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गुरुवार, जनवरी 24, 2013

वार्षिक संगीतमाला 2012 पॉयदान # 16 : कौन हैं 'मैं क्या करूँ' गाने वाले निखिल पॉल जार्ज ?

वार्षिक संगीतमाला की सोलहवीं पॉयदान पर के गीत की ख़ास बात ये है कि इसे गाया है मूलतः एक गिटार वादक ने। ये अलग बात है फिल्म रिलीज़ होने के पहले लोकप्रियता की सीढ़ियाँ चढ़ने में ये गाना अव्वल था। प्रीतम द्वारा संगीतबद्ध इस गीत को लिखा है आशीष पंडित ने जिनके बारे में इस संगीतमाला की शुरुआत में आपको यहाँ बता चुका हूँ। फिल्म बर्फी के इस गीत के गायक हैं निखिल पॉल जार्ज (Nikhil Paul George)

निखिल का पैतृक निवास केरल में है पर भारत में उनका ज्यादा समय नागपुर में बीता। अब आप सोच रहे होंगे कि निखिल आखिर नागपुर में कर क्या रहे थे? नागपुर में तो निखिल ने कंप्यूटर विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली पर साथ साथ निजी तौर पर परीक्षा देकर पश्चिमी शास्त्रीय गिटार में भी डिप्लोमा हासिल कर लिया। कंप्यूटर और गिटार दोनों में डिग्रियाँ हासिल करने के बाद एक वज़ीफे की तहत संगीत संयोजन सीखने के लिए निखिल, रॉयल कॉलेज आफ लंदन जा पहुँचे और आजकल वे वहीं रहते हैं। 

प्रीतम से परिचय में आने के बाद उन्होंने उनके कई गीतों में बतौर वादक, प्रोग्रामर, ध्वनि संयोजक का काम किया। प्रीतम के तमाम सफल गीतों टी एमो, रब्बा मैं तो. क्यूँ दूरियाँ ...आदि में वो उनकी टीम का हिस्सा रह चुके हैं। बर्फी के पार्श्व संगीत और फिल्म के गीतों के संगीत संयोजन में भी निखिल ने अपना योगदान दिया था।

एक आम से दीवाने लड़के के दिल की व्यथा को कहते इस गीत के लिए निर्देशक अनुराग बसु और संगीतकार प्रीतम को किसी होनहार गायक की नहीं बल्कि एक ऐसी आवाज़ की तलाश थी जो सिर्फ गीत की भावनाओं को अपनी आवाज़ में उतार सके। निखिल जिस बेचारगी और विवशता से मैं क्या करूँ मैं क्या करूँ... दसियों बार दोहराते है कि सुनने वाला भी सोचने लगता है कि सच इस हालत में ये लड़का अब करे तो क्या करे? :) आशीष पंडित द्वारा लिखी प्यार में डूबे दिल की ये दास्तां कोई नई नहीं है पर नया है उसे पेश करने का प्रीतम का अंदाज़ जो मन को एक बार में ही मोह लेता है। तो आइए सुनें उनका गाया ये नग्मा...


निखिल शायद ही आगे बतौर गायक हिंदी फिल्म संगीत में आपको नज़र आएँ पर प्रीतम की आगामी फिल्मों में भी वो उनकी टीम का हिस्सा बने रहेंगे।


दिल ये मेरा, बस में नहीं
पहले कभी ऐसा होता था नहीं
तू ही बता इस दिल का मैं
अब क्या करूँ
कहने पे, चलता नहीं
कुछ दिनों से, मेरी भी सुनता नहीं
तू ही बता इस दिल का मैं
उफ्फ अब मैं क्या करूँ
मैं क्या करूँ, मैं क्या करूँ,मैं क्या करूँ, मैं क्या करूँ

करता हैआवारगी
इसपे तो धुन चढ़ी, है प्यार की
ना जाने गुम है कहाँ
बातों में है पड़ा, बेकार की
उलटी ये बात है
ऐसे हालात है
गलती करे ये, मैं भरूँ
उफ़ दिल का क्या करूँ
मैं क्या करूँ...

दिल पे मेरा काबू नहीं
फितरत कभी इसकी ऐसी थी नहीं
तू ही बता...


इस गीत को अभिनीत करने में रणवीर कपूर की कलाकारी भी कमाल की थी जिसका वीडिओ आप यहाँ देख सकते हैं...


शुक्रवार, मार्च 19, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 - प्रथम पाँच- तेरा होने लगा हूँ खोने लगा हूँ..

