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बुधवार, जनवरी 31, 2024

वार्षिक संगीतमाला 2023 : ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते

वार्षिक संगीतमाला में अब तक आपने कुछ रूमानी और कुछ थिरकते गीतों का आनंद उठाया पर आज जिस गीत का चुनाव मैंने किया है उसका मिज़ाज मन को धीर गंभीर करने वाला है और मेरा विश्वास है कि उसमें निहित संदेश आपको अपने समाज का आईना जरूर दिखाएगा। 

हिंदी फिल्मों में फ़ैज़ की नज़्मों और ग़ज़लों का बारहा इस्तेमाल किया गया है। कभी किरदारों द्वारा उनकी कविता पढ़ी गयी तो कभी उनके शब्द गीतों की शक़्ल में रुपहले पर्दे पर आए। फ़ैज़ की शायरी की एक खासियत थी कि उन्होने रूमानी शायरी के साथ साथ तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक हालातों पर भी लगातार अपनी लेखनी चलाई और इसीलिए जनमानस ने उन्हें बतौर शायर एक ऊँचे ओहदे से नवाज़ा। लोगों ने जितने प्रेम से मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न माँग को पसंद किया उतने ही जोश से सत्ता के प्रति प्रतिकार को व्यक्त करती उनकी नज़्म हम देखेंगे को भी हाथों हाथ लिया।



फ़ैज़ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। सर्वहारा वर्ग के शासन के लिए वो हमेशा अपनी नज़्मों से आवाज उठाते रहे। बोल की लब आजाद हैं तेरे....उनकी एक ऐसी नज़्म है जो आज भी जुल्म से लड़ने के लिए आम जनमानस को प्रेरित करने की ताकत रखती है। पिछले कुछ वर्षों में उनकी नज़्म के इस रंग को हिंदी फिल्मों में लगातार जगह मिली हो। कुछ साल पहले पल्लवी जोशी ने Buddha In A Traffic Jam'.फ़क़त चंद रोज़ मेरी जान को आवाज़ दी थी। नसीरुद्दीन शाह एक फिल्म में ये दाग दाग उजाला को अपनी आवाज़ दे चुके हैं। हैदर में उनकी ग़ज़ल का इस्तेमाल करने वाले विशाल भारद्वाज ने इस बार पिछले साल की शुरुआत में कुत्ते फिल्म के शीर्षक गीत के तौर पर फ़ैज़ की इसी नाम की नज़्म का इस्तेमाल किया।

अपने समाज के दबे कुचले, बेघर, बेरोजगार, आवारा फिरती आवाम में जागृति जलाने के उद्देश्य से फैज ने प्रतीकात्मक लहजे में उनकी तुलना गलियों में विचरते आवारा कुत्तों से की। किस तरह आम जनता नेताओं, रसूखदारों, नौकरशाहों के खुद के फायदे के लिए उनकी चालों में मुहरा बन कर भी अपना दर्द चुपचाप सहती रहती है, ये नज़्म उसी ओर इशारा करती है।

ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
कि बख्शा गया जिनको ज़ौक़ ए गदाई*
ज़माने की फटकार सरमाया** इनका
जहां भर की दुत्कार इनकी कमाई

ना आराम शब को ना राहत सवेरे
ग़लाज़त*** में घर , नालियों में बसेरे
जो बिगड़ें तो एक दूसरे से लड़ा दो
जरा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
ये हर एक की ठोकरें खाने वाले
ये फ़ाक़ों से उकता के मर जाने वाले
ये मज़लूम मख़्लूक़^ गर सर उठाये
तो इंसान सब सरकशीं^^ भूल जाए
ये चाहें तो दुनिया को अपना बना लें
ये आकाओं की हड्डियाँ तक चबा लें
कोई इनको एहसासे ज़िल्लत^^^ दिला ले
कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे

*भीख मांगने की रुचि **संचित धन ***गंदगी ^ आम जनता ^^घमंड ^^^ अपमान की अनुभुति

फैज को विश्वास था कि गर आम जनता को अपनी ताकत का गुमान हो जाए तो वो बहुत कुछ कर सकती है।रेखा भारद्वाज की आवाज़ में ये नज़्म हमारे हालातों पर करारी चोट करती हुई दिल तक पहुँचती है। विशाल कोरस में भौं भौं का अनूठा प्रयोग करते हैं। इस भूल जाने वाले एल्बम में ये नज़्म एकमात्र ऐसा नगीना है जिसे लोग कई दशकों बाद तक याद रखेंगे।
  
 

वार्षिक संगीतमाला 2023 में मेरी पसंद के पच्चीस गीत
  1. वो तेरे मेरे इश्क़ का
  2. तुम क्या मिले
  3. पल ये सुलझे सुलझे उलझें हैं क्यूँ
  4. कि देखो ना बादल..नहीं जी नहीं
  5. आ जा रे आ बरखा रे
  6. बोलो भी बोलो ना
  7. रुआँ रुआँ खिलने लगी है ज़मीं
  8. नौका डूबी रे
  9. मुक्ति दो मुक्ति दो माटी से माटी को
  10. कल रात आया मेरे घर एक चोर
  11. वे कमलेया
  12. उड़े उड़नखटोले नयनों के तेरे
  13. पहले भी मैं तुमसे मिला हूँ
  14. कुछ देर के लिए रह जाओ ना
  15. आधा तेरा इश्क़ आधा मेरा..सतरंगा
  16. बाबूजी भोले भाले
  17. तू है तो मुझे और क्या चाहिए
  18. कैसी कहानी ज़िंदगी?
  19. तेरे वास्ते फ़लक से मैं चाँद लाऊँगा
  20. ओ माही ओ माही
  21. ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
  22. मैं परवाना तेरा नाम बताना
  23. चल उड़ चल सुगना गउवाँ के ओर
  24. दिल झूम झूम जाए
  25. कि रब्बा जाणदा

    गुरुवार, जनवरी 26, 2017

    वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान संख्या 17 : पल्लवी जोशी जब पहुँची माइक के पीछे Chand Roz Meri Jaan...

    आपको याद होगा कि कुछ साल पहले फिल्म हैदर में विशाल भारद्वाज ने फ़ैज़ की ग़ज़ल गुलो में रंग भरे का इस्तेमाल किया था और वो भी अरिजीत सिंह की आवाज़ में। इस साल फिर फ़ैज वार्षिक संगीतमाला का हिस्सा बने हैं एक नज़्म के साथ जिसे आवाज़ दी है एक अभिनेत्री ने।हिंदी फिल्मों में अभिनेत्रियों द्वारा गायिकी की कमान सँभालने के दृष्टांत हमेशा से रहे हैं और आजकल तो प्रियंका चोपड़ा, आलिया भट्ट व श्रद्धा कपूर ने इस प्रवृति को और गति प्रदान की है। पुराने ज़माने में भी सुरैया, गीता दत्त और सुलक्षणा पंडित ने नायिका व गायिका के रूप में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। उमा देवी यानि टुनटुन ने हास्य अभिनय के साथ कुछ बेहद मशहूर नग्मे गाए। बाद में शबाना आज़मी की आवाज़ में कुछ गीत रिकार्ड हुए। इसी सिलसिले में एक नया नाम जुड़ा है पल्लवी जोशी का।


    जो लोग पल्लवी जोशी के फिल्म जगत के आरंभिक दिनों से परिचित ना हों उन्हें बताना चाहूँगा कि हिंदी फिल्मों में सत्तर और अस्सी के शुरुआती सालों में सिनेमा के रूपहले पर्दे पर वो बतौर बाल कलाकार नज़र आयीं। अस्सी के उत्तरार्ध और नब्बे के दशक में हिंदी फिल्मों में भी वो यदा कदा दिखती रहीं। कला फिल्मों और बाद में टीवी धारावाहिकों में अपने जानदार अभिनय से वो एक जाना पहचाना चेहरा बन गयीं। फिर उन्हें गुनगुनाते हुए अनु कपूर के साथ मैंने जी टीवी के लोकप्रिय कार्यक्रम अंत्याक्षरी में देखा गया। तभी पता चला कि उन्होंने अभिनय के साथ शास्त्रीय संगीत भी सीखा हुआ है।

    पिछले साल मई महीने में विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित एक फिल्म प्रदर्शित हुई Buddha in a Traffic Jam जो कि सामाजिक एवम् राजनीतिक ख़ामियों की ओर इशारा करती एक फिल्म थी। सामाजिक प्रताड़ना चाहे वो जबरन नैतिक आचार संहिता थोपने के रूप में हो या कट्टरवाद कै तौर पर उसका प्रतिरोध जरूरी है। यही इस फिल्म का संदेश था और इसके लिए विवेक एक गीत की तलाश में थे। स्वाभाविक रूप से उनकी खोज फ़ैज़ की इस नज़्म पर आकर समाप्त हुई। आख़िर फ़ैज की शायरी अपने ज़माने में सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का स्वर बन कर उभरी थी और आज भी लोगों को प्रेरणा देती रही है। ये नज़्म भी फ़ैज़ ने तब लिखी थी जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाक़त अली खाँ की सरकार के तख्तापलट करने की साजिश रचने के जुर्म में उन्हें जेल भेज दिया गया था।


    पल्लवी बताती हैं कि उनके पति व निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने उनसे कहा कि इस नज़्म के लिए उन्हें एक कच्ची या अपरिष्कृत आवाज़ की जरूरत है जो वो बखूबी पूरा कर सकती हैं। पल्लवी ने संगीत की तालीम जरूर ली थी पर कभी इस तरह गाने का ख़्याल उनके मन में नहीं आया था। पर विवेक के ज़ोर देने से वो मान गयीं और उन्हें इसे निभाने में कोई दिक्कत भी नहीं हुई। उनके लिए ये सुखद अनुभव रहा। ये अलग बात है कि घर का मामला होने की वज़ह से उन्हें इस नज़्म को गाने के लिए पैसे नहीं मिले।

    इस गीत को संगीतबद्ध किया रोहित शर्मा  ने। वैसे जहाँ शब्द महत्त्वपूर्ण हो और फ़ैज़ जैसे शायर के लिखे हों वहाँ वाद्य यंत्रों की गुंजाइश कम ही रह जाती है और इसीलिए पूरी नज़्म में आपको पल्लवी की आवाज़ के साथ मात्र हारमोनियम ही बजता सुनाई देगा। तो आइए सुनते हैं पल्लवी जोशी की आवाज़ में ये संवेदनशील नज़्म

    चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
    ज़ुल्म की छाँव में दम लेने
    पे मजबूर हैं हम
    इक ज़रा और सितम सह लें तड़प लें रो लें
    अपने अजदाद  की मीरास है माज़ूर हैं हम

    जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरे हैं 
    फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं

    और अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिये जाते हैं
    ज़िन्दगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है
    जिसमें  
    हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं

    बस कुछ ही दिनों की बात है मेरे हमदम सिर्फ कुछ दिनों की। अभी तो ये जुल्म ओ सितम सहना होगा। क्या करें अपने बाप दादा की इस धरोहर में हम फिलहाल लाचार हैं। शरीर तो क़ैद कर ही लिया इन्होंने और अब मन की भावनाओ को जकड़ना चाहते हैं। यहाँ तो सोचने, चिंतन करने और यहाँ तक कि बातचीत पर भी पाबंदी है। फिर भी मैंने हिम्मत नहीं छोड़ी है भले ही ये ज़िंदगी के उस गरीब की फटी पुरानी पोशाक बन गयी है जिस पर जब तब दर्द के पैबंद लगते रहते हैं।  
     
    लेकिन अब ज़ुल्म की मीयाद के दिन थोड़े हैं
    इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं

    अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में
    हम को रहना है पर यूँ ही तो नहीं रहना है
    अजनबी हाथों का बेनाम गराँ-बार सितम
    आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है



    ये तेरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द
    अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार
    चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
    दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार

    चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़ 

    पर इस जुल्म की मीयाद लंबी नहीं। न्याय मिलने का दिन दूर नहीं। अत्याचार से झुलसे दुनिया के इस मैदान में हम इन हालातों में और नहीं रह सकते। आज इन पराए लोगों द्वारा मन को बोझिल कर देने वाला सितम हमेशा तो नहीं सहना है। तेरी सु्ंदरता में लिपटे इन ग़मों की धूल,  दिल की अनुत्तरित तड़प, जिस्म की भोली जरूरतें, चाँदनी रातों का उमड़ता दर्द  इन्हें इंतज़ार करना होगा। कुछ दिन और, सिर्फ कुछ दिन और!

    यूँ तो पल्लवी जोशी ने पूरी नज़्म ही रिकार्ड की है पर फिल्म में गीत के वीडियो में नज़्म का एक हिस्सा कटा हुआ है।


    वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक

    रविवार, सितंबर 04, 2016

    तुम मेरे पास रहो .. फ़ैज़ की दिलकश नज़्म नैयरा नूर की आवाज़ में Tum Mere Paas Raho : Nayyara Noor

    आज से दस बारह साल पहले इंटरनेट में कविता ग़ज़लों को पसंद करने वाले कई समूह सक्रिय थे। प्रचलित भाषा में इन्हें बुलेटिन बोर्ड कहा जाता था। वैसे तो आज भी ये समूह हैं पर सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों ने उनकी प्रासंगिकता खत्म कर दी है। ऐसी ही उर्दू कविता के समूह में फ़ैज़ की गज़लों पर चली एक कड़ी में मैंने "हम तो ठहरे अजनबी इतनी मदारातों के बाद... पहले पढ़ी और फिर सुनी थी। इस ग़ज़ल की वज़ह से ही मेरी पहचान नैयरा नूर की खूबसूरत गायिकी से हुई थी। फिर तो उनकी आवाज़ मुझे इतनी प्यारी लगी कि उनकी गायी कई अन्य मशहूर ग़ज़लें व नज़्में मुझे अपने दिल पे नाज़ था..., ऐ जज़्बा दिल गर मैं चाहूँ... , रात यूँ दिल में.... , कभी मैं खूबसूरत हूँ ... खोज खोज कर सुनी।

    वैसे क्या आप जानते हैं कि लाहौर में पली बढ़ी नैयरा की पैदाइश भारत के शहर गुवहाटी में हुई थी। उनका परिवार अमृतसर से रोज़ी रोटी की तलाश में गुवाहाटी में बस गया था। जब भी उनसे अपने बचपन के दिनों के बारे में पूछा जाता वे गुवाहाटी की हरी भरी खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसे अपने घर  की बात जरूर बतातीं और साथ ही ये भी कि रात में उनके उस घर के बाहर सैकड़ों की तादाद में पतंगे  कैसे उमड़ पड़ते थे। पर उनके जन्म के छः सात साल  बाद उनका परिवार 1957 के करीब लाहौर चला गया। 

    लाहौर में उनकी शिक्षा नेशनल आर्ट्स कॉलेज में हुई। कॉलेज के ज़माने में वे संगीत की हर प्रतियोगिता में हिस्सा लेतीं। ऐसी ही प्रतियोगिताओं में उनकी मुलाकात शहरयार ज़ैदी से हुई जो ख़ुद एक उभरते गायक थे। नैयरा ने संगीत का कोई प्रथम पुरस्कार भले ही शहरयार को लेने ना दिया हो पर अपना दिल वे  उनसे जरूर हार बैठीं।

    नैयरा नूर  और फ़ैज़ , सामने हैं फैज़ की बेटी सलीमा हाशमी
    सत्तर के दशक की शुरुआत में कॉलेज के कार्यक्रम में जब वो लता का गाया भजन जो तुम तोड़ो पिया ... गा रही थीं तब उनकी आवाज़ पर प्रोफेसर असरार का ध्यान गया। असरार संगीतविद्य होने के साथ एक कम्पोजर भी थे। असरार ने ना केवल नैयरा नूर को गाने के लिए प्रोत्साहन दिया बल्कि अपने संगीतबद्ध नग्मे भी उनसे गवाए। नैयरा ने अगले कुछ सालों में पाकिस्तान टेलीविजन के ड्रामों में अपनी आवाज़ दी पर उनकी आवाज़ को लोगों ने पहचानना तब शुरु किया जब फ़ैज साहब की ग़ज़लों के एक एलबम में उनके दामाद शोएब हाशमी ने नैयरा को मौका दिया।

    नैयरा ने शास्त्रीय संगीत की बक़ायदा शिक्षा नहीं ली पर ऐसा उन्हें  सुनने से महसूस नहीं होता। नैयरा की गाई जिस नज़्म को आज मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ वो इसी एलबम की है। ग़ज़ब सी कशिश है इस नज़्म में जो हाशमी साहब के दावतखाने में एक टेपरिकार्डर सरीखे यंत्र पर रिकार्ड की गई थी।

    रात के गहराते सायों में एकाकी मन जब काटने को दौड़ता है और धड़कता दिल गुजारिश करता है  उनके पास रहने की.. तो इस नज़्म की वादियों में मन ख़ुद ही भटक जाता है। आइए देखते हैं कि क्या कहते हैं फ़ैज़ इस नज़्म में..

    तुम मेरे पास रहो
    तुम मेरे पास रहो

    तुम मेरे पास रहो
    मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो
    जिस घड़ी रात चले
    जिस घड़ी रात चले
    आसमानों का लहू पी के स्याह रात चले
    मरहम-ए-मुश्क लिए नश्तर-ए-अल्मास लिए
    बैन करती हुई, हँसती हुई, गाती निकले
    दर्द के कासनी, पाज़ेब बजाती निकले


    मुझे पूरी तरह चेतना शून्य करने वाले मेरे प्रिय मेरे पास रहो। जब आस्मां का  नीला लहू पी के ये रात स्याह हो जाती है, तो हीरे के नश्तर सी ये दिल में  चुभती है। इसकी नीली पायल मेरे  दर्द की आवाज़ बन जाती है। कभी विलाप करती, कभी हँसती, कभी गाती तो कभी अपनी सुगंध से दिल को मरहम लगाती इस रात में मैं तुम्हारी कमी महसूस करता हूँ। ऐसी रातों में तुम मेरे पास रहो।

    जिस घड़ी सीनों में डूबे हुए दिल
    आस्तीनों में निहाँ हाथों की,
    राह तकने लगे, आस लिये
    और बच्चों के बिलखने की तरह, क़ुल-क़ुल-ए-मय
    बहर-ए-नासूदगी मचले तो मनाये न मने

    जब कोई बात बनाये न बने
    जब न कोई... बात चले
    जिस घड़ी रात चले
    जिस घड़ी मातमी, सुन-सान, स्याह रात चले
    पास रहो

    तुम मेरे पास रहो
    तुम मेरे पास रहो
    मेरे क़ातिल, मेरे दिलदार, मेरे पास रहो


    जब तेरी यादों में दिल डूबता है, तब आस्तीनों में छुपे तुम्हारे बाहुपाश की आस दिल को बेचैन करती है। इस बेचैनी में गिलास में गिरती शराब का स्वर भी बच्चों के बिलखने जैसा लगता है।  किसी तरह भी मन इस नैराश्य से निकल नहीं पाता। ना कोई बात सूझती है ना दोस्तों से बात करने का मन करता है। और तुम हो कि ऐसी दुखभरी सुनसान अँधेरी रात में भी पास नहीं रहती । अब तो रहोगी ना?



    नैयरा फ़ैज़ से जुड़ी अपनी यादों के बारे में कहती हैं कि जब मैं अपने सहगायकों के साथ रिकार्डिंग के लिए हाशमी साहब के घर पर होती तो फ़ैज़ साहब भी दूर बैठ कर हमें सुनते रहते। वैसे भी फ़ैज़ साहब को महफिलों में शिरक़त करना और दूसरों को सुनना पसंद था। उनकी चुप्पी तभी टूटती जब उनसे कोई राय माँगी जाती। जब भी हम कोई कठिन सुर लगाते तो कनखियों से फ़ैज़ साहब की ओर देखते और हमेशा हमें प्रोत्साहित करती मुस्कान उनके चेहरे पर होती। उन्हें देखकर हमें यही लगता कि वो भी हमारी गायिकी का पूरा आनंद उठा रहे  हैं ।

    शहरयार से शादी के बाद अस्सी के दशक के उत्तरार्ध से नय्यारा ने अपने आप को घर परिवार तक सीमित कर दिया। वो कहती हैं कि पारिवारिक जिम्मेदारियों को वहन करते हुए संगीत से जुड़े अपने पेशे को ठहराव देने का उन्हें कोई मलाल नहीं है।   अपनी पोतियों से दादी का शब्द सुनना ही आज उनके लिए संगीत है।

    रविवार, नवंबर 22, 2015

    मेरी तेरी निगाह में जो लाख इंतज़ार हैं.. फ़ैज़ की एक उदासी भरी नज़्म Kya Karein by Faiz !

