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गुरुवार, अगस्त 25, 2016

कृष्ण की चेतावनी : रामधारी सिंह दिनकर Krishna ki Chetavani by Dinkar

रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविताएँ बचपन से मन को उद्वेलित करती रही हैं। पर स्कूल की पुस्तकों में उनके लिखे महाकाव्य कुरुक्षेत्र व रश्मिरथी के कुछ बेहद लोकप्रिय अंश ही रहा करते थे । स्कूल के दिनों में उनकी   दो लोकप्रिय कविताएँ शक्ति और क्षमाहिमालय हमने नवीं  और दसवीं में पढ़ी थीं जो कुरुक्षेत्र का ही हिस्सा थीं। कुरुक्षेत्र तो महाभारत के शांति पर्व पर आधारित थी वहीं रश्मिरथी दानवीर कर्ण पर ! रश्मिरथी का शाब्दिक अर्थ वैसे व्यक्ति से है जिसका जीवन रथ किरणों का बना हो। किरणें तो ख़ुद ही सुनहरी व उज्ज्वल होती हैं। कर्ण के लिए ऐसे उपाधि का चयन दिनकर ने संभवतः उनके सूर्यपुत्र और पुण्यात्मा होने की वज़ह से किया हो।


रश्मिरथी के अंशों को मैंने शुरुआत में टुकड़ों में पढ़ा इस बात से अनजान कि ये पुस्तक बचपन से ही घर में मौज़ूद रही। रश्मिरथी यूँ तो 1952 में प्रकाशित हुई पर 1980 में जब करीब सवा सौ पन्नों की ये पुस्तक मेरे घर आई तो जानते हैं इसका मूल्य कितना था? मात्र ढाई रुपये!

जब किताब हाथ में आई तो समझ आया कि ये काव्य तो एक ऐसी रोचक कथा की तरह चलता है जिसे एक बार पढ़ना शुरु किया तो फिर बीच में इसे छोड़ना संभव नहीं। दिनकर, महाभारत के पात्र कर्ण की ये गाथा सात सर्गों यानि खंडों में कहते हैं। दिनकर की भाषा इतनी ओजमयी है कि शायद ही कोई उनके इस काव्य को बिना बोले हुए पढ़ सके।  आज जन्माष्टमी के अवसर पर मैं आपको इस महाकाव्य के तीसरे सर्ग का वो हिस्सा सुनाने जा रहा हूँ जिसमें बारह वर्ष के वनवास और एक साल के अज्ञातवास को काटने के बाद पांडवों ने कौरवों से सुलह के लिए भगवान कृष्ण को हस्तिनापुर भेजा जो कौरवों की राजधानी हुआ करती थी। इस अंश को कई जगह कृष्ण की चेतावनी के रूप में किताबों में प्रस्तुत किया गया।


वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका,
उलटे हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

 हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान कुपित होकर बोले
जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।


 यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।
परिधि-बन्ध :  क्षितिज , मैनाक-मेरु : दो पौराणिक पर्वत

दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख, मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग क्षर-अक्षर, नश्वर मनुष्य, सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।
दृग : आँख,  शत कोटि : सौ करोड़

शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल, शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।
जिष्णु : विष्णु के अवतार

भूलोक अटल पाताल देख, गत और अनागत काल देख
यह देख जगत का आदि सृजन, यह देख महाभारत का रण 
मृतकों से पटी हुई भू है
पहचान,  कहाँ इसमें तू है

अंबर में  कुंतल जाल देख, पद के नीचे पाताल देख
मुट्ठी में तीनो काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख
सब जन्म मुझी से पाते हैं
फिर लौट मुझी में आते हैं
कुंतल :केश 

जिह्वा से कढ़ती ज्वाला सघन, साँसों से पाता जन्म पवन
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हँसने लगती है सृष्टि उधर
मैं जभी मूँदता  हूँ लोचन
छा जाता चारो ओर  मरण
लोचन : आँख

बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।
 वह्नि : अग्निपुंज

भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बँद से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।
 वायस : कौआ,  श्रृगाल : सियार

थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर न अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय,
दोनों पुकारते थे 'जय-जय'!

