Monday, May 22, 2017

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में.. आइए सुनें नूर साहब की पूरी ग़ज़ल Aag Hai, Pani Hai, Mitti Hai, Hawa Hai Mujh Mein . by Krishna Bihari Noor

बहुत सारी पसंदीदा ग़ज़लें होती हैं जिनके तीन चार अशआर डॉयरी के पन्नों पर नोट कर हम उन्हें पूरा मान लेते हैं। बरसों वहीं अशआर हमारे ज़हन में रह रह कर उठते और पलते रहते हैं। ऐसे में जब उसी ग़ज़ल के चंद और अशआर अचानक से सामने आ जाते हैं तो लगता है कि बैठे बिठाए कोई सौगात मिल गयी हो। लखनऊ से ताल्लुक रखने वाले शायर  कृष्ण बिहारी नूर की इस मशहूर ग़ज़ल के पाँच शेर बरसों से मेरे पास थे पर कल उनसे जुड़ी एक किताब पढ़ते हुए ग़ज़ल के चंद शेर और हाथ लगे तो सोचा आप तक उनकी ये पूरी कृति पहुँचा दूँ।



इस ग़ज़ल से जुड़े एक किस्से का जिक्र कन्हैयालाल नंदन जी ने अपने एक आलेख में किया है। तब नंदन जी मुंबई में पत्र पत्रकारिता से जुड़े काम के सिलसिले में पदस्थापित थे। नूर साहब एक मुशायरे के सिलसिले में मुंबई आए हुए थे और नवी मुंबई के वासी में ठहरे थे जो कि मुख्य शहर से काफी दूर का इलाका है। उन्होंने नंदन जी को फोन कर कहा कि वो उनसे मिलना चाहते हैं। कन्हैयालाल नंदन को यही लगा कि इतनी दूर से ख़ुद फोन कर मिलने की बात कर रहा है तो जरूर इसे मुझसे कोई काम होगा। पर डेढ़ घंटे बाद जब नूर हाज़िर हुए तो उनसे उनके आने का उद्देश्य जान कर नंदन आश्चर्यचकित रह गए। नूर साहब का कहना था कि बस एक नई ग़ज़ल लिखी है वही आप जैसे संवेदनशील श्रोता को सुनाना चाहता था। वो ग़जल यही ग़ज़ल थी जिसका जिक्र मैंने आज आपसे छेड़ा है।

तो चलिए देखते हैं कि आख़िर क्या कहना चाहा था कृष्ण बिहारी नूर ने अपनी इस ग़ज़ल में...

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि ये शरीर प्रकृति के पंच तत्वों से निर्मित है और भगवान का वास हर जगह है। यानि अपने अंदर भी अगर हम पवित्र मन से झांकें तो वहाँ परमात्मा जरूर दिखेंगे। कृष्ण बिहारी नूर ने इस सोच को अपने मतले में ढालते हुए लिखा कि

आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में
और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझ में


नूर साहब की ये विशेषता थी कि वो अपनी शायरी में सूफ़ियत के साथ मोहब्बत का रंग बड़े सलीके  से घोला करते थे। अब अगले शेर में वो परमपिता या अपने महबूब से मुख़ातिब हैं इसका फैसला तो आप ही कीजिए। पर जो भी है इस मोहब्बत का आलम ये है कि इसने उन्हें  अपने आप से जुदा कर दिया है। अब तो उसका इख्तियार उनके ज़हन पर हो गया है 

अब तो ले-दे के वही शख़्स बचा है मुझ में
मुझको मुझसे अलग करके छुपा है मुझ में


ऐसे अगर आपको चाहने वाला आपकी हर छोटी छोटी बात को आत्मसात करते हुए आपके अंतर्मन को टटोलने की कोशिश करने लगे तो फिर अपने हाल के बारे में आप भी कह उठेंगे कि 

मेरा ये हाल उघड़ती हुई परतें जैसे,
वो बड़ी देर से कुछ ढूँढ रहा है मुझ में


ये तो मुझे पूरी ग़ज़ल में सबसे कमाल का शेर लगता है। कितनी तरह के अच्छे बुरे अहसासों, विराधाभासों से दिल जूझता रहता है। ठीक मौसम की बदलती रंगत की तरह। ये अहसास कभी सुकून के पल ले आते हैं तो कभी बेहिसाब बेचैनी। इन बदलती भावनाओं के बीच दिल की फ़िज़ा जो रंग बिखेरती है उन्हें शब्दों में बयाँ करना आसान है क्या?

जितने मौसम हैं वो सब जैसे कहीं मिल जाएँ
इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझ में


आप मेरे करीब भी नहीं आएँ, दूर से ही मेरे बारे में कोई राय बना लें तो इसमें मेरा क्या कुसूर? मेरे सच्चे दिल की पुकार और व्यक्तित्व की चमक को महसूस करने के लिए आपको मेरे संग कुछ वक़्त तो ज़ाया करना ही पड़ेगा।

वो ही महसूस करेगा जो मुख़ातिब होगा
ऐसे अनदेखे उजाले की सदा है मुझमें


मैंने तो सोचा था कि उनकी नज़दीकियाँ पूरे जिस्म में एक ख़ुमारी सी ले आती हैं। पर मैं नहीं जानता था कि उनके लिए मेरा प्रेम एक नशा नहीं जो चढ़ के उतर जाएगा। वो तो मेरे शरीर के हर कोने में दौड़ते लहू की भांति मेरी नस नस में है जो  मेरी साँस थमने से ही रुकेगा।

नशा-ए-मय की तरह समझा था क़ुरबत उसकी
वो तो मानिंद ए लहू दौड़ रहा है मुझमें


आईने की भी अपनी सीमाएँ हैं। वो बस आपका बाहरी रूप रंग ही दिखा पाता है। आपके अंदर का अक़्स उसकी पहुँच से कोसों दूर है।

आईना ये तो बताता है के मैं क्या हूँ लेकिन
आईना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझ में

टोंक देता है, कदम जब भी ग़लत उठता है
ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें

अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ 'नूर'
मैं कहाँ तक करूँ साबित के वफ़ा है मुझ में


ये तो थे ग़ज़ल के पूरे शेर। नूर साहब की आवाज़ में जब ये ग़ज़ल नहीं मिली तो मैंने सोचा क्यूँ ना इसे अपनी आवाज़ में ही रिकार्ड कर लूँ। तो ये रही नूर साहब की भावनाओं तक अपनी आवाज़ से पहुँचने की मेरी कोशिश।

Sunday, May 07, 2017

मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, जिया जिया ना जिया .. है एक साँस का झगड़ा, लिया लिया ना लिया

नब्बे के दशक में हरिहरण फिल्म संगीत और ग़ज़ल गायिकी में एक सितारे की तरह चमके थे। इस दौरान उनकी ग़ज़लों के कई एलबम आए  जिनमें से एक था 1992 में रिलीज़ हुआ हाज़िर। इस एलबम की पहली ग़ज़ल (जो सबसे लोकप्रिय हुई थी) का मतला कुछ यूँ था मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, जिया जिया ना जिया ..है एक साँस का झगड़ा, लिया लिया ना लिया

ये उन दिनों की बात थी जब इंजीनियरिंग कॉलेज के चार साल पूरे होने आए थे और इश्क़ था कि हमारी ज़िदगानी से मुँह छुपाए घूम रहा था। ऐसे में इस ग़ज़ल के मतले को मन ही मन मैं कुछ यूँ गुनगुनाने को मज़बूर हो गया था।
मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, किया किया ना किया
है तो ये रोज़ का लफड़ा, लिया लिया ना लिया 😁


सच तो ये था कि उन दिनों भी कहकशाँ व गालिब जैसे जगजीत के एलबमों का जादू मेरे सिर चढ़ कर बोल रहा था। हरिहरण की गायिकी लुभाती तो थी पर जगजीत की आवाज़ का मैं कुछ ज्यादा ही मुरीद था। उस वक्त दूरदर्शन पर भी नियमित रूप से हरिहरण के कार्यक्रम आया करते थे। मुझे याद है कि ऐसे ही एक महफिल में उन्होंने एक प्यारे से गीत को अपनी आवाज़ दी थी जिसके बोल थे मेरी साँसों में बसी है, तेरे दामन की महक, जैसे फूलों में उतर आई हो उपवन की महक। कभी इस गीत की रिकार्डिंग हाँ लगी तो जरूर आपसे साझा करूँगा।

प्रियंका बार्वे
तो फिर अचानक ही इतने सालों बाद मुझे हरिहरण की याद कहाँ से आ गयी। हुआ यूँ कि कुछ दिनों पहले मराठी फिल्मों की प्रतिभावान गायिका प्रियंका बार्वे की आवाज़ में ये ग़ज़ल सुनने को मिल गयी। प्रियंका ने बिना किसी संगीत के शुरुआत के तीन अशआर गा कर मन में मिठास सी घोल दी। सच तो ये है कि कुछ ग़ज़लें बिना संगीत के आभूषण के सुनी जाएँ तो ज्यादा आनंद देती हैं और मेरे ख़्याल से ये एक ऐसी ही ग़ज़ल है।


पुणे के संगीतज्ञों के परिवार से ताल्लुक रखने वाली प्रियंका ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा अपनी दादी मालती पांडे बार्वे से ली। फिलहाल प्रियंका का इरादा गायिकी के साथ साथ अभिनय के क्षेत्र में उतरने का भी है। पिछले साल वे फिरोज़ खान द्वारा निर्देशित नाटक मुगल ए आज़म में अनारकली के रूप में नज़र आयीं। प्रियंका की इस प्रस्तुति को सुन कर ऐसा लगा कि उन्हें मराठी के आलावा हिंदी फिल्मों और ग़ज़लों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरना चाहिए।

इस ग़ज़ल को लिखा है ब्रिटेन में रहने वाले उर्दू के नामचीन शायर डा. सफ़ी हसन ने। आपको जान कर अचरज होगा कि पाकिस्तान से ताल्लुक रखने वाले और फिलहाल बर्मिंघम में बसे सफ़ी साहब पेशे से एक वैज्ञानिक हैं। कितना खूबसूरत मतला लिखा था सफ़ी साहब ने। जिसे इश्क़ का रोग लग गया उसकी तो हर साँस ही गिरवी हो जाती है। फिर उसका जीना क्या और मरना क्या?

मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, जिया जिया ना जिया
है एक साँस का झगड़ा, लिया लिया ना लिया 

सफ़ी साहब आगे फर्माते हैं कि अगर दर्द से पूरा शरीर ही छलनी हो तो दिल को रफ़ू कर के कौन सी ठंडक मिलने वाली है?

बदन ही आज अगर तार-तार है मेरा
तो एक चाक-ए-ग़रेबाँ, सिया सिया ना सिया

और इसकी तो बात ही क्या ! पसंदीदा शेर है मेरा इस ग़ज़ल का। जनाब सफ़ी हसन यहाँ कहते हैं की भले ही उनका नाम मेरे होठों पर नहीं आया पर क्या कभी उन्हें अपने ख्यालों से दूर  कर पाया हूँ?

ये और बात के तू हर रह-ए-ख़याल मे है
कि तेरा नाम जुबाँ से, लिया लिया ना लिया

मेरे ही नाम पे आया है जाम महफ़िल मे
ये और बात के मै ने, पिया पिया ना पिया

ये हाल-ए-दिल है 'सफ़ी' मैं तो सोचता ही नही
कि क्यों किसी ने सहारा, दिया दिया ना दिया

वैसे चलते चलते हरिहरण की आवाज़ में पूरी ग़ज़ल भी सुनते जाइए। तबले पे हरिहरण जी का साथ दे रहे हैं मशहूर वादक ज़ाकिर हुसैन ।

Friday, April 28, 2017

विनोद खन्ना : वे पाँच नग्मे जो मुझे उनकी सदा याद दिलाएँगे.. Vinod Khanna 1946 -2017

विनोद खन्ना हमारे बीच नहीं रहे। सोशल मीडिया पर कुछ हफ्ते पहले उनकी बीमारी की हालत में ली गयी तस्वीर उनके चाहने वालों को गहरा धक्का दे गयी थी। लोगों के मन में हमेशा उनके बाँके छबीले नौजवान हीरो की छवि तैरती रही भले ही उन्होंने उम्र  के इस पड़ाव में चरित्र अभिनेता का चोला पहन लिया था। उन पर फिल्माए कुछ गीत हमेशा किसी ना किसी वज़ह से मुझे याद रहे। आज उन्हीं चंद गीतों के माध्यम से उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियाँ ताजा करना चाहता हूँ।



उस वक्त सारी फिल्में मैं अपने परिवार के साथ सिनेमा हॉल में देखा करता था। विनोद खन्ना की फिल्मों की बात करूँ तो बचपन में मैंने  मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथोनी और कुर्बानी देखी थी। यानि तब तक विलेन से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले विनोद देश के चहेते हीरो बन चुके थे।

उस दौर में जब अमिताभ, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, शत्रुघ्न व संजीव कुमार जैसे नायकों का बोलबाला था, आकर्षक कद काठी पर मीठी सी मुस्कुराहट लिए  विनोद बिल्कुल अलग से दिखते थे। मुकद्दर का सिकंदर और अमर अकबर एंथोनी में तो अमिताभ इस क़दर छाए रहे कि विनोद का किरदार मेरी स्मृतियों में स्थायी रूप ना ले सका। पर कुर्बानी में फिरोज खान के साथ उनका रोल खासा लोकप्रिय हुआ। कुबुक कुबुक और तुझपे कुरबाँ मेरी जान से ज्यादा जो गीत लंबे समय तक यादों में शामिल रहा वो था जीनत अमान के साथ विनोद खन्ना पर फिल्माया नग्मा। जिसके बोल कुछ यूँ थे हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे.. अगर आपने इसे सुना भी हो तो मनहर उधास की आवाज़ में इसे फिर सुन लीजिए..


विनोद खन्ना के कैरियर के इस दौर में बहुत सारी  फिल्में हिट हुयीं पर  उनमें ज़्यादातर में एक से ज्यादा हीरो थे। ये वो दौर था जब उन्हें उतनी सही कहानियाँ नहीं मिल पायीं जिसके वो हक़दार थे। फिर भी गुलज़ार ने उन्हें जो  मौके मेरे अपने (1971), अचानक (1973) और मीरा  (1979) में दिए, उसके साथ उन्होंने पूरा न्याय किया। फिल्म मेरे अपने में  किशोर दा का गाया  गीत जिसे विनोद जी ने अभिनीत किया था, बरसों मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज के एकाकी दिनों का साथी रहा

कोई होता जिसको अपना
हम अपना कह लेते यारों
पास नहीं तो दूर भी होता
लेकिन कोई मेरा अपना



अपने कैरियर के चढ़ाव पर ओशो की शरण में संन्यास लेकर विनोद खन्ना ने अपने प्रशंसकों को चौंका दिया था। मेरे पिता भी ओशो से खासे प्रभावित थे और उनकी लगभग हर किताब उनकी अलमारी की शोभा  बढ़ाया करती थी। इसलिए अख़बार में जब भी विनोद के संन्यासी जीवन की ख़बरें आतीं मैं उन्हें चाव से पढ़ता।अमेरिका जाने के पहले उन्होंने गुलज़ार की फिल्म मीरा की थी। गुलज़ार से वो तब कहा करते थे कि मेरा तो मन मीरा का किरदार निभाने को करता है क्यूँकि मैं उसकी भक्ति को अपने भगवान से जोड़ कर देख सकता हूँ। ये उनकी अगाध श्रद्धा का ही परिचायक था कि उन्होंने ओशो के आश्रम में माली से लेकर टॉयलट साफ करने तक के काम किए। वो वापस क्यूँ लौटे ये तो कहना मुश्किल है। क्या गुरु से उनका मोह भंग हुआ या फिर आर्थिक परेशानियाँ इस पर तो अब क़यास ही लगाए जा सकते हैं।

पाँच साल के इस  लंबे इंटरवल के बाद फिर बतौर नायक फिल्मों में आने लगे। 1989 में उन्होंने ॠषि कपूर व श्रीदेवी  के साथ फिल्म चाँदनी में एक प्यारा सा किरदार निभाया और उन पर फिल्माया ये नग्मा बरसों बेवज़ह आँखें नम करता रहा। बारिश की छनछनाहट के बीच सुरेश वाडकर की डूबती आवाज़..मन तब गुम हो जाता था इस गीत में

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है
वही आग सीने में फिर जल पड़ी है




कॉलेज के ज़माने में जितना समय किशोर, जगजीत और गुलज़ार को सुनने में लगाया उतना पढ़ने में भी लगाया हो इस पर विश्वास तो नहीं होता। शायद लगाया भी हो...पढ़ाई तो भूल भी गयी पर जो वक़्त इनके साथ गुजरा वो हमेशा हमेशा के लिए दिल पे नक़्श हो गया।

अपनी दूसरी पारी में गुलज़ार निर्देशित सिर्फ एक फिल्म की वो थी लेकिन। उस दौर के अभिनेताओं में संजीव कुमार मेरी पहली पसंद थे। देखने वाली बात है कि गुलज़ार ने संजीव कुमार के साथ तो काफी काम किया ही, विनोद को भी कम मौके नहीं दिये। विनोद खन्ना में अपने अन्तर्मन को तलाश करने का जो भाव रहा उसे गुलज़ार ने बारहा टटोलने की कोशिश की।  गुलज़ार ने विनोद के अभिनय का वो स्वरूप उभारा जिनसे उनके चाहने वाले अनजान ही रहे हैं। फिल्म लेकिन में ही एक गीत था सुरमयी शाम इस तरह आए साँस लेते हैं जिस तरह साए। सुरेश वाडकर का गाया गीत मेरे लिए क्यूँ खास रहा है उसके बारे में यहाँ मैने लिखा है। गीत का वीडियो यू ट्यूब पर तो है पर शेयर करने के लिए उपलब्ध नहीं है। आज विनोद जी की यादों में इस गीत को  भी  शामिल कीजिएगा।

कोई आहट नहीं बदन की कोई
फिर भी लगता है तू यहीं हैं कहीं
वक़्त जाता सुनाई देता है
तेरा साया दिखाई देता है
जैसे खुशबू नज़र से छू जाए
साँस लेते हैं जिस तरह साए


जगजीत की आवाज़ और गुलज़ार के बोलों के साथ सिनेमा के रुपहले पर्दे पर विनोद खन्ना 2002 में फिल्म लीला में नज़र आए । इस फिल्म के तमाम नग्मे शानदार थे पर कल अचानक उनके चले जाने से उस गीत की ये पंक्तियाँ बार बार मन को गीला कर रही थीं..

