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मंगलवार, मई 28, 2019

यादें रवींद्र जैन की : घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं.. Ghunghroo Ki Tarah

अक्सर हम अपने मूड के हिसाब से गीतों को सुनते हैं पर कई दफ़ा ऐसा होता है कि चाहे हम किसी भी मूड में हों कोई गीत अचानक बज कर हमें अपने रंग में रंग लेता है। मेरे साथ पिछले हफ्ते ऐसा ही हुआ। कार्यालय जाने की तैयारी करते वक़्त सारेगामा कारवाँ से घुँघरू की तरह....ये गीत गूँजा और फिर दिन भर मेरे साथ ही रह गया। कॉलेज के ज़माने में किशोर दा के गीतों को हम थोक में सुनते थे। फिल्म चोर मचाए शोर का ये गीत भी उस दौर में मुझे काफी पसंद था। आजकल जब किशोर दा को सुनना पहले से काफी कम हो गया है तो अचानक इन गीतों को सुनकर वो पुराना वक़्त सामने आ जाता है।


1974 में रिलीज़ हुई इस फिल्म के संगीतकार थे रवींद्र जैन साहब। यूँ तो इस फिल्म के तीन गीत बहुत चले थे पर उनमें से एक की तकदीर इतनी अच्छी रही कि वो साल दर साल शादी विवाह के मौसम में बारहा बजता रहा। जी हाँ वही ले जाएँगे ले जाएँगे दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे.. रह जाएँगे रह जाएँगे पैसे वाले देखते रह जाएँगे। जानते हैं इस कालजयी गीत को किसने लिखा था? इसे लिखने वाले थे पंजाब के प्रसिद्ध कवि इंद्रजीत सिंह तुलसी जिन्हें अपने पंजाबी, उर्दू और हिंदी में रचे काव्य के लिए पंजाब के राजकवि से लेकर पद्मश्री सम्मान तक मिला। इस फिल्म के गीत एक डाल पर तोता बोले एक डाल पर मैना  भी तुलसी जी की ही रचना थी।

रवींद्र जैन ने अपनी किताब सुनहरे पल में ले जाएँगे ले जाएँगे का जिक्र करते हुए लिखा है
"चोर मचाए शोर के एक गीत के लिए मैंने ढेर सारी  धुनें बनाई। कोई सिप्पी साहब को पसंद नहीं आती तो कोई अशोक राय जी को नहीं जँचती। तंग आकर मैंने सोचा की इस फ़िल्म से नाता तोड़ लिया जाए। सिटिंग से उठते उठते एक धुन यूँ ही हारमोनियम पर बजाई। सारे सुनने वाले एक सुर में, एक मत होकर कहने लगे - इसी धुन की तो तलाश थी। स्वरों को शब्दों का जमा पहनाया गया, तब प्रकट हुवा ' ले जाएँगे, ले जाएँगे दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे। जिस गाने के बिना आज भी कोई बारात नहीं निकलती।"
फिल्म के बाकी गीत ख़ुद संगीतकार रवींद्र जैन ने लिखे थे। मुझे नहीं लगता कि हिंदी फिल्म संगीत में रवींद्र जैन के आलावा कोई और संगीतकार हुआ हो जिसने बतौर गीतकार भी अपनी अमिट छाप छोड़ी हो। घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं  सुनकर ऐसा लगता है मानो उनके जीवन में सहे गए कष्टों की प्रतिध्वनि मिल गयी हो। 


अलीगढ़ के एक पढ़े लिखे परिवार से ताल्लुक रखने वाले रवींद्र जैन बचपन से ही दृष्टिहीन थे। बड़े भाई स्कूल में प्राध्यापक थे। रवींद्र तो किताबें पढ़ नहीं पाते थे। ऐसी स्थिति में उनके भाई साहित्यकारों की रचनायें उन्हें पढ़ कर सुनाते थे। साहित्य से इस तरह पनपा उनका अनुराग गीतों के माध्यम से उनकी लेखनी में उतर आया। फिल्मी दुनिया से दूर रहकर भी उन्होंने लेखनी का दामन नहीं छोड़ा। 'दिल की नज़र से' नाम से उनका ग़ज़ल संग्रह छपा। अपनी आत्मकथा 'सुनहरे पल' के आलावा उन्होंने भक्ति लेखन में अपने झंडे गाड़े। ना केवल उन्होंने गीता का सरल हिंदी में अनुवाद किया बल्कि रवींद्र रामायण नाम से एक पुस्तक भी लिख डाली।

