Thursday, April 15, 2021

वार्षिक संगीतमाला : एक शाम मेरे नाम के संगीत सितारे 2020

पिछला साल हिंदी फिल्म संगीत या यूँ कहिए कि पूरे फिल्म उद्योग के लिए एक चुनौतीपूर्ण साल था। साल की शुरुआत में तो कुछ फिल्में रिलीज़ हुई और फिर कोविड का कहर बरप गया जो आज भी अपनी दोगुनी तेज़ी से जारी है। फिल्में देखना एक सामूहिक क्रियाकलाप हुआ करता था। सिनेमाहॉल के बंद होने से लोगों की वो गतिविधि अपने घर के  अंदर सिमट गई। 

अप्रैल के बाद से फिल्में लगातार रिलीज़ तो हुई पर ओटीटी प्लेटफार्म पे। हॉल में प्रदर्शित फिल्मों में गीत संगीत से अलग माहौल रचता है जो कि ओटीटी प्लेटफार्म पर नदारद रहता है। नेटफ्लिक्स हो या डिज्नी या फिर कोई और प्लेटफार्म वे शायद ही अपनी फिल्मों के गाने को ढंग से प्रमोट करते हैं। इयही वज़ह थी कि इस माध्यम से रिलीज़ हुई फिल्मों के गाने खोजने में भी काफी मशक्कत करनी पड़ी। कई फिल्मों में तो पिछले साल गाने थे ही नहीं। हाँ कुछ वेब सिरीज़ अवश्य बनीं जिनके संगीत ने सुधी श्रोताओं का दिल जीता। शंकर महादेवन और साथी कलाकारों का काम Bandish Bandits में काफी सराहा गया। वही A Suitable Boy में कविता सेठ ने दाग़ देहलवी से लेकर ग़ालिब की ग़ज़लों को निहायत खूबसूरती से आपनी आवाज़ से सँवारा। 

लॉकडाउन में सिंगल्स तो ढेर सारे बने और व्यक्तिगत रूप से भी कई सराहनीय प्रयास हुए पर उन सबको सुन पाना मुश्किल था इसलिए मैंने हमेशा की तरह सिर्फ फिल्मी गीतों को ही इस संगीतमाला में स्थान दिया। वर्ना पिछले साल तो पता नहीं जी कौन सा नशा करता है और मुंबई में का बा जैसे तमाम गीतों की धूम रही जो खूब बजे और सराहे गए। पिछले साल के गैर फिल्मी गीतों में से कुछ पर आलेख लिखने की इच्छा है। देखूँ इस कोरोना काल में वक़्त निकल पाता है या नहीं। 

ज़ाहिर है ऐसे माहौल में फिल्में और गीत संगीत पर लोगों का ध्यान उतना नहीं गया जितना हर साल जाता था। फिर भी वार्षिक संगीतमाला की सालाना परंपरा के अनुसार अपनी ओर से मैंने कोशिश की कि पिछले साल के फिल्मी संगीत में जो कुछ बेहतर हुआ वो आपके समक्ष प्रस्तुत कर सकूँ। जैसा कि हमेशा होता है वार्षिक संगीतमाला की समापन कड़ी के तौर पर आज की ये पोस्ट 2020 के संगीत सितारों के नाम। 

पिछले साल रिलीज़ हुई फिल्मों के  बेहतरीन गीतों से तो मैंने आपका परिचय पिछले तीन महीनों में तो कराया ही पर गीत लिखने से लेकर संगीत रचने तक और गाने से लेकर बजाने तक हर विधा में किस किस ने उल्लेखनीय काम किया ये जानना भी तो जरूरी है। तो आइए मिलते हैं एक शाम मेरे नाम के इन संगीत सितारों से।




साल के बेहतरीन गीत

साल के बेहतरीन गीतों की चर्चा तो विस्तार से हो ही चुकी है। कुछ गीत जो इस सूची में शामिल नहीं हो पाए पर सुनने लायक जरूर थे। उन गीतों में शिकारा का ऐ वादी, गिल्टी का रहने दो ना, शुभ मंगल ज्यादा सावधान का राख, भूत का चन्ना वे, हैप्पी हार्डी हीर का इश्क़बाजियाँ, लव आजकल 2 का तुम तो रहोगी, थप्पड़ का हायो रब्बा, पंगा का दिल ने कहा और बहुत हुआ सम्मान के टाइटिल ट्रैक का नाम लेना चाहूँगा। जैसा कि पहले भी कह चुका हूँ कि शायद, हरदम हरपल, रूबरू और मैं तुम्हारा जैसे चोटी के गीतों को आगे पीछे रखने में दिक्कत तो हुई पर सरताज गीत का सेहरा थप्पड़ के गीत एक टुकड़ा धूप को पहनाने में मेरे मन में कोई संशय नहीं था। इस शानदार संवेदनशील गीत के लिए एक बार फिर अनुराग सैकिया, शकील आज़मी और राघव चैतन्य की टीम को ढेर सारी बधाई।

साल का सर्वश्रेष्ठ गीत :  एक टुकड़ा धूप, थप्पड़ ( अनुराग सैकिया, शकील आज़मी, राघव चैतन्य)

साल के इन पच्चीस चुने हुए गीतों से संबंधित पोस्ट अगर आपने ना पढ़ी हो तो लिंक क्लिक करके वहाँ जा सकते हैं।



साल के बेहतरीन एलबम

पिछले साल मुझे कोई एलबम एकदम ऐसा नहीं लगा जिसे साल के एलबम का नाम दिया जा सके। मुझे संदीप शांडिल्य की शिकारा, मिथुन की ख़ुदा हाफिज़ और कुछ हद तक चमन बहार जैसी छोटे बजट की फिल्मों का संगीत भी भला लगा। प्रीतम और हीमेश रेशमिया अपनी संगीत की प्रोग्रामिंग पे खासी मेहनत करते हैं। इस लिहाज से लूडो और हैप्पी हार्डी और हीर जैसे एलबम भी श्रवणीय हो गए। छपाक पिछले साल की एक ऐसी फिल्म थी जो एक एसिड एटैक जैसी घृणित सामाजिक समस्या पर बनाई गयी थी। ऐसे गंभीर विषय पर गीत बनाना आसान बात नहीं थी पर शंकर एहसान लॉय ने गुलज़ार के साथ मिलकर इस फिल्म में कुछ संवेदनशील नग्मे दिये। दिल बेचारा का संगीत भी सुशांत सिंह राजपूत की स्मृतियों से मन को गीला करने में समर्थ रहा, पर जिस फिल्म के गीतों को साल भर बार बार सुनने का दिल किया वो थी लव आज कल 2 जिसमें इम्तियाज़ अली एक बार फिर प्रीतम और इरशाद कामिल की जोड़ी से बेहतरीन काम ले पाए।



  • शिकारा : संदेश शांडिल्य
  • लूडो : प्रीतम
  • लव आज कल 2 : प्रीतम
  • हैप्पी हार्डी और हीर : हीमेश रेशमिया
  • दिल बेचारा : ए आर रहमान
  • छपाक : शंकर अहसान लॉय
  • ख़ुदा हाफिज़ : मिथुन