जाग के काटी सारी रैना
नैनों में कल ओस गिरी थी

क्या पता था कि उनका हँसता मुस्कुराता चेहरा यूँ अचानक ही दृष्टिपटल से ओझल हो जाएगा।



बिंदास, खुशमिजाज़, दोस्तों की कद्र और हमेशा मदद करने वाले विनोद खन्ना को ये दुनिया एक छैल छबीले हीरो के रूप में हमेशा याद रखेगी। विनोद खन्ना से जुड़ी आपकी भी कुछ व्यक्तिगत यादे हैं तो जरूर बाँटें..

Sunday, April 23, 2017

चाँद फिर निकला, मगर तुम न आए : सचिन दा व मजरूह की जुगलबंदी का कमाल Chand Phir Nikla

1957 में एस डी बर्मन साहब की तीन फिल्में प्रदर्शित हुई थीं। प्यासा, पेइंग गेस्ट और नौ दौ ग्यारह। हिट तो ये तीनों फिल्में रहीं। पर इनमें गुरुदत्त की प्यासा हर लिहाज़ से अलहदा फिल्म थी। फिल्म का संगीत भी उतना ही चला। फिल्म के गीतकार थे साहिर लुधियानवी। अक्सर जब गीतकार संगीतकार मिलकर इस तरह की सफल फिल्में देते हैं तो उनकी जोड़ी और पुख्ता हो जाती है  पर सचिन दा की उसी साल रिलीज़ फिल्मों में साहिर का नाम नदारद था और उनकी जगह ले ली थी मजरूह सुल्तानपुरी ने।

सचिन दा और साहिर की अनबन की पीछे उनके अहम का टकराव था। साहिर को एक बार ओ पी नैयर ने एक फिल्मी पार्टी में ये कहते सुना था कि मैंने ही सचिन दा को बनाया है। ज़ाहिर है साहिर के मन में ये बात रही होगी कि गीतकार के रूप में उनका योगदान संगीतकार से ज्यादा है। ऐसा कहा जाता है कि प्यासा के निर्माण के दौरान वे अपना पारिश्रमिक सचिन दा से एक रुपये ज्यादा रखने पर अड़े रहे। शायद उनके इस रवैये से सचिन दा खुश नहीं थे।

सचिन दा की मजरूह के साथ आत्मीयता थी। इसलिए जब पेइंग गेस्ट में गीतकार को चुनने का वक़्त आया तो उन्होंने मजरूह को बुला लिया। सचिन दा मजरूह को मुजरू कह कर बुलाते थे। चाय, काफी और पान के साथ दोनों की घंटों सिटिंग चलती। सचिन दा धुन रचते और बोलों से धुन का तालमेल बिठाते। कभी कभी तो एक ही गीत के लिए दस या बीस धुनें बनती। ये सिलसिला तब तक चलता जब तक सचिन दा खुद संतुष्ट नहीं हो जाते। अगर कहीं दिक्कत होती तो मुजरू को बोल बदलने को कहते।


पेइंग गेस्ट के लिए सचिन दा ने एक बेहद मधुर धुन  बनाई थी जिस पर मजरूह ने मुखड़ा दिया था चाँद फिर निकला मगर तुम ना आए। विरह की भावना से ओतप्रोत इस गीत में जिस तरह मजरूह ने चाँद जैसे बिम्ब का प्रयोग किया था वो इस गीत को अनुपम बना देता है।

चाँद फिर निकला, मगर तुम न आए
जला फिर मेरा दिल, करुँ क्या मैं हाय
चाँद फिर निकला …


पर मुझे इस गीत की सबसे दिल को छूती पंक्ति वो लगती है जब मजरूह पहले अंतरे में कहते हैं

ये रात कहती है वो दिन गये तेरे
ये जानता है दिल के तुम नहीं मेरे

खड़ी मैं हूँ फिर भी निगाहें बिछाये
मैं क्या करूँ हाय के तुम याद आए
चाँद फिर निकला …


रात के साथ दिन के इस सहज मेल से अच्छे दिन चले जाने का जो भाव पैदा किया मजरूह ने उसका जवाब नहीं।
 
सुलगते सीने से धुँआ सा उठता है
लो अब चले आओ के दम घुटता हैं
जला गये तन को बहारों के साये
मैं क्या करुँ हाय के तुम याद आए
चाँद फिर निकला …


मजरूह अपने साक्षात्कारों में अक्सर कहा करते थे कि सचिन दा को ज्यादा साज़ और साज़िंद पसंद नहीं थे। वे  अक्सर कोशिश करते कि कम से कम वाद्य यंत्रों से काम चलाया जाए। शंकर जयकिशन से उलट आर्केस्ट्रा के प्रयोग से वो दूर रहना पसंद करते थे। सचिन दा का मानना था कि गाने पर अगर ज्यादा  जेवर चढ़ेगा तो गाना तो फिर दिखेगा ही नहीं। प्रील्यूड व इंटरल्यूड्स को छोड़ दें तो इस गीत में लता की आवाज़ के साथ घटम के आलावा कोई ध्वनि नहीं आती। पर मजरूह के बोल और सचिन दा की मेलोडी इतनी जबरदस्त थी कि वहाँ  संगीत का आभाव ज़रा भी नहीं खटकता। यही वजह है कि ये गीत छः दशकों बाद भी हम सबके दिलों पर अपनी गिरफ्त बनाए हुए है।

फिल्म में देव आनंद की प्रतीक्षा करती नूतन के गीत को भावों को अपनी भाव भंगिमा से जोड़ा है कि लता की आवाज़ का दर्द पर्दे पर भी बखूबी उभर आता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को..

Friday, April 14, 2017

बता मेरे यार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया Bata Mere Yaar Sudama Re...

पिछले कुछ वर्षों में हरियाणा अक्सर गलत कारणों से ज्यादा में चर्चा में रहा है। भ्रूण हत्या की बात हो  या  खाप पंचायत के अमानवीय फैसले, जाटों का मनमाना उपद्रव या जगतविदित हरियाणवी अक्खड़पन ये सभी मुद्दे ही मीडिया में सुर्खियाँ बटोरते रहे हैं। । पर विगत कुछ महीनों से इस राज्य के कुछ सकरात्मक पहलू भी हमारे सामने आए हैं जिनकी वजह से यहाँ की छवि को एक नई रौशनी में देख कर पूरा देश प्रभावित हुआ है। इसका पहला श्रेय तो यहाँ के पहलवानों, खासकर महिला पहलवानों को जाता है जिन्होंने ना केवल ओलंपिक, एशियाई व कॉमनवेल्थ खेलों में पदक जीत कर देश का नाम रोशन किया बल्कि अपनी इस सफलता से बॉलीवुड के निर्माता निर्देशकों को हरियाणवी ग्रामीण संस्कृति के प्रति आकृष्ट किया।

नतीजा ये हुआ कि वही बोली जो हमें थोड़ी रूखी लगती थी उसमें हमें गाँव का सोंधापन आने लगा। हरियाणवी जुमले हमारी जुबां पर चढ़ गए। हाल ही में आई फिल्म दंगल इस भाषा और परिवेश को हमारे और करीब ले आई। ये सब हो ही रहा था कि कुछ स्कूली छात्राओं द्वारा गाया एक हरियाणवी भजन यू ट्यूब पर इस क़दर लोकप्रिय हुआ कि कुछ हफ्तों में वो पूरे देश में करोड़ लोगों द्वारा देखा और सराहा गया।


कृष्ण सुदामा की मित्रता की कहानियाँ तो हम बचपन से पढ़ते आए हैं। पर रोहतक के खिल्लौड़ गाँव से ताल्लुक रखने वाली विधि ने कृष्ण सुदामा  संवाद के उन किस्सों को फिर से पुनर्जीवित कर दिया है।  मुख्य गायिका विधि  भजन के इस रूप में सामने आने की कहानी अपने एक साक्षात्कार में बड़े भोलेपन से कुछ यूँ बयाँ करती हैं
"मेरी मम्मी को गाणा पसंद था। वो जाती थी सत्संग में गाणे। तो फिर मम्मी ने मुझे सिखाया। फिर मैंने अपने म्यूजिक टीचर को बताया तो सर को भी अच्छा लगा। हमने स्कूल में गाया तो सबको अच्छा लगा।  सर ने कहा इसको नया म्यूजिक देते हैं। फिर सर ने तैयार करा के इसे यू ट्यूब पर डलवा दिया और ये प्रसिद्ध हो गया। ये जितनी भी मेहनत है हमारे सर की है। उनके सामने हमारी मेहनत तो कुछ भी नहीं है।"

