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गुरुवार, जनवरी 29, 2026

वार्षिक संगीतमाला 2024 Top 5 : चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है

संजय लीला भंसाली अपनी फिल्मों के उत्कृष्ट संगीत के लिए जाने जाते रहे हैं। जब दो साल पहले लाहौर में मुजरों और जिस्मफरोशी के लिए मशहूर हीरामंडी पर उन्होंने वेब सीरीज बनाई तो इसके आठ भागों के लिए ठुमरियों, कव्वाली और ग़ज़लों से सजा आठ गीतों का एक गुलदस्ता भी बना जो मूल कथानक से कहीं ज्यादा सराहा गया।

मुझे इस एल्बम के कई गीत अच्छे लगते हैं पर मेरी इस संगीतमाला में इनमें से दो ही शामिल हो पाए। पहला तो कल्पना गंधर्व का गाया इक बार देख लीजिए तो दूसरा आज का गीत चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है जिसे संजय लीला भंसाली ने श्रेया घोषाल से गवाया। इन दोनों ही गीतों को तुराज ने ही लिखा है। संजय लीला भंसाली की एक खूबी है कि कलाकारों को सुनने परखने के बाद अगर वे उनसे प्रभावित होते हैं तो फिर वे उनकी फिल्मों के अभिन्न अंग बन ही जाते  है। 


गीतकार ए एम तुराज को भंसाली साहब ने 2010 में गुजारिश के लिए गाने लिखने को कहा था। उसके बाद बाजीराव मस्तानी, गंगूबाई और फिर हीरामंडी में जब जब उन्हें काव्यात्मक गीतों की जरूरत हुई उन्होंने तुराज का हाथ पकड़ा और तुराज ने भी उन्हें निराश नहीं किया। इस गीत के संगीत को अरेंज करने वाले श्रेयस पुराणिक के साथ भंसाली जी का पुराना नाता रहा है। 

श्रेया घोषाल को तो फिल्मी दुनिया मेला पहला बड़ा ब्रेक संजय लीला भंसाली की बदौलत देवदास में मिला था और उसके बाद उनकी हर फिल्म में श्रेया का गाया कोई गाना होता ही है। भंसाली श्रेया से अपनी पहली मुलाकात के बारे में कहते है।

बात 1999-2000 की होगी। मैं उस दिन इस्माइल दरबार के साथ दिन भर बैठा था। हम लोग एक अच्छी गायिका की तलाश में थे। सोलह साल की श्रेया तब अपने पिताजी के साथ मेरे घर आई थी। मैं दिन भर लक्ष्मीकांत जी की एक धुन गुनगुना रहा था। जब श्रेया आई तो मैंने उसे कुछ गुनगुनाने को कहा और कमाल देखिए कि श्रेया ने वही गीत सुनाया जो मैं दिन भर से गा रहा था। तभी मैंने जान लिया कि इससे मेरा कुछ अंदर का रिश्ता है जो शायद अब ज़िंदगी भर बरक़रार रहे।

प्रेम में डूबे हुए दिल को जब ठेस लगती है तो मन एकदम से उसे स्वीकार नहीं पाता है। तरह तरह के प्रश्न मन मस्तिष्क में उठने लगते हैं कि आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? भला पूर्णिमा के दिन भी किसी ने चांद को किसी ने ढलते देखा है? पर मेरा प्यार तो उरूज़ पर आते आते ही अचानक बिखर गया। लुटे पिटे दिल की हालत बयां करें तो किससे? हालत ये है कि सीने में दर्द छुपाए चेहरे पर मुस्कुराहट का लबादा ओढ़ना पड़ रहा है। तुराज़ इसी मनोदशा को कुछ यूं शब्द देते हैं।

चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है
चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है
हाय, पानी में...., हाय, पानी में...कौन जलता है?
चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है...