विदुर तो पहले से ही कृष्ण भक्त थे इसलिए उन्हें प्रभु के विकराल रूप के दर्शन हुए। पर ऐसी कथा है कि विदुर ने जब धृतराष्ट्र से कहा कि आश्चर्य है कि भगवान अपने विराट रूप में विराज रहे हैं। इसपर धृतराष्ट्र ने अपने अंधे होने का पश्चाताप किया। पश्चाताप करते ही भगवन के इस विराट रूप देखने तक के लिए उनको दृष्टि मिल गयी।

मुझे तो इस कविता को पढ़ना और अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करना आनंदित कर गया। रश्मिरथी का ये अंश और पूरी किताब आपको कैसी लगती है ये जरूर बताएँ। तीसरे सर्ग के इस अंश का कुछ हिस्सा अनुराग कश्यप ने अपनी फिल्म गुलाल में भी इस्तेमाल किया था। उन अंशों को अपनी आवाज़ से सँवारा था पीयूष मिश्रा ने।

मंगलवार, सितंबर 24, 2013

कलम या कि तलवार : रामाधारी सिंह 'दिनकर' के जन्मदिन पर सुनिए उनकी ये प्रेरक कविता !

कल राष्ट्रकवि रामाधारी सिंह 'दिनकर' का जन्मदिन था। स्कूल और कॉलेज जीवन में मेरे प्रियतम कवि होने के बावज़ूद विगत कुछ सालों में "रश्मिरथी" के आलावा उनकी कोई और पुस्तक नहीं पढ़ पाया हूँ। ये जरूर है कि मेरे कार्यालय में दिनकर प्रेमी गाहे बगाहे उनको याद अवश्य कर लिया करते हैं। इसी बहाने उनके व्यक्तित्व से जुड़े कई वाकये और उनकी ओजमयी कविताएँ सुनने को मिल जाती हैं।

कल ऐसे ही एक कार्यक्रम में सहकर्मियों के साथ वक़्त गुजरा। पद्य के साथ गद्य पर उनके समान अधिकार, उनका आकर्षक रूप, विनम्र व्यवहार और ओजपूर्ण भाषा, 1971 के भारत पाक युद्ध के समय उनका लगातार तीन दिनों तक पटना में वीर रस कवि सम्मेलन का आयोजन कराना, नेहरु, राजेंद्र प्रसाद और जयप्रकाश नारायण से उनके घनिष्ठ संबंध और अंतिम दिनों में धनाभाव के चलते पौत्रियों के विवाह की चिंता... बहुत सारी बातों पर चर्चा हुई और मन उनके व्यक्तित्व के प्रति आदरभाव से हृदय में सब समेटता चला गया।

शाम को वापस लौटा तो दिनकर की लिखी ये कविता जो स्कूल के दिनों में पढ़ी थी बरबस याद आ गयी। तब भी इसे पढ़ते वक्त मन प्रफुल्लित हो उठता था और आज भी इसके पाठ के दौरान मैं वैसी ही भावनाओं से एक बार फिर गुजरा। कलम और तलवार में से एक को चुनने की दुविधा को दिनकर चंद पंक्तियों में बड़ी ही सहजता से दूर करते हुए तलवार के ऊपर कलम की सर्वोच्चता को स्थापित करते हैं। तो आइए दिनकर को याद करें उनकी इस कविता के माध्यम से



दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति अजेय अपार

अंध कक्षा में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान

कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
दिल ही नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली

पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे,
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे

एक भेद है और वहाँ निर्भय होते नर -नारी,
कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी

जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले,
बादलों में बिजली होती, होते दिमाग में गोले

जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार,
क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार

और चलते चलते उनकी इन पंक्तियों के साथ आपसे विदा लूँ

लोहे के पेड़ हरे होंगे,
तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर,
आँसू के कण बरसाता चल।