सोमेश जांगड़ा
सही मायने में विधि की आवाज़ को हम तक पहुँचाने में संगीत शिक्षक सोमेश जांगड़ा का सबसे बड़ा हाथ है। सोमेश कहते हैं कि विधि की आवाज़ में जो टोन है वो बिल्कुल लोकगायिकी के अनुरूप है। जब इस गीत को एक नए रूप में प्रस्तुत करने का विचार उनके मन में आया तो उन्होंने दो हफ्तों में इसे फिर से संगीतबद्ध किया। दो दिन में इस भजन की डबिंग हुई। बाकी समय कोरस और गायिकी को अलग रिकार्ड कर मिक्स करने में लगा। एक बार जब यू ट्यूब में ये अपलोड हुआ तो लोग इतने प्रभावित हुए कि हरियाणा के कार्यक्रमों में इन बच्चियों को बुलाया जाने लगा। अलग अलग जगहों पर लाइव परफारमेंस के दौरान वीडियो रिकार्डिग हुई जो इंटरनेट पर साझा होती चली गयी।

 सोमेश का मानना है कि इस भजन के इतने सराहे जाने की तीन वज़हें हैं। पहली तो ये भजन, जिसकी शब्द रचना बिल्कुल एक लोक गीत जैसी है। दूसरे विधि जिसकी आवाज़ में लोक गायिका की सभी खूबियाँ मौज़ूद हैं और तीसरी बात इसका संगीत जिसमें हारमोनियम के साथ लोक वाद्यों का ऐसा समावेश किया गया है जो हरियाणवी मिट्टी में रचा बसा सा लगता है। ये तीनों मिलकर मन में ऐसा सुकून जगाते हैं कि मन कृष्ण द्वारा बालसखा सुदामा के साथ दिखाए अपनत्व से श्रद्धा से भर उठता है।


बता मेरे यार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

बालक था रे जब आया करता, रोज खेल के जाया करता
हुई कै तकरार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

मन्ने सुना दे कुटुंब कहाणी, क्यों कर पड़ गयी ठोकर खानी
टोटे की मार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

सब बच्चों का हाल सुना दे, मिसराणी  की बात बता दे
रे क्यूँ गया हार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

चाहिए था रे तन्ने पहलम आना, इतना दुःख नहीं पड़ता ठाणा
क्यों भूला प्यार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

इब भी आगया ठीक बखत पे, आज बैठ जा म्रेरे तखत पै
जिगरी यार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया

आजा भगत छाती पे लाल्यूँ, , इब बता तन्ने कड़े  बिठा लूँ
करूँ साहूकार सुदामा रै, भाई घणे दिना में आया
 (घणे दिनों : बहुत दिनों में, टोटा : गरीबी, बखत :वक़्त,  ठाणा :उठाना,  कड़े : किधर ,छाती पे लाल्यूँ  :छाती से लगा लूँ , इब  :अब, )

इस भजन की अपार सफलता से दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हो गयीं।  भारतीय संगीत से पश्चिमी संगीत के सम्मिश्रण यानि फ्यूजन के इस दौर में भी हमारी देशी संस्कृति में इतना कुछ है कि जिसे अगर ढंग से परोसा जाए तो देश के संगीतप्रेमी उसे सर आँखों पर बिठाते हैं। दूसरी बात ये कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में हुनर हर जगह बिखरा है। जरूरत है तो इक सहारे की और एक माध्यम की। सफलता की ऐसी कहानियाँ इंटरनेट जैसे सशक्त माध्यम से आगे भी दोहराई जाएँगी मुझे इसका पूरा भरोसा है।

Tuesday, April 04, 2017

हर ज़ुल्म तेरा याद है, भूला तो नहीं हूँ Har Zulm

कुछ महीने पहले WhatsApp और फेसबुक पर एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें ज़मीन पर बैठा एक शख़्स गा रहा था। उसके कपड़े पर चूने के छींटे थे और पीछे उसका साथी दीवारों की पुताई में व्यस्त था। पर दो मिनट के वीडियो में उसकी सधी हुई गायिकी ने मुझे ऍसा प्रभावित किया कि कुछ दिनों तक तो ये ग़ज़ल होठों से चिपकी ही रही। 

इंटरनेट पर तो ये तुरंत ही पता चल गया कि ये ग़जल सज्जाद अली की गायी है। वही सज्जाद अली जिनकी आवाज़ की ओर मेरा ध्यान बोल फिल्म के गीत दिन परेशां है, रात भारी है से गया था। सज्जाद ने पहली बार इस ग़ज़ल को अपने एलबम कोई तो बात हो....  में पन्द्रह वर्ष पहले 2002 में शामिल किया था।  चार साल पहले जब इसका वीडियो यू ट्यूब पर रिलीज़ हुआ लोगों ने इसे काफी पसंद किया। सज्जाद के बारे में पहले भी यहाँ काफी कुछ लिख चुका हूँ। संगीत में दशकों से सक्रिय रहते हुए पचास वर्षीय सज्जाद फिलहाल दुबई में रहते हैं और इक्का दुक्का ही सही अपने सिंगल्स रिलीज़ करते रहते हैं।

पर जैसा मैंने शुरुआत में कहा कि इस ग़ज़ल से मेरी मुलाकात उस शख़्स ने करवायी जो पाकिस्तान में पेंटर बाबा के नाम से अपनी गायिकी के लिए जाना जाता है पर उनका वास्तविक नाम है ज़मील अहमद। सज्जाद ने जब अपनी गायी इस ग़ज़ल को ज़मील की आवाज़ में सुना तो वो भी ज़मील के हुनर की दाद दिए बिना नहीं रह सके। वैसे ज़मील ने इस अचानक मिली लोकप्रियता के बाद ग़ुलाम अली की ग़ज़ल चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला को भी अपनी आवाज़ दी है।

सज्जाद अली व आफ़ताब मुज़्तर
वैसे क्या आपको पता है कि इस ग़ज़ल को किसने लिखा? इसे लिखा है आफ़ताब मुज़्तर ने जो कराची से ताल्लुक रखते हैं और लेखक व शायर होने के साथ साथ एक रिसर्व स्कॉलर भी हैं। आफ़ताब साहब की इस ग़ज़ल में यूँ तो आठ अशआर थे पर सज्जाद ने गाने के लिए इनमें से चार को चुना। अपनी इस ग़ज़ल के बारे में आफ़ताब कहते हैं कि इस ग़ज़ल का वो शेर साहिल पे खड़े हो..  उनके उस्ताद ख़ालिद देहलवी को बेहद पसंद था और जब भी वे उनके पास जाते उस्ताद इस शेर की फर्माइश जरूर करते। तो आइए इस ग़ज़ल को सुनाने से पहले रूबरू कराते  हैं आपको इसके सारे अशआरों से..

हर ज़ुल्म तेरा याद है, भूला तो नहीं हूँ
ऐ वादा फ़रामोश मैं तुझ सा तो नहीं हूँ


ऐ वक़्त मिटाना मुझे आसान नहीं है
इंसान हूँ कोई नक़्श-ए-कफ़-ए-पा तो नहीं हूँ

तुम्हारा ढाया हर सितम मुझे याद है पर क्या करूँ मैं तुम्हारे जैसा तो हूँ नहीं जो अपने हर वादे से मुकर जाए। ऐ वक़्त मुझे उन पदचिन्हों की तरह ना समझो जिस पर चल कर तुम उसका निशां मिटा दो।

चुपचाप सही मसलेहतन वक़्त के हाथो,
मजबूर सही, वक़्त से हारा तो नहीं हूँ


उनके लिए लड़ जाऊँगा तक़दीर मैं तुझ से
हालांकि कभी तुझसे मैं उलझा तो नहीं हूँ

आज मैं सब कुछ जानते हुए किसी प्रयोजन से चुप हूँ।  मेरी इस मजबूरी, इस चुप्पी का ये मतलब मत लगा लेना कि मैंने तुम्हारे  सामने अपने घुटने टेक दिए हैं। यूँ तो भाग्य ने जिस ओर चलाया उसी ओर चलता रहा हूँ। पर जब बात उनकी हो तो फिर अपनी तक़दीर से  दो दो हाथ करने में मुझे परहेज़ नहीं।
ये दिन तो उनके तग़ाफ़ुल ने दिखाए
मैं गर्दिश ए दौरां तेरा मारा तो नहीं हूँ


साहिल पे खड़े हो तुम्हें क्या ग़म, चले जाना
मैं डूब रहा हूँ, अभी डूबा तो नहीं हूँ


मुझे तो बेहाली कभी छू भी नही सकी थी, ये दौर तो अब तेरी बेरुखी की वज़ह से आया है। तेरे ग़म में आज बदहवास सा मैं डूब रहा हूँ। और तुम हो कि बस बस यूँ ही दूर खड़े किनारे से देख भर रहे हो। जाओ, बस संतोष कर लो इस बात का कि मैं अभी तक डूबा नहीं हूँ।

क्यूँ शोर बरपा है ज़रा देखो तो निकल कर
मैं उसकी गली से अभी गुजरा तो नहीं हूँ

मुज़्तर मुझे क्यूँ देखता रहता है ज़माना
दीवाना सही उनका तमाशा तो नहीं हूँ


लो अभी मैं उसकी गली तक पहुँचा भी नहीं और पहले से ही छींटाकशी शुरु हो गयी। आख़िर ज़माना मुझ पर ही क्यूँ बातें बनाता है? मैंने कोई तमाशा तो नहीं सिर्फ प्यार ही तो किया है।