साल का सर्वश्रेष्ठ एलबम      :  लव आज कल 2 : प्रीतम  

साल के कुछ खूबसूरत बोलों से सजे सँवरे गीत
इस साल कुछ नए और कुछ पुराने गीतकारों के बेहद अर्थपूर्ण गीत सुनने को मिले। नए लिखने वालों में गरिमा ओबरा  ने सुन सुर जो कहानियाँ सी कहते हैं. में साथ साथ संगीत रचने वाले दो कलाकारों के बीच पनपे प्रेम का प्यारा खाका खींचा तो वहीं पीर ज़हूर ने रूबरू में अपने लेखन से हिंदी फिल्मों में ग़ज़लों की गौरवशाली परंपरा की पुनः याद दिला दी। रिपुल शर्मा ने आज के समाज में घटती संवेदनशीलता को मी रक़्सम के गीत ये जो शहर है में बखूबी उभारा। जावेद अख़्तर  पंगा के गीत जुगनू में अपनी पुरानी लय में दिखे। 

अमिताभ भट्टाचार्य के मेरे लिए तुम काफी हो के लिये लिखे सहज सरल बोल दिल को एकदम से छू गये वहीं प्रीतम की बदौलत सईद कादरी का हरदम हमदम एक बार फिर मन को रूमानियत के सैलाब में भिगो गया। पर सबसे अच्छे बोलों के लिए जिन दो गीतों में काँटे का मुकाबला रहा वो था गुलज़ार का लिखा छपाक से पहचान ले गया और शकील आज़मी का एक टुकड़ा धूप का। दोनों ही गीत अपने बोलों में पूरी कहानी का मर्म बड़ी संजीदगी के साथ ले कर चलते हैं। इसलिए बड़ा मुश्किल था इनमें से किसी एक को चुनना और मैंने शकील आज़मी को चुना एक टुकड़ा धूप के लिए..
  • अमिताभ भट्टाचार्य :     मेरे लिए तुम काफी हो ….  
  • शकील आज़मी     :      एक टुकड़ा धूप का अंदर अंदर नम सा है...  
  • सईद कादरी         :      हमदम हरदम
  • गरिमा ओबरा        :     सुन सुर जो कहानियाँ सी कहते हैं. 
  • गुलज़ार                 :     छपाक से पहचान ले गया ...
  • इरशाद कामिल     :      मर जाएँ हम..
  • रिपुल शर्मा            :      ये जो शहर है
  • पीर ज़हूर              :      वो रूबरू खड़े हैं मगर फ़ासले तो हैं

साल के सर्वश्रेष्ठ बोल :  एक टुकड़ा धूप का अंदर अंदर नम सा है.. ...शकील आज़मी

साल के गीतों की कुछ बेहद जानदार पंक्तियाँ 

जब आप पूरा गीत सुनते हैं तो कुछ पंक्तियाँ कई दिनों तक आपके होठों पर रहती हैं और उन्हें गुनगुनाते वक़्त आप एक अलग खुशी महसूस करते हैं। पिछले  साल के गीतों  की वो  बेहतरीन पंक्तियों जिनके शब्द मेरे साथ काफी दिनों तक रहे वे कुछ यूँ हैं 😃

  • एक चेहरा गिरा जैसे मोहरा गिरा जैसे धूप को ग्रहण लग गया छपाक से पहचान ले गया 
  • इश्क़ रगों में जो बहता रहे जाके..कानों में चुपके से कहता रहे ..तारे गिन, तारे गिन सोए बिन, सारे गिन
  • चक्के जो दो साथ चलते हैं थोड़े..तो घिसने रगड़ने में छिलते है थोड़े..पर यूँ ही तो कटते हैं कच्चे किनारे..ये दिल जो ढला तेरी आदत पे..शामिल किया है इबादत में..थोड़ी ख़ुदा से भी माफी हो..मेरे लिए तुम काफी हो...
  • वो रूबरू खड़े हैं मगर फासले तो हैं नज़रों ने दिल की बात कही लब सिले तो हैं
  • दिल चाहे हर घड़ी तकता रहूँ तुझे...जब नींद में हो तू, जब तू सुबह उठे..ये तेरी ज़ुल्फ़ जब चेहरा मेरा छुए...दिल चाहे उंगलियाँ उनमें उलझी रहें 
  • टूट के हम दोनों में, जो बचा वो कम सा है..एक टुकड़ा धूप का अंदर अंदर नम सा है..एक धागे में हैं उलझे यूँ, कि बुनते बुनते खुल गए..हम थे लिखे दीवार पे, बारिश हुई और धुल गए
  • तुम ना हुए मेरे तो क्या..मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा रहा..मेरे चंदा मैं तुम्हारा सितारा रहा..
    रिश्ता रहा बस रेत का..ऐ समंदर मैं तुम्हारा किनारा रहा
  • तू कह रहा है, मैं सुन रही हूँ, मैं खुद में तुझको ही, बुन रही हूँ, है तेरी पलकों पे फूल महके,
    मैं जिनको होंठों से चुन रही हूँ,
  • सुन सुर जो कहानियाँ सी कहते हैं..चुन लब मनमानियाँ जो सहते हैं
  • रात है काला छाता जिस पर इतने सारे छेद...तेजाब उड़ेला किसने इस पर जान ना पाए भेद
  • तू तेज़ चिंगारी मैं चरस का झोला ..तू मीठी रूहफज़ा मैं बर्फ का गोला
  • हाँ आज फिर दिल से झगड़ा किया..हाँ आज फिर थोड़ा सोए हैं कम..हाँ आज दिल से झगड़ा किया..हाँ आज फिर थोड़ा रोए हैं हम
साल के बेहतरीन गायक
पिछले साल अरिजीत सिंह, सोनू निगम, पापोन जैसे दिग्गजों के साथ दर्शन रावल, राघव चैतन्य, कमाल खान, सनी हिंदुस्तानी और हृदय गट्टाणी जैसे नए गायकों की आवाज़ें भी सुनाई दीं। नए गायकों में राघव चैतन्य का एक टुकड़ा धूप और दर्शन रावल का मेहरबाँ खास तौर पर पसंद आया। सोनू निगम ने आख़िरी कदम तक और दो का चार में अपनी आवाज़ के नए पहलुओं से रूबरू कराया। स्वानंद किरकिरे में भी मस्ती भरे अंदाज़ में रात है काला छाता को निभाया। पापोन मर जाएँ हम, मोहित चौहान तारे गिन और शंकर महादेवन जुगनू जैसे युगल गीतों में नज़र आए। 

विशाल मिश्रा ने ख़ुदा हाफिज़ के सुरीले गीत आप हमारी जान बन गए को इतना मन से गाया कि सुन कर बेहद सुकूँ मिला। अरिजित सिंह का डंका इस साल भी लूडो और लव आज कल 2 के तीन एकल गीतों की बदौलत बजता रहा। इन गीतों को वो अपनी आवाज़ के दम पर वो एक अलग ही स्तर पर वो ले गए और इसीलिए उन्हें एक बार फिर साल के बेहतरीन गायक चुनना मुश्किल निर्णय नहीं रहा।


  • अरिजीत सिंह        :  हरपल हरशब हमदम-हमदम …
  • अरिजीत सिंह        :  शायद कभी ना कह सकूँ मैं तुमको
  • अरिजीत सिंह        :  या तो बर्बाद कर दो या फिर आबाद कर दो
  • विशाल मिश्रा          : आप हमारी जान बन गए
  • दर्शन रावल           : ओ मेहरवाँ क्या मिला यूँ जुदा हो के बता 
  • सोनू निगम            :  तेरे संग हूँ आख़़िरी क़दम तक ..
  • राघव चैतन्य          :  एक टुकड़ा धूप का
  • शंकर महादेवन     :  जुगनू

