा। उम्मीद है कि किसी भारतीय कलाकार की आवाज़ से भी ये गीत निखरेगा। गीत का संगीत भी बेहद मधुर है। तबले की संगत तो खास तौर पर कानों को लुभाती है।  तो आइए सुनते हैं ये प्यारा सा नग्मा।


जो न मिल सके वही बेवफा, ये बड़ी अजीब सी बात है
जो चला गया मुझे छोड़ कर वही आज तक मेरे साथ है
जो न मिल सके वो ही बेवफा ...

जो किसी नज़र से अता हुई वही रौशनी है ख्याल में
वो न आ सके रहूँ मुंतज़र, ये खलिश कहाँ थी विसाल में
मेरी जुस्तज़ू को खबर नहीं, न वो दिन रहे न वो रात है
जो चला गया मुझे छोड़ कर वही आज तक मेरे साथ है
जो न मिल सके वो ही बेवफा ...

करे प्यार लब पे गिला न हो, ये किसी किसी का नसीब है
ये करम है उसका ज़फा नहीं, वो जुदा भी रह के करीब है
वो ही आँख है मेरे रूबरू, उसी हाथ में मेरा हाथ है
जो चला गया मुझे छोड़ कर वही आज तक मेरे साथ है
जो न मिल सके वो ही बेवफा ..

मेरा नाम तक जो न ले सका, जो मुझे क़रार न दे सका
जिसे इख़्तियार तो था मगर, मुझे अपना प्यार न दे सका
वही शख्स मेरी तलाश है, वही दर्द मेरी हयात है
जो चला गया मुझे छोड़ कर वही आज तक मेरे साथ है
जो न मिल सके वो ही बेवफा...

नूरजहाँ की आवाज़ का साथ अभी कुछ दिन और रहेगा। अभी तो आपने उनकी आवाज़ में ये गीत सुना। आपकी कुछ शामों को नासिर काज़मी जी की लिखी ग़ज़लों से सुरीला बनाने का मेरा इरादा है।

Sunday, June 24, 2018

हुण मैं अनहद नाद बजाया.. अपने दिल का हाल सुनाया Anhad Naad by Sona Mohapatra

सोना महापात्रा एक ऐसी आवाज़ की मालकिन हैं जो सुरीलेपन के साथ साथ भरपूर उर्जा से भरी है। उनकी आवाज़ से मेरी पहली दोस्ती उनके गैर फिल्मी एलबम सोना के गीत अभी ना ही आना सजना मोहे थोड़ा मरने दे, इंतजार करने दे से हुई थी और उसके बाद तो ये बंधन फिर छूटा ही नहीं । वो एक ऐसी कलाकार हैं जिन्होंने हिंदी फिल्मी गीतों के इतर अपना मुकाम बनाया। चाहे उनके हिंदी पॉप एलबम हों या टीवी शो सत्यमेव जयते और कोक स्टूडिओ  के लिए उनके गाए गीत उनकी आवाज़ हमेशा चर्चा में रही। हिंदी फिल्मों में उनको अपने हुनर के हिसाब से काम नहीं मिला पर इसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की। अम्बरसरिया, नैना, मन तेरा जो रोग है जैसे यादगार गीतों को आवाज़ देने वाली सोना ने अपने पति और संगीतकार राम संपत के साथ मिलकर  लाल परी मस्तानी के नाम से संगीत की एक नई यात्रा शुरु की है जिसके गीतों में अपने व्यक्तित्व के विविध रंगों को प्रकट करेंगी। अब तक इस श्रृंखला के तीन गीत आ चुके हैं। 

पहला गीत श्याम के रंग में रँगी मीरा का प्रेम अनुरोध था जिसे श्याम पिया के नाम से रिलीज़ किया गया जबकि दूसरा अमीर खुसरों का लिखा गीत तोरी सूरत के बलिहारी  निजामुद्दीन औलिया को समर्पित था। ये गीत तो अपनी जगह प्यारे थे ही पर इस श्रृंखला का जो तीसरा गीत पिछले हफ्ते आया वो एक बार ही सुनकर मन में ऐसा रच बस गया है कि निकलने का नाम ही नहीं लेता। बुल्ले शाह और कबीर के सूफी रंगों में समाया ये गीत है अनहद नाद और इसे लिखा सोना और राम संपत की टीम के स्थायी सदस्य मुन्ना धीमन ने। 