      एक शाम मेरे नाम पर फ़ैज़ की शायरी से जुड़ी लंबी महफिलें अंजाम ले चुकी हैं। पुराने पाठकों को याद होगा कि उन की ग़ज़लों और नज़्मों पर एक दफ़े मैंने तीन कड़ियों की एक श्रंखला की थी।उन तीन भागों की लिंक तो ये रहीं.
      जो उनकी शायरी के मुरीद हैं उन्हें ये आलेख जरूर रास आएँगे ।

      बीस नवंबर को फ़ैज़ की पुण्यतिथि के रोज़ उनकी बहुत सारी ग़ज़लें और नज़्म एक बार फिर नज़रों से गुजरी और इस नज़्म को देख दिल एकबारगी सिहर उठा। सोचा इसी बहाने इस महान शायर की दमदार लेखिनी को एक बार फिर से याद कर लूँ।

      अब देखिए ना इश्क़ इंसान को मजबूती देता है, खुशी के पल मुहैया कराता है तो वहीं कभी ये हमें बिल्कुल असहाय, अकेला और आत्मविश्वास से परे भी ढकेल देता है। फ़ैज़ की ये नज़्म कुछ ऐसे ही उदास लमहों की कहानी कहती है। नज़्म की शुरुवात में फ़ैज़ कहते हैं..

      मेरी-तेरी निगाह में
      जो लाख इंतज़ार हैं
      जो मेरे-तेरे तन-बदन में
      लाख दिल-फ़िगार1  हैं
      जो मेरी-तेरी उँगलियों की बेहिसी2 से
      सब क़लम नज़ार3 हैं
      जो मेरे-तेरे शहर में
      हर इक गली में
      मेरे-तेरे नक़्श-ए -पा4   के बेनिशाँ मज़ार हैं

      1 . घायल , 2. संवेदनहीन , 3 . कमज़ोर , 4  पदचिन्ह

      इस कभी ना ख़त्म होने वाले इंतज़ार ने पुरानी यादों की रह रह कर उभरती टीस से मिलकर शायर के  दिल के कोने कोने को घायल कर दिया है। यहाँ तक कि प्रेमी के  साथ साथ कदमों से नापी शहर की दहलीज़ भी गुम सी हो गई लगती है। ये अलग बात है कि हमारा ये प्रेमी शायर हमसफ़र के साथ उन गुम से पलों को मन ही मन पूजता है तभी तो वे उसे 'बेनिशाँ मज़ार' से लगते हैं । जिन उँगलियों ने कभी वो मुलायम सा हाथ पकड़ा था वो संवेदनहीन हो चली हैं। ऐसे हालात में कवि की कलम  कमज़ोर  ना हो तो क्या हो?

      जो मेरी-तेरी रात के
      सितारे ज़ख़्म-जख़्म हैं
      जो मेरी-तेरी सुबह के
      गुलाब चाक-चाक हैं
       

      यह ज़ख़्म सारे बे-दवा
      यह चाक सारे बे-रफ़ू
      किसी पे राख चाँद की
      किसी पे ओस का  लहू


      कवि आगे कहते हैं कि तुम्हारे बिना सितारों से सजी वो रातें देखता हूँ तो उनके टिमटिमाते हृदय में भी मुझे अपने जख़्मों की परछाई नज़र आती है। अब तो वो गुलाब जिनके साथ हमारी कितनी सुबहें साथ कटी थीं चीरे हुए से  लगते हैं। फ़ैज की काव्यात्मक सोच का उत्कृष्ट नमूना तब देखने को मिलता है जब वे रातों में अपने दिल पर चाँद की राख मलते नज़र आते हैं। वही सुबह गुलाबों पर गिरी ओस उन्हे हृदय से रिसते लहू जैसी प्रतीत होती है। सच, अब तो उनके लिए प्रेम का ये ये मर्ज़ लाइलाज़  हो चला  है ।

      यह है भी या नहीं बता
      यह है कि महज़ जाल है
      मेरे-तुम्हारे अन्कबूत- ए -वहम5  का बुना हुआ
      जो है तो इसका क्या करें
      नहीं है तो भी क्या करें
      बता, बता, बता, बता 

       5  . संशय की मकड़ी 

      अवसाद की इन घड़ियों में व्यक्ति के लिए प्रेम संशय की स्थिति उत्पन्न कर देता है। क्या वो मुझसे सच में प्रेम करती है/करता  है? क्या मैं उसके लायक हूँ? क्या मेरा प्यार महज़ एक खुशफ़हमी है? ऐसे अनेक प्रश्न उसे मथते रहते हैं। नज़्म के आख़िरी भाग में फ़ैज़ ऐसी ही मनोदशा को हमारे सामने लाते हैं एक उलझन के साथ ! सच तो ये है कि  प्रेम को स्वीकार करने से ही तो दिल में आई आफ़त कम नहीं हो जाती। प्रेम तो तब भी परिस्थितियों का दास बन कर ही रहता है। दिल तो अब भी सवाल करता है जो है तो इसका क्या करें...नहीं है तो भी क्या करें

      फ़ैज़ की इस संवेदनशील नज़्म की उदासी को अपनी आवाज़ में क़ैद करने की कोशिश की है। उम्मीद है आपको पसंद आएगी। रिकार्डिंग के लिए इस पंक्ति में हल्का सा बदलाव किया है बता, बता, मुझे बता .. क्या करें.. क्या करें।


      सोमवार, जनवरी 26, 2015

      वार्षिक संगीतमाला 2014 पायदान # 13 : गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले.. Gulon Mein Rang Bhare

      पिछले साल के बेहतरीन गीतों को ढूँढते हुए हम आ चुके हैं संगीतमाला के बीचो बीच यानि इसके बाद शुरु होगा शीर्ष की बारह पायदानों का सफ़र। संगीतमाला की तेरहवीं पॉयदान पर जो ग़ज़ल है उसके बारे में पिछले साल नवंबर में विस्तार से चर्चा कर चुका हूँ। विशाल भारद्वाज ने मेहदी हसन साहब की गाई और फै़ज़ की लिखी इस ग़ज़ल को हैदर में इतनी खूबसूरती से समाहित किया कि ये ग़ज़ल फिल्म का एक जरूरी हिस्सा बन गई।


      फ़ैज़ की लिखी ग़ज़ल के भावार्थ को आज दोबारा नहीं लिखूँगा। अगर आप ने मेरी पिछली पोस्ट ना भी पढ़ी हो तो मेरी इस पॉडकॉस्ट को सुन लें जो मेरे उसी आलेख पर आधारित थी।


      पर विशाल ने फिल्म की कहानी के साथ इस ग़ज़ल के अलग अलग मिसरों को वादी-ए-कश्मीर के हालातों से जोड़ कर उसे एक अलग माएने ही दे दिए हैं। फिल्म में पहली बार ये ग़ज़ल तब आती है जब डा. साहब (फिल्म में हैदर के पिता का किरदार) मेहदी हसन साहब की ग़ज़ल सुनते हुए गुनगुना रहे हैं और हैदर जेब खर्च माँगने के लिए वो ग़ज़ल बंद कर देता है। उसे पैसे मिलते हैं पर तभी जब वो ग़ज़ल का जुमला याद कर सुना देता है..

      चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले...

      लेखिका मनरीत सोढ़ी सोमेश्वर ने इस ग़ज़ल के मतले को फिल्म की कहानी से जोड़ते हुए अपने एक अंग्रेजी आलेख में लिखा था
      "कश्मीर के बाग बागीचों का कारोबार तो नब्बे के दशक के मध्य में ही बंद हो गया था। हैदर की कहानी भी इसी समय की है। चिनार के पेड़ ही इस वादी को उसकी रंगत बख्शते थे। वही  दरख्त जिनके सुर्ख लाल रंग को देख कर फारसी आक्रमणकारियों आश्चर्य से बोल उठे थे चिनार जिसका शाब्दिक अर्थ था क्या आग है ! और उस वक़्त वादी प्रतीतात्मक रूप में ही सही भारतीय सेना और आतंकियों की गोलीबारी के बीच जल ही तो रही थी।"
      ग़ज़ल का अगला मिसरा भी तब उभरता है जब क़ैदखाने में डा. साहब यातनाएँ झेल रहे होते हैं। फिल्म में एक संवाद है  कैदखानों की उन  कोठरियों में सारी चीखें, सारी आहें जब  दफ़्न हो जाती थीं तब एक आवाज़ बिलखते हुए सन्नाटे से सुर मिला के रात के जख्मों पर मलहम लगाया करती थी।

      कफ़स उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो
      कहीं तो बह्र-ए-खुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

      सच तो ये है कि विशाल भारद्वाज ने फिल्म में अरिजित की ग़ज़ल इस्तेमाल ही नहीं की। पर उसे पहले प्रमोट कर देखने वाले के ज़ेहन में उसे बैठा दिया ताकि कहानी में जब उसके मिसरे गुनगुनाए जाएँ  तो लोग उसे कहानी से जोड़ सकें। मेहदी हसन की इस कालजयी ग़ज़ल को गाने की कोशिश कर पाना ही अपने आप में अरिजित के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। नाममात्र के संगीत (पूरे गीत में आपको गिटार की हल्की सी झनझनाहट के साथ मात्र ड्रम्स संगत में बजती हुई सुनाई देती है) के साथ अपनी आवाज़ के बलबूते पर उन्होंने इस ग़ज़ल को बखूबी निभाया है।

      तो आइए सुनते हैं इस फिल्म के लिए रिकार्ड की गई ये ग़ज़ल


      वार्षिक संगीतमाला 2014

      रविवार, नवंबर 02, 2014

      गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले.. Gulon Mein Rang bhare...

      दीवाली की छुट्टियों के दौरान विशाल भारद्वाज की फिल्म हैदर देखी। फिल्म में विशाल ने फैज़ की लिखी सदाबहार ग़ज़ल गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले फिर से जुबाँ पर ला दी। फिल्मों में किसी ग़ज़ल को खूबसूरती से पेश किया जाए तो उसमें अन्तरनिहित भावनाएँ दिल में बहुत दिनों तक बनी रहती हैं। सोचा था वार्षिक संगीतमाला 2014 में  अरिजित सिंह की गाई इस ग़ज़ल को तो स्थान मिलेगा ही तब ही लिखूँगा इसके बारे में। पर एक बार कोई गीत ग़ज़ल दिमाग पर चढ़ जाए फिर मन कहाँ मानता है बिना उसके बारे में लिखे हुए। मुझे मालूम है कि हैदर देखते हुए बहुत से लोगों का पहली बार इस ग़ज़ल से साबका पड़ा होगा और उसकी भावनाओं की तह तक पहुँचने की राह में उर्दू व फ़ारसी के कठिन शब्दों ने रोड़े अटकाए होंगे। मैंने यही कोशिश की है कि जो भावनाएँ ये ग़ज़ल मेरे मन में जगाती है वो इस आलेख के माध्यम से आप तक पहुँचा सकूँ। ये इस ग़ज़ल का शाब्दिक अनुवाद नहीं पर ग़ज़ल को समझने की मेरी छोटी सी कोशिश है। ग़ज़ल का मतला है..