दर्द ऐसा कि हँसी आती है
साँस सीने में, फँसी जाती है
जिसमें काँटे बिछे हों मंज़िल तक
जिसमें काँटे बिछे हों मंज़िल तक
ऐसे रस्ते पे, कौन चलता है?
हाय, पानी में, हाय, पानी में.....हा..य, पानी में कौन जलता है?
चौदहवीं शब ....ढलता है

जीता हुआ इश्क़, हार बैठे... हैं
इसी तरह दिल को, मार बैठे हैं
जैसे हमने मले हैंहाथ अपने
जैसे हमने मले हैं हाथ अपने
ऐसे हाथों को कौन मलता है?
हाय, पानी में..हाँ..हाय, पानी में कौन जलता है?
चौदहवीं ....ढलता है

संजय लीला भंसाली की राग यमन कल्याण से प्रेरित प्यारी धुन तुरंत श्रोता का ध्यान अपनी ओर खींचती है। मुखड़ों और अंतरों के बीच श्रेयस का संगीत संयोजन इस उप शास्त्रीय गीत के लिए खरा उतरता है। कहीं सारंगी और सितार की झनझनाहट, तो कहीं जलतरंग की आहट। तबले पर तो संदेश कदम शुरू से अंत तक अपना जलवा बरकरार रखते हैं।

संजय जानते थे कि एल्बम के इस सबसे सुरीले गीत के साथ कोई न्याय कर सकता है तो वो हैं श्रेया घोषाल। तो आइए सुनें उन्हीं की आवाज़ में ये गीत

बुधवार, दिसंबर 17, 2025

वार्षिक संगीतमाला 2024 Top 10: इक बार देख लीजिए दीवाना बना दीजिए

वार्षिक संगीतमाला की अगली पेशकश है 2024 में काफी लोकप्रिय रही वेब सीरीज हीरामंडी से। यूं तो हीरामंडी में शामिल तमाम गीत सुनने के काबिल हैं पर इस बार की संगीतमाला में इस धारावाहिक के दो गीतों को सुनने का अवसर आप सबको मिलेगा। सकल बन फूल रही सरसों, आज़ादी और नजरिया की मारी भले ही इस श्रृंखला का हिस्सा न बन पाए हों पर आप उन्हें भी अवश्य सुनें।

ऐसा शायद ही होता है कि किसी वार्षिक संगीतमाला में दो गीत ऐसे हों जिन्हें एक ही परिवार के सदस्यों ने गाया हो। गायकों की इस भीड़ में अगर वो रिश्ता भाई बहन का हो तो और भी अचरज की बात हो जाती है। मैं बात कर रहा हूं गायक पृथ्वी गंधर्व और उनकी बहन कल्पना गंधर्व की। पृथ्वी गंधर्व का गाया हुआ निर्मोहिया इस गीतमाला की बीसवीं पायदान पर आप पहले ही सुन चुके हैं और आज सातवीं सीढ़ी पर उनकी बहन कल्पना हम सबसे सुना रही हैं नेटफ्लिक्स की सीरीज हीरामंडी का ये गीत। 

जिस परिवार के उपनाम में गंधर्व का जिक्र हो तो लगने लगता है कि वो संगीत से जुड़ा होगा। कल्पना के नाना वादक थे और उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी के साथ कई फिल्मों में काम किया। दादा ने सारंगी को अपना वाद्य चुना वहीं पिता ने वायलिन पर महारत हासिल की।


पृथ्वी और कल्पना ने बचपन से शास्त्रीय संगीत के साथ ग़ज़ल और उप शास्त्रीय संगीत अपने नाना से सीखा। ये दोनों उज्जैन घराने की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। पृथ्वी को तो मैं बतौर ग़ज़ल गायक मैं पिछले कुछ सालों से सुन रहा हूं पर कल्पना की गायिकी से मैं हीरामंडी के माध्यम से ही परिचित हो सका। हालांकि इसके पहले भी उन्होंने तनु वेड्स मनु रिटर्न और सरबजीत के गाने गाए हैं।

