Wednesday, October 23, 2019

एक सुरीली शाम स्निति के नाम ! Musical evening with Sniti Mishra

नौ साल पहले ओडिशा के छोटे से शहर बलांगिर से आई स्निति को मेंने Sa Re Ga Ma Singing Superstars में सुना था तो सूफी के रंगों में रँगी उस अलग सी आवाज़ को सुनकर प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका था। उसी वक्त एक शाम मेरे नाम पर उनके बारे में यहाँ लिखा भी था।


क्या पता था कि नौ साल बाद ऊपरवाला मुझे मौका देगा अपने शहर राँची में उसी प्रतिभाशाली गायिका की मेजबानी करने का। मौका था एक तकनीकी सेमिनार के साथ होने वाले संगीत के कार्यक्रम का, जिसमें मैंने उन्हें इस साल आमंत्रित किया था।

ऐसे सजी थी राँची में स्निति की महफिल
दो दिन हमारे साथ स्निति रहीं और उन दो दिनों में प्रैक्टिस से लेकर शो तक स्निति ने नए पुराने गीतों और ग़ज़लों का जो गुलदस्ता हमें सुनाया उसकी मिठास अब तक कानों में गूँज रही है। स्निति की आवाज़ को मंच पर श्रोताओं से रूबरू कराने के पहले मैंने कहा कि अगर आप पूछें कि उनकी आवाज़ में मुझे क्या विशिष्ट लगता है तो मैं यही कहूँगा कि उनकी आवाज़ में सूफ़ी संगीत सा ठहराव है, ग़ज़लों सी नजाकत है, पुराने हिंदी फिल्मी गानों सी मिठास है और आज के फ्यूजन सा नयापन है।

रिहर्सल में स्निति के साथ बैठना संगीत की वैतरणी में डुबकी लगाने जैसा था।

उनकी आवाज़ की इसी विशिष्टता को श्रोताओं तक पहुंचाने के लिए हमने ऐसे गीतों को चुना जिसमें उनके हुनर का हर रंग छलके।  अभी मुझ में कहीं.., मोरा सैयाँ मोसे बोले ना.., सजदा.., मितवा.. इन आंखों की मस्ती के.., जो तुम याद आए बहुत याद आए.., ज़रा सी आहट होती है.., निगाहें मिलाने को जी चाहता है..., घूमर.., लागा चुनरी में दाग..., यारा सिली सिली..., फूलगेंदवा ना मार..., आज जाने की ज़िद ना करो के माध्यम से उन्होंने संगीत के हर मूड को अपनी गायिकी से छुआ और ऐसा छुआ कि सारे संगीतप्रेमी झूम उठे।

कार्यक्रम शुरु होने के ठीक पहले मैं स्निति के साथ मंच पर
स्निति की कोशिश रहती है कि वो हर गीत में कुछ improvisation करें ताकि सुनने वाले के लिए वो अनुभव विशिष्ट हो जाए और यही हुआ भी। अधिकांश लोगों का ये मानना था कि इन कार्यक्रमों में गाने तो पहले भी सुनते थे पर विशुद्ध संगीत क्या होता है उसका स्वाद इस बार ही चखा।

प्रैक्टिस और शो के बीच के समय में उनसे सारेगामापा के पहले और बाद की उनकी सांगीतिक यात्रा पर ढेर सारी बातें हुईं। तो चलिए जानते हैं स्निति के इस सफ़र के बारे में.. 
राँची के कार्यक्रम में अपनी गायिकी में मगन स्निति
स्निति के माता पिता शास्त्रीय संगीत के प्रेमी रहे हैं। घर में शास्त्रीय संगीत खूब सुना जाता और बच्चों को सुनाया जाता। नब्बे के उस दशक में अनु कपूर की मेरी आवाज़ सुनो और सोनू निगम के सारेगामा जैसे कार्यक्रम के तैयार गायकों को देख पिता भी आश्वस्त हो चले थे कि बिना अच्छे प्रशिक्षण के वहाँ स्थान बना पाना मुश्किल है। स्निति का बालमन  किशोर सुनिधि चौहान और सोनू निगम की गायिकी से बहुत प्रभावित हो चुका था पर उनके पिताजी चाहते थे कि उनकी शिक्षा किसी काबिल शिक्षक से शुरु की जाए ताकि शास्त्रीय संगीत की जो आरंभिक नींव पड़े वो पुख्ता हो। अब बलांगिर में ऐसे शिक्षक कहाँ मिलते? वो तो स्निति का सौभाग्य था कि भुवनेश्वर से तभी स्थानांतरित हो कर शास्त्रीय संगीत के शिक्षक रघुनाथ साहू बलांगिर पधारे और स्निति ने उनसे सीखना शुरु किया। तब बारह साल की स्निति सातवीं कक्षा की छात्रा थीं।


स्निति की पढ़ाई और शास्त्रीय संगीत की शिक्षा चलती रही। इसी बीच उन्होंने सारेगामापा के ऑडिशन में भाग लेना भी शुरु कर दिया। स्निति के गुरु उन्हें शास्त्रीय संगीत के इतर गीत सुनने तक के लिए मना करते जबकि सारेगामापा के मेंटर्स को हर प्रकृति के गीत गाने वाले  हरफनमौला गायकों की तलाश रहती। स्निति अपने गुरु के बताए मार्ग पर चलती रहीं। नतीजा ये हुआ कि वो सारेगामापा की आखिरी बाधा पार करने के पहले ही दो बार छँट गयीं।

स्निति थोड़ी निराश तो हुईं पर उन्होंने उससे उबरने के लिए अपनी MBA की पढ़ाई पर ध्यान देना शुरु किया जिसमें 2010 में उन्होंने दाखिला लिया था। उसी साल सारेगामापा ने अपने पैटर्न में बदलाव किया। सिंगिंग सुपरस्टार्स वाली शृंखला में नए पुराने गीतों के आलावा शास्त्रीय संगीत और ग़ज़लों के लिए अलग राउंड रखे गए थे। इसलिए मेंटर्स का ध्यान इस बार ऐसे गायकों पर था जो ऐसी विधाओं में भी पारंगत हों। अपनी माँ के उत्साहित करने पर उन्होंने फिर ऑडिशन में अपनी किस्मत आजमाई। स्निति की गायिकी इस बार के कार्यक्रम के बिल्कुल अनुकूल थी। सारेगामापाा में स्निति की आवाज़ का जादू सर चढ़कर बोला। वहाँ से लौट कर  उन्होंने अपना MBA पूरा किया और फिर  मुंबई में शिफ्ट हो गयीं।



सारेगामापा या इसके जैसे अन्य रियालिटी शो भले ही आपको कुछ समय की प्रसिद्धि दिला देते हों पर अपने पाँव ज़माने के लिए असली मेहनत उसके बाद शुरु होती है। जहाँ तक स्निति का सवाल है तो मुंबई जाने से पहले ही उनके मन में ये स्पष्टता थी कि उन्हें शास्त्रीय संगीत के इर्द गिर्द ही अपनी गायिकी को आगे बढ़ाना है


स्निति बताती हैं कि वो एक बेहद वरीय शास्त्रीय वादक से अपने मार्गदर्शन ले लिए मिलीं। उन्होंने स्निति से कहा कि देखो मेरा दौर कुछ और था। अगर आज तुम्हें इस विधा में बढ़ना है तो शास्त्रीय संगीत के साथ साथ फ्यूजन का भी सहारा लेना पड़ेगा। दरअसल खालिस शास्त्रीय गायिकी में अपना मुकाम बनाने के लिए आज भी किसी घराने की विरासत बहुत काम करती है। जिसके ऊपर घरानों की छत्रछाया नहीं है उसके लिए अपने को शास्त्रीय गायिकी में स्थापित करना आसान नहीं। 

पिछले कुछ सालों में स्निति ने सूफी संगीत व सुगम शास्त्रीय संगीत के आलावा नए पुराने हिंदी फिल्मी गानों और चुनिंदा ग़ज़लों को भी अपने अलग अंदाज़ में आवाज़ें दी हैं। उन्होंने तमिल व कश्मीरी गीतों को भी बखूबी निभाया है और भविष्य में आप उनके गाए बांग्ला गीत को भी सुन पाएँगे।

स्निति की आवाज़ में एक ठुमरी
हिंदी फिल्मी गीतों को गाने से उन्हें परहेज़ नहीं बशर्ते कि उन्हें जो मौके मिलें वो उनकी प्रतिभा से न्याय कर सकें। स्निति ने अपने लिए एक उसूल बना रखा है कि वो डमी गीत नहीं गाएँगी। यही सोच उनकी आइटम नंबर्स के लिए भी है। उन्होंने अब तक जो भी प्रोजेक्ट लिए हैं उसमें इस बात का ध्यान रखा है कि वो उनकी आवाज़ के अनुरूप हों।

स्निति मानती हैं कि किसी भी गायक को  आगे बढ़ने के लिए  गीतों के कवर वर्सन के साथ साथ अपना  रचा हुए मूल संगीत भी बनाना जरूरी है जिसे आज दुनिया Independent Music  के नाम से जानती है।