 अगर दिनकर की कविताएँ आपको भी उद्वेलित करती हैं तो इन्हें भी आप पढ़ना पसंद करेंगे

रविवार, अगस्त 31, 2008

तू तरुण देश से पूछ अरे गूँजा कैसा यह ध्वंस राग ? : हिमालय - रामधारी सिंह ' दिनकर '

पिछले हफ़्ते हमारे दफ़्तर में रामधारी सिंह 'दिनकर' के जन्मशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में उनकी कविताओं का पाठ करने के लिए एक संध्या चुनी गई थी। दिनकर राष्टकवि तो थे ही, हमारी पीढ़ी को उन्होंने किशोरावस्था में अपनी ओजपूर्ण कविताओं से कलम की ताकत का अंदाजा करवाया। और यही कारण था कि उस शाम, हॉल को भरने में ज्यादा वक़्त नहीं लगा। हम सबके सामने, हमारे एक साहित्यानुरागी सहयोगी ने दिनकर के काव्य जीवन का एक बेहद संवेदनशील जीवन वृत खींचा।


मैंने इस अवसर पर उनकी कविता 'हिमालय' का पाठ किया। ये कविता मेरी नवीं कक्षा की पाठ्य पुस्तक में थी। मुझे याद है कि स्कूल में जब भी इस कविता को दोहराते थे, कविता का अंत आते-आते धमनियों में रक्त प्रवाह की तीव्रता अपने चरम पर पहुँच जाती थी।

आज जब इस कविता को दोबारा पढ़ता हूँ तो लगता है फिर इस सोए हुए देश को तंद्रा से उठाने की जरूरत है। बाहरी शक्तियों की बात करें तो कश्मीर से लेकर अरुणाचल तक जगह जगह दुश्मन हमारे इस प्रहरी कौ अपने पैरो तले रौंदकर इसका अपमान करते फिर रहे हैं । तो वहीं दूसरी ओर इससे जन्मी नदियाँ जो उत्तर के मैदानों को सिंचित और उर्वर बनाती थीं आज अपने प्रलय से जनमानस को लील रही हैं फिर भी ये यती चुप है,शांत है...

चाहे वो जम्मू में जनता का महिनों से उबलता आक्रोश हो, या उड़ीसा की कानूनविहीनता, या फिर तेरह दिनों से कोशी में आई प्रलयकारी बाढ़ में आम जनता के रोते बिलखते चेहरे.... भारत में राजनैतिक और प्रशासनिक अकर्मण्यता का जो दृश्य दिखाई दे रहा है वो वास्तव में बेहद भयावह है। इस दृष्टि से दिनकर की ये पंक्तियाँ और भी प्रासंगिक हो गई हैं।

उस पुण्यभूमि पर आज तपी !
रे आन पड़ा संकट कराल
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे
डँस रहे चतुर्दिक विविध व्याल
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !


आइए पढ़ें राष्ट्र कवि दिनकर की ये कविता ...और शपथ लें कि देश के एक सुधी नागरिक की हैसियत से हम इन अकर्मण्य नेताओं और प्रशासकों पर एकजुट होकर दबाव बनाएँ ताकि वे अपने कर्तव्यों से विमुख ना हों और साथ ही सहयोग दें उनके प्रयासों को सफल बनाने में..

मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

साकार दिव्य गौरव विराट,
पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल!
मेरी जननी के हिम करीट !
मेरे भारत के दिव्य भाल !
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

युग युग अजेय, निर्बन्ध मुक्त
युग युग गर्वोन्नत, नित महान
निस्सीम व्योम में तान रहा
युग से किस महिमा का वितान
कैसी अखंड ये चिर समाधि ?
यतिवर! कैसा ये अमर ध्यान ?