पर इससे पहले की हम इस गीत के बारे में कुछ और बातें करें ये जानना आपके लिए दिलचस्प होगा कि आख़िर इस श्रृंखला को सोना ने लाल परी मस्तानी का नाम क्यूँ दिया है? सोना इस बारे में अपने साक्षात्कारों कहती रही हैं कि

"ये दिल्ली की बात है जब मैं एक गेस्ट हाउस में ठहरी थी। वहाँ संसार के विभिन्न भागों से आए अन्य यात्री भी ठहरे थे। उनमें एक फ्रेंच महिला भी थी जो अफगानिस्तान से आई थी। उसने मुझे बताया कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान की जो सीमा है वो सूफी संगीत का एक मुख्य केंद्र था। जब वहाँ तालिबान आए तो उन्होंने संगीत पर रोक लगा दी और औरतों को घर के अंदर बुर्कों में रहने की सख्त ताकीद कर दी। वहाँ एक औरत सदा लाल लिबास में रहती थी। वो एक बेखौफ़ स्त्री थी जो तालिबान की परवाह किए बिना दरगाह में गाती रही। उसके द्वारा बताई ये छवि मेरे दिमाग में छप सी गयी। एक ऐसी स्त्री की छवि जो तालिबान की कालिमा को ललकारती हुई गाती रही , नाचती रही ये कहते हुए कि संगीत हराम नहीं है। पन्द्रह साल पहले की इस घटना ने मेरे दिमाग में लाल परी मस्तानी का रूप गढ़ दिया।
मुझे लाल रंग से प्यार रहा है। हमारी संस्कृति में इसका बहुत महत्त्व रहा है। मेरे लिए लाल रंग शक्ति, नारीत्व और उर्जा का प्रतीक है। मेरे प्रशंसक भी लाल रंग से मेरे प्रेम की वजह से  मुझे लाल परी मस्तानी के नाम से संबोधित करते थे और इसीलिए इस सिलसिले को मैंने लाल परी मस्तानी का नाम दिया है।"

इस गीत का शीर्षक है अनहद नाद। ये अनहद नाद आख़िर है क्या? शाब्दिक रूप से देखें तो अनहद मतलब जिसकी कोई हद ना हो और नाद मतलब ध्वनि। यानि ऐसी ध्वनि जिसका कोई अंत ना हो। अध्यात्म में अनहद नाद उस अवस्था को कहते हैं जब व्यक्ति ध्यान में यूँ मगन हो जाता है कि उसे बाहरी ध्वनियाँ नहीं सुनाई देतीं। मन को इतनी गहरी चुप्पी में ले जाते हैं कि सुनाई देता है तो सिर्फ अंदर का मौन।

ड्रम पर हैं बैंगलोर के यदुनंदन नागराज

मुन्ना धीमन इस गीतों के बोलों में ध्यान की इसी अवस्था का जिक्र करते हुए दिल के  प्रफुल्लित होने की बात करते हैं। इस अवस्था का अहसास कुछ ऐसा है जो बारिश में पेड़ को नहाते वक्त होता होगा, जो रोम रोम के तरंगित होने से होता होगा। मुन्ना ने इस अहसास को दूसरे अंतरे में जिस तरह एक पंक्षी को कंधे पे रखने या नदिया को गोद में उठाने की कल्पना से जोड़ा है उसे सोना की आवाज़ में सुनकर मन सच में आनंद विभोर हो उठता है।
सोना और राजस्थान के ढोल वादक 