जां निसार लोन के साथ स्निति का गाया एक कश्मीरी गीत

स्निति ऐसा सोचती हैं कि जिस तेजी से डिजिटल काटेंट आजकल बनाया और इंटरनेट पर उपभोग किया जा रहा है वो कुछ दिनों में इसे फिल्मों और टीवी के समकक्ष या उससे भी सशक्त माध्यम बना देगा। इसलिए अभी उनका ध्यान इसी माध्यम पर अपनी नई प्रस्तुतियाँ देने का है। आने वाले सालों के लिए उनकी योजना है कि ना केवल वो गाएँ बल्कि अपने गीतों को कंपोज भी करें। एक सपना उन्होंने और भी पाल रखा है और वो है एक प्रोडक्शन हाउस बनाने का जिसमें वे नए कलाकारों को ऐसा मंच प्रदान कर सकें जिस पर वो अपनी प्रतिभा दिखला सकें।

स्निति जितनी प्रतिभाशाली गायिका हैं उतने ही सहज और विनम्र व्यक्तित्व की स्वामिनी भी हैं। अपने कार्य के प्रति उनका समर्पण देखते ही बनता है। मुझे पूरा विश्वास है कि उन्होंने अपने लिए जो संगीत की राह तय की है उस पर उनकी ये सुरीली यात्रा चलती रहेगी।

Friday, October 04, 2019

देखो आलोय आलो आकाश....अरिजीत सिंह Dekho Aaloy Alo Akash

नए गायकों में अरिजीत सिंह युवाओं के सबसे चहेते हैं। जब भी किसी नई हिंदी फिल्म का संगीत रिलीज़ होता है तो अक्सर मैंने देखा है कि लोग बाग उसमें अरिजीत का गाया हुआ गाना ढूँढते हैं। उनकी लोकप्रियता का आलम ये है कि संगीतकार भी उनके लिए फिल्म की सबसे अच्छी कम्पोजीशन सुरक्षित रखते हैं। ये भी सच है कि अरिजीत ने पिछले एक दशक से अपनी गायिकी पर काफी मेहनत की है। भले ही वो अपने रूमानी गीतों के लिए जाने जाते हैं पर उन्होंने शास्त्रीय गीतों और ग़ज़लों को भी उतनी ही रवानी से गाया है और इसीलिए वो हम सबके प्रिय गायक हैं।


हिंदी फिल्मों के लिए उनके गाए गीतों को तो आप सब इस ब्लॉग की वार्षिक संगीतमाला में सुनते ही रहे हैं। आपमें से शायद बहुतों को ना पता हो कि अरिजीत मूलतः पश्चिम बंगाल के मुर्शीदाबाद से ताल्लुक रखते हैं यानी उनकी मातृभाषा बंगाली है। चलिए आज मैं आपको उनका बेहद नर्म संज़ीदा सा एक बंगाली गीत सुनवाता हूँ उसके अनुवाद के साथ। ये गीत है फिल्म खाद (Khad) का जो 2014 में रिलीज़ हुई थी।। हिंदी में इस बंगाली शब्द का अर्थ है खाई । 

बड़ी अलग सी कहानी थी इस फिल्म की। कुछ अनजाने लोग एक साथ सफ़र पर हैं और उनकी बस दुर्घटनाग्रस्त हो कर एक खाई में गिर जाती है। सबको हल्की चोट आती है। ऊपर जाने के लिए इतना समय नहीं बचता तो वे लोग एक रात एक साथ इकठ्ठा बिताते हैं। उनमें से कोई ये सुझाव देता है कि एक खेल खेला जाए जिसमें सब अपनी ज़िदगी के ऐसे रहस्यों का खुलासा करें जिसे कहने से वो झिझकते हों। शायद ऐसा करने से उनके मन की ग्लानि उस अंतहीन खाई में समा जाएँ और वो अगली सुबह एक नई ज़िदगी जीने के लिए निकलें। सब एक एक कर अपनी दिल में ज़मीं काली परतों को उधेड़ते हैं और ऐसा करते करते सुबह हो जाती है और तब आता है कहानी का झकझोर देने वाला मोड़।

हालांकि मैं बताना तो नहीं चाहता था फिर भी इस गीत के संदर्भ के लिए बताना पड़ेगा मुझे कि दरअसल ये सारे लोग मर चुके थे और उनकी आत्माएँ उनके शरीर से निकलने के पहले ग्लानिबोध से मुक्त होने के लिए ये खेल खेल रही थीं। 
इन्द्रदीप दासगुप्ता व श्रीजतो बंदोपाध्याय

कौन जानता है कि मरने के पहले मनुष्य के मन में कैसी भावनाएँ पैदा होती हैं। बंगाली फिल्मों के लोकप्रिय गीतकार श्रीजतो बंदोपाध्याय उपनिषद के मंत्र के साथ इस गीत में आती हुई मृत्यु के ठीक पहले की मानसिक अवस्था को टटोलने की कोशिश करते हैं। पर आशा के विपरीत उनका ये चित्रण डरावना नहीं बल्कि खुशी और निश्चिंतता से भरा है। आत्मा जब ग्लानि मुक्त होकर उड़ चले तो शायद उसमें ऐसे ही भाव उमड़ते हों।

असतो मा सद्गमय। 
तमसो मा ज्योतिर्गमय। 
मृत्योर मां अमृतम गमय ॥ 
शान्ति शान्ति ओम
शान्ति ओम शान्ति ओम हरि ओम तत्सत


देखो आलोय  आलो आकाश, देखो आकाश ताराए भोरा
देखो जावार पोथेर पाशे, छूटे हवा पागोल परा
ऐतो आनंदो आयोजोन, शोबी  बृथा आमाय छाड़ा
धोरे थाकुक आमार मूठो, दुई चोखे थाकुक धारा
एलो समोय राजार मोतो, होलो काजेर हीसेब सारा
बोले आए रे छूटे, आए रे तोरा
हेथा नाइको मृत्तू नाइको जोरा

असतो मा सद्गमय...

देखो तारों से भरा हुआ कितना चमकीला आकाश है ये !
रास्ते के साथ साथ ये कैसी मस्ती में बहकी हुई  हवा बह रही है
प्रकृति में ये जो उत्सव सा माहौल है वो सब निरर्थक है मेरे बिना
मेरा हाथ अच्छी तरह पकड़े रखना
ये तुम्हारी आँखों से जो आँसू बहने वाले हैं उन्हें रोक कर रखना
ये समय तो राजा जैसा है
जिंदगी के कामों का जो हिसाब था वो पूरा हो गया
दौड़ के आओ कि अब मरने का कोई डर नहीं।

मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

अरिजीत की आवाज़ में श्रीजतो के शब्द और इन्द्रदीप दासगुप्ता की प्यारी धुन चित्त को बिल्कुल शांत कर देती है। संगीत की पहुँच भाषा से कहीं आगे है और मुझे यकीन है कि इस अगर इस गीत का अर्थ आप नहीं भी जानते तो भी इससे प्रेम करने लगते।

Thursday, September 19, 2019

ज़िंदगी को न बना लें वो सज़ा मेरे बाद.. मेहदी हसन / हिमानी कपूर Zindagi Ko Na Bana Lein

कई बार नए कलाकार कुछ ऐसी पुरानी ग़ज़लों की याद दिला देते हैं जिनसे सालों से राब्ता टूटा हुआ था। पिछले हफ्ते जनाब मेहदी हसन की गायी ऐसी ही एक नायाब ग़ज़ल सुनने को मिली। दरअसल गणेशोत्सव में हर साल संगीतकार व गायक शंकर महादेवन के यहाँ सुरों की महफिल जमती है। इस बार उस आयोजन में युवा गायिका हिमानी कपूर ने बड़े प्यार से हकीम नासिर की इस ग़ज़ल के कुछ शेर गुनगुनाए और सच में सुन के आनंद आ गया।
मेहदी हसन/ हिमानी कपूर
अब जब इस ग़ज़ल की बात हो रही है तो उसे रचने वाले हकीम नासिर साहब के बारे में भी कुछ जान लिया जाए। जनाब काबिल अजमेरी की तरह नासिर साहब की पैदाइश राजस्थान के अजमेर में हुई थी। विभाजन के बाद उनका परिवार कराची में बस गया। घर का पुश्तैनी काम ही हकीमी था सो नासिर साहब ने भी बाप दादा के बनाए कराची के निजामी दवाखाने में हकीमी की। कॉलेज के ज़माने में नासिर साहब ने नियमित रूप से क्रिकेट भी खेली। कराची के हमदर्द कॉलेज से हिकमत की पढ़ाई करने के दौरान ही उन्हें शायरी का चस्का लगा।

हकीम नासिर
हकीम मोहम्मद नासिर मोहब्बतों के ही शायर रहे। उनकी सबसे ज्यादा मकबूल ग़ज़ल "जब से तूने मुझे दीवाना बना ..  " है जिसे आबिदा  परवीन  ने अपनी रुहानी आवाज़ से कालजयी बना दिया। हकीम साहब से उनके हर मुशायरे में इस ग़ज़ल को पढ़ने की गुजारिश होती रहती थी। याद के लिए चंद अशआर इसी ग़ज़ल के आप सब की नज़र

जब से तूने मुझे दीवाना बना रक्खा है
संग हर शख़्स ने हाथों में उठा रक्खा है 

उस के दिल पर भी कड़ी इश्क़ में गुज़री होगी
नाम जिस ने भी मोहब्बत का सज़ा रक्खा है 

इश्क़ के सामने कौन नहीं बेबस हो जाता है और इसी बेबसी पर उनकी एक ग़ज़ल और याद आ रही है जिसमें उन्होंने लिखा था

इश्क़ कर के देख ली जो बेबसी देखी न थी
इस क़दर उलझन में पहले ज़िंदगी देखी न थी

आप से आँखें मिली थीं फिर न जाने क्या हुआ 
लोग कहते हैं कि ऐसी बे-ख़ुदी देखी न थी

हाकिम नासिर के इश्क़िया मिज़ाज की गवाही देते ये अशआर भी खूब थे..

