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रविवार, अप्रैल 14, 2024

वार्षिक संगीतमाला 2023 : पहले भी मैं तुमसे मिला हूँ

वार्षिक संगीतमाला में अब शीर्ष के सात नग्मे रह गए हैं और उनमें से आज का गीत है फिल्म एनिमल का जिसकी मधुर धुन बनाई व गाया विशाल मिश्रा ने और बोल लिखे राजशेखर ने। यूपी बिहार की इस संगीतकार गीतकार की जोड़ी ने अपने इस गीत के माध्यम से देश विदेश में अपनी सफलता का परचम लहराया। वैसे क्या आपको पता है कि ये पूरा गीत  मात्र डेढ घंटे में ही बन कर तैयार हो गया था :) ।


संदीप वांगा ने एनिमल के पहले विशाल के साथ कबीर सिंह में काम किया था। विशाल एक अर्से से संगीत जगत में काम कर रहे थे पर कबीर सिंह के गीत कैसे हुआ कैसे हुआ..इतना जरूरी तू कैसे हुआ को युवाओं ने हाथों हाथ लिया। एक तरह से इस गीत ने विशाल की पहचान फिल्म उद्योग में बना दी। 

तीन साल बाद जब विशाल को संदीप ने अपनी नई फिल्म के लिए गाना लिखने के लिए बुलाया तो विशाल ने गीतकार के लिए राजशेखर का नाम सुझाया। राजशेखर का नाम सुझाने के पीछे विशाल के पास दो वज़हें थी। एक तो राजशेखर लिखते बहुत बढ़िया हैं और दूसरी विशेष बात ये कि कभी साथ काम करते हुए राजशेखर ने विशाल से ये कहा था कि अगर मेरा कोई गाना रणवीर पर फिल्माया गया तो कैसा दिखेगा? यानी राजशेखर की दिली तमन्ना थी कि उनका लिखा हुआ कोई गीत रणवीर पर शूट हो। विशाल के ज़ेहन में ये बात रह गई और इस तरह पहली बार राजशेखर की मुलाकात संदीप वांगा से हुई।

पहली सिटिंग में जैसे ही विशाल ने पियानो पर आरंभिक धुन बजाई, संदीप ने गाना अनुमोदित कर दिया और उस धुन पर डेढ़ घंटे के भीतर विशाल ने राजशेखर के साथ मिलकर पूरा गीत तैयार कर लिया।

संदीप वांगा की फिल्में, उनकी चुनी कहानियाँ मुझे नहीं रुचतीं इसलिए ना मैंने कबीर सिंह देखी और न ही एनिमल। पर ये जरूर है कि उनकी फिल्मों का संगीत अलहदा होता है। सतरंगा और पहले भी मैं के अलावा जिस तरह उन्होंने इस फिल्म में रहमान के सदाबहार गीत दिल है छोटा सा छोटी सी आशा की धुन का इस्तेमाल किया वो काबिलेतारीफ़ था। 

अगर किसी ने फिल्म ना देखी हो तो उन्हें ये गीत एक एक रूमानी गीत ही लगेगा पर फिल्म में दोनों ही चरित्र के बीच का लगाव सच्चे सहज प्रेम से कोसों दूर है। यही वज़ह है कि नायक राजशेखर के शब्दों में ख़ुद को टटोलता हुआ अपनी भावनाओं को लेकर थोड़ा भ्रमित नज़र आता है। 

पहले भी मैं तुमसे मिला हूँ, पहली दफा ही मिलके लगा
तूने छुआ जख्मों को मेरे, मरहम मरहम दिल पे लगा
पागल पागल हैं थोड़े, बादल बादल हैं दोनों
खुल के बरसे भीगे आ ज़रा
मैं अरसे से खुद से ज़रा लापता हूँ
तुम्हें अगर मिलूँ तो पता देना
खो ना जाना मुझे देखते देखते
तू ही ज़रिया, तू ही मंज़िल है
या के दिल है, इतना बता

विशाल का मुखड़े के पहले पियानो का टुकड़ा गीत की जान है। बाकी गिटार और ड्रम्स आवाज़ के उतार चढ़ाव के अनुरूप अपनी संगत देते हैं। विशाल संगीतकार तो अच्छे हैं ही, रूमानी गीतों को बहुत डूब कर गाते हैं।

 

फिल्म संगीत में ऐसा कई बार होता है कि आपके कई बेहतरीन काम नज़रअंदाज़ हो जाते हैं और अचानक ही कोई गीत ऐसा चमक उठता है जिसकी कल्पना भी बनाने वाले ने नहीं की होगी। नेट पर इस गीत को इतना सुना गया कि ये एक समय ये देश विदेश के Music Charts पर ट्रेंड करने लगा था। 

राजशेखर तनु वेड्स मनु के ज़माने से ही मेरे मेरे प्रिय गीतकार रहे हैं। तनु वेड्स मनु का रंगरेज़ और कितने दफ़े दिल ने कहा, करीब करीब सिंगल का जाने दे और हाल फिलहाल में उनका मिसमैच्ड में लिखा गीत ऐसे क्यूँ.... कुछ ऐसे नग्मे लगते हैं जिसमें उन्होंने इंसानी रिश्तों की बारीक पड़ताल की है। तनु वेड्स मनु हिट भी हुई पर कमाल देखिए कि उसके तीन साल बाद तक राजशेखर को ढंग का काम नहीं मिला। इसीलिए विशाल कहते हैं कि अपने आप को साबित करने के लिए आपको निरंतर लगे रहना पड़ता है और जब सफलता हाथ लगती है तो पीछे की हुई सारी मेहनत, सारे अच्छे बुरे तजुर्बे काम आते हैं