राम संपत ने पहली बार इस गीत को सोना और शादाब फरीदी की आवाज़ में कोक स्टूडियो सीजन चार में इस्तेमाल किया था पर वहाँ सोना की बुलंद आवाज़ के सामने शादाब की जुगलबंदी कुछ जम नहीं पाई थी। अपने इस नए रूप में इस बार गीत के वीडियो शूट के लिए जैसलमेर की गडसीसर झील को चुना गया। अब शूटिंग राजस्थान में थी तो संगीत को आंचलिक रंग देने के लिए वहाँ के स्थानीय ढोल वादकों को भी संगीत संयोजन में शामिल किया गया। चानन खाँ, स्वरूप खाँ, पापे खाँ और  सत्तार खाँ की चौकड़ी ने ड्रम्स के साथ गीत में जो रस घोला उसे आप गीत सुनते हुए महसूस कर सकेंगे। पर मुझे संगीत का टुकड़ा जो सबसे अधिक भाया वो था संचित चौधरी की वायलिन पर बजाई कमाल की धुन जो अंतरों के बीच में लगभग 1m 25s-1m 45s में आती है। 

हुण मैं अनहद नाद बजाया
अपने दिल का हाल सुनाया
हुण मैं अनहद नाद बजाया
अपने दिल का हाल सुनाया
हाल सुना के लुत्फ़ वो पाया
हो..जो बरखा विच पेड़ नहाया
हाए हाल सुना के लुत्फ़ वो पाया
हो..जो बरखा विच पेड़ नहाया
रोम रोम मेरे घुँघरू छनके
हो.. रोम रोम मेरे घुँघरू छनके
लोग कहें मस्ताना आया हुण मैं अनहद
हुण मैं अनहद नाद बजाया

अपने दिल का हाल सुनाया

नच नच मैं गलियाँ विच घूमा
इसदा उसदा माथा चूमा
हाय नच नच मैं गलियाँ विच घूमा
हो इसदा उसदा माथा चूमा
इक पंछी कंधे पर रक्खा
हो इक पंछी कंधे पर रक्खा
इक नदिया को गोद उठाया
हुण मैं अनहद
हुण मैं अनहद नाद बजाया..नाद बजाया
अपने दिल का हाल सुनाया..हाल सुनाया.

सोना ने जिस मस्ती के साथ इस गीत को निभाया है वो गीत को बार बार सुनने पर मजबूर कर देता है। तो आइए सुनें ये प्यारा सा नग्मा


 

एक शाम मेरे नाम पर सोना महापात्रा

Sunday, June 10, 2018

आ अब लौट चलें … कैसे गूँजा शंकर जयकिशन का शानदार आर्केस्ट्रा? Aa Ab Laut Chalein

पुराने हिंदी फिल्मी गीतों में अगर आर्केस्ट्रा का किसी संगीतकार ने सबसे बढ़िया इस्तेमाल किया तो वो थे शंकर जयकिशन। हालांकि उनके समकालीनों में सलिल चौधरी और बाद के वर्षों में पंचम ने भी इस दृष्टि से अपने संगीत में एक अलग छाप छोड़ी। पर जिस वृहद स्तर पर शंकर जयकिशन की जोड़ी वादकों की फौज को अपने गानों के लिए इक्ठठा करती थी और जो मधुर स्वरलहरी उससे उत्पन्न होती थी उसकी मिसाल किसी अन्य हिंदी फिल्म संगीतकार के साथ मिल पाना मुश्किल है। शंकर जयकिशन का आर्केस्ट्रा ना केवल गीतों में रंग भरता था पर साथ ही इस तरह फिल्म के कथानक के साथ रच बस जाता था कि आप फिल्माए गए दृश्य से संगीत को अलग ही नहीं कर सकते थे।

