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बुधवार, अप्रैल 17, 2019

क्या कमाल थी ताजमहल में रोशन और साहिर की जुगलबंदी ! : जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं ...

संगीतकार रोशन और गीतकार साहिर लुधयानवी ने यूँ तो कई फिल्मों में साथ साथ काम किया पर 1963 में प्रदर्शित ताजमहल उनके साझा सांगीतिक सफ़र का अनमोल सितारा थी। दोनों को उस साल ताजमहल के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। रोशन को सबसे अच्छे फिल्म संगीत के लिए और साहिर को जो वादा किया है निभाना पड़ेगा गीत लिखने के लिए। बतौर संगीतकार यूँ तो रोशन की गीत, ग़ज़ल और कव्वाली रचने में माहिरी थी पर उनमें आत्मविश्वास की बेहद कमी थी इसलिए अपने गीतों की असफलता का डर उन्हें हमेशा सताता था। वो अक्सर अपने संगीतोबद्ध गीतों पर दूसरों की राय से बहुत प्रभावित हो जाया करते थे। ऐसी मनोस्थिति में फिल्मफेयर का ये पहला पुरस्कार उनके लिए कितना मायने रखता होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।



ताजमहल में जो गीत सबसे मकबूल हुआ वो था जो वादा किया है निभाना पड़ेगा। मेरी नज़र में गीत के बोलों के ख्याल से साहिर का सबसे अच्छा काम जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं में था पर फिल्मफेयर हमेशा से गुणवत्ता से ज्यादा लोकप्रियता पर विश्वास करता आया है इसलिए इस गीत को कोई पुरस्कार तब नहीं मिला। अपनी प्रेयसी के किन खूबसूरत पहलुओं को उसकी तस्वीर उभार नहीं पाती इसे साहिर ने कितने प्यार से गूँथा था गीत के इन अंतरों में।  

रंगों में तेरा अक्स ढाला, तू ना ढल सकी
साँसों की आँच, जिस्म की खुशबू ना ढल सकी
तुझ में जो लोच है, मेरी तहरीर में नहीं


बेजान हुस्न में कहाँ, रफ़्तार की अदा
इन्कार की अदा है ना इकरार की अदा
कोई लचक भी जुल्फ-ए-गिरहगीर में नहीं

जो बात तुझमें है, तेरी तस्वीर में नहीं


गीतों में ऐसी कविता आजकल भूले भटके ही मिलती है। ऐसी पंक्तियाँ कोई साहिर जैसा शायर ही लिख सकता था जिसने प्रेम को बेहद करीब से महसूस किया हो। रफ़ी साहब ने इसे गाया भी बड़ी मुलायमियत से था।


रोशन ने मैहर के अताउल्लाह खान से जो सारंगी सीखी थी उसका अपने गीतों में उन्होंने बारहा प्रयोग किया। इस गीत में भी तबले के साथ सारंगी की मोहक  तान को आप जगह जगह सुन सकते हैं।

इसी फिल्म का  सवाल जवाब वाले अंदाज़ में रचा एक युगल गीत भी तब काफी लोकप्रिय हुआ था। साहिर की कलम यहाँ भी क्या खूब चली थी..  दो मचलते प्रेमियों की मीठी तकरार कितनी सहजता से उभरी थी उनकी लेखनी  में ..

पाँव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी 
दिल की बेचैन उमंगों पे करम फ़रमाओ 
इतना रुक रुक के चलोगी तो क़यामत होगी 

शर्म रोके है इधरशौक़ उधर खींचे है 
क्या खबर थी कभी इस दिल की ये हालत होगी



वैसे तो हिंदी फिल्म संगीतकारों में मदनमोहन को फिल्मी ग़ज़लों का बेताज बादशाह माना गया है पर अगर संगीतकार रोशन द्वारा संगीतबद्ध ग़ज़लों को आँका जाए तो लगेगा कि उनकी ग़ज़लों और नज़्मों को वो सम्मान नहीं मिला जिनकी वे हक़दार थीं। लता मंगेशकर मदनमोहन की तरह रोशन की भी प्रिय गायिका थीं। रोशन ने उनकी आवाज़ में दुनिया करे सवाल तो, दिल जो ना कह सका, रहते थे कभी जिनके दिल में जैसी प्यारी ग़ज़लें रचीं। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में उनके द्वारा संगीतबद्ध नज़्म शराबी शराबी ये सावन का मौसम भी मुझे बेहद प्रिय है।