      गुलों मे रंग भरे, बाद-ए-नौबहार चले
      चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

      काश ऐसा हो कि वसंत की ये हवा चले और इस बागीचे के सारे फूल अपने रंग बिरंगे वसनों को पहन कर खिल उठें। पर सच बताऊँ इस गुलशन की असली रंगत तो तब आएगी जब तुम इनके बीच रहो।

      कफ़स उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो
      कहीं तो बह्र-ए-खुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

      कभी तो सुब्ह तेरे कुन्ज-ए-लब से हो आगाज़
      कभी तो शब् सर-ए-काकुल से मुश्कबार चले


      फ़ैज़ ने ये ग़ज़ल तब लिखी थी जब वो जेल की सलाखों के पीछे थे। उनके अशआरों में छुपी बेचैनी को इसी परिपेक्ष्य में महसूस करते हुए ऐसा लगता है मानो वे कह रहे हों इन सींखचों के पीछे मन में तैरती उदासी जाए तो जाए कैसे ? ऐ हौले हौले बहने वाली हवा भगवान के लिए तुम्हीं उनका कोई ज़िक्र छेड़ो ना। क्या पता उनकी यादों की खुशबू इस मायूस हृदय को सुकून पहुँचा सके। कभी तो ऐसा हो कि सुबह की शुरुआत तुम्हारे होठों के किनारों के छू जाने से होने वाली सिहरन की तरह हो। कभी तो रात का आँचल तुम्हारी घनी जुल्फो से आती खुशबू सा महके।

      जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब्-ए-हिजरां
      हमारे अश्क तेरे आक़बत सँवार चले

      जब हम प्रेम में होते हैं तो हमें अपने से ज्यादा अपने साथी की फिक्र होती है उसकी हर खुशी हमें अपने ग़म से बढ़कर प्रतीत होती हैं। फ़ैज अपने  शेर में इस भावना को कुछ यूँ बयाँ करते हैं.. मैं तो अपनी पीड़ा को किसी तरह सह लूँगा पर मेरे दोस्त मुझे इस बात का संतोष तो है कि विरह की उस रात में बहे मेरे आँसू बेकार नहीं गए। कम से कम आज तुम्हारारे भविष्य सही राहों पर तो है।

      हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब
      गिरह मे लेके गरेबां का तार-तार चले

      आज उन्होंने बुलाया है मुझे, मेरे जुनूँ मेरी दीवानगी के सारे बही खातों पर गौर फ़रमाने के लिए और मैं हूँ कि अपने दिल रूपी गिरेबान कें अदर दर्द के इन टुकड़ो् की गाँठ बाँध कर निकल पड़ा हूँ।

      मक़ाम फैज़ कोई राह मे जँचा ही नही
      जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले

      फ़ैज ने आपनी शायरी की शुरुआत तो रूमानियत से की पर माक्रसवादी विचारधारा के प्रभाव ने उन्हें एक क्रांतिकारी शायर बना दिया। अपनी ज़िदगी में उन्होंने कभी बीच की राह नहीं चुनी। मक़्ते में शायद इसीलिए वे कहते हैं इस दोराहे के बीच उन्हें कोई और रास्ता नहीं दिखा। प्रेमिका की गली से निकले तो फिर वो राह चुनी जो फाँसी के फंदे पर जाकर ही खत्म होती थी।

      वैसे तो इस ग़ज़ल को तमाम गायकों ने अपनी आवाज़ दी है पर पर जनाब मेहदी हसन की अदाएगी की बात कुछ और है तो लीजिए सुनिए उनकी आवाज़ में ये दिलकश ग़ज़ल


      वैसे अगर आप पूरी पोस्ट मेरी आवाज़ में सुनना चाहते हों तो इस पॉडकॉस्ट में सुन भी सकते हैं। बोलने में तीन चार जगह गलतियाँ हो गई हैं उसके लिए पहले से ही क्षमा प्रार्थी हूँ।

      रविवार, अप्रैल 10, 2011

      फ़ैज़ जन्मशती वर्ष विशेष : जब मशहूर अभिनेत्री शबाना आज़मी मिलने गयीं फैज़ अहमद 'फ़ैज़' से...

      बचपन से बड़े होते होते ऐसी कई शख़्सियत हमारे जीवन में आती हैं, जिनसे हम खासा प्रभावित रहते हैं। उनसे मिलने की, देखने की और दो बाते करने की हसरत मन में पाले रहते हैं। पर जब किसी सुखद संयोग से हमारी ये मनोकामना पूरी हो जाती है तो अपने उस प्रेरणा स्रोत के सामने अपने आप को निःशब्द पाते हैं। पर ऐसा सिर्फ मेरे आपके जैसे आम लोगों के साथ  ही होता है ऐसा भी नहीं है। बड़े बड़े सेलीब्रिटी भी जब अपने पसंदीदा व्यक्तित्व के पास अपने आप को पाते हैं तो उनकी हालत भी कुछ वैसी ही हो जाती है।

      एक ऐसा ही किस्सा याद आता है जो जानी मानी अभिनेत्री शबाना आज़मी ने एक बार अपने साक्षात्कार में अपने प्रिय शायर फ़ैज़ अहमद 'फैज़' की याद में सुनाया था। जैसा कि आपको मालूम होगा कि ये साल फ़ैज़ की जन्मशती वर्ष भी है तो मैंने सोचा क्यूँ ना उस रोचक किस्से को आप सब से साझा किया जाए। शबाना जी के लिए फ़ैज़, शेक्सपियर, कीट्स और ग़ालिब जैसे उस्ताद कवियों शायरों से भी ज्यादा पसंदीदा शायर रहे हैं। अब उन्हीं की जुबानी सुनिए कि जब फ़ैज से उनकी प्रत्यक्ष मुलाकात हुई तो उसका उनके दिल ओ दिमाग पर क्या असर पड़ा...



      "एक बार ऐसा हुआ था कि मास्को फिल्म फेस्टिवल के दौरान मुझे पता चला कि फ़ैज़ साहब भी वहीं हैं तो मैं बहुत खुशी से गई उनसे मिलने के लिए। तो फिर उन्होंने कहा कि बेटा तुम शाम को आओ मुझसे मिलने तो मैं फिर गई उनके कमरे में। तो उन्होंने कहा कि कुछ शेर हो गए हैं लो पढ़ो बिल्कुल नए हैं। मेंने ज़रा सा खिसियाते हुए, सर खुजाते हुए कहा ...

      फ़ैज़ चाचा मैं उर्दू नहीं पढ़ सकती। वो एकदम से आगबबूला हो गए और कहने लगे...

      क्या मतलब है तुम्हारा ? नामाकूल हैं तुम्हारे माँ बाप ...
      (सनद रहे कि शबाना आज़मी मकबूल और अज़ीम शायर कैफ़ी आजमी की बेटी हैं और फ़ैज़ उनके माता पिता के अच्छे मित्रों में से थे। ऐसी उलाहना आत्मीय मित्रों को ही दी जा सकती है )


      मैंने सफाई देते हुए कहा कि ऐसा नहीं है। मगर मैं शायरी खूब अच्छी तरह समझ सकती हूँ। आप की बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ और मैं उर्दू समझती हूँ। सिर्फ लिख पढ़ नहीं सकती। आप की पूरी शायरी मुझे मुँहज़ुबानी याद है। जैसे कि.. जैसे कि.. और उस वक़्त मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। मैंने कहा जैसे कि
      "देख कि दिल की जाँ से उठता है
      ये धुआँ सा कहाँ से उठता है...."

      तो उन्होंने एक क़श लेते हुए कहा. कि भई ....वो तो मीर का क़लाम है...

      मैंने कहा कि नहीं नहीं मेरा मतलब वो थोड़ी था मतलब...

      "बात करनी कभी मुझे मुश्किल कभी ऍसी तो ना थी.."
      तो फिर उन्होंने अपनी सिगरेट रखी और कान खुजाते हुए कहा कि देखिए भई मीर की हद तक तो ठीक था पर बहादुर शाह ज़फर को मैं शायर नहीं मानता...

      इतना सुनना था कि मेरा चेहरा शर्म से लाल हो गया और किसी तरह मुँह छुपाते हुए  मैं कमरे से निकल गई। मैंने सोचा ये सचमुच समझेंगे कि मुझे कुछ नहीं आता और मैं बाहर गई और उनकी तमाम शायरी मुझे पट पट पट पट पट याद आ गई। पर उस वक़्त मैं इतना घबड़ा गई थी कि मुझे कुछ याद नहीं आया। फ़ैज चाचा से मुलाकात का ये एक ऍसा वाक़या है जो मैं जिंदगी भर नहीं भूलूँगी।"

      वैसे क्या आपको पता है कि शबाना एक कुशल अभिनेत्री के साथ साथ एक अच्छी गायिका हैं? सुनिए उनकी आवाज़ फ़ैज़ की ये मशहूर नज़्म जो हमेशा से लोगों की आवाज़ को हुक्मरानों तक पहुंचाने के लिए प्रेरित करती रही है। कुछ वर्षों पहले मैंने इस नज़्म को टीना सानी की आवाज़ में आप तक पहुँचाया था



      बोल कि लब आजाद हैं तेरे
      बोल, जबां अब तक तेरी है
      तेरा सुतवां* जिस्म हे तेरा
      बोल कि जां अब तक तेरी है
      * तना हुआ

      देख कि आहनगर* की दुकां में
      तुन्द** हैं शोले, सुर्ख है आहन^
      खुलने लगे कुफलों के दहाने^^
      फैला हर जंजीर का दामन
      *लोहार, ** तेज, ^लोहा, ^^तालों के मुंह

      बोल, ये थोड़ा वक्त बहुत है
      जिस्मों जबां की मौत से पहले
      बोल कि सच जिंदा है अब तक
      बोल कि जो कहना है कह ले

      बुधवार, नवंबर 25, 2009

      ये दाग दाग उजाला, ये शबगज़ीदा सहर : सुनिए आज के हालातों के मद्देनज़र फैज़ की ये नज़्म नसीरुद्दीन शाह की आवाज़ में...

      आज से करीब २५ साल पहले २० नवंबर १९८४ को लाहौर के मेयो अस्पताल से फ़ैज़ अहमद फैज़ हमें छोड़ कर चले गए। पर फ़ैज़ की ग़ज़लें, उनकी नज़्में रह रह कर दिल में उभरती रहती हैं। आज की सुबह एक ऍसी ही सुबह है जब उनकी इस नज़्म की याद मुझे बारहा आ रही है। क्यूँ आ रही है ये बात बाद में । पहले ये जान लें कि फ़ैज ने इस नज़्म में क्या लिखा था?