राजशेखर ने इस गीत का एक अंतरा और लिखा था जो कि नायिका के मनोभावों को व्यक्त करता है। इसे अपने एक साक्षात्कार में विशाल ने गा के सुनाया था।

तुम्हारे बदन की महक ख़्वाब सी है
मैं चाहूँ कि इसमें ही खोई रहूँ
मैं सुबहों को बाहों में अपनी छुपा के
तेरे साथ यूँ ही मैं सोई रहूँ
पूरे दिन बस तुझे देखते-देखते
पहले भी मैं तुमसे मिली हूँ, पहली दफा ही मिलके लगा
तूने छुआ जख्मों को मेरे, मरहम मरहम दिल पे लगा
पागल पागल हैं थोड़े, बादल बादल हैं दोनों
खुल के बरसे भीगे आ ज़रा


बिना किसी संगीत के भी विशाल की आवाज़ मन को छू जाती है।  वैसे बतौर गायक आपको विशाल मिश्रा कैसे लगते हैं?

वार्षिक संगीतमाला 2023 में मेरी पसंद के पच्चीस गीत
  1. वो तेरे मेरे इश्क़ का
  2. तुम क्या मिले
  3. पल ये सुलझे सुलझे उलझें हैं क्यूँ
  4. कि देखो ना बादल..नहीं जी नहीं
  5. आ जा रे आ बरखा रे
  6. बोलो भी बोलो ना
  7. रुआँ रुआँ खिलने लगी है ज़मीं
  8. नौका डूबी रे
  9. मुक्ति दो मुक्ति दो माटी से माटी को
  10. कल रात आया मेरे घर एक चोर
  11. वे कमलेया
  12. उड़े उड़नखटोले नयनों के तेरे
  13. पहले भी मैं तुमसे मिला हूँ
  14. कुछ देर के लिए रह जाओ ना
  15. आधा तेरा इश्क़ आधा मेरा..सतरंगा
  16. बाबूजी भोले भाले
  17. तू है तो मुझे और क्या चाहिए
  18. कैसी कहानी ज़िंदगी?
  19. तेरे वास्ते फ़लक से मैं चाँद लाऊँगा
  20. ओ माही ओ माही
  21. ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
  22. मैं परवाना तेरा नाम बताना
  23. चल उड़ चल सुगना गउवाँ के ओर
  24. दिल झूम झूम जाए
  25. कि रब्बा जाणदा

    शुक्रवार, जनवरी 28, 2022

    वार्षिक संगीतमाला 2021 मन केसर-केसर महके, रेशम-रेशम लागे रे Top Songs of 2021

    वार्षिक संगीतमाला में पिछले साल के बेहतरीन गीतों की इस शृंखला में दक्षिण भारतीय शादियों का माहौल बरकरार रखते हुए आज का गीत फिल्म मीनाक्षी सुंदरेश्वर से। ये गीत भले ही शादी के विधि विधानों के बीच फिल्माया गया है पर पति पत्नी के रिश्ते में बँधने के पहले दो युवा दिलों के मन में चलती प्रेमसिक्त फुलझड़ियों की झलक दिखला जाता है।


    संगीतकार जस्टिन प्रभाकरन और राजशेखर ने क्या समां बाँधा है शाश्वत सिंह और आनंदी जोशी के गाए इस युगल गीत में। गीत में गायिकाओं का मधुर कोरस, गीत के बीच में द्रुत ताल वाली गायिकी, राजशेखर की काव्यात्मक बोली में निखरते नए नए शब्द और उनका प्यारा दोहराव सब आपका ध्यान आकर्षित करते हैं।

    गीतों में शब्दों का दोहराव पहले भी होता आया है। याद कीजिए साहिर लुधियानवी साहब का लिखा मुझे जीने दो का शानदार नग्मा रात भी है कुछ भींगी भींगी, चाँद भी है कुछ मद्धम मद्धम जिसे गुनगुनाते आज भी आनंद आ जाता है। राजशेखर ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी है इस गाने में साहिर की उस शैली की शान कायम रखने में। गीत की शुरुआत में वो लिखते हैं मन केसर-केसर महके, रेशम-रेशम लागे रे...दिल चंपई-चंपई बाँधे, सिंदूरी से धागे रे और इसी रूप को आगे बढ़ाते हुए उनका ये कहना फिर खनक-खनक गई हँसी हँसी तेरी..कनक-कनक धरा हुई अभी अभी गीत की सुंदरता में चार चाँद लगा देता है।

    राज शेखर और जस्टिन प्रभाकरन 

    अंतरों में भी राजशेखर की कविता का जादू खत्म नहीं होता। मन रूमानी हो उठता है जब वो कहते हैं एक कोसा-कोसा सपना, मद्धम-मद्धम जागे रे, दिन हौले-हौले धड़के, सौंधी-सौंधी शामें रे। राजशेखर ने इस गीत में कनक (सुनहरा),कोसा(रेशमी), संदली(चंदन सी) जैसे कम प्रयुक्त होने वाले शब्दों को गीतों की भाषा से जिस तरह जोड़ा है उसके लिए वो बधाई के पात्र हैं।

    शादी के बंधन में बँध रही युवा जोड़ी की भावनाओं को बखूबी अपनी आवाज़ में उतारा है इलाहाबाद के शाश्वत सिंह और मुंबई की आनंदी जोशी ने। तमिल फिल्मों में संगीत देने वाले जस्टिन प्रभाकरन की तरह आनंदी और शाश्वत की आवाज़ कुछ ही हिंदी फिल्मों में गूँजी है पर ये दोनों कलाकार एक दशक से ज्यादा समय से संगीत की दुनिया  में सक्रिय हैं। 

