Monday, January 18, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 गीत # 17 : जो इक पल तुमको ना देखें तो मर जाएँ हम Mar Jaayein Hum

विधु विनोद चोपड़ा अपनी फिल्मों के खूबसूरत फिल्मांकन और संगीत के लिए जाने जाते रहे हैं। बतौर निर्देशक परिंदा, 1942 A love story, करीब और मिशन कश्मीर का संगीत काफी सराहा गया था। इस साल थियेटर में रिलीज़ उनकी फिल्म शिकारा के गीत उतने तो सुने नहीं गए पर अगर आपको शांत बहता संगीत पसंद हो तो ये एल्बम आपको एक बार जरूर सुनना चाहिए। अगर मैं अपनी कहूँ तो मुझे इस संगीत एल्बम में ऐ वादी शहज़ादी... की आरंभिक कविता जिस अंदाज़ में पढ़ी गयी वो बेहद भायी पर जहाँ तक पूरे गीत की बात है तो इस गीतमाला में इस फिल्म का एक ही गीत शामिल हो पाया और वो है श्रद्धा मिश्रा और पापोन का गाया युगल गीत मर जाएँ हम..


मर जाएँ हम एक प्यारा सा प्रेम गीत है ये जो संदेश शांडिल्य की लहराती धुन और झेलम नदी में बहते शिकारे के बीच इरशाद कामिल के शानदार बोलों की वज़ह से मन पर गहरा असर छोड़ता है। दरअसल जब आप  अपने अक़्स को भूल कर किसी दूसरे व्यक्तित्व की चादर को खुशी खुशी ओढ़ लेते हैं तभी प्रेम का सृजन होता है। इरशाद इन्ही भावनाओं को पहले अंतरे में उभारते हैं। 

गीत के दूसरे अंतरे में उनका अंदाज़ और मोहक हो जाता है। अब इन पंक्तियों की मुलायमियत तो देखिए। कितने महीन से अहसास जगाएँ हैं इरशाद कामिल ने अपनी लेखनी के ज़रिए... तू कह रहा है, मैं सुन रही हूँ,मैं खुद में तुझको ही, बुन रही हूँ,....है तेरी पलकों पे फूल महके,...मैं जिनको होंठों से चुन रही हूँ,...होंठों पे आज तेरे मैं नमी देख लूँ,...तू कहे तो बुझूँ मैं, तू कहे तो चलूँ

संगीत संयोजन में संदेश शांडिल्य ने गिटार और ताल वाद्यों के साथ संतूर का प्रयोग किया है। गीत का मुखड़ा जब संतूर पर बजता है तो मन सुकून से भर उठता है। संतूर पर इस गीत में उँगलिया थिरकी हैं रोहन रतन की।

जो इक पल तुमको ना देखें तो मर जाएँ हम,
जो एक पल तुमसे दूर जाएँ तो मर जाएँ हम,
तू दरिया तेरे साथ ही भीगे बह जाएँ हम,
जो इक पल तुमको ना देखें तो मर जाएँ हम...

मैं तेरे आगे बिखर गयी हूँ,
ले तेरे दिल में उतर गयी हूँ,
मैं तेरी बाँहों में ढूँढूँ खुद को,
यहीं तो थी मैं किधर गयी हूँ,
खो गयी है तू मुझमें, आ गयी तू वहाँ,
मिल रहे हैं जहाँ पे, ख्वाब से दो जहां,
जो एक पल तुमको ना देखें तो मर जाएँ हम..

तू कह रहा है, मैं सुन रही हूँ,
मैं खुद में तुझको ही, बुन रही हूँ,
है तेरी पलकों पे फूल महके,
मैं जिनको होंठों से चुन रही हूँ,
होंठों पे आज तेरे मैं नमी देख लूँ,
तू कहे तो बुझूँ मैं, तू कहे तो चलूँ
जो एक पल तुमको ना देखें... तो मर जाएँ हम,
तू दरिया तेरे साथ ही भीगे..
तू नदिया तेरे साथ ही भीगें, बह जाएँ  हम

नवोदित गायिका श्रद्धा की आवाज़ की बनावट थोड़ी अलग सी है जो कि आगे के लिए संभावनाएँ जगाती हैं जबकि पापोन तो हमेशा की तरह अपनी लय में हैं। शिकारा में इस गीत को फिल्माया गया है आदिल और सादिया की युवा जोड़ी पर..

 

Saturday, January 16, 2021

वार्षिक संगीतमाला गीत #18 : तू जर्दे की हिचकी,गुलकंद का तोला .. Do Ka Chaar

वार्षिक संगीतमाला की अठारह वीं पायदान पर है एक बार फिर सोनू निगम की आवाज़। फिल्म एक बार फिर से चमनबहार। इस फिल्म के एक अन्य गीत के बारे में लिखते हुए मैं बता ही  चुका हूँ कि चमनबहार एक पान की दुकान चलाने वाले नवयुवक की इकतरफा प्रेम कहानी है। छत्तीसगढ़ के छोटे से कस्बे लोरमी में रची बसी इस कहानी को इसी राज्य के बिलासपुर शहर से ताल्लुक रहने वाले अपूर्व धर हैं जो प्रकाश झा की फिल्मों में कई बार सहायक निर्देशक की भूमिका निभा चुके हैं।


इकतरफा प्रेम तो आप जानते ही है कि ख़्वाबों खयालों में पलता है। निर्देशक अपूर्व धर (Apurva Dhar Badgayin) जो इस गीत के गीतकार भी हैं ने इस गीत के माध्यम से नायक के सपनों की मीठी उड़ान भरी है। ज़ाहिर सी बात है कि जब सैयाँ पानवाले हों तो उनकी छबीली जर्दे की हिचकी और गुलकंद के तोले जैसी ही थोड़ी तीखी थोड़ी मीठी होगी। इसीलिए गीत की शुरुआत वे कुछ इन शब्दों से करते हैं । 😀😀😀

दो का चार तेरे लिए सोलह 
तू जर्दे की हिचकी,गुलकंद का तोला 
तू मीठा पान मैं कत्था कोरिया 
देखा जो तुझको मेरा दिल ये बोला 

दूसरे अंतरे में भी अपूर्व की लेखनी नायक द्वारा नायिका को कई अन्य मज़ेदार बिंबों में बाँधती नज़र आती है।

तू राज दुलारी मैं शंभू भोला 
तू मन मोहिनी मेरा बैरागी चोला 
तू तेज़ चिंगारी मैं चरस का झोला 
तू मीठी रूहफज़ा मैं बर्फ का गोला 
उड़ती है खुशबू किमामी 
होता नशा जाफरानी 
मैं बेतोड़ दर्द की कहानी 
तू ही तो है मेरा मलहम यूनानी 
दो का चार तेरे लिए गल्ला 
तू ही तो अल्लाह तू ही मोहल्ला दो का चार....

गीत का संगीत रचा है अंशुमन मुखर्जी ने। गीत की शुरुआत और खासकर अंतरों के बीच में तार वाद्यों के साथ वॉयलिन का प्रयोग कर्णप्रिय लगता है। गीत के फिल्मांकन में नायक की भूमिका में जीतेन्द्र कुमार का अभिनय किसी भी आम से लड़के को इस इकतरफा प्रेम कहानी से जोड़ेगा। सोनू की आवाज़ का सुरीलापन तो आकर्षित करता ही है, साथ ही जिस तरह वो गीत की भावनाओं में रम कर गाते हैं वो भी काबिलेतारीफ है।

तो आइए सुनें सोनू निगम की आवाज़ में ये चुलबुला नग्मा

Monday, January 11, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत # 19 : रात है काला छाता... Raat Hai Kala Chhata

आज जिस गीत को आपके सामने ले के आ रहा हूँ वो ज्यादातर लोगों के लिए अनजाना ही होगा। दरअसल ये एक ऐसा गीत है जो उस दौर के गीत संगीत की याद दिला आता है जिसे फिल्म संगीत का स्वर्णिम काल कहा जाता है। श्री वल्लभ व्यास के लिखे इस गीत के बोल थोड़े अटपटे से हैं पर उसे स्वानंद किरकिरे अपनी खुशमिजाज़ आवाज़ से यूँ सँवारते हैं कि उन्हें सुनते सुनते इस गीत को गुनगुनाने का दिल करने लगता है। वही ठहराव और वही मधुरता जो आजकल के गीतों में बहुत ढूँढने से मिलती है।

ये गीत है फिल्म सीरियस मेन का जो नेटफ्लिक्स पर पिछले अक्टूबर में रिलीज़ हुई थी। वैज्ञानिकों के बीच छोटे पद पर काम करते हुए अपने को कमतर माने जाने की कसक नायक के दिलो दिमाग में इस कदर घर कर जाती है कि वो प्रण करता है कि अपने बच्चे को ऐसा बनाएगा कि सारी दुनिया उसकी प्रतिभा को नमन करे। पर इस काली रात से सुबह के उजाले तक पहुँचने के लिए वो अपने तेजाबी झूठ का ऐसा जाल रचता जाता है कि गीतकार को कहना पड़ता है...रात है काला छाता जिस पर इतने सारे छेद.... तेजाब उड़ेला किसने इस पर जान ना पाए भेद


इस गीत की मूल धुन का क्रेडिट गीत में फ्रांसिस मेंडीज़ को दिया गया है पर इसे इस रूप में लाने का श्रेय है असम से ताल्लुक रखने वाले अनुराग सैकिया को जो पहले भी अनुभव सिन्हा की फिल्मों में अपने बेहतरीन काम से हिंदी फिल्म जगत में अपना सिक्का जमा चुके हैं। प्रवासी मजदूरों पर गीतकार सागर के लिखे लोकप्रिय गीत मुंबई में का बा का संगीत निर्देशन भी उन्होंने ही किया था। इस गीत के संगीत संयोजन में उन्होंने गिटार और बैंजो के आलावा पियानिका और मेंडोलिन का प्रयोग किया है। इन वाद्य यंत्रों पर उँगलियाँ थिरकी हैं सोमू सील की।

रात है काला छाता जिस पर इतने सारे छेद
तेजाब उड़ेला किसने इस पर जान ना पाए भेद
ता रा रा रा.रा रा ... रा रा रा.रा रा .

अब खेलेगा खेल विधाता, चाँद बनेगा बॉल, बॉल... 
सभी लड़कियाँ सीटी होंगी सारे शहर को कॉल
खेल में गड़बड़ नहीं चलेगी, सीटी हरदम बजी रहेगी
जारा ध्यान से इसे बजाना, खुल जाएगी पोल

हम आवारा और लफंगे हैं, लेते सबसे पंगे हैं
लेकिन पंगे सँभल के लेना, वर्ना पड़ जाएगा लेने को देना
रात है काला छाता जिस पर इतने सारे छेद...

तो आइए सुनें स्वानंद की आवाज़ में सीरियस मेन के इस गीत को..