कल्पना गंधर्व

हीरामंडी के लिए गाने का मौका उन्हें अचानक से ही मिला। भंसाली साहब अक्सर नई आवाज़ों को मौका देते रहे हैं। अक्सर उनकी महफिलों में नए कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है। वे उनसे कुछ सुनाने की फरमाइश करते हैं और आवाज़ अच्छी लगी तो फिर वहीं उस गायक या गायिका को अपने किसी गीत के लिए चुन भी लेते हैं। कल्पना से भी उन्होंने एक ग़ज़ल गंवाई और ये गीत रिकॉर्ड कर लिया। हालांकि कौन से गीत पर कब संपादन की कैंची चल जाए ये डर कल्पना को भी सता रहा था। साथ ही उनके मन में ये संशय भी था कि क्या इसे नेटफ्लिक्स ठीक से प्रमोट करेगी क्योंकि ओटीटी वाले इस मामले में हमेशा कोताही बरतते पाए गए हैं। 

इस गीत को लिखा है ए एम तुराज़ ने जो अक्सर संजय लीला भंसाली की फिल्मों में गीत लिखते पाए जाते हैं। तुझे याद कर लिया है आयत की तरह..., इक दिल है इक जान है..., अब तोहे जाने न दूंगी भंसाली साहब की फिल्मों के लिए लिखे उनके कुछ ऐसे गीत हैं जो मेरे बेहद पसंदीदा रहे हैं।

हीरामंडी का संगीत यूं तो खासा पसंद किया गया पर इक बार देख लीजिए.. के रिलीज़ होने के बाद आलम ये था कि लोगों ने इंस्टाग्राम पर इस गीत को लेकर बेतहाशा रील बनाईं। लड़कियों में तो ये गीत खासा लोकप्रिय हुआ। शायद ही कोई नवोदित गायिका हों जिन्होंने इस गीत की शुरुआती पंक्तियां नहीं गाई। संजय लीला भंसाली की धुन को कल्पना ने अपनी गायिकी से इस मुकाम पर पहुंचा दिया कि तुराज़ का ये गीत सबकी जुबान पर आ गया।

इक बार देख लीजिए 
इक बार देख लीजिए दीवाना बना दीजिए 
जलने को हैं तैयार हम परवाना बना दीजिए 
इक बार देख लीजिए 

इतनी पिएँ कि जा ना सकें उठ कर कहीं भी हम 
आँखों को अपनी आप एक मय-ख़ाना बना दीजिए 
इक बार देख लीजिए 

कुछ भी दिखाई ना दे हमें सिवा आप के कहीं पे 
सारे जहां से आप हमको बेगाना बना दीजिए 
इक बार देख लीजिए....

इस शब्द प्रधान गीत में म्यूजिक अरेंजर राजा पंडित ने सितार और वायलिन जैसे तार वाद्यों के साथ साथ तबले और हारमोनियम का इस्तेमाल किया है। राजा ने इस गीत के पहले अंतरे के बाद वायलिन और दूसरे में सितार और फिर गीत के अंत में हारमोनियम पर बजाए एक टुकड़े से सजाया है।

तो आइए आनंद लें इस गीत का कल्पना की आवाज़ में

मंगलवार, जनवरी 22, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 8 : एक दिल है, एक जान है Ek Dil Hai Ek Jaan Hai

हिंदी फिल्मों में शास्त्रीय रागों से प्रेरित गीत हमेशा बनते रहे हैं. ये जरूर है कि विगत कुछ सालों में उनकी संख्या में कमी आई है। खुशी की बात है कि आज भी संजय लीला भंसाली जैसी हस्तियाँ मौज़ूद हैं जो अपनी फिल्मों में हमारी इस अनमोल सांगीतिक विरासत का कोई ना कोई रंग छलकाते ही रहते हैं। इस साल मेरी इस संगीतमाला में बहुत दुखा मन और मैं हूँ अहम के बाद तीसरे ऐसे ही शास्त्रीय गीत एक दिल एक जान ने अपनी जगह बनाई है एक नई आवाज़ के साथ।  ये आवाज़  है शिवम  पाठक की 