    शाश्वत सिंह और आनंदी जोशी 

    शाश्वत अपना ख़ुद का संगीत रचते और गाते हैं और वो करना उन्हें सबसे अच्छा लगता है। रोज़ी रोटी और नाम के लिए बॉलीवुड तो है ही। रहमान की एकाडमी में रहकर उन्होंने संगीत के विविध पक्षों के बारे में सीखा है। आनंदी मराठी फिल्मों में बतौर गायिका सक्रिय हैं। सा रे गा मा पा में भी अपनी गायिकी का सिक्का जमा चुकी हैं। 

    जस्टिन प्रभाकरन के संगीत में गिटार, नादस्वरम और ताल वाद्यों के साथ कोरस भी एक अहम भूमिका निभाता है। तो आइए सुनते हैं ये गीत जिसे देखना अभिनेत्री सान्या मल्होत्रा की बोलती आँखों की वज़ह से और आनंदमय हो गया है।

    मन केसर-केसर महके, रेशम-रेशम लागे रे
    दिल चंपई-चंपई बाँधे, सिंदूरी से धागे रे
    सुन ओ कनमनी
    सुन ओ कनमनी शहनाई सी ये बाजे रे
    साँवली-साँवली तेरी आँख में,  से ख़ाब रे
    खनक-खनक गई हँसी हँसी तेरी
    कनक-कनक धरा हुई अभी अभी

    मन केसर-केसर महके...सिंदूरी से धागे रे
    दोनो नैनों में पिया बसे सारा-सारा
    इन्हीं नैनों में सारा मिले प्यार
    आँचल में हो पुरवा, रूनझुन तारे आँगन में
    आँगन में आँगन में

    एक कोसा-कोसा सपना, मद्धम-मद्धम जागे रे
    दिन हौले-हौले धड़के, सौंधी-सौंधी शामें रे
    हुई संदली, हुई संदली अपनी सब रातें रे
    साँवली साँवली...... अभी अभी


    वैसे इतना बता दूँ कि इस फिल्म का ये आख़िरी गीत नहीं है जो इस गीतमाला का हिस्सा बना है। :)

    वार्षिक संगीतमाला 2021 में अब तक

    अगर आप सोच रहे हों कि मैंने हर साल की तरह इस गीत की रैंक क्यूँ नहीं बताई तो वो इसलिए कि इस साल परिवर्तन के तौर पर गीत किसी  क्रम में नहीं बजेंगे और गीतों की मेरी सालाना रैंकिंग सबसे अंत में बताई जाएगी। 

    शनिवार, मार्च 31, 2018

    वार्षिक संगीतमाला 2017 रनर्स अप वो जो था ख़्वाब सा, क्या कहें जाने दे Jaane De

    हमारे यहाँ की फिल्मी कथाओं में प्रेम का कोई अक़्स ना हो ऐसा शायद ही कभी होता है। यही वज़ह है कि अधिकांश फिल्में एक ना एक रूमानी गीत के साथ जरूर रिलीज़ होती हैं। फिर भी गीतकार नए नए शब्दों के साथ उन्हीं भावनाओं को तरह तरह से हमारे सम्मुख परोसते रहते हैं। पर एक गीतकार के लिए  बड़ी चुनौती तब आती है जब उसे सामान्य परिस्थिति के बजाए उलझते रिश्तों में से प्रेम की गिरहें खोलनी पड़ती हैं।  ऐसी ही एक चुनौती को बखूबी निभाया है राज शेखर ने वार्षिक संगीतमाला 2017 के रनर्स अप गीत के लिए जो कि है फिल्म करीब करीब सिंगल से।



    राज शेखर एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं के लिए कोई नई शख़्सियत नहीं हैं । बिहार के मधेपुरा से ताल्लुक रखने वाले इस गीतकार ने अपनी शुरुआती फिल्म तनु वेड्स मनु में वडाली बंधुओं के गाए गीत रंगरेज़ से क्रस्ना के साथ मिलकर  वार्षिक संगीतमाला के सरताज़ गीत का खिताब जीता था। हालांकि तनु वेड्स मनु की सफलता राज शेखर के कैरियर में कोई खास उछाल नहीं ला पाई। तनु वेड्स मनु रिटर्न के साथ वो लौटे जरूर पर अभी भी वो फिल्म जगत में अपनी जड़े जमाने की ज़द्दोजहद में लगे हुए हैं। आजकल अपनी कविताओं को वो अपने बैंड मजनूँ का टीला के माध्यम से अलग अलग शहरों में जाकर प्रस्तुत भी कर रहे हैं। 

    करीब करीब सिंगल में राज शेखर के लिखे गीत को संगीतबद्ध किया विशाल मिश्रा ने। वैसे तो विशाल ने कानून की पढ़ाई की है और विधिवत संगीत सीखा भी नहीं पर शुरुआत से वो संगीत के बड़े अच्छे श्रोता रहे हैं  सुन सुन के ही उन्होंने संगीत की अपनी समझ विकसित की है। आज वे सत्रह तरह के वाद्य यंत्रों को बजा पाने की काबिलियत रखते हैं।  विकास ने भी इस गीत की धुन को इस रूप में लाने के लिए काफी मेहनत की। चूँकि वो एक गायक भी हैं तो अपनी भावनाओं को भी गीत की अदाएगी में पिरोया। जब गीत का ढाँचा तैयार हो गया तो उन्हें लगा कि इस गीत के साथ आतिफ़ असलम की आवाज़ ही न्याय कर सकती है। इसी वज़ह से गीत की रिकार्डिंग दुबई में हुई। ये भी एक मसला रहा कि गीत में जाने दे या जाने दें में से कौन सा रूप चुना जाए? आतिफ़ को गीत के बहाव के साथ जाने दें ही ज्यादा अच्छा लग रहा था जिसे मैंने भी महसूस किया पर आख़िर में हुआ उल्टा।