साल के सर्वश्रेष्ठ गायक          :  अरिजीत सिंह

साल की बेहतरीन गायिका
पिछला साल गायिकाओं के लिए बिल्कुल ही सही नहीं रहा। मेरे चुने पच्चीस गीतों में सिर्फ एक गीत में ही महिला स्वर की भूमिका एकल रूप में थी। वो गीत था Choked पैसा बोलता से जिसे रचिता अरोड़ा ने गाया था। इतनी हुनरमंद गायिकाओं के रहते हुए उन्हें हिंदी फिल्मों में एकल गीत नहीं मिलना हमारे संगीत उद्योग का एक दुखद पहलू है जिस पर गंभीरता से मंथन करने की आवश्यकता है। युगल गीतों में भी उनकी उपस्थिति एक आध अंतरे तक ही सीमित रही। जोनिता गाँधी, श्रेया घोषाल, असीस कौर, शिल्पा राव, श्रद्धा मिश्रा, रानू मंडल, अंतरा मित्रा इस साल की मेरी संगीतमाला का हिस्सा तो बनी पर इनमें से किसी को भी ऐसा कोई पूरा गीत नहीं मिला । ऐसे में ये श्रेणी इस साल बिना किसी नाम के मजबूरन मुझे खाली रखनी पड़ी।

साल की सर्वश्रेष्ठ गायिका     :   कोई नहीं

गीत में प्रयुक्त हुए संगीत के कुछ बेहतरीन टुकड़े

संगीत जिस रूप में हमारे सामने आता है उसमें संगीतकार संगीत संचालक और निर्माता की  बड़ी भूमिका रहती है पर संगीतकार की धुन हमारे कानों तक पहुँचाने का काम हुनरमंद वादक करते हैं जिनके बारे में हम शायद ही जान पाते हैं। वैसे आजकल गीतों में लाईव आर्केस्ट्रा का इस्तेमाल बेहद कम होता जा रहा है। ज्यादातर अंतरों के बीच प्री मिक्सड टुकड़े बजा दिए जाते हैं। प्रीतम और हीमेश ने कुछ कमाल की सिग्नेचर ट्यून्स दीं जिन्हें बार बार सुनने का दिल चाहा। कुछ वादकों ने भी बड़ी मधुरता से संगीत के टुकड़े बजाए। पर सबसे ज्यादा आनंद मुझे आदत में बजने वाली सिग्नेचर ट्यून को सुनने में आया। 



  • आदत मुखड़े के पहले तार वाद्यों की सिग्नेचर ट्यून हीमेश रेशमिया
  • संतूर पर गीत की धुन मर जाएँ हम वादक रोहन रतन
  • सारंगी पर गुलाम अली आबाद बर्बाद इंटरल्यूड
  • शायद सिग्नेचर ट्यून वुडविंड पर निर्मल्य डे
  • शहनाई पर आइ डी दास एक टुकड़ा धूप

संगीत की सबसे कर्णप्रिय मधुर तान  : आदत  सिग्नेचर ट्यून हीमेश रेशमिया 

संगीतमाला के समापन मैं अपने सारे पाठकों का धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्होंने समय समय पर अपने दिल के उद्गारों से मुझे आगाह किया। आपकी टिप्पणियाँ इस बात की गवाह थीं कि आप सब का हिंदी फिल्म संगीत से कितना लगाव है।  कई पोस्टस पर हजार से ज्यादा व्युज़ मिले जो कि पिछले सालों से कहीं ज्यादा है।





एक बार फिर आप सभी का दिल से शुक्रिया इस सफ़र में इस कठिन समय में भी साथ बने रहने के लिए। 

Thursday, April 01, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 सरताज गीत: एक टुकड़ा धूप का अंदर अंदर नम सा है Ek Tukda Dhoop

वक़्त आ गया है एक शाम मेरे नाम के सालाना जलसे वार्षिक संगीतमाला के सरताजी बिगुल को बजाने का। ये कहने में मुझे कोई झिझक नहीं कि पिछले साल के तमाम गीतों में से इस गीत को चोटी पर रखने में मुझे ज्यादा दुविधा नहीं हुई। पायदान दो से छः तक के गीतों में आपस में ज्यादा अंतर नहीं था पर थप्पड़ से लिया गया ये गीत अपने गहरे शब्दों. धुन और गायिकी के सम्मलित प्रभावों के मेरे आकलन में अपने प्रतिद्वन्दियों से कहीं आगे रहा ।


अनुभव सिन्हा ने जबसे गंभीर और लीक से हट कर विषयों पर फिल्में बनानी शुरु कीं तबसे उनकी फिल्मों के गीत संगीत पर मेरा हमेशा ध्यान रहता है। अपनी पिछली कुछ फिल्मों में उन्होंने संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी जहाँ अनुराग सैकिया को सौंपी है वहीं उनकी फिल्मों के अधिकांश गीतों के बोल शायर शकील आज़मी साहब ने लिखे हैं। 

इस जोड़ी का फिल्म मुल्क के लिए बनाया  गीत जिया में मोरे पिया समाए 2018 में वार्षिक संगीतमाला का हिस्सा बना था। इन दोनों द्वारा रचा आर्टिकल 15 का इंतज़ारी भी बेहद चर्चित रहा था। जहाँ तक थप्पड़ का सवाल है ये एक बेहद संवेदनशील विषय पर बनी फिल्म थी। नायक नायिका के वैवाहिक जीवन को एक पार्टी में सबके सामने लगाया गया थप्पड़ चरमरा कर रख देता है। नायिका इस थप्पड़ की वज़ह से अपने रिश्ते का पुनर्मूल्यांकन करते हुए कई ऐसे छोरों पर पहुँचती है जहाँ से वापसी की राह बेहद धुँधली दिखाई देती है।

अनुराग सैकिया व शकील आज़मी

असम के प्रतिभावान युवा संगीतकार अनुराग सैकिया का अनुभव सिन्हा से रिश्ता एक गाइड या पथ प्रदर्शक का है। ये अनुभव की ही फिल्में थीं जिनकी वज़ह से अनुराग को बतौर संगीतकार मुंबई में पहचान मिली है। यही वज़ह है कि अनुराग जब भी कोई धुन बनाते हैं तो उसे अनुभव सिन्हा को जरूर भेजते हैं। इस गीत की भी धुन अनुराग ने पहले बनाई। अनुभव को धुन पसंद आई और उन्होंने अनुराग को अगले ही दिन थप्पड़ की पटकथा सुनाई।गीत लिखने की जिम्मेदारी एक बार फिर शकील के कंधों पर थी। शकील आज़मी ने कहानी को इतने करीने से समझते हुए इस धुन पर अपने बोल लिखे कि बस कमाल ही हो गया। 

जो भी शायराना तबियत रखता है उनके लिए शकील आज़मी किसी पहचान के मुहताज नहीं है। वे जिस मुशायरे में जाते हैं अपने बोलने के अंदाज़ और अशआरों की पुख्तगी से सबका दिल जीत लेते हैं। आजमगढ़ से ताल्लुक रखने वाले पचास वर्षीय शकील का नाम माता पिता ने शकील अहमद खाँ रखा था पर शकील ने जब अदब की दुनिया में कदम रखा तो कैफ़ी आज़मी का नाम बुलंदियों पर था। उनकी शोहरत का उन पर ऐसा असर हुआ कि उन्होंने अहमद हटाकर अपने नाम के आगे आज़मी लगाना शुरु कर दिया। उनके करीब आधा दर्जन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिसमें परों को खोल उनका सबसे ताज़ा संग्रह है। 

शकील साहब मानते हैं कि एक कवि या शायर गीत के बोलों के साथ ज्यादा न्याय कर सकता है क्यूँकि उसने उन शब्दों को सालों साल जिया और तराशा है। अच्छे बोल गीतों की उम्र बढ़ा देते हैं। मैं शकील साहब की इस बात से पूरा इत्तिफाक रखता हूँ । अब इसी गीत को देखें। ये उनकी शायरी की काबिलियत का ही नमूना है कि वो मुखड़े की चंद पंक्तियों में पूरी कहानी का दर्द सहज शब्दों में गहराई से उतार लाए हैं ..