यूँ तो सज्जाद ने इस ग़ज़ल में गिटार का खूबसूरती से उपयोग किया है पर इस ग़ज़ल के बोलों में जो दर्द और इसकी धुन में जो मिठास है वो बिना किसी संगीत के ही दिल में बस जाने का माद्दा रखती है। तो आइए सुनते हैं इसे सज्जाद अली की आवाज़ में।

Thursday, March 30, 2017

एक शाम मेरे नाम ने पूरे किए अपने ग्यारह साल ! ( 2006-2017)

पिछले हफ्ते एक शाम मेरे नाम ने अपने ग्यारह वर्ष पूरे किए। जो लोग इस ब्लॉग से हाल में ही जुड़े हैं वो मेरे इस लंबे सफ़र की कहानी यहाँ पढ़ सकते हैं। आज कुछ खास आपसे नया कहने को नहीं हैं। चंद बातें जो नयी हुई हैं वो ये कि पिछले साल से एक शाम मेरे नाम अपने डोमेन यानि http://www.ek-shaam-mere-naam.in/  पर आ गया है और कुछ महीने पहले ही यू ट्यूब पर इस ब्लॉग का आडियो चैनल  भी शुरु हो गया है जिसमें मैं अपने पसंदीदा नज़्में, गीत और कविता आपको  अपनी आवाज़ में सुनाता रहूँगा।


आज हक़ीकत ये है कि  मेरे अधिकांश शुरुआती साथी ब्लॉग की दुनिया से दूर चले गए हैं या नियमित नहीं रहे। पर जहाँ तक मेरा सवाल है, ब्लॉग मेरा पहला घर था और रहेगा। यही वज़ह है कि सोशल मीडिया पर मेरी गतिविधियों का केंद्र भी मेरे दोनों ब्लॉग एक शाम मेरे नाम व मुसाफ़िर हूँ यारों रहे हैं।

सोशल मीडिया आज हर ब्लॉगर की जरूरत बन गया है क्यूँकि वहाँ रहकर नई पोस्ट तक पहुँचना पढ़ने लिखने वालो के लिए ज्यादा सुविधाजनक है। एक शाम मेरे नाम का फेसबुक पन्ना आप यहाँ से फॉलो कर सकते हैं अगर आप ट्विटर  पर ज्यादा सक्रिय हैं तो मेरी ट्विटर  प्रोफाइल ये रही। बाकी ई मेल सब्सक्रिप्शन का विकल्प तो है ही😊

बाकी मैं यही चाहूँगा कि इस ब्लाग की बेहतरी के लिए आपके मन में कुछ हो तो जरूर बताएँ। सालों साल इस ब्लॉग का अनुसरण करने वाले पाठकों को मेरा तहे दिल से शुक्रिया व प्यार। ग्यारह वर्षों के इस सफ़र में कितने राही आए साथ रहे और फिर जुदा भी हो गए और ये क्रम चलता रहा है। आगे भी चलता रहेगा गर मैं ना थकूँ.. उम्मीद है कि आप मुझे थकने भी ना देंगे..और हमारा ये साथ आगे भी बना रहेगा।

 

Saturday, March 25, 2017

अनारकली आरा वाली .. नारी अस्मिता को उभारती एक सशक्त फिल्म Anaarkali of Arrah

आरा से मेरा छोटा सा ही सही, एक रिश्ता जरूर है। मेरे पिता वहाँ  तीन सालों तक पदस्थापित रहे। पहली बार इंटर में अकेले रेल यात्रा मैंने पटना से आरा तक ही की थी । आरा के महाराजा कॉलेज में संयोगवश भौतिकी की प्रयोगशाला में जाने का अवसर मिला तो पता चला कि भोजपुरी में विज्ञान कैसे पढ़ाया जाता है। आज अविनाश दास की फिल्म अनारकली आफ आरा ने इस शहर से पुराने तार फिर जोड़ दिए।   बिहारी मिट्टी की खुशबू लिए एक कसी हुई, संवेदनशील फिल्म बनाने के लिए  निर्देशक अविनाश दास हार्दिक बधाई के पात्र हैं।



अनारकली आरा वाली, भ्रष्ट पुलिस, रसूखदार व रँगीले उप कुलपति और मौकापरस्त नौटंकी मालिक के बीच पिसती एक नाचनेवाली की सहज सी कहानी है जो  बिना किसी लाग लपेट या भाषणबाजी के साथ कही गयी है । ये अविनाश की काबिलियत है कि द्विअर्थी गीत गाने वाली अनारकली पर फिल्म बनाते हुए भी अश्लीलता परोसने के लालच में बिना फँसे हुए उन्होंने विषय पर अपनी ईमानदारी बनाए रखी है। अविनाश इस लिए भी बधाई के पात्र हैं कि जो कलाकार उन्होंने इस फिल्म के विभिन्न किरदारों के लिए चुने हैं उन्होंने कमाल का काम किया है।

स्वरा भास्कर ने तनु वेड्स मनु के दोनों संस्करणों में अपने अभिनय की छाप छोड़ी थी। निल बटे सन्नाटा में उनका काम सराहा गया था पर यहाँ तो उन्होंने अनारकली के किरदार को पूरी तरह जी लिया है। इतना तो तय है कि ये फिल्म बतौर अभिनेत्री उनके कैरियर में मील का पत्थर साबित होगी। स्वरा के साथ जो किरदार छोटे समय में भी दिल को गुदगुदाते हुए भिंगो कर चला जाता है वो है हीरामन तिवारी का। सच, इस छोटे से रोल में इस्तियाक खाँ के अभिनय की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। संजय मिश्रा और पंकज त्रिपाठी की अभिनय क्षमता से हम सभी पहले से ही वाकिफ़ हैं। इस फिल्म में भी उन्होंने अपना यश कायम रखा है।

रही बात गीत संगीत की तो इस फिल्म में वो कहानी का एक हिस्सा है। बिहार की पान दुकानों से लेकर बस के अंदर तक, मेलों से लेकर ठेलों तक दोहरे अर्थों वाला भौंड़ा भोजपुरी संगीत वहाँ के किस बाशिंदे ने नहीं सुना होगा। फिल्म के संगीतकार रोहित शर्मा और गीतकारों के लिए चुनौती थी कि उस पूरे माहौल को फिल्मी पर्दे पर उतार दें। रोहित ने वो तो किया ही है साथ ही कुछ ऐसे संवेदनशील गीतों को भी इस फिल्म का हिस्सा बनाया है जो दिल में एक घुटन और दर्द का अहसास जगाते हैं। रेखा भारद्वाज का गाया बदनाम जिया दे गारी और सोनू निगम का मन बेक़ैद हुआ कुछ ऐसा ही गीत  हैं।

औरत चाहे जो भी काम करे उसके चरित्र को ना उसके काम से आँका जा सकता है और ना ही उसकी ना का वज़न उसके काम से छोटा हो जाता है। अविनाश इस फिल्म के माध्यम से ये  संदेश देने में सफल हुए हैं। फिल्म का संपादन चुस्त है। फिल्म अपनी बिहारीपनती से हँसाती भी है और अनारकली की पीड़ा से कोरों को गीला भी करती है। अब "भकुआ" के का देख रहे हैं? गर्दवा ऐसे थोड़ी उड़ेगा। जाइए जल्दी फिलिम देख आइए। 😉

चलते चलते सोनू निगम की आवाज़ में प्रशांत इंगोले का लिखा इस फिल्म का लिखा गीत  सुन लीजिए। इसमें आपको स्वरा भास्कर के साथ दिखेंगे इस्तियाक खाँ !

Wednesday, March 22, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पुनरावलोकन : कौन रहे पिछले साल के संगीत सितारे ? Top 25 Songs of 2016 : Recap

तो चलिए वार्षिक संगीतमाला 2016  के समापन के अवसर पर आज चर्चा करते हैं पिछले साल के संगीत सितारों पर। सबसे पहले संगीतकारों की बात। पिछले साल ए आर रहमान, विशाल भारद्वाज, सलीम सुलेमान, साजिद वाजिद, अजय अतुल जैसे नामी संगीतकार हिंदी फिल्म संगीत के परिदृश्य से लगभग गायब ही रहे। हाँ, शंकर अहसान लॉय ने जरूर मिर्जया में किए गए प्रयोगों से सुर्खियाँ बटोरीं वहीं विशाल शेखर सुल्तान के संगीत से अपनी गिरती साख बचाने में सफल रहे।


उभरते हुए नए संगीतकारों में अरमान मलिक ने  एयरलिफ्ट, M S Dhoni The untold story, अज़हर, सरबजीत, सनम रे जैसी फिल्मों में अपने गीतों की मधुरता की वज़ह से खासी लोकप्रियता अर्जित की। वहीं बावरा बंधुओं का मदारी के लिए रचा गीत भी भविष्य की संभावनाओं के लिए दस्तक दे गया।