मिसाल के तौर पर फिल्म  "जिस देश में गंगा बहती है" के इस सदाबहार गीत आ अब अब लौट चलें को याद कीजिए। 1960 में बनी इस फिल्म का विषय चंबल के बीहड़ों में उत्पात मचा रहे डाकुओं को समाज की मुख्यधारा में वापस लौटाने का था। इस फिल्म के निर्माता थे राज कपूर साहब। राजकपूर की फिल्म थी तो शंकर जयकिशन की जोड़ी के साथ शैलेंद्र, हसरत जयपुरी, मुकेश और लता जैसे कलाकारों का जुड़ना स्वाभाविक था। कुछ ही दिनों पहले सोशल मीडिया पर शैलेंद्र के पुत्र दिनेश शंकर शैलेंद्र ने इस फिल्म से जुड़ी एक रोचक घटना सब के साथ बाँटी थी। दिनेश शंकर शैलेंद्र के अनुसार
"राजकपूर ने फिल्म की पटकथा बताने के लिए शंकर, जयकिशन, हसरत और मुकेश को आर के स्टूडियो के अपने काटेज में बुलाया था। राजकपूर ने  फिल्म की कहानी जब सुनानी खत्म की तो कमरे में सन्नाटा छा गया। अचानक शंकर ने चाय का कप टेबल पर दे मारा और गाली देते हुए उस ठंडे, धुँए भरे कमरे से बाहर निकल गए। सारे लोग उनके इस व्यवहार पर चकित थे। फिर राजकपूर ने शैलेंद्र से कहा कि जरा देखो जा के आख़िर पहलवान* को क्या हो गया? कहानी पसंद नहीं आई? शैलेन्द्र शंकर के पास गए और उनसे पूछा कि मामला क्या है? शंकर ने गालियों की एक और बौछार निकाली और फिर कहा कि डाकुओं की फिल्म में भला संगीत का क्या काम है? बना लें बिन गानों की फिल्म, हमें यहाँ क्यूँ बुलाया है? शैलेंद्र ने उन्हें समझाया कि इस फिल्म में भी गाने होंगे। सब लोग वापस आए और कहानी के हिसाब से गीतों के सही स्थान पर विचार विमर्श हुआ और अंततः फिल्म के लिए नौ गाने बने।" 

(*संगीतकार बनने से पहले शंकर तबला बजाने के साथ साथ पहलवानी का हुनर भी रखते थे 😊।)



तो बात शुरु हुई थी शंकर जयकिशन की आर्केस्ट्रा पर माहिरी से। आ अब लौट चलें के लिए शंकर जयकिशन ने सौ के करीब वायलिन वादकों को जमा किया था। साथ में कोरस अलग से। हालत ये थी कि तारादेव स्टूडियो जहाँ इस गीत की रिकार्डिंग होनी थी में इतनी जगह नहीं बची थी कि सारे वादकों को अंदर बैठाया जा सके। लिहाजा कुछ को बाहर फुटपाथ पर बैठाना पड़ा था। कहा जाता है कि इस गीत कि रिहर्सल डेढ़ दिन लगातार चली और इसीलिए परिणाम भी जबरदस्त आया।

आर्केस्ट्रा में बजते संगीत को ध्यान में रखते हुए निर्देशक राधू कर्माकर ने गीत की रचना की थी। ये गीत फिल्म को अपने अंत पर ले जाता है जब फिल्म का मुख्य किरदार डाकुओं को आत्मसमर्पण करवाने के लिए तैयार करवा लेता है। गीत में एक ओर तो डाकुओं का गिरोह अपने आश्रितों के साथ लौटता दिख रहा है तो दूसरी ओर पुलिस की सशंकित टुकड़ी हथियार से लैस होकर डाकुओं के समूह को घेरने के लिए कदमताल कर रही है। निर्देशक ने पुलिस की इस कदमताल को वायलिन और ब्रास सेक्शन के संगीत में ऐसा पिरोया है कि दर्शक संगीत के साथ उस दृश्य से बँध जाते हैं। संगीत का उतर चढाव भी ऐसा जो दिल की धड़कनों के  साथ दृश्य की नाटकीयता को बढ़ा दे। वायलिन आधारित द्रुत गति की धुन और साथ में लहर की तरह उभरते कोरस को अंतरे के पहले तब विराम मिलता है जब हाथों से तारों को एक साथ छेड़ने से प्रक्रिया से शंकर जयकिशन हल्की मधुर ध्वनि निकालते हैं। इस प्रक्रिया को संगीत की भाषा में Pizzicato कहते हैं। इस गीत में Pizzicato का प्रभाव आप वीडियो के 39 से 45 सेकेंड के बीच में सुन सकते हैं।