ये गीत राग झिंझोटी पर आधारित है। राग झिंझोटी रात्रि के दूसरे पहर में गाया जाने वाला राग है। किशोर के कई उदास करने वाले लोकप्रिय गीत कोई हमदम ना रहा, कोरा  कागज था ये मन मेरा, तेरी दुनिया से हो कर मजबूर चला  राग झिंझोटी की स्वरलहरियों के ताने बाने में बुने गए हैं। 

बाँसुरी के मधुर स्वर से गीत का प्रील्यूड शुरु होता है। इंटरल्यूड्स में भी वही मधुरता कायम रहती है। जिसने जीवन में दर दर ठोकरें खाई हों, भाग्य के खिलाफ लड़ा हो वो इस सहज पर दिल से लिखे गीत से जरूर मुत्तासिर होगा। इस गीत में रवी्द्र जी ने घुँघरू जैसे रूपक का कितना प्यारा और भावनात्मक प्रयोग किया  जिसे किशोर दा की आवाज़ एक अलग मुकाम पर ले गयी। फिल्म में इस गीत के पहले दो अंतरों का इस्तेमाल हुआ है जबकि मुझे तीसरा अंतरा इस गीत का सबसे भावनात्मक हिस्सा लगता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को.. 

घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं
कभी इस पग में, कभी उस पग मैं
बँधता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं 

कभी टूट गया, कभी तोड़ा गया
सौ बार मुझे फिर जोड़ा गया
यूँ ही लुट लुट के और मिट मिट के
बनता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं...

मैं करता रहा, औरों की कही
मेरी बात मेरे, मन ही में रही
कभी मंदिर में, कभी महफ़िल में
सजता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं... 

अपनों में रहे, या गैरों में
घुँघरू की जगह तो है पैरों में
फिर कैसा गिला, जग से जो मिला
सहता ही रहा हूँ मैं
घुँघरू की तरह, बजता ही रहा हूँ मैं


 

इस गीत को फिल्माया गया था शशि कपूर पर

शनिवार, नवंबर 04, 2017

तू जो मेरे सुर में, सुर मिला ले, संग गा ले... Tu jo Mere Sur Mein..Songs of Chitchor

बहुत कम ही ऐसी फिल्में होंगी जिसका हर एक इक नग्मा मकबूलियत की सीढ़ियाँ चढ़ने में कामयाब रहा हो। चितचोर ऐसे ही एक फिल्म थी जिसके चारों गाने बेहद मशहूर  हुए। येशुदास की शानदार आवाज़, हेमलता का सुरीला साथ और रवींद्र जैन के सहज व कोमल बोलों और अद्भुत संगीत की वज़ह से ही ये कमाल संभव हो पाया था। पिछले महीने आपसे बाते हुई थी चितचोर के दो गीतों जब दीप जले आना.. और गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा के बारे में। आज चर्चा करते हैं इसी फिल्म के अन्य दो गीतों की।
  
आज से पहले आज से ज्यादा इस फिल्म का सबसे  खुशनुमा गाना था जो  गाँव की जुबान पर वक़्त चढ़ गया था। गीत की लय, शब्दों की धनात्मक उर्जा और उस पर येशुदास की आवाज़ को सुनकर श्रोता इसे गुनगुनाने को मजबूर हो जाया करते थे।

आज से पहले आज से ज्यादा
खुशी आज तक नहीं मिली
इतनी सुहानी ऐसी मीठी
घड़ी आज तक नहीं मिली