ये दर्द है हमदम उसी ज़ालिम की निशानी
दे मुझ को दवा ऐसी कि आराम न आए

मैं बैठ के पीता रहूँ बस तेरी नज़र से
हाथों में कभी मेरे कोई जाम न आए 

तो आइए अब बात करें उस ग़ज़ल की जिससे आज की बात शुरु हुई थी। एक अजीब सी तड़प है इस ग़ज़ल मेंजिससे मोहब्बत थी उसका साथ छूट गया पर उसके बावज़ूद शायर को इस बात का यकीं है कि जिस शिद्दत से उसने मुझे प्यार किया था वो शिद्दत अपने मन  में वो और किसी के लिए नहीं ला पाएगी। 

अब अगर ये शायर की खुशफहमी है तब तो कोई बात ही नहीं पर अगर यही हक़ीक़त है तो फिर मन ये सवाल जरूर करता है कि इतने प्यारे रिश्ते को तोड़ने की जरूरत क्या थी? पर ये भी तो सच है ना कि रिश्तों की डोर कब पूरी तरह अपने हाथ में रही है?

ज़िंदगी को न बना लें वो सज़ा मेरे बाद
हौसला देना उन्हें मेरे ख़ुदा मेरे बाद


कौन घूँघट को उठाएगा सितम-गर कह के
और फिर किस से करेंगे वो हया मेरे बाद

हाथ उठते हुए उन के न कोई देखेगा
किस के आने की करेंगे वो दुआ मेरे बाद



फिर ज़माने में मोहब्बत की न पुर्सिश* होगी
रोएगी सिसकियाँ ले ले के वफ़ा मेरे बाद

किस क़दर ग़म है उन्हें मुझ से बिछड़ जाने का
हो गए वो भी ज़माने से जुदा मेरे बाद

वो जो कहता था कि ‘नासिर’ के लिए जीता हूँ
उस का क्या जानिए क्या हाल हुआ मेरे बाद

* पूछ 

बहरहाल मेहदी हसन साहब की ये ग़ज़ल आपने सुनी ही होगी। 


हिमानी ने भी इस ग़ज़ल के कुछ अशआरों को बड़े दिल से निभाया है। हिमानी की आवाज़ का मैं तब से प्रशंसक रहा हूँ जब वे 2005 के सा रे गा मा पा में पहली बार संगीत के मंच पर दिखाई पड़ी थीं। पहली बार जब उनकी आवाज़ में  जिया धड़क धड़क जिया धड़क धड़क जाये... सुना था तो रोंगटे खड़े हो गए थे।


हिमानी ने पिछले एक दशक में बैंड बाजा बारात और बचना ऐ हसीनों सहित सात आठ फिल्मों के लिए गाने गाए हैं पर एक दो गानों को छोड़कर उनके बाकी गाने उतने लोकप्रिय नहीं हुए। इंटरनेट के युग में उनके जैसे हुनरमंद कलाकार अब अपने सिंगल्स खुद ही निकाल रहे हैं। हिमानी का मानना है कि फिल्मों के बजाए Independent Music करने में सहूलियत ये होती है कि आप अपनी पसंद के गीत चुनते हैं और दर्शकों से सीधे मुखातिब होते हैं।

ये ग़ज़ल भी उन्होंने यू ट्यूब पर पहली बार ॠषिकेश में गंगा के किनारे यूँ ही रिकार्ड की थी पर जैसा मैंने आपको ऊपर बताया कि हाल ही में इसे उन्होंने शंकर महादेवन के घर में सुनाया। आप भी सुन लीजिए उनका ये प्यारा सा प्रयास...


आज तो ना हमारे बीच हकीम मोहम्मद नासिर हैं और ना ही मेहदी हसन साहब लेकिन जब तक उनकी गायिकी का परचम फहराने वाले ऐसे युवा कलाकार हमारे बीच रहेंगे उनकी याद हमेशा दिल में बनी रहेगी।

Saturday, August 17, 2019

जिसे मिलना ही नहीं उससे मोहब्बत कैसी... सोचता जाऊँ मगर दिल में उतरता देखूँ (Tu jo aa jaye..)

सत्तर के दशक में जगजीत जी ने कई ग़ज़लें गायीं। कभी निजी महफिलों में तो कभी स्टेज शो में। वो वक़्त ग्रामोफोन का हुआ करता था। चुनिंदा ग़ज़लें ही रिकार्ड होती थीं। जब कैसेट का युग आया तो भी उस शुरुआती दौर में HMV का एकाधिकार रहा।  नतीजा ये हुआ कि जगजीत जी की बहुत सारी ग़ज़लें उनके उसे पहली बार गाने के कई दशकों बाद किसी एलबम का हिस्सा बनीं। आज इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिकी की लिखी जो ग़ज़ल आपको सुनाने जा रहा हूँ वो इसी कोटि की है।


इस ग़ज़ल को लिखने वाले सीमाब अकबराबादी के पोते इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिकी से आपकी मुलाकात मैंने फिल्म अर्थ के लिए लिखी उनकी चर्चित ग़ज़ल तू नहीं तो ज़िदगी में और क्या रह जाएगा के जिक्र के दौरान की थी। दादा की मौत के बाद उनका परिवार आगरा से मुंबई आया और विकट परिस्थितियों में शायर पत्रिका का सालों साल बिना रुके संपादन करता रहा। वे अपने किसी भी साक्षात्कार में फक्र से ये बताना नहीं भूलते कि एक समय वो भी था जब निदा फ़ाज़ली जैसा शायर उन्हें ख़त लिखता था कि उनकी शायरी पत्रिका में छाप दी जाए।

इमाम साहब की ज़िंदगी ने तब दुखद मोड़ लिया जब वर्ष 2002 में चलती ट्रेन पर चढ़ने की कोशिश में वो गिर पड़े और उस दुर्घटना के बाद उमका कमर से नीचे का हिस्सा बेकार हो गया। आज उनकी ज़िंदगी व्हीलचेयर के सहारे ही घिसटती है, फिर भी वो इसी हालत में 'शायर' के संपादन में जुटे रहते हैं। कुछ साल पहले भास्कर को दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि
"हमारी विरासत शायरी है। हम उसे आगे ले जाने के लिए हर सुबह आंखें खोलते हैं और रात में पलकें झपकाते हैं तो इस यकीन के साथ कि अगली सुबह फिर अदब को मज़बूती देने के लिए सांस लेते हुए उठेंगे। यही हमारी ज़िंदगी है। कई बार कुछ लोग कहते हैं कि जिस साहित्यिक समाज के लिए हमने सब कुछ दांव पर लगा दिया, उसने बेकद्री की है, लेकिन हमें ऐसा कतई नहीं लगता। तमाम संस्थाओं ने मान-सम्मान दिया है, हमारी ग़ज़लें पढ़ी-सुनी हैं, ‘शायर’ को अब तक हाथोहाथ लिया है तो चंद दुखों के आगे लोगों की मोहब्बत को हम कैसे नाकाफी कह दें।
जगजीत सिंह, चित्रा सिंह, पंकज उधास और सुधा मल्होत्रा जैसे गायक और गायिकाओं ने मेरे कलाम गाए, निदा फाज़ली और बशीर बद्र को फ़िल्म इंडस्ट्री से इंट्रोड्यूस कराने का मुझे मौका मिला, कृश्नचंदर, महेंदरनाथ, राजिंदर सिंह बेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास से सोहबत रही- और बताइए, दौलत क्या होती है। "
इमाम साहब का ये जज़्बा यूँ ही बना रहे। उनकी मशहूर ग़ज़लों की तो रिकार्डिंग उपलब्ध नहीं पर उनको अगर आप तरन्नुम में गाते सुन लें तो यूँ महसूस होगा कि सफेद बालों के इस वृद्ध इंसान के भीतर रूमानियत से भरा एक युवा दिल आज भी धड़क रहा है।


वैसे तो मुझे उनकी ये पूरी ग़ज़ल ही प्यारी लगती है पर इसके दो शेर खासतौर पर दिल के करीब लगते हैं। पहला तो वो जिसमें इमाम साहब कहते हैं जिसे मिलना ही नहीं उससे मोहब्बत कैसी...सोचता जाऊँ मगर दिल में उतरता देखूँ और दूसरा वो चंद लम्हे जो तेरे कुर्ब के मिल जाते हैं...इन्ही लम्हों को मैं सदियों में बदलता देखूँ।

जिन्हें हम पसंद करते हैं उनके साथ ज़िदगी बीते ना बीते उनका स्थान दिल की गहराइयों में वैसे ही बना रहता है और जब कभी ऐसी शख्सियत से मुलाकात होती है तो उन बेशकीमती पलों को हम हृदय में तह लगाकर रख देते हैं और जब जब मन होता है उन यादों को ओढ़ते बिछाते रहते हैं।