ताजमहल के लिए भी उन्होंने साहिर से एक ग़ज़ल लिखवाई जुर्म ए उल्फत पे हमें लोग सज़ा देते हैं। बिल्कुल नाममात्र के संगीत पर भी इस ग़ज़ल की धुन का कमाल ऐसा है कि दशकों बाद भी इसका मुखड़ा हमेशा होठों पर आ जाया करता है। साहिर की शायरी का तिलिस्म लता की आवाज़ में क्या खूब निखरा है। राग अल्हैया बिलावल पर आधारित इस धुन में मुझे बस एक कमी यही लगती है कि अशआरों के बीच संगीत के माध्यम से कोई अंतराल नहीं रखा गया।


जुर्म--उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं 
कैसे नादान हैंशोलों को हवा देते हैं 

हम से दीवाने कहीं तर्क-ए-वफ़ा करते हैं 
जान जाये कि  रहे, बात निभा देते हैं 

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें 
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं 


तख़्त क्या चीज़ है और लाल--जवाहर क्या है 
इश्क़ वाले तो खुदाई भी लुटा देते हैं 

हमने दिल दे भी दिया अहद---वफ़ा ले भी लिया 
आप अब शौक़ से  दे दें, जो सज़ा देते हैं 


(उल्फ़त : प्रेम ,  तर्क-ए-वफ़ा : बेवफ़ाई,  सिला :प्रतिकार,  लाल--जवाहर : माणिक, अहद---वफ़ा :वफ़ा का वादा )


ग़ज़ल लता के मधुर से आलाप से शुरु होती है। आलाप खत्म होते ही आती है सारंगी की आहट। फिर तो साहिर के शब्द और लता की मधुर आवाज़ के साथ इश्क का जुनूनी रूप बड़े रूमानी अंदाज़ में ग़ज़ल का हर शेर उभारता चला जाता है। रोशन की धुन में उदासी है जिसे आप इस गीत को गुनगुनाते हुए महसूस कर सकते हैं। तो आइए सुनते हैं लता की आवाज़ में ये ग़ज़ल

रविवार, जुलाई 12, 2009

काहे तरसाए जियरा... राग कलावती पर आधारित एक सम्मोहक युगल गीत !

कुछ दिनों पहले संगीतकार रोशन और साहिर की जोड़ी द्वारा रचित दिल जो ना कह सका के बारे में बाते हुईं थीं। आज से चार दिन बाद यानि 14 जुलाई को संगीतकार रौशन का जन्म दिन है तो मेंने सोचा कि क्यूँ ना साहिर के बोलों पर उनके संगीतबद्ध इस शास्त्रीय नग्मे को आपके सामने प्रस्तुत कर उनकी याद दिलाई जाए। लता जी के साथ तो रौशन साहब ने तो कई अद्भुत गीत दिए हैं पर आज का ये गीत लता जी का नहीं बल्कि आशा भोंसले और उषा मंगेशकर का गाया युगल गीत है।



अगर हिंदी फिल्मों में शास्त्रीय युगल गीतों की बात करें तो उनमें 1964 में आई फिल्म चित्रलेखा के इस गीत का जिक्र नहीं होना आश्चर्य की बात होगी। ये गीत राग कलावती पर आधारित है जो कि मध्यरात्रि के पूर्व गाया जाने वाला राग है। खैर मैं तो मंगेशकर बहनों की इस शास्त्रीय जुगलबंदी को किसी भी वक़्त सुनता हूँ, मन मुदित हो जाया करता है। संगीतकार रौशन की खासियत यही थी को वो अपनी धुनों में लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत के बीच ऍसा सामंजस्य स्थापित करते थे कि हृदय उनकी जादूगरी पर वाह वाह कर उठे। बेमिसाल गायिकी और संगीत के आलावा एक और बात इस गीत को अनोखा बनाती हैं वो हैं इसके बोल..

साहिर एक मक़बूल शायर तो थे ही फिल्मों के लिए उनकी लिखी हुई ग़ज़लें भी उतनी ही मशहूर हुईं। पर वही शख्स शुद्ध हिंदी में भी उसी माहिरी के साथ गीत रचना कर सकता है ये बात इस गीत के शब्दों पर गौर करने से पता चल जाती है।
चलिए अब इस गीत का मूड टटोलते हैं। सावन का महिना प्रारंभ हो चुका है। ऍसे में अगर पिया जी परदेश में हों और लौटने का नाम नहीं ले रहे और ऊपर से बारिश की ये कल्की हल्की फुहारें तन मन में और आग लगा दें तो जियरा तो तरसेगा ही !