इस गीत को अपनी आवाज़ से सँवारा है शिवम पाठक ने। शिवम जब उत्तर प्रदेश के छोटे शहर लखीमपुर खीरी से मुंबई आए थे तो उनका इरादा सिर्फ नेटवर्किग और हार्डवेयर के पाठ्यक्रम में दाखिला लेने का था। आवाज़ अच्छी थी तो एक मित्र ने इंडियन आइडल में किस्मत आज़माने को कहा। आडिशन में छँट गए तो लगा कि शास्त्रीय संगीत सीखना चाहिए। परिवार का संगीत से कोई नाता तो था नहीं। बैंक एकाउटेंट पिता को पुत्र का नेटवर्किंग हार्डवेयर के कोर्स से अचानक संगीत के प्रति नया रुझान अखरा क्यूँकि उस कोर्स के लिए वो काफी पैसे लगा चुके थे। फिर भी शिवम को सुरेश वाडकर की संगीत पाठशाला में उन्होंने दाखिला दिला दिया। 

शिवम पाठक 
दो साल बाद वो फिर इंडियन आइडल के मंच पर पहुँचे और अंतिम पाँच में जगह बनाई। नागेश कुकनूर की फिल्म मोड़ (2011) में उन्हें गाने का पहला मौका मिला। फिल्म कुछ खास नहीं चली। अगले कुछ सालों में ज्यादा काम उन्हें मिला नहीं तो वे गाने संगीतबद्ध करने लगे। 2014 में वे अश्विनी धीर की सिफारिश पर फिल्म मेरीकॉम के लिये संजय लीला भंसाली से मिले और अपनी एक रचना सुनाई जो संजय जी ने पसंद कर ली। फिल्म में उनके संगीतबद्ध दो गाने थे।

2014 में सरबजीत और गाँधीगिरी के कुछ गीतों को छोड़ दें तो उनकी आवाज़ ज्यादा नहीं सुनाई दी पर जैसा कि संजय लीला भंसाली की आदत है वो नए कलाकारों से अगर प्रभावित हो जाएँ तो उन्हें भविष्य में मौका देने से पीछे नहीं हटते। खुद शिवम  को संगीत संयोजन की अपेक्षा गायिकी से ज़्यादा लगाव है। जिस तरह शिवम ने इस गीत को गाया है उससे निश्चय ही संजय लीला भंसाली का विश्वास उन पर मजबूत हुआ होगा।

गीतकार ए एम तुराज़  से संजय लीला भंसाली का जुड़ाव तो और भी पुराना रहा है। गुजारिश का तेरा जिक्र से लेकर बाजीराव मस्तानी के आयत तक आपने उनके शायराना लफ़्ज़ हिंदी फिल्मों में सुने हैं। शिवम की तरह तुराज़ भी उत्तरप्रदेश से ताल्लुक रखते हैं। मुजफ्फरनगर के एक किसान परिवार से पहले शायरी और फिल्मों तक के उनके सफ़र के बारे में मैं पहले ही आपको यहाँ बता चुका हूँ। मैंने देखा है कि संजय लीला भंसाली को जब भी मोहब्बत की बात गहराई से करनी हो तो वो तुराज़ का रुख करते हैं। 

संजय लीला भंसाली व  ए एम तुराज़ 
संजय लीला भंसाली की शास्त्रीय संगीत से मोहब्बत जगज़ाहिर है। कुमार गंधर्व उनके प्रिय गायक रहे हैं। आपने भंसाली के रचे गीतों में राग भूपाली, राग अहीर भैरव, राग बसंत, राग पूरिया धनश्री जैसे रागों की झलक सुनी होगी पर जिस तरह उन्होंने राग यमन और उसके सहोदर यमन कल्याण का इस्तेमाल अपने गीतों में किया है उसका सानी आज के संगीत निर्देशकों में मिल पाना कठिन ही है। राग यमन की स्वरलहरियों से सजे लाल इश्क़, झोंका हवा का, अब अलविदा और आयत जैसे गीत तो आपके ज़हन में होंगे ही। 