पर अगर मुझे साल 2016  के तीन विशिष्ट संगीतकारों का नाम लेना हो तो मैं उस सूची में क्लिंटन सेराजो, प्रीतम और अमित त्रिवेदी का नाम लेना चाहूँगा। क्लिंटन की गायिकी से तो मैं पहले भी परिचित था पर गिटार पर उनकी माहिरी   का स्वाद मैंने  TE3N, जुगनी और कहानी 2 के उन गीतों से चखा जो इस संगीतमाला का हिस्सा बने हैं। प्रीतम ने दंगल में तो हरियाणवी दंगल ही मचा दिया। ऐ दिल है मुश्किल में उनका संगीत भी काफी सराहा गया। 

पर मेरे लिए इस साल के संगीतकार रहे अमित त्रिवेदी। फितूर में उनका संगीत संयोजन बेमिसाल रहा। उड़ता पंजाब और डियर ज़िदगी के कुछ गीतों में भी उन्होंने जान डाल दी।

साल के बेहतरीन एलबम का सेहरा मैं हरियाणवी रंग में रँगे दंगल को पहनाना चाहूँगा। फितूर, सुल्तान, एम एस धौनीऐ दिल है मुश्किल भी साल के कुछ अन्य अच्छे संगीत एलबम रहे।

साल की आवाज़ का तो खिताब तो अरिजीत सिंह ले गए। चन्ना मेरेया, मरहम, नैना, ऐ ज़िंदगी गले लगा ले और तेरे बिना जी ना लगे जैसे गीतों से उन्होंने इस गीतमाला में एकछत्र राज किया। सरताज खाँ , सरवर खाँ और जुबीन नौटियाल साल की कुछ नयी प्रतिभाशाली आवाज़ों में से थे। आश्चर्य की बात ये रही कि संगीतमाला में सिर्फ चार गीत ऐसे थे जिसमें सिर्फ गायिकाओं की आवाज़ गूँजी। फ़ैज़ की नज़्म चंद रोज़ में पल्लवी जोशी का काम काफी सराहा गया  वहीं जोनिता गाँधी की आवाज़ दंगल में दिल को गिलहरियों की तरह फुदकाने में कामयाब रही। क़ुरातुलेन बलोच, नंदिनी सिरकर के गाए गीत भी संगीतमाला का हिस्सा बने। पर श्रेया और सुनिधि की अनुपस्थिति को क्या उनके युग का अस्ताचल माना जाना चाहिए?


गीतकारों में ये साल बिना किसी प्रतिस्पर्धा के अमिताभ भट्टाचार्य के नाम रहा। संगीतमाला में उनके लिखे सात गीत शामिल हुए। स्वानंद किरकिरे ने फितूर के लिए शानदार काम किया वहीं इरशाद कामिल ने सुल्तान और मदारी के लिए कुछ बेहतरीन गीत लिखे। तनवीर गाज़ी ने पिंक के गीत कारी कारी को लिखकर दिल जीत लिया वहीं मनोज मुन्तसिर  धोनी, रुस्तम और वन नाइट स्टैंड जैसी फिल्मों में अपने नर्म मुलायम नग्मों से हमें बहलाते रहे।

डांस नंबर्स में सबसे ज्यादा मजा बागी के छम छम छम और ऐ दिल है मुश्किल के ब्रेकअप सांग में आया। वैसे युवा पीढ़ी पिछले साल काला चश्मा और बेबी को बेस पसंद है पर भी खूब थिरकी। साल का सबसे मनोरंजक या हँसाने वाला गाना निसंदेह हानिकारक बापू रहा। 

तो ये था पिछले साल के हिंदी फिल्म संगीत सितारों का लेखाजोखा। इस संगीतमाला के साथ बने रहने और समय समय पर अपनी राय से अवगत कराते रहने के लिए शुक्रिया। आशा है ये श्रंखला आप सब को पसंद आयी होगी।

वार्षिक संगीतमाला  2016 
1. चन्ना मेरेया Channa Mereya
2. इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत गुम है गुम है गुम है Ikk Kudi
3. जग घूमेया थारे जैसा ना कोई Jag Ghoomeya
4. पश्मीना धागों के संग कोई आज बुने ख़्वाब Pashmina
5. बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है   Hanikaarak Bapu
6. होने दो बतियाँ, होने दो बतियाँ   Hone Do Batiyan
7.  क्यूँ रे, क्यूँ रे ...काँच के लमहों के रह गए चूरे'?  Kyun Re..
8.  क्या है कोई आपका भी 'महरम'?  Mujhe Mehram Jaan Le...
9.   जो सांझे ख्वाब देखते थे नैना.. बिछड़ के आज रो दिए हैं यूँ ... Naina
10. आवभगत में मुस्कानें, फुर्सत की मीठी तानें ... Dugg Duggi Dugg
11.  ऐ ज़िंदगी गले लगा ले Aye Zindagi
12. क्यूँ फुदक फुदक के धड़कनों की चल रही गिलहरियाँ   Gileheriyaan
13. कारी कारी रैना सारी सौ अँधेरे क्यूँ लाई,  Kaari Kaari
14. मासूम सा Masoom Saa
15. तेरे संग यारा  Tere Sang Yaaran
16.फिर कभी  Phir Kabhie
17 चंद रोज़ और मेरी जान ...Chand Roz
18. ले चला दिल कहाँ, दिल कहाँ... ले चला  Le Chala
19. हक़ है मुझे जीने का  Haq Hai
20. इक नदी थी Ek Nadi Thi

Thursday, March 16, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 सरताज गीत: मेरे ज़िक्र का जुबाँ पे स्वाद रखना ..चन्ना मेरेया Channa Mereya

वार्षिक संगीतमाला 2016 की आख़िरी सीढ़ी पर पहुँचते हुए वक़्त आ गया है सरताजी बिगुल बजाने का और बिना किसी आश्चर्य के यहाँ गीत है फिल्म ऐ दिल है मुश्किल का। ये गीत पिछले साल खूब बजा और अभी भी लगातार बज रहा है। अरिजीत सिंह की मर्मस्पर्शी गायिकी, अमिताभ भट्टाचार्य के खूबसूरत बोल और प्रीतम का पश्चिमी और भारतीय संगीत का प्यारा मिश्रण ही इस गीत को मेरे लिए साल के पच्चीस बेहतरीन गीतों की सूची में अव्वल नंबर पर ले आया है। मैंने अक्सर महसूस किया है है कि जो गीत अपने साथ उदासी की चादर लपेटे होते हैं उनका साया दिनों दिन दिल पर गहराता सा जाता है और चन्ना मेरेया एक ऐसा ही गीत है।


चाँद को लेकर ना जाने कितने गीतों के मुखड़े रचे गए होगे। साहिर का चाँद, मज़रूह का चाँद, गुलज़ार का चाँद... लगभग सारे गीतकारों ने चाँद को केंद्र में रखकर गीत लिखे हैं। चाँद है भी तो इतना खूबसूरत कि हर बार उसे देखकर हमारी भावनाएँ अलग अलग रूपों में निकलती हैं। कभी बासी नहीं होतीं। अमिताभ भट्टाचार्य ने उसी बिम्ब का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए एक अतिरिक्त काम ये जरूर किया है कि उन्होंने इसी बहाने चाँद के पंजाबी रूप चन्ना से हमारा परिचय करा दिया। मानना होगा अमिताभ की प्रतिभा को कि बस एक शब्द से गीत को वो हल्का सा ही सही पर आंचलिक रंग देने में सफल हो जाते हैं। दंगल का घणा हो या यहाँ चन्ना मेरेया यानि मेरा चाँद, ये शब्द कानों में वहाँ की मिट्टी की मिठास घोल देते हैं।

प्रीतम और अमिताभ की जोड़ी कोई नयी नहीं है। पिछले कुछ सालों से इस जोड़ी ने कई शानदार नग्मे दिए हैं। प्रीतम की आदत है कि वो हमेशा फिल्म के एक गीत के लिए कई धुनें बनाते हैं। ऐ दिल है मुश्किल की कहानी करण जौहर से सुनने के बाद उन्हो्ने पाँच छः धुने बनायीं और उन्हें सुनाने के लिएले गए। इनमें से तीन धुनें करण ने पहली बार सुनते ही स्वीकृत कर दी। चन्ना मेरेया की धुन उनमें से एक थी। प्रीतम भारतीय वाद्यों के पश्चिमी वाद्य यंत्रों के साथ फ्यूजन में माहिर रहे हैं। यहाँ भी गिटार परिवार के सदस्यों के साथ ढोलक, मुखड़े और अंतरों में साथ बजता है वहीं इंटरल्यूड्स में शहनाई और सारंगी की तान भी सुनाई देती है। एक अनुभवी संगीतकार होने के नाते इस शब्द प्रधान गीत में वो संगीत को कहीं हावी नहीं होने देते और अरिजीत तो बस कमाल हैं। दर्द भरे गीतों में अगर शास्त्रीयता का मिश्रण हो तो वो अरिजीत की आवाज़ में खूब फबता है।

ऐ दिल है मुश्किल बतौर फिल्म तो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आयी थी। इकतरफ़े प्रेम का विषय संभावना से भरा तो था पर घटिया पटकथा ने अच्छे कलाकारों के होते हुए भी मजा किरकिरा कर दिया था। पर जो बात फिल्म उतने अच्छे से कह नहीं पायी वो ये गीत कह गया। कहते हैं अच्छी दोस्तियाँ बहुधा प्रेम में तब्दील हो जाती हैं। अगर दोनों ओर समान भावनाएँ ना हों तो इकतरफा प्रेम में पड़े रहने या फिर माया मोह को त्याग कर वैरागी बनने का विकल्प तो हैं  ही। पर हक़ीकत तो ये भी है कि इन विकल्पों को जीना इतना आसान भी नहीं ।
 

ख़ैर साथ ना भी हो तो गीतकार ये उम्मीद जगाते ही हैं कि जब भी इन दोस्तों का आपसी जिक्र हो, दूसरे की जुबाँ पर एक मिठास आ जाए और  माहौल चंदन सी खुशबू से समा जाए।  विरह बेला में रचे इस गीत को रणबीर कपूर पर्दे पर अपनी उदासी आंखों से जीवंत करते नज़र आते हैं। तो आइए सुनते हैं एक बार फिर ये नग्मा..