है ना मजेदार गाना? वैसे अगर आप में से किसी ने इसकी मूल धुन सुनी हो तो मुझे जरूर बताएँ। 

Sunday, January 10, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत # 20 : तेरे संग हूँ आख़़िरी क़दम तक ... Aakhiri Kadam Tak

वार्षिक संगीतमाला अब अपने दूसरे चरण यानी शुरु के बीस गानों के पड़ाव तक पहुँच चुकी है और इस पड़ाव से आगे का रास्ता दिखा रहे हैं सोनू निगम। सोनू निगम ज्यादा गाने आजकल तो नहीं गा रहे पर जो भी काम उन्हें मिल रहा है वो थोड़ा अलग कोटि का है। पियानो और की बोर्ड पर महारत रखने वाले संगीतकार मिथुन शर्मा को ही लीजिए। मेरी संगीतमाला में पिछले पन्द्रह सालों से उनके गीत बज रहे हैं पर ये पहला मौका है उनकी बनाई किसी धुन को सोनू निगम की आवाज़ का साथ मिल रहा है। 


पिछले साल ये मौका आया फिल्म ख़ुदाहाफिज़ में। डिज़्नी हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई इस फिल्म का संगीत भी हैप्पी हार्डी एंड हीर की तरह काफी प्रभावशाली रहा। इस फिल्म के तीन गाने इस गीतमाला  में शामिल होने की पंक्ति में थे पर इसी फिल्म का अरमान मलिक का गाया हुआ गाना मेरा इंतज़ार करना बड़े करीब से अंतिम पच्चीस की सूची के बाहर चला गया। 

बहरहाल जहाँ तक इस गीत में सौनू और मिथुन की पहली बार बनती जोड़ी का सवाल है तो लाज़िमी सा प्रश्न बनता है कि आख़िर मिथुन को इतनी देर क्यूँ लगी सोनू को गवाने में ? मिथुन का मानना है कि सोनू निगम तकनीकी रूप से सबसे दक्ष गायक हैं। उनकी प्रतिभा से न्याय करने के लिए मिथुन को एक अच्छी धुन की तलाश थी जो  ख़ुदाहाफिज़ के गीत 'आख़िरी कदम तक' पर जाकर खत्म हुई। 

मिथुन ने जब सोनू को इस गीत को गाने का प्रस्ताव दिया तो वो एक बार में ही सहर्ष तैयार हो गए। वैसे तो मिथुन के संगीतबद्ध ज्यादातर गीत सईद क़ादरी लिखते आए हैं पर इधर हाल फिलहाल में अपने गीतों को लिखना भी शुरु कर दिया है। शायद आशिकी 2 में उनके लिखे गीत क्यूँकि तुम ही हो की सफलता के बाद उन्हें अपनी लेखनी पर ज्यादा आत्मविश्वास आ गया हो। अब दिक्कत सिर्फ ये थी कि सोनू निगम लॉकडाउन में दुबई में डेरा डाले थे जबकि मिथुन मुंबई में। पर तकनीक के इस्तेमाल ने इन दूरियों को गीत की रिकार्डिंग में आड़े नहीं आने दिया। 

ख़ुदाहाफिज़ एक ऐसे मध्यमवर्गीय युवा दम्पत्ति की कहानी है जो शादी के बाद देश में बेरोज़गार हो जाने पर विदेश में नौकरी कर करने का फैसला लेता है। कथा में नाटकीय मोड़ तब आता है जब नायिका परदेश में गुम हो जाती है। पर नायक हिम्मत नहीं हारता और अपने जी को और पक्का कर जुट जाता है अपनी माशूका की खोज में। उसे बताया जाता है कि उसका क़त्ल हो चुका है। साथ साथ जीवन और मरण का जो सपना नायक ने देख रखा था वो पल में चकनाचूर हो जाता है। अपनी पत्नी की अंतिम यात्रा में नायक के मन में उठते मनोभावों को मिथुन कुछ इस तरह शब्दों में ढालते हैं।

नज़रों से करम तक 
ईमां से धरम तक, हक़ीक़त से लेकर भरम तक 
दुआ से असर तक, ये सारे सफ़र तक 
फरिश्तों के रोशन शहर तक, आँसू से जशन तक 
जन्मों से जनम तक, सेहरे को सजा के कफ़न तक 
तेरे संग हूँ आख़़िरी क़दम तक
....

ये रात काली ढल जाएगी 
उल्फ़त की होगी फिर से सुबह 
जिस देश आँसू ना दर्द पले 
है वादा मैं तुझसे मिलुँगा वहाँ 
ज़ख़्मों से मरहम तक, जुदा से मिलन तक 
डोली में बिठा के दफ़न तक 
तेरे संग हूँ आख़़िरी क़दम तक 
तेरे संग हूँ आख़़िरी क़दम तक ...

गीत की शुरुआती पंक्तियाँ वाकई बेहद संवेदनशील बन पड़ी हैं। शब्दों के अंदर बिखरे भावनाओं के सैलाब को सोनू निगम ने अपनी आवाज़ में इस तरह एकाकार किया कि नायक का दर्द सीधे दिल में महसूस होता है। सोनू की सशक्त आवाज़ के पीछे मिथुन ने नाममात्र  का संगीत संयोजन रखा है जो उनके प्रिय पियानो तो कभी गिटार के रूप में प्रकट होता है। अगर आप सोनू निगम की आवाज़ और गायिकी के प्रशंसक हैं तो ये गीत अवश्य पसंद करेंगे।


वैसे सोनू निगम की आवाज़ से इस संगीतमाला में एक बार फिर आगे भी मुलाकात होगी हालांकि वो गीत बिल्कुल अलग मूड लिये हुए है।
वार्षिक संगीतमाला में अब तक

20. तेरे संग हूँ आख़़िरी क़दम तक..

Thursday, January 07, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत #21 बाजे दिल धुन धुन .. दिल धुन धुन धुन धुन बाजे रे Dhun Dhun

वार्षिक संगीतमाला की इक्कीसवीं पायदान का गीत वो जिसमें छत्तीसगढ़ी लोक गीत की मिठास है। इस गीत को गाया है रोमी ने लिखा और धुन बनाई अमित प्रधान ने। चमनबहार के इस गीत को सुनना मेरे लिए एक सुखद आश्चर्य रहा क्यूँकि बहुत दिनों बाद मुखड़े के पहले हारमोनियम की मधुर धुन सुनाई दी इस गीत में। वैसे भी ताल वाद्यों के साथ हारमोनियम हमारे लोकगीतों की जान होता आया है।


चमनबहार इस साल नेटफ्लिक्स पर जून में रिलीज़ हुई। ये फिल्म एक छोटे शहर में पान की दुकान चलाने वाली बिल्लू की कहानी है। बिल्लू जी वनप्रहरी की नौकरी पर लात मात कर अपना ड्रीम जॉब पान की दुकान खोल लेते हैं। दुकान खुल तो जाती है पर चलती नहीं और बिल्लू बेचारे अपनी नीरस चलती ज़िदगी से अनमने से हो जाते हैं कि अचानक उनकी तक़दीर का दरवाजा खुलता है और दुकान के सामने के घर में आ जाती है एक किशोर कन्या जिसपर बिल्लू क्या पूरा शहर ही फिदा हो जाता है। मतलब एक ओर तो बिल्लू की दुकान सामने लगने वाली अड्डेबाजी की वज़ह से  चकाचक चलने लगती है तो दूसरी ओर उन दिल भी फकफकाने लगता है।

पूस के जाड़ा में आम फल जाए 
सपना मा जब गोरिया आए रे 
सुंदरी भंवरा जैसे मन हर घुमरे 
आंकी चांकी सब लागे रे
बाजे दिल धुन धुन 
दिल धुन धुन धुन धुन बाजे रे 
दिल धुन धुन धुन धुन धुन 
धुन धुन धुन धुन धुन धुन धुन बाजे रे 
ओ..सतरंगी सपना, सतरंगी सपना आ 
सतरंगी सपना जब आँखी में आए 
रंगी रंगी सब लागे रे 
जेठ महीना फागुन जस लागे 
धुन धुन धुन धुन मांदर बाजे रे 
सतरंगी सपना जब आँखी में आए 
रंगी रंगी सब लागे रे 
परसा के पेड़ से टेसु हा झड़ते 
जादू जादू सब लागे रे 
धिन धिन फक फक 
धिन धिन फक फक 
भाग हर मोर बोले रे 
दिल धुन धुन धुन धुन बाजे रे 

बिल्लू की इसी मनोदशा को संगीतकार और गीतकार की दोहरी भूमिका निभाते हुए अमित प्रधान ने निर्देशक अपूर्वा धर बडगायन के साथ (जो कि ख़ुद छत्तीसगढ़ के हैं) इस गीत में उतारने की कोशिश की है। गीत में इकतरफे प्रेम का उल्लास फूट फूट पड़ता है। इसीलिए नायक को पूस के जाड़े में भी आम फले दिखते हैं और परसा के पेड़ से टेसू की बहार आई लगती है। 😀 

आज के इस पाश्चात्य माहौल में संगीत के सोंधेपन के साथ जब देशी बोली की छौंक सुनने को मिलती है तो आनंद दुगना हो जाता है। प्रदीप पंडित ने पूरे गीत में हारमोनियम पर अपना कमाल दिखलाया ही है पर गीत की शुरुआत में उनकी बजाई धुन कानों को मस्ती भरे गीत वाले मूड के लिए तैयार कर देती है।

बतौर गायक रोमी की गायिकी का मैं उनके फिल्लौरी के लिए गाए गीत साहिबा से मुरीद हो चुका हूँ। यहाँ भी उन्होंने अपनी छवि पर दाग नहीं लगने दिया है। तो आइए आज आपको सुनाते हैं ये गीत इसके बोलों के साथ। मेरा यकीं है कि इसे सुन कर आपका दिल भी धुन धुनाने लगेगा।


Wednesday, January 06, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत # 22 : तेरी मेरी कहानी... Teri Meri Kahani...

वार्षिक संगीतमाला की आज की पायदान पर जो गीत है उसे अगर यू ट्यूब की मानें तो उसे पिछले साल करोड़ों लोगों ने सुना। इस साल की संगीतमाला में शामिल होने वाला ये हैप्पी हार्डी एंड हीर का दूसरा गाना है। हम भारतीयों को ये हमेशा बड़ी खुशी देता है कि कोई आम सा व्यक्ति अपनी प्रतिभा के बल पर रातों रात स्टार बन जाए। ऐसे शख़्स के प्रति जम के प्यार उड़ेलना हमारी फितरत है।

कहाँ रानू मंडल बंगाल के राणाघाट स्टेशन पर इक प्यार का नग्मा जैसे गीत सुना कर दान में जो भी मिलता उससे अपनी जीविका चलाती थीं और अपने वीडियो के वायरल होने के बाद कहाँ वो सीधे मायानगरी मुंबई में हीमेश रेशमिया जैसे संगीतकार के लिए गाने रिकार्ड करने लगीं। 



हीमेश की धुनें ऐसे भी कर्णप्रिय होती हैं उस पर रानू की आवाज़ को फिल्मी गीत में सुनने की सबकी उत्सुकता और फिर उनकी मीठी आवाज़ का हीमेश द्वारा सधा हुआ इस्तेमाल। गाना तो मशहूर होना ही था और  हुआ भी। हीमेश ने भी इस गीत में बखूबी साथ दिया रानू का।

गीतकार शब्बीर अहमद ने भी दो प्रेमियों की कहानी कहने के लिए कुछ अच्छे बिंब  ढूँढ निकाले मसलन 

कभी उड़ती महक, कभी गीली फ़िज़ा, कभी पाक दुआ 
कभी धूप कड़क, कभी छाँव नरम कभी सर्द हवा 
तेरी मेरी, तेरी मेरी तेरी मेरी कहानी...