      फ़ैज़ ने अगस्त १९४७ में पाकिस्तान के तत्कालीन हालातों के मद्देनज़र एक नज़्म लिखी थी सुबह-ए- आज़ादी। कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े फ़ैज़ आज़ादी को एक ऍसे परिवर्तन के रूप में देखना चाहते थे जो अमीरी और गरीबी की खाई को मिटा दे। पर जब ऍसा कुछ नहीं हुआ तो मायूस हो कर उन्होंने लिखा

      कैसी दागदार रौशनी के साथ निकली है ये सुबह जिसमें कुछ दिखाई नहीं दे रहा। जब हम अपने इस सफ़र में चले थे तो हमने ऐसी सुबह की तो कल्पना नहीं की थी। हमारी कल्पनाओं की सुबह तो उस मुकाम की तरह थी जैसे कोई आसमान की चादर पर चलते हुए जगमगाते तारों के पास पहुँच जाए या जैसे भटकती हुई समुद्र की धारा को उसका किनारा मिल जाए।

      ये दाग दाग उजाला, ये शबगज़ीदा सहर
      वो इन्तज़ार था जिस का, ये वो सहर तो नहीं
      ये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू लेकर
      चले थे यार कि मिल जायेगी कहीं न कहीं
      फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल
      कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल

      आखिर कहीं तो ग़म से भरे इस दिल की नैया को किनारा मिलेगा? युवावस्था की रहस्यमय दहलीज़ को पार करते वक़्त इस सफ़र पर चलने से हमें जाने कितने ही हाथों ने रोका। हुस्न की परियाँ हमें आवाज़ देकर अपनी ओर आकृष्ट करने का प्रयास करती रहीं पर फिर भी वो हमें अपने मार्ग से विचलित ना कर सकीं, थका ना सकीं। आखिर क्यूँ ? क्यूँकि दिल में उस सुबह को लाने का एक जोश था, एक उमंग थी। हमारे लिए तो उस बिल्कुल करीब आ गई सुबह के हसीं दामन को छू लेना ही अंतिम मुकाम था।

      कहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म-ए-दिल
      जवाँ लहू की पुर-असरार शाहराहों से
      चले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़े
      दयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों से
      पुकारती रहीं बाहें, बदन बुलाते रहे
      बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन
      बहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामन
      सुबुक सुबुक थी तमन्ना, दबी दबी थी थकन

      सुन रहे हैं कि जुल्म के बादल अब छँट चुके हैं और लोग तो ये भी कह रहे हैं कि जिस मंजिल की तलाश में हम चले थे वो हमें मिल भी चुकी है। पर कहाँ है चेहरों पर लक्ष्य मिलने की खुशी? अगर हालात बदले हैं तो उनका असर क्यूँ नहीं दिखाई देता? जिस सुबह की हवा का हमें बेसब्री से इंतज़ार था वो किधर से आई और किधर चली गई? अब देखिए ना सड़क के किनारे जलते इस प्रकाशपुंज को भी उसके जाने का रास्ता नहीं मालूम। रात का भारीपन भी तो कम होता नहीं दिखता। इसीलिए तो मुझे लगता है आँखों और दिल को जिस सुबह की तलाश थी वो अभी नहीं आई। तुमलोग भी आगे का सफ़र करने को तैयार हो जाओ कि मंज़िल तक पहुँचना अभी बाकी है.....

      सुना है हो भी चुका है फ़िराक़-ए-ज़ुल्मत-ओ-नूर
      सुना है हो भी चुका है विसाल-ए-मंज़िल-ओ-गाम
      बदल चुका है बहुत अहल-ए-दर्द का दस्तूर
      निशात-ए-वस्ल हलाल-ओ-अज़ाब-ए-हिज्र-ओ-हराम
      जिगर की आग, नज़र की उमंग, दिल की जलन
      किसी पे चारा-ए-हिज्राँ का कुछ असर ही नहीं
      कहाँ से आई निगार-ए-सबा, किधर को गई
      अभी चराग़-ए-सर-ए-राह को कुछ ख़बर ही नहीं
      गिरानि-ए-शब में कमी नहीं आई
      निजात-ए-दीद-ओ-दिल की घड़ी नहीं आई
      चले चलो कि वो मंज़िल अभी नहीं आई

      ये तो थी मेरी समझ के हिसाब से इस उर्दू नज़्म का अनुवाद करने की एक कोशिश। संभवतः इसमें कुछ त्रुटियाँ भी हो सकती हैं। वैसे कुछ दिनों पहले मुझे कुर्तुलीन हैदर की किताब आग का दरिया के अंग्रेजी अनुवाद The River of Fire के एक अंश को पढ़ने का मौका मिला था। उस किताब में फ़ैज की इस नज़्म का संक्षिप्त अनुवाद करते हुए कुर्तुलीन जी ने लिखा था


      This blighted dawn , this darkened sun. This is not the morning we waited for.We went forth in the desert of heaven, hoping to reach our destination of stars. We hoped that, somewhere, we would come ashore from the placid river of the night, that the barge of sorrow would end its cruise. Whence came the early morning breeze, where did it go? The wayside lamp does not know. The night's burden has not diminished, the hour of deliverance for eye and heart has not arrived. Face forward! For our destination is not yet
      in sight.
      तो आइए सुनें जाने माने अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की धारदार आवाज़ में फ़ैज़ की ये नज़्म

       
       

      बुधवार, अक्टूबर 21, 2009

      आए कुछ अब्र कुछ शराब आए: फ़ैज़ के क़लाम पर रूना लैला का खनकता स्वर

      दीपावली एक ऐसा त्योहार है जिसकी गहमागहमी में ब्लॉग की ओर भी रुख करने को जी नहीं चाहता। साल के इन दिनों में पुरानी स्मृतियों से गुजरना अच्छा लगता है। आप कहेंगे दीपावली से पुरानी स्मृतियों का क्या लेना देना? दरअसल जब भी घर की साफ सफाई में अपने आप को लगाता हूँ, कुछ पुराने ख़तों, तसवीरों,काग़ज़ातों और उनसे जुड़ी यादों से अपने आप को घिरा पाता हूँ। दीप से लेकर पटाखे जलाने तक में अपने बच्चे के साथ खुद भी बच्चा बनने की ख़्वाहिश रहती है मेरी। फिर भला एक बार नेट से दूर जाने पर ब्लॉग की बात भी क्यूँ याद आए?

      पर अब तो दीपावली भी खत्म हो गई है। और शुक्र की बात है कि इस बार की दीपावली बिना किसी मानव निर्मित हादसे के बिना ही गुजर गई। पर मन अभी भी अनमना सा है। क्यूँ है ये अनमनापन पता नहीं। शायद छुट्टियों से लौट कर फिर दैनिक दिनचर्या से बँधने की खीज़ है या मन में अटका कोई बिना बात का फ़ितूर। दीपावली के पहले फ़ैज़ के एक क़लाम को ढूँढ कर रखा था तबियत से सुनने के लिए और आज वही कर भी रहा हूँ ...


      और जब फैज़ की ग़ज़ल के कुछ अशआरों को रूना लैला की खनकती आवाज़ का सहारा हो तो ग़जल की तासीर ही कुछ और हो जाती है




      आए कुछ अब्र1 कुछ शराब आए
      उसके बाद आए जो अज़ाब2 आए

      1-बादल, 2-मुसीबत

      बाम-ए-मीना3 से महताब4 उतरे
      दस्त-ए-साकी5 में आफ़ताब6 आए

      3 - स्वर्ग की छत, 4- चाँदनी, 5 - साकी के हाथों में, 6 - सूर्य किरणें

      हर रग-ए-ख़ूँ में फिर चरागाँ हो
      सामने फिर वो बेनक़ाब आए


      कर रहा था ग़म-ए-ज़हाँ का हिसाब
      आज तुम याद बेहिसाब आए


      ना गई तेरे ग़म की सरदारी7
      दिल में यूं रोज इनकिलाब आए

      7 - तांडव, आतंक

      इस तरह अपनी खामोशी गूँजी
      गोया हर सिमत8 से जवाब आए

      8 - तरफ़

      ‘फ़ैज़’ थी राह सर-बसर मंज़िल
      हम जहाँ पहुँचे क़ामयाब आए



      ऐसी आवाज़..ऍसी कम्पोजीशन को सुने अब अर्सा बीत गया। वैसे पिछले महिने रूना जी म्यूजिक टुडे के विभिन्न अवसरों में गाए जाने वाले पंजाबी गीतों के इस एलबम के लिए दस साल बाद भारत की यात्रा पर आईं थीं। रूना जी ने उस दौरान दिए गए एक साक्षात्कार में बताया
      मैंने जब गाना शुरु किया तो मैं बारह साल की भी नहीं थी। उस ज़माने की फिल्में परिवारोन्मुख सामाजिक परिवेश से जुड़ी होती थीं। ऍसा नहीं कि आज की फिल्में ऍसी नहीं हैं पर आजकल ध्यान स्टंट और सुंदर स्थलों पर की जाने वाली शूटिंग पर कहीं ज़्यादा है। उस ज़माने की बात करूँ तो संगीत बेहद अहम हिस्सा हुआ करता था फिल्मों का। उस वक़्त लोग संगीत सुनने के लिए फिल्म देखते थे। संगीत रिकार्डिंग एक सामाजिक उत्सव लगता था जहाँ सब अपने किरदारों को बिना थोड़ी सी गलती के निभाना अपना कर्तव्य समझते थे। आज तो स्टूडिओ में आए पूछा गाना क्या है, अलग अलग पंक्तियाँ या कभी कभी तो शब्द गा दिए और हो गया जी गीत तैयार। ये बेहद आसान है पर मुझे लगता है कि ऍसा करते वक़्त उन भावनाओं को खो देते हैं जो पूरे गीत को एक साथ गाने में आती हैं।
      बिल्कुल वाज़िब फर्माया रूना लैला जी ने ! वैसे मुझे तो लगता है कि आज भी लोग अच्छे संगीत की वज़ह से सिनेमा देखने जाना चाहते हैं। पर वैसा संगीत देने के लिए जिस मेहनत की जरूरत है उस मापदंड को साल में चार पाँच फिल्में ही पूरी तरह पैदा कर पाती हैं। अगर हमारे रूना लैला जैसे शैदाइयों की खुशकिस्मती रही तो हिंदी फिल्म जगत में भी रूना की आवाज़ को सुनने का मौका एक बार फिर मिल पाएगा।

      सोमवार, सितंबर 08, 2008

      आशा ताई की सालगिरह पर सुनिए गैर फिल्मी गीत, नज़्म और ग़ज़ल का ये गुलदस्ता...!