अच्छा चलता हूँ दुआओं में याद रखना
मेरे ज़िक्र का जुबाँ पे स्वाद रखना
दिल के संदूकों में मेरे अच्छे काम रखना
चिट्ठी तारों में भी मेरा तू सलाम रखना
अँधेरा तेरा, मैंने ले लिया
मेरा उजला सितारा तेरे नाम किया
चन्ना मेरेया मेरेया चन्ना मेरेया मेरेया

चन्ना मेरेया मेरेया बेलिया ओ पिया ..

महफ़िल में तेरी हम ना रहें जो
गम तो नहीं है गम तो नहीं है
किस्से हमारे नज़दीकियों के
कम तो नहीं हैं कम तो नहीं हैं
कितनी दफा सुबह को मेरी
तेरे आँगन में बैठे मैंने शाम किया
चन्ना मेरेया मेरेया चन्ना मेरेया मेरेया...पिया...

तेरे रूख से अपना रास्ता मोड़ के चला..
चन्दन हूँ मैं अपनी ख़ुशबू छोड़ के चला..
मन की माया रख के तेरे तकिये तले
बैरागी, बैरागी का सूती चोला ओढ़ के चला
ओ पिया ..


वार्षिक संगीतमाला की आखिरी कड़ी में करेंगे 2016  के संगीत का पुनरावलोकन और देखेंगे कि आख़िर पिछला साल रहा संगीत के किन दिग्गजों के नाम..

वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक 
2. इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत गुम है गुम है गुम है Ikk Kudi
3. जग घूमेया थारे जैसा ना कोई Jag Ghoomeya
4. पश्मीना धागों के संग कोई आज बुने ख़्वाब Pashmina
5. बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है   Hanikaarak Bapu
6. होने दो बतियाँ, होने दो बतियाँ   Hone Do Batiyan
7.  क्यूँ रे, क्यूँ रे ...काँच के लमहों के रह गए चूरे'?  Kyun Re..
8.  क्या है कोई आपका भी 'महरम'?  Mujhe Mehram Jaan Le...
9. जो सांझे ख्वाब देखते थे नैना.. बिछड़ के आज रो दिए हैं यूँ ... Naina
10. आवभगत में मुस्कानें, फुर्सत की मीठी तानें ... Dugg Duggi Dugg
11.  ऐ ज़िंदगी गले लगा ले Aye Zindagi
12. क्यूँ फुदक फुदक के धड़कनों की चल रही गिलहरियाँ   Gileheriyaan
13. कारी कारी रैना सारी सौ अँधेरे क्यूँ लाई,  Kaari Kaari
14. मासूम सा Masoom Saa
15. तेरे संग यारा  Tere Sang Yaaran
16.फिर कभी  Phir Kabhie
17 चंद रोज़ और मेरी जान ...Chand Roz
18. ले चला दिल कहाँ, दिल कहाँ... ले चला  Le Chala
19. हक़ है मुझे जीने का  Haq Hai
20. इक नदी थी Ek Nadi Thi

Tuesday, March 14, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 रनर्स अप : इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत गुम है गुम है गुम है Ikk Kudi

वार्षिक संगीतमाला 2016 के रनर्स अप खिताब का सेहरा बँधा है पंजाब के लोकप्रिय कवि शिव कुमार बटालवी की कविता इक कुड़ी जेदा नाम मोहब्बत के एक अंश पर आधारित उड़ता पंजाब के इस गीत के नाम। शिव कुमार बटालवी का नाम पंजाब के उन कवियों में शुमार होता है जो वहाँ के बाशिंदों के ह्रदय में बसते हैं। उड़ता पंजाब के निर्देशक अभिषेक दुबे ने उनकी कविता का अपनी फिल्म में इस्तेमाल कर इस कवि के प्रति पूरे देश में रुचि उत्पन्न कर दी जिसकी वजह से काव्य प्रेमी शिव कुमार बटालवी की  कई अन्य बेहतरीन रचनाओं से रूबरू हो पाए हैं । 

शिव कुमार बटालवी की निजी ज़िंदगी से इस कविता का क्या सरोकार था,? कौन थी वो लड़की जो उनकी ज़िदगी से गुम हो गयी थी ? इन सब के बारे में मैं पहले ही यहाँ विस्तार से लिख चुका हूँ। आज तो आपको मुझे  ये बताना है कि ये प्यारा सा नग्मा उड़ता पंजाब का हिस्सा कैसे बन गया?


दरअसल फिल्म के निर्देशक जब फिल्म की कहानी पर काम कर रहे थे तभी इस गीत की जरूरत उन्हें महसूस हुई। फिल्म में बिहारी मजदूर का किरदार निभाती आलिया भट्ट की पंजाब में आने के पहले की ज़िंदगी और उसके अंदर एक हाकी खिलाड़ी बनने की चाह को निर्देशक इस गीत को पार्श्व में रखकर दिखाना चाहते थे। जब बटालवी की पूरी कविता चार पन्नों में सज कर अमित त्रिवेदी के पास पहुँची तो वो असमंजस में पड़ गए कि आख़िर फिल्म के गीत के लिए इसका कौन सा हिस्सा चुना जाए ? आख़िरकार कविता के शुरुआती हिस्से को चुना गया। गीत के दो वर्जन बने। एक को शाहिद माल्या से गवाया गया और दूसरे को दिलजीत दोसांझ से। गीत दोनों रूपों में बेहतरीन है पर दिलजीत की आवाज़ के साथ अमित त्रिवेदी की धुन दिल को सचमुच जीत ले जाती है।

पंजाब के संगीत उद्योग में दिलजीत दोसांझ कोई नया नाम नहीं हैं। जालंधर के दोसांझ कलां गाँव से ताल्लुक रखने वाले दिलजीत पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से पंजाबी संगीत जगत में सक्रिय हैं। दस के करीब संगीत एलबम निकालने वाला ये गायक कई पंजाबी फिल्मों का भी हिस्सा रह चुका है। जहाँ तक हिंदी फिल्मों का सवाल है उड़ता पंजाब के आलावा दिलजीत  तेरे नाल लव हो गया, मेरे डैड की मारुति, यमला पगला दीवाना 2  और सिंह इज़ ब्लिंग जैसी फिल्मों में अपनी आवाज़ दे चुके हैं। बटालवी ने ख़ुद इसे जिस अंदाज़ में गाया था उससे अलग लय में अमित ने दिलजीत से ये गीत गवाया और उनकी इस बात के लिए तारीफ करनी होगी की गीत के मूड को उन्होंने यूँ  पकड़ा की उनकी आवाज़ में उस गुम हुई लड़की का दर्द सहज ही उभर आया। गीत में उदासी की लकीरों को और गहरा करने में साथ दिया इलेक्ट्रिक व बास गिटार से सजे  संगीत संयोजन ने ।

आख़िर गीत के पंजाबी बोलों में बटालवी ने कहना क्या चाहा है?


इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

सूरत ओसदी परियाँ  वरगी, 
सीरत दी ओ.. मरियम लगदी
हसदी है ताँ फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है ताँ ग़ज़ल है लगदी
लम्म स लम्मी सरू दे  क़द दी। . हाय
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
पर नैणा दी गल्ल समझ दी
इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है...

इक लड़की जिसका नाम मोहब्बत था, वो गुम है, गुम है , गुम है। सादी सी, प्यारी सी वो लड़की गुम है। उसका चेहरा परियों जैसा था और हृदय मरियम सा पवित्र। वो हँसती तो लगता जैसे फूल झड़ रहे हों और चलती तो लगता जैसे एक ग़ज़ल ही मुकम्मल  हो गई हो। लंबाई ऐसी कि सरू के पेड़ को भी मात दे दे। जवानी तो जैसे उसके अभी उतरी थी पर आंखों की भाषा वो खूब समझती थी। पर वो आज नहीं है। कहीं नहीं है। :(



सच कहूँ तो इस गीत का कैनवस फिल्म से कहीं आगे तक विस्तृत है। अगर आप उड़ता पंजाब ना भी देखें तो भी इस गीत से जुड़ने आपको थोड़ा सा भी वक़्त नहीं लगेगा। आख़िर कितनी प्रेम कहानियाँ अपने मुकाम तक पहुँच पाती हैं? जिस मोहब्बत का हम सपना देखते हैं क्या वो भाव जीवन पर्यन्त हमारे साथ रहता है? क्या हम एक समझौते के तहत प्रेम में बने रहने का ख़ुद से छलावा नहीं करते? क्या उस खोयी मोहब्बत की गुमशुदगी का अहसास रह रह कर हमें नहीं कचोटता?