एक इश्क़ एक जान एक और तोहफा है यमन प्रेमियों के लिए संजय लीला भंसाली का। इस राग से उनका ये प्रेम पद्मावत की पटकथा का हिस्सा बन गया। फिल्म में एक प्रसंग है जब छल से क़ैद किए राजा रतन सिंह के जख़्मों पर नमक छिड़कते हुए बागी राजपुरोहित राघव चेतन कहता है कि मैंने सोचा क्यूँ ना यमन कल्याण बजाऊँ, शायद तुम्हारा दर्द इसे सुन कर कम हो जाए तो राजा रतन सिंह का बेपरवाही भरा जवाब होता है बजाओ यमन.....

गीत शिवम के आलाप से शुरु होता है और मुखड़े में मंद मंद बहता हुआ दिलो दिमाग पर छा जाता है। गीत के मध्य में कव्वाली की तर्ज पर तुराज़ के शब्द अपने प्रिय को नए नए बिंबों में ढालते हैं। कव्वाली वाले हिस्से में आवाज़े हैं अज़ीज़ नाज़ां, कुणाल पंडित और फरहान साबरी की।गीत में जो ठहराव है वो सम्मोहित करता है। दिल करता है कि गीत उसी अंदाज़ में चलता रहे पर अफ़सोस गीत पहले ही खत्म हो जाता है पर शिवम के आलाप के और सागर में डुबकी लगाने के बाद।

एक दिल है, एक जान है
दोनों तुझ पे कुर्बान है
एक मैं हूँ, एक ईमान है
दोनों तुझ पे हाँ तुझ पे
दोनों तुझ पे कुर्बान है
एक दिल है..

इश्क़ भी तू मेरा प्यार भी तू
मेरी बात ज़ात जज़्बात भी तू
परवाज़ भी तू रूह-ए-साज़ भी तू
मेरी साँस नब्ज़ और हयात भी तू

मेरा राज़ भी तू, पुखराज भी तू
मेरी आस प्यास और लिबास भी तू
मेरी जीत भी तू, मेरी हार भी तू
मेरा ताज, राज़ और मिज़ाज भी तू

मेरे इश्क़ के, हर मक़ाम में
हर सुबह में, हर शाम में
इक रुतबा है, एक शान है
दोनों तुझ पे हाँ तुझ पे
दोनों तुझ पे कुर्बान है
एक दिल है..




वार्षिक संगीतमाला 2018  
1. मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
2जब तक जहां में सुबह शाम है तब तक मेरे नाम तू
3.  ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
4.  आज से तेरी, सारी गलियाँ मेरी हो गयी
5.  मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा 
6.  तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा
7.  नीलाद्रि कुमार की अद्भुत संगीत रचना हाफिज़ हाफिज़ 
8.  एक दिल है, एक जान है 
9 . मुड़ के ना देखो दिलबरो
10. पानियों सा... जब कुमार ने रचा हिंदी का नया व्याकरण !
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 
24. वो हवा हो गए देखते देखते
25.  इतनी सुहानी बना हो ना पुरानी तेरी दास्तां

गुरुवार, फ़रवरी 25, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पायदान # 3 : तुझे याद कर लिया है ... आयत की तरह Aayat

वार्षिक संगीतमाला के समापन में अब सिर्फ आख़िरी की तीन सीढ़ियाँ  बची हैं और इन तीनों गीतों के बोल कुछ ऐसे हैं जो इनकी मिठास को और बढ़ा देते हैं। तीसरी पॉयदान पर एक बार फिर बाजीराव मस्तानी का वो नग्मा जिस पर आपका ध्यान फिल्म देखते हुए शायद ही गया हो। गीत के बोल थे तुझे याद कर लिया है आयत की तरह क़ायम तू हो गई है रिवायत की तरह। अब इस आयत को क्षेत्रमिति वाला आयत (Rectangle) मत समझ लीजिएगा। दरअसल क़ुरान में लिखी बात को भी आयत कहते हैं। तो किसी को..याद करने की सोच को आयत का बिम्ब देना अपने आप कमाल है ना और ये कमाल दिखाया एक किसान के बेटे ने। जी हाँ इस गीत को लिखने वाले हैं ए एम तुराज़ जो कि मुजफ्फरनगर के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। अब तुराज़ साहब के बारे में क्या कहें।