टूट के हम दोनों में, जो बचा वो कम सा है
एक टुकड़ा धूप का अंदर अंदर नम सा है
एक धागे में हैं उलझे यूँ, कि बुनते बुनते खुल गए
हम थे लिखे दीवार पे, बारिश हुई और धुल गए
टूट के हम दोनो में....नम सा है

उलझे धागों से बुनते बुनते खुल जाने का ख्याल हो या फिर पोपले धरातल पर बने रिश्ते के टूटने को दीवार पर लिखी इबारत के तेज बारिश में धुल जाने से की गई उनकी तुलना..मन वाह वाह कर ही उठता है। नायिका के मन की आंतरिक उथल पुथल को भी वो गीत के  तीनों अंतरों में बखूबी उभारते हैं। 

टूटे फूटे ख़्वाब की हाए...दुनिया में रहना क्या
झूठे मूठे वादों की हाए..लहरों में बहना क्या
दिल ने दिल में ठाना है, खुद को फिर से पाना है
दिल के ही साथ में जाना है
टूट के हम दोनों में....नम सा है 

सोचो ज़रा क्या थे हम हाय..क्या से क्या हो गए
हिज्र वाली रातों की हाय कब्रों में सो गए
तुम हमारे जितने थे..सच कहो क्या उतने थे ?
जाने दो मत कहो कितने थे
रास्ता हम दोनों में, जो बचा वो कम सा है
एक टुकड़ा धूप का, अंदर अंदर नम सा है
टूट के हम दोनों में....नम सा है 

इस गीत का एक अंतरा और भी है जो गीत के वीडियो में इस्तेमाल नहीं हुआ

तेरी ही तो थे हमपे हाय जितने भी रंग थे
बेख़्याली में भी हम हाय...तेरे ही तो संग थे 
रंग जो ये उतरे हैं, मुश्किलों से उतरे हैं 
जीते जी जाँ से हम गुजरे है 
रास्ता हम दोनों में, जो बचा वो कम सा है

गीत के आडियो वर्सन में आप इस अंतरे को सुन पाएँगे।



राघव चैतन्य

इतने खूबसूरत बोलों को कम से कम संगीत की जरूरत थी। अनुराग मात्र गिटार, वुडविंड वाद्यों और बाँसुरी की मदद से इस गीत के लिए कहानी के अनुरूप  एक बेहद गमगीन सा माहौल रचने में सफल हुए हैं। इस काम में उनकी मदद की है राघव चैतन्य ने जिनका बॉलीवुड के लिए शायद ये पहला ही गीत होगा। 

मेरठ में पले बढ़े 27 वर्षीय राघव पिछले छः साल से मुंबई में अपना संगीत बना रहे हैं। उनके रचे संगीत को यू ट्यूब और इंटरनेट के संगीत चैनलों पर खासी मकबूलियत मिली है । अनुराग ने पहले भी उनके साथ काम किया था और इस गीत के लिए उन्हें राघव की आवाज़ का ही ख्याल आया क्यूँकि उन्हें लगा कि उसमें लोगों का दिल छूने की ताकत है। राघव के लिए ये शुरुआती दिन हैं पर उन्होंने इतने कम अनुभव के बाद भी गीत की भावनाओं को बेहतरीन तरीके से अपनी आवाज़ में उतारा है।

वाद्य यंत्रों में वुडविंड वाद्यों जिनमें एक शहनाई जैसी सुनाई देती है पर आइ डी दास का काम मुझे बेहद प्रभावशाली लगा। मुखड़े और अंतरे के बीच भास्कर ज्योति की बाँसुरी भी कानों को सोहती है। तो एक बार फिर सुनते हैं चोटी पर के इस गीत को जिसके बारे में फिल्म की नायिका तापसी पन्नू का कहना था कि जब भी कोई मुश्किल सीन शूट करना होता तो मैं इस गाने को सुनकर अपना मूड बना लेती थी।

 
 
तो कैसा लगा आपको ये गीत? वार्षिक संगीतमाला की आखिरी कड़ी होगी पिछले साल के संगीत सितारों के नाम..

वार्षिक संगीतमाला 2020


Tuesday, March 23, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 रनर अप : हरदम हर पल, हर शब, हमदम-हमदम Hardum Humdum

संगीतमाला की दूसरी पायदान पर एक बार फिर है प्रीतम और अरिजीत की जोड़ी। फर्क सिर्फ इतना है कि इस दफ़ा गीतकार का किरदार सँभाला है सईद क़ादरी ने और क़ादरी साहब के बोल ही थे जो इस गीत कौ तीसरी या चौथी सीढ़ी से खिसकाकर इस साल का रनर अप बनाने में सफल हुए। ये गीत है फिल्म लूडो का हरदम हमदम। 

जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूँ कि अनुराग बसु और प्रीतम की दोस्ती उनकी साझा फिल्मों में कमाल की केमेस्ट्री पैदा करती है। जग्गा जासूस और बर्फी और उसके पहले Gangster और Life In a Metro जैसी फिल्मों में इनके संगीत का स्वाद आप चख ही चुके होंगे। 


लूडो के गाने भी बेहद पसंद किए गए। हरदम हमदम की धुन प्रीतम ने अनुराग को बरसों पहले सुनाई थी। अनुराग ने इसे सुनते ही ये वादा ले लिया था कि वो इसे अपनी किसी फिल्म में शामिल करेंगे। वो मौका आया लूडो में। प्रीतम का कहना था कि लूडो जैसी क्राइम थ्रिलर में ढेर सारे गीतों की जरूरत नहीं थी पर अनुराग बसु की कोई कहानी गीतों के बिना दौड़ ही नहीं सकती सो लूडो के लिए चार गीत बनाए गए। 

प्रीतम की जैसी आदत है उन्होंने हरदम हमदम की पुरानी धुन को अलग अलग संगीत संयोजन में बाँधा। प्रीतम ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि इस गीत के नौ वर्जन उन्होंने तैयार किए थे पर उनमें अनुराग को जँचा सबसे पहला वाला जिसे फिल्म वर्सन के नाम से जाना गया हालांकि फिल्म के प्रमोशन के लिए झटक मटक वाले वर्सन का इस्तेमाल किया गया।