    विशाल मिश्रा, आतिफ़ असलम और राजशेखर

    राज शेखर कहते हैं कि इस गीत को उन्होंने फिल्म की कहानी और कुछ अपने दिल की आवाज़ को मिलाकर लिखा। तो आइए देखें कि आख़िर राजशेखर ने इस गीत में ऍसी क्या बात कही है जो इतने दिलों को छू गयी।

    ज़िदगी इतनी सीधी सपाट तो है नहीं कि हम जिससे चाहें रिश्ता बना लें और निभा लें। ज़िंदगी के किसी मोड़ पर हम कब, कहाँ और कैसे किसी ऐसे शख़्स से मिलेंगे जो अचानक ही हमारे मन मस्तिष्क पर छा जाएगा, ये भला कौन जानता है?  ये भी एक सत्य है कि हम सभी के पास अपने अतीत का एक बोझा है जिसे जब चाहे अपने से अलग नहीं कर सकते। कभी तो हम जीवन में आए इस हवा के नए झोंके को एक खुशनुमा ख़्वाब समझ कर ना चाहते हुए भी बिसार देने को मजबूर हो जाते हैं या फिर रिश्तों को अपनी परिस्थितियों के हिसाब से ढालते हैं ताकि वो टूटे ना, बस चलता रहे। ऐसा करते समय हम कितने उतार चढ़ाव, कितनी कशमकश से गुजरते हैं ये हमारा दिल ही जानता है। सोचते हैं कि ऐसा कर दें या फिर वैसा कर दें तो क्या होगा?  पर अंत में पलायनवादी या फिर यथार्थवादी सोच को तरज़ीह देते हुए मगर जाने दे वाला समझौता कर आगे बढ़ जाते हैं। इसीलिए राजशेखर गीत के मुखड़े में कहते हैं   

    वो जो था ख़्वाब सा, क्या कहें जाने दे
    ये जो है कम से कम ये रहे कि जाने दे
    क्यूँ ना रोक कर खुद को एक मशवरा कर लें मगर जाने दे
    आदतन तो सोचेंगे होता यूँ तो क्या होता मगर जाने दे
    वो जो था ख्वाब सा ....


    हम आगे बढ़ जाते हैं पर यादें बेवज़ह रह रह कर परेशान करना नहीं छोड़तीं। दिल को वापस मुड़ने को प्रेरित करने लगती हैं। उन बातों को कहवा लेना चाहती हैं जिन्हें हम उसे चाह कर भी कह नहीं सके। पर दिमाग आड़े आ जाता है। वो फिर उस मानसिक वेदना से गुजरना नहीं चाहता और ये सफ़र बस जाने दे से ही चलता रहता है। अंतरों में राजशेखर ने ये बात कुछ यूँ कही है..

    हम्म.. बीता जो बीते ना हाय क्यूँ, आए यूँ आँखों में
    हमने तो बे-मन भी सोचा ना, क्यूँ आये तुम बातों में
    पूछते जो हमसे तुम जाने क्या क्या हम कहते मगर जाने दे
    आदतन तो सोचेंगे होता यूँ तो क्या होता मगर जाने दे
    वो जो था ख्वाब सा ....
    आसान नहीं है मगर, जाना नहीं अब उधर
    हम्म.. आसान नहीं है मगर जाना नहीं अब उधर
    मालूम है जहाँ दर्द है वहीं फिर भी क्यूँ जाएँ
    वही कशमकश वही उलझने वही टीस क्यूँ लाएँ
    बेहतर तो ये होता हम मिले ही ना होते मगर जाने दे
    आदतन तो सोचेंगे होता यूँ तो क्या होता मगर जाने दे
    वो जो था ख्वाब सा .......


    आतिफ़ की आवाज़ गीत के उतार चढ़ावों के साथ पूरा न्याय करती दिखती है। विशाल ताल वाद्यों के साथ गिटार का इंटरल्यूड्स में काफी इस्तेमाल करते हैं। वैसे आपको जान कर अचरज होगा कि राज शेखर ने इस गीत के लिए इससे भी पीड़ादायक शब्द रचना की थी। वो वर्सन तो ख़ैर अस्वीकार हो गया और  फिलहाल राज शेखर की डायरी के पन्ने में गुम है। उन्होंने वादा किया है कि अगर उन्हें वो हिस्सा मिलेगा उसे शेयर करेंगे। तो चलिए अब सुनते हैं ये नग्मा

    वार्षिक संगीतमाला 2017

    बुधवार, जनवरी 20, 2016

    वार्षिक संगीतमाला 2015 पायदान # 17 : ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे.. O Sathi Mere..

    वर्षिक संगीतमाला का सफ़र अब मुड़ रहा हैं थिरकते, मुस्कुराते गीतों से अपेक्षाकृत गंभीर और रूमानी गीतों की तरफ़ और इस कड़ी की पहली पेशकश है सत्रहवीं पायदान पर बैठा तनु वेड्स मनु रिटर्न का ये नग्मा। संगीतकार क्रस्ना सोलो व गीतकार राजशेखर की जोड़ी इससे पहले 2011 में वार्षिक संगीतमाला के सरताज गीत यानि शीर्ष पर रहने का तमगा हासिल कर चुकी है। ज़ाहिर है जब इस फिल्म का सीक्वेल आया तो इस जोड़ी के मेरे जैसे प्रशंसक को थोड़ी निराशा जरूर हुई।