तू जो आ जाए तो इस घर को सँवरता देखूँ
एक मुद्दत से जो वीरां है वो बसता देखूँ

ख़्वाब बनकर तू बरसता रहे शबनम शबनम
और बस मैं इसी मौसम को निख़रता देखूँ

जिसे मिलना ही नहीं उससे मोहब्बत कैसी
सोचता जाऊँ मगर दिल में उतरता देखूँ

चंद लम्हे जो तेरे कुर्ब के मिल जाते हैं
इन्ही लम्हों को मैं सदियों में बदलता देखूँ
(कुर्ब : निकटता )

जगजीत जी ने इसी बहर में पाकिस्तान के मशहूर शायर अहमद नदीम कासिमी का भी एक शेर गाया है जो कुछ यूँ है

दिल गया था तो ये आँखें भी कोई ले जाता
मैं फ़क़त एक ही तस्वीर कहाँ तक देखूँ  😄            -


स्टेज शो में तब जगजीत बहुत कुछ मेहदी हसन वाली शैली अपनाते थे। यानी ग़ज़ल के अशआरों के बीच श्रोताओं को उनकी शास्त्रीय गायिको सुनने का लुत्फ मिल जाया करता था। जगजीत ने  इस ग़ज़ल में राग दुर्गा पर आधारित बंदिश का इस्तेमाल किया है।

जगजीत जी को ग़ज़लों के साथ कई नए तरह के वाद्य यंत्र जैसे वॉयलिन, पियानो, सरोद आदि इस्तेमाल करने का श्रेय दिया जाता है पर नब्बे के दशक के बाद उनके संगीत संयोजन में एक तरह का दोहराव आने लगा। अगर आप उस समय के एलबमों को सुनते हुए बड़े हुए हैं तो उनकी ये ग़ज़ल और उसका संगीत संयोजन आपको ग़ज़ल गायिकी की पारंपरिक शैली की ओर ले जाता मिलेगा। मुझे तो लुत्फ़ आ गया इसे सुन कर। आप भी सुनें।

Sunday, July 14, 2019

सूनी सूनी साँस के सितार पर ...नीरज की एक कविता जो बन गयी गीत Sooni Sooni Sanson Ke Sitar Par...

आधुनिक हिंदी कविता के प्रशंसकों में शायद ही कोई ऐसा हो जो गोपाल दास नीरज के गीतों, मुक्तक, दोहों और कविताओं से दो चार नहीं हुआ होगा। नीरज हिंदी फिल्मों में भी साठ और सत्तर के दशक में सक्रिय रहे और करीब पाँच दशकों बाद भी उनके गीत आज भी बड़े चाव से गाए व गुनगुनाए जाते हैं। नीरज जी के लिखे सबसे शानदार गीत सचिन देव बर्मन और शंकर जयकिशन जैसे संगीतकारों की झोली में गए। पर हिंदी फिल्म जगत में नीरज की पारी ज्यादा दिन नहीं चल सकी। सचिन दा और जयकिशन की मृत्यु और संगीत के बदलते परिवेश ने फिल्मी गीत लेखन से उनका मन विमुख कर दिया। 


उनके सफल दर्जन भर गीतों की बानगी लें तो उसमें हर रस के गीत मौज़ूद थे। प्रेम, (लिखे जो खत तुझे... रँगीला रे..., जीवन की बगिया महकेगी....) शोखी, (ओ मेरी ओ मेरी शर्मीली...., रेशमी उजाला है मखमली अँधेरा....) उदासी, (दिल आज शायर है, कैसे कहें हम..., खिलते हैं गुल यहाँ खिल के बिखरने को...., मेघा छाए आधी रात....) भक्ति, (राधा ने माला जपी श्याम की....) और हास्य (धीरे से जाना खटियन में खटमल...., ऐ भाई ज़रा देख के चलो...) जैसे सारे रंग मौज़ूद तो थे उनकी लेखनी में।

कवियों ने जब जब गीतकार की कमान सँभाली है तो अपनी कविताओं को गीतों में पिरोया है। धर्मवीर भारती की लिखी कविता  ये शामें सब की सब शामें क्या इनका कोई अर्थ नहीं.... याद आती है जिसका आांशिक प्रयोग सूरज का सातवाँ घोड़ा में हुआ था। नीरज ने कई बार अपनी कविताओं को गीत में ढाला। उनकी अमर रचना कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे को फिल्म "नए उमर की नई फ़सल " में हूबह लिया गया। नीरज की एक और कविता थी जिसका कुछ हिस्सा इस्तेमाल हुआ शंकर जयकिशन की  फिल्म लाल पत्थर के एक गीत सूनी सूनी साँस के  सितार ..  में गीत के अंतरे तो फिल्म के लिहाज से सहज बना दिए गए पर आज उनके उस गीत को सुनवाने से पहले वो कविता सुन लीजिए जो प्रेरणा थी उस गीत की।

नीरज की इस कविता में एक आध्यात्मिक सोच है जिस पर उदासी का मुलम्मा चढ़ा है। वे कहते हैं कि जीवन में कभी भी आपके चारों ओर सब कुछ धनात्मक उर्जा से भरा नहीं होता। जब एक ओर कुछ रिश्ते प्रगाढ़ होते रहते हैं तो वहीं किसी दूसरे संबंध में दरारें पड़ने लगती हैं। कहीं सृजन हो रहा होता है तो साथ ही कई विनाश गाथा रची जा रही होती है। कहीं प्रेम का ज्वार फूट रहा होता है तो कहीं उसी प्रेम को घृणा की दीवार तहस नहस करने को आतुर रहती है।  

वैसे भी इस संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है। सुख दुख के इन झोंकों के बीच हम जीवन की नैया खेते रहना ही शायद अमिट सत्य है जिसे जितनी जल्दी हम स्वीकार कर लें उतना ही बेहतर..। 

सूनी-सूनी साँस के सितार पर
गीले-गीले आँसुओं के तार पर
एक गीत सुन रही है ज़िन्दगी
एक गीत गा रही है ज़िन्दगी।
चढ़ रहा है सूर्य उधर, चाँद इधर ढल रहा
झर रही है रात यहाँ, प्रात वहाँ खिल रहा
जी रही है एक साँस, एक साँस मर रही
इसलिए मिलन-विरह-विहान में
इक दिया जला रही है ज़िन्दगी
इक दिया बुझा रही है ज़िन्दगी।
रोज फ़ूल कर रहा है धूल के लिए श्रंगार
और डालती है रोज धूल फ़ूल पर अंगार
कूल के लिए लहर-लहर विकल मचल रही
किन्तु कर रहा है कूल बूंद-बूंद पर प्रहार
इसलिए घृणा-विदग्ध-प्रीति को
एक क्षण हँसा रही है ज़िन्दगी
एक क्षण रूला रही है ज़िन्दगी।
एक दीप के लिए पतंग कोटि मिट रहे
एक मीत के लिए असंख्य मीत छुट रहे
एक बूंद के लिए गले-ढले हजार मेघ
एक अश्रु से सजीव सौ सपन लिपट रहे
इसलिए सृजन-विनाश-सन्धि पर
एक घर बसा रही है ज़िन्दगी
एक घर मिटा रही है ज़िन्दगी।
सो रहा है आसमान, रात हो रही खड़ी
जल रही बहार, कली नींद में जड़ी पड़ी
धर रही है उम्र की उमंग कामना शरीर
टूट कर बिखर रही है साँस की लड़ी-लड़ी
इसलिए चिता की धूप-छाँह में
एक पल सुला रही है ज़िन्दगी
एक पल जगा रही है ज़िन्दगी।
जा रही बहार, आ रही खिजां लिए हुए
जल रही सुबह बुझी हुई शमा लिए
रो रहा है अश्क, आ रही है आँख को हँसी
राह चल रही है गर्दे-कारवां लिए हुए
इसलिए मज़ार की पुकार पर
एक बार आ रही है ज़िन्दगी
एक बार जा रही है ज़िन्दगी।

उनकी कविता में  कहीं आशा का चढ़ता सूरज है कहीं निराशा की ढलती साँझ है। कहीं फूल धूल पर बिछने को तैयार बैठा है और वही धूल उस फूल की सुंदरता नष्ट करने पर तुली है। लहरें किनारों से मिलने के लिए उतावली हैं और किनारा पास आती लहरों पर प्रहार करने से भी नहीं सकुचा रहा। करोड़ों पतंगे एक दीप की चाह में अपने जीवन की कुर्बानियाँ दे रहे हैं। इष्ट मीत के प्रेम को पाने के लिए हम कितनों के प्रणय निवेदन को अनदेखा कर रहे हैं। इन सोते जागते पलों और बदलते जीवन में कहीं हँसी की खिलखिलाहट है तो कहीं रुदन का विलाप



नीरज ने फिल्म में अपनी कविता का मूल भाव और मुखड़ा वही रखते हुए अंतरों का सरलीकरण कर दिया। शंकर जयकिशन के साझा सांगीतिक सफ़र का वो आखिरी साल था। दिसंबर 1971 में इस फिल्म के प्रदर्शित होने के तीन महीने पहले जयकिशन लिवर की बीमारी की वजह से दुनिया छोड़ चुके थे। शास्त्रीय रचनाओं में प्रवीण ये संगीत रचना भी संभवतः शंकर की ही होगी। उन्होंने इस गीत को राग जयजयवंती पर आधारित किया था। 

शुरुआत और अंत में आशा जी के आलाप गीत को चार चाँद लगाते हैं। उनकी शानदार गायिकी की वज़ह से उस साल के फिल्मफेयर में ये गीत नामित हुआ था। गीत के इंटरल्यूड्स में सितार का बेहतरीन प्रयोग मन को सोहता है।

इस गीत को फिल्माया गया था राखी पर। दृश्य था कि राखी मंच पर अपना गायन प्रस्तुत कर रही हैं और उनके पीछे विभिन्न वाद्य यंत्र लिए वादक मंच पर बैठे हैं। मजे की बात ये कि गीत में पीछे दिखते वाद्यों में शायद ही किसी का प्रयोग हुआ है। बज तबला और सितार रहा है पर वो दिखता नहीं है। अपने पुराने प्रेम को भूलते हुए ज़िदगी में नायिका का नए सिरे से रमना कितना कठिन है। इसलिए नीरज गीत में कहते हैं कि एक सुर मिला रही है ज़िंदगी...एक सुर भुला रही है ज़िंदगी

सूनी सूनी साँस के सितार पर
भीगे भीगे आँसुओं के तार पर
एक गीत सुन रही है ज़िंदगी
एक गीत गा रही है ज़िंदगी
सूनी सूनी साँस के सितार पर ...