राजस्थान के जोधपुर से ताल्लुक रखने वाले सईद क़ादरी पिछले दो दशकों से हिंदी फिल्म जगत में सक्रिय हैं। आपको याद होगा कि सईद क़ादरी ने महेश भट्ट की फिल्म जिस्म के आवारापन बंजारापन से हिंदी फिल्मों की दुनिया में क़दम रखा था। मर्डर में उनके गीत भींगे होठ तेरे और कहो ना कहो ने काफी सुर्खियाँ बटोरी थीं। 2007 में उनका गीत जिंदगी ने जिंदगी भर गम दिए, जितने भी मौसम दिए...सब नम दिए पहली बार किसी संगीतमाला का हिस्सा बना। फिर 2011 में Murder 2 का फिर मोहब्बत करने चला है तू और 2012 में बर्फी का गीत फिर ले आया दिल मजबूर क्या कीजे ने मेरा दिल जीता। पर उसके बाद क़ादरी साहब को आठ साल लगे अपने किसे लिखे गीत के ज़रिए इस संगीतमाला में शिरकत करने के लिए। 

सईद क़ादरी 

अब इस रूमानी गीत के बारे में क्या कहा जाए पूरा गीत ही ऐसा है कि जिसे किसी भी को अपने खास के लिए गाने का दिल करेगा। सिर्फ इतना जरूर कहूँगा कि मुझे इसके दूसरे अंतरे की मुलायमियत बेहद पसंद आई। कितना प्यारा लिखा क़ादरी साहब ने दिल चाहे हर घड़ी तकता रहूँ तुझे....जब नींद में हो तू, जब तू सुबह उठे....ये तेरी ज़ुल्फ़ जब चेहरा मेरा छुए......दिल चाहे उंगलियाँ उनमें उलझी रहें। बोलों के आलावा प्रीतम की धुन और अरिजीत की गायिकी तो बेहतरीन है ही।

लूडो में चार रंग की गोटियों की तरह चार समानांतर कहानियाँ चलती हैं और कहानियों के किरदार के आपसी प्रेम को एक साथ जोड़ कर ये गीत  फिल्माया गया है। तो आइए पहले सुने इस गीत का वो वर्जन जो फिल्म के प्रमोशन में इस्तेमाल हुआ। गीत की आरंभिक धुन में गिटार प्रमुखता से बजता है। बीच में सरोद और सितार की भी मधुर ध्वनि सुनाई देती है।  अंतरे में प्रीतम ने प्रमोशन वाले वर्जन में डांस की रिदम डाली है तो फिल्म वर्सन में इस प्रभाव को टोन डाउन किया गया है। 

इस गीत के संगीत में एक मस्ती है और बोलों में पुराने गीतों सा सौंदर्य और मिठास जो इसे अलहदा बनाती है।

ये ली है मेरी आँखों ने, क़सम ऐ यार 
रखेगी तुझे ख़्वाब में, हमेशा, हरदम 
हरपल हरशब हमदम-हमदम

कितना हूँ चाहता कैसे कहूँ तुझे 
साया तेरा दिखे तो चूम लूँ उसे 
जिस दिन तुझे मिलूँ, दिल ये दुआ करे 
दिन ये ख़त्म ना हो, ना शाम को ढले 
रहे है बस साथ हम, तू रहे पास 
रखूँ मैं तुझे बाहों में हमेशा हरदम 
हर पल, हर शब, हमदम-हमदम

तो आइए सबसे पहले सुनें इस गीत का प्रमोशनल वर्सन

 फिल्म वर्जन में संगीत संयोजन तो बदलता ही है, साथ ही गीत का दूसरा अंतरा भी सुनाई देता है।

दिल चाहे हर घड़ी तकता रहूँ तुझे
जब नींद में हो तू, जब तू सुबह उठे
ये तेरी ज़ुल्फ़ जब चेहरा मेरा छुए
दिल चाहे उंगलियाँ उनमें उलझी रहें
सुन ऐ मेरे सनम, सुन मेरी जान
तू है एहसास में 

हमेशा, हरदम हर पल, हर शब, हमदम-हमदम

 

अरिजीत के आलावा इस गीत को प्रीतम ने शिल्पा राव से भी गवाया जो शायद फिल्म में इस्तेमाल नहीं हुआ।

लो देते हैं हम तुम्हें 
कसम फिर यार
बहेंगे हम अश्क में
आँखों से हर दम हमदम 
हरदम हमदम हरदम 
कितना हूँ...ना शाम को ढले 
छाने ये दिल बात में
तेरे ही जज़्बात में
सजना मेरी बातों में
तुम ही तो हर दम हमदम 
हरदम हमदम हरदम 



अब वार्षिक संगीतमाला की बस आख़िरी पायदान बची है जो निश्चय ही अपनी गुणवत्ता में बाकी सब गीतों से कहीं ऊपर है यानी उसे चुनते हुए मुझे पिछले साल के किसी और गीत का दूर दूर तक भी ख़्याल नहीं आया। तो बताइए ये गीत कैसा लगा और कौन है इस साल का सरताज गीत?

वार्षिक संगीतमाला 2020

Friday, March 19, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत #3 शायद कभी ना कह सकूँ मैं तुमको Shayad

ढाई महीने का ये सफ़र हमें ले आया है वार्षिक संगीतमाला की तीसरी पायदान पर जहाँ गाना वो जो पिछले साल की शुरुआत में आया और आते ही संगीतप्रेमियों के दिलो दिमाग पर छा गया। अब तक ये पन्द्रह करोड़ से भी ज्यादा बार इंटरनेट पर सुना जा चुका है। जी हाँ ये गाना था लव आज कल 2  से शायद

प्रीतम, इरशाद कामिल और अरिजीत सिंह जब साथ आ जाएँ तो कमाल तो होना ही है। तीन साल पहले भी एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला में यही तिकड़ी तीसरे स्थान पर थी जब हैरी मेट सेजल के गीत हवाएँ के साथ। एक बार फिर वैसा ही  जादू जगाने में सफल हुए हैं ये तीनों इस नग्मे में ।

प्रीतम अपनी धुनों को तब तक माँजते हैं जब तक उन्हें यकीन नहीं हो जाता कि श्रोता उसे हाथों हाथ लेंगे। उनके गीतों में सिग्नेचर ट्यून का इस्तेमाल बारहा होता है और ये ट्यून इतनी आकर्षक होती है कि सुनने वाला दूर से ही सुन के पहचान जाता है कि ये वही गीत है। यहाँ भी मुखड़े के बाद जो धुन बजती है वो तन मन प्रफुल्लित कर देती है। 



इरशाद कामिल ने प्रेम के इकतरफे स्वरूप को इतने सहज शब्दों में इस गीत में उतारा है कि शायद ही कोई हो जो इस गीत की भावनाओं के मर्म से अछूता रह पाए । हर प्रेमी की ये इच्छा होती है कि सामने वाला बिना कहे उसकी बात समझ सके। अब ये इच्छा भगवान पूरी भी कर दें तो भी उस 'शायद' की गुंजाइश बनी रहती है क्यूँकि सामने वाला भी तो कई बार समझ के नासमझ बना रहता है। इसीलिए गीत के मुखड़े में इरशाद लिखते हैं.. शायद कभी ना कह सकूँ मैं तुमको...कहे बिना समझ लो तुम शायद...शायद मेरे ख्याल में तुम एक दिन...मिलो मुझे कहीं पे गुम शायद । देखिए कितना सुंदर और अनूठा प्रयोग है शायद शब्द का कि वो पहली और तीसरी पंक्ति की शुरु में आता है तो दूसरी और चौथी की आख़िर में। आँखों को ख्वाब देना खुद ही सवाल करके..खुद ही जवाब देना तेरी तरफ से वाली पंक्ति भी बड़ी खूबसूरत बन पड़ी है।