    पिछली फिल्म में शर्मा जी के प्यार का भोलापन पहली फिल्म में राजशेखर से कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े और रंगरेज़ जैसे गीत लिखा गया था। पर सीक्वेल में चरित्र बदले परिवेश बदला उसमें गीतकार संगीतकार के लिए पटकथा ने कुछ ज्यादा गंभीर व प्यारा करने लायक छोड़ा ही ना था। लिहाजा गीत संगीत फिल्म की परिस्थितियों के अनुरूप लिखे गए जो देखते समय तो ठीक ही ठाक लगे पर कानों में कोई खास मीठी तासीर नहीं छोड़ पाए। फिल्म देखने के बाद जब इस एलबम के गीतों को फिर से सुना तो एक गीत ऐसा मिला जिसे मैं फिल्म की कहानी से जोड़ ही नहीं पाया क्यूँकि शायद इसका फिल्म में चित्रांकन तो किया ही नहीं गया था। अब जब नायिका के तेवर ऐसे हों कि शर्मा जी हम बेवफ़ा क्या हुए आप तो बदचलन हो गए तो फिर शर्मा जी क्या खाकर बोल पाते कि ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे.. हाथों की अब गिरह दी ऐसे की टूटे ये कभी ना..


    बहरहाल गीत की परिस्थिति फिल्म में भले ना बन पाई हो राजशेखर के लिखे बेहतरीन बोलों और सोनू निगम की गायिकी ने इस गीत का दाखिला संगीतमाला में करा ही दिया। बिहार के मधेपुरा के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाले हुनरमंद राजशेखर के मुंबई पहुँचने की कहानी तो आपको यहाँ मैं पहले ही बता चुका हूँ। पिछले साल बिहार के चुनावों में बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो का उनका गीत खासा लोकप्रिय हुआ। बचपन में माँ पापा से नज़रे बचाकर पन्द्रह  सोलह घंटे रेडियो सुनने वाले इस बालक के लिखे गाने लोग उसी रेडियो पर बड़े चाव से सुन रहे हैं।

    ज़िदगी का खट्टा मीठा सफ़र अपने प्रियतम के साथ गुजारने की उम्मीद रखते इस गीत की सबसे प्यारी पंक्तियाँ मुझे वो लगती हैं जब राजशेखर कहते हैं..

    हम जो बिखरे कभी
    तुमसे जो हम उधड़े कहीं
    बुन लेना फिर से हर धागा
    हम तो अधूरे यहाँ
    तुम भी मगर पूरे कहाँ
    करले अधूरेपन को हम आधा

    सच अपने प्रिय से ऐसी ही उम्मीद तो दिल में सँजोए रखते हैं ना हम !

    संगीतकार क्रस्ना सोलो का नाम अगर आपको अटपटा लगे तो ये बता दूँ कि वो ये उनका ख़ुद का रचा नाम है ताकि जब वो अपने विश्वस्तरीय संगीतज्ञ बनने का सपना पूरा कर लें तो लोगों को उनके नाम से ख़ुद को जोड़ने में दिक्कत ना हो। वैसे माता पिता ने उनका नाम अमितव सरकार रखा था। क्रस्ना ने इस गीत की जो धुन रची है वो सामान्य गीतों से थोड़ी हट के है और इसीलिए उसे मन तक उतरने में वक़्त लगता है। मुखड़े के बाद का संगीत संयोजन गीत के बोलों जितना प्रभावी नहीं है। रही गायिकी की बात तो कठिन गीतों को चुनौती के रूप में स्वीकार करना सोनू निगम की फितरत रही है। इस गीत में बदलते टेम्पो को जिस खूबसूरती से उन्होंने निभाया है वो काबिले तारीफ़ है। तो आइए सुनें ये गीत..

     

    ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे..
    हाथों की अब गिरह दी ऐसे
    की टूटे ये कभी ना..

    चल ना कहीं सपनों के गाँव रे
    छूटे ना फिर भी धरती से पाँव रे
    आग और पानी से फिर लिख दें वो वादे सारे
    साथ ही में रोए हँसे, संग धूप छाँव रे
    ओ साथी मेरे..

    हम जो बिखरे कभी
    तुमसे जो हम उधड़े कहीं
    बुन लेना फिर से हर धागा
    हम तो अधूरे यहाँ
    तुम भी मगर पूरे कहाँ
    कर ले अधूरेपन को हम आधा
    जो भी हमारा हो मीठा हो या खारा हो
    आओ ना कर ले हम सब साझा
    ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे ..

     गहरे अँधेरे या उजले सवेरे हों
    ये सारे तो हैं तुम से ही
    आँख में तेरी मेरी उतरे इक साथ ही
    दिन हो पतझड़ के रातें या फूलों की
    कितना भी हम रूठे पर बात करें साथी
    मौसम मौसम यूँ ही साथ चलेंगे हम
    लम्बी इन राहों में या फूँक के फाहों से
    रखेंगे पाँव पे तेरे मरहम

    आओ मिले हम इस तरह
    आए ना कभी विरह
    हम से मैं ना हो रिहा
    हमदम तुम ही हो
    हरदम तुम ही हो
    अब है यही दुआ
    साथी रे उम्र के सलवट भी साथ तहेंगे हम
    गोद में ले के सर से चाँदी चुनेंगे हम
    मरना मत साथी पर साथ जियेंगे हम
    ओ साथी मेरे..  

    वार्षिक संगीतमाला 2015

    गुरुवार, अगस्त 01, 2013

    कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े : क्या आप 'शर्मा जी' जैसा बनना नहीं चाहेंगे?