गिटार की धुन के साथ गीत गीत आगे बढ़ता है।  मुकेश तो खैर राजकपूर की शानदार आवाज़ थे ही, अंतरों के बीच कोरस के साथ लता का ऊँचे सुरों तक जाता लंबा आलाप गीत का मास्टर स्ट्रोक था। इस गीत में लता जी की कोई और पंक्ति नहीं है पर ये आलाप इतनी खूबसूरती से निभाया गया है कि पूरे गीत के फिल्मांकन में जान फूँक देता है। गीतकार शैलेंद्र की खासियत थी कि वो बड़ी सहजता के साथ ऐसे बोल लिख जाते थे जो सीधे श्रोताओं के दिल को छू लेते थी। गलत राह पे चलने से नुकसान की बात हो या समाज द्वारा इन भटके मुसाफ़िरों को पुनः स्वीकार करने की बात, अपने सीधे सच्चे शब्दों से शैलेंद्र ने गीत में एक आत्मीयता सी भर दी है। उनका दूसरे अंतरे में बस इतना कहना कि अपना घर तो अपना घर है आज भी घर से दूर पड़े लोगों की आँखों की कोरें गीला कर देगा।


आ अब लौट चलें, आ अब लौट चलें
नैन बिछाए बाँहें पसारे तुझको पुकारे देश तेरा
आ जा रे – आ आ आ

सहज है सीधी राह पे चलना
देख के उलझन बच के निकलना
कोई ये चाहे माने न माने
बहुत है मुश्किल गिर के संभलना
आ अब लौट चलें …

आँख हमारी मंज़िल पर है
दिल में ख़ुशी की मस्त लहर है
लाख लुभाएँ महल पराए
अपना घर फिर अपना घर है
आ अब लौट चलें …

इतना मधुर संगीत संयोजन करने के बाद भी ये गीत उस साल के फिल्मफेयर अवॉर्ड के लिए नामांकित नहीं हुआ। इसके संगीत संयोजन के बारे में शंकर जयकिशन पर आरोप लगा कि उनकी धुन उस समय रिलीज़ हुए इटालवी गीत Ciao Ciao Bambina से मिलती है। अगर आप वो गीत इटालवी में सुनें तो शायद ही आप इस साम्यता को पकड़ पाएँ। पर अलग से उस धुन सुनने के बाद तुझको पुकारे देश मेरा वाली पंक्ति गीत की धुन से मिलती दिखती है। पर इस हल्की सी प्रेरणा को नज़रअंदाज करें तो जिस तरह गीत को शंकर जयकिशन ने कोरस और लता के आलाप के साथ आगे बढ़ाया है वो उनके हुनर और रचनात्मकता को दर्शाता है।



शंकर जयकिशन कुछ शानदार गीतों की फेरहिस्त इस ब्लॉग पर आप यहाँ देख सकते हैं

Wednesday, May 23, 2018

इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा : जब मोत्सार्ट का रंग चढ़ा सलिल चौधरी पर Itna na mujhse tu pyar badha

सलिल चौधरी के गीतों के बारे में लिखते हुए पहले भी मैं आपको बता चुका हूँ कि कैसे उनका बचपन अपने डाक्टर पिता के साथ रहते हुए असम के चाय बागान में बीता। पिता संगीत के रसिया थे। उनके एक आयरिश मित्र थे जो वहाँ से जाते समय अपना सारा पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का खजाना सलिल दा के पिता को दे गए थे।  उनके संग्रह से ही सलिल को मोत्सार्ट, शोपिन, बीथोवन जैसे पश्चिमी संगीतकारों की कृतियाँ हाथ लगी थीं।