अरिजीत की गायिकी के लिए युवाओं में एक जुमला खासा मशहूर है और वो ये कि अरिजीत के गाने और मम्मी के ताने सीधे दिल पे लगते हैं। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अगर ये गाना अरिजीत के आलावा किसी और से गवाया गया होता तो उसका प्रभाव तीन चौथाई रह जाता। ऊंचे व नीचे सुरों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें आजकल के अपने समकालीन पुरुष गायकों से कहीं ऊपर ले जाती  है। 

प्रीतम के संगीत संयोजन में गिटार का प्रमुखता से इस्तेमाल होता है। मजे की बात ये है कि इस गीत की प्रोग्रामिंग से लेकर एकास्टिक गिटार पर अरिजीत की उँगलियाँ ही थिरकी हैं। वुडविंड वाद्य यंत्रों से बनी मनमोहक सिग्नेचर धुन बजाने वाले हैं निर्मल्य डे। तो आइए सुनते हैं एक बार फिर इस गीत को जो शुरुआत तो एक मायूसी से होता है पर अंतरे तक पहुँचते पहुँचते आपको गीत की धुन में डुबाते हुए एक धनात्मक उर्जा से सराबोर कर देता है

शायद कभी ना कह सकूँ मैं तुमको 
कहे बिना समझ लो तुम शायद 
शायद मेरे ख्याल में तुम एक दिन 
मिलो मुझे कहीं पे गुम शायद 

जो तुम ना हो रहेंगे हम नहीं 
जो तुम ना हो रहेंगे हम नहीं 
ना चाहिए कुछ तुमसे ज्यादा 
तुमसे कम नहीं 
जो तुम ना हो तो हम भी हम नहीं ..कम नहीं 

आँखों को ख्वाब देना खुद ही सवाल करके
खुद ही जवाब देना तेरी तरफ से 

बिन काम काम करना जाना कहीं हो चाहे 
हर बार ही गुज़रना तेरी तरफ से 
ये कोशिशें तो होंगी कम नहीं 
ये कोशिशें तो होंगी कम नहीं 
ना चाहिए कुछ तुमसे ज्यादा ...जो तुम ना हो


 

लव आज कल 2 तो लॉकडाउन के पहले आई पर इसके गाने कोविड काल में भी लोगों को सुहाते रहे। आप में से बहुत लोगों को पता ना हो कि लॉकडाउन में प्रीतम ने अरिजीत और इरशाद कामिल के साथ मिलकर गीत का एक और अंतरा रचा था जिसके बोल कुछ यूँ थे.. 

चाहत कसम नहीं है, कोई रसम नहीं है
दिल का वहम नहीं है, पाना है तुमको
ख़्वाबों में गाँव जिसका, रस्ता ना आम जिसका
चाहत है नाम जिसका ,पाना है तुमको
हो तुम जहाँ मिलेंगे हम वहीं
ना चाहिए कुछ तुमसे ज्यादा 
तुमसे कम नहीं 
जो तुम ना हो तो हम भी हम नहीं ..कम नहीं 

चलिए चलते चलते उस वर्जन को भी सुन लिया जाए :)



वार्षिक संगीतमाला 2020

Sunday, March 14, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत #4 - वो रूबरू खड़े हैं मगर फ़ासले तो हैं Rubaru

हिंदी फिल्मों में ग़ज़लों को बतौर गीतों में ढालने का सिलसिला हमेशा से चलता रहा है। आजकल वैसे फिल्मी ग़ज़लें कम ही सुनाई देती हैं। इसीलिए जब गिनी वेड्स सनी फिल्म का ये गीत सुनने को मिला तो एक सुखद आश्चर्य हुआ। इस गीत को लिखा पीर ज़हूर ने और इसकी धुन बनाई जां निसार लोन ने। भले ही आपने ये गाना फिल्म में सुना हो पर शायद ही आप जानते हों कि जां निसार लोन ने ये गीत थोड़े बदले हुए रूप में आज से करीब डेढ़ साल पहले एक सिंगल के रूप में निकाला था। मैंने तब ये ग़ज़ल स्निति मिश्रा से सुनी थी और पसंद आने के बाद मैं उसके मूल स्वरूप को जाँ निसार लोन की आवाज़ में सुना था।

ज़ाहिर है कि गिनी वेड्स सनी के निर्माता निर्देशक को ये धुन पसंद आई होगी और जां निसार लोन ने शब्दों के थोड़े हेर फेर के साथ इसे फिल्म के लिए ढाल लिया होगा। पर इससे पहले मेरी वार्षिक संगीतमाला के प्रथम पाँच गीतों में शामिल  इस गाने के बारे में और बात की जाए थोड़ा इस गीत को हम तक पहुँचाने वालों से मुलाकात कर ली जाए। 

जाँ निसार लोन और पीर ज़हूर एक ऐसी जोड़ी है जिसने पिछले कुछ सालों में कश्मीर के सूफी संगीत की मिठास को ना केवल अपने राज्य में बल्कि पूरे देश में पहुँचाने की पुरज़ोर कोशिश की है। हरमुख बर्तल, पीर म्यानो, ख़ुदाया जैसे गीत कश्मीरी संस्कृति में रचे बसे हैं और कश्मीर और उसके बाहर भी सुने और सराहे गए क्यूँकि लोन ने गैर कश्मीरी गायकों स्निति मिश्रा और रानी हजारिका का इस्तेमाल अपने गीतों में किया है। इस युवा संगीतकार ने अपनी धुनों में शास्त्रीयता का परचम तो लहराया ही है साथ ही आंचलिक वाद्यों का भी बखूबी इस्तेमाल किया है।

जाँ निसार लोन की दिल को छूती धुन और पीर ज़हूर के बोल इस ग़ज़ल की जान हैं। जो मूल गीत था उसमें ज़हूर के अशआर कुछ यूँ थे

उनका ये बांकपन ये तबस्सुम ये सादगी
बेशक मेरी क़जा के यही मरहले तो हैं

सौ बार बंद कर गए पलकों की चिलमनें
शिकवा नहीं है कोई मगर कुछ गिले तो हैं

और सबसे अच्छा शेर था उस गीत का वो ये कि

क्या ले के आ रहे हो शहर ए इश्क़ में
सब दर्द को खरीद लूँ वो हौसले तो हैं

तो पहले सुनिए मूल गीत..

 

गिनी वेड्स सनी में ये गीत तब आ जाता है जब नायक नायिका एक दूसरे को एक ट्रिप पर जान रहे होते हैं। कोई भी रिश्ता जब बनता है तो उसके साथ कई सारी अनिश्चितता रहती है। आदमी उसी में डूबता उतराता है इसी आशा में कि साथ साथ उन भँवरों को पार कर किनारे पहुँच जाएगा। कभी तो लगता है कि सामने वाले ने दिल की बात समझ ली तो कभी ऐसा भी लगता है कि आगे बात शायद बढ़ ना पाए। पीर ज़हूर ने ने मन के इसी असमंजस को अपने शब्द देने की कोशिश की है। अब ग़ज़ल के मतले को ही देखिए पास रह के भी जेहानी रूप से दूर रहने की बात को ज़हूर ने किस खूबसूरती से सँजोया है।

वो रूबरू खड़े हैं मगर फासले तो हैं 
नज़रों ने दिल की बात कही लब सिले तो हैं 

बाकी अंतरों में प्रेम के इस उतार चढ़ाव का पूरी हिम्मत से सामना करने की बात है। 

हर मोड़ पे मिलेंगे हम ये दिल लिए हुए 
हर बार चाहे तोड़ दो वो हौसले तो हैं 
आख़िर को रंग ला गयी मेरी दुआ ए दिल 
हम देर से मिले हों सही लेकिन मिले तो हैं 
वो रूबरू खड़े हैं मगर फ़ासले तो हैं...