सच ही लिखा शब्बीर ने ज़िंदगी की कोई भी कहानी इन बदलते रंगों के बिना कहाँ पूरी हो पाती है? जीवन के इस घूमते पहिए को समझने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं। अब रानू की जीवन कथा को ही लीजिए एक हिट गाने ने उन्हें रातों रात स्टार बना दिया पर कोरोना काल में उन्हें आगे कोई विशेष काम ही नहीं मिला और फिलहाल वो फिर राणाघाट में अकेले समय बिताने को विवश हैं।

संगीतमाला के अगले गीत में है लोकगीत वाली मिठास सुनना ना भूलिएगा।


वार्षिक संगीतमाला में अब तक

Tuesday, January 05, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत # 23 : अँखियाँ बरस बरस जाएँ ..

वार्षिक संगीतमाला की तेइसवीं सीढ़ी इंतज़ार कर रही है तनिष्क बागची के द्वारा रचे दुर्गामती फिल्म के उस गीत का जो बी प्राक की जानदार आवाज़ में आप पर बरस बरस जाना चाहता है। अपने जोड़ीदार वायु श्रीवास्तव से गीत लिखाने वाले तनिष्क ने इस गीत में गीतकार की भूमिका भी ख़ुद ही निभाई है।।


तनिष्क बागची की गणना इस साल के सबसे व्यस्त संगीतकारों में करनी चाहिए। इस साल वो करीब दस फिल्मों में संगीत देते नज़र आए। मेरी संगीतमाला में शामिल उनका ये पाँचवा संगीतबद्ध गीत है। मुझे सबसे ज्यादा खुशी उनके गीत कान्हा (फिल्म : शुभ मंगल सावधान) ने  ने दी थी जो कि वार्षिक संगीतमाला 2017 में दसवीं पॉयदान तक जा पहुँचा था। अब जब उन्होंने पिछले साल इतनी फिल्में की हैं तो देखिए वो अपना रिकार्ड इस संगीतमाला में सुधार पाते हैं या नहीं।

तनिष्क अपनी संगीतबद्ध रचनाओं से अक्सर अपनी प्रतिभा का परिचय देते रहे हैं पर कई बार उनका संगीत बेहद औसत भी रहता है। उन्होंने पिछले कुछ सालों में इतने सारे गानों के रिमिक्स बनाए हैं कि अब तो उनका नाम किसी फिल्म में देख कर ये लगता है कि लो अब एक और रिमिक्स आ गया। अपनी इस पहचान से वो जितना जल्दी आगे निकलें वो बेहतर होगा।

दुर्गामती फिल्म के इस गीत की शुरुआत होती है अल्तमश फरीदी के सुकून देने वाले आलाप से और फिर गूँजता है स्वर बी प्राक का 

उनकी ये नज़र जो नज़र से मिली
मैं पिघलता रहा उसमें ही कहीं 
मैं ख़ुदा से हाँ ख़ुदा से कहूँ तू मेरा, तू मेरा हाँ 
कि अँखियाँ बरस बरस जाएँ 
नैना तरस तरस जाएँ 
मोहे दरस दिखा जा रे पिया रे

मुखड़े की धुन अपनी ओर खींचती है और बी प्राक तनिष्क के सामान्य से बोलों में भी अपनी अदायगी से प्राण भर देते हैं। ऊँचे सुरों पर उनकी पकड़ तेरी मिट्टी की सफलता के बाद किसी से छिपी नहीं है। गीत के अंत में वादक तापस रॉय जब मेंडोलिन पर मुखड़े की धुन बजाते हैं तो मुँह से अनायास ही वाह वाह निकल पड़ती है।

तो आइए संगीतमाला की आज की कड़ी में सुनते हैं भूमि पेडनेकर और करण कपाड़िया पर फिल्माए इस मधुर गीत को


Monday, January 04, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत # 24 : बड़ी ही नशीली संगत तेरी... तू है मेरी आदत बुरी

वार्षिक संगीतमाला की चौबीसवीं सीढ़ी पर है एक रूमानी गीत फिल्म हैप्पी हार्डी और हीर का जिसे संगीतबद्ध किया है हीमेश रेशमिया ने।

हीमेश रेशमिया एक मँजे हुए संगीतकार हैं। 
गा तो वो लेते ही थे अब तो कई फिल्मों में अभिनय भी कर चुके हैं। गीत संगीत के साथ वो उसकी मार्केटिंग भी बढ़िया कर लेते हैं। पिछले साल रानू मंडल को सड़कों से सीधे बॉलीवुड के स्टूडियो तक पहुँचाने का भी श्रेय उनको ही जाता है।  जिस कदर रानू का वीडियो वॉयरल हुआ, उससे उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा उन्हें था जिसका उन्होंने हैप्पी हार्डी और हीर के गानों में बखूबी इस्तेमाल किया।


यही वजह थी कि लॉकडॉउन के पहले आई ये फिल्म भले औसत चली पर इसके संगीत को अच्छी खासी मकबूलियत मिली। अब इस फिल्म के गीत आदत को ही लीजिए। इस गीत का सबसे प्यारा हिस्सा इसकी शुरुआत है जिसमें असीस कौर की गायी गीत की ये पंक्तियां मन मोह लेती हैं

जो कदी छूटे ना, वो चाहत बुरी
मान ले इश्क है, आफ़त बुरी

इन पंक्तियों के पहले तार वाद्यों से जो संगीत का टुकड़ा हीमेश ने रचा है वो तो बस लाजवाब है। गीत के बीच जब जब वो बजता है मन खुशी से आनंदित हो जाता है। आडियो वर्जन में असीस दूसरे अंतरे में भी आती हैं और बड़ी खूबसूरती से अपनी उपस्थिति जतला कर निकल जाती हैं। गीत में रब्बी शेरगिल पंजाबियत की मस्ती और और रानू मंडल मिठास घोलते नज़र आते हैं। अगर साधारण है तो हीमेश की गायिकी जो अन्य गायकों जैसी असरदार नहीं। 

तो पहले इस गीत का लंबा आडियो वर्जन सुनिए।

   

और ये है गीत का वीडियो जिसे फिल्माया गया है हीमेश और सोनिया मान पर। अरे एक बात तो बतानी रह ही गयी। इस गीत के बोल लिखे हैं सोनिया कपूर ने जो हीमेश की पत्नी भी हैं।

 

इस गीत को सुन कर इन चार गायकों में से आप किस के लिए कहेंगे ..बड़ी ही नशीली संगत तेरी...तू है मेरी आदत बुरी

Sunday, January 03, 2021

वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत # 25 : तू तो साडी केयर नि करदा

कोरोना ने हमारी इस साल ऐसी मनःस्थिति कर दी कि हम ढंग से पिछले साल के गीत संगीत का ठीक ही लुत्फ ही नहीं उठा सके। अगर साल के पहले तीन महीनों को छोड़ दें तो इस साल कोरोना के चक्कर में ना फिल्में बड़े पर्दे पर रिलीज़ हुईं और ना ही उनका संगीत गली मोहल्लों में गूँजा।

ओटीटी प्लेटफार्म पे फिल्में जरूर बनीं और रिलीज़ हुईं पर उनके बेहद कम गीत ही आम जनता तक पहुँच सके। इनमें से तो कई फिल्में ऐसी थी जिनमें गीत थे ही नहीं। वैसे भी आजकल के कई युवा निर्देशक गीतों को फिल्म की कहानी में एक व्यवधान की तरह ही मानते हैं। ऐसे में इस साल की संगीतमाला बाकी सालों जैसी विविधता और कुछ हद तक वो गुणवत्ता तो लिए हुए नहीं है फिर भी मैंने कोशिश की है हर साल की तरह आपके लिए पिछले साल रिलीज़ हुई फिल्मों के पच्चीस बेहतरीन गीतों को सामने लाऊँ। 

हालांकि कुछ लोगों का ऐसा भी मत था कि इनमें वेब सिरीज़ के गीतों को भी शामिल किया जाए। वाकई इस साल कुछ बेहद उम्दा काम फिल्मों के इतर भी हुआ है। वेब सिरीज़ के अलावा लॉकडाउन में बहुत सारे कलाकारों ने अपनी व्यक्तिगत कोशिश से मिलजुल कर गाने बनाए जो बेहद सुरीले थे। पर उन गीतों के बारे में अलग से लिखूँगा इस संगीतमाला के खत्म होने के बाद।


फिलहाल तो संगीतमाला की शुरुआत पच्चीस पॉयदान के गीत से जिसे मैंने फिल्म छलाँग से लिया है। ये बड़ा मज़ेदार सा गीत है जो मियाँ बीवी की शिकायतों को बड़े हल्के फुल्के अंदाज़ में पेश करता है। अब आप ही बताइए इग्नोर करने की, केयर और शेयर ना करने की शिकायत तो आम तौर पर हर पत्नी को अपने पति से होती है। बस इस केयर और इग्नोर करने का मापदंड थोड़ा बदल गया है। आज के युग में फोन का घड़ी घड़ी ना आना, सोशल मीडिया पर लाइक या कमेंट नहीं करना, मेसेज अनसीन ही किये रखना जैसी बातें झगड़े के लिए वाजिब शिकायतों की सूची में शामिल हैं।

अब जिस गीत के लिखने और गाने में हनी सिंह का हाथ हो उसमें पंजाबी के साथ हिंग्लिश का तड़का तो होगा ही। पर तारीफ़ की बात ये है कि जो जुमले हनी ने अन्य गीतकारों की मदद से डाले हैं वैसे उलाहने आज की इस डिजिटल संस्कृति में आम हैं।

तो सुनिए कि इस गीत में नुसरत भड़ूचा, राजकुमार राव पर क्या  इल्जाम लगा रही हैं और बदले में राजकुमार राव अपनी सफाई में कैसी दलीलें पेश कर रहे हैं। इस गीत की धुन बनाई है हितेश सोनी ने और आवाज़ें दी हैं स्वीतज बरार और हनी सिंह ने। 



अच्छा ये बताइए कि ऐसी शिकायतें क्या आप भी करते हैं?

Friday, October 02, 2020

वैष्णव जन तो तेने कहिये.... : सुनिए कुलदीप मुरलीधर पाई की ये निर्मल प्रस्तुति

आज गाँधी जयन्ती है और जैसे ही बापू की बात होती है उनका प्रिय भजन वैष्णव जन मन में गूँजने लगता है पर क्या आप जानते हैं कि इस भजन के जनक कौन थे। पन्द्रहवीं शताब्दी के लोकप्रिय गुजराती संत नरसी मेहता जिन्हें लोग नरसिंह मेहता के नाम से भी बुलाते हैं नरसी मेहता को गुजराती भक्ति साहित्य में वही स्थान प्राप्त है जो हिंदी में सूरदास को। गाँधी जी ने उनके भजन के एक भाग को अपनी प्रार्थना सभाओं का हिस्सा बनाया और वो इतनी सुनी गई कि वैष्णव धुन गाँधी जी के विचारों का प्रतीक बन गयी।

आज मैंने कुलदीप मुरलीधर पाई एवम् उनके शिष्यों द्वारा गायी ये सम्पूर्ण  रचना सुनी और मन इसमें डूब सा गया। कुलदीप एक शास्त्रीय गायक, संगीतकार व संगीत निर्माता भी हैं। बचपन से उनका झुकाव आध्यात्म की ओर था इसलिए भक्ति संगीत को उन्होंने अपने संगीत का माध्यम चुना। यू ट्यूब पर उनका भक्ति संगीत का चैनल खासा लोकप्रिय है। उनकी वंदे गुरु परंपरा से संबद्ध कड़ियों ने अपनी आध्यात्मिक परम्पराओं से जुड़ने का आज की पीढ़ी को मौका दिया है।

इस भजन को सुनने से पहले ये जान लेते हैं कि संत नरसी ने तब सच्चे वैष्णव की क्या परिभाषा गढ़ी थी

वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे 

पर दुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आणे रे

वैष्णव जन तो उसे कहेंगे जो दूसरों के दुख को समझता हो। जिसके मन में दूसरो का भला करते हुए भी अभिमान का भाव ना आ सके वही है सच्चा वैष्णव

सकल लोक माँ सहुने वन्दे, निन्दा न करे केनी रे 
वाच काछ मन निश्चल राखे, धन-धन जननी तेरी रे 

जिसके मन में हर किसी के प्रति सम्मान का भाव हो और जो परनिंदा से दूर रहे। जिसने अपनी वाणी, कर्म और मन को निश्छल रख पाने में सफलता पाई हो उसकी माँ तो ऐसी संतान पा कर धन्य हो जाएगी।

समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, पर स्त्री जेने मात रे 
जिहृवा थकी असत्य न बोले, पर धन नव झाले हाथ रे 

जिसके पास सबको देखने समझने की समान दृष्टि हो, जो परस्त्री को माँ के समान समझे। जिसकी जिह्वा असत्य बोलने से पहले ही रुक जाए और जिसे दूसरे के धन को पाने की इच्छा ना हो

मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ वैराग्य जेना तन मा रे 
राम नामशुं ताली लागी, सकल तीरथ तेना तन मा रे 

जिसे मोह माया व्याप्ति ही न हो, जिसके मन में वैराग्य की धारा बहती हो। जो हर क्षण मन में राम नाम का ऐसा जाप करे कि सारे तीर्थ उसके तन में समा जाएँ वही जानो कि सच्चे वैष्णव मार्ग पर चल रहा है।

वण लोभी ने कपट रहित छे, काम क्रोध निवार्या रे 
भणे नर सैयों तेनु दरसन करता, कुळ एको तेर तार्या रे 
वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीर पराई जाणे रे ।

जिसने लोभ, कपट, काम और क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली हो। ऐसे वैष्णव के दर्शन मात्र से ही, परिवार की इकहत्तर पीढ़ियाँ  तर जाती हैं

हालांकि नरसिंह मेहता ने सच्चे वैष्णव बनने के लिए जो आवश्यक योग्यताएँ रखी हैं वो आज के युग में किसी में आधी भी मिल जाएँ तो वो धन्य मान लिया जाएगा। कम से कम हम इस राह पर बढ़ने की एक कोशिश तो कर ही सकते हैं।


इस भजन में कुलदीप का साथ दिया है राहुल, सूर्यागायत्री और भाव्या गणपति ने। इतना स्पष्ट उच्चारण  गायिकी कि क्या कहने ! साथ में ताल वाद्यों और बाँसुरी की ऐसी मधुर बयार कि मन इसे सुनकर निर्मल होना ही है। 

Sunday, August 30, 2020

प्यार हुआ चुपके से.. जावेद अख्तर के काव्यात्मक बोलों पर पंचम का यादगार संगीत

1994 में प्रदर्शित हुई इस फिल्म 1942 Love Story संगीतकार पंचम की आख़िरी फिल्म थी। इस फिल्म का संगीत रचने में उन्होंने काफी मेहनत की थी। फिल्म और उसका संगीत बेहद लोकप्रिय हुआ था, पर इस फिल्म के रिलीज़ होने के छः महीने पहले ही बिना इसकी सफलता को देखे हुए पंचम इस दुनिया से रुखसत हो चुके थे।

पंचम अपने कैरियर के उस पड़ाव में अपने संघर्ष काल से गुजर रहे थे। अस्सी के दशक में उन्हें काम मिलना भी कम हो गया था। ये वो दौर था जब हिंदी फिल्म संगीत रसातल में जा रहा था और पंचम से हुनर में बेहद कमतर संगीतकार निर्माता निर्देशकों की पसंद बने हुए थे। मानसिक रूप से अपनी इस अनदेखी से पंचम परेशान थे और जो छोटे मोटी फिल्में उन्हें मिल भी रही थीं उसमें उनका काम उनकी काबिलियत के अनुरूप नहीं था।

ऐसे में जब विधु विनोद चोपड़ा ने पंचम को ये जिम्मेदारी सौंपी तो ये सोचकर कि आज़ादी के पहले के समय का संगीत उनसे अच्छा कोई और नहीं दे सकता। हालाँकि पंचम पर उस समय बतौर संगीत निर्देशक असफलता का ऐसा ठप्पा लग चुका था कि संगीत कंपनी एच एम वी ने विधु विनोद चोपड़ा से कह रखा था कि अगर आपने आर डी बर्मन को इस फिल्म के लिए अनुबंधित किया  तो उनका पारीश्रमिक आप ही देना यानी हम ऐसे व्यक्ति पर पैसा नहीं लगाएँगे।

पंचम का भी अपने ऊपर अविश्वास इतना था कि जब कुछ ना कहो की पहली धुन खारिज़ हुई तो उनका पहला सवाल यही था कि मैं इस फिल्म का संगीतकार रहूँगा या नहीं और जवाब में विधु विनोद चोपड़ा ने तल्खी से कहा था कि तुम अपनी भावनाएँ मत परोसो बल्कि अपना अच्छा संगीत दो जिसके लिए तुम जाने जाते हो।

हफ्ते भर में पंचम एक और धुन ले के आए और वो गीत उस रूप में आया जिसमें हम और आप इसे आज सुनते हैं। फिल्म का सबसे कामयाब गीत इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा की चर्चा तो पहले यहाँ कर ही चुका हूँ कि कैसे वो मिनटों में बन गया। 


मुझे इस फिल्म का जो गीत सबसे ज्यादा पसंद है वो था दिल ने कहा चुपके से..प्यार हुआ चुपके से। क्या बोल लिखे थे जावेद अख्तर साहब ने इस गीत के लिए। गीत के हर एक अंतरे को सुनकर ऐसा लगता था मानो शहद रूपी कविता की मीठी बूँद टपक रही हो। ऐसी बूँद जिसका ज़ायका मन में घंटों बना रहता था। पंचम के संगीत में राग देश की प्रेरणा के साथ साथ रवींद्र संगीत का भी संगम था। पंचम ने धुन तो कमाल की बनाई ही पर तितलियों से सुना..... के बाद का तबला और मैंने बादल से कभी..... के बाद की बाँसुरी और अंत में निश्चल प्यार को आज़ादी की जंग से जोड़ता सितार गीत को सुनने के बाद भी मन में गूँजते रहे थे।

पहले प्यार के अद्भुत अहसास को तितलियों और बादल के माध्यम से कहलवाने का जावेद साहब का अंदाज़ अनूठा था जिसे कविता कृष्णामूर्ति जी ने इतने प्यार से गुनगुनाया कि इस गीत की बदौलत उस साल की सर्वश्रेष्ठ गायिका का खिताब भी उन्होंने हासिल किया। तो आज उनकी आवाज़ में फूल से भौंरे का व नदी से सागर से मिलने का ये सुरीला किस्सा फिर से एक बार सुनिए आज की इस पोस्ट में..  

दिल ने कहा चुपके से, ये क्या हुआ चुपके से
क्यों नए लग रहे हैं ये धरती गगन
मैंने पूछा तो बोली ये पगली पवन
प्यार हुआ चुपके से, ये क्या हुआ चुपके से

तितलियों से सुना, मैंने किस्सा बाग़ का
बाग़ में थी इक कली, शर्मीली अनछुई
एक दिन मनचला भँवरा आ गया
खिल उठी वो कली, पाया रूप नया
पूछती थी कली, ये मुझे क्या हुआ
फूल हँसा चुपके से..प्यार हुआ चुपके से...

मैंने बादल से कभी, ये कहानी थी सुनी
परबतों की इक नदी, मिलने सागर से चली
झूमती, घूमती, नाचती, डोलती
खो गयी अपने सागर में जा के नदी
देखने प्यार की ऐसी जादूगरी
चाँद खिला चुपके से, प्यार हुआ चुपके से...

जितना प्यारा ये गीत था उतनी ही खूबसूरती से हिमाचल प्रदेश में इसका फिल्मांकन किया गया था। मनीषा की सादगी भरी सुंदरता तो मन को मोहती ही है...


Saturday, August 15, 2020

तेरी मिट्टी के वो अंतरे जो फिल्म केसरी में इस्तेमाल नहीं हुए... Teri Mitti Unreleased Verses

तेरी मिट्टी पिछले साल के बेहद चर्चित गीतों में रहा था। मनोज मुंतशिर की लेखनी और अर्को के मधुर संगीत से सँवरा ये गीत मुझे कितना अजीज़ था इस बात का अदाजा तो आपको होगा ही क्यूँकि ये एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला का सरताज गीत भी बना था पिछले साल। इस फैसले से मनोज कुछ दिनों के लिए विचलित भी रहे थे और उन्होंने सार्वजनिक तौर अपना दुख भी ज़ाहिर किया था। जनता ने तो फैसला पहले ही ले लिया था और उनका प्यार इस गीत के लिए तरह तरह से उमड़ा जो कि इस बात को साबित कर गया कि ये गीत इस साल तो क्या दशकों तक श्रोताओं के दिल में अपनी जगह बरक़रार रखेगा।



जब भी कोई गीत बनता है तो गीतकार उसके कई अंतरे लिखते हैं। उनमें से कुछ निर्माता, निर्देशक व संगीतकार मिल कर चुन लेते हैं और कुछ यूँ ही नोट्स में दबे रह जाते हैं। आजकल अमूमन दो अंतरे फिल्मी गीतों का हिस्सा बनते हैं और कई बार ऐसा होता है कि संपादन के बाद उनमें से गीत का एक टुकड़ा भर ही फिल्म में रह पाता है। बतौर श्रोता मैं ये कह सकता हूँ कि जब किसी गीत का भाव और शब्द मुझे पसंद आते हैं तो अक्सर ये उत्सुकता बनी रहती है कि इसके वो अंतरे कौन से थे जो गीत का हिस्सा नहीं बन पाए। मनोज ने श्रोताओं की इसी मनोभावनाओं का ध्यान रखते हुए इस गीत के कुछ बचे हुए अंतरों को मशहूर वॉयलिन वादक दीपक पंडित और गायिका रूपाली जग्गा के साथ मिलकर गीत की शक़्ल में प्रस्तुत करने का निश्चय किया।

देश के अमर योद्धाओं को समर्पित इस गीत के लिए स्वतंत्रता दिवस से बेहतर दिन और क्या हो सकता था? आजकल मनोज गीत लिखने के साथ साथ अपने यू ट्यूब चैनल पर शायरों और गीतकारों के बारे में बातें भी करते हैं और नए कवियों की चुनिंदा शायरी पढ़कर उनकी हौसला अफजाई भी करते हैं। लिखते तो अच्छा वो हैं ही दिखते भी अच्छे हैं और बोलते भी क्या खूब हैं। आज जो गीत का बचा हुआ हिस्सा रिलीज़ हुआ है उसके बीच बीच में मनोज ने अपनी कविता भी पढ़ी है जो गीत के अनुरूप देश की सरहद पर जान न्योछावर करने वाले वीर जवानों को समर्पित है। कुछ मिसाल देखिए

वो गोलियाँ जो हमारी तरफ बढ़ी थीं कभी
तुम अपने सीने में भरकर ज़मीं पे लेट गए
जहाँ भी प्यार से माँ भारती ने थपकी दी
तुम एक बच्चे की मानिंद वहीं पे लेट गए

या फिर ये देखिए कि

तुम्हीं ना होते तो दुनिया बबूल हो जाती
जमींने ख़ून से यूँ लालाज़ार करता कौन
हजारों लोग यूँ तो हैं ज़माने में लेकिन
हमारे वास्ते यूँ मुस्कुरा के मरता कौन

या फिर बशीर बदर साहब की ज़मीं से उठता उनका ये शेर

भले कच्ची उमर में ज़िदगी की शाम आ जाए
ये मुमकिन ही नहीं कि ख़ून पे इलजाम आ जाए

बहरहाल गीत का ये हिस्सा अगर फिल्म में होता तो शहीद की माशूका पर फिल्माया गया होता क्यूँकि इन अंतरों में मनोज ने उसी के मन को कुछ यूँ पढ़ने की कोशिश की है

हाथों से मेरे ये हाथ तेरे, छूटे तो यार सिहर गई मैं
तू सरहद पे बलिदान हुआ, दहलीज़ पे घर की मर गयी मैं
तू दिल में मेरे आबाद है यूँ जैसे हो फूल किताबों में
ओ माइया वे वादा है मेरा हम रोज़ मिलेंगे ख्वाबों मे

और ये अंतरा तो बस कमाल का है..