इसी फिल्म का एक बेहद सुरीला गीत था तू जो मेरे सुर में सुर मिला ले.....  जिसमें येशुदास का साथ दिया था हेमलता ने। राजश्री प्रोडक्शंस तमाम फिल्मों में रवींद्र जैन ने हेमलता से बड़े प्यारे नग्मे गवाए हैं। अक्सर लोग जानना चाहते हैं कि रवींद्र जैन हेमलता के संपर्क में कैसे आए और उन्होंने लता के बजाए हेमलता को इतना प्रश्रय क्यूँ दिया?  इस प्रश्न का जवाब देने के लिए आपको हेमलता के हिंदी फिल्म संगीत में बतौर पार्श्वगायिका स्थापित होने के पहले के सफ़र को जानना होगा। 


हेमलता के पिता पंडित जयचंद भट्ट लाहौर के किराना घराने से जुड़े प्रख्यात शास्त्रीय गायक व संगीतज्ञ थे। संगीत का माहौल बचपन से होने के बावज़ूद हेमलता के मारवाड़ी ब्राह्मण पिता रूढ़िवादी विचारों के थे और लड़कियों के सार्वजनिक रूप से गायन को अच्छा नहीं मानते थे। पर हेमलता को बचपन से ही गाने में रुचि थी। तब हेमलता का परिवार कोलकाता में रहा करता था। उनकी प्रतिभा को देखते हुए उनके पिता के एक शिष्य ने चुपके से दुर्गा पूजा के उपलक्ष्य में हो रहे संगीत समारोह में सात साल की हेमलता को गाने का मौका दे दिया। उस कार्यक्रम में रफ़ी, किशोर, हेमंत व लता जैसे मशहूर पार्श्व गायकों को बुलाया गया था। हेमलता ने जब लता जी का गाना गाया तो भीड़ अति उत्साहित हो उठी और उनसे और गाने की फर्माइश करने लगी। नतीजा ये हुआ कि उन्हें उस दिन  एक के बजाए एक दर्जन गीत गाने पड़े और आयोजकों ने उनकी इस उपलब्धि पर उन्हें बेबी लता का नाम देकर एक गोल्ड मेडल भी दे डाला। इस कार्यक्रम में उनके पिता को भी बुलाया गया था। उनकी गायिकी को सुन पिता का भी दिल पसीज़ा और वो उन्हें मुंबई भेजने को राजी हो गए।

हेमलता

हेमलता के मुंबई जाने के कुछ साल पूर्व रवींद्र जैन संगीत प्रभाकर बनने के बाद उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता आए थे। उन्होंने इस दौरान पंडित जयचंद भट्ट से भी शिक्षा ली। यहीं उनकी मुलाकात बेबी लता यानि हेमलता से हुई। गुरु से सीखने के बाद वो अपनी कुछ रचनाएँ हेमलता से भी गवाते। हेमलता को हिंदी फिल्मों में पहला मौका रवींद्र जैन ने नहीं दिया। हेमलता कुछ दिनों तक संगीतकार नौशाद की शागिर्द रहीं पर उन्होंने अपने पहले कुछ गीत उषा खन्ना और कल्याणजी आनंदजी के लिए गाए।

सत्तर के दशक में जब रवींद्र जैन अपने को स्थापित कर रहे थे तब हेमलता सौ से ज्यादा गीत गा चुकी थीं पर ये भी सच है कि हेमलता के ढीले ढाले चलते कैरियर में पंख रवींद्र जी ने ही लगाए। फकीरा का उनका खूब लोकप्रिय हुआ गीत फकीरा चल चला  चल रवींद्र जैन का ही संगीतबद्ध था।

लता जी रवींद्र जैन की पसंदीदा गायिका थीं पर एक तो उन्हें नया संगीतकार होने की वज़ह से लता जी का समय नहीं मिल पाता था और दूसरी ओर लता भी उनकी नई नई आवाजों को ज्यादा बढ़ावा देने के रवैये से खुश नहीं रहती थीं। यही वज़ह रही कि हेमलता का नाम रवींद्र जैन के रचे संगीत में बारहा आता रहा।