मंज़िल भी कारवाँ भी तू और हमसफ़र भी तू
वाक़िफ़ तुम ही से प्यार के सब क़ाफ़िले तो हैं 
माना के मंज़िलें अभी कुछ दूर हैं मगर 
मिलकर वफ़ा की राह पे हम तुम चले तो हैं 
हाँ.. हो.. वो रूबरू खड़े हैं मगर फ़ासले तो हैं 
वो रूबरू खड़े हैं मगर फ़ासले तो हैं

फिल्म में इस गीत को लोन की जगह मँजे हुए गायक कमल खान ने गाया है। अगर आपको याद हो तो ये वही कमल  हैं जिन्होंने सा रे गा मा पा का खिताब तो अपने नाम किया ही था और उसके बाद इश्क़ सूफियाना गा कर फिल्म इंडस्ट्री में हलचल मचा दी थी। हुनरमंद होने के बाद कमल की गायिकी आजकल हिंदी फिल्मों में नज़र नहीं आती पर पंजाबी गीतों में उनकी आवाज़ अवश्य सुनाई देती रहती है। जाँ निसार की धुन मन में एक बार ही में घर बना लेती है। मुखड़े और पहले आंतरे के बीच का संगीत संयोजन भी कर्णप्रिय लगता है। गाने मे गिटार के साथ साथ बाँसुरी का भी इस्तेमाल हुआ है। तो आइए सुनते हैं ये गीत..




वार्षिक संगीतमाला 2020

Tuesday, March 09, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत #5 - तुम ना हुए मेरे तो क्या... मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा रहा Main Tumhara Raha

क्या आपके ख्याल में ऐसा कोई गाना आता है जिसको पूरा करने के लिए फिल्म की कहानी ट्विस्ट और टर्न लेती हो। किसी गीत को कहानी के प्लॉट में इतनी तवोज्जह मिली फिल्म दिल बेचारा  के गीत मैं तुम्हारा में जो बना है इस साल की वार्षिक संगीतमाला की पाँचवी सीढ़ी का गीत। 

दरअसल फिल्म में नायिका एक ऐसे गीत को गुनगुनाती रहती है जिसे उसके  गीतकार ने आधा ही लिख कर छोड़ दिया। अपनी बीमारी से लड़ती नायिका के मन में ये प्रश्न हमेशा कौंधता है कि आख़िर लिखने वाले ने इतना प्यारा मुखड़ा बीच में ही क्यूँ छोड़ दिया? फिल्म की कहानी के अंत में नायक किस तरह इस गीत के लेखक से नायिका को मिलवाता है और गीत को पूरा करवाता है ये तो आपने फिल्म में देखा ही होगा। आखिर ऐसा क्या भाव था इस गीत के  मुखड़े में ?

ज़िदगी में हम कई लोगों से प्रेम करते हैं। उनमें कुछ के करीब हम जा पाते हैं तो कुछ दूर से ही हमारे आसमान में जुगनू की तरह चमकते रहते हैं। ये गीत उन जुगनुओं को ये विश्वास दिलाता है कि भले हम उन्हें अपनी हथेली में सजाकर सहला ना पाए हों पर उनकी चमक से हमारा हृदय हमेशा जगमग होता रहा है। गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य ने इन्हीं भावों को गीत के मुखड़े में चाँद से दूर चमकने वाले सितारो और समंदर की दूर जाती लहरों को अपलक ताकते किनारों जैसे खूबसूरत बिंबों से बाँधा है । 

संगीतकार रहमान को भी क्या पता था कि वो जिस सुरीली धुन को  रच रहे हैं वो फिल्म के नायक के जीवन की आख़िरी फिल्म का गीत बन कर रह जाएगा । सुशांत तो असमय चले गए पर जब जब वो याद किए जाएँगे ये गीत हमारे होठों पर होगा।


इस युगल गीत को अपनी आवाज़ें दी हृदय गट्टाणी और जोनिता गाँधी की जोड़ी ने। हृदय के पिता रहमान के संगीत कार्यक्रम के प्रबंधन से बरसों से जुड़े रहे। इसका फायदा ये भी हुआ कि उनके पुत्र को संगीत सीखने के लिए रहमान जैसे वट वृक्ष की छाया मिली़। हृदय को रहमान ने फिल्मों में पहले भी मौके दिए थे पर ये गीत उनके छोटे से कैरियर के लिए मील का पत्थर साबित होगी इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। जहाँ तक जोनिता की बात है तो वो पिछले सात आठ सालों से अपनी गायिकी का परचम लहरा रही हैं। इस गीत को वो अपने सबसे सुरीले गीतों में मानती हैं। गीत के शब्द इतने प्रभावी हैं कि हल्के फुल्के तार वाद्यों और बीच बीच में नवीन कुमार की बजाई खूबसूरत बाँसुरी के आलावा रहमान ने ज्यादा वाद्यों की जरूरत नहीं समझी।

तो आइए सुनते हैं दर्द की चाशनी में डूबा ये गीत जिसका मुखड़ा एक बार सुनते ही दिल में बस गया था।

तुम ना हुए मेरे तो क्या
हूँ.. तुम ना हुए मेरे तो क्या
मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा रहा
मेरे चंदा मैं तुम्हारा सितारा रहा

रिश्ता रहा बस रेत का
ऐ समंदर मैं तुम्हारा किनारा रहा
मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा रहा
तुम ना हुए मेरे तो क्या

तू ही पहली गुज़ारिश,हसरत भी तू आख़िरी
माही मेरे मसीहा,मर्ज़ी बता क्या तेरी
मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा रहा
मेरे चंदा मैं तुम्हारा सितारा रहा

मैं जाड़ों के महीने की तरह
और तुम हो पशमीने की तरह
मैं दीवारों की तरह हूँ
तुम जैसे हो दरीचा
मैं बगीचा जो जो तुम ने सींचा
तुम ना हुए.. किनारा रहा
मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा मैं तुम्हारा रहा


वार्षिक संगीतमाला 2020

Saturday, February 27, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत # 6 - मेरे लिए तुम काफी हो.. Mere liye tum kafi ho...

तनिष्क बागची और वायु श्रीवास्तव की संगीतकार जोड़ी  जिन्हें लोग तनिष्क वायु के नाम से जानते हैं के संगीत पर मेरा ध्यान फिल्म शुभ मंगल सावधान के गीत कान्हा से गया था। तनु वेड्स मनु रिटर्न के गीत बन्नो से ये जोड़ी पहली बार चर्चा में आई थी पर शुभ मंगल सावधान के बाद इनके गीतों में मुझे ऐसी कोई खास बात नज़र नहीं आई। तनिष्क ने इन गुजरे सालों  में  तो अपनी छवि संगीतकारों के रिमिक्स किंग की ही बना ली। वायु भी कमरिया जैसे गीतों के आगे अपनी लेखनी को विस्तार नहीं दे पाए।

पर शुभ मंगल ज्यादा सावधान के इस गीत में वायु ने वो कमाल कर दिखलाया जो उनके अपनी कला में हुनरमंद होने का प्रमाण दे गया। एक गीतकार की सफलता इस बात में है कि वो सहज से शब्दों में दिल को छूती बात कह जाए और वार्षिक संगीतमाला 2020 की छठी पायदान के गीत संगीत में तनिष्क वायु की जोड़ी यही करने में सफल रही है।