प्यार जिसे कहते हैं
खेल है खिलोना है
आज इसे पाना है कल इसे खोना है
सूनी सूनी ...... तार पर
एक सुर मिला रही है ज़िंदगी
एक सुर भुला रही है ज़िंदगी
सूनी सूनी साँस के सितार पर ...

कोई कली गाती है
कोई कली रोती है
कोई आँसू पानी है
कोई आँसू मोती है
सूनी सूनी ....... तार पर
किसी को हँसा रही है ज़िंदगी
किसी को रुला रही है ज़िंदगी
सूनी सूनी साँस के सितार पर .

   

राखी के आलावा इस फिल्म में थे राज कुमार और विनोद मेहरा और साथ ही थीं हेमा मालिनी एक विलेन के किरदार में

Sunday, June 30, 2019

ओ घटा साँवरी, थोड़ी-थोड़ी बावरी O Ghata Sanwari

बरसात की फुहारें रुक रुक कर ही सही मेरे शहर को भिंगो रही हैं। पिछले कुछ दिनों से दिन चढ़ते ही गहरे काले बादल आसमान को घेर लेते हैं। गर्जन तर्जन भी खूब करते हैं। बरसते हैं तो लगता है कि कहर बरपा ही के छोड़ेंगे पर फिर अचानक ही उनका नामालूम कहाँ से कॉल आ जाता है और वे चुपके से खिसक लेते हैं। गनीमत ये है कि वो ठंडी हवाओं को छोड़ जाते हैं जिनके झोंको का सुखद स्पर्श मन को खुशनुमा कर देता है।

ऍसे ही खुशनुमा मौसम में टहलते हुए परसों 1970 की फिल्म अभिनेत्री का ये गीत कानों से टकराया और बारिश से तरंगित नायिका के चंचल मन की आपबीती का ये सुरीला किस्सा सुन मन आनंद से भर उठा। क्या गीत लिखा था मजरूह ने! भला बताइए तो क्या आप विश्वास करेंगे कि एक कम्युनिस्ट विचारधारा वाला शायर जो अपनी इंकलाबी रचनाओ की वज़ह से साल भर जेल की हवा खा चुका हो इतने रूमानी गीत भी लिख सकता है? पर ये भी तो सच है ना कि हर व्यक्ति की शख्सियत के कई पहलू होते हैं।


मजरूह के बोलों को संगीत से सजाया था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी ने। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल कभी भी मेरे पसंदीदा संगीतकार नहीं रहे। इसकी एक बड़ी वजह थी अस्सी और नब्बे के दशक में उनका संगीत जो औसत दर्जे का होने के बावजूद भी कम प्रतिस्पर्धा के चलते लोकप्रिय होता रहा था। फिल्म संगीत की गुणवत्ता में निरंतर ह्रास के उस दौर में उनके इलू इलू से लेकर चोली के पीछे तक सुन सुन के हमारी पीढ़ी बड़ी हुई थी। लक्ष्मी प्यारे के संगीत की मेरे मन में कुछ ऐसी छवि बन गयी थी कि मैंने उनके साठ व सत्तर के दशक में संगीतबद्ध गीतों पर कम ही ध्यान दिया। बाद में मुझे इन दशकों में उनके बनाए हुए कई नायाब गीत सुनने को मिले जो मेरे मन में उनकी छवि को कुछ हद तक बदल पाने में सफल रहे।

लक्ष्मीकांत बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे। जीवकोपार्जन के लिए उन्होंने संगीत सीखा। मेंडोलिन अच्छा बजा लेते थे। एक कार्यक्रम में उनकी स्थिति के बारे में लता जी को बताया गया। फिर लता जी के ही कहने पर उन्हें कुछ संगीतकारों के यहाँ काम मिलने लगा। इसी क्रम में उनकी मुलाकात प्यारेलाल से हुई जिन्हें वॉयलिन में महारत हासिल थी। कुछ दिनों तक दोनों ने साथ साथ कई जगह वादक का काम किया और फिर उनकी जोड़ी बन गयी जो उनकी पहली ही फिल्म पारसमणि में जो चमकी कि फिर चमकती ही चली गयी़। कहते हैं कि उस ज़माने में उनकी कड़की का ये हाल था कि उनके गीत कितने हिट हुए ये जानने के लिए वे गली के नुक्कड़ पर पान दुकानों पर बजते बिनाका गीत माला के गीतों पर कान लगा कर रखते थे।

लक्ष्मी प्यारे को अगर आरंभिक सफलता मिली तो उसमें उनकी मधुर धुनों के साथ लता जी की आवाज़ का भी जबरदस्त हाथ रहा। ऐसा शायद ही होता था कि लता उनकी फिल्मों में गाने के लिए कभी ना कर दें। फिल्म जगत को ये बात पता थी और ये उनका कैरियर ज़माने में सहायक रही।

ओ घटा साँवरी, थोड़ी-थोड़ी बावरी
हो गयी है बरसात क्या
हर साँस है बहकी हुई
अबकी बरस है ये बात क्या
हर बात है बहकी हुई
अबकी बरस है ये बात क्या
ओ घटा साँवरी...

पा के अकेली मुझे, मेरा आँचल मेरे साथ उलझे
छू ले अचानक कोई, लट में ऐसे मेरा हाथ उलझे
क्यूँ रे बादल तूने.. ए ..ए.. ए.. आह उई ! तूने छुआ मेरा हाथ क्या
ओ घटा साँवरी...

आवाज़ थी कल यही, फिर भी ऐसे लहकती ना देखी
पग में थी पायल मगर, फिर भी ऐसे छनकती ना देखी
चंचल हो गये घुँघरू रू.. मे..रे..,  घुँघरू मेरे रातों-रात क्या
ओ घटा साँवरी...

मस्ती से बोझल पवन, जैसे छाया कोई मन पे डोले
बरखा की हर बूँद पर, थरथरी सी मेरे तन पे डोले
पागल मौसम जारे जा जाजा जा.. जा तू लगा मेरे साथ क्या!
ओ घटा साँवरी...

तो लौटें आज के इस चुहल भरे सुरीले गीत पर। लक्ष्मी प्यारे ने इस गीत की धुन राग कलावती पर आधारित की थी। बारिश के आते ही नायिका का तन मन कैसे एक मीठी अगन से सराबोर हो जाता है मजरूह ने इसी भाव को इस गीत में बेहद प्यारे तरीके से विस्तार दिया है। लक्ष्मी प्यारे ने लता जी से हर अंतरे की आखिरी पंक्ति में शब्दों के दोहराव से जो प्रभाव उत्पन्न किया है वो लता जी की आवाज़ में और मादक हो उठा है। तो चलिए हाथ भर के फासले पर मँडराते बादल और मस्त पवन के झोंको के बीच सुनें लता जी की लहकती आवाज़ और छनकती पायल को ...


जितना प्यारा ये गीत है उतना ही बेसिरपैर का इसका फिल्मांकन है। हेमा मालिनी पर फिल्माए इस गीत की शुरुआत तो बारिश से होती है पर गीत खत्म होते होते ऐसा लगता है कि योग की कक्षा से लौटे हों। बहरहाल एक रोचक तथ्य ये भी है कि इस फिल्म के प्रीमियर पर धरम पा जी ने पहली बार अपनी चंगी कुड़ी हेमा को देखा था।

एक शाम मेरे नाम पर मानसूनी गीतों की बहार  

Saturday, June 15, 2019

यादें इब्ने इंशा की : फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों ! Farz Karo..