लौटते हैं चितचोर के इस गीत की तरफ़। रवींद्र जैन अपनी फिल्मों में पार्श्व संगीत  यानि Background Music से लेकर अपने गाने के संगीत संयोजन को खुद ही देखते थे। उनका मानना था कि हर गीत में एक आत्मा होती है जो उसके राग और रचना से मिल कर निकलती है। इसीलिए गीतों के अंदर वाद्य यंत्रों का संयोजन इस तरह से होना चाहिए कि संगीत गीत की आत्मा के अनुरूप बहे। तू जो मेरे सुर में.. को उन्होंने राग पीलू पर संगीतबद्ध किया था। इस गीत के इंटरल्यूड्स में बाँसुरी, सितार और तबले की संगत देखते ही बनती है। उनका कमाल इस बात में था कि वो सरगम को भी इन इंटल्यूड्स में खूबसूरती से पिरोते थे। 

मुझे ये बड़ा ही सच्चा सहज और अपना सा गीत लगता है। वक़्त के साथ प्रेम को व्यक्त करने के तौर तरीके बदल भले गए हों पर मुझे तो अभी भी प्रेम की परिभाषा का एक रूप रवींद्र जैन के इन बोलों में उतर आया दिखता है जब वो कहते हैं...चाँदनी रातों में, हाथ लिए हाथों में....डूबे रहें एक दूसरे की, रस भरी बातों में...तू जो मेरे संग में, मुस्कुरा ले, गुनगुना ले....तो ज़िंदगी हो जाए सफ़ल..तू जो मेरे मन को..

हेमलता को इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर एवार्ड मिला था जबकि गोरी तेरा गाँव के लिए येशुदास राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने में सफल रहे थे। तो आइए एक बार फिर सुनें इस गीत को


तू जो मेरे सुर में, सुर मिला ले, संग गा ले
तो ज़िंदगी हो जाए सफ़ल
तू जो मेरे मन को, घर बना ले, मन लगा ले
तो बंदगी हो जाए सफ़ल...तू जो मेरे सुर में

चाँदनी रातों में, हाथ लिए हाथों में
डूबे रहें एक दूसरे की, रस भरी बातों में
तू जो मेरे संग में, मुस्कुरा ले, गुनगुना ले
तो ज़िंदगी हो जाए सफ़ल..तू जो मेरे मन को..

क्यूँ हम बहारों से, खुशियाँ उधार लें
क्यूँ ना मिलके हम खुद ही अपना जीवन सँवार लें
तू जो मेरे पथ में, दीप उगा ले हों उजाले
तो बंदगी हो जाए सफ़ल..तू जो मेरे सुर में..


रविवार, अक्टूबर 15, 2017

जब दीप जले आना, जब शाम ढले आना Songs of Chitchor : Jab Deep Jale Aana ...Part- I

रवींद्र जैन को गुजरे दो साल हो गए हैं। नौ अक्टूबर 2015 को उन्होंने हमसे विदा ली थी।  यूँ तो करीब चार दशकों के सक्रिय कैरियर में उन्होंने दर्जनों फिल्में की पर सत्तर के दशक में राजश्री प्रोडक्शन के लिए उन्होंने जो काम किया वो उनका सर्वश्रेष्ठ रहा। कल उनके उसी दौर के संगीतबद्ध गीत सुन रहा था और चितचोर पर आकर मेरी सुई जो अटकी तो अटकी ही रह गयी। ग्रामीण परिवेश में बनाई हुई एक रोमांटिक और संगीतमय फिल्म थी चितचोर। अमोल पालेकर और जरीना वहाब द्वारा अभिनीत इस फिल्म के हिट होने का एक बड़ा कारण इसका संगीत था। यूँ तो सिर्फ चार गीत थे फिल्म में पर रवींद्र जैन ने अपने बोलों और संगीत से श्रोताओं के मन में जो जादू जगाया था वो आज चार दशकों तक क़ायम है।