इस गीत को गाया है हर दिल अज़ीज़ आयुष्मान खुराना ने। आयुष्मान इस गीत के बारे में कहते हैं कि
"हम फिल्म में ऐसा गीत डालना चाहते थे जो प्यार और रूमानियत की वैश्विक भावना को उभार सके। ये एक ऐसा गीत है जिसमें प्रेम से जुड़ी सारी भावनाएँ समाहित हैं और जिसे सुनकर हम किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचेंगे जो हमारी ज़िदगी में खास है। हमारा मकसद ये भी बताना था कि जैसा आम प्रेमी युगल एक दूसरे के बारे में महसूस करते हैं वैसी ही भावना दो लड़कों के बीच भी हो सकती है।"
मैंने ये फिल्म नहीं देखी पर इस गीत को पहली बार सुनते ही मन में एक खुशनुमा अहसास मन में तारी हो गया था। वैसे तो वायु का लिखा पूरा गीत ही मुझे पसंद है पर जिस तरह उन्होंने युगल प्रेमियों को सितारों की तरह टूटने और टकराने की बात की या उनकी आपसी तकरार को साथ चलते दो चक्कों के घिसने रगड़ने से जोड़ा वो मुझे बेहद प्यारा लगा।

तेरी मेरी ऐसी जुड़ गई कहानी
कि जुड़ जाता जैसे दो नदियों का पानी
मुझे आगे तेरे साथ बहना है
जाना तुम्हें तो है ये बात जानी
कि ये ज़िन्दगी कैसे बनती सुहानी
मुझे हर पल तेरे साथ रहना है

तुम कुछ अधूरे से हम भी कुछ आधे
आधा आधा हम जो दोनों मिला दे
तो बन जाएगी अपनी इक जिंदगानी
ये दुनिया मिले ना मिले हमको
खुशियाँ भगा देंगी हर ग़म को
तुम साथ हो फिर क्या बाकी हो
मेरे लिए तुम काफी हो

मेरे लिए तुम काफी हो...मेरे लिए तुम काफी हो 

इक आसमां के हैं हम दो सितारे 
कि टकराते हैं टूटते हैं बेचारे
मुझे तुमसे पर ये कहना है
चक्के जो दो साथ चलते हैं थोड़े 
तो घिसने रगड़ने में छिलते है थोड़े

पर यूँ ही तो कटते हैं कच्चे किनारे
ये दिल जो ढला तेरी आदत पे
शामिल किया है इबादत में
थोड़ी ख़ुदा से भी माफी हो
मेरे लिए तुम काफी हो...

तनिष्क ने तार वाद्यों के हल्की मदद से गीत की कर्णप्रियता आखिर तक बनाए रखी। कुल मिलाकर ये एक ऐसा गीत है जिसे फिल्म की कहानी से परे भी हर शख्स अपनी ज़िंदगी से जोड़ पाएगा। तो आइए सुनते हैं आयुष्मान खुराना की आवाज़ में ये गीत जिसे फिल्माया गया है आयुष्मान और जितेन्द्र कुमार पर


वार्षिक संगीतमाला 2020




Tuesday, February 23, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत # 7 छपाक से पहचान ले गया Chhapaak se pehchaan le gaya

वार्षिक संगीतमाला 2020 की सातवीं पायदान पर है मेरे प्रिय गीतकार गुलज़ार का लिखा गीत। एसिड अटैक पर पिछले साल की जनवरी में एक बेहद संवेदनशील फिल्म आई थी छपाक। फिल्म के प्रदर्शन के समय विवादों के बादल घिर आए जिसने इस जरूरी विषय पर बनी फिल्म के संदेश को आंशिक रूप से ही सही पर ढक लिया। 

मेघना गुलज़ार की फिल्मों में उनके पिता ही गीतकार की भूमिका निभाते हैं। मेघना कहती हैं कि ऐसी फिल्मों में गीतों की गुंजाइश कम ही होती है। फिर भी उन्होंने इस फिल्म में गीत रखे क्यूँकि भारतीय फिल्म संस्कृति में गीत फिल्म का चेहरा होते हैं और कई बार तो उनमें ही फिल्म की आत्मा बसती है।



अब छपाक के इस शीर्षक गीत को ही लें। गीत के शानदार मुखड़े में ही पूरी फिल्म का कथा सार छुपा है... कोई चेहरा मिटा के और आँख से हटा के..चंद छींटे उड़ा के जो गया..छपाक से पहचान ले गया। चंद लफ़्जों में इतनी गहरी बात आज के युग में गुलज़ार ही कर सकते हैं। तेज़ाब की चंद बूँदें. किसी की ज़िदगी की गाड़ी को किस तरह बेपटरी कर सकती हैं ये अंदाजा पिछले कुछ साल की नृशंस घटनाओं से हम सब बड़ी आसानी से लगा सकते हैं। ऐसे में गुलज़ार के शब्द दिल में तीर की तरफ चुभते हैं। अंतरे में गुनहगार के व्यक्तित्व का भी वो कितना बढ़िया  खाका खींचते हुए लिखते हैं.. बेमानी सा जुनून था बिन आग के धुआँ...ना होश ना ख्याल सोच अंधा कुआँ 

कोई चेहरा मिटा के और आँख से हटा के 
चंद छींटे उड़ा के जो गया 
छपाक से पहचान ले गया 
एक चेहरा गिरा जैसे मोहरा गिरा 
जैसे धूप को ग्रहण लग गया 
छपाक से पहचान ले गया 

ना चाह न चाहत कोई ना कोई ऐसा वादा है 
ना चाह न चाहत कोई ना कोई ऐसा वादा 
है हाथ में अँधेरा और आँख में इरादा 
कोई चेहरा मिटा ..पहचान ले गया 

बेमानी सा जुनून था, बिन आग के धुआँ 
बेमानी सा जुनून था बिन आग के धुआँ 
ना होश ना ख्याल सोच अंधा कुआँ 

कोई चेहरा मिटा ..पहचान ले गया 

आरज़ू थी शौक थे वो सारे हट गए, कितने सारे जीने के तागे कट गए 
आरज़ू थी शौक थे वो सारे हट गए कितने सारे जीने के तागे कट गए 
सब झुलस गया 
कोई चेहरा मिटा ..पहचान ले गया 

शंकर अहसान लॉय ने इस गीत के लिए अरिजीत की आवाज़ का इस्तेमाल किया। गीत के शब्दों में दबी पीड़ा को उभारने के लिए उन्होंने संगीत संयोजन में बाँसुरी और रबाब का प्रयोग किया है। बाँसुरी वादन नवीन ने और रबाब पर तापस राय की उँगलियाँ थिरकी हैं। इस गीत की रिलीज़ के समय संगीतकार शंकर महादेवन ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि इस गीत को बनाने के लिए गुलज़ार के साथ बैठना अपने आप में एक उपलब्धि थी। छपाक जैसी संवेदनशील फिल्म के साथ जुड़ना हमारे लिए फक्र की बात थी और इसीलिए इसका संगीत हमारे लिए हमेशा कोहिनूर ही बना रहेगा क्यूँकि वर्षों बाद भी इन गीतों की चमक फीकी नहीं पड़ेगी।

तो आइए सुनते हैं ये गीत अरिजीत की आवाज़ में..

वार्षिक संगीतमाला 2020


 

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