सावन की झड़ी जब लगती है, बूँदों में तू ही बरसता है
तू ही तो है जो झरनों के पानी में छुप के हँसता है
त्योहार मेरे सब तुझसे ही, मेरी होली तू बैशाखी तू
मैं आज भी हूँ जोगन तेरी, है आज भी मुझमें बाकी तू

तेरी मिट्टी में मिल जावां, गुल बण के मैं खिल जावां..
इतनी सी है दिल की आरजू..

सबसे बड़ी बात जो मनोज से इस गीत के अंत में कही है और जो हम सबको समझनी चाहिए कि फौजी को भी वहीं खुशियाँ, वही ग़म व्यापते हैं जो एक आम इंसान महसूस करता है पर देश की मिट्टी के लिए सब भूलकर वो अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है। गलवान में हमारे बीस लोग शहीद हुए तो उन्हें सिर्फ एक गिनती समझ कर हमें भूल नहीं जाना है पर अपने जैसा एक साथी समझ कर उसके बलिदान को याद रखना हैं।

तो आइए सुनते हैं मनोज, दीपक और रूपाली की ये सम्मिलित प्रस्तुति जो आपकी आँखों को एक बार फिर से नम कर देगी...

 

Saturday, July 04, 2020

यूँ ही कभी हो जाता है.. पंचम के संगीत की याद दिलाता एक प्यारा नग्मा

पिछले हफ्ते  संगीतकार पंचम का जन्मदिन था। जैसा कि अक्सर होता है जन्मदिवस पर हम उस व्यक्ति विशेष की कृतियाँ याद करते हैं। उनके बनाए गीत सुनते हैं, गाते हैं, उससे जुड़ी यादें साझा करते हैं और यही कल बहुत लोगों ने किया भी। पर इन सारी पेशकश में सबसे अलग था दो कलाकारों का एक मौलिक प्रयास जो हमें हर पल में पंचम के संगीत की याद दिला रहा था।

एक साझा और बेहद प्यारी कोशिश आश्विन श्रीनिवासन और रोंकिनी गुप्ता की युगल जोड़ी की तरफ से भी हुई। दोनों ही कलाकार शास्त्रीय संगीत की अलग अलग विधाओं में पारंगत हैं। रोंकिनी की शास्त्रीय गायिकी कमाल की है वही आश्विन की उँगलियाँ बचपन से ही बाँसुरी पर थिरकती रही हैं। दोनों ही ऐसे कलाकार हैं जिनका हुनर एक विधा तक सीमित नहीं हैं। इन्होंने अपने संगीत के साथ काफी प्रयोग करने की कोशिश की है। हिन्दी फिल्मों में रोंकिनी के गाए गीत हर साल प्रशंसा बटोरते रहे हैं वहीं आश्विन ने भी संगीत निर्माण से लेकर गीत लिखने व गाने में नामी हस्तियों के साथ गठजोड़ किया है।


आश्विन श्रीनिवासन व  पंचम 
पंचम की संगीत रचना के बहुत सारे अवयव हैंं जैसे ताल वाद्यों की उनकी एक खास तरह की रिदम, गीत में अक्सर कुछ नई तरीके की आवाज़ पैदा करने की उनकी ललक, इंटरल्यूड्स का संगीत संयोजन, गीत के बीच तैरता आलाप, किरदारों की आपसी बातचीत और भी बहुत कुछ जिसे आप इस गीत को सुनते हुए महसूस कर सकेंगे। आश्विन (Ashwin Srinivasan) ने पंचम की इन्हीं विशिष्टताओं को बड़ी बारीकी से पकड़ा और ऐसा इसीलिए संभव हो सका कि वे पंचम के संगीत के अनन्य भक्त रहे हैं।

रोंकिनी गुप्ता 
रहा रोंकिनी (Ronkini Gupta) का सवाल तो अब तक वो जैसे गीत गाती रही हैं ये उससे हट के कुछ अलग कोटि का गीत था और बड़ी खूबी से उन्होंने इसे निभाया। या फिर मैं ऐसे कहूँ कि उन्होंने अपनी बेहतरीन गायिकी से गीत के सहज शब्दों को भी अनमोल बना दिया। मुखड़े से अंतरे में बदलता स्केल हो या इंटरल्यूड्स में संगीत के उनकी ला ला करती मीठी तान..या अंत की चंचल चुहल..ये सब गीत का मज़ा दोगुना कर देती है। कुल मिलाकर इस गीत को सुन कर ऐसा लगता है कि पंचम, आशा व किशोर की तिकड़ी साक्षात पुनः प्रकट हो गयी हो।
तो अब आप इस गीत का आनंद लीजिए आश्विन के लिखे इन शब्दों के साथ
यूँ ही कभी हो जाता है
ख़्वाबों में दिल खो जाता है
तुझसे भी तो हो जाता है
मुझमें भी तू खो जाता है
मुझमें धड़कता है..
यूँ भी कभी हो जाता है.... 

ऐसी कृतियाँ जो एक महान संगीतकार के संगीत के मुख्य पहलुओं को चंद मिनटों में यूँ सजा दें निश्चय ही सराहने योग्य हैं। तो आइए सुनते हैं इस गीत को इस युगल जोड़ी की आवाज़ में।



आश्विन एक मँजे हुए बाँसुरी वादक हैं। चूँकि आज की पोस्ट पंचम दा पर हैं तो क्यूँ ना उनकी बाँसुरी की माहिरी पंचम की बनाई हुई कुछ सदाबहार धुनों पर सुन ली जाए।


एक शाम मेरे नाम पर पंचम के कई सुरीले गीतों की चर्चा होती रही है। उन सब की फ़ेहरिस्त यहाँ पर

Saturday, June 27, 2020

ग़म का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी.. जब मिले सुर लता और जगजीत के

कलाकार कितनी भी बड़ा क्यूँ ना हो जाए फिर भी जिसकी कला को देखते हुए वो पला बढ़ा है उसके साथ काम करने की चाहत हमेशा दिल में रहती है। सत्तर के दशक में जब जगजीत बतौर ग़ज़ल गायक अपनी पहचान बनाने में लगे थे तो उनके मन में भी एक ख़्वाब पल रहा था और वो ख़्वाब था सुर कोकिला लता जी के साथ गाने का।



जगजीत करीब पन्द्रह सालों तक अपनी इस हसरत को मन में ही दबाए रहे। अस्सी के दशक के आख़िर में 1988 में अपने मित्र और मशहूर संगीतकार मदनमोहन के सुपुत्र संजीव कोहली से उन्होंने गुजारिश की कि वो लता जी से मिलें और उन्हें एक ग़ज़लों के एलबम के लिए राजी करें। लता जी मदनमोहन को बेहद मानती थीं इसलिए जगजीत जी ने सोचा होगा कि वो शायद संजीव के अनुरोध को ना टाल पाएँ।

पर वास्तव में ऐसा हुआ नहीं। जगजीत सिंह की जीवनी से जुड़ी किताब बात निकलेगी तो फिर में सत्या सरन ने लिखा इस प्रसंग का जिक्र करते हुए लिखा है कि
लता ने कोई रुचि नहीं दिखाई, उन्होंने ये पूछा कि उनको जगजीत सिंह के साथ गैर फिल्मी गीत क्यों गाने चाहिए? हालांकि बतौर गायक वो जगजीत सिंह को पसंद करती थीं। इसके आलावा वे उन संगीतकारों के लिए ही गाना चाहती थीं जिनके साथ उनकी अच्छी बनती हो।
लता जी को मनाने में ही दो साल लग गए। एक बार जब इन दो महान कलाकारों का मिलना जुलना शुरु हुआ तो आपस में राब्ता बनते देर ना लगी। लता जी ने जब जगजीत की बनाई रचनाएँ सुनीं तो प्रभावित हुए बिना ना रह सकीं। जगजीत ने भी उन्हें बताया की ये धुनें उन्होंने सिर्फ लता जी के लिए सँभाल के रखी हैं। दोनों का चुटकुला प्रेम इस बंधन को मजबूती देने में एक अहम कड़ी साबित हुआ। संगीत की सिटिंग्स में बकायदा आधे घंटे अलग से इन चुटकुलों के लिए रखे जाने लगे। लता जी की गिरती तबियत, संजीव की अनुपलब्धता की वज़ह से ग़ज़लों की रिकार्डिंग खूब खिंची पर जगजीत जी ने अपना धैर्य बनाए रखा और फिर सजदा आख़िरकार 1991 में सोलह ग़ज़लों के डबल कैसेट एल्बम के रूप में सामने आया जो कि मेरे संग्रह में आज भी वैसे ही रखा है।

मुझे अच्छी तरह याद है कि तब सबसे ज्यादा प्रमोशन जगजीत व लता के युगल स्वरों में गाई निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल हर तरह हर जगह बेशुमार आदमी..फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी को मिला था। भागती दौड़ती जिंदगी को निदा ने चंद शेरों में बड़ी खूबसूरती से क़ैद किया था। खासकर ये अशआर तो मुझे बेहद पसंद आए थे

रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी

ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र
आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी

यूँ तो इस एलबम में मेरी आधा दर्जन ग़ज़लें बेहद ही पसंदीदा है पर चूंकि आज बात लता और जगजीत की युगल गायिकी की हो रही है तो मैं आपको इसी एलबम की एक दूसरी ग़ज़ल ग़म का खज़ाना सुनवाने जा रहा हूँ जिसे नागपुर के शायर शाहिद कबीर ने लिखा था। शाहिद साहब दिल्ली में केंद्र सरकार के मुलाज़िम थे और वहीं अली सरदार जाफरी और नरेश कुमार शाद जैसे शायरों के सम्पर्क में आकर कविता लिखने के लिए प्रेरित हुए। चारों ओर , मिट्टी के मकान और पहचान उनके प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह हैं। जगजीत के आलावा तमाम गायकों ने उनकी ग़ज़लें गायीं पर मुझे सबसे ज्यादा आनंद उनकी ग़ज़ल ठुकराओ या तो प्यार करो मैं नशे में हूँ  गुनगुनाने में आता है। 😊

जहाँ तक ग़म का खज़ाना का सवाल है ये बिल्कुल सहज सी ग़ज़ल है। दो दिल मिलते हैं, बिछुड़ते हैं और जब फिर मिलते हैं तो उन साथ बिताए दिनों की याद में खो जाते हैं और बस इन्हीं भावनाओं को स्वर देते हुए शायर ने ये ग़ज़ल लिख दी है। इस ग़ज़ल की धुन इतनी प्यारी है कि सुनते ही मज़ा आ जाता है। तो आप भी सुनिए पहले लता और जगजीत की आवाज़ में..

ग़म का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी
ग़म का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी
ये नज़राना तेरा भी है, मेरा भी
अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना
अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना
राग पुराना तेरा भी है, मेरा भी
राग पुराना तेरा भी है, मेरा भी
ग़म का खज़ाना ....

तू मुझको और मैं तुमको, समझाऊँ क्या
तू मुझको और मैं तुमको समझाऊँ क्या
दिल दीवाना तेरा भी है, मेरा भी
दिल दीवाना तेरा भी है, मेरा भी
ग़म का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी

शहर में गलियों, गलियों जिसका चर्चा है
शहर में गलियों, गलियों जिसका चर्चा है
वो अफ़साना तेरा भी है, मेरा भी

मैखाने की बात ना कर, वाइज़ मुझसे
मैखाने की बात ना कर, वाइज़ मुझसे
आना जाना तेरा भी है, मेरा भी
ग़म का खज़ाना तेरा भी है....

यूँ तो जगजीत और लता जी की आवाज़ को उसी अंदाज़ में लोगों तक पहुँचा पाना दुसाध्य कार्य है पर उनकी इस ग़ज़ल को हाल ही में उभरती हुई युवा गायिका प्रतिभा सिंह बघेल और मोहम्मद अली खाँ ने बखूबी निभाया।  हालांकि गीत के बोलों को गाते हुए बोल की छोटी मोटी भूलें हुई हैं उनसे। लाइव कन्सर्ट्स में ऐसी ग़ज़लों को सुनने का आनंद इसलिए भी बढ़ जाता है क्यूँकि मंच पर बैठे साजिंद भी अपने खूबसूरत टुकड़ों को मिसरों के बीच बड़ी खूबसूरती से सजा कर पेश करते हैं। अब यहीं देखिए मंच की बाँयी ओर वॉयलिन पर दीपक पंडित हैं  जो जगजीत जी के साथ जाने कितने कार्यक्रमों में उनकी टीम का हिस्सा रहे। वहीं दाहिनी ओर आज के दौर के जाने पहचाने बाँसुरी वादक पारस नाथ हैं जिनकी बाँसुरी टीवी पर संगीत कार्यक्रमों से लेकर फिल्मों मे भी सुनाई देती है।

 

सजदा का जिक्र अभी खत्म नहीं हुआ है। अगले आलेख बात करेंगे इसी एल्बम की एक और ग़ज़ल के बारे में और जानेंगे कि चित्रा जी को कैसी लगी थी लता जी की गायिकी ?

Wednesday, April 22, 2020

मोहब्बत करने वाले कम न होंगे.. हफ़ीज़ होशियारपुरी

कई शायर ऐसे रहे हैं जिनकी किसी एक कृति ने उनका नाम हमेशा के लिए हमारे दिलो दिमाग पर नक़्श कर दिया। कफ़ील आज़र का नाम कौन जानता अगर उनकी नज़्म बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी ..  को जगजीत जी ने अपनी आवाज़ नहीं दी होती। अथर नफ़ीस साहब वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया से हमेशा अपनी याद दिला जाते हैं। प्रेम वारबर्टनी का नाम सिर्फ तभी आता है जब राजेंद्र व नीना मेहता की गाई नज़्म तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना  का जिक्र होता है। वहीं राजेंद्र नाथ रहबर का नाम तभी ज़हन में उभरता है जब तेरे खुशबू से भरे ख़त मैं जलाता कैसे.....  सुनते वक़्त जगजीत की आवाज़ कानों में गूँजती है।



ऐसा नहीं कि इन शायरों ने और कुछ नहीं लिखा। कम या ज्यादा लिखा जरूर पर वे पहचाने अपनी इसी रचना से गए। ऐसे ही एक शायर थे हफ़ीज़ होशियारपुरी साहब जिनका ताल्लुक ज़ाहिरन तौर पर पंजाब के होशियारपुर से था। वही होशियारपुर जहाँ से जैल सिंह और काशी राम जैसी हस्तियाँ राजनीति में अपनी चमक बिखेरती रहीं। स्नातक की पढ़ाई होशियारपुर से पूरी कर हफ़ीज़ लाहौर चले गए। वहाँ तर्कशास्त्र में आगे की पढ़ाई की। हफ़ीज़ साहब के नाना शेख गुलाम मोहम्मद शायरी में खासी रुचि रखते थे। उनकी याददाश्त इतनी अच्छी थी कि  हजारों शेर हमेशा उनकी जुबां पर रहते थे। उन्हें ही सुनते सुनते हफ़ीज़ भी दस ग्यारह साल की उम्र से शेर कहने लगे। बाद में लाहौर में पढ़ाई करते समय फ़ैज़ और राशिद जैसे समकालीन बुद्धिजीवियों का असर भी उनकी लेखनी पर पड़ा।
हफ़ीज़ होशियारपुरी
आज़ादी के आठ बरस पहले उन्होंने कृष्ण चंदर के साथ रेडियो लाहौर में भी काम किया। मंटो भी उनको अपना करीबी मानते थे। मशहूर शायर नासिर काज़मी के तो वो गुरु भी कहे जाते हैं पर इतना सब होते हुए भी उनकी लिखी चंद ग़ज़लें ही मकबूल हुईं और अगर एक ग़ज़ल का नाम लिया जाए जिसकी वज़ह से आम जनता उन्हें आज तक याद रखती है तो वो "मोहब्बत करने वाले कम न होंगे..." ही होगी। जनाब मेहदी हसन ने इस ग़ज़ल के कई शेर अपनी अदायगी में शामिल किये। उनके बाद फरीदा खानम, इकबाल बानो और हाल फिलहाल में पापोन ने भी इसे अपनी आवाज़ से सँवारा है पर मुझे इस ग़ज़ल को हमेशा मेहदी हसन साहब की आवाज़ में ही सुनना पसंद रहा है। जिस तरह से उन्होंने ग़ज़ल के भावों को पढ़कर अपनी गायिकी में उतारा है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम होगी।

इस ग़ज़ल का मतला तो सब की जुबां पर रहता ही है पर जो शेर मुझे सबसे ज्यादा दिल के करीब लगता है वो ये कि ज़माने भर के ग़म या इक तेरा ग़म... ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे.. किसी की याद की कसक भी इतनी प्यारी होती है कि उस ग़म को महसूस करते हुए भी आशिक अपने और ग़म भुला देता है। हफ़ीज़ साहब ने अपनी इसी बात को अपने लिखे एक अन्य शेर में यूँ कहा है

अब उनके ग़म से यूँ महरूम ना हो जाएँ कभी
वो जानते हैं कि इस ग़म से दिल बहलते हैं

चलिए ज़रा होशियारपुरी साहब की इस पूरी ग़ज़ल को पढ़ा जाए। जिन अशआर को मेहदी हसन ने गाया है उन्हें मैंने चिन्हित कर दिया है Bold करके।

मोहब्बत करने वाले कम न होंगे
तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे

मैं अक्सर सोचता हूँ फूल कब तक
शरीक-ए-गिर्या-ए-शबनम न होंगे


मैं जानता हूँ तुम हो ही ऐसी कि तुम्हें चाहने वालों की कभी कमी नहीं रहेगी। हाँ पर देखना कि चाहनेवालों की उस महफिल में तुम्हें मेरी कमी हमेशा महसूस होगी। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि सुबह की ओस पूरे पौधे पर गिरे पर उसके रुदन की पीड़ा फूल तक ना पहुँचे?

ज़रा देर-आश्ना चश्म-ए-करम है
सितम ही इश्क़ में पैहम न होंगे

ठीक है जनाब कि उन्होंने मेरी ओर थोड़ी देर से ही अपनी नज़र-ए-इनायत की। मैं क्यूँ मानूँ कि आगे भी वे मुझ पे ऐसे ही सितम ढाते रहेंगे?

दिलों की उलझने बढ़ती रहेंगी
अगर कुछ मशवरे बाहम न होंगे

ज़माने भर के ग़म या इक तेरा ग़म
ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे


अगर हमारी बातचीत में यूँ ही खलल पड़ता रहे तो दिल की उलझनें तो बढ़ती ही रहेंगी। लेकिन ये भी है कि इन उलझनों से मन में उठती  बेचैनी और दर्द अगर रहा तो इस ग़म की मिठास से बाकी के ग़म तो यूँ ही दफा हो जाएँगे।

कहूँ बेदर्द क्यूँ अहल-ए-जहाँ को
वो मेरे हाल से महरम न होंगे

हमारे दिल में सैल-ए-गिर्या होगा
अगर बा-दीद-ए-पुरनम न होंगे

इस दुनिया को क्यूँ बेदर्द कहूँ मैं? सच तो ये है कि उन्हें मेरे दिल का हाल क्या मालूम ? मैंने कभी अपनी आँखों में सबके सामने नमी आने नहीं दी भले ही दिल में दर्द का सैलाब क्यूँ न बह रहा हो।

अगर तू इत्तेफ़ाक़न मिल भी जाए
तेरी फ़ुर्कत के सदमें कम न होंगे

'हफ़ीज़ ' उनसे मैं जितना बदगुमां हूँ
वो मुझसे इस क़दर बरहम न होंगे

अब तो अगर कहीं मुलाकात हो भी जाए तो जो सदमा तेरी जुदाई में सहा है वो नहीं कम होने वाला। पता नहीं मुझे अब भी क्यूँ ऐसा लगता है कि जितना मैं उन पर अविश्वास करता रहा, शक़ की निगाह से देखता रहा उतनी नाराज़गी उनके मन में मेरे प्रति ना हो।


तो आइए सुनें इस खूबसूरत ग़ज़ल को मेहदी हसन की आवाज़ में..



पिछले महीने एक शाम मेरे नाम की ये महफिल चौदह साल पुरानी हो गई। इस ग़ज़ल से उलट आपसे यही उम्मीद रहेगी कि  आपकी इस ब्लॉग के प्रति मोहब्बत भी बरक़रार रहे और इस महफिल में सालों साल आप हमारे साथ शिरकत करते रहें।

Saturday, March 14, 2020

कोई धुन हो मैं तेरे गीत ही गाए जाऊँ Koyi Dhun Ho.. Runa Laila

रूना लैला एक ऐसी गायिका हैं कि जिनकी आवाज़ की तलब मुझे हमेशा कुछ कुछ अंतराल पर लगती रहती है। आज की पीढ़ी से जब भी मैं उनके गाए गीतों के बारे में पूछता हूँ तो ज्यादातर की जुबां पर दमादम मस्त कलंदर का ही नाम होता है। जहाँ तक मेरा सवाल है मुझे तो उनकी आवाज़ में हमेशा घरौंदा का उनका कालजयी गीत तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है ही ज़हन में रहता है।

वैसे क्या आपको पता है कि रूना जी ने बचपन में कला के जिस रूप का दामन थामा था वो संगीत नहीं बल्कि नृत्य था। संगीत तो उनकी बड़ी बहन दीना लैला सीखती थीं। पर उनकी देखा देखी उन्होंने भी शास्त्रीय संगीत में अपना गला आज़माना शुरु कर दिया। दीना को एक संगीत समारोह में गाना था पर उनका गला खराब हो गया और रूना ने उस बारह साल की छोटी उम्र में बहन की जगह कमान सँभाली। उनकी गायिकी इतनी सराही गयी कि उन्होंने संगीत सीखने पर गंभीरता से ध्यान देना शुरु किया। चौदह साल की उम्र में उन्होंने पहली बार पाकिस्तानी फिल्म में गाना गाया।


उबैद्दुलाह अलीम व  रूना लैला
साठ के दशक के अंतिम कुछ सालों से लेकर 1974 तक उन्होंने पाकिस्तानी फिल्मों और टीवी के लिए काम किया। फिल्मों के इतर रूना जी ने अपनी गायिकी के आरंभिक दौर में फ़ैज़ और उबैदुल्लाह अलीम की कुछ नायाब ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी थी। रंजिश ही सही के आलावा उनकी गाई कुछ ग़ज़लों को मैंने पहले भी सुनवाया है। फ़ैज़ का लिखा हुआ आए कुछ अब्र कुछ शराब आए.., सैफुद्दीन सैफ़ का गरचे सौ बार ग़म ए हिज्र से जां गुज़री है... उबैदुल्लाह अलीम की बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स उनकी गायी मेरी कुछ प्रिय ग़ज़लों में एक है।  

अलीम साहब कमाल के शायर थे। वे भोपाल में जन्मे और फिर सियालकोट व कराची में पले बढ़े। उन्होंने रेडियो और टीवी जगत की विभिन्न संस्थाओं में साठ और सत्तर के दशक में अपना योगदान दिया। कुछ दिनों तो बसो मेरी आँखों में, अजीज इतना ही रखो कि जी सँभल जाए, कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी जैसी नायाब ग़ज़लों को लिखने वाले इस शायर और उनसे जुड़ी बातों को यहाँ बाँटा था मैंने। आज मैं आपको इन्हीं अलीम साहब की लिखी एक ग़ज़ल सुनवाने जा रहा हूँ जो उनके ग़ज़ल संग्रह के नाम से बने एलबम चाँद चेहरा सितारा आँखें का भी बाद में  हिस्सा बनी। रूना जी ने इसके शुरु के चार अशआर गाए हैं वो बेहद ही दिलकश हैं।


कोई धुन हो मैं तेरे गीत ही गाए जाऊँ
दर्द सीने मे उठे शोर मचाए जाऊँ

ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम
और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ

तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में
ख़ुद को लिक्खूँ तेरी तस्वीर बनाए जाऊँ

जिसको मिलना नहीं फिर उससे मोहब्बत कैसी
सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ

पीटीवी के इस श्वेत श्याम वीडियो में रूना जी ने इस ग़ज़ल को करीब 20-22 की उम्र में गाया होगा। इसके कुछ सालों बाद वो बांग्लादेश चली गयीं। यही वो समय था जब उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए भी गाने रिकार्ड किए। फिलहाल सुनिए इस ग़ज,ल को उनकी आवाज़ में..



इस ग़ज़ल के कुछ अशआर और भी थे तो मैंने सोचा कि क्यूँ ना आपको ये पूरी ग़ज़ल इसे लिखनेवाले शायर की आवाज़ में भी सुना दूँ।


अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है
ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ

यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे
हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ

जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे
कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ

शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ
धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ

अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे
बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ



रूना जी पिछले दिसंबर में गुलाबी गेंद से खेले गए भारत बांग्लादेश टेस्ट मैच में अतिथि के रूप में कोलकाता आई थीं। बतौर संगीतकार उन्होंने पिछले दिसंबर में ही एक एलबम रिलीज़ किया है जिसका नाम है Legends Forever । इस एलबम के सारे गीत बांग्ला में हैं पर अन्य नामी कलाकारों के साथ उन्होंने इस एलबम  में हरिहरण और आशा जी की आवाज़ का इस्तेमाल किया है। 

जब उनसे इस भारत यात्रा के दौरान पूछा गया कि पुराने और अभी के संगीत में क्या फर्क आया है तो उन्होंने कहा कि 
पहले हम एक गीत गाने के पहले वादकों के साथ रियाज़ करते थे। एक गलती हुई तो सब कुछ शुरु से करना पड़ता था। रिकार्डिंग के पहले भी घंटों और कई बार दिनों तक रियाज़ चलता था और इसका असर ये होता था कि गीत की आत्मा मन में बस जाती थी। आज तो हालत ये है कि आप स्टूडियो जाते हैं, वहीं गाना सुनते हैं और रिकार्ड कर लेते हैं। टेक्नॉलजी ने सब कुछ पहले से आसान बना दिया है और हमें थोड़ा आलसी।
रूना जी के इस कथन से शायद ही आज कोई संगीतप्रेमी असहमत होगा। वे  इसी तरह संगीत के क्षेत्र में आने वाले सालों में भी सक्रियता बनाए रखेंगी ऐसी उम्मीद है।

Wednesday, February 12, 2020

वार्षिक संगीतमाला : एक शाम मेरे नाम के संगीत सितारे 2019

वार्षिक संगीतमाला की ये समापन कड़ी है 2019 के संगीत सितारों के नाम। पिछले साल रिलीज़ हुई फिल्मों के  बेहतरीन गीतों से तो मैंने आपका परिचय पिछले दो महीनों में तो कराया ही पर गीत लिखने से लेकर संगीत रचने तक और गाने से लेकर बजाने तक हर विधा में किस किस ने उल्लेखनीय काम किया यही चिन्हित करने का प्रयास है मेरी ये पोस्ट। तो आइए मिलते हैं एक शाम मेरे नाम के इन संगीत सितारों से।



साल के बेहतरीन गीत
पुराने गीतों पर रिमिक्स बनाने का चलन कोई नया नहीं है पर पिछले साल तो हद ही हो गयी। कुछ ऐसे एलबम आए जिनमें उनके आलावा कुछ था नहीं। इतने प्रतिभाशाली संगीतकारों के रहते हुए भी लोग मेहनत से बच कर इस तरह के शार्ट कट इख्तियार करने लगें तो ये सचमुच चिंता का विषय है। अगर संगीतमाला के आधे गीत महज चार पाँच एलबम में सिमट जाएँ तो सोचिए कि जो हर साल सौ से अधिक फिल्में बनती हैं उनमें कैसा संगीत परोसा गया होगा?

आइटम नंबर की तरह रैप सांग को हर एलबम बनाने की प्रवृति भी इस साल नज़र आई।  गली ब्वॉय ने रैप गीतों से कुछ सार्थक संदेश देने में एक अच्छी पहल की। मल्टी कंपोसर एलबमों की संख्या में और वृद्धि हुई। वहीं इस प्रवृति ने एक संगीत उद्योग में म्यूजिक सुपरवाइसर का एक नए पद ही ईजाद कर दिया जिसका काम अलग अलग संगीतकारों से फिल्म की कहानी के हिसाब से गाने बनवाना है। कुछ बेहद कम बजट की गुमनाम फिल्मों में भी ऐसे गीत निकल कर आए जो बेहद मधुर थे। कई नए युवा संगीतकारों, गायक और गीतकारों ने मिलकर सुरीले रंग बिखेरे। जैसे मैंने पिछली पोस्ट में बताया था मेरे लिए इस साल का सरताज गीत तेरी मिट्टी रहा। वार्षिक संगीतमाला में शामिल सारे गीतों की सूची एक बार फिर ये रही।



साल का सर्वश्रेष्ठ गीत :  तेरी मिट्टी, केसरी (अर्को प्रावो मुखर्जी, मनोज मुंतशिर, बी प्राक)

03. रुआँ रुआँ, रौशन हुआ Ruan Ruan
04. तेरा साथ हो   Tera Saath Ho
05. मर्द  मराठा Mard Maratha
06. मैं रहूँ या ना रहूँ भारत ये रहना चाहिए  Bharat 
07. आज जागे रहना, ये रात सोने को है  Aaj Jage Rahna
08. तेरा ना करता ज़िक्र.. तेरी ना होती फ़िक्र  Zikra
09. दिल रोई जाए, रोई जाए, रोई जाए  Dil Royi Jaye
10. कहते थे लोग जो, क़ाबिल नहीं है तू..देंगे वही सलामियाँ  Shaabaashiyaan
11 . छोटी छोटी गल दा बुरा न मनाया कर Choti Choti Gal
12. ओ राजा जी, नैना चुगलखोर राजा जी  Rajaji
13. मंज़र है ये नया Manzar Hai Ye Naya 
14. ओ रे चंदा बेईमान . बेईमान..बेईमान O Re Chanda
15. मिर्ज़ा वे. सुन जा रे...वो जो कहना है कब से मुझे Mirza Ve
16. ऐरा गैरा नत्थू खैरा  Aira Gaira
17. ये आईना है या तू है Ye aaina
18. घर मोरे परदेसिया  Ghar More Pardesiya
19. बेईमानी  से.. 
20. तू इतना ज़रूरी कैसे हुआ? Kaise Hua
21. तेरा बन जाऊँगा Tera Ban Jaunga
22. ये जो हो रहा है Ye Jo Ho Raha Hai
23. चलूँ मैं वहाँ, जहाँ तू चला Jahaan Tu chala 
24.रूह का रिश्ता ये जुड़ गया... Rooh Ka Rishta 

साल के बेहतरीन एलबम

अगर पूरे एलबम के लिहाज़ से देखा जाए तो कुछ छोटे बजट की फिल्मों ने भी अच्छा संगीत दिया जैसे कि गॉन केश, मोतीचूर चकनाचूर और घोस्ट। देशप्रेम के जज़्बे को उभारते केसरी और URI का भी संगीत काफी सराहा गया पर खिताबी जंग का मुकाबला इस बार त्रिकोणीय था। कलंक, मणिकर्णिका और कबीर सिंह के लगभग सभी गाने खासे लोकप्रिय हुए। जहाँ कबीर सिंह युवाओं की आवाज़ बना वही कलंक और मणिकर्णिका जैसी पीरियड फिल्मों ने पुरानी मेलोडी की यादें ताज़ा कर दीं। पर साल का सबसे बेहतरीन एलबम रहा कलंक जिसने
मणिकर्णिका से थोड़े अंतर से बाजी मारी ।

  • मणिकर्णिका : शंकर एहसान लॉय
  • कलंक  : प्रीतम
  • Uri: The Surgical Strike  : शाश्वत सचदेव
  • कबीर सिंह : कई संगीतकार
  • गॉन केश : कई संगीतकार

साल का सर्वश्रेष्ठ एलबम      :  कलंक, प्रीतम  

साल के कुछ खूबसूरत बोलों से सजे सँवरे गीत
इस साल कुछ नए और कुछ पुराने गीतकारों के बेहद अर्थपूर्ण गीत सुनने को मिले। नए लिखने वालों में अभिरुचि चंद  ने मंज़र है ये नया में मन में जोश भरने के साथ अपने प्रतीकों से गुलज़ार साहब की याद दिला दी वहीं अभिषेक मजाल अपने रूमानी गीत बेईमानी से में नए खूबसूरत बिंब भरते नज़र आए। प्रसून जोशी और जावेद अख्तर ने देशप्रेम के जज़्बे को कविता सरीखे शब्दों से नवाज़ा तो मनोज तेरी मिट्टी में सैनिक के दिल की आवाज़ बन कर उभरे। सीमा सैनी की बेइमान चंदा से नोक झोंक बड़ी प्यारी रही, वहीं रुआँ रुआँ में वरुण ग्रोवर ने अपने गहरे शब्दों से दिल जीता। अमिताभ ने कलंक के शीर्षक गीत इश्क़ का जोग विजोग फिर उभारा तो इरशाद कामिल ने आईना में रूमानियत से भरी बेहद दिलकश पंक्तियाँ रचीं। इतने सारे प्यारे गीतों में किसी एक को चुनना मेरे लिए बड़ा कठिन रहा और अंत में मैंने प्रसून जोशी की काव्यात्मकता और मनोज के दिल छूते भावों के आधार पर इन दोनों को ही संयुक्त रूप से साल के बेहतरीन लिखे गीतों में जगह दी है।

  • अमिताभ भट्टाचार्य :      कलंक नहीं, इश्क़ है काजल पिया ….  
  • प्रसून जोशी           :      मैं रहूँ या ना रहूँ भारत ये रहना चाहिए...  
  • प्रसून जोशी           :      बोलो कब प्रतिकार करोगे 
  • वरुण ग्रोवर,          :      रुआँ रुआँ, रौशन हुआ... 
  • सीमा सैनी             :     ओ रे चंदा बेईमान ...
  • इरशाद कामिल     :      ये आईना है या तू है...
  • मनोज मुंतशिर       :      तेरी मिट्टी 
  • अभिषेक मजाल     :      बेईमानी से
  • अभिरुचि चंद         :      मंज़र है ये नया
  • जावेद अख्तर         :      मर्द मराठा

साल के सर्वश्रेष्ठ बोल : तेरी मिट्टी.. मनोज मुंतशिर /मैं रहूँ या ना रहूँ ...प्रसून जोशी

साल के गीतों की कुछ बेहद जानदार पंक्तियाँ 

जब आप पूरा गीत सुनते हैं तो कुछ पंक्तियाँ कई दिनों तक आपके होठों पर रहती हैं और उन्हें गुनगुनाते वक़्त आप एक अलग खुशी महसूस करते हैं। पिछले  साल के गीतों  की वो  बेहतरीन पंक्तियों जिनके शब्दों के साथ मेरे दिल की मँगनी हुई वे कुछ यूँ हैं 😃

  • तू झील खामोशियों की... लफ़्ज़ों की मैं तो लहर हूँ..एहसास की तू है दुनिया..छोटा सा मैं एक शहर हूँ
  • जिस्म से तेरे मिलने दे मुझे, बेचैन ज़िन्दगी इस प्यार में थी...उँगलियों से तुझपे लिखने दे ज़रा, शायरी मेरी इंतज़ार में थी
  • रुआँ रुआँ, रौशन हुआ...धुआँ धुआँ, जो तन हुआ...हाँ नूर को, ऐसे चखा..मीठा कुआँ, ये मन हुआ
  • काँधे पे सूरज, टिका के चला तू..हाथों में भर के चला बिजलियाँ..तूफां भी सोचे, ज़िद तेरी कैसी..ऐसा जुनून है किसी में कहाँ
  • मेरी नस नस तार कर दो और बना दो एक सितार..राग भारत मुझपे छेड़ो झनझनाओ बार बार
  • तरसे जिसको मोरे नैन चंदा, तू दिखे उसे सारी रैन चंदा..मैं जल जाऊँ तुझसे ओ चंदा, हाय लगाऊँ तुझपे ओ चंदा
  • दुनिया की नज़रों में ये रोग है..हो जिनको वो जाने, ये जोग है...इकतरफा शायद हो दिल का भरम...दोतरफा है, तो ये संजोग है
  • ओ माई मेरे क्या फिकर तुझे, क्यूँ आँख से दरिया बहता है, तू कहती थी तेरा चाँद हूँ मैं, और चाँद हमेशा रहता है
  • अग्नि वृद्ध होती जाती है, यौवन निर्झर छूट रहा है...प्रत्यंचा भर्रायी सी है, धनुष तुम्हारा टूट रहा है..कब तुम सच स्वीकार करोगे, बोलो, बोलो कब प्रतिकार करोगे?
  • सोच की दीवारों पे. तारीख लिख के चला है..साँसों की मीनारों पे, ख़्वाहिश रख के चला है..रह गया है गर्दिशों में..ये सवाल कैसा..इक मलाल है ऐसा
  • अग्नि हो कर मँगनी हो गई पानी से..

साल के बेहतरीन गायक
गायिकी की बात करूँ तो ये साल पुराने के साथ नए उभरते गायकों का भी रहा। शांतनु सुदामे द्वारा  मंज़र है ये नया का  जोशीला गायन ध्यान खींचने में सफल रहा। पापोन की नमकीन आवाज़ तेरा साथ है को एक अलग ही स्तर पर ले गयी। सोनू निगम मिर्जा वे और शर्त में अपनी उसी पुरानी लय में दिखे। वही अरिजीत सिंह ने हमेशा की तरह कलंक के शीर्षक गीत के उतार चढ़ाव को बखूबी निभाया। अरमान मलिक की आवाज़ की मुलायमियत तेरा जिक्र में मन को सहलाने वाली थी। पर ये साल पंजाबी गायिकों के लिए खास तौर से अच्छा रहा। सूफी गायिकी के लिए मशहूर करण ग्रेवाल ने चिट्ठिये का दर्द अपनी आवाज़ में उतार लिया तो वहीं अर्जुन हरजाई बड़ी मासूमियत से छोटी छोटी गल में मान जाने की वकालत करते रहे पर जिस आवाज़ ने गीत की पहली पंक्ति से रोंगटे खड़े कर दिए वो थी बी प्राक की आवाज़ जिन्होंने पंजाबी फिल्मों से पहली बार इस साल बालीवुड का रुख किया है। उनके गाये इस गीत के लिए अक्षर कुमार को भी कहना पड़ा कि ये उनके कैरियर के सबसे शानदार गाए गीतों में से एक है।



  • अरिजीत सिंह        :  कलंक नहीं, इश्क़ है काजल पिया …
  • पापोन                   :  तेरा साथ है 
  • कँवर ग्रेवाल          :  चिट्ठिये 
  • शांतनु सुदामे         : मंज़र है ये नया 
  • बी प्राक                 : तेरी मिट्टी 
  • अर्जुन हरजाई        : छोटी छोटी गल 
  • सोनू निगम            :  मिर्जा वे
  • अरमान मलिक      :  तेरा ना करता जिक्र

साल के सर्वश्रेष्ठ गायक          :  बी प्राक, तेरी मिट्टी

साल की बेहतरीन गायिका
पिछले साल की अपेक्षा इस साल गायिकाओं को भी कई एकल गीत गाने का मौका मिला। कविता सेठ की आवाज़ बहुत सालों के बाद इस साल नुस्खा तराना में गूँजी। ज्योतिका टांगरी ने इस साल कई गीत गाए पर घोस्ट के लिए उनका गाया गीत काफी मधुर रहा। नई गायिकाओं में जिन आवाज़ों ने सबसे अधिक प्रभावित किया वो थीं आज जागे रहना में हिमानी कपूर और राजा जी में प्रतिभा सिंह बघेल। आशा है आने वाले सालों में इनके और गीत सुनने को मिलेंगे। बेहतरीन गायिका के लिए जीत का सेहरा लगातार दूसरे साल श्रेया घोषाल की झोली में गया । घर मोरे परदेशिया के शास्त्रीय आलाप हों या या ओ रे चंदा की मीठी चुहल वो दोनों ही गीतों में अपनी बेहतरीन गायिकी का सिक्का जमा गयीं।



  • हिमानी कपूर     : आज जागे रहना, ये रात सोने को है.
  • श्रेया घोषाल       : ओ रे चंदा बेईमान  
  • प्रतिभा बघेल     : ओ  राजा जी 
  • श्रेया घोषाल       : घर मोरे परदेसिया
  • कविता सेठ       : नुस्खा तराना
  • ज्योतिका टांगरी : ये जो हो रहा है

साल की सर्वश्रेष्ठ गायिका     :  श्रेया घोषाल (घर मोरे परदेसिया, ओ रे चंदा बेईमान)   

गीत में प्रयुक्त हुए संगीत के कुछ बेहतरीन टुकड़े

संगीत जिस रूप में हमारे सामने आता है उसमें संगीतकार संगीत संचालक और निर्माता की  बड़ी भूमिका रहती है पर संगीतकार की धुन हमारे कानों तक पहुँचाने का काम हुनरमंद वादक करते हैं जिनके बारे में हम शायद ही जान पाते हैं। वैसे आजकल गीतों में लाईव आर्केस्ट्रा का इस्तेमाल बेहद कम होता जा रहा है। ज्यादातर अंतरों के बीच प्री मिक्सड टुकड़े बजा दिए जाते हैं। फिर भी इस साल कलंक, केसरी, मणिकर्णिका, पानीपत जैसी फिल्मों के गीतों में लाइव रिकार्ड किए हुए भांति भांति के वाद्य गूँजे। विशाल भारद्वाज ने रुआँ रुआँ में गिटार को गीत के शब्दों के साथ बड़े करीने से समायोजित किया। संगीत संचालकों में आदित्य देव के काम ने बार बार ध्यान खींचा। कुछ गीतों में स्वीडन और थाइलैंड के विदेशी वादक समूहों का भी प्रयोग हुआ। कानों को मधुर लगने वाली  धुनों की चर्चा तो नीचे है पर सबसे ज्यादा दिल खुश हुआ विपिन पटवा के  तेरा साथ है के लिए किए गए संगीत संयोजन ने । घड़े, सितार और शहनाई के साथ तार वाद्यों की स्वरलहरी गीत के खत्म होने के बाद भी ज़हन में बजती रही।


  • रूआँ रूआँ : गिटार अंकुर मुखर्जी, विशाल भारद्वाज
  • तेरा साथ है गीत के अंत में तार वाद्यों पर आधारित धुन : विपिन पटवा
  • तेरी मिट्टी अंत में तार वाद्यों पर आधारित धुन प्रकाश वर्मा, आदित्य देव, अर्को प्रावो मुखर्जी
  • ऐरा गैरा प्रील्यूड/इंटरल्यूड : बुलबुल तरंग राशिद खाँ, मेंडोलिन, तापस राय. सितार सलमान खाँ, प्रीतम  
  • तेरा ना करता जिक्र प्रील्यूड : गिटार - केबा जरमिया,  असद खाँ
  • मिर्जा वे सिग्नेचर ट्यून : जीत गाँगुली
  • रुह का रिश्ता,इंटरल्यूड : आदित्य देव, सोनल प्रधान
  • जहाँ तू चला मिडनाइट मिक्स इंटरल्यूड : जसलीन रॉयल, अक्षय राहेजा

संगीत की सबसे कर्णप्रिय मधुर तान  : तेरा साथ है, विपिन पटवा 

संगीतमाला के समापन मैं अपने सारे पाठकों का धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्होंने समय समय पर अपने दिल के उद्गारों से मुझे आगाह किया। आपकी टिप्पणियाँ इस बात की गवाह थीं कि आप सब का हिंदी फिल्म संगीत से कितना लगाव है। इस साल गीतमाला शुरु होने के पहले मैंने आप सबसे अपनी पसंद के गीतों का चुनाव करने को कहा था और साथ में ये बात भी कही थी कि जिन लोगों की पसंद सबसे ज्यादा इस गीतमाला के गीतों से मिलेगी उन्हें एक छोटा सा तोहफा दिया जाएगा मेरे यात्रा ब्लॉग मुसाफ़िर हूँ यारों की तरफ से। इस बार की प्रतियोगिता के सभी विजेताओं बठिंडा से अरविंद मिश्र, पटना से मनीष, लखनऊ से कंचन सिंह चौहान और कोयम्बटूर से स्मिता जयचंद्रन को मेरी तरफ से ढेर सारी बधाई।



एक बार फिर आप सभी का दिल से शुक्रिया इस सफ़र में साथ बने रहने के लिए। 
 

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