शिव कुमार बटालवी का ये सहज सा गीत इसलिए विशेष नहीं कि वो उनकी प्रेमिका की खूबसूरती बयाँ करता है बल्कि इसलिए कि ये हमारे अंदर की उस टीस, उस हसरत को उभारता है जिस मोहब्बत को हमने वक़्त के हाथों लाचार होकर भुलाया हुआ है।

वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक 
2. इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत गुम है गुम है गुम है Ikk Kudi
3. जग घूमेया थारे जैसा ना कोई Jag Ghoomeya
4. पश्मीना धागों के संग कोई आज बुने ख़्वाब Pashmina
5. बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है   Hanikaarak Bapu
6. होने दो बतियाँ, होने दो बतियाँ   Hone Do Batiyan
7.  क्यूँ रे, क्यूँ रे ...काँच के लमहों के रह गए चूरे'?  Kyun Re..
8.  क्या है कोई आपका भी 'महरम'?  Mujhe Mehram Jaan Le...
9. जो सांझे ख्वाब देखते थे नैना.. बिछड़ के आज रो दिए हैं यूँ ... Naina
10. आवभगत में मुस्कानें, फुर्सत की मीठी तानें ... Dugg Duggi Dugg
11.  ऐ ज़िंदगी गले लगा ले Aye Zindagi
12. क्यूँ फुदक फुदक के धड़कनों की चल रही गिलहरियाँ   Gileheriyaan
13. कारी कारी रैना सारी सौ अँधेरे क्यूँ लाई,  Kaari Kaari
14. मासूम सा Masoom Saa
15. तेरे संग यारा  Tere Sang Yaaran
16.फिर कभी  Phir Kabhie
17 चंद रोज़ और मेरी जान ...Chand Roz
18. ले चला दिल कहाँ, दिल कहाँ... ले चला  Le Chala
19. हक़ है मुझे जीने का  Haq Hai
20. इक नदी थी Ek Nadi Thi

Friday, March 10, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान #3 : जग घूमेया थारे जैसा ना कोई Jag Ghoomeya

वार्षिक संगीतमाला 2016 की आख़िरी तीन पायदानें बची हैं और इन पर विराजमान तीनों नग्मे बड़े प्यारे व लोकप्रिय हैं और आपने पिछले साल इन्हें कई दफ़ा जरूर सुना होगा। संगीतमाला की तीसरी सीढ़ी  पर जो गीत है उसे संगीतबद्ध किया विशाल शेखर ने और बोल लिखे इरशाद कामिल ने।  सुल्तान फिल्म का ये गीत है जग घूमेया। इस गीत के दो वर्जन हैं। एक जिसे गाया राहत फतेह अली खाँ ने और दूसरे को आवाज़ दी नेहा भसीन ने। गाने तो आपको आज दोनों ही सुनाएँगे पर पहले ज़रा जान तो कि किस तरह जग घूमेया की धुन पहले दिन की पहली संगीत सिटिंग में ही बना ली गयी।

विशाल शेखर को जब सुल्तान की पटकथा सुनाई गयी तो उन्हें लगा ये तो बड़ी रोचक कहानी है और इसके लिए संगीत रचने में मजा आने वाला है। अगले ही दिन जब वो यशराज  स्टूडियो पहुँचे तो उन्होंने चार पाँच धुनें तैयार कीं पर इन धुनों में उन्होंने सबसे पहले जग घूमेया को ही फिल्म के निर्देशक अली अब्बास जाफ़र को सुनाया। अली ने धुन सुनते जी कहा कि क्या बात है ! अदित्य चोपड़ा को भी धुन पसंद आयी। अक्सर निर्माता निर्देशक  कई तरह की धुनें सुनना पसंद करते हैं पर यहाँ मामला पहली बार में ही लॉक हो गया। अली और आदि ने माना कि ये सुल्तान के संगीत की बेहतरीन शुरुआत है।

पर धुन तो गीत नहीं होता तो उसमें इरशाद कामिल को अपने शब्द भरने थे। कामिल अली के साथ पहले ही गुंडे और मेरे ब्रदर की दुल्हन में साथ काम कर चुके थे। इस गीत के लिए उन्हें सुल्तान के चरित्र में डूबना पड़ा। इरशादकामिल का इस गीत  के बारे में कहना है
जब तक आप चरित्र को पूरी तरह समझ नहीं लेते तब तक आप दिल से नहीं लिख सकते। ऊपरी तौर पर भी गीत लिखे जाते हैं पर जग घुमेया जैसे रूमानी गीत को लिखने के लिए मुझे ख़ुद सुल्तान के चरित्र को आत्मसात करना पड़ा।


शायद ही हममें से कोई ऐसा हो जिसने अपने होने वाले हमसफ़र के लिए सपने गढ़े ना हों। पर सपने कहाँ हमेशा सच होते हैं और कई बार तो हमारी तमन्नाएँ ही माशाल्लाह इतनी लंबी चौड़ी होती हैं कि वो पूरी हो भी नहीं सकती। फिर भी कुछ लोग होते हैं सुल्तान जैसे जिन्हें उनके सपनों के जहाँ से आगे की ऐसी शख़्सियत मिलती है जो दुनिया में अपनी तरह की अकेली हो। 

वैसे ये भी तो है कि अगर कोई अच्छा लगने लगे तो फिर दिल भी पूरी तरह अनुकूल यानि conditioned हो जाता है उनके लिए। उनका चेहरा हो या आँखें, मुस्कुराहट हो या नादानियाँ सब इतने प्यारे, इतने भोले लगने लगते हैं जैसे पहले  कभी लगे ही ना थे। इरशाद कामिल इन्हीं भावनाओं को बेहद नर्म रूपकों में कुछ यूँ क़ैद करते हैं...




ओ.. ना वो अखियाँ रूहानी कहीं, ना वो चेहरा नूरानी कहीं
कहीं दिल वाली बातें भी ना, ना वो सजरी जवानी कहीं
जग घूमेया थारे जैसा ना कोई, जग घूमेया थारे जैसा ना कोई

ना तो हँसना रूमानी कहीं, ना तो खुशबू सुहानी कहीं
ना वो रंगली अदाएँ देखीं, ना वो प्यारी सी नादानी कहीं
जैसी तू है वैसी रहणा...जग घूमेया...

बारिशों के मौसमों की भीगी हरियाली तू
सर्दियों में गालों पे जो आती है वो लाली तू
रातों का सुकूँ भी है, सुबह की अज़ान है
चाहतों की चादरों में, मैंने है सँभाली तू

कहीं अग जैसे जलती है, बने बरखा का पाणी कहीं
कभी मन जाणा चुपके से, यूँ ही अपनी चलाणी कहीं
जैसी तू है वैसी रहणा...जग घूमेया...

अपणे नसीबों में या, हौसले की बातों में
सुखों और दुखों वाली, सारी सौगातों में
संग तुझे रखणा है, यूने संग रहणा
मेरी दुनिया में भी, मेरे जज्बातों में

तेरी मिलती निशानी कहीं, जो है सबको दिखानी कहीं
तू तो जाणती है मरके भी, मुझे आती है निभाणी कहीं
वो ही करना है जो है कहणा

ये गीत पहले अरिजीत सिंह की आवाज़ में रिकार्ड किया गया था। बाद में सलमान से अनबन की वजह से अंततः राहत इस गीत की आवाज़ बने।  विशाल कहते हैं कि गीत के दो वर्जन अलग अलग मूड लिए हुए हैं और उनका कहना बिल्कुल सही है। राहत के वर्जन में जहाँ प्यार की खुमारी है, एक उत्साह है वही नेहा भसीन के वर्जन में प्यार के साथ एक ठहराव है, सुकून है और मेंडोलिन और तुम्बी का नाममात्र का संगीत संयोजन है। नेहा इस तरह के गीत कम ही गाती हैं पर उन्होंने इसे बखूबी निभाया है..


वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक 
3. जग घूमेया थारे जैसा ना कोई Jag Ghoomeya
4. पश्मीना धागों के संग कोई आज बुने ख़्वाब Pashmina
5. बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है   Hanikaarak Bapu
6. होने दो बतियाँ, होने दो बतियाँ   Hone Do Batiyan
7.  क्यूँ रे, क्यूँ रे ...काँच के लमहों के रह गए चूरे'?  Kyun Re..
8.  क्या है कोई आपका भी 'महरम'?  Mujhe Mehram Jaan Le...
9. जो सांझे ख्वाब देखते थे नैना.. बिछड़ के आज रो दिए हैं यूँ ... Naina
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12. क्यूँ फुदक फुदक के धड़कनों की चल रही गिलहरियाँ   Gileheriyaan
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15. तेरे संग यारा  Tere Sang Yaaran
16.फिर कभी  Phir Kabhie
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20. इक नदी थी Ek Nadi Thi

 

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