 
चितचोर 1976 में आई थी। तब तो मेरी संगीत सुनने की उम्र नहीं थी। पर इस फिल्म के गीतों की लोकप्रियता इतनी थी कि अस्सी के दशक में रेडियो पर कोई महीना नहीं गुजरता था जब चितचोर के गीत ना सुनाई पड़ते हों। इनमें जो गीत सबसे ज्यादा बजता था वो था गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा..। राग पलासी और लोकसंगीत को जोड़ता हुआ ये गीत येशुदास की  हिंदीभाषी जनमानस में लोकप्रियता का बड़ा बीज बो गया। गीत की धुन तो कमाल थी ही कुछ रूपक भी बेमिसाल थे मसलन रूप तेरा सादा चंद्रमा ज्यूँ आधा आधा जवाँ रे। रवींद्र जी देख तो सकते नहीं थे फिर भी अपने आस पास की प्रकृति को उन्होंने हृदय के कितना करीब से महसूस किया था वो इन पंक्तियों से सहज व्यक्त होता है

जी करता है मोर के पाँवों में पायलिया पहना दूँ
कुहू कुहू गाती कोयलिया को, फूलों का गहना दूँ
यहीं घर अपना बनाने को, पंछी करे देखो
तिनके जमा रे, तिनके जमा रे


बहरहाल ये गीत रेडियो ने मुझे इतना सुनाया कि वक़्त के साथ इस गीत से मेरा लगाव घटता चला गया। वैसे भी शहरी जीवन में ना तो गाँव के नज़ारे थे और ना ही गोरी की नज़ाकत। हाँ फिल्म के बाकी गीत जरूर दिल के ज्यादा करीब रहे। जिन दो गीतों को आज भी मैं उतने ही चाव से सुनता हूँ उनमें से एक है राग यमन पर आधारित जब दीप जले आना, जब शाम ढले आना..।



यूँ तो हिंदी फिल्मों में येशुदास की आवाज़ को लाने का श्रेय रवींद्र जैन को दिया जाता है पर  रिलीज़ के हिसाब से देखें तो फिल्म छोटी सी बात जो चितचोर के पहले उसी साल जनवरी में प्रदर्शित हुई थी के गीत जानेमन जानेमन तेरे दो नयन.... से येशुदास के हिंदी फिल्म कैरियर की शुरुआत हुई थी। पर अगर आप येशुदास के सबसे लोकप्रिय गीतों का चुनाव करेंगे तो पाएँगे कि उनमें से लगभग आधे रवींद्र जैन के संगीतबद्ध किए हुए होंगे। इन दो कलाकारों के बीच बड़ा प्यारा सा रिश्ता था जिसे इसी बात से समझा जा सकता है कि रवींद्र जैन ने एक बार ख़्वाहिश ज़ाहिर की थी कि अगर उन्हें कभी देखने का अवसर मिला  तो वो सबसे पहले येशुदास को ही देखना चाहेंगे।

ये उनका प्रेम ही था कि उन्होंने अपनी सबसे अच्छी रचनाएँ येशुदास से गवायीं। वो उन्हें भारत की आवाज़ कहते थे। रवींद्र जी के लिखे संगीतबद्ध गीतों को येशुदास की आवाज़ ने एक आत्मा दी। गोरी तेरा गाँव.. में अपने गायन के लिए तो उन्होंने राष्ट्रीय पुरस्कार तक जीता।

ये उस माहौल की बात है जब सांझ आते ही गाँव के हर घर में दीपक जल जाया करते थे।  कुछ तो है इस शाम के DNA में ।आख़िर यही तो वो वेला होती है जिसमें प्रेमी एक दूसरे को बड़ी विकलता से याद किया करते हैं। रवींद्र जी ने ऍसा ही कुछ सोचकर इस गीत का मुखड़ा दिया होगा। बाँसुरी के साथ समायोजित उनके इंटरल्यूड्स भी बेहद मधुर हैं। गीत के बोलों में वो अंतरा मुझे बेहद प्यारा लगता है जिसमें रवींद्र बड़ी रूमानियत से लिखते हैं कि मैं पलकन डगर बुहारूँगा, तेरी राह निहारूँगा..मेरी प्रीत का काजल तुम अपने नैनों में मले आना, उफ्फ दिल में कितनी मुलायमियत सँजोये था ये संगीतकार।

जब दीप जले आना, जब शाम ढले आना
संकेत मिलन का भूल न जाना मेरा प्यार ना बिसराना
जब दीप जले आना ...