काहे तरसाए जियरा
काहे तरसाए जियरा, जियरा...
यवन ऋतु सजन जाके न आ...ए..
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा..

नित नीत जागे ना
नित नीत जा.. जागे ना, नित नीत जा.. जागे ना,
नित नीत जागे ना
सोया सिंगा...र, सोया सिंगा.......र
झनन झन झनन, नित ना बुला..ए
काहे जियरा तरसाए
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा..

नित नीत आए ना
नित नीत आ.. आए ना, नित नीत आ.. आए ना,
नित नीत आए ना
तन पे निखा...र, तन पे निखा......र
पवन मन सुमन नित ना खिला..ए
काहे जियरा तरसाए
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा


नित नीत बरसे ना
नित नीत बर. बरसे ना, नित नीत बर.. बरसे ना
नित नीत बरसे ना
रस की फुहार, रस की फुहा...र
सपन बन गगन, नित ना लुटा..ए
काहे जियरा तरसाए
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा
जियरा...


संगीतकार रोशन ने इस गीत में विभिन्न वाद्य यात्रों में क्या कमाल बैठाया था। तबले की थाप, बाँसुरी की सुरीली गूँज और उनके बीच तार वाद्यों की झंकार। कई बार संगीत संयोजन पर हमारा ध्यान तब जाता है जब उस पेशकश को आर्केस्ट्रा के साथ देखा जाए। ऐसा ही एक प्रस्तुति मुझे नेट पर मिली। आप भी देखिए संगीत का कमाल



तो आइए सुनते हैं आशा और उषा जी की इस अद्भुत जुगलबंदी को चित्रलेखा फिल्म के इस गीत

गुरुवार, जून 25, 2009

दिल जो ना कह सका आज सुनिए लता जी की मीठी आवाज में ये रूमानियत भरा गीत...

पिछली पोस्ट में आपने सुना इस गीत को मोहम्मद रफ़ी  की आवाज़ में। सुरों की मलिका लता जी ने भी इस प्यारे से गीत को अपना स्वर दिया है। जैसा कि मैंने पहले कहा था कि लता वाले वर्सन का मिज़ाज कुछ दूसरा है।रफ़ी साहब का गाया गीत एक ऊंचा टेम्पो लिए हुए था वहीं मीना कुमारी पर फिल्माया ये गीत उस शांत नदी की धारा की तरह है जिसके हर सिरे से सिर्फ और सिर्फ रूमानियत का प्रवाह होता है।


जहाँ रफ़ी साहब को विभिन्न अंतरों में गीत के बदलते भावों के हिसाब से आवाज़ का लहजा बदलना था वहीं लता इस गीत में अपनी मीठी आवाज़ से प्रेम में आसक्त नायिका के कथ्यों में मिसरी घोलती नज़र आती हैं।

वैसे अंतरजाल पर इस गीत के बारे में ये बहस आम है कि गीत के इन दोनों रूपों में कौन सी प्रस्तुति ज्यादा धारदार थी? दो महान गायकों की ऍसी तुलना मुझे तो बेमानी लगती है, खासकर तब जब दोनों गीतों की परिस्थितियाँ फिल्म 'भीगी रात' में बिल्कुल अलहदा थीं।हाँ, मुझे ये जरूर लगता है कि रफ़ी वाले वर्सन को सफलता पूर्वक निभाने के लिए किसी भी गायक के लिए चुनौतियाँ कही ज़्यादा थीं।

लता रोशन जी की बतौर संगीतकार बेहद इज्जत करती थीं । और यही वज़ह है कि पचास साठ के दशक में बहू बेगम, चित्रलेखा, ममता, ताजमहल में संगीतकार रौशन के लिए गाए उनके गीत हिन्दी पार्श्व फिल्म गायन की अनमोल धरोहर बन गए हैं।

वैसे ये गीत भी अपने आप में लाजवाब है। गीत के शुरुआती हिस्से में लता जी की हमिंग के बीच चाशनी में घुला हुआ उनका स्वर उभरता है तो बस मन में समा बँध जाता है। वैसे इसके बाद कोई कसर बचती भी है तोगीतकार मज़रूह सुल्तानपुरी  के कभी नरमी कभी शोखी लिए बोल आपको रूमानी माहौल से निकलने का मौका ही नहीं देते।

हम्म्म्म...हम्म्म्म..हम्म्म्म
दिल जो ना कह सका
वही राज़-ए-दिल कहने की रात आई
दिल जो ना कह सका....