तो चलिए वार्षिक संगीतमाला 2009 की तीसरी पॉयदान पर आज विशुद्ध बॉलीवुड रोमांटिक मेलोडी का स्वाद चखने। ये गाना पिछले साल के अंत में आया और हर जगह छा गया और आज भी इसे सुनने पर एक मीठा मीठा सा अहसास मन में तारी रहता है और आप इसे गुनगुनाने का लोभ संवरण नहीं कर सकते। तारीफ करनी होगी संगीतकार प्रीतम की जिन्होंने एक बेहतरीन धुन के साथ आलिशा चिनॉय और आतिफ असलम को इस गीत को गाने को चुना।

गीत शुरु होता है अंग्रेजी जुबान में। प्रीतम अपने गीतों में अंग्रेजी की पंक्तियाँ, हिंदी अंतरों के बीच में पहले भी डालते आए हैं। वर्ष 2006 में उन्होंने फिल्म 'प्यार के साइड एफेक्टस' के लिए एक गीत रचा था जाने क्या चाहे मन बावरा.. जिसे मैं उनकी बेहतरीन कम्पोशीसन में से एक मानता हूँ। वहाँ भी अंग्रेजी का एक अंतरा ठीक इसी तरह लगाया था उन्होंने!

मन सोचता है कि क्या इसकी जरूरत थी? शायद आज के अंग्रेजीदाँ युवा वर्ग को गीत से जोड़ना उनका मकसद रहा हो। कई जगह संगीतप्रेमियों द्वारा इसकी आलोचना भी पढ़ी। पर मेरा मत तो यही है कि ये अगर ना भी करते तो भी चलता और अगर किया भी है तो वो अंतरा इस गीत के साथ भावनात्मक तौर पर जुड़ा ही दिखता है।

खैर, आशीष पंडित के लिखे इस गीत में अपनी शहद सी आवाज़ का जादू बिखेरा है अलीशा चिनॉय ने। अलीशा की बात करने पर उन पुराने दिनों की याद करना लाज़िमी हो जाता है जब हम स्कूल की दहलीज़ पार कर कॉलेज में जाने को तैयार हो रहे थे। वो वक़्त 'मेड इन इंडिया' की लोकप्रियता के पहले का था। हिंदी पॉप जगत में उन दिनों बेबी डॉल के नाम से मशहूर अलीशा इंडियन मेडोना की छवि को बनाने में व्यस्त थीं। अपनी जेबखर्च से मैंने पहला कैसेट उन्हीं का खरीदा था पर उसके बाद उनका पॉप संगीत मुझे विशेष रास नहीं आया। पर फिल्मी गीतों में अलीशा बीच बीच में सुनाई देती रहीं। 'मेरा दिल गाए जा जूबी जूबी जूबी...' से लेकर 'कजरारे कजरारे...' तक संगीत जगत तीन दशकों का सफ़र पूरा करने वाली अलीशा की इस बात पर दाद देनी होगी कि इतने लंबे समय में भी उनकी आवाज़ में वही खनक बरकरार है जो तीस साल पहले थी।

वैसे उनके बारे में एक रोचक तथ्य ये है जिसे आप अलीशा के नाम से जानते हैं, उनका वास्तविक नाम 'सुजाता' था जिसे बाद में उन्होंने अपनी भतीजी के नाम पर बदल कर अलीशा कर लिया। इस गीत के रोमांटिक मूड को पुख्ता करने में भी अलीशा की आवाज़ का महती योगदान है। रहे आतिफ साहब तो उनकी आवाज़ और लोकप्रियता के बारे में मैं पहले ही यहाँ चर्चा कर चुका हूँ।

तो आइए एक बार फिर सराबोर हो लें इस गीत की रूमानियत में..


shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and feel me, girl feel me
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and heal me, girl heal me
thinking abt the love we making n the life we sharing
come and feel me, girl feel me
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and feel me, comon heal me

हुआ जो तुम्हें मेरा मेरा
तेरा जो इकरार हुआ
तो क्यूँ ना मैं भी कह दूँ कह दूँ
हुआ मुझे भी प्यार हुआ

तेरा होने लगा हूँ खोने लगा हूँ
जब से मिला हूँ
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and feel me, girl feel me
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean
come and heal me, girl heal me


वैसे तो मन मेरा,
पहले भी रातों में
अक्सर ही चाहत के हाँ
सपने सँजोता था
पहले भी धड़कन ये
धुन कोई गाती थी
पर अब जो होता है वो
पहले ना होता था

हुआ है तुझे जो भी जो भी
मुझे भी इस बार हुआ
तो क्यूँ ना मैं भी कह दूँ कह दूँ
हुआ मुझे भी प्यार हुआ

तेरा होने लगा हूँ खोने लगा हूँ...
आँखों से छू लूँ
कि बाहें तरसती हैं
दिल ने पुकारा है हाँ
अब तो चले आओ

आओ कि शबनम की बूँदे बरसती हैं
मौसम इशारा है हाँ
अब तो चले आओ

बाँहों में डाले बाँहें बाँहें
बाँहों का जैसे हार हुआ
हाँ माना मैंने माना माना
हुआ मुझे भी प्यार हुआ

तेरा होने लगा हूँ खोने लगा हूँ...
shining in the sand n sun like a pearl upon the ocean...

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