सलिल के गीतों की खास बात ये थी कि उनकी मधुरता लोक संगीत और भारतीय रागों से बहकर निकलती थी पर जो मुखड़े या इंटरल्यूड्स में वाद्य यंत्रों का संयोजन होता था वो पश्चिमी संगीत से प्रभावित रहता था । उन्होंने अपने कई गीतों में मोत्सार्ट (Mozart)) से लेकर शोपिन (Chopin) की धुन से प्रेरणा ली। आज के संगीतकार भी कई बार ऐसा करते हैं पर अपने आप को किसी धुन से प्रेरित होने की बात स्वीकारने में झिझकते हैं। आज के इस इंटरनेट युग में सलिल दा को अपने इस मोत्सार्ट प्रेम पर कुछ मुश्किल सवालों के जवाब जरूर देने पड़ते पर सलिल दा ने अपने संगीत में मोत्सार्ट के प्रभाव को कभी नहीं नकारा। वो तो अपने आप को फिर से पैदा हुआ मोत्सार्ट ही कहते थे।

आज उनके ऐसे ही एक गीत की बात आप को बताना चाहता हूँ जिसे लिखा था राजेंद्र कृष्ण ने। ये युगल गीत था फिल्म छाया से जो वर्ष 1961 में प्रदर्शित हुई थी। गीत के बोल थे इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा..सलिल दा ने इस गीत के मुखड़े की धुन मोत्सार्ट सिम्फोनी 40 G Minor 550 से हूबहू इस्तेमाल की थी। खुद मोत्सार्ट ने इस सिम्फोनी को वर्ष 1788 में विकसित किया था। मोत्सार्ट की इस मूल धुन को  पहले पियानो और फिर छाया फिल्म के इस युगल गीत में सुनिए। समानता साफ दिखेगी।


इस गीत को आवाज़े दी थीं तलत महमूद और लता मंगेशकर ने। युगल गीत को गीतकार राजेंद्र कृष्ण ने एक सवाल जवाब की शक्ल में ढाला था। बिम्ब भी बड़े खूबसूरत चुने थे उन्होंने नायक नायिका के लिए। जहाँ नायक अपने आप को आवारा बादल बताता है तो वहीं नायिका बादल के अंदर छिपी जलधारा में अपनी साम्यता ढूँढती है। इस गीत को फिल्माया गया था आशा पारिख और सुनील दत्त की जोड़ी पर।

इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा, कि मैं इक बादल आवारा
कैसे किसी का सहारा बनूँ, कि मैं खुद बेघर बेचारा

इस लिये तुझसे प्यार करूँ, कि तू एक बादल आवारा
जनम-जनम से हूँ साथ तेरे, कि नाम मेरा जल की धारा

मुझे एक जगह आराम नहीं, रुक जाना मेरा काम नहीं
मेरा साथ कहाँ तक दोगी तुम, मै देश विदेश का बंजारा

ओ नील गगन के दीवाने, तू प्यार न मेरा पहचाने
मैं तब तक साथ चलूँ तेरे, जब तक न कहे तू मैं हारा

क्यूँ प्यार में तू नादान बने, इक बादल का अरमान बने
अब लौट के जाना मुश्किल है मैंने छोड़ दिया है जग सारा



वैसे राजेंद्र कृष्ण ने इसी गीत का दूसरा दुखभरा रूप भी गढा था जिसे तलद महदूद ने एकल रूप में गाया था। अगर गीत के रूप में उनकी आवारा बादल और उसमें से बरसती जलधारा की कल्पना अनुपम थी तो दूसरे रूप में ठोकर खाए दिल की अंदरुनी तड़प बखूबी उभरी थी..

अरमान था गुलशन पर बरसूँ, एक शोख के दामन पर बरसूँ
अफ़सोस जली मिट्टी पे मुझे, तक़दीर ने मेरी दे मारा

मदहोश हमेशा रहता हूँ, खामोश हूँ कब कुछ कहता हूँ
कोई क्या जाने मेरे सीने में, है बिजली का भी अंगारा

इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा, कि मैं इक बादल आवारा
कैसे किसी का सहारा बनूँ, कि मैं खुद बेघर बेचारा


 

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