नगमा सा कोई जाग उठा बदन में
झंकार की सी थरथरी है तन में
झंकार की सी थरथरी है तन में
हो प्यार की इन्हीं धड़कती
धड़कती फिज़ाओं में, रहने की रात आई
दिल जो ना कह सका....

अब तक दबी थी इक मौज़ ए अरमाँ
लब तक जो आई बन गई है तूफाँ
लब तक जो आई बन गई है तूफाँ
हो..,, बात प्यार की बहकती
बहकती निगाहों से कहने की रात आई
दिल जो ना कह सका....

गुजरे ना ये शब, खोल दूँ ये जुल्फ़ें
तुमको छुपा लूँ मूँद के ये पलकें
तुमको छुपा लूँ मूँद के ये पलकें
हो..बेकरार सी लरज़ती
लरज़ती सी छाँव में रहने की रात आई
दिल जो ना कह सका....
(मौज़ ‍- लहर , लरज़ना - काँपना, थरथराना)

प्रेम रस से सराबोर इस गीत को अगर आप मीना कुमारी और प्रदीप कुमार की अदाकारी के साथ देखना चाहते हैं तो ये रहा इसका वीडिओ लिंक....

मंगलवार, जून 23, 2009

दिल जो ना कह सका...: रफ़ी, रौशन और मज़रूह की त्रिवेणी से निकला का एक यादगार नग्मा...

पिछले हफ्ते चैनल बदलते बदलते जी टीवी के लिटिल चैम्पस पर उँगलियाँ रुकीं तो रुकी की रुकी रह गईं। एक छोटे बालक को रफी साहब के इस गीत का एक हिस्सा गाते सुना तो मन आह्लादित हो गया। बीते दिनों के इन अनमोल मोतियों को आज के बच्चों के मुख से सुनना असीम संतोष की भावना से मन को भर देता है। कई दिनों के बाद ये गीत जब सुनने को मिला तो ज़ेहन से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। इसलिए सोचा कि क्यूँ ना इस आनंद को आप सब के साथ बाँटा जाए।

जिस गीत के बोल, धुन और गायिकी तीनों ही बेमिसाल हों तो आपको कहने को तो कुछ रह ही नहीं जाता, मन भावनाओं के आवेश से हिलोरें लेने लगता है और गीत खुद बा खुद होठों पर चला आता है ...

दिल जो ना कह सका
वही राज़-ए-दिल कहने की रात आई
दिल जो ना कह सका....



क्या धुन बनाई थी मुखड़े की संगीतकार रोशन ने कि आदमी मज़रूह सुल्तानपुरी के शब्दों की रवानी के साथ बहता ही चला जाता है। १९६५ में प्रदर्शित फिल्म भींगी रात का ये गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था और उस साल की बिनाका संगीतमाला में पाँचवे स्थान तक जा पहुँचा था। अगर मुखड़े के लिए गीतकार और संगीतकार की जादूगरी को दाद देने का जी चाहता है तो वहीं अंतरे में मोहम्मद रफी साहब की कलाकारी इस गीत को उनके गाए बेहतरीन गीतों में से एक मानने पर मज़बूर कर देती है।

ये गीत फिल्म में प्रदीप कुमार, अशोक कुमार और मीना कुमारी पर फिल्माया गया है।

गीतकार मज़रूह सुल्तानपुरी ने प्रेमिका की बेवफाई टूटे नायक (प्रदीप कुमार) के दिल में उठते मनोभावों को गीत के अलग अलग अंतरों में व्यक्त किया हैं।

दिल जो ना कह सका
वही राज़-ए-दिल कहने की रात आई
दिल जो ना कह सका....

नगमा सा कोई जाग उठा बदन में
झंकार की सी, थरथरी है तन में
झंकार की सी थरथरी है तन में
हो.. मुबारक तुम्हें किसी की
लरज़ती सी बाहों में
रहने की रात आई
दिल जो ना कह सका...