तीन पीढ़ियों तक उन्होंने घर में किसानी का काम होते ही देखा। ख़ुद तो हिंदी मीडियम से पढ़े पर पिता के शायरी के शौक़ ने उन्हें उर्दू भी सिखा दी। पहली बार कविता तो उन्होंने अठारह साल का होने के बाद लिखी पर इससे पहले ये समझ गए कि उनसे खेती बारी नहीं होने वाली। पिता तो इस आशा में थे कि वो भी उनके साथ काम करें पर उन्होंने मुंबई जा कर काम करने की इच्छा जताई। पिता की अनुमति तो नहीं मिली पर दादी अपने लाडले पोते के बचाव में आ गई और उन्होंने उनके वालिद से कह दिया कि आप भेज रहे हैं या हम भेंजें। फिर क्या था पिताजी को झुकना पड़ा  और बीस साल से भी कम उम्र में तुराज़ मुंबई आ गए। 


अरिजीत सिंह व  ए  एम तुराज़
एक दो साल इधर उधर की खाक़ छानने के बाद टीवी सीरियल के लिए गीत व संवाद लिखने का काम मिलने लगा। वर्ष 2005 बतौर गीतकार उन्होंने  इस्माइल दरबार के साथ अपनी पहली फिल्म की। इस्माइल दरबार ने ही उन्हें संजय लीला भंसाली से मिलवाया जब वे साँवरिया बना रहे थे। तुराज़ को साँवरिया में तो काम नहीं मिला पर गुजारिश के लिए संजय जी ने उन्हें फिर बुलाया। तुराज़ उस मुलाकात को याद कर कहते हैं कि

"संजय सर ने मुझसे  यही कहा कि धुन, संगीत सब भूल जाओ बस कविता के लिहाज से तुमने  जो सबसे अच्छा मुखड़ा लिखा हो वो मुझे दो । मेंने उन्हें ये तेरा जिक़्र है या इत्र है...  सुनाया और उन्होंने इसे  फिल्म के लिए चुन लिया जबकि यही मुखड़ा मैं बहुत लोगों को पहले भी सुना चुका था पर किसी की समझ में नहीं आया। मैं वो लिखना चाहता हूँ जिसे मुझे और सुननेवाले की रुह को सुकून मिले और संजय लीला भंसाली ऐसे निर्देशक हैं जिन्होंने ऐसा करने का मुझे अवसर दिया।"

जिंदगी में जब दूरियाँ बढ़ती हैं तो यादें काम आती हैं। अपने प्रिय के साथ बिताया एक एक पल हमारे जेहन में मोतियों की तरह चमकता है। उस चमक को हम अपने दिल में यूँ सँजो लेते है कि उन क्षणों के बारे में बार बार सोचना व महसूस करना हमारी आदत में शुमार हो जाता है। तुराज़ इन्हीं भावों से मुखड़े की शुरुआत करते हैं। पर मुखड़े के पहले ताल वाद्य की हल्की हल्की थाप के बीच अरिजीत सिंह का शास्त्रीय आलाप शुरु होता है जिसे सुन मन इस संजीदगी भरे गीत के रंग में रँग जाता है। 

संजय लीला भंसाली का शुरुआती संगीत संयोजन और अरिजीत का आलाप मुझे रामलीला के उनके गीत लाल इश्क़ की याद दिला देता है। हम दिल दे चुके सनम के बाद से उन्होंने इस्माइल दरबार को बतौर संगीतकार काम नहीं करवाया हो पर अपने अभिन्न मित्र के संगीत की छाप उनके बाद की फिल्मों में भी दिखी है पर इसके बावज़ूद भी गर उनके गीत मुझे इतने मधुर लगे हैं तो इसकी वज़ह है गीतकार व गायकों का उनका उचित चुनाव।