मैं पलकन डगर बुहारूँगा, तेरी राह निहारूँगा
मेरी प्रीत का काजल तुम अपने नैनों में मले आना
जब दीप जले आना ...


जहाँ पहली बार मिले थे हम, जिस जगह से संग चले थे हम
नदिया के किनारे आज उसी, अमवा के तले आना
जब दीप जले आना ...

नित साँझ सवेरे मिलते हैं, उन्हें देख के तारे खिलते हैं
लेते हैं विदा एक दूजे से कहते हैं चले आना
जब दीप जले आना ...


चितचोर के बाकी दो गीतों में मुझे कौन पसंद हैं वो तो आप जानेंगे इस लेख की अगली कड़ी में। फिलहाल तो ये गीत सुनिए येशुदास और हेमलता जी की आवाज़ों में...

शनिवार, अक्टूबर 10, 2015

रवींद्र जैन : खुशबू जैसे फूलों में उड़ने से भी रह जाए ! Ravindra Jain

संगीतकार रवींद्र जैन नहीं रहे। पर अपने रचे गीतों की सुनहरी यादों की लड़ी सी छोड़ गए हैं वो। दस वर्ष का भी नहीं रहा हूँगा जब पहली बार उनका रचा संगीत कानों में पड़ा। उन दिनों बाकी फिल्में हम जाएँ या ना जाएँ पर पिताजी राजश्री प्रोडक्शन की फिल्में हमें देखने जरूर ले जाया करते थे। सत्तर के दशक में राजश्री ने जो फिल्में बनाई उनमें से अधिकांश के संगीतकार रवींद्र जैन ही थे। ये वो दौर था जब राजश्री की फिल्में हिट होने पर तीन महीने से लेकर साल भर तक चलती थीं और इन फिल्मों के चलने में कथावस्तु के साथ साथ संगीत का महती योगदान होता था। अब गीत गाता चल और नदिया के पार जैसी फिल्मों का ख़्याल करते वक़्त जेहन में गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल... या कौन दिशा में ले के चला रे बटोहिया... जैसे गीत ना आएँ ऐसा हो सकता है भला?


बतौर संगीतकार रवींद्र जैन की मुझे सत्तर के दशक की जो दो फिल्में हमेशा याद रहती हैं वो थीं चितचोर और अँखियों के झरोखे से। दोनों ही राजश्री की फिल्में थीं और कमाल की बात तो ये है कि रवींद्र जैन ने ना केवल इन फिल्मों का संगीत दिया था बल्कि  गीतों के बोल भी लिखे थे। चितचोर के गीतों आज से पहले आज से ज्यादा.., जब दीप जले आना...., तू जो मेरे सुर में सुर मिलाए... की मधुरता को कौन भूल सकता है? वहीं अगर आपको याद हो तो गोरी तेरा गाँव बड़ा प्यारा ने येसूदास जैसे नवोदित गायक को तब लोकप्रियता की ऊँचाई पर ला खड़ा कर दिया था। येसूदास के आलावा हेमलता , जसपाल सिंह, सुरेश वाडकर जैसी आवाज़ों को जनता के सम्मुख लाने का श्रेय भी रवींद्र जी को ही दिया जाता है।

पर आज रवींद्र जी की याद मुझे ले गई है करीब तीन दशक पीछे जब मैं उनकी संगीतबद्ध फिल्म अँखियों के झरोखे से देखने गया था। आज भी इसके संगीत से जुड़ी दो बातें भुला नहीं पाया एक तो इसकी दोहावली और दूसरे इसका शीर्षक गीत।


इस फिल्म में एक दोहावली है जिसमें कॉलेज में चल रही प्रतियोगिता में रवींद्र जी ने एक गीत का रूप दे दिया था। स्कूल में इनके भावार्थ को लेकर हम तब पशोपेश में पड़े रहते थे पर फिल्म में उनका इतना सुन्दर प्रस्तुतिकरण देखकर बाल मन में दोहों के प्रति अभिरुचि फिर से जाग उठी थी।