तू महाशून्य में खोज रहा
किस जटिल समस्या का निदान ?
उलझन का कैसा विषमजाल
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

औ मौन तपस्या लीन यती
पल भर को तो कर दृगन्मेष
रे ज्वालाओं से दग्ध विकल
है तड़प रहा पद पर स्वदेश

सुखसिंधु , पंचनंद, ब्रह्मपुत्र
गंगा यमुना की अमिय धार
जिस पुण्यभूमि की ओर बही
तेरी विगलित करुणा उदार

जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त
सीमापति ! तू ने की पुकार
'पद दलित इसे करना पीछे
पहले मेरा सिर ले उतार।'


उस पुण्यभूमि पर आज तपी !
रे आन पड़ा संकट कराल
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे
डँस रहे चतुर्दिक विविध व्याल
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !



कितनी मणियाँ लुट गईं ? मिटा
कितना मेरा वैभव अशेष!
तू ध्यान मग्न ही रहा; इधर
वीरान हुआ प्यारा स्वदेश ।


वैशाली के भग्नावशेष से
पूछ लिच्छवी शान कहाँ ?
ओ री उदास गण्डकी ! बता
विद्यापति कवि के गान कहाँ ?


तू तरुण देश से पूछ अरे
गूँजा कैसा यह ध्वंस राग
अम्बुधि अन्तस्तल बीच छुपी
यह सुलग रही है कौन आग ?

प्राची के प्रांगण बीच देख
जल रहा स्वर्ण युग अग्निज्वाल
तू सिंहनाद कर जाग तपी
मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

रे रोक, युधिष्ठिर को ना यहाँ
जाने दे उनको स्वर्ग धीर
पर फेर हमें गांडीव गदा
लौटा दे अर्जुन भीम वीर


कह दे शंकर से आज करें
वे प्रलय नृत्य फिर एक बार
सारे भारत में गूँज उठे
'हर हर बम' का फिर महोच्चार


अगर दिनकर की कविताएँ आपको भी उद्वेलित करती हैं तो इन्हें भी आप पढ़ना पसंद करेंगे

रविवार, सितंबर 23, 2007

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविता : ब्रह्म से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है....

आज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' का जन्मदिन है। दिनकर का जन्म २३ सितंबर १९०८ में बिहार के सिमरिया नामक ग्राम में हुआ था। सो जन्मदिन के साथ-साथ ये उनका जन्मशती वर्ष भी है। बचपन से वो मेरे सबसे प्रिय कवि रहे हैं। मुझे याद है कि छठी से दसवीं तक जब भी हिंदी की नई पाठ्य पुस्तक मिलती थी, तो सबसे पहले मैं ये देखता था कि कविता वाले भाग में दिनकर की कोई कविता है या नहीं। उनकी कविता को कभी मन ही मन नहीं पढ़ा जाता था। बार बार पढ़ते और वो भी जोर जोर से बोल के जैसे खुद की ही कविता हो। जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा के छायावादी रहस्यों को समझने की उम्र नहीं थी पर दिनकर की पंक्तियाँ ना केवल बड़ी आसानी से कंठस्थ हो जाती थीं बल्कि वे मन में एक ऐसा ओज भर देती थीं जिसका प्रभाव कविता की आवृति के साथ बढ़ता चला जाता था।

पहली बार छठी कक्षा में उनका किया इस प्रश्न ने मन में हलचल मचा दी थी

दो में से तुम्हें क्या चाहिए ?
कलम या कि तलवार
मन में ऊँचे भाव
या तन में शक्ति अजय आपार !

तो वहीं सातवीं या आठवीं में शक्ति और क्षमा पढ़ने के बाद उनकी काव्य शैली ने मुझे पूरी तरह मोहित कर दिया था

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो


पूरी कविता आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

दसवीं की परीक्षा में इन पंक्तियों का भावार्थ लिखते वक़्त लगा ही नहीं था कि इसके लिए कुछ अलग से याद करना पड़ा हो..

रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ
जाने दे उनको स्वर्ग धीर,
पर लौटा हमें गांडीव गदा
लौटा दे अर्जुन भीम वीर


आज उनकी एक और अच्छी कविता पढ़ी। पता नहीं ये पूर्ण है या नहीं, पर इसकी पंक्तियाँ मन को छू गईं।
सब हो सकते तुष्ट एक सा 
सब सुख पा सकते हैं 
चाहें तो , पल में  धरती को 
स्वर्ग बना सकते हैं

छिपा दिये सब  तत्त्व आवरण 
के नीचे  ईश्वर  ने 
संघर्षों  से खोज निकाला 
उन्हें उद्यमी  नर ने 
 
ब्रह्म से कुछ लिखा भाग्य में
मनुज नहीं लाया है
अपना सुख उसने अपने
भुजबल से ही पाया है

प्रकृति नहीं डरकर झुकती है
कभी भाग्य के बल से
सदा हारती वह मनुष्य के
उद्यम से, श्रमजल से


भाग्यवाद  आवरण पाप का 
और शस्त्र  शोषण का ,
जिससे रखता  दबा  एक जन 
भाग दूसरे जन का । 

पुछो किसी भाग्यवादी से 
यदि विधि अंक प्रबल है 
पद  पर क्यों देती न स्वयं 
वसुधा निज रत्न उगल है ? 

उपजाता क्यों विभव प्रकृति को 
सींच -सींच वह जल से ? 
क्यों न उठा लेता निज  संचित 
कोष भाग्य  के बल से । 

और मरा  जब पूर्व जन्म में 
वह धन संचित  करके 
विदा हुआ था न्यास समर्जित
किसके घर में  धर  के । 

जन्मा  है वह जहां , आज 
जिस पर उसका शासन है 
क्या है यह  घर वही ? और 
यह उसी न्यास का धन है ? 

यह भी पूछो  , धन जोड़ा 
उसने जब प्रथम -प्रथम था 
उस संचय के पीछे तब 
किस भाग्यवाद  का क्रम था ? 

वही मनुज के श्रम का शोषण 
वही अनयमय  दोहन ,
वही मलिन  छल नर - समाज से 
वही ग्लानिमय  अर्जन । 

एक मनुज संचित करता है 
अर्थ पाप के बल से , 
और भोगता उसे दूसरा 
भाग्यवाद  के छल से । 

नर - समाज  का भाग्य  एक है 
वह श्रम , वह भुज - बल है , 
जिसके सम्मुख  झुकी हुई 
पृथिवी, विनीत  नभ - तल है । 

जिसने श्रम जल दिया , उसे 
पीछे मत रह जाने दो , 
विजित  प्रकृति  से सबसे पहले 
उसको सुख पाने दो । 

जो कुछ न्यस्त प्रकृति में  है , 
वह मनुज मात्र का धन है , 
धर्मराज , उसके कण -कण  का 
अधिकारी जन - जन है ।


पूज्यनीय को पूज्य मानने
में जो बाधाक्रम है
वही मनुज का अहंकार है
वही मनुज का भ्रम है

रामधारी सिंह 'दिनकर'

सोमवार, जुलाई 03, 2006

शक्ति और क्षमा

परिचर्चा में दिनकर की कविताओं वाली पोस्ट में इन्द्रधनुष वाले नितिन बागला जी ने शक्ति और क्षमा की कुछ पंक्तियाँ पेश की थीं और लिखा था कि किसी को शेष पंक्तियाँ याद हो तो लिखे। ये कविता मुझे भी सदा से पसंद रही है पर पूरी याद नहीं थी। खोज बीन के पश्चात अंतरजाल पर ये जब इमेज फार्म में मिली तो आप सब के साथ बांटने की इच्छा हुई।

आज के इस एक ध्रुवीय विश्व में ये कविता कितनी प्रासंगिक है वो आज भी इस रचना को पढ़ कर आप सब महसूस कर सकते हैं। अब अमरीका की विश्व नीति की तुलना और असर, भारत की विदेश नीति से करें तो दिनकर की ये पंक्तियाँ मन को उद्वेलित किये बिना नहीं रह पातीं। बिना बल के क्षमा या सहनशीलता दिखाने वालों को ना किसी ने गंभीरता से लिया है ना लेगा।
आशा है ये कविता आप सब की भी प्रिय होगी ।

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनीत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो ।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे ।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से ।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो , तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन संपूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की ।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

श्रेणी :
मेरी प्रिय कवितायें में प्रेषित
 

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