अरिजीत सिंह ने इस गीत के बोलों को अपनी रूह से महसूस करते हुए गाया है। उन्हें भले ही इस साल का फिल्मफेयर एवार्ड सूरज डूबा है के लिए मिला पर इस गीत के लिए वो उस इनाम के ज्यादा हक़दार थे। मुखड़े के बीच की कव्वाली के टुकड़े में उनका साथ दिया है अजीज़ नाजा और शाहदाब फरीदी ने।




तुझे याद कर लिया है,
तुझे याद कर लिया है
आयत की तरह
क़ायम तू हो गयी है
क़ायम तू हो गयी है
रिवायत की तरह

तुझे याद कर लिया है
मरने तलक रहेगी
मरने तलक रहेगी
तू आदत की तरह

तुझे ..की तरह

ये तेरी और मेरी मोहब्बत हयात है
हर लम्हा इसमें जीना मुक़द्दर की बात है
कहती है इश्क़ दुनिया जिसे मेरी  जान -ए -मन
इस एक लफ्ज़ में ही छुपी क़ायनात है ..

मेरे दिल की राहतों का तू जरिया  बन  गयी  है
तेरी इश्क़ की मेरे दिल में कई ईद मन गयी  है
तेरा ज़िक्र हो रहा है, तेरा ज़िक्र हो रहा है, इबादत  की  तरह
तुझे ..की तरह


वार्षिक संगीतमाला 2015

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पायदान # 9 : अब तोहे जाने ना दूँगी Ab Tohe Jane Na Doongi

वार्षिक संगीतमाला की नवीं पायदान का गीत वैसे है तो इस साल की संगीतमय व शानदार फिल्म बाजीराव मस्तानी से, पर इसे सुनकर ये मत कहिएगा कि इसे तो हमने फिल्म में देखा ही नहीं। दरअसल आजकल गाने तो स्क्रिप्ट के साथ बनते जाते हैं पर कई दफ़े फिल्म की ज्यादा लंबाई की वज़ह से इन पर कैंचियाँ भी चल जाती है। नवीं पॉयदान की  ये मीठी सी कशिश लिए हुयी शास्त्रीय बंदिश इसी कैंची का शिकार होकर फिल्म में अपनी जगह नहीं बना पायी । 

पिछले साल की प्रदर्शित फिल्मों में मुझे बाजीराम मस्तानी का एलबम अव्वल लगा। शास्त्रीयता, रोमांस, नृत्य सभी रसों का मेल था इस एलबम में। इसके कई गीत इस संगीतमाला मैं हैं तो कई को मुझे छोड़ना पड़ा। बहरहाल इस फिल्म का पहला गीत जो मैंने चुना है वो आधारित  है राग भूपाली या राग भूप पर। कर्नाटक संगीत में इस राग को राग मोहन के नाम से जाना जाता है। सरगम के सिर्फ पाँच स्वरों का इस्तेमाल करने वाले इस राग पर दिल हुम हुम करे, नील गगन की छाँव में, पंख होते तो उड़ आती रे मैं जहाँ रहूँ जैसे तमाम  कालजयी गीत बन चुके हैं।


आश्चर्य ही की बात है कि फिल्म निर्देशक के आलावा संगीत निर्देशन का भार सँभालने वाले संजय लीला भंसाली ने इस शास्त्रीय गीत के लिए दो नई आवाज़ों  पायल देव व श्रेयस पुराणिक को चुना और दोनों ने इस गीत के माध्यम से उनके विश्वास पर खरा उतरने की पूरी कोशिश की। 

पायल देव व  श्रेयस पुराणिक
खासकर पायल देव जिन्होंने अब तक बॉलीवुड में इक्का दुक्का गाने ही गाए थे ने तो उस लिहाज़ से कमाल ही कर दिया। सात आठ साल पहले मुंबई में कदम रखने वाली पायल का संगीत का सफ़र एड जिंगल्स से ही शुरु हुआ था। संगीतकारों के लिए भी गाती रहीं और उनके कुछ नग्में रुपहले पर्दे तक भी पहुँचे पर किसी ने उन्हें वो सम्मान नहीं दिलाया जितना उन्हें इस गीत को गाकर मिला।  अपने साक्षात्कारों में इस गीत के बारे में बातें करती वो फूली नहीं समाती। वे कहती हैं

"मुझे संजय सर के आफिस से एक दिन कॉल आई कि सर आपसे किसी गीत के सिलसिले में मिलना चाहते हैं। शायद उन्होंने मेरी आवाज़ पहले कहीं सुनी थी। पहले तो मुझे अपने भाग्य पर विश्वास ही नहीं हुआ। मैं वहाँ गई पर संजय सर के सामने मैं बहुत नर्वस हो गई। पहली बार गाया तो संजय सर ने समझाया कि गीत में जरूरत  से ज्यादा  हरक़तें नहीं लेनी हैं फिर उन्होंने जैसा उसे संगीतबद्ध किया था वो मुझे सुनाया। उन्हें  मेरी आवाज़ पसंद तो आई पर  उन्होंने कहा कि पूरे गीत को आराम से वापस जाकर रिकार्ड कर के भेज दो। फिर एक दिन मुझे फोन आया कि आपकी रिकार्डिग संजय सर को पसंद आ गई है। तब तक मुझे ये भी पता नहीं था कि मेरा ये गीत किस फिल्म के लिए रिकार्ड हुआ है। वो तो जब अलबेला सजन के लिए संजय सर ने मुझे फिर बुलाया तो मुझे लगा कि वो गीत भी बाजीराव मस्तानी के लिए होगा।"

तो देखा आपने की नए कलाकार  इतने नर्वस हो जाते हैं बड़े नामों के सामने कि किस फिल्म के लिए गा रहे हैं ये पूछने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते। पायल का इस गीत में साथ दिया नागपुर के श्रेयस पुराणिक ने। सुरेश वाडकर की छत्रछाया में संगीत सीखने  वाले श्रेयस की ये छोटी पर असरदार शुरुआत है। 

अब इस गीत के बारे में क्या कहें।  पियानों के नोट्स से शुरु होता हुआ ये गीत मुखड़े के बाद शहनाई के मधुर टुकड़े से मन को रससिक्त कर देता है। गीत चाहत के उस रूप को व्यक्त करता है जब प्रेमी बड़े अधिकार के साथ तन मन से अपने साथी को अंगीकार कर लेना चाहता है। तभी तो गीतकार ए एम तुराज़ प्रेम बरसाने, होठों पर होठ धरने व संग सो जाने की बात करते हैं। पर इस गीत में जिस तरह पायल जाने ना दूँगी और अब तोहे जाने ना दूँगी को निभाती हैं कि गीत सुनने के बाद भी उसका मीठा ज़ायका घंटों दिमाग में रहता  है तो आइए रात्रि के इस पहर में इस गीत के लिए बने इस गीत में थोड़ा डूबें इसके बोलों के साथ.. 


अब तोहे जाने ना दूँगी
अब तोहे जाने ना दूँगी
सौतन सी ये रैन है आई
सौतन सी ये रैन है आई
अब तोहे जाने ना दूँगी
प्रेम बरसाओ संग सो जाओ
जाने न दूँगी
अब तोहे जाने ना दूँगी

कुछ भी न बोलूँ ऐसा कर जाओ
होंठों पे मेरे होंठ धर जाओ

सुख वाली रूत जाने ना दूँगी
प्रेम बरसाओ संग सो जाओ
जाने न दूँगी
अब तोहे जाने न दूँगी

एक है मन्नत, एक है दुआ
दोनों ने इश्क की रूह को है छुआ
दायें से पढ़ या बाएँ से पढ़
फर्श से अर्श तक इश्क़ है लिखा

ना जाने ना जाने ना
ना जाने ना दूँगी
अब तोहे जाने न दूँगी
अब तोहे जाने न दूँगी
  

वार्षिक संगीतमाला 2015

 

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स्पष्टीकरण

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