रही शीर्षक गीत की बात तो क्या शब्द रचना और क्या धुन बनाई थी रवींद्र जी ने।  जीवन में ना जाने कितनी बातें अप्राप्य लगती हैं। प्रेम भी कभी कभी उनमें से एक हो जाता है क्यूँकि कई बार अपने हमसफ़र तक पहुँचने के लिए कठिन वास्तविकताओं से रूबरू होना पड़ता है, परिस्थितियों से लड़ना पड़ता है। पर आँखें बंद कीजिए, मन के आँगन में गोते लगाइए तो कठोर वास्तविकताओं की ये दीवार ढह सी जाती है। रह जाता है तो अपने उस प्यारे से साथी का सलोना सा मुखड़ा जो इतना करीब आ जाता है कि नींद, चैन, सपने सब फिर से उसके गुलाम हो जाते हैं। पर आँखें हमेशा तो बंद नहीं की जा सकती ना। फिर तो जूझना ही पड़ता है हर किसी को अपने हृदय से, अपने लगाव से और उसके अलग हो जाने के भय से।

कितनी खूबसूरती से बाँधा था रवीन्द्र जी ने गीत के इन भावों को। मुझे नहीं लगता कि कोई भी संगीतकार ऐसा होगा जिसे कहानी के अनुरूप भावनाओं को शब्दों का जामा पहनाना इस बखूबी से आता हो। यही वज़ह है कि रवीन्द्र जी का गीत संगीत हमेशा एक दूसरे में पूरी तरह घुला मिला सा लगता  है।

फिल्म देखते वक़्त मेरा बाल मन इस गीत से ऐसा जुड़ गया था कि इसके  दुख भरे हिस्से के आते आते आँसुओं की अविरल धारा को मेरे लिए रोकना मुश्किल हो गया था... शायद ये दर्द ही है जो इस गीत को यादों के दायरे के बाहर जाने नहीं देता..। तो आइए आज सुनते हैं इस गीत को जिसे गाया था हेमलता व जसपाल सिंह ने।


अँखियों के झरोखों से मैने देखा जो साँवरे
तुम दूर नज़र आये, बड़ी दूर नज़र आये
बंद कर के झरोखों को ज़रा बैठी जो सोचने
मन में तुम ही मुस्काए, मन में तुम ही मुस्काए


एक मन था मेरे पास वो अब खोने लगा है
पाकर तुझे, हाए मुझे कुछ होने लगा है
एक तेरे भरोसे पे सब बैठी हूँ भूल के
यूँ ही उम्र गुजर जाए, तेरे साथ गुजर जाए

जीती हूँ तुम्हे देख के मरती हूँ तुम्हीं पे
तुम हो जहाँ साजन मेरी दुनियाँ है वही पे
दिन रात दुआ माँगे मेरा मन तेरे वास्ते
कही अपनी उम्मीदों का कोई फूल ना मुरझाए

मैं जब से तेरे प्यार के रंगो में रंगी हूँ
जगते हुए सोयी रही, नींदो में जगी हूँ
मेरे प्यार भरे सपने, कही कोई न छीन ले
मन सोच के घबराए, यही सोच के घबराए


रवींद्र जैन ने धार्मिक फिल्मों में भी संगीत दिया, रामायण जैसे कई लोकप्रिय धारावाहिक में अपना संगीत पिरोया, यहाँ तक कि तमाम गैर फिल्मी एलबम किए जो बेहद लोकप्रिय भी हुए। क्या इतनी बहुमुखी प्रतिभा का धनी कोई व्यक्ति जन्म से अंधा हो सकता है? दरअसल उनके जीवन की इस क्रूर सच्चाई का पता मुझे नब्बे के दशक में चला। ऐसे व्यक्ति की जीवटता और हुनर देख के मन में सच्ची श्रद्धा उमड़ती है। उनका जीवन अपने आप में एक मिसाल था और रहेगा। आज  वो हमारे बीच नहीं है पर उनको याद करते हुए शायद ये शब्द सदा मेरे होठों पर रहें..

 

कलियाँ ये सदा प्यार की मुसकाती रहेंगी
खामोशियाँ तुझसे मेरे अफ़साने कहेंगी
जी लूँगा नया जीवन तेरी यादों में बैठ के
खुशबू जैसे फूलों में उड़ने से भी रह जाए
 

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