      आज आशा ताई की सालगिरह है। कुछ दिनों पहले उन्हें 'सा रे गा मा' के मंच पर गाते सुना था। अभी भी वो खनक, वो माधुर्य जस का तस बना लगता है। आज इस खुशी के अवसर पर गीत और ग़ज़लों का ये गुलदस्ता आपके लिए पेश-ए-खिदमत है। जीवन के हर रंग को अपनी गायिकी में समाहित करने वाली इस महान गायिका की आवाज़ में आज सुनिए पिया को संबोधित करता एक प्यारा सा गीत, एक उदासी भरी नज़्म और फ़ैज की लिखी एक दिलकश ग़ज़ल ।

      सबसे पहले बात इस नज़्म की जो मैंने सबसे पहले 1985 के आस पास सुनी थी। अभी जो थोड़ी बहुत उर्दू समझ में आती है, उस वक़्त वो भी समझ नहीं आती थी। पर जाने क्या था इस नज़्म में, कि मुखड़ा सुनते ही इसकी उदासी दिल में तैर जाती थी। मेरे ख्याल से ये सारा करिश्मा था आशा ताई की भावपूर्ण आवाज का, जिसकी वज़ह से भाषा की समझ ना होते हुए भी इसकी भावनाओं का संप्रेषण हृदय तक सहजता से हो जाता था।


      तो आइए पहले सुनें मेराज-ए-ग़ज़ल से ली गई सलीम गिलानी साहब की लिखी ये नज़्म



      रात जो तूने दीप बुझाए
      मेरे थे... मेरे थे....
      अश्क जो सारे दिल में छुपाए
      मेरे थे... मेरे थे....

      कैफे बहाराँ, महरे निगाराँ, लुत्फ ए जुनूँ
      मौसम ए गुल के महके साए
      मेरे थे... मेरे थे....

      मेरे थे वो, खाब जो तूने छीन लिए
      गीत जो होठों पर मुरझाए
      मेरे थे... मेरे थे....

      आँचल आँचल, गेसू गेसू, चमन चमन
      सारी खुशबू मेरे साए
      मेरे थे... मेरे थे....

      साहिल साहिल लहरें जिनको ढूँढती हैं
      माज़ी के वो महके साए
      मेरे थे... मेरे थे....


      गुलाम अली के साथ आशा जी का ये एलबम मुझे दो अन्य प्रस्तुतियों के लिए भी प्रिय था। एक तो शबीह अब्बास का लिखा, बड़ा प्यारा सा मुस्कुराता गुदगुदाता ये नग्मा । देखिए आशा जी अपनी इठलाती आवाज़ में किस तरह अपने साजन के लिए प्रेम के कसीदे पढ़ रही हैं




      सलोना सा सजन है और मैं हूँ
      जिया में इक अगन है और मैं हूँ

      तुम्हारे रूप की छाया में साजन
      बड़ी ठंडी जलन है ओर मैं हूँ

      चुराये चैन रातों को जगाए
      पिया का ये चलन है और मैं हूँ

      पिया के सामने घूँघट उठा दे
      बड़ी चंचल पवन है और मैं हूँ

      रचेगी जब मेरे हाथों में मेंहदी
      उसी दिन की लगन है और मैं हूँ


      और आज की इस महफिल का समापन करते हैं इसी एलबम की इस बेहद मशहूर ग़ज़ल से, जिसे लिखा था फ़ैज अहमद फ़ैज ने

      यूँ सजा चाँद कि छलका तेरे अंदाज का रंग
      यूं फ़जा महकी कि बदला मेरे हमराज का रंग





      जिस एलबम में आशा जी के गाए इतने खूबसूरत नगीने हों उसे अगर आप नेट से खरीदना चाहें तो यहाँ क्लिक करें।

      रविवार, नवंबर 04, 2007

      फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ :शीशों का मसीहा कोई नहीं क्या आस लगाए बैठे हो ?

      बहुत अर्से पहले की बात है। अंतरजाल पर एक शायरी समूह में हरिवंशराय बच्चन की कविता "..जो बीत गई सो बात गई, मानो वो बेहद प्यारा था.." की बात चल रही थी। उसी सिलसिले में बात निकली की फ़ैज अहमद फ़ैज ने भी कुछ ऍसा ही लिखा था ..."तुम नाहक टुकड़े चुन चुन कर, दामन में छुपाए बैठे हो...शीशों का मसीहा कोई नहीं क्या आस लगाए बैठे हो..."। उस बातचीत का असर ये हुआ कि नज़्म का मुखड़ा दिमाग में रह गया। बाद में जब ये नज़्म, 'फै़ज़' के एक संकलन में पूरी पढ़ी तब समझ आया कि जहाँ बच्चन ने अपनी कविता पहली पत्नी के देहांत के बाद अपने व्यक्तिगत वियोग से ऊपर उठने के लिए लिखी थी, वहीं फ़ैज ने जेल से लिखी इस नज्म में जीवन के व्यक्तिगत सपनों के टूटने से उपजी उदासी को भुलाकर, सामाजिक असमानता को कम करने के लिए संघर्ष करने का आह्वान किया था।

      फ़ैज़ की ये नज़्म आज के सामाजिक हालातों को देखते हुए भी उतनी ही सापेक्षिक है। बहुत पहले इसे मैंने इसके कुछ हिस्सों को अपने रोमन चिट्ठे पर चढ़ाया था पर इस नज़्म को आज यहाँ अश्विन्दर सिंह की गुजारिश पर पूरी पेश कर रहा हूँ


      मोती हो कि शीशा, जाम कि दुर1
      जो टूट गया सो टूट गया
      कब अश्कों से जुड़ सकता है
      जो टूट गया, सो छूट गया
      1. एक तरह का माणिक

      तुम नाहक टुकड़े चुन चुन कर
      दामन में छुपाए बैठे हो
      शीशों का मसीहा कोई नहीं
      क्या आस लगाए बैठे हो

      शायद कि इन्हीं टुकड़ों में कहीं
      वो साग़रे-दिल2 है जिसमें कभी
      सद नाज़3 से उतरा करती थी
      सहबाए-गमें-जानां की परी
      2. हृदय रूपी मदिरा पात्र, 3.गर्व से

      फिर दुनिया वालों ने तुम से
      ये सागर लेकर फोड़ दिया
      जो मय थी बहा दी मिट्टी में
      मेहमान का शहपर4 तोड़ दिया
      4. सबसे मज़बूत पंख

      ये रंगी रेजे5 हैं शाहिद6
      उन शोख बिल्लूरी7 सपनों के
      तुम मस्त जवानी में जिन से
      खल्वत8 को सजाया करते थे

      5. टुकड़े, 6. साक्षी, 7. काँच, 8. एकाकीपन

      नादारी 9, दफ्तर, भूख और गम
      इन सपनों से टकराते रहे
      बेरहम था चौमुख पथराओ
      ये कांच के ढ़ांचे क्या करते

      9. दरिद्रता

      या शायद इन जर्रों में कहीं
      मोती है तुम्हारी इज्जत का
      वो जिस से तुम्हारे इज्ज़10 पे भी
      शमशादक़दों11 ने नाज़ किया
      10. विनम्रता 11. सरों के पेड़ ऍसे कद वालों ने

      उस माल की धुन में फिरते थे
      ताजिर भी बहुत रहजन भी बहुत
      है चोर‍नगर, यां मुफलिस की
      गर जान बची तो आन गई

      ये सागर शीशे, लालो- गुहर
      सालम हो तो कीमत पाते हैं
      यूँ टुकड़े टुकड़े हों तो फकत12
      चुभते हैं, लहू रुलवाते हैं

      12. सिर्फ

      तुम नाहक टुकड़े चुन चुन कर
      दामन में छुपाए बैठे हो
      शीशों का मसीहा कोई नहीं
      क्या आस लगाए बैठे हो

      यादों के गरेबानों के रफ़ू
      पर दिल की गुज़र कब होती है
      इक बखिया उधेड़ा, एक सिया
      यूँ उम्र बसर कब होती है

      इस कारगहे-हस्ती13 में जहाँ
      ये सागर शीशे ढ़लते हैं
      हर शै का बदल मिल सकता है
      सब दामन पुर हो सकते हैं
      13. संसार

      जो हाथ बढ़े यावर14 है यहाँ
      जो आंख उठे वो बख़्तावर15
      यां धन दौलत का अंत नहीं
      हों घात में डाकू लाख यहाँ
      14. सहायक, 15. भाग्यवान

      कब लूट झपट में हस्ती16 की
      दुकानें खाली होती हैं
      यां परबत परबत हीरे हैं
      या सागर सागर मोती है
      16. जीवन

      कुछ लोग हैं जो इस दौलत पर
      पर्दे लटकाया फिरते हैं
      हर परबत को हर सागर को
      नीलाम चढ़ाते फिरते हैं

      कुछ वो भी हैं जो लड़ भिड़ कर
      ये पर्दे नोच गिराते हैं
      हस्ती के उठाईगीरों की
      हर चाल उलझाए जाते हैं


      इन दोनों में रन१७ पड़ता है
      नित बस्ती बस्ती नगर नगर
      हर बसते घर के सीने में
      हर चलती राह के माथे पर
      १७. संघर्ष

      ये कालक भरते फिरते हैं
      वो जोत जगाते रहते हैं
      ये आग लगाते फिरते हैं
      वो आग बुझाते रहते हैं

      सब सागर शीशे, लालो-‍गुहर
      इस बाज़ी में बिद जाते हैं
      उठो, सब ख़ाली हाथों को
      इस रन से बुलावे आते हैं


      फ़ैज़ अहमद 'फ़ैज़'

      शनिवार, मार्च 31, 2007

      'फैज' : राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के स्वर -बोल ...,कुत्ते, हम देखेंगे, फकत चंद रोज मेरी जान !