इब्ने इंशा का आज यानी 15 जून को जन्मदिन है। अगर वो आज हमारे साथ रहते तो उनकी उम्र 92 की होती। इब्ने इंशा मेरे पसंदीदा साहित्यकारों में से एक रहे हैं। शायर इसलिए नहीं कह रहा कि मुझे उनके लिखे व्यंग्य भी बेहद उम्दा लगते हैं। उर्दू की आखिरी किताब पढ़ते वक़्त जितना मैं हँसते हँसते लोटपोट हुआ था उसके बाद वैसी कोई मजेदार किताब पढ़ने को नहीं मिली। उनके यात्रानामों का अभी तक हिंदी में अनुवाद नहीं आया है। जिस दिन आएगा उस दिन चीन जापान से लेकर मध्य पूर्व के उनके यात्रानामों को पढ़ने की तमन्ना है।



जो लोग कविता को पढ़ पढ़ कर रस लेते हैं उनके लिए इब्ने इंशा जैसा कोई शायर नहीं है। इंशा जी की शायरी में जहाँ एक ओर शोखी है, शरारत है तो वहीं दूसरी ओर एक बेकली, तड़प और एक किस्म की फकीरी भी है। अपने दुख के साथ साथ समाज के प्रति अपने दायित्व को उनकी नज़्में बारहा उभारती हैं। ये बच्चा किसका बच्चा है और बगदाद की एक रात उनकी ऍसी ही श्रेणी की लंबी नज़्में हैं। 

आजकल के शायरों में अगर चाँद किसी की नज़्मों और गीतों मे बार बार दिखता है तो वो गुलज़ार साहब हैं पर जिनलोगों ने इब्ने इंशा को पढ़ा है वो जानते हैं कि चाँद के तमन्नाइयों में इंशा सबसे ऊपर हैं। बचपन में उनकी शायरी से मेरा परिचय जगजीत सिंह की गाई ग़ज़ल कल चौदहवीं की रात थी, से ही हुआ था। इंशा ने अपनी पहली किताब का भी नाम चाँदनगर रखा। इंशा ने इस बात का जिक्र भी किया है कि उनका घर एक रेलवे स्टेशन के पास था जिसके ऊपर बने पुल पर वो घंटों चर्च के घंटा घर की आवाज़ें सुनते और चाँद को निहारा करते थे। चाहे वो एकांत में रहें या शहर की भीड़ भाड़ में, चाँद से उनकी प्रीति बनी रही। चाँदनगर की प्रस्तावना में अपनी शायरी के बारे में इंशा लिखते हैं...   
मैं शुरु से स्वाभाव का रूमानी था पर मैं ऍसे संसार का वासी हूँ जहाँ सब कुछ प्रेममय नहीं है। मेरी लंबी नज़्में मेरे आस पास की घटनाओं का कटु सत्य उजागर करती हैं। हालांकि कई बार ऐसा लेखन मेरी रूमानियत के आड़े आता रहा। फिर भी मैंने कोशिश की चाहे प्रेम हो या जगत की विपदा जब भी लिखूँ मन की भावनाओं को सच्चे और सशक्त रूप में उभारूँ।
अब फर्ज करो को ही लीजिए। कैसी शरारत भरी नज़्म है कि एक ओर तो उनके दिल में दबा प्रेम इस रचना के हर टुकड़े से कुलाँचे मार कर बाहर निकलना चाहता है तो दूसरी ओर अपनी ही भावनाओं को हर दूसरी पंक्ति में वो विपरीत मोड़ पर भी ले जाते हैं ताकि सामने वाले के मन में संशय बना रहे। ये जो इंसानी फितरत है वो थोड़ी बहुत हम सबमें हैं। प्रेम से लबालब भरे पड़े हैं पर जब सीधे पूछ दिया जाए तो कह दें नहीं जी ऐसा भी कुछ नहीं हैं। आपने आखिर क्या सोच लिया और फिर बात को ही घुमा दें? अपनी बात कहते हुए जिस तरह इंशा ने हम सब की मनोभावनाओं पर चुपके से सेंध मारी है,वो उनकी इस रचना को इतनी मकबूलियत दिलाने में सफल रहा।


इब्ने इंशा को उनके जन्मदिन पर याद करने के लिए उनकी बेहद लोकप्रिय नज़्म पढ़ने की कोशिश की है। यूँ तो इब्ने इंशा की इस नज़्म को छाया गाँगुली और हाल फिलहाल में जेब बंगेश ने अपनी आवाज़ से सँवारा है पर जो आनंद इसे बोलते हुए पढ़ने में आता है वो संगीत के साथ सुनने में मुझे तो नहीं आता। आशा है आप भी पूरे भावों के साथ साथ ही में पढ़ेंगे इसको

फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों
फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों

फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से जोड़ सुनाई हो
फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो

फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों
फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों

फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हो
फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो

फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो
फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो




एक शाम मेरे नाम पर इब्ने इंशा

Tuesday, May 28, 2019

यादें रवींद्र जैन की : घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं.. Ghunghroo Ki Tarah

अक्सर हम अपने मूड के हिसाब से गीतों को सुनते हैं पर कई दफ़ा ऐसा होता है कि चाहे हम किसी भी मूड में हों कोई गीत अचानक बज कर हमें अपने रंग में रंग लेता है। मेरे साथ पिछले हफ्ते ऐसा ही हुआ। कार्यालय जाने की तैयारी करते वक़्त सारेगामा कारवाँ से घुँघरू की तरह....ये गीत गूँजा और फिर दिन भर मेरे साथ ही रह गया। कॉलेज के ज़माने में किशोर दा के गीतों को हम थोक में सुनते थे। फिल्म चोर मचाए शोर का ये गीत भी उस दौर में मुझे काफी पसंद था। आजकल जब किशोर दा को सुनना पहले से काफी कम हो गया है तो अचानक इन गीतों को सुनकर वो पुराना वक़्त सामने आ जाता है।


1974 में रिलीज़ हुई इस फिल्म के संगीतकार थे रवींद्र जैन साहब। यूँ तो इस फिल्म के तीन गीत बहुत चले थे पर उनमें से एक की तकदीर इतनी अच्छी रही कि वो साल दर साल शादी विवाह के मौसम में बारहा बजता रहा। जी हाँ वही ले जाएँगे ले जाएँगे दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे.. रह जाएँगे रह जाएँगे पैसे वाले देखते रह जाएँगे। जानते हैं इस कालजयी गीत को किसने लिखा था? इसे लिखने वाले थे पंजाब के प्रसिद्ध कवि इंद्रजीत सिंह तुलसी जिन्हें अपने पंजाबी, उर्दू और हिंदी में रचे काव्य के लिए पंजाब के राजकवि से लेकर पद्मश्री सम्मान तक मिला। इस फिल्म के गीत एक डाल पर तोता बोले एक डाल पर मैना  भी तुलसी जी की ही रचना थी।

रवींद्र जैन ने अपनी किताब सुनहरे पल में ले जाएँगे ले जाएँगे का जिक्र करते हुए लिखा है
"चोर मचाए शोर के एक गीत के लिए मैंने ढेर सारी  धुनें बनाई। कोई सिप्पी साहब को पसंद नहीं आती तो कोई अशोक राय जी को नहीं जँचती। तंग आकर मैंने सोचा की इस फ़िल्म से नाता तोड़ लिया जाए। सिटिंग से उठते उठते एक धुन यूँ ही हारमोनियम पर बजाई। सारे सुनने वाले एक सुर में, एक मत होकर कहने लगे - इसी धुन की तो तलाश थी। स्वरों को शब्दों का जमा पहनाया गया, तब प्रकट हुवा ' ले जाएँगे, ले जाएँगे दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे। जिस गाने के बिना आज भी कोई बारात नहीं निकलती।"
फिल्म के बाकी गीत ख़ुद संगीतकार रवींद्र जैन ने लिखे थे। मुझे नहीं लगता कि हिंदी फिल्म संगीत में रवींद्र जैन के आलावा कोई और संगीतकार हुआ हो जिसने बतौर गीतकार भी अपनी अमिट छाप छोड़ी हो। घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं  सुनकर ऐसा लगता है मानो उनके जीवन में सहे गए कष्टों की प्रतिध्वनि मिल गयी हो। 


अलीगढ़ के एक पढ़े लिखे परिवार से ताल्लुक रखने वाले रवींद्र जैन बचपन से ही दृष्टिहीन थे। बड़े भाई स्कूल में प्राध्यापक थे। रवींद्र तो किताबें पढ़ नहीं पाते थे। ऐसी स्थिति में उनके भाई साहित्यकारों की रचनायें उन्हें पढ़ कर सुनाते थे। साहित्य से इस तरह पनपा उनका अनुराग गीतों के माध्यम से उनकी लेखनी में उतर आया। फिल्मी दुनिया से दूर रहकर भी उन्होंने लेखनी का दामन नहीं छोड़ा। 'दिल की नज़र से' नाम से उनका ग़ज़ल संग्रह छपा। अपनी आत्मकथा 'सुनहरे पल' के आलावा उन्होंने भक्ति लेखन में अपने झंडे गाड़े। ना केवल उन्होंने गीता का सरल हिंदी में अनुवाद किया बल्कि रवींद्र रामायण नाम से एक पुस्तक भी लिख डाली।

ये गीत राग झिंझोटी पर आधारित है। राग झिंझोटी रात्रि के दूसरे पहर में गाया जाने वाला राग है। किशोर के कई उदास करने वाले लोकप्रिय गीत कोई हमदम ना रहा, कोरा  कागज था ये मन मेरा, तेरी दुनिया से हो कर मजबूर चला  राग झिंझोटी की स्वरलहरियों के ताने बाने में बुने गए हैं। 

बाँसुरी के मधुर स्वर से गीत का प्रील्यूड शुरु होता है। इंटरल्यूड्स में भी वही मधुरता कायम रहती है। जिसने जीवन में दर दर ठोकरें खाई हों, भाग्य के खिलाफ लड़ा हो वो इस सहज पर दिल से लिखे गीत से जरूर मुत्तासिर होगा। इस गीत में रवी्द्र जी ने घुँघरू जैसे रूपक का कितना प्यारा और भावनात्मक प्रयोग किया  जिसे किशोर दा की आवाज़ एक अलग मुकाम पर ले गयी। फिल्म में इस गीत के पहले दो अंतरों का इस्तेमाल हुआ है जबकि मुझे तीसरा अंतरा इस गीत का सबसे भावनात्मक हिस्सा लगता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को.. 

घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं
कभी इस पग में, कभी उस पग मैं
बँधता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं 

कभी टूट गया, कभी तोड़ा गया
सौ बार मुझे फिर जोड़ा गया
यूँ ही लुट लुट के और मिट मिट के
बनता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं...

मैं करता रहा, औरों की कही
मेरी बात मेरे, मन ही में रही
कभी मंदिर में, कभी महफ़िल में
सजता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं... 

अपनों में रहे, या गैरों में
घुँघरू की जगह तो है पैरों में
फिर कैसा गिला, जग से जो मिला
सहता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं


 

इस गीत को फिल्माया गया था शशि कपूर पर

Tuesday, May 14, 2019

कैसे बना अराधना का सदाबहार नग्मा 'रूप तेरा मस्ताना'? Story Behind 'Roop Tera Mastana'

इस साल सितंबर में राजेश खन्ना व शर्मिला टैगोर की कालजयी फिल्म अराधना को पचास साल हो जाएँगे। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा के दो महान कलाकारों की किस्मत बदल कर रख दी थी। फिल्म के नायक राजेश खन्ना इसी फिल्म की बदौलत स्टारडम की सीढियाँ चढ़ते हुए सुपरस्टार बन गए वहीं इस फिल्मों के गीतों की वज़ह से किशोर कुमार का सितारा ऐसा चमका कि वे सत्तर के दशक में सबसे लोकप्रिय गायक का मुकाम हासिल करने में सफल हुए। इन दोनों को शोहरत की बुलंदियों तक पहुँचाने में पर्दे के पीछे दो किरदार थे। फिल्म के निर्देशक शक्ति सामंत और संगीतकार सचिन देव बर्मन।

आज भी इस फिल्म के सारे गाने उतने ही प्यार से सुने जाते हैं जितने दशकों पहले सुने जाते थे। मेरे सपनों की रानी, कोरा काग़ज़ था ये मन मेरा, सफल होगी तेरी अराधना, बागों में बहार है, गुनगुना रहे हैं भँवरे, चंदा है तू मेरा सूरज है तू जैसे तमाम गीत आज भी रेडियो के विविध चैनलों में अक्सर सुनाई दे जाते हैं।


इसी फिल्म का एक और मस्ती से भरा गीत था रूप तेरा मस्ताना जिसकी बीट्स पर शायद ही कोई ऐसा हो जिसने ठुमके ना लगाए हों।  फिल्म सचिन दा की झोली में कैसे आई? ये गीत कैसे अपनी अंतिम शक्ल में आया? इन सब के पीछे एक रोचक दास्तां छिपी है। तो चलिए आज इस गीत की याद दिलाने के साथ इन किस्सों से भी आप सबको रूबरू करा दूँ

अराधना के रिलीज़ होने के दो साल पहले शक्ति सामंत की फिल्म An evening in Paris रिलीज़ हुई थी। फिल्म में शंकर जयकिशन का संगीत जबरदस्त हिट हुआ था तो ये ज़ाहिर सी बात लग रही थी कि अगली फिल्म में भी शक्ति दा शंकर जयकिशन का ही दामन थामेंगे। इसीलिए जब एक सुबह अपने सहयोगियों के साथ शक्ति दा सचिन देव बर्मन के घर पहुँचे तो दादा उन्हें देख कर चकित हुए। खागेश देव बर्मन सचिन दा पर लिखी अपनी किताब The world of his music में लिखते हैं कि

"शक्ति सामंत ने सचिन दा से कहा कि मैं इक कम बजट की फिल्म बना रहा हूँ। शंकर जयकिशन को रखना इस बजट में मेरे लिए मुश्किल है इसलिए आप के पास आया हूँ कि अगर आप...
सचिन दा बिफर उठे कि तुम मुझसे कम पैसों में काम कराना चाहते हो? बजट कम है  इसलिए मेरे पास आए हो, ऐसा सुनकर मुझे अच्छा लगेगा क्या? ये सब कहने के बजाए इतना नहीं कह सकते थे कि मुझसे संगीत निर्देशन करवाना चाहते हो?
सचिन दा पैसों के बारे में बात नहीं करते थे। पैसों का मोलभाव करना उन्हें राजसी परिवेश में पले बढ़े होने की वजह से अपनी शान के खिलाफ लगता था। पर उस दिन वो बोल उठे।
चलो ठीक है पिछली फिल्म में तुमने मुझे 75000 रुपये दिए थे। इस बार मैं 80000 रुपये लूँगा।
शक्ति सामंत ने पूरी विनम्रता से उन्हें उत्तर दिया - सर इस मद में फिल्म में एक लाख का प्रावधान है।
सचिन दा एकदम से प्रफुल्लित हो उठे। बोले एक लाख! तुम देखना इस फिल्म का संगीत ख़ुद अपनी आवाज़ बनेगा, सारे रिकार्ड तोड़ देगा।"
सचिन दा, शक्ति सामंत, राजेश खन्ना और पंचम के साथ
जैसा सचिन दा ने कहा था वैसा बाद में हुआ भी। फिल्म तो सचिन दा ने ले ली और उसके गीत बनने शुरु हुए।रूप तेरा मस्ताना गीत किस तरह अपने अस्तित्व में आया इसके पीछे दो अलग अलग मत हैं। एक तो वो जो किशोर कुमार के पुत्र अमित कुमार, संगीत से जुड़े कार्यक्रमों में बताते रहे हैं और दूसरा ब्रजेन विश्वास का कथ्य जो सचिन की टीम के तबला वादक रहे। ब्रजेन विश्वास की बात का जिक्र खागेश देव बर्मन ने भी अपनी किताब में भी किया है। खागेश जी  ने ब्रजेन विश्वास के हवाले  इस प्रसंग की चर्चा अपनी किताब में कुछ यूँ की है

एक बार जब सचिन दा मुंबई से कोलकाता आए तो अपने घर में हारमोनियम बजाते हुए बोल उठे कि जानते हो शक्ति ने मुझे अपनी फिल्म में संगीत  निर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी है। उसमें मुझे एक सेक्सी नंबर भी करना है। 
उसी के बारे में सोच रहा था कि मुझे ख्याल आया कि एक बार मैं अपने मित्र के घर गया था। बहुत देर तक दरवाजा खटखटाने के बाद वो निकला तो उसने कहा कि क्षमा करें दादा मैं अपने बेटे की शादी कर रहा हूँ इसीलिए उसे धोती पहना रहा था । वहीं एक छोटी लड़की मिट्टी के चूल्हे से खेल रही थी। जब उसने शादी वाले बालक को देखा तो जोर से हँस पड़ी और बोली तुम इस छोटे बच्चे की शादी करोगे? लड़के के  पिता ने कहा कि हाँ अभी इसलिए कर रहा हूँ कि आगे जा के ये बिगड़ न जाए। ये सुनकर वो लड़की हँसी और गाने लगी 
कालके जाबो ससुर बाड़ी, आजके खाइ गारा गरी
(यानी कल ससुराल जाना है इसलिए मैं आज खुशी से झूम रही हूँ) 
शक्ति दा की बात सुनकर मुझे यही गाना याद आ गया। मैं इसी गीत का टेंपो कम करके किशोर को गाने को कहूँगा। रही सेक्सी बनाने की बात तो गीत के बीच किशोर को गहरी साँसों के साथ आहें भरने को बोलूँगा।

सचिन दा ने जो धुन बनाई उसका कलेवर आंचलिक था। अमित कुमार के हिसाब से वो भटियाली था। गीत की परिस्थितियों से ये धुन जम नहीं रही थी। किशोर दा और पंचम दोनों ही ये महसूस कर रहे थे। अंत में हिम्मत बाँध कर पंचम ने अपने स्टाइल में कालके जाबो ससुर बाड़ी को संगीतबद्ध किया और पिता को सुनाया। सचिन दा को भी वो धुन पसंद आई और  आनंद बक्षी के बोलों की मदद से ये गीत अपना अंतिम स्वरूप ले पाया।

अमित कुमार इस प्रसंग का जिक्र कुछ दूसरी तरह से करते हैं पर उनके कथन से ज्यादा विश्वसनीयता ब्रजेन विश्वास की बातों में लगती है। बहरहाल अमित किस तरह सचिन दा की मूलधुन का जिक्र करते हैं वो देखने लायक है।

 

गायक भूपेंद्र का कहना है कि रूप तेरा मस्ताना की धुन सचिन दा की ही थी। अमित कुमार भी यही कहते हैं। धुन भले ही सचिन दा की हो पर जिस तरह के संगीत संयोजन के लिए पंचम जाने जाते थे उसकी स्पष्ट झलक इस गीत के प्रील्यूड और इंटरल्यूड में सुनाई देती है।

कॉलेज के ज़माने में किशोर कुमार के गाए चुनिंदा गीतों को मैंने कैसेट में रिकार्ड करवाया था। ये गीत साइड A का पहला गीत हुआ करता था। किशोर दा की आवाज़ और पश्चिमी वाद्यों की सुरीली धमक युवा मनों को मस्ती के रंग में ऐसी तरंगित कर देती थी कि आगे के गाने सुनने के बजाए इसी गाने को रिपीट मोड में बारहा बजाया जाता था। तो चलिए एक बार और सुनते हैं ये गीत..

रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना 
भूल कोई हमसे ना हो जाये

रात नशीली मस्त समा है 
आज नशे में सारा जहाँ है
आए शराबी मौसम बहकाए  
रूप तेरा मस्ताना....

आँखों से आँखें मिलती हैं ऍसे 
बेचैन हो के तूफ़ाँ में जैसे
मौज कोई साहिल से टकरा
रूप तेरा मस्ताना...

रोक रहा है हमको ज़माना 
दूर ही रहना पास ना आना
कैसे मगर कोई दिल को समझाए ...
रूप तेरा मस्ताना...

Friday, April 26, 2019

उदासी के रंग : कुँवर नारायण Udaasi ke Rang

रंगों की दुनिया मुझे बेहद पसंद है। हर रंग का हमारे दिलो दिमाग पर एक अलग असर होता है। कुछ रंग हमारी कमज़ोरी होते हैं और उनसे रँगे साजो समान हमें तुरत फुरत में पसंद आ जाते हैं जबकि कुछ को देख कर ही हम अपनी नाक भौं सिकोड़ने लगते हैं। 

रंगों से हमारी मुलाकात बचपन में प्रतीकों के तौर पर करायी गयी थी। सफेद रंग शांति का तो काला शोक का। लाल को गुस्से से तो नीले को सौम्यता से जोड़ कर देखा गया। कभी कभी मन में सवाल उठता है कि रंगों की दुनिया क्या इतनी सहज और एकरूपी है? सच पूछिए तो हर रंग एक आईने की तरह है। देखनेवाला उसे जिस भावना से देखे वही अक़्स उस रंग में नज़र आने लगता है।



आधुनिक हिंदी कविता के जाने माने हस्ताक्षर कुँवर नारायण ने एक कविता लिखी थी उदासी के रंग। अब शायद ही जीवन का कोई हिस्सा हो जहाँ उल्लास के साथ उदासी का रंग ना फैला हो। ऐसे ही उदास मन से कुँवर नारायण ने जब अपने आसपास की प्रकृति को देखा तो उन्हें क्या नज़र आया पढ़िए व सुनिए मेरी आवाज़ में.. 

उदासी भी
एक पक्का रंग है जीवन का
उदासी के भी तमाम रंग होते हैं
जैसे
फ़क्कड़ जोगिया
पतझरी भूरा
फीका मटमैला
आसमानी नीला
वीरान हरा
बर्फ़ीला सफ़ेद
बुझता लाल
बीमार पीला
कभी-कभी धोखा होता है
उल्लास के इंद्रधनुषी रंगों से खेलते वक्त
कि कहीं वे
किन्हीं उदासियों से ही
छीने हुए रंग तो नहीं हैं ?


यानी रंगों की दुनिया कुछ नहीं बस हमारे मन की दुनिया है जिसे पर हम अपमी भावनाओं की कूचियाँ चलाते हैं।

Wednesday, April 17, 2019

क्या कमाल थी ताजमहल में रोशन और साहिर की जुगलबंदी ! : जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं ...

संगीतकार रोशन और गीतकार साहिर लुधयानवी ने यूँ तो कई फिल्मों में साथ साथ काम किया पर 1963 में प्रदर्शित ताजमहल उनके साझा सांगीतिक सफ़र का अनमोल सितारा थी। दोनों को उस साल ताजमहल के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। रोशन को सबसे अच्छे फिल्म संगीत के लिए और साहिर को जो वादा किया है निभाना पड़ेगा गीत लिखने के लिए। बतौर संगीतकार यूँ तो रोशन की गीत, ग़ज़ल और कव्वाली रचने में माहिरी थी पर उनमें आत्मविश्वास की बेहद कमी थी इसलिए अपने गीतों की असफलता का डर उन्हें हमेशा सताता था। वो अक्सर अपने संगीतोबद्ध गीतों पर दूसरों की राय से बहुत प्रभावित हो जाया करते थे। ऐसी मनोस्थिति में फिल्मफेयर का ये पहला पुरस्कार उनके लिए कितना मायने रखता होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।



ताजमहल में जो गीत सबसे मकबूल हुआ वो था जो वादा किया है निभाना पड़ेगा। मेरी नज़र में गीत के बोलों के ख्याल से साहिर का सबसे अच्छा काम जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं में था पर फिल्मफेयर हमेशा से गुणवत्ता से ज्यादा लोकप्रियता पर विश्वास करता आया है इसलिए इस गीत को कोई पुरस्कार तब नहीं मिला। अपनी प्रेयसी के किन खूबसूरत पहलुओं को उसकी तस्वीर उभार नहीं पाती इसे साहिर ने कितने प्यार से गूँथा था गीत के इन अंतरों में।  

रंगों में तेरा अक्स ढाला, तू ना ढल सकी
साँसों की आँच, जिस्म की खुशबू ना ढल सकी
तुझ में जो लोच है, मेरी तहरीर में नहीं


बेजान हुस्न में कहाँ, रफ़्तार की अदा
इन्कार की अदा है ना इकरार की अदा
कोई लचक भी जुल्फ-ए-गिरहगीर में नहीं

जो बात तुझमें है, तेरी तस्वीर में नहीं


गीतों में ऐसी कविता आजकल भूले भटके ही मिलती है। ऐसी पंक्तियाँ कोई साहिर जैसा शायर ही लिख सकता था जिसने प्रेम को बेहद करीब से महसूस किया हो। रफ़ी साहब ने इसे गाया भी बड़ी मुलायमियत से था।


रोशन ने मैहर के अताउल्लाह खान से जो सारंगी सीखी थी उसका अपने गीतों में उन्होंने बारहा प्रयोग किया। इस गीत में भी तबले के साथ सारंगी की मोहक  तान को आप जगह जगह सुन सकते हैं।

इसी फिल्म का  सवाल जवाब वाले अंदाज़ में रचा एक युगल गीत भी तब काफी लोकप्रिय हुआ था। साहिर की कलम यहाँ भी क्या खूब चली थी..  दो मचलते प्रेमियों की मीठी तकरार कितनी सहजता से उभरी थी उनकी लेखनी  में ..

पाँव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी 
दिल की बेचैन उमंगों पे करम फ़रमाओ 
इतना रुक रुक के चलोगी तो क़यामत होगी 

शर्म रोके है इधरशौक़ उधर खींचे है 
क्या खबर थी कभी इस दिल की ये हालत होगी



वैसे तो हिंदी फिल्म संगीतकारों में मदनमोहन को फिल्मी ग़ज़लों का बेताज बादशाह माना गया है पर अगर संगीतकार रोशन द्वारा संगीतबद्ध ग़ज़लों को आँका जाए तो लगेगा कि उनकी ग़ज़लों और नज़्मों को वो सम्मान नहीं मिला जिनकी वे हक़दार थीं। लता मंगेशकर मदनमोहन की तरह रोशन की भी प्रिय गायिका थीं। रोशन ने उनकी आवाज़ में दुनिया करे सवाल तो, दिल जो ना कह सका, रहते थे कभी जिनके दिल में जैसी प्यारी ग़ज़लें रचीं। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में उनके द्वारा संगीतबद्ध नज़्म शराबी शराबी ये सावन का मौसम भी मुझे बेहद प्रिय है।


ताजमहल के लिए भी उन्होंने साहिर से एक ग़ज़ल लिखवाई जुर्म ए उल्फत पे हमें लोग सज़ा देते हैं। बिल्कुल नाममात्र के संगीत पर भी इस ग़ज़ल की धुन का कमाल ऐसा है कि दशकों बाद भी इसका मुखड़ा हमेशा होठों पर आ जाया करता है। साहिर की शायरी का तिलिस्म लता की आवाज़ में क्या खूब निखरा है। राग अल्हैया बिलावल पर आधारित इस धुन में मुझे बस एक कमी यही लगती है कि अशआरों के बीच संगीत के माध्यम से कोई अंतराल नहीं रखा गया।


जुर्म--उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं 
कैसे नादान हैंशोलों को हवा देते हैं 

हम से दीवाने कहीं तर्क-ए-वफ़ा करते हैं 
जान जाये कि  रहे, बात निभा देते हैं 

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें 
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं 


तख़्त क्या चीज़ है और लाल--जवाहर क्या है 
इश्क़ वाले तो खुदाई भी लुटा देते हैं 

हमने दिल दे भी दिया अहद---वफ़ा ले भी लिया 
आप अब शौक़ से  दे दें, जो सज़ा देते हैं 


(उल्फ़त : प्रेम ,  तर्क-ए-वफ़ा : बेवफ़ाई,  सिला :प्रतिकार,  लाल--जवाहर : माणिक, अहद---वफ़ा :वफ़ा का वादा )


ग़ज़ल लता के मधुर से आलाप से शुरु होती है। आलाप खत्म होते ही आती है सारंगी की आहट। फिर तो साहिर के शब्द और लता की मधुर आवाज़ के साथ इश्क का जुनूनी रूप बड़े रूमानी अंदाज़ में ग़ज़ल का हर शेर उभारता चला जाता है। रोशन की धुन में उदासी है जिसे आप इस गीत को गुनगुनाते हुए महसूस कर सकते हैं। तो आइए सुनते हैं लता की आवाज़ में ये ग़ज़ल

 

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