गुरुवार, मार्च 19, 2026

वार्षिक संगीतमाला 2024 सरताज गीत : मैनू विदा करो ...अब विदा करो मेरे यारा

वार्षिक संगीतमाला 2024 को विदा करने का वक़्त आ गया है उस साल के सबसे शानदार गीत के साथ जिसे सुन या देख कर शायद ही किसी शख़्स की आँखें न भीगीं हों। कभी किसी ज़माने में पंजाब के मशहूर कवि शिव कुमार बटालवी ने इसी शीर्षक से एक कविता लिखी थी जिसे गीतकार इरशाद कामिल ने फिल्म अमर सिंह चमकीला में विदाई गीत का मुखड़ा बना लिया और बाकी के अंतरों में जाते हुए व्यक्ति के भावों को ऐसा पकड़ा कि वो हम सबका गीत बन गया।


ऐसा कहा जाता है कि अमर सिंह चमकीला की हत्या इसलिए की गई  क्योंकि उनके गीतों के विषय सामाजिक मान्यताओं और नैतिकता के पैमानों पर खरे नहीं उतरते थे। अतिवादियों ने इसलिए उन्हें और उनकी सह गायिका अमरजोत को इस दुनिया से चलता कर दिया। आख़िर चमकीला का अपराध क्या इतना बड़ा था कि उन्हें ऐसी सजा मिली?

मुझे ऐसा लगता है कि आख़िरी वक़्त आने पर हम सब दिल से बड़े हो जाते हैं। हमारा हृदय उदार हो जाता है। जब जीवन रहा ही नहीं तो उसमें होने वाली ज्यादतियों की शिकायत भी नहीं रह जाती। शारीरिक पीड़ा के इन क्षणों में भी अपने प्रियजनों के सुखद भविष्य की कामना होठों पर चली ही आती है। इरशाद कामिल व्यक्ति की इसी मनोस्थिति का गीत में मार्मिक चित्रण करते हैं। अरिजीत सिंह ने क्या डूब के इस गीत को गाया है जोनिता गांधी के साथ। ये भी कैसा संयोग है कि इस गीत के आने के डेढ़ साल बाद अरिजीत ने बतौर पार्श्व गायक फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया।

वैसे शुरुआत में रहमान का इरादा दिलजीत दोसांझ से इस गीत को गवाने का था जो फिल्म में अमर सिंह चमकीला की भूमिका निभा रहे थे। फिर ये ख़्याल उभरा कि कहानी में जब चमकीला मर चुका तो गाना किसी दूसरे की आवाज़ में गवाना चाहिए और फिर अरिजीत का नाम सामने आया। उनका हिस्सा रिकॉर्ड होने के बाद  लगा कि मृत्यु तो अमनजोत की भी हुई है तो उसके लिए एक महिला स्वर को भी गीत में होना चाहिए और इस तरह इस गीत का एक अंतरा जोनिता को मिला।

संसार को छोड़ने के पल के बारे में हर इंसान कभी न कभी विचार तो करता ही है। पर रहमान, इरशाद कामिल , इम्तियाज़ अली ने अरिजीत के साथ मिलकर इस विषय को गीत में ढाल कर अजर अमर बना दिया है। दशकों बाद भी इस गीत की भावनाएं अलग अलग परिपेक्ष्य में लोगों के दिल को जरूर झिझोड़ती रहेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

चलते इस गीत के इस रूप में आने का वाक़या भी आपको बताता चलूँ। इस गीत के अपने अस्तित्व में आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।

"रात के ढाई बज रहे थे। संगीतकार ए आर रहमान अपने मुंबई वाले स्टूडियो में इम्तियाज़ अली और इरशाद कामिल के साथ बैठे थे। अचानक रहमान ने कहा कि स्टूडियो की सारी लाइट बंद कर देते हैं। बत्तियां तो बुझा दी गईं पर उनके स्थान पर मोमबत्तियों और दीयों को जलाया गया। रहमान अपने पियानो पर अपने उंगलियाँ चलने लगे।  मुखड़ा तो पहले ही बन चुका था पर  बाकी अंतरों पर काम अगले दो घंटों में हुआ।"

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,अब विदा करो मेरे यारा,

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
मैंने जाना है उस पार

तुम सभी साफ सही, हूँ मटमैला मैं,
तुम सभी पाक मगर पाप का दरिया मैं,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार

झूठ भला क्यूँ बोलोगे तुम,
सब सच कहते हो,
मेरी नहीं है दुनिया जिसमें,
तुम सब रहते हो 


साथ तुम्हारे और रहूँ  मैं,
मेरा तो मन था,
सच है यहाँ पे जो भी बुरा था,
मेरे कारण था 

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार 

मेरे सर पे सारी तोहमत तुम धर देना,
मैं तो मैं हूँ रूह भी मेरी पागल कर देना,
तुम खुश रहना, सब कुछ सहना, मुझको आता है,
टूटे तारे का धरती से कैसा नाता है 

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यारा,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
मैंने जाना है उस पार 

तुम सभी साफ सही (साफ सही) हूँ मटमैला मैं,
तुम सभी पाक मगर (पाक मगर) पाप का दरिया मैं,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार...!!!


 


 

आशा है 2024 का सरताज गीत और पच्चीस गीतों की ये शृंखला आप सब को पसंद आई होगी। जिस तरह से मेरी कार्यालय की व्यस्तता बढ़ रही हैं उसका सीधा असर आपने इस संगीतमाला के लंबे खिंच जाने के तौर पर देखा होगा। मुझे पता नहीं की 2025 की संगीतमाला को आप तक इस रूप में पहुंचा पाऊंगा या नहीं पर पिछले 20-22 सालों से चल रही इस गीतमाला के जो श्रोता और पाठक रहे हैं उनका ढेर सारा आभार!

4 टिप्‍पणियां:

  1. मैनु विदा करो...सरताज गीत का एकदम सही हकदार...पूरी अल्बम में एक से बढ़कर एक गीत...बेहद संगीतमय और भावुक करने वाली फिल्म...❗🥰💓

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    1. हाँ मनीष शानदार एल्बम था इस फिल्म का । बाकी ये गीत तो मन में रच बस गया ही है।

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  2. सही बहुत मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी गीत है ये 🙏

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