      फैज की इक खासियत थी कि जब भी वो अपना शेर पढ़ते उनकी आवाज कभी ऊँची नहीं होती थी । दोस्तों की झड़प और आपसी तकरार उनके शायरी के मूड को बिगाड़ने के लिए पर्याप्त हुआ करती थी। पर उनके स्वभाव की ये नर्मी कभी भी तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक हालातों पर अपनी लेखनी के माध्यम से चोट करने में आड़े नहीं आई ।१९४७ में विभाजन से मिली आजादी के स्वरूप से वो ज्यादा खुश नहीं थे । उनकी ये मायूसी इन पंक्तियों से साफ जाहिर है

      ये दाग दाग उजाला , ये शब-गजीदा* सहर
      वो इंतजार था जिसका वो सहर तो नहीं


      ये वो सहर तो नहीं जिस की आरजू लेकर
      चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं ना कहीं
      फलक** के दश्त में तारों की आखिरी मंजिल

      *कष्टभरी ** आसमान

      फैज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे । पाकिस्तान में सर्वहारा वर्ग के शासन के लिए वो हमेशा अपनी नज्मों से आवाज उठाते रहे। बोल की लब आजाद हैं तेरे....उनकी एक ऐसी नज्म है जो आज भी जुल्म से लड़ने के लिए आम जनमानस को प्रेरित करने की ताकत रखती है । इसीलिए पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में ये उतनी ही लोकप्रिय है जितनी की पाक में । टीना सानी की आवाज में इस नज्म को सुनें, मेरा यकीन है कि इसमें कही गई बात आपके दिल तक पहुँचेगी


      बोल कि लब आजाद हैं तेरे
      बोल, जबां अब तक तेरी है
      तेरा सुतवां* जिस्म हे तेरा
      बोल कि जां अब तक तेरी है
      * तना हुआ


      देख कि आहनगर* की दुकां में
      तुन्द** हैं शोले, सुर्ख है आहन^
      खुलने लगे कुफलों के दहाने^^
      फैला हर जंजीर का दामन

      *लोहार, ** तेज, ^लोहा, ^^तालों के मुंह

      बोल, ये थोड़ा वक्त बहुत है
      जिस्मों जबां की मौत से पहले
      बोल कि सच जिंदा है अब तक
      बोल कि जो कहना है कह ले


      लियाकत अली खाँ की सरकार का तख्ता पलट करने की कम्युनिस्ट साजिश रचने के जुर्म में १९५१ में फैज पहली बार जेल गए । जेल की बंद चारदीवारी के पीछे से मन में आशा का दीपक उन्होंने जलाए रखा ये कहते हुए कि जुल्मो-सितम हमेशा नहीं रह सकता ।

      चन्द रोज और मेरी जान ! फकत* चन्द ही रोज !
      जुल्म की छांव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
      और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें
      अपने अजदाद की मीरास** है माजूर*** हैं हम

      *सिर्फ **पुरखों की बपौती *** विवश

      जिस्म पर कैद है, जज्बात पे जंजीरे हैं
      फिक्र महबूस है* , गुफ्तार पे ताजीरें** हैं
      अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिये जाते हैं
      जिंदगी क्या है किसी मुफलिस की कबा*** है जिसमें
      हर घड़ी दर्द के पैबंद लगे जाते हैं
      * विचारों पर कैद ** बोलने पर प्रतिबंध *** गरीब का कुर्ता

      लेकिन अब जुल्म की मियाद के दिन थोड़े हैं
      इक जरा सब्र कि फरियाद के दिन थोड़े हैं


      जेल से ही वो शासन के खिलाफ आवाज उठाते रहे । वो चाहते थे पाकिस्तान में एक ऐसी सरकार बने जो आम लोगों की आंकाक्षांओं का प्रतिनिधित्व करती हो । बगावत करने को उकसाती उनकी ये नज्म पाक में काफी मशहूर हुई । कहते हैं जब भी किसी मंच पर इकबाल बानो उनकी इस नज्म को गाते हुए जब ये कहतीं सब ताज उछाले जाएंगे, सब तख्त गिराए जाएंगे, दर्शक दीर्घा से समवेत स्वर में आवाजें आतीं...."हम देखेंगे"
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      हम देखेंगे
      लाजिम है कि हम भी देखेंगे
      वो दिन कि जिसका वादा है
      जो लौह-ए-अजल में लिखा है
      जब जुल्म ए सितम के कोह-ए-गरां*
      रुई की तरह उड़ जाएँगे
      दम महकूमों** के पाँव तले
      जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
      और अहल-ए-हिकम*** के सर ऊपर
      जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी
      हम अहल-ए-सफा^, मरदूद-ए-हरम^^
      मसनद पे बिठाए जाएंगे
      सब ताज उछाले जाएंगे
      सब तख्त गिराए जाएंगे
      .........और राज करेगी खुल्क-ए-खुदा^^^
      जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
      * भारी पहाड़ **शोषितों *** सत्तारुढ़ ^पवित्र लोग ^^जिनकी चरमपंथियों ने निंदा की ^^^आम जनता

      अपने समाज के दबे कुचले ,बेघर,बेरोजगार, आवारा फिरती आवाम में जागृति जलाने के उद्देश्य से फैज ने प्रतीतात्मक लहजे में उनकी तुलना गलियों में विचरते आवारा कुत्तों से की। किस तरह आम जनता राजIनतिज्ञों, नौकरशाहों के खुद के फायदे के लिए उनकी चालों में मुहरा बन कर भी अपना दर्द चुपचाप सहती रहती है, ये नज्म उसी ओर इशारा करती है।

      ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
      कि बख्शा गया जिनको जौके गदाई*
      जमाने की फटकार सरमाया** इनका
      जहां भर की दुतकार इनकी कमाई
      ना आराम शब को ना राहत सवेरे
      गलाजत*** में घर , नालियों में बसेरे
      जो बिगड़ें तो एक दूसरे से लड़ा दो
      जरा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
      ये हर एक की ठोकरें खाने वाले
      ये फाकों से उकता के मर जाने वाले
      ये मजलूम मखलूक^ गर सर उठाये
      तो इंसान सब सरकशीं^^ भूल जाए
      ये चाहें तो दुनिया को अपना बना लें
      ये आकाओं की हड्डियाँ तक चबा लें
      कोई इनको एहसासे जिल्लत^^^ दिला ले
      कोई इनकी सोई हुई दुम हिला दे
      *भीख मांगने की रुचि **संचित धन ***गंदगी ^ आम जनता ^^घमंड ^^^ अपमान की अनुभुति
      फैज को विश्वास था कि गर आम जनता को अपनी ताकत का गुमान हो जाए तो वो बहुत कुछ कर सकती है । पर उनका ये स्वप्न, स्वप्न ही रह गया । कम्युनिस्ट विचारधारा को वो अपने ही मुल्क में प्रतिपादित नहीं कर पाए । अपने जीवन के अंतिम दशक में वो बहुत कुछ इस असफलता को स्वीकार कर चुके थे । १९७६ की उनकी ये रचना बहुत कुछ उसी का संकेत करती है।

      वो लोग बहुत खुशकिस्मत थे
      जो इश्क को काम समझते थे
      या काम से आशिकी करते थे
      हम जीते जी मशरूफ* रहे
      कुछ इश्क किया कुछ काम किया
      काम इश्क के आड़े आता रहा
      और इश्क से काम उलझता रहा
      फिर आखिर तंग आकर हमने
      दोनों को अधूरा छोड़ दिया
      व्यस्त*

      फैज ने अपनी शायरी में रूमानी कल्पनाओं का जाल बिछाया पर अपने इर्द गिर्द के राजनीतिक और सामाजिक माहौल को भी उतना ही महत्त्व दिया । एक ओर बगावत का बिगुल बजाया तो दूसरी ओर प्रेयसी की याद के घेरे में उपमाओं का हसीन जाल भी बुना ।इसलिए समीक्षकों की राय में रूप और रस. प्रेम और राजनीति, कला और विचार का जैसा सराहनीय समन्वय आधुनिक उर्दू शायरी में फैज का है उसकी मिसाल खोज पाना संभव नहीं है ।
      समाप्त ।

    • फैज़ अहमद फ़ैज भाग:१, भाग: २, भाग: ३



    • मंगलवार, मार्च 27, 2007

      'फैज' : रूमानी कल्पनाओं के तिलिस्म से दूर यथार्थ की खोज -भाग:2

      पिछली पोस्ट में मैंने जिक्र किया था फैज के जीवन और लेखन से जुड़ी कुछ बातों का । तो आज आगे बढ़ें इस सफर पर...
      फैज की शायरी के बारे में नामी समीक्षक प्रकाश पंडित
      कहते हैं कि उनकी अद्वितीयता आधारित है उनकी शैली के लोच और मंदगति पर , कोमल. मृदुल और सौ -सौ जादू जगाने वाले शब्दों के चयन पर, तरसी हुई नाकाम निगाहें और आवाज में सोई हुई शीरीनियां ऐसी अलंकृत परिभाषाओं और रूपकों पर, और इन समस्त विशेषताओं के साथ गूढ़ से गूढ़ बात कहने के सलीके पर ।

      अगर फैज की उपमाओं की खूबसूरती का आपको रसास्वादन करना हो तो उनकी नज्म 'गर मुझे इसका यकीं हो , मेरे हमदम मेरे दोस्त' की इन पंक्तियों पर गौर फरमाएँ...आपका मन उनकी कल्पनाशीलता को दाद दिए बिना नहीं रह पाएगा

      कैसे मगरूर* हसीनाओं के बर्फाब से जिस्म
      गर्म हाथों की हरारत से पिघल जाते हैं
      कैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुकूश**
      देखते देखते यकलख्त*** बदल जाते हैं
      *दंभी **परिचित नैन नक्श ***एकाएक

      किस तरह आरिजे-महबूब का शफ्फाक बिलूर*
      यक-ब-यक बादा-ए-अहमर** सा दहक जाता है
      कैसे गुलचीं^ के लिए झुकती है खुद शाख-ए - गुलाब
      किस तरह रात का ऐवान ^^महक जाता है
      *स्वच्छ कांच सदृश प्रेयसी के कपोल **शराब की लाली ^ फूल चुनने वाले ^^महल

      टीना सानी की आवाज में इस दिलकश नज्म को आप यहाँ सुन सकते हैं ।



      १९७८ में फैज मास्को में थे। उन्हीं दिनों उन्होंने तेलंगाना आंदोलन में शिरकत करने वाले प्रगतिशील शायर मोइनुद्दीन मखलूम की गजल से प्रेरित होकर एक गजल लिखी थी आपकी याद आती रही रात भर...। उसके चंद शेर जो मुझे पसंद हैं

      आपकी याद आती रही रात भर
      चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

      गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई
      शम-ए-गम झिलमिलाती रही रात भर

      एक उम्मीद पर दिल बहलता रहा
      एक तमन्ना सताती रही भर



      शायद वो यादे ही थीं जिसने फैज के जेल में बिताये हुए चार सालों में हमेशा से साथ दिया था । इसी प्रवास के दौरान उन्होंने एक नज्म लिखी थी 'याद' जो कि बेहद चर्चित हुई थी ।

      दश्ते- तनहाई* में ऐ जाने- जहाँ लर्जां **हैं
      तेरी आवाज के साये, तेरे होठों के सराब***
      दश्ते- तनहाई में , दूरी के खसो - खाक^ तले
      खिल रहे हैं तेरे पहलू के समन ^^ और गुलाब

      *एकांत का जंगल ** कांपती हुई *** मरीचिका ^घास मिट्टी ^ ^ चमेली

      इस कदर प्यार से ऐ जाने-जहां रक्खा है
      दिल के रुखसार* पे इस वक्त तेरी याद ने हाथ
      यूं गुमां होता है, गरचे है अभी सुब्हे-फिराक**
      ढ़ल गया हिज्र^ का दिन, आ भी गई वस्ल की रात^^
      *कपोल **विरह की सुबह ^वियोग ^^मिलन

      इकबाल बानो की आवाज में इस नज्म को सुनने का लुत्फ ही कुछ और है ।


      पर पुरानी यादों ने हमेशा फैज की शायरी में मधुर स्मृतियाँ ही जगाईं ऐसा भी नहीं है । वसंत आया तो बहार भी आई। पर अपनी खुशबू के साथ उन बिखरे रिश्तों, अधूरे ख्वाबों और उन अनसुलझे सवालों के पुलिंदे भी ले आई जिनका जवाब अतीत से लेकर वर्तमान के पन्नों में कहीं भी नजर नहीं आता ।

      बहार आई तो जैसे इक बार
      लौट आए हैं फिर अदम* से
      वो ख्वाब सारे, शबाब सारे
      जो तेरे होठों पर मर मिटे थे
      जो मिट के हर बार फिर जिए थे
      निखर गए हैं गुलाब सारे
      जो तेरी यादों से मुश्क- बू** हैं
      जो तेरे उश्शाक*** का लहू हैं

      *जमे हुए, मृत ** कस्तूरी की तरह सुगंधित *** आशिकों

      उबल पड़े हैं अजाब* सारे
      मलाल ए अहवाल ए दोस्तां** भी
      खुमार ए आगोश ए माहवशां*** भी
      गुबार ए खातिर के बाब सारे
      तेरे हमारे
      सवाल सारे, जवाब सारे
      बहार आई है तो खुल गए हैं
      नए सिरे से हिसाब सारे
      * दुख, पीड़ा ** दोस्तों के बुरे हालात के दृश्य *** चद्रमा सा सुंदर

      टीना सानी की आवाज़ में इस नज़्म को सुनना एक बेहद प्यारा सा अनुभव है..

      पर फैज ने अपनी शायरी को सिर्फ रूमानियत भरे अहसासों में कैद नहीं किया ।वक्त बीतने के साथ उन्होंने ये महसूस किया कि शायरी को प्यार मोहब्बत की भावनाओं तक सीमित रखना उसके उद्देश्य को संकुचित करना था । उनकी नज्म मेरे महबूब मुझसे पहली सी मोहब्बत ना माँग ... उनके इसी विचार को पुख्ता करती है ।

      मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग

      मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शा* है हयात**
      तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर*** का झ़गडा क्या है
      तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात^
      तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
      *प्रकाशमान, ** जिंदगी ***सांसारिक चिंता ^ स्थायित्व

      तू जो मिल जाये तो तकदीर निगूं *हो जाए (*सिर झुका ले)
      यूं न था, मैंने फकत चाहा था यूं हो जाए
      और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
      राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

      अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म*
      रेशमों- अतलसो- कमख्वाब में बुनवाये हुए
      जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
      खाक में लिथडे** हुए, ख़ून में नहलाए हुए
      *सदियों से चला आ रहा अंधकारमय तिलिस्म **धूल से सना हुआ

      जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
      पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
      लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
      अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे
      और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
      राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
      मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग !


      जब फैज साहब ने नूरजहाँ की आवाज में इस नज्म को सुना तो इतने प्रभावित हुए कि उसके बाद सबसे यही कहा कि आज से ये नज्म नूरजहाँ की हुई ।



      फैज कम्युनिस्ट विचारधारा के समर्थक थे । अपनी शायरी में सामाजिक हालातों के साथ साथ फैज की ये कोशिश भी रही कि कि अपनी लेखनी से आम जनमानस व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए प्रेरित कर सकें । सामाजिक और राजनैतिक हलचल पैदा करने वाली इन नज्मों की चर्चा करूँगा इस कड़ी के अगले और अंतिम भाग में ।


    • फैज़ अहमद फ़ैज भाग:१, भाग: २, भाग: ३
    • शुक्रवार, मार्च 23, 2007

      फैज अहमद 'फैज' की गजलों और नज्मों का सफर : भाग १


      फैज अहमद 'फैज' आधुनिक उर्दू शायरी के वो आधारस्तम्भ है, जिन्होंने अपने लेखन से इसे एक नई ऊँचाई दी । १९११ में सियालकोट में जन्मे फैज ने अपनी शायरी में सिर्फ इश्क और सौंदर्य की ही चर्चा नहीं की, बल्कि देश और आवाम की दशा और दिशा पर भी लिखते रहे । शायरी की जुबान तो उनकी उर्दू रही पर गौर करने की बात है कि अंग्रेजी और अरबी में भी उन्होंने ३० के दशक में प्रथम श्रेणी से एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। शायद यही वजह रही कि उनकी गजलें और नज्में अरबी फारसी के शब्दों का बहुतायत इस्तेमाल हुआ है।

      पढ़ाई लिखाई खत्म हुई तो पहले अमृतसर और बाद में लाहौर में अंग्रेजी के प्राध्यापक नियुक्त हुए । १९४१ में इन्होंने एक अंग्रेज लड़की एलिस जार्ज से निकाह किया । और मजेदार बात ये रही कि ये निकाह और किसी ने नहीं बल्कि अपने शेख अबदुल्ला ने पढ़वाया था । १९४१ में फैज का पहला कविता संग्रह नक्शे फरियादी प्रकाशित हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फैज सेना में शामिल हो गए । आजादी के बाद कम्युनिस्ट विचारधारा का अपने देश में प्रचार प्रसार करते रहे । लियाकत अली खाँ की सरकार के तख्तापलट की साजिश रचने के जुर्म में १९५१‍ - १९५५ तक कैद में रहे । जिंदगी के इस मोड़ में जो कष्ट, अकेलापन और उदासी उन्होंने झेली वो इस वक्त लिखी गई उनकी नज्मों में साफ झलकती है । ये नज्में बाद में बेहद लोकप्रिय हुईं और "दस्ते सबा ' और ' जिंदानामा' नाम से प्रकाशित हुईं ।

      फैज की शायरी से मेरा परिचय पहली बार तब हुआ जब अंतरजाल पर करीब तीन वर्ष पूर्व उर्दू शायरी की एक महफिल में जाना शुरु किया । तब इनकी एक नज्म गर मुझे इसका यकीं हो...सामने से गुजरी थी और कठिन लफ्जों की वजह से उसकी हर पंक्ति के मायने समझने में मुझे अच्छा खासा वक्त लगा था । पिछले तीन सालों में उनका लिखा जो मुझे खास तौर से पसंद आया वो मेरी कोशिश रहेगी की आपके साथ बांटूँ ।

      जैसा की अमूमन होता है, अन्य शायरों की तरह शुरुआती दौर में हुस्न और इश्क ही फैज की शायरी का सबसे बड़ा प्रेरक रहा ।नक्शे फरियादी की शुरुआती नज्म में वो कहते हैं ।

      रात यूँ दिल में खोई हुई याद आई
      जैसे वीराने में चुपके से बहार आ जाए
      जैसे सहराओं में हौले से चले बाद ए नसीम *
      जैसे बीमार को बेवजह करार आ जाए

      *हल्की हवा


      नैयरा नूर की आवाज़ में इसे सुनने का लुत्फ़ ही अलग है।


      अपने हमराज के बदलते अंदाज के बारे में फैज का ये शेर देखें
      यूँ सजा चाँद कि झलका तेरे अंदाज का रंग
      यूँ फजा महकी कि बदला मेरे हमराज का रंग


      और इस रूमानी गजल के इन शेरों की तो बात ही क्या !


      शाम ए फिराक अब ना पूछ आई और आ के टल गई
      दिल था कि फिर बहल गया , जां थी कि फिर संभल गई

      जब तुझे याद कर लिया, सुबह महक महक उठी
      जब तेरा गम जगा लिया, रात मचल मचल गई

      दिल से तो हर मुआमलात करके चले थे साफ हम
      कहने में उनके सामने बात बदल बदल गई

      पर फैज की एक गजल जो मुझे बेहद पसंद है वो है हम कि ठहरे अजनबी.....। इसे सुन कर मन बोझल तो जरूर हो जाता है पर जाने क्या असर है फैज के लफ्जों और नैयरा नूर की दिलकश आवाज का कि इसे बार बार सुनने की इच्छा यथावत बनी रहती है ।



      हम कि ठहरे अजनबी इतनी मदारातों* के बाद
      फिर बनेंगे आशनां कितनी मुलाकातों के बाद
      *आवाभगत


      कब नजर में आएगी बेदाग सब्जे* की बहार
      खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद
      *खेत

      दिल तो चाहा पर शिकस्त ए दिल ने मोहलत ना दी
      कुछ गिले शिकवे भी कर लेते मुनाजातों * के बाद
      *प्रार्थना

      थे बहुत बेदर्द लमहे खत्म ए दर्द ए इश्क के
      थीं बहुत बेमहर* सुबहें मेहरबां रातों के बाद
      *मुश्किल

      उनसे जो कहने गए थे फैज जां सदका किये
      अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद


      फैज ने अपनी कविता का विषय यानि मौजूं-ए-सुखन पर यहाँ तक कह दिया था


      लेकिन उस शोख के आहिस्ता से खुलते हुए होठ
      हाए उस जिस्म के कमबख्त दिलावेज खुतूत
      आप ही कहिए कहीं ऐसे भी अफसूं (जादू) होंगे
      अपना मौजूए सुखन इनके सिवा और नहीं
      तब ए शायर* का वतन इनके सिवा और नहीं
      *शायरी की प्रवृति
      पर बाद में फैज देश और अपने आस पास के हालातों से इस कदर प्रभावित हुए कि कह बैठे

      इन दमकते हुए शहरों की फरावां मखलूक (विशाल जनता)
      क्यों फकत मरने की हसरत में जिया करती है
      ये हसीं खेत, फटा पड़ता है जोबन जिनका
      किसलिए इन में फकत (सिर्फ) भूख उगा करती है


      इस प्रविष्टि के अगले भाग में चर्चा करेंगे उनकी अन्य नज्मों के साथ उस नज्म की जिसे रचने के बाद उन्होंने अपने आप को रूमानियत भरी शायरी से थोड़ा दूर कर लिया था ।


    • फैज़ अहमद फ़ैज भाग:१, भाग: २, भाग: ३
    •  

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