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बुधवार, फ़रवरी 22, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 7 क्यूँ रे, क्यूँ रे ...काँच के लमहों के रह गए चूरे'? Kyun Re..

वार्षिक संगीतमाला के साल के दस बेहतरीन गीतों की फेरहिस्त में जो गीत सबसे ज्यादा ग़मगीन कर देता है वो हैं क्यूँ रे...। बच्चे किसे प्यारे नहीं होते। उनका निर्मल मन, उनकी खिलखिलाती हँसी, उनकी शरारतें हमारे हृदय को पुलकित करती रहती हैं। ऐसे में वे अचानक से ही ज़िदगी से बेहरमी से अलग कर दिए जाएँ तो असहनीय पीड़ा होती है। फिल्म Te3n का ये गीत एक बुजुर्ग की ऐसी ही वेदना को व्यक्त करता है जो उनकी अपहृत पोती के हत्यारों की तलाश में है। 

विद्या बालन, अमिताभ बच्चन और नवाजुद्दीन सिद्दिकी जैसे शानदार कलाकारों से परिपूर्ण ये फिल्म सिनेमाघरों में ज्यादा दिन तक तो टिक नहीं पाई पर फिल्म का गीत संगीत अपनी छाप अवश्य छोड़ गया। इस फिल्म के गीत हक़ है मुझे से आप पहले ही इस संगीतमाला में रूबरू हो चुके हैं। आज बारी है इसी फिल्म के एक दूसरे गीत की जिसे अमिताभ बच्चन ने ख़ुद अपनी आवाज़ दी है।



अमिताभ की आवाज़ का तो सारा देश दीवाना है और मैं भी उनकी आवाज़ के जादू से अछूता नहीं हूँ। अब तक नई पुरानी तीस से ज्यादा फिल्मों में अमिताभ अपनी आवाज़ का परचम लहरा चुके हैं। अमिताभ बच्चन ने अपने चिर परिचित मजाकिया अंदाज़ में इस फिल्म का संगीत जनता के सामने रखते हुए इस गीत से जुड़े कुछ प्रसंगों का उल्लेख किया था। अमिताभ का कहना था। .
"पहली बार जब मैंने ये गाना गाया तो इन लोगों ने उसे बेकार कह के नकार दिया। फिर किसी ने कहा क्लिंटन को बुलवा दें। अब बताइए जिन हजरात को आप बचना चाहते हो उन्हीं को आपके छः इंच पर बैठा दिया जाए तो मेरे जैसे शख़्स की, जो गायक नहीं है क्या हालत हुई होगी। सच पूछिए तो मैंने बिल्कुल बेसुरा गाया। अब ये लोग हैं ना बेसुरी आवाज़ को भी मशीन में डालकर और उसमें कोरस और संगीत से अच्छा बना देते हैं। सो जो आप सुनेंगे वो मेरी नहीं मशीनी आवाज़ होगी।"
जब अमिताभ बोल रहे थे तो उनके साथ बैठे क्लिंटन की हँसी रुक नहीं पा रही थी। क्लिंटन का कहना था कि अमिताभ की गहरी आवाज़ का इस्तेमाल हम सब एक दूसरे रूप में करना चाहते थे। उनके द्वारा निभाए किरदार जॉन बिश्वास की आवाज़ एक टूटे हुए इंसान की थी जो वक़्त के हाथों लाचार हो गया था। इसलिए हमने उन्हें उसी चरित्र को अपनी आवाज़ में ढालने को कहा। वाकई अमिताभ बच्चन ने अमिताभ भट्टाचार्य के बोलों के पीछे भावनाओं को हूबहू आवाज़ में तब्दील कर दिया। 



संगीतकार क्लिंटन ने इस साल संगीतमाला में शामिल में अपने चार  गीतों डिगी डिगी डुग, महरम हक़ है और क्यूँ रे  गिटार का जिस तरह इस्तेमाल किया है वो काबिलेतारीफ़ है। ये सारे गीत शब्द प्रधान हैं और सबमें संगीत नाममात्र का ही है। अमिताभ भट्टाचार्य का हँसी के लिए जलतरंग की उपमा का इस्तेमाल मन को सोहता है। दोनो अंतरों से गुजरते गुजरते आँखे नम हो जाती है। ऐसा लगता है मानों कोई अपना ही ज़िंदगी से बिछुड़ गया हो...


जलतरंग सी हँसी तेरी, सुनायी दे आज भी
खुशबू तेरी रह गयी तेरे जाने के बाद भी
घर का वो कोना तेरा, सूना बिछौना तेरा
तेरी गैर मौजूदगी में भी, लगे होना तेरा
क्यूँ रे, क्यूँ रे, कर गया तनहा मुझे ऐसे
क्यूँ रे, क्यूँ रे काँच के लमहों के रह गए
रह गए चूरे

तेरी चीजें अब भी वैसे ही रखता हूँ
बैठा सन्नाटे में उनको  तकता हूँ
जब लौटेगी तब तक रस्ता देखूँगा
इसके आलावा कर भी क्या सकता हूँ
ऊँगली से मुझको फिर से, सुलझाने दे ना अपने
गुच्छे घुंघरैले बालों के भूरे
क्यूँ रे, क्यूँ रे कर गया तनहा मुझे ऐसे
क्यूँ रे, क्यूँ रे काँच के लमहों के रह गए
रह गए चूरे


मासूम सा में आपने एक पिता के दिल की करुण पुकार सुनी थी आज सत्तर वर्षीय उस बुजुर्ग की सुनिए जो बड़ी कातरता से एक प्रश्न कर रहा है कि ये सब हुआ तो क्यूँ हुआ...


वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक 
8.  क्या है कोई आपका भी 'महरम'?  Mujhe Mehram Jaan Le...
9. जो सांझे ख्वाब देखते थे नैना.. बिछड़ के आज रो दिए हैं यूँ ... Naina
10. आवभगत में मुस्कानें, फुर्सत की मीठी तानें ... Dugg Duggi Dugg
11.  ऐ ज़िंदगी गले लगा ले Aye Zindagi
12. क्यूँ फुदक फुदक के धड़कनों की चल रही गिलहरियाँ   Gileheriyaan
13. कारी कारी रैना सारी सौ अँधेरे क्यूँ लाई,  Kaari Kaari
14. मासूम सा Masoom Saa
15. तेरे संग यारा  Tere Sang Yaaran
16.फिर कभी  Phir Kabhie
17 चंद रोज़ और मेरी जान ...Chand Roz
18. ले चला दिल कहाँ, दिल कहाँ... ले चला  Le Chala
19. हक़ है मुझे जीने का  Haq Hai
20. इक नदी थी Ek Nadi Thi

गुरुवार, दिसंबर 05, 2013

कविताएