Thursday, January 17, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान 11 : तू ही अहम, तू ही वहम Tu Hi Aham

वार्षिक संगीतमाला की 21 वीं सीढ़ी पर एक कव्वाली थी तो 11वीं पायदान पर है एक भजन फिल्म सुई धागा का जिसे संगीतबद्ध किया है अनु मलिक ने, बोल हैं वरुण ग्रोवर के और आवाज़ रोंकिनी गुप्ता की।

किसी देखी हुई फिल्म का एलबम सुनते वक़्त अचानक से कोई गीत अच्छा लगता है और फिर हम सोचते हैं कि अरे ये फिल्म में कहाँ था? कई बार कुछ गीत फिल्मों में संपादन के दौरान ही हट जाते हैं या उनकी कुछ हिस्सा ही फिल्म में शूट होता है। सुई धागा के इस सुरीले भजन को तो मैं फिल्म में देख नहीं पाया पर हो सकता है मेरे ध्यान से रह गया हो या सिर्फ इसकी कुछ पंक्तियाँ इस्तेमाल हुई हों। इस गीत का प्रमोशन भी फिल्म के बाकी गीतों की तरह नहीं किया गया। इसलिए मुझे यकीन है कि आपमें से ज्यादातर लोगों के लिए ये मीठा सा भजन अनसुना होगा। 


इस गीत की चर्चा शुरु करते हैं गीतकार वरुण ग्रोवर से। तीन साल पहले अनु मलिक के साथ मिलकर उन्होंने मोह मोह के धागे लिखकर श्रोताओं को अपने मोह जाल में फाँस लिया था। उसी साल मसान में दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल से प्रेरित उनका गीत तू किसी रेल सी गुजरती है मुझे बेहद पसंद आया था। वरुण ग्रोवर का नाम मैं जब भी किसी फिल्म की क्रेडिट में देखता हूँ तो मन पहले से ही खुश हो जाता है कि चलो अब कुछ सार्थक गहरे बोलों से मुलाकात होने वाली है।

तू ही अहम के मुखड़े को ही को ही देख लीजिए। इस भजन के पीछे की सोच किसी ऐसे  इंसान की है जिसके मन में भगवान के होने के प्रति पहले कुछ शंका (वहम) थी पर उसका आभास होने से वो एक गौरव, एक शक्ति (अहम) में बदल गयी है। अब उस शक्ति से जुड़ाव हो गया है तो ये भरोसा हो चला है कि आगे का मार्ग भी वही दिखलाएगा। मुझे शब्दों के लिहाज से इस गीत का दूसरे अंतरा सबसे प्रिय है जिसमें वरुण माया मोह में पड़े इंसान की मनोवृतियों को वे खूबसूरत बिंबों से सामने रखते नज़र आते हैं।

अनु मालिक व  वरुण ग्रोवर 
कुछ साल के अज्ञातवास के बाद जबसे अनु मलिक ने दम लगा कर हइसा के संगीत से वापसी की है तबसे उनके गीतों में मेलोडी लौट आई है। पिछले साल की फिल्मों में सुई धागा के साथ साथ जे पी दत्ता की फिल्म पलटन में भी उनका काम सराहनीय था। अगर तू ही अहम की बात करूँ तो  प्रील्यूड व पहले इंटरल्यूड में  गिटार की तरंगों के बीच उभरता रोंकिनी का आलाप, बोलों के पीछे बार बार उभरती बाँसुरी मन को सुकून से भर देती है। दूसरे इंटरल्यूड में बाँसुरी की मोहक तान का तो कहना ही क्या! 

इन सब के आलावा अनु मलिक की तारीफ़ इसलिए भी करनी होगी कि उन्होंने इस शास्त्रीयता के रंग में डूबे इस गीत के लिए एक ऐसी गायिका को चुना जो इस तरह के गीत के साथ पूरी तरह न्याय कर सकती थीं। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ रोंकिनी गुप्ता की जिनके तुम्हारी सुलू के गीत रफ़ू ने पिछले साल इस गीतमाला का सरताज बनने का गौरव प्राप्त किया था।

रोंकिनी गुप्ता 
जो लोग बतौर गायिका रोंकिनी के सांगीतिक सफ़र से परिचित नहीं हैं वो उनके बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं। तुम्हारी सुलु का गीत गाते वक़्त सहायक निर्देशक मनन ने  (जो सुई धागा में भी सहायक निर्देशन का काम कर रहे थे) रोकिनी का नाम फिल्म के निर्देशक शरत कटारिया को सुझाया। अनु मलिक चाहते थे कि उनके संगीतबद्ध गीतों को कोई संगीत सीखी हुई तैयार गायिका मिले जिसकी आवाज़ का स्वाद कुछ अलग सा हो। रोंकिनी इन मापदंडों में बिल्कुल खरी उतरीं।  शास्त्रीय गायिकी पर उनकी पकड़ तो सर्वविदित है इसलिए उनके गीतों में संगीतकार कोई ना कोई आलाप डाल ही देते हैं। नतीजा ये  कि आप इस आलाप के साथ ही गीत से बँधने लगते हैं। इस गीत में जब वो परबत तोड़ धरम का ... या मुक्ति जो ये चाहे... गाती हैं तो उनकी आवाज़ का उतार चढ़ाव देखते ही बनता है। इस साल गायिकाओं के गाए बेहतरीन एकल गीतों में इस गीत का नाम भी मन में स्वाभाविक रूप से उठता है।

तो आइए सुनते हैं ये भजन उनकी आवाज़ में। 

तू ही अहम, तू ही वहम
तू ही अहम, तू ही वहम
तुझसे जुड़ा  वास्ता
हम हैं पाखी भटके हुए, तू साँझ का रास्ता
घाट तू ही पानी तू ही प्यास है
तू ही चुप्पी तू अरदास है, तू ही अहम, तू ही वहम

हमको तू ना माने, हम मानेंगे तुझको
घोर अंधेरे में भी पहचानेंगे तुझको
परबत तोड़ धरम का हम पायेंगे तुझको
तू रंग भी बेरंग भी
तू रंग भी बेरंग भी
शंका तू ही आस्था
हम हैं पाखी भटके हुए, तू साँझ का रास्ता
घाट तू ही.. तू अरदास है, तू ही अहम, तू ही वहम

तन ये भोग का आदी, मन ये कीट पतंगा
झूठ के दीवे नाचे, झूठा बने ये मलंगा
मुक्ति जो ये चाहे, तो मारे मोह अड़ंगा
तू ही सदा से दूर था
तू ही सदा से दूर था
तू ही सदा पास था
हम हैं पाखी भटके हुए, तू साँझ का रास्ता
घाट तू ही.. तू अरदास है
तू ही अहम.... तू ही वहम


वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 

Wednesday, January 16, 2019

वार्षिक संगीतमााला 2018 पायदान # 12 : पहली बार है जी, पहली बार है जी.. Pehli Baar

दो हफ्तों के इस सफ़र में आधी दूरी पार कर के अब बारी साल के बारह ऐसे गीतों की जो मुझे बेहद पसंद रहे हैं। इन बारह गीतों में एक तिहाई शायद ऐसे भी गीत होंगे जिन्हें इस साल बेहद कम सुना गया है। कौन हैं वो गीत उसके लिए तो आपको हुजूर साथ साथ चलना होगा इस संगीतमाला के। आज एक बार फिर मैं हूँ अजय अतुल के इस गीत के साथ जिससे जुड़ी चर्चा दो सीढ़ियों पहले यानि धड़क के शीर्षक गीत के बारे में बात करते हुए मैंने की थी। बड़ा प्यारा गीत है ये। अजय अतुल ने ये गीत सबसे पहले अपनी फिल्म सैराट के लिए संगीतबद्ध किया था और फिर उसे धड़क के लिए हिंदी बोलों के साथ फिर से बनाया गया। ये गीत मिसाल है किस तरह पश्चिमी वाद्य यंत्रों से निकली सिम्फनी को हिंदुस्तानी वाद्यों के साथ मिलाकर खूबसूरत माहौल रचा जा सकता है।


अजय अतुल के आर्केस्टा में वॉयलिन बड़ी प्रमुखता से बजता है। साथ में कई बार पियानो भी होता है। छोटे शहरों से आगे निकल कर बढ़े इन भाइयों को पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से कैसे लगाव हुआ इसकी भी अलग एक कहानी है। 1989 में इन्होंने इलयराजा की संगीतबद्ध फिल्म अप्पू राजा देखी। फिल्म में इस्तेमाल हुए संगीत से वे बहुत प्रभावित हुए । इलयराजा के संगीत को सुनते सुनते ही उनमें पश्चिमी शास्त्रीय संगीत के प्रति उत्सुकता जगी। मोत्सार्ट, बीथोवन और बॉक की सिम्फनी ने उन्हें बेहद आकर्षित किया। फिर हॉलीवुड के संगीतज्ञों जॉन विलियम्स और ज़िमर की धुनों को भी उन्होंने काफी सुना। यही वज़ह कि सलिल चौधरी के अंदाज़ में उनके गीतों में पश्चिमी सिम्फनी आर्केस्ट्रा की स्वरलहरियाँ बार बार उभरती हैं।

सैराट या बाद में धड़क में पश्चिमी संगीत का ऐसा माहौल रचने के पीछे अजय अतुल के मन में एक और वजह भी थी। वो ये कि उन्होंने अक्सर गौर किया था कि वॉयलिन और गिटार से सजी धुने उच्च वर्ग की प्रेम गीतों और कहानियों तक सीमित रह जाती हैं जिसमें हीरो लंबी कारों को ड्राइव करता है और आलीशान कॉलेजों में पढ़ता है। सैराट के चरित्र ज़मीन से जुड़े थे, मामूली लोगों की बातें करते थे पर उन्होंने सोचा कि उनका प्रेम पर्दे पर बड़ा दिखना चाहिए। संगीत में नाटकीयता झलकनी चाहिए और उसका स्वरूप अंतरराष्ट्रीय होना चाहिए। इस सोच का नतीजा ये हुआ कि अजत अतुल ने इस गीत की शुरुआत वायलिन के एक कोरस से की जो प्रील्यूड के  आख़िर में बाँसुरी की मधुर धुन से जा मिलता है।

अजय अतुल 
हर अंतरे के शुरु की पंक्तियाँ के दौरान पीछे वाद्य बेहद धीमे बजते हैं और फिर जैसे जैसे गीत की लय तेज होती है संगीत भी मुखर हो उठता है और दूसरे अंतरे के शुरुआत के साथ वापस अपनी पुरानी लय में चला जाता है।  पहला इंटरल्यूड अपनी प्रकृति में पूरी तरह यूरोपीय है तो दूसरे में ताल वाद्यों के साथ बाँसुरी की वही मधुर धुन फिर प्रकट होती है। 

गीत के बोलों में गीतकार अमिताभ भट्टाचार्य ने शुरुआती प्रेम के लक्षणों को इतनी सहजता से पकड़ा है कि कहीं उन्हें सुनते हुए आप मुस्कुरा उठते हैं तो कभी उन यादों में डूब जाते हैं जब ऐसा ही कुछ आपके या आपके दोस्तों के साथ घटित हुआ था। अजय ने मराठी फिल्म  में भी इस गीत को अपनी आवाज़ दी है और यहाँ भी उसे दोहराने का लोभ छोड़ नहीं सके हैं। उनकी गायिकी मुझे पसंद है पर यही गीत अरिजीत गाते तो शायद इस गीत का प्रभाव थोड़ा और बढ़ जाता...

पहली बार है जी, पहली बार है जी
इस कदर किसी की, धुन सवार है जी
जिसकी आस में, हुई सुबह से दोपहर
शाम को उसी का इंतज़ार है जी
होश है ज़रा, ज़रा-ज़रा खुमार है जी
छेड़ के गया, वो ऐसे दिल के तार है जी
पहली बार है जी ... इंतज़ार है जी

हड़बड़ी में हर घड़ी है, धड़कनें हुई बावरी
सारा दिन, उसे ढूँढते रहे, नैनो की लगी नौकरी
दिख गयी तो है उसी में, आज की कमाई मेरी
मुस्कुरा भी दे, तो मुझे लगे, जीत ली कोई लॉटरी.
दिल की हरकतें. मेरी समझ के पार है जी
हे.. इश्क है इसे, या मौसमी बुखार है जी.
पहली बार है जी..पहली बार है जी...हम्म.

सारी सारी रात जागूँ, रेडियो पे गाने सुनूँ
छत पे लेट के, गिन चुका हूँ जो
रोज वो सितारे गिनूँ
क्यूँ न जानूँ दोस्तों की, दोस्ती में दिल ना लगे
सबसे वास्ता तोड़ ताड़ के, चाहता हूँ तेरा बनूँ
अपने फैसले पे मुझको ऐतबार है जी
ओ हो. तू भी बोल दे कि तेरा क्या विचार है जी.
हम्म हम्म.ला रे ला रा रा.


वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 13 : सरफिरी सी बात है तेरी Sarphiri

वार्षिक संगीतमाला का जो अगला गीत है वो एक बार फिर आ रहा है लैला मजनूँ से। फर्क इतना है कि इस बार जोय बरुआ की जगह संगीत का दारोमदार है नीलाद्रि कुमार पर। हिंदी फिल्म संगीत में अलग अलग काल खंडों में हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के कलाकारों को जगह मिलती रही है। सितार और ज़िटार वादक नीलाद्रि कुमार इस कड़ी में एक और नया नाम हैं। नीलाद्रि ने चार वर्ष की उम्र से ही अपने पिता से सितार सीखना शुरु किया। सितार में देश विदेश में अपनी कला प्रदर्शन कर चुकने के बाद उन्होंने जिटार यानि इलेक्ट्रिक सितार को ईजाद किया। उनके वाद्य वादन से जुड़े एलबम के बाद हर साल आते रहे। बीच बीच में फिल्मी गीतों में भी उनकी धुनें बजती रहीं। हालांकि हिंदी फिल्मों में बतौर संगीतकार उनका पहला गीत फिल्म शोरगुल में तेरे बिना जी ना लगे था जो 2016 में रिलीज़ हुई थी। 


इस साल लैला मजनूँ एलबम के दस गीतों में चार उनके हिस्से में आए और इतनी खूबसूरत रचनाएँ दीं उन्होंने इस फिल्म के लिए कि  ये एलबम इस साल के सर्वश्रेष्ठ एलबम होने का प्रबल दावेदार बन गया है। लैला मजनूँ के गीतों में एक अजीब किस्म की मेलोडी है जिसका असर गीतों को सुनते सुनते और बढ़ता चला जाता है। अब सरफिरी को ही लूँ तो गीत का प्रील्यूड सुनते ही चित्त शांत होने लगता है। गीत के इंटरल्यूड में सरोद और गिटार और गीत के उतार चढ़ाव के साथ ताल वाद्यों का प्रयोग नीलाद्रि बड़ी खूबी से करते हैं। 

प्रेम में पड़ने के दौरान हमारा मन मैं कैसी उथल पुथल होती है इसकी एक झलक ये गीत दिखलाता है। दरअसल इस फिल्म में ऐसे दो गीत हैं एक "तुम " जो कि मजनूँ के मानसिक हालातों को चित्रित करता है तो दूसरी ओर "सरफिरी " जिसमें लैला अपने दिल की बात कह रही है।

इश्क़ में तर्क काम नहीं करते, दिल हमेशा दिमाग पर हावी रहता है। अपने आप पर नियंत्रण खोने लगता है। अब देखिए यहाँ लड़का सरफिरा है बेतुकी बातें करता है फिर भी लैला का दिल उस की ओर खिंचा चला जा रहा है। दिमाग हिदायतें दे रहा है कि सँभल जा अभी भी वक़्त है और दिल है कि उस हिदायत को अनुसुना कर अपने प्रेमी को अपनाने के लिए आतुर है। इरशाद कामिल बड़ी खूबी से इन भावनाओं को शब्द देते हुए कहते हैं सरफिरी सी, बात है तेरी, आएगी ना, ये समझ मेरी.. है ये फिर भी डर मुझको मैं ना कह दूँ, हाँ तुझको। अंतरे में कितना प्यारा है उनका ये अंदाज़ जब वो कहते हैं तेरी बातें, सोचती हूँ मैं, तेरी सोचें, ओढ़ती हूँ मैं, मुझे ख़ुद में, उलझा कर...किया घर में, ही बेघर भई वाह इरशाद कामिल साहब! आपकी लेखनी यूँ ही अपना कमाल दिखलाती रहे।




इस मुश्किल से गीत को गाया है श्रेया घोषाल और बाबुल सुप्रियो ने। हिंदी फिल्म संगीत के इस दौर में एक बात जो देखने को मिल रही है वो ये दौर बेहतरीन गायकों के लिए भी इतना आसान नहीं है। इंटरनेट के इस दौर में अपनी आवाज़ को आम जनता या फिर फिल्म उद्योग तक पहुँचाना पहले से ज्यादा आसान हुआ है। इस सहूलियत ने लेकिन गायकों और गायिकाओं की एक फौज खड़ी कर दी है और संगीतकारों को एक गीत गवाने कि लिए दर्जनों विकल्प है। एक एक गाने को कई लोगों से गवाया जा रहा है। इतनी कठिन प्रतिस्पर्धा की वजह से नए गायक मुफ्त में भी गाने का तैयार है अगर उनका नाम एक अच्छे बैनर से जुड़ जाए। ऐसी हालत में  सोनू निगम और श्रेया घोषाल जैसे गायकों को भी जितना काम उनके हुनर के हिसाब से मिलना चाहिए वो नहीं मिल रहा है। आने वाला दौर उन संगीतकारों का होगा जो गायक का भी काम करेंगे और ऐसा मैं लगभग हर दूसरी फिल्म में देख भी रहा हूँ। 

अब श्रेया को ही देखिए पिछले साल कर हर मैदान फतह, धड़क के शीर्षक गीत और पल एक पल जैसे गीतों में उन्हें मात्र दो तीन पंक्तियाँ गाने को मिली। उनकी आवाज़ का अगर ढंग से इस्तेमाल हुआ तो वो पद्मावत के गीत घूमर और लैला मजनूँ के इस गीत सरफिरी में। जहाँ तक मेरा मत है सरफिरी उनका पिछले साल का गाया सबसे बेहतरीन गीत है। इस गीत के उतार चढ़ावों को अपनी सधी आवाज़ से जिस तरह वो निभाती हैं वो काबिलेतारीफ है। बाबुल सुप्रियो भी बहुत दिनों बाद फिल्मों में वापस लौटे हैं। आशा है उनको हम आगे भी लगातार सुन पाएँगे। तो आइए सुनें इस गीत को..

सरफिरी सी, बात है तेरी
आएगी ना, ये समझ मेरी
है ये फिर भी डर मुझको 
मैं ना कह दूँ, हाँ तुझको
सरफिरी सी, बात…

भूली मैं, बीती...ऐसे हूँ, जीती
आँखों से, मैं तेरी...ख़्वाबों को, पीती हुई
सरफिरी सी, बात है मेरी
आएगी ना, ये समझ तेरी

चलो बातों में बातें घोलें, 
आओ थोड़ा सा खुद को खोलें
जो ना थे हम, जो होंगे नहीं
आजा दोनों, वो हो लें

तेरी बातें, सोचती हूँ मैं
तेरी सोचें, ओढ़ती हूँ मैं
मुझे ख़ुद में, उलझा कर
किया घर में, ही बेघर
सरफिरी सी बात है मेरी
सरफिरी सी बात है तेरी 



वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक

Sunday, January 13, 2019

वार्षिक संगीतमााला 2018 पायदान # 14 : तेरे नाम की कोई धड़क है ना Dhadak Hai Na

वार्षिक संगीतमाला की इन सीढ़ियों पर अगला गीत फिल्म धड़क से जिसे शायद ही पिछले साल आपने रेडियो या टीवी पर ना सुना हो। मराठी फिल्म सैराट के हिंदी रीमेक धड़क पर वैसे ही सिनेप्रेमियों की नज़रे टिकी हुई थीं। करण जौहर अपने द्वारा निर्मित फिल्मों के प्रचार प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ते और यहाँ तो दो नए चेहरों का कैरियर दाँव पर लगा था जिसमें एक चेहरा मशहूर अभिनेत्री श्रीदेवी की पुत्री जाह्न्वी का था। निर्माता निर्देशक ने संगीत की जिम्मेदारी अजय अतुल की जोड़ी पर सौंपी थी जिन्होंने इसके पहले मूल मराठी फिल्म सैराट का भी संगीत दिया था। इंटरनेट के इस ज़माने में सैराट गैर हिंदी हलकों में भी इतनी देख ली गयी थी कि उसके गीतों की धुन से बहुत लोग वाकिफ़ थे। अजय अतुल पर दबाव था कि इस फिल्म के लिए कुछ ऐसा नया रचें जिससे धड़क फिल्म के संगीत को सैराट से एक पृथक पहचान मिले।

जिन्होंने अजय अतुल के संगीत का पिछले एक दशक में अनुसरण नहीं किया है उनको बता दूँ कि वे मराठी फिल्मों में एक जाना माना नाम रहे हैं। मेरा उनके संगीत से पहला परिचय 2011 में सिंघम के सुरीले गीत बदमाश दिल तो ठग है बड़ा से हुआ। फिर 2012 में अग्निपथ में सोनू निगम के गाए गीत अभी मुझ में कहीं, बाकी थोड़ी सी है ज़िंदगी से उन्होंने खास वाह वाहियाँ बटोरीं। फिर तीन साल बाद 2015 में सोनू निगम ने उनके लिए उनके भावपूर्ण गीत सपना जहाँ दस्तक ना दे से फिर उन्होंने मेरी संगीतमाला में दस्तक दी़। एक बार फिर तीन साल के अंतर पर वो पिछले साल धड़क, जीरो और ठग्स आफ हिंदुस्तान जैसी फिल्मों में कहीं थोड़ा कम कहीं थोड़ा ज्यादा कमाल दिखाते नज़र आए। रोमांस पर उनकी पकड़ गहरी रही ही है, साथ ही चिकनी चमेली, सुरैयाझिंगाट जैसे डांस नबरों से वो लोगों को झुमाने की काबिलियत रखते हैं।


महाराष्ट्र के पुणे, जुन्नार व शिरूर जैसे शहरों में पले बढ़े अजय और अतुल गोगावले जिस परिवार से आते हैं उसका संगीत से कोई लेना देना नहीं था। गोगावले बंधुओं की कठिन आर्थिक परिस्थितियों का मैंने पहले भी जिक्र किया है पर उनकी कथा इतनी प्रेरणादायक है कि उसे बार बार दोहराने की जरूरत है। छात्र जीवन में उनके पास कैसेट खरीदने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। जहाँ से जो संगीत सुनने को मिलता उसके लिए वे अपने कान खुले रखते वे अक्सर ऐसे लोगों को अपना मित्र बनाते जिनके पास पहले से कोई वाद्य यंत्र हो ताकि उनसे माँग कर उसे बजाना सीख सकें। स्कूम में अजय गोगावले गाया करते तो अतुल हारमोनियम सँभालते। फिर उन्होंने पुणे में ही टीवी सीरियल और जिंगल के लिए संगीत देने का काम करना शुरु किया। तब निर्माताओं के यहाँ वो साइकिल पर हारमोनियम चढ़ा कर जाया करते थे। कभी कभी तो उन्हें अपनी धुनों को वाद्य यंत्र के अभाव में मुँह से सुनानी पड़ती थी।  उनके संगीत प्रेम को देखते हुए पिता ने उधार के पैसों से उन्हें कीबोर्ड ला कर दिया।
अजय और अतुल गोगावले

उनके संगीत में मराठी लोक संगीत और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है। छोटे शहरों से आगे निकल कर बढे इन भाइयों को पश्चिमी शास्त्रीय संगीत से कैसे लगाव हुआ उसकी चर्चा संगीतमाला में आगे करेंगे। अजय अतुल ने सैराट बनाते समय जिन धुनों पर मेहनत की थी उन्हीं में से एक पर उन्होंने दोबारा काम करना शुरु किया जो कि धड़क के शीर्षक गीत के रूप में इस शक़्ल में सामने आया। 

अग्निपथ की सफलता के बाद से अजय अतुल ने अपने गीत लिखवाने के लिए अमिताभ भट्टाचार्य का दामन नहीं छोड़ा है और अमिताभ हर बार उनके इस विश्वास पर खरे उतरे हैं। देखिए कितना खूबसूरत मुखड़ा लिखा उन्होंने इस गीत के लिए 

मरहमी सा चाँद है तू, दिलजला सा मैं अँधेरा
एक दूजे के लिए हैं, नींद मेरी ख्वाब तेरा
तू घटा है फुहार की, मैं घड़ी इंतज़ार की
अपना मिलना लिखा इसी बरस है ना..
जो मेरी मंजिलों को जाती है
तेरे नाम की कोई सड़क है ना
जो मेरे दिल को दिल बनाती है
तेरे नाम की कोई धड़क है ना


जिसे गीत की हुक लाइन (या यूँ कह लीजिए कि श्रोताओं को फाँस कर रखने वाली पंक्ति) बोलते हैं वो तो कमाल ही है जो मेरी मंजिलों को जाती है तेरे नाम की कोई सड़क है ना..जो मेरे दिल को दिल बनाती है..तेरे नाम की कोई धड़क है ना। फिल्म का नाम भी आ गया और बोल भी दिल के आर पार हो गए। गीत की इतनी अच्छी शुरुवात कि गायिका श्रेया घोषाल को भी कहना पड़ा कि ये गीत कानों को वैसा ही सुकून देता है जैसे  तपती धरती को उस पर  गिरती  बारिश की पहली बूँदें देती हैं । 

जैसे ही मुखड़ा खत्म होता है वैसे ही पियानो की टुंगटुंगाहट और पीछे बजते वॉयलिन के स्वर आपको गीत की मेलोडी में बहा ले जाते हैं और उसी  के बीच श्रेया की मीठी आवाज़ आपके कानों में पड़ती है। 

कोई बांधनी जोड़ा ओढ़ के
बाबुल की गली आऊँ छोड़ के
तेरे ही लिए लाऊँगी पिया
सोलह साल के सावन जोड़ के
प्यार से थामना.. डोर बारीक है
सात जन्मों की ये पहली तारीख है

डोर का एक मैं सिरा
और तेरा है दूसरा
जुड़ सके बीच में कई तड़प है ना

जो मेरी मंजिलों को जाती है
तेरे नाम की कोई सड़क है ना
जो मेरे दिल को दिल बनाती है
तेरे नाम की कोई धड़क है ना

बीच के अंतरे मुखड़ों जैसे प्रभावी तो नहीं है पर गीत का मूड बनाए रखते हैं। गीत का समापन संगीतकार बाँसुरी की मधुर स्वरलहरी से करते हैं। अजय गोगावले की आवाज़ की बनावट में एक नयापन है। वैसे भी आजकल का चलन ही ये है कि संगीतकार अगर गायक भी हो तो अपनी धुनों को ख़ुद गाना पसंद करता है। तो आइए एक बार फिर सुनें इस गीत को।


वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 

Saturday, January 12, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 15 : तेरा यार हूँ मैं Tera Yaar Hoon Main

वार्षिक संगीतमाला में अब बढ़ रहे हैं प्रथम पन्द्रह गीतों की तरफ।  यारी दोस्ती पर हिंदी फिल्म जगत में गीत बनते रहे हैं। अगर अपनी याददाश्त पर ज़ोर डालूँ तो ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे, यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी, तेरे जैसा यार कहाँ, दोस्त दोस्त ना रहा, दीये जलते हैं, सलामत रहे दोस्ताना हमारा जैसे गीत तुरंत दिमाग में उतरते हैं। अब आप कहेंगे कि ये सारे तो बेहद पुराने गीत हैं तो नए गीतों में दिल चाहता है हम रहे ना रहें कभी यारों के बिन, अल्लाह वारियाँ ओ टूटी यारियाँ मिला दे ओए, जाने नहीं देंगे तुझे जैसे चंद जिनका ख्याल अभी आ रहा है। दोस्तों के बिना तो इस दुनिया में किसी इंसान का जी पाना दुश्वार है। जब भी कोई सुरीला नग्मा दोस्ती की बात करता है तो वो जल्द ही सबके मन में बस जाता है। इस साल इसी कड़ी में अपनी अलग पहचान बनाता हुआ जुड़ा है सोनू के टीटू की स्वीटी फिल्म का गीत तेर यार हूँ मैं।




सोनू के टीटू की स्वीटी जैसे नाम वाली फिल्मों से तो यही आशा थी कि इसके गाने मौज मस्ती वाले ही होंगे और वे थे भी वैसे ही सिवाय इस गीत के जिसका एक अलग ही मिज़ाज था। बड़ी संजीदा और मधुर धुन तैयार की रोचक कोहली ने इस गीत के लिए। इस फिल्म की कहानी तो आप जानते ही हैं कि दोस्त की मंगेतर के तौर तरीके नायक के पसंद नहीं आते। दोस्त बेचारा मित्र और मंगेतर के बीच इसी असमंजस में है कि चुने तो किसको चुने? दोनों ही उसे प्रिय हैं। 

इस गीत में गीतकार कुमार ( जिनका पूरा नाम राकेश कुमार है।) को शब्दों के माध्यम से उन मंज़रों का खाका खींचना था जो दो मित्रों के बीच बचपन से दोस्ती की गाँठ को मजबूत करते आए थे। मनोज की तरह कुमार अपनी भाषा को सहज रखते हुए श्रोताओं के दिल तक पहुँचने की कोशिश करते हैं। कुमार ने बचपन की शरारतों, खिलौने के लिए मार पीट, छोटी मोटी कहा सुनी जैसी बातों का जिक्र कर ये काम बखूबी किया। अरिजीत की आवाज़ का दर्द रोचक की मायूस करती धुन में घुलता जाता है। 


तू जो रूठा तो कौन हँसेगा
तू जो छूटा तो कौन रहेगा
तू चुप है तो ये डर लगता है
अपना मुझको अब कौन कहेगा
तू ही वजह.
तेरे बिना बेवजह बेकार हूँ मैं
तेरा यार हूँ मैं, तेरा यार हूँ मैं

आजा लड़ें फिर खिलौनों के लिए
तू जीते मैं हार जाऊँ
आजा करें फिर वही शरारतें
तू भागे मैं मार खाऊँ

मीठी सी वो गाली तेरी
सुनने को तैयार हूँ मैं
तेरा यार हूँ मैं, हम्म. तेरा यार हूँ मैं

ओ जाते नहीं कहीं रिश्ते पुराने
किसी नए के आ जाने से
जाता हूँ मैं तो मुझे तू जाने दे
क्यूँ परेशां है मेरे जाने से

टूटा है तो जुड़ा है क्यूँ
मेरी तरफ तू मुड़ा है क्यूँ
हक नहीं तू ये कहे की
यार अब हम ना रहे
एक तेरी यारी का ही

सातों जनम हक़दार हूँ मैं, तेरा यार हूँ मैं

गीत के प्रील्यूड में ताल वाद्यों और गिटार का जो सामंजस्य उन्होंने रचा है वो कानों को सोहता है। रोचक कोहली के लिए ये साल बेहद सफल साबित हुआ है। इस साल की संगीतमाला में अब तक आप उन्हें देखते देखते और ले डूबा में सुन चुके हैं। इन गीतों में एक गौर करने वाली बात ये है कि अपनी संगीतबद्ध रचनाओं में वो ज्यादा वाद्य यंत्रों का प्रयोग नहीं करते और उनकी धुनें सहज पर सुरीली होती हैं जो तेजी से कानों से दिल तक जगह बना लेती हैं। इस संगीतमाला में उनका गीतकार कुमार के साथ एक गीत और है। उस गीत की बारी आने पर इन दो कलाकारों के बारे में और बातें होंगी। तो आइए सुने अरिजीत सिंह की आवाज़ में ये गीत।


वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 

Friday, January 11, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान 16 : मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ Saansein

इस साल की संगीतमाला ने मुझे कई नयी प्रतिभाओं से मिलने का मौका दिया। इनमें कुछ गीतकार, कुछ संगीतकार और कुछ गायक थे और कुछ तीनों ही एक साथ थे। वैसे ये अचरज करने की बात नहीं है  क्यूँकि अगर आप पश्चिमी संगीत को थोड़ा बहुत सुनते हैं तो वहाँ  गीत फिल्मों की बजाय एक  बैंड  के तहत लोगों तक पहुँचते हैं  जिसमें  तीन चार या उससे कम कलाकार होते हैं । एक स्थिति ये भी होती है कि आप खुद ही गीत लिखते हैं, उसे संगीतबद्ध करते हैं और फिर स्टेज या स्टूडियो में उसे गा भी देते हैं।

हिंदी फिल्म संगीत में भी ऐसे कलाकारों का आगमन हो रहा है जो इस तरह के संगीत को सुन कर पले बढ़े हैं। आज जिस शख़्स से आपको मिलवाने जा रहा हूँ वो गीत लिखने और गिटार बजाने में तो माहिर हैं ही साथ ही अपनी विशिष्ट शैली में उसे गा भी लेते हैं। मैं बात कर रहा हूँ प्रतीक कुहाड़ की जिनका कारवाँ फिल्म का गीत आज इस पायदान पर बज रहा है।


प्रतीक का संगीत के प्रति झुकाव शुरु से था ऐसा कहना मुश्किल है। हाई स्कूल में पहली बार उन्होंने गिटार सीखने की कोशिश की पर असफल हुए। फिर पढ़ने के लिए वो जयपुर से न्यूयार्क चले गए। वहाँ सबसे पहले वे इलियट स्मिथ के संगीत से खासा प्रभावित हुए। फिर बॉब डिलन को काफी सुना। इन गायकों ने उनमें गिटार बजाने की इच्छा फिर से जागृत कर दी। न्यूयार्क शहर के परिवेश ने एक ओर तो खुले ढंग से सोचने की आजादी दी तो दूसरी ओर वो वहाँ वे जो भी कर रहे थे उस पर कोई टीका टिप्पणी करने वाला नहीं था। वो उस विशाल महानगर में रहने वाले एक छोटे से कलाकार थे जो अपनी राहें खुद बना रहा था। 

स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वो भारत लौटे। यहाँ उन्होंने अपने कुछ गाने रिकार्ड किए और फिर अपना एलबम In Tokens and Charms रिलीज़ किया। इस एलबम के लिए विश्व भर में प्रशंसा बटोरीं।  उन्हें MTV Europe संगीत सम्मान और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गीत लिखने की प्रतियोगिता में पहला स्थान मिला। इन इनामों के बदौलत उन्हें विश्व में कई जगह अपने गीतों को सुनाने का मौका मिला।

प्रतीक कुहाड़ 
हिंदी फिल्मों में प्रतीक कुहाड़ का प्रवेश एक गीतकार के रूप में फिल्म बार बार देखो के गीत खो गए हम कहाँ से हुआ और इस साल उन्होंने कारवाँ के दो गीतों में गायिकी, संगीत देने और गाने की तिहरी भूमिका निभाई। मैंने इस गाने के आलावा हिंदी में रिकार्ड किए उनके अन्य गीतों को भी सुना और पाया कि उनकी रचनाओं उनके शब्दों के इर्द गिर्द घूमती है। वो मूलतः एक गीतकार ही हैं। अपने शब्दों पे ही वे धुन रचते हैं जिनमें एक सहज सी मधुरता प्रवाहित होती है। उनकी गायिकी किसी सधे गायक की नहीं है पर उसका कच्चापन ही उनका यूएसपी है जो युवाओं को भाता रहा है।

कारवाँ के इस गीत को दो भागों में बाँट सकते हैं। गीत का पहला हिस्सा किरदार की उस मनोदशा को बताता है जहाँ किरदार की ज़िदगी बस यूँ ही कट रही है। उसकी कोई दिशा नहीं है। प्रतीक इस मनोदशा को चित्रित करने के लिए जख्मी ज़मीं, उलझी ख्वाहिशों. ठहरी नज़रें और रुकी घड़ियों का सहारा लेते हैं। हालांकि इन बिंबों के साथ उन्होंने हँसती पलकों और सँभलती बातों का प्रयोग क्यूँ किया ये मेरी समझ से परे है। 

साँसें मेरी अब बेफिकर हैं, दिल में बसे कैसे ये पल हैं
बातें सँभल जा रही हैं, पलकों में यूँ ही हँसी है
मन में छुपी कैसी ये धुन है, हर ख्वाहिशें उलझी किधर हैं
पैरों से ज़ख्मी ज़मीं है, नज़रें भी ठहरी हुई हैं
है रुकी हर घड़ी, हम हैं चले राहें यही


गीत का अगला हिस्सा निराशा के अंधकार के बीत जाने और आशा की नई किरण दिखने की बात करता है। प्रतीक की काव्यत्मकता यहाँ प्रभावित करती है। वो कहते हैं कि पहले मंजिलें उन परछाइयों की तरह थीं जो दिन बीतते ही साथ छोड़ देती हैं लेकिन अब रातों ने भी उन्हें गले लगा लिया है, शामें उनका आलिंगन कर रही हैं। मेरा अन्तरमन ही मुझे हौसले दे रहा है मेहनत करने का, मदहोशी के आलम से यथार्थ की ज़मीं पर कदम रखने का। उनके कानों में खिलते गीत है और कदमों में आग है लक्ष्य तक पहुँचने की,

ये मंज़िलें हमसे खफ़ा थी, इन परछाइयों सी बेवफ़ा थी
बाहों में अब खोई हैं रातें, हाथों में खुली हैं ये शामें
ये सुबह है नयी, हम हैं चले...

मैं अपने ही मन का हौसला हूँ, है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ
मैं पीली सहर का नशा हूँ, मैं मदहोश था, अब मैं यहाँ हूँ

साँसें मेरी अब बेफिकर हैं, दिल में बसे कैसे ये पल हैं
नग्मे खिले हैं अब सारे, पैरों तले हैं मशालें
थम गयी है ज़मीं, हम हैं चले...

प्रतीक कुहाड़ का गीत आज इस गीतमाला में है तो उसमें उनके बोलों के साथ सहज बहते हुए संगीत का भी हाथ है। गीत पियानों की मधुर धुन से शुरु होता है। पहले इंटरल्यूड में गिटार की धुन झूमने पर विवश करती है और जब तक वो गीत की पंक्ति  मैं अपने ही मन का हौसला हूँ... तक पहुँचते है सुनने वाले के मन में उर्जा का संचार होने लगता है। मेरे ख्याल से ऐसा होना निराशा से आशा की ओर ले जाने वाले इस गीत की सार्थकता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को। 



इस गीत के साथ मेरी मस्ती का एक मूड यहाँ भी 😃😃

वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 

Wednesday, January 09, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 17 बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा Bahut Dukha Man

वार्षिक संगीतमाला का अगला गीत जरा हट के है। कई बार हम सब संगीतप्रेमियों की शिकायत होती है कि आजकल का नया संगीत तेज शोर वाले डांस नंबर या एक जैसे लगने वाले रूमानी गीतों से भरा पड़ा है। साल भर के सौ से ज्यादा फिल्मों के संगीत को सुनते हुए ये शिकायत गलत नहीं लगती लेकिन ये भी जानना जरूरी है कि ऐसा आखिर क्यूँ है? अच्छे और अलग पहचान बनाने वालों गीतों के लिए ठोस पटकथाओं का होना आवश्यक है जो संगीतकारों और गीतकारों को कहानी और उसके परिवेश के हिसाब से नई नई चुनौतियाँ पेश कर सकें पर होता ये है कि ज्यादातर एलबमों में रोमांटिक, रैप, आइटम नंबर मसाले की तरह मिलाए जाते हैं। नतीजा है कि ऍसे एलबमों का ज़ायका कुछ दिनों तक होठों पर रहकर ऐसा उड़ता है कि फिर दोबारा नहीं लौटता। हालांकि कुछ निर्माता निर्देशक आज भी ऐसे हैं जो लीक से हटकर चलते हैं। संगीत उनकी फिल्मों के लिए फिलर नहीं बल्कि कहानी का हिस्सा होता है। अनुराग कश्यप ऐसे ही एक निर्माता हैं जिनकी फिल्म का संगीत कहानी को आगे बढ़ाता है। यही वजह है कि हिचकी की तरह ही मुक्केबाज इस साल के एलबमों में नयी हवा के झोंके की तरह उभरा है।

ये भी एक सुखद संयोग है कि हिचकी और दास देव के आजाद कर की तरह ही मुक्केबाज का संगीत एक नवोदित महिला संगीतकार ने रचा है। ये संगीतकार हैं रचिता अरोड़ा जो जसलीन व अनुपमा राग की तरह ही एक गायिका भी हैं। फर्क ये है कि जहाँ जसलीन खुद से संगीत सीख कर आगे बढ़ी हैं वहीं अनुपमा व रचिता ने बकायदा शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रखी है। दिल्ली में पली बढ़ी रचिता ने संगीत निर्देशन का काम वहाँ मंचित होने वाले नाटकों में संगीत देकर शुरु किया। मुंबई में पृथ्वी थियेटर में एक नाटक की रिहर्सल के दौरान उनकी मुलाकात मकरंद देशपांडे से हुई। उनका काम देखकर मकरंद ने उन्हें अनुराग कश्यप से मिलने को कहा। रचिता अनुराग से बतौर गायिका मिलने गयी थीं पर वहाँ से लौटीं फिल्म के लिए संगीतकार का काम ले के। अनुराग ने सबसे पहले सुनील जोगी की डेढ़ दशक पुरानी कविता मुश्किल है अपना मेल प्रिये रचिता से संगीतबद्ध करवाई। हास्य का पुट लिए इस गीत के आलावा मुक्केबाज में लोक संगीत का तड़का भी है और सत्ता के खिलाफ स्वर देता गीत भी। 

जब मैं इस संगीतमाला के लिए गीतों का चयन कर रहा था तो सबसे पहले मेरा ध्यान इस फिल्म के गीत छिपकली पर अटका। दोहरे चरित्र वाले लोगों पर ऐसी व्यंग्यात्मक धार वाले गीत हाल फिलहाल में कम ही बने हैं। वैसे इस फिल्म का सबसे मधुर गीत मुझे बहुत दुखा मन लगा जिसे  खुद रचिता ने आदित्य देव के साथ मिलकर गाया है। 

छिपकली और बहुत दुखा मन दोनों गीतों को ही लिखा है हुसैन हैदरी ने। चार्टेड एकाउटेंट और फिर मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाले हैदरी को कविता का शौक़ कॉलेज के दिनों से ही था। अपनी पढ़ाई पूरी कर के वो कोलकाता की एक कंपनी का वित्त विभाग सँभाल रहे थे। उन्हें ऐसा लगा कि  कविता कहने और पढ़ने का शौक़ तो मुंबई जा कर ही पूरा हो सकता हैं क्यूँकि वहाँ खुले मंच पर तब तक कविताएँ पढ़ने का चलन शुरु हो गया था। साथ ही वो फिल्मी गीतों के लेखन में भी हाथ आज़माना चाहते थे। हैदरी को लगा कि गर मन में इच्छा है तो जोखिम अभी ही लेना पड़ेगा। 2015  में उन्होंने नौकरी छोड़ दी ये सोच कर कि अगर पाँच सालों में मुंबई में पैर जम गया तो ठीक नहीं तो वे वापस लौट आएँगे। इसी बीच उनकी कविता "हिंदुस्तानी मुसलमान" इंटरनेट पर काफी सराही गयी। गुड़गाँव और करीब करीब सिंगल के कुछ गीतों को लिखने के बाद उन्हें मुक्केबाज में मौका मिला और इस फिल्म में लिखे उनके तीनों गीतों को काफी सराहा गया है।

रचिता अरोड़ा व हुसैन हैदरी
साँझ का घोर अँधेरा मोहे
रात की याद दिलावे
रात जो सिर पर आवे लागे
लाख बरस कट जावे

आस का दरपन कजलाया रे
लागे मोहे झूठा
बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन
हाथ तोरा जब छूटा

चिट्ठी जाए ना ऊ देस
जो देस गए मोरे सजना
हवा के पर में बाँध के भेजे
हम सन्देस का गहना

बिरहा ने पतझड़ बन के
पत्ता-पत्ता लूटा
बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन
हाथ तोरा जब छूटा

धूप पड़ी जो बदन पे मोरे
अगन-सी ताप लगावे
छाँव में थम के पानी पिए तो
पानी में जहर मिलावे

तन की पीड़ तो मिट गई मोरी
मन का बैर न टूटा
बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन
हाथ तोरा जब छूटा

मोरे हाथ में तोरे हाथ की
छुवन पड़ी थी बिखरी
बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन
हाथ तोरा जब छूटा

बहुद दुखा मन एक विरह गीत है जो कि राग पूरिया धनश्री पर आधारित है। ये सांयकालीन राग अक्सर उदासी के रंगो को स्वरलहरी देने के लिए इस्तेमाल होता रहा है। रचिता अरोड़ा ने इसीलिए शायद इस विरह गीत में इस राग का प्रयोग किया है। हुसैन हैदरी ने विरह की पीड़ा को जिन शब्दों में चित्रित किया है वो एक कविता सरीखा ही लगता है। आस का दरपन कजलाया रे..लागे मोहे झूठा, बिरहा ने पतझड़ बन के...पत्ता-पत्ता लूटा, मोरे हाथ में तोरे हाथ की...छुवन पड़ी थी बिखरी जैसे सटीक काव्यांश दिल की टीस को और गहरा कर देते हैं। हुसैन हैदरी के इन कमाल के शब्दों को रचिता की मीठी आवाज़ सहलाती हुई निकल जाती है। आदित्य देव ने भी अपनी पंक्तियाँ बखूबी निभाई हैं। रचिता की धुन ऐसी नहीं है कि एक ही बार में आपका ध्यान खींचे। ये गीत धीरे धीरे मन में घर बनाने वाला गीत है। इसलिए जब भी इसे सुनें फुर्सत से सुनें..

 


वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 

Tuesday, January 08, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 18 : खोल दे ना मुझे, आजाद कर Azaad Kar

संगीतमाला का अगला गीत है फिल्म दास देव से। वैसे दास देव कुछ अजीब सा नाम नहीं लगा आपको? अगर लगा तो इसे अब पलट कर देखिए। आपको  देव दास नज़र आएगा। सुधीर जी की ये फिल्म इस ज़माने के देवदास और पारो का एक नया रूप खींचती है। फिल्म का जो गीत आज आपके सामने है वो पहले दरअसल फिल्म में था ही नहीं। लेखक और गीतकार गौरव सोलंकी की एक बड़ी भूमिका रही इस गीत को फिल्म में लाने की। 


वैसे जो लोग गौरव सोलंकी से परिचित नहीं हैं वो उनके UGLY फिल्म के गीत पापा जो कि साल 2014 में एक शाम मेरे नाम का सरताज गीत बना था के बारे में अवश्य पढ़ें। रुड़की में इंजीनियरिंग की पढ़ाई से लेकर गीत, पटकथा व कहानी लेखन तक का उनका सफ़र उनकी गहरी बौद्धिक और साहित्यिक क्षमता की गवाही देता है। हाल ही में सत्याग्रह को दिये साक्षात्कार में उन्होंने दास देव के इस गीत के बनने की कहानी कुछ यूँ बयाँ की थी।

‘दास देव’ की रिलीज से पहले सुधीर जी इसे अपने दोस्तों, फिल्मों से जुड़े लोगों को दिखा रहे थे, उनका फीडबैक ले रहे थे. उनका कहना था कि मैं बहुत वक़्त से जुड़ा हूँ  इस फिल्म से तो मेरी ऑब्जेक्टिविटी चली गई है, तुम बाहरी की नजर से देखो और कुछ जोड़ना हो तो बताओ। तो हमने बैठकर उसमें कुछ चीजें जोड़ीं, कुछ घटाईं। इसी दौरान वे जब सभी से पूछ रहे थे कि तुम्हारी क्या राय है तो मैंने कहा कि अगर अंत में कोई गाना हो तो फिल्म का क्लोजर बेहतर हो जाएगा। फिल्म देखकर उस गाने का एब्सट्रेक्ट-सा थॉट मेरे दिमाग में था भी. मैंने कहा कि आपके पास पहले से जो गाने रिकॉर्डेड हैं उनमें से कोई इस्तेमाल कर लीजिए अगर सिचुएशन पर फिट हो तो, नहीं तो मैं लिखने की कोशिश करता हूँ . इस तरह ‘आजाद हूँ ’ ईजाद हुआ!
दास देव की कहानी एक ऐसे चरित्र पर केंद्रित है जो एक जाने माने सोशलिस्ट नेता  की अय्याश संतान है और जिसे विकट परिस्थितियों में राजनीति के दलदल में उतरना पड़ता है। ये गाना उस किरदार के बीते हुए जीवन के अच्छे बुरे लमहों. अपेक्षाओं, निराशाओं आदि से आजाद होकर एक नई राह पकड़ने की बात करता है । जिंदगी के ब्लैकबोर्ड से सब मिटाकर एक नए पाठ की शुरुआत जैसा कुछ करने की सोच डाली है गौरव ने इस गीत में।

स्वानंद किरकिरे 
स्वानंद किरकिरे जब भी गायिकी की कमान सँभालते हैं कुछ अद्भुत हो होता है। सुधीर मिश्रा की ही फिल्म हजारों ख्वाहिशें ऐसी में भी उनकी गहरी आवाज़ बावरा मन देखने चला एक सपना से गूँजी थी। परिणिता में उनका गाया रात हमारी तो चाँद की सहेली थी आज भी बारहा अकेलेपन में दिल के दरवाजों पर दस्तक देता रहा है। इस गीत में भी उनकी आवाज़ की गहनता नायक के दिल की कातर पुकार से एकाकार होती दिखती है।

गीत में अगर कोई कमी दिखती है तो वो इसका छोटा होना। वास्तव में ये गीत लंबा था और एक कविता की शक्ल लिए था। गीत का दूसरा अंतरा सुधीर मिश्रा ने हटवा दिया ये कहते हुए कि ज्यादा लंबा होने से गीत की सादगी चली जाएगी।

अनुपमा राग व  गौरव सोलंकी 

इस शब्द प्रधान गीत का संगीत संयोजन किया है अनुपमा राग ने। हिंदी फिल्म संगीत में संगीत संयोजन एक ऍसी विधा रही है जहाँ महिलाओं की उपस्थिति नगण्य ही रही है। पुरानी फिल्मों में उषा खन्ना और पिछले दशक में स्नेहा खनवलकर को छोड़ दें तो शायद ही किसी ने अपनी अलग पहचान बनाई हो पर पिछले साल से एक नए परिवर्तन की झलक मिलनी शुरु हो गयी है। अब महिलाएँ भी पूरे आत्मविश्वास के साथ इस विधा में कूद रही हैं और उनमें से तीन की संगीतबद्ध रचनाएँ इस वार्षिक संगीतमाला के पच्चीस बेहतरीन गीतों में अपनी जगह बनाने में सफल हुई हैं। अब तक मैंने आपकी मुलाकात हिचकी की संगीत निर्देशिका जसलीन कौर रायल से कराई थी। जहाँ तक अनुपमा राग का सवाल है ये गीत हिन्दी फिल्मों में की गयी उनकी पहली संगीत रचना है। नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों के खानदान से ताल्लुक रहने वाली अनुपमा खुद उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं। 

लखनऊ की भातखंडे विश्वविद्यालय से संगीत विराशद अनुपमा फिलहाल अपनी सरकारी नौकरी से एक विराम लेकर मुंबई की मायावी दुनिया में अपनी किस्मत आजमा रही हैं। हिंदी फिल्मों में पिछले पाँच सालों में उन्होंने गुलाबी गैंग, जिला गाजियाबाद, बिन बुलाये बाराती जैसी फिल्मों में कुछ नग्मे गाए हैं। फिल्म संगीत के इतर उनके निजी एलबम और सिंगल्स भी बीच बीच में आते रहे हैं।

अनुपमा का संगीत गीत की गंभीरता के अनुरूप है और वो शब्दों पर हावी होने की कोशिश नहीं करता। 

हम थे कहाँ, ना याद कर
फिर से मुझे ईजाद कर
खोल दे ना मुझे, आजाद कर

हर इक तबाही से, सारे उजालों से
मुझको जुलूसों की सारी मशालों से
सारी हक़ीकत से, सारे कमालों से
मुझको यकीं से तू, सारे सवालों से
आजाद कर आजाद कर

ना तुम हुकुम देना
ना मुझ से कर फरियाद
मुझ को गुनाहों से
माफी से कर आजाद
सारी हक़ीकत से, सारे कमालों से
मुझको यकीं से तू, सारे सवालों से
आजाद कर आजाद कर

तो आइए सुनते हैं इस गीत को...




वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 

Monday, January 07, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 19 : ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला O Meri Laila

लैला मजनूँ का नाम लेने से मुझे तो सबसे पहले सत्तर के दशक की फिल्म याद आ जाती है जिसके गाने कई सालों तक  भी रेडियो और दूरदर्शन के चित्रहार में धूम मचाते रहे। संगीतकार मदनमोहन ने लता और रफ़ी की आवाज़ में हुस्न हाज़िर है मोहब्बत की सजा पाने को, तेरे दर पे आया हूँ.., इस रेशमी पाजेब की झनकार के सदके, होके मायूस तेरे दर से सवाली ना गया, बर्बाद ए मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा जैसे गीतों का गुलदस्ता दिया जो हमेशा हमेशा के लिए हमारे दिलों मे नक़्श हो गया। 

मुझे  लगता है कि इम्तियाज अली ने जब अपने छोटे भाई साजिद अली के साथ 2018 में इसी नाम से  फिल्म बनाने का निश्चय किया तो उनके मन में ये विचार जरूर कौंधा होगा कि लैला मजनूँ का संगीत उसकी सांगीतिक विरासत के अनुरूप होना चाहिए। अपने दो सिपाहसलारों यानी संगीतकारों नीलाद्रि कुमार और जोय बरुआ की मदद से वो इस कार्य में कितने सफल हुए वो आप इस संगीतमाला के साथ साथ ख़ुद महसूस कर सकेंगे।


इम्तियाज अली की लैला मजनूँ कोई ऐतिहासिक प्रेम गाथा नहीं बल्कि एक सहज सी प्रेम कथा है जो कश्मीर की वादियों में फलती फूलती है। संगीतमाला में इस फिल्म का जो पहला गीत शामिल हो रहा है, एक बेहद ख़ुशमिज़ाज गीत है जो प्रेम में डूबे दो अजनबियों के उल्लासित मन की खुशी  बयाँ करता है। ये दूसरी दफा है कि असम का कोई संगीतकार इस साल की संगीतमाला में अपनी जगह बना रहा है। इससे पहले मैंने आपकी मुलाकात मुल्क की कव्वाली  पिया समाए में युवा व उभरते हुए संगीतकार अनुराग सैकिया से कराई थी। अनुराग सैकिया और जोय बरुआ दोनों ही पश्चिमी शास्त्रीय और पॉप संगीत से प्रभावित रहे हैं और उनकी ज्यादातर रचनाएँ इसी कोटि की रही हैं। ये उनकी बहुमुखी प्रतिभा का ही कमाल है कि अनुराग ने जहाँ मुल्क में कव्वाली संगीतबद्ध की वहीं जोय ने लैला मजनूँ के लिए कश्मीरी लोक संगीत और पश्चिमी वाद्यों को मिलाते हुए कई धुनें तैयार कीं।

इरशाद कामिल और जोय बरुआ
वैसे अनुराग की तरह जोय हिंदी फिल्म संगीत के लिए कोई नया नाम नहीं हैं। बतौर गायक पिछले डेढ़ दशक से लगभग दर्जन भर गीतों में अपनी आवाज़ दे चुके हैं पर उनका ज्यादातर बेहतरीन काम अंग्रेजी या असमी संगीत के लिए हुआ है। लैला मजनूँ के कुछ गीतों को संगीत देने का सुनहरा मौका उन्होंने दोनों हाथों से बेहद कुशलतापूर्वक लपका है।

मुखड़े और हर अंतरे का अंत जोय ने द्रुत गति के कोरस से किया है। रुबाब की धुन से शुरु होता ये गीत जैसे जैसे कोरस तक पहुँचकर अपनी लय पकड़ता है वैसे वैसे गीत की उर्जा सुनने वालों को वशीभूत करने में कामयाब होती है। रूबाब का स्वर मुझे बेहद पसंद है और वो गीत में हमेशा रहता है कभी अकेला तो कभी अन्य वाद्यों के साथ।  इस गीत के साथ ही इस साल पहली बार इरशाद कामिल का कोई गीत संगीतमाला में आया है और इस गुणी गीतकार के बोलों का फर्क आप पढ़ कर ही समझ सकते हैं। वो चाहे भूली अठन्नी का नोस्टालजिया हो या फिर बंद आँखें करूँ दिन को रातें करूँ ..तेरी जुल्फों को सहला के बातें करूँ की मुलायमियत, इरशाद गीत में कई बार मन गुदगुदा जाते हैं। 


पत्ता अनारों का, पत्ता चनारों का, जैसे हवाओं में
ऐसे भटकता हूँ दिन रात दिखता हूँ, मैं तेरी राहों में
मेरे गुनाहों में मेरे सवाबों में शामिल तू
भूली अठन्नी सी बचपन के कुर्ते में, से मिल तू
रखूँ छुपा के मैं सब से वो लैला
माँगूँ ज़माने से, रब से वो लैला
कब से मैं तेरा हूँ कब से तू मेरी लैला
तेरी तलब थी हाँ तेरी तलब है
तू ही तो सब थी हाँ तू ही तो सब है
कब से मैं तेरा हूँ कब से तू मेरी लैला
ओ मेरी लैला, लैला ख़्वाब तू है पहला
कब से मैं तेरा हूँ कब से तू मेरी लैला

माँगी थी दुआएँ जो उनका ही असर है हम साथ हैं
ना यहाँ दिखावा है ना यहाँ दुनयावी जज़्बात हैं
यहाँ पे भी तू हूरों से ज्यादा हसीं
यानी दोनों जहानों में तुमसा नहीं
जीत ली हैं आखिर में हम दोनों ने ये बाजियाँ..
रखूँ छुपा के मैं .... लैला
तेरी तलब थी ..... लैला.
ओ मेरी लैला...

जायका जवानी में ख़्वाबों में यार की मेहमानी में
मर्जियाँ तुम्हारी हो खुश रहूँ मैं तेरी मनमानी में
बंद आँखें करूँ दिन को रातें करूँ
तेरी जुल्फों को सहला के बातें करूँ
इश्क में उन बातों से हो मीठी सी नाराज़ियाँ
रखूँ छुपा के मैं .... लैला
तेरी तलब थी ..... लैला.
ओ मेरी लैला...


ये इस गीतमाला में आतिफ असलम का तीसरा गाना है और इस बार वो अपनी गायिकी के अलग अलग रंगों में दिखे हैं। इस गीत में उनका साथ दिया है ज्योतिका टांगरी ने। वैसे ये गीत आतिफ का ही कहलाएगा पर ज्योतिका ने अपना हिस्सा भी अच्छा ही निभाया है। तो आइए सुनते हैं लैला मजनूँ का ये नग्मा...



वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 

Sunday, January 06, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 20 : मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा Lae Dooba

वार्षिक संगीतमाला में अब दौर आ गया है प्रथम बीस गीतों का और आज इस पड़ाव पर फिल्म अय्यारी का एक ऐसा गीत है जो आपकी ये शाम रूमानी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। इस गीत को गाया है सुनिधि चौहान ने। जब श्रेया और सुनिधि अपने कैरियर के सबसे व्यस्ततम मोड़ पर थीं तो अक्सर ऐसा होता था कि श्रेया की झोली में रोमांटिक और गंभीर गीत ज्यादा आते थे और सुनिधि तेज बीट्स वाले डांस और आइटम नंबर्स में छाई रहती थीं। ऐसी छवि की वजह से उनके कैरियर में उन्हें कई अच्छी रचनाओं से हाथ धोना पड़ा। 


सुनिधि एक ऐसी गायिका हैं जो हर मूड के गीत को बखूबी निभाने की काबिलियत रखती हैं। सुनिधि ग्यारह साल की उम्र से ही हिंदी फिल्म संगीत का हिस्सा हैं। सालों बाद उन्होंने अपने होने वाले बच्चे के लिए ब्रेक लिया पर माँ बनने के बाद से फिर से काम शुरु भी कर दिया। अब बच्चे का भाग्य कहिए कि साल 2018 सुनिधि चौहान के लिए एक बेहद सफल वर्ष साबित हुआ है। उन्हें काफी अच्छे गाने मिले और उसे उन्होंने पूरी लगन से निभाया भी। यही वजह है कि इस साल उनके तीन एकल गीत इस गीतमाला का हिस्सा हैं, वो भी तब जबकि इस इंडस्ट्री में जितने एकल गीत बनते हैं उनका लगभग एक चौथाई हिस्सा ही महिला गायिकाओं के हिस्से में आता है। 
सुनिधि चौहान
सुनिधि ने अय्यारी के इस मधुर गीत को अपनी अदाएगी से और मधुर बना दिया है। जिस तरह वो गीत में बार बार लै डूबा दोहराती हैं तो दिल डूबता सा ही महसूस होता है। सुनिधि अपनी गायिकी से  ऍसा प्रभाव ला सकीं क्यूँकि रोचक कोहली और मनोज मुन्तशिर की जोड़ी ने धुन और बोलोँ काउन्हें  ऍसा गुलदान दिया जिसे उन्होंने अपनी फूल सी आवाज़ से खूबसूरत बना दिया। 

अय्यारी सेना पर आधारित फिल्म थी। छोटा सा एलबम था तीन गीतों का। इसमें सबसे ज्यादा लोकप्रियता लै  डूबा ने हासिल की। गीत की धुन इतनी सुरीली है कि रोचक कोहली को संगीत संयोजन के नाम पर गिटार के कुछ तार ही झनझनाने पड़े हैं प्रील्यूड व इंटरल्यूड में। वैसे क्या आप जानते हैं कि गिटार से इतनी अच्छी धुनें निकालने वाले रोचक कोहली  वकालत की पढ़ाई कर चुके थे  और संगीत के क्षेत्र में अपना दखल देने के पहले उन्होंने आठ साल तक रेडियो स्टेशन में नौकरी भी की थी?  मुझे लगता है कि व्यक्ति जीवन की किसी भी मोड़ पर सफलता हासिल कर सकता है बशर्ते कि वो हर समय अपने अंदर छुपे हुनर को टटोलता और माँजता रहे।

मनोज मुन्तशिर और रोचक कोहली
आखिर ले डूबा में ऐसा क्या है जो श्रोताओं को अपनी ओर खींचता है? जो लोग प्रेम में पड़े हों उन्हें अच्छी तरह पता होगा कि इसका शुरुआती दौर दिल के लिए कितनी उथल पुथल ले कर पाता है।  मनोज मुन्तशिर ने बस ऐसे ही कुछ लमहे पकड़े हैं इस गीत में जो हर किसी को इस दौर की खट्टी मीठी  याद दिलाने के लिए काफी हैं। 

तो आइए थोड़ा डूब के देखते हैं इन रूमानी भावों में मनोज, रोचक और सुनिधि के साथ..

मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा, हाँ इश्क़ तेरा लै डूबा
ऐसा क्यूँ होता है, तेरे जाने के बाद 
लगता है हाथों में, रह गए तेरे हाथ 
तू शामिल है मेरे, हँसने में रोने में 
है क्या कोई कमी, मेरे पागल होने में
मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा.... 

हर दफ़ा... वही जादू होता है, तू जो मिले 
हो.. सब संवर, जाता है, यारा अन्दर मेरे 
इक लम्हे में कितनी, यादें बन जाती हैं 
मैं इतना हँसती हूँ, आँखें भर आती हैं 
मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा.... 

फुरसतें कहाँ आँखों को है मेरी आज कल 
हो.. देखने में तुझे, सारा दिन जाए निकल 
और फिर आहिस्ता से, जब छू के तू निकले 
तेरी आँच में दिल मेरा, धीमे धीमे पिघले
मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा.... 





वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
वार्षिक संगीतमाला 2018  में अब तक
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 
 

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