    पिछले हफ्ते टीवी पर तनु वेड्स मनु दोबारा देखी। फिल्म तो ख़ैर दोबारा देखने पर भी उतनी ही मजेदार लगी जितनी पहली बार लगी थी पर 'शर्मा जी (माधवन)' का चरित्र इस बार दिल में कुछ और गहरे बैठ गया। कितनी दुत्कार, कितनी झिड़कियाँ सहते रहे पर हिम्मत नहीं हारी उन्होंने।  कोशिश करते रहे, नाकामयाबी हाथ लगी तो उसे ही समय का तकाज़ा मान कर ना केवल स्वीकार कर लिया पर अपने रकीब की सहायता करने को भी तैयार हो गए। मन के अंदर हाहाकार मचता रहा पर प्रकट रूप में अपने आप को विचलित ना होने दिया। पर शर्मा जी एकदम से दूध के धुले भी नहीं हैं वक़्त आया तो कलम देने से कन्नी काट गए।  आखिर शर्मा जी इंसान ही थे, धर्मराज युधिष्ठिर तक अश्वथामा का इतिहास भूगोल बताए बगैर उसे दुनिया जहान से टपका गए थे। अब इतना तो बनता है ना 'इसक' में ।


    दिक्कत यही है कि आज कल की ज़िदगी में 'शर्मा जी' जैसे चरित्र मिलते कहाँ हैं? आज की पीढ़ी प्यार में या परीक्षा में नकारे जाने को खुशी खुशी स्वीकार करने को तैयार दिखती ही नहीं है। अब आज के अख़बार की सुर्खियाँ देखिए। प्रेम में निराशा क्या हाथ लगी  चल दिए हाथ में कुल्हाड़ी लेकर वो भी जे एन यू जैसे भद्र कॉलेज में। इंतज़ाम भी तिहरा था। कुल्हाड़ी से काम ना बना तो पिस्तौल और छुरी तो है ही।

    आजकल हो क्या रहा है इस समाज को? जब मर्जी आई एसिड फेका, वो भी नहीं तो अगवा कर लिया। क्या इसे प्रेम कहेंगे ? इस समाज को जरूरत है शर्मा जी जैसी सोच की। उनके जैसे संस्कार की। नहीं तो वक़्त दूर नहीं जब प्रेम कोमल भावनाओं का प्रतीक ना रह कर घिन्न और वहशत का पर्यायी बन जाएगा।

    दरअसल 'शर्मा जी' का जिक्र छेड़ने के पीछे  मेरा एक और प्रयोजन था। आपको तनु वेड्स मनु के उस खूबसूरत गीत को सुनवाने का जिसे मेरे पसंदीदा गीतकार राजशेखर ने लिखा था। लिखा क्या था 'शर्मा जी' के दिल के मनोभावों को हू बहू काग़ज़ पर उतार दिया था।

    संगीतकार कृष्णा जिन्हें 'क्रस्ना' के नाम से भी जाना जाता है और राजशेखर की जोड़ी के बारे में तो आपको यहाँ बता ही चुका हूँ। सनद रहे कि ये वही राजशेखर हैं जो आजकल फिल्म 'इसक' में ऐनिया ओनिया रहे हैं यानि सब एन्ने ओन्ने कर रहे हैं। 

    गीत में क्रस्ना बाँसुरी का इंटरल्यूड्स में बेहतरीन इस्तेमाल करते हैं। मोहित चौहान रूमानी गीतों को निभाने में वैसे ही माहिर माने जाते हैं पर यहाँ तो एकतरफा प्रेम के दर्द को भी वो बड़े सलीके से अपनी आवाज़ में उतार लेते हैं। 


    कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े
    वैसे तो तेरी ना में भी मैंने ढूँढ़ ली अपनी ख़ुशी
    तू जो गर हाँ कहे तो बात होगी और ही
    दिल ही रखने को कभी, ऊपर-ऊपर से सही, कह दे ना हाँ
    कह दे ना हाँ, यूँ ही
    कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े

    कितने दफ़े हैराँ हुआ मैं ये सोचके
    उठती हैं इबादत की ख़ुशबुएँ क्यूँ मेरे इश्क़ से
    जैसे ही मेरे होंठ ये छू लेते हैं तेरे नाम को
    लगे कि सजदा किया कहके तुझे शबद के बोल दो
    ये ख़ुदाई छोड़ के फिर आजा तू ज़मीं पे
    और जा ना कहीं, तू साथ रह जा मेरे
    कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े

    कितने दफ़े मुझको लगा, तेरे साथ उड़ते हुए
    आसमानी दुकानों से ढूँढ़ के पिघला दूँ मैं चाँद ये
    तुम्हारे इन कानों में पहना भी दूँ बूँदे बना
    फिर ये मैं सोच लूँ समझेगी तू, जो मैं न कह सका
    पर डरता हूँ अभी, न ये तू पूछे कहीं, क्यूँ लाए हो ये
    क्यूँ लाए हो ये, यूँ ही
    कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े

    वैसे भी ये गीत उन सबको अच्छा लगेगा जिनमें शर्मा जी के चरित्र का अक़्स है। मुझमें तो है और आपमें?

    गुरुवार, मार्च 01, 2012

    वार्षिक संगीतमाला 2011 :सरताज गीत - ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है !

    वार्षिक संगीतमाला 2011 के सफ़र में दो महिने साथ चलते चलते वक़्त आ गया है सरताज गीत की घोषणा का। इस गीत का दारोमदार सँभाल रही है एक युवा संगीतकार और गीतकार की जोड़ी जिन्होंने अपने पहले प्रयास में वो कर दिखाया है,जिसे करने में मँजे हुए कलाकारों को वर्षों लगेंगे। इस फिल्म के गीत संगीत को मिल रही मक़बूलियत का अंदाज़ा शायद उन्हें भी इसे बनाते वक़्त ना रहा हो। ये गीत है फिल्म तनु वेड्स मनु का जिसे लिखा है राजशेखर ने और जिसकी धुन बनाई है कृष्णा ने। इस गीत के दो रूप हैं जिसमें एक में स्वर है वडाली बंधुओं का और दूसरा वर्जन जो फिल्म में प्रयुक्त हुआ है उसे आवाज़ दी है कृष्णा ने। तो आइए जानते हैं पहले इन दोनों प्रतिभावान गीतकार संगीतकार की जोड़ी के बारे में। 


    इस गीत के सिलसिले में राजशेखर से मेरी लंबी बातचीत हुई और सच बताऊँ बड़ा अच्छा लगा उत्तर बिहार में मधेपुरा के एक किसान परिवार में जन्मे इस कलाकार से बात कर। जैसा कि बिहार में आमतौर पे होता है राजशेखर को भी हाईस्कूल करने के बाद इंजीनियरिंग की कोचिंग के लिए पटना भेजा गया। राजशेखर उन दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि कैलकुलस के सवाल देखते ही उनका दिमाग शून्य हो जाया करता था। कोचिंग आने जाने से ज्यादा उन्हें रास्ते में हिंदी किताबों की दुकानों पर बैठ कर साहित्यिक पुस्तकों के पन्ने पलटना अच्छा लगता। एक दिन पिता से साफ साफ कह दिया कि ये पढ़ाई अब मेरे से नहीं होगी और जा पहुँचे दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज। वहीं से हिंदी में एमए किया। कॉलेज में रहते ही उन्हें रंगमंच का चस्का लगा और केएमसी की नाट्य संस्था “द प्लेयर्स” से बतौर अभिनेता और निर्देशक बने। कुछ दिनों तक NDTV में नौकरी भी की पर वो भी उन्हें रास नहीं आई। दिल्ली से मुंबई जाने की कहानी के बारे में वे कहते हैं  
    "दोस्तों के बहकावे में आकर 2004 के एक बेनाम दिन मुँह उठाए और एक बैग लिए मुंबई आए। जाने माने निर्देशकों को एसिस्ट करने के नाम पर क्लर्की कबूल नहीं की और फिल्म लेखन की दुनिया में आ गए। बीच-बीच में ‘अनवर’ और ऐसी ही दूसरी फिल्मों में छोटे-मोटे रोल कर दोस्तों को अपने मुंबई में रहने और स्ट्रगल करने का भान कराते रहे। 2011 में अपनी शादी इसलिए नहीं की क्योंकि तन्नू और मन्नू की शादी के गीत लिखने थे।"
    राजशेखर की मुलाकात तनु वेड्स मनु के निर्देशक आनंद राय से उनके एक मित्र व फिल्म के पटकथा लेखक हिमांशु ने करवाई। फिल्म के लिए वैसे तो पहला गीत उन्होंने 'मन्नू भैया का करिहें' लिखा जो आनंद को पसंद आ गया। पर जब उन्होने आनंद को रंगरेज़ सुनाया तो वे एकदम से सन्न रह गए और फिर उन्होंने राजशेखर को गले से लगा लिया। गीतों का चुनाव तो हो चुका था अब खोज थी एक अदद संगीतकार की जो की कृष्णा के रूप में पूरी हुई।

    राजशेखर की तरह ही कृष्णा को गीत संगीत विरासत में नहीं मिला था। अहमदाबाद के NID से फिल्म और वीडिओ कम्यूनिकेशन पढ़ने वाले कृष्णा अपने सांगीतिक हुनर का श्रेय गुरु जवाहर चावड़ा को देते हैं। मुंबई में अपने शुरुआती दौर में कृष्णा विज्ञापन फिल्मों, डाक्यूमेंट्री में संगीत देने का काम करते रहे और साथ ही गुरु से संगीत की शिक्षा भी लेते रहे। राजशेखर के ज़रिए आनंद से हुई मुलाकात ने उन्हें फिल्म संगीतकार बनने का पहला मौका दिला दिया।

    राजशेखर और कृष्णा से तो आप मिल लिए आइए अब जानते हैं कि रंगरेज़ को अपने गीत कें केंद्रबिंदु में रखने का ख्याल राजशेखर को आया कैसे? राजशेखर इस बारे में कहते हैं..

    " जब मैं कॉलेज में था तो अक्सर लड़कियों को बेरंगी चुन्नियों को रंगवाने पास के कमला नगर मार्केट ले जाते देखता था। मुझे तभी से रंगरेज़ की शख्सियत से एक तरह का फैसिनेशन यानि लगाव हो गया था। जब आनंद ने मुझे गीत की परिस्थितियाँ बतायीं  तो मन की तहों में दबे उस रंगरेज़ का चेहरा मेरे फिर सामने आ गया।"
    राजशेखर के बोल तो लाजवाब हैं ही कृष्णा की सांगीतिक समझ की भी दाद देनी होगी कि जिस तरह से इस मुश्किल से गीत को कम्पोज किया। कृष्णा इस बारे में कहते हैं

    "मुझे पता था कि ये गीत एक ऐसे प्रेमी के दिल के हाल को व्यक्त कर रहा है जो पूरी तरह अपनी प्रेमिका पर आसक्त होने के बावजूद भी अपने दिल की बात नहीं कह पा रहा। जब जब व्यक्ति अपने हृदय को ऐसे चक्रवात में फँसा पाता है तो  प्रेम प्रेम नहीं रह जाता वो उससे ऊपर उठता हुआ निष्काम भक्ति का रूप ले लेता है। कव्वाली और सूफ़ियाना संगीत ऐसी भावनाओं को उभारने के लिए सबसे सटीक माध्यम हैं। बतौर संगीतकार इस गीत में मैंने मुखड़े और अंतरों के बँधे बँधाए ढर्रे से अलग कुछ करने की कोशिश की है। इस गीत को सुनने वालों ने जरूर ध्यान दिया होगा मुखड़ा शुरु के बाद फिर एकदम आख़िर में बजता है। मैं नहीं चाहता था कि राजशेखर के शब्दों का प्रवाह इंटरल्यूड्स के संगीत से टूट जाए।"
    कृष्णा कितना सही कह रहे हैं ये आपको गीत सुनकर ही समझ आ जाएगा। जैसे जैसे गीत आगे बढ़ता है आप पर गीत का सुरूर छाने लगता है। गीत सुनते वक़्त मुझे तो ऐसा लगता है कि ख़ुदा की इबादत कर रहा हूँ। गीत का टेम्पो जैसे जैसे बढ़ता है मन पूर्ण समर्पण और भक्ति के पृथक संसार में जा पहुँचता है। संगीत के रूप में भारतीय वाद्यों के  साथ में ताली की उत्तरोत्तर गति पकड़ती थाप मन पर जादू सा असर करती है। तो आइए सुनें कृष्णा की आवाज़ में ये गीत !



    ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे
    ये बात बता रंगरेज़ मेरे
    ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है
    ये कौन से पानी में तूने कौन सा रंग घोला है
    कि दिल बन गया सौदाई
    मेरा बसंती चोला है, मेरा बसंती चोला है
    अब तुम से क्या मैं शिकवा करूँ
    मैने ही कहा था ज़िद कर के
    रंग दे चुनरी पी के रंग में
    रंग रंग दे रंग दे चुनरी पी के रंग में
    पर मुए कपास पे रंग ना रुके
    रंग इतना गहरा तेरा कि जान-ओ-जिगर तक को भी रंग दे
    जिगर रंग दे....

    रंगरेज़ तूने अफ़ीम क्या है खा ली
    जो मुझसे तू यह पूछे कि कौन सा रंग
    रंगों का कारोबार है तेरा
    ये तू ही तो जाने कौन सा रंग
    मेरा बालम रंग, मेरा साजन रंग
    मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग
    मेरा फाग़न रंग, मेरा सावन रंग
    पल पल रंगते रंगते मेरे आठों पहर मनभावन रंग

    इक बूँद इश्क़ियाँ डाल कोई तू
    इक बूँद इश्क़ियाँ डाल कोई मेरे सातों समंदर जाए रंग
    मेरी हद भी रंग, सरहद भी रंग दे
    बेहद रंग दे, अनहद भी रंग दे
    मंदिर, मस्जिद, मैकद रंग

    रंगरेज़ मेरे, रंगरेज़ मेरे, रंगरेज़ मेरे
    रंगरेज़ मेरे दो घर क्यूँ रहे
    एक ही रंग में दोनो घर रंग दे, दोनो रंग दे
    पल पल रंगते रंगते, रंगते रंगते
    नैहर पीहर का आँगन रंग
    पल पल रंगते रंगते रंगते रंगते
    मेरे आठों पहर मनभावन रंग

    नींदे रंग दे, करवट भी रंग
    ख़्वाबों पे पड़े सलवट भी रंग
    यह तू ही है, हैरत रंग दे
    आ दिल में समा हसरत रंग दे
    आजा हर वसलत रंग दे
    जो आ ना सके तो फुरक़त रंग दे

    दर्द-ए-हिजरां लिए दिल में,
    दर्द-ए-हिजरां लिए दिल में, दर्द ए, मैं ज़िंदा रहूँ
    मैं ज़िंदा रहूँ, ज़ुररत रंग दे
    रंगरेज़ मेरे, रंगरेज़ मेरे
    तेरा क्या है अस्ल रंग अब तो यह दिखला दे


    मेरा पिया भी तू, मेरी सेज भी तू
    मेरा रंग भी तू, रंगरेज़ भी तू
    मेरी नैया भी तू, मँझधार भी
    तुझ में डूबू, तुझ में उभरूँ
    तेरी हर एक बात सर आँखों पे
    मेरा मालिक तू, मेरा साहिब तू
    मेरी जान, मेरी जान तेरे हाथों में
    मेरा क़ातिल तू, मेरा मुनसिफ़ तू
    तेरे बिना कुछ सूझे ना, तेरे बिना कुछ सूझे ना
    मेरी राह भी तू, मेरा रहबर तू
    मेरा सरवर तू, मेरा अकबर तू
    मेरा मशरिक़ तू, मेरा मगरिब तू
    ज़ाहिद भी मेरा, मुर्शिद भी तू

    अब तेरे बिना मैं जाऊँ कहाँ, जाऊँ कहाँ
    तेरे बिना अब जाऊँ कहाँ, तेरे बिना अब मैं जाऊँ कहाँ

    तेरे बिना, तेरे बिना …..

    ऐ रंगरेज़ मेरे, ऐ रंगरेज़ मेरे... मेरा बसंती चोला है
    वडाली बंधुओं ने भी अपने गायन से इस गीत को एक अलग ऊँचाइयाँ दी हैं। वडाली बंधुओं इस गीत में इतना रमे कि गीत की रिकार्डिंग खत्म होने में बारह घंटे लग गए। बीच में जब उन्हें कृष्णा ने विराम लेने के लिए पूछा तो उनका जवाब था

    "बेटा जब हम स्टेज पर चढ़ते हैं तो दुनिया भूल जाते हैं और आज अगर गाते गाते चौबीस घंटे भी हो जाएँ तो हम गाकर ही उठेंगे।"
    तो आइए सुनते हैं पूरनचंद और प्यारेलाल वडाली द्वा गाया ये गीत...


    कंगना और माधवन पर फिल्माए इस गीत को आप यहाँ देख सकते हैं..


    इसी के साथ वार्षिक संगीतमाला 2011 की ये यात्रा यहीं समाप्त हुई। जो लोग इस सफ़र में साथ बने रहे उनका मैं हृदय से आभारी हूँ। पिछले छः वर्षों से चल रहे सिलसिले के प्रति आपका प्रेम ही मेरा प्रेरणास्रोत रहा है।

     

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    स्पष्टीकरण

    इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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