तौबा ये किस ने, अंजुमन सजा के
टुकड़े किये हैं गुनचा-ए-वफ़ा के
टुकड़े किये हैं गुनचा-ए-वफ़ा के
हो..उछालो गुलों के टुकड़े
कि रंगीं फ़िज़ाओं में
रहने की रात आई, दिल जो ना कह सका....

चलिये मुबारक जश्न दोस्ती का
दामन तो थामा आप ने किसी का
दामन तो थामा आप ने किसी का
हो...हमें तो खुशी यही है
तुम्हें भी किसी को अपना
कहने की रात आई, दिल जो ना कह सका...

सागर उठाओ दिल का किस को ग़म है
आज दिल की क़ीमत जाम से भी कम है
आज दिल की क़ीमत जाम से भी कम है
पियो चाहे खून-ए-दिल हो
हो...के पीते पिलाते ही रहने की रात आई
दिल जो ना कह सका...


नायक की दिल की पीड़ा कभी तंज़, कभी उपहास तो कभी गहरी निराशा के स्वरों में गूँजती है और इस गूँज को मोहम्मद रफ़ी अपनी आवाज़ में इस तरह उतारते हैं कि गीत खत्म होने तक नायक का दर्द आपका हो जाता है

तो फिर देर काहे कि सुनिए आप भी इस महान गायक को एक बेमिसाल गीत में



इसी गीत को लता मंगेशकर ने भी गाया है। पर मीना कुमारी वाले गीत का मिज़ाज़ कुछ अलग है। पर उस गीत की बात करेंगे इस कड़ी की अगली पोस्ट में..

मंगलवार, जून 17, 2008

आइए सुनें बारिशों के इस मौसम में सुमन कल्याणपुर को : शराबी शराबी ये सावन का मौसम ख़ुदा की क़सम ख़ूबसूरत न होता

मानसूनी बारिश से पूरा भारत भीगा हुआ है। झुलसाती गर्मी के बाद बारिश की फुहारें किसे अच्छी नहीं लगती। आज बाहर टप टप गिरती बरखा की बूँदों ने मुझे प्रेरित किया है आपके साथ एक प्यारे से मानसूनी गीत को बाँटने के लिए। यूँ तो बारिश से जुड़े कई अनमोल गीत भारतीय फिल्म जगत हमें दे चुका है। नियमित पाठकों को याद होगा कि किशोर कुमार के बारे में श्रृंखला लिखते समय मैंने मंजिल फिल्म के लिए योगेश गौड़ का लिखा गीत रिमझिम गिरे सावन सुनाया था। इस गीत को गुनगुनाना मुझे बेहद प्रिय है और यही वज़ह है कि इस गीत को आप चिट्ठे की साइडबार में भी पाएँगे। पर आज का ये गीत कुछ अलग सा है, इसमें शास्त्रीयता भी है और लफ़्जों की एक नज़ाकत भी। ये एक ऍसा गीत है जो वर्षा ॠतु को प्रेम के रंगों में सराबोर कर देता है।

जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ १९६७ में आई फिल्म नूरजहाँ के गीत "शराबी शराबी ये सावन का मौसम ख़ुदा की क़सम ख़ूबसूरत न होता..." की जिसे संगीतबद्ध किया था राकेश रोशन के पिता स्वर्गीय रोशन जी ने, जिसे लिखा था गीतकार शकील बदायुँनी साहब ने और इस गीत को गाया था कोकिल कंठी सुमन कल्याणपुर ने....


मझे सुमन कल्याणपुर की गायिकी हमेशा से अच्छी लगती रही है। बचपन में अक्सर जब किसी के संगीत ज्ञान की परीक्षा लेनी होती तो सुमन जी के गाए किसी गीत को गा कर सामने वाले से ये जरूर पूछते कि बताओ इसे किसने गाया है। अक्सर जवाब लता मंगेशकर आता और तब तक हमने अपना प्वाइंट प्रूव कर लिया होता कि तुम्हें अभी तो गायकों की ही पहचान नहीं है तो तुमसे संगीत के बारे में क्या बहस करनी :)।

लता से आवाज की साम्यता की वज़ह सुमन जी को गाने के मौके कम मिले पर जितने भी मिले उसे उन्होंने पूरी तरह निभाया। 'दिल ही तो है', 'शगुन' और 'बात एक रात की' जैसी फिल्मों में उनके गाए कुछ गीत मुझे बेहद पसंद हैं और कभी उन्हें भी आप तक पहुँचाने की कोशिश करूँगा।

इस गीत की एक खासियत ये भी है कि ये राग गौड़ मल्हार पर आधारित है। राग मल्हार के बारे में कहा जाता है कि जब इस राग पर आधारित कोई गीत पूरे सुर ताल और भाव के साथ गाया जाए तो देवराज इन्द्र को बारिश करानी ही पड़ती है। वैसे भी शकील के लिखे खूबसूरत बोल बारिश की बूंदों सी शीतलता देते हैं। आप खुद ही सुन कर महसूस करें ना..




शराबी शराबी ये सावन का मौसम
ख़ुदा की क़सम ख़ूबसूरत न होता
अगर इसमें रंग-ए-मोहब्बत न होता
शराबी शराबी ......................


सुहानी-सुहानी ये कोयल की कूकें
उठाती हैं सीने में रह-रह के हूकें
छलकती है मस्ती घने बादलों से
उलझती हैं नज़रें हसीं आँचलों से
ये पुरनूर मंज़र
ये पुरनूर मंज़र ये रंगीन आलम
ख़ुदा की क़सम ख़ूबसूरत न होता
अगर इसमें रंग-ए-मोहब्बत न होता
शराबी शराबी ......................


पुरनूर - प्रकाशमान

गुलाबी-गुलाबी ये फूलों के चेहरे
ये रिमझिम के मोती ये बूँदों के सेहरे
कुछ ऐसी बहार आ गई है चमन में
कि दिल खो गया है इसी अंजुमन में
ये महकी नशीली
ये महकी नशीली हवाओं का परचम
ख़ुदा की क़सम ख़ूबसूरत न होता
अगर इसमें रंग-ए-मोहब्बत न होता
शराबी शराबी
... ..................

अंजुमन - सभा मज़लिस

ये मौसम सलोना अजब ग़ुल खिलाए
उमंगें उभारे उम्मीदें जगाए
वो बेताबियाँ दिल से टकरा रहीं हैं
के रातों की नींदें उड़ी जा रहीं हैं
ये सहर-ए-जवानी
ये सहर-ए-जवानी ये ख़्वाबों का आलम
ख़ुदा की क़सम ख़ूबसूरत न होता
अगर इसमें रंग-ए-मोहब्बत न होता
शराबी शराबी ....................

शुक्रवार, अक्टूबर 19, 2007

दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें.. :आइए सुनें साहिर का लिखा ये खूबसूरत नग्मा

इंसान जब इश्क करता है तो उसका जुनूं उसे सारी दुनिया से लड़ने की ताकत दे देता है। लगता है कि अगर आपका महबूब आपके साथ हो तो फिर ज़हान साथ रहे, ना रहे क्या फ़र्क पड़ता है। पर जिसके भरोसे सारे जग की दुश्मनी मोल ली, अगर वही हमारी भावनाएँ समझ ना सके तो दिल का टूटना लाज़िमी है। किस किस को सफाई देते रहें और अगर दें भी तो किस अवलंब पर ? आखिर तुम्हारे ना समझ पाने का गम क्या कम है कि सारे ज़माने से लड़ते फिरें।

साहिर लुधयानवी ने इसी बात को अपनी इस नज़्म में पिरोया है। उनके सवाल के अंदर की बेबसी, लफ़्जों में उभर कर आई है। और लता जी की गायिकी साहिर के इस सवाल को दिल तक पहुँचाती है इक टीस के साथ। तो पेशे खिदमत है, रोशन का संगीतबद्ध किया हुआ फिल्म 'बहू बेगम' का ये गीत...



दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें
तुमको न हो ख़याल तो हम क्या जवाब दें
दुनिया करे सवाल ...

पूछे कोई कि दिल को कहाँ छोड़ आये हैं
किस किस से अपना रिश्ता-ए-जाँ तोड़ आये हैं
मुश्किल हो अर्ज़-ए-हाल तो हम क्या जवाब दें
तुमको न हो ख़याल तो ...

पूछे कोई कि दर्द-ए-वफ़ा कौन दे गया
रातों को जागने की सज़ा कौन दे गया
कहने से हो मलाल तो हम क्या जवाब दें
तुमको न हो ख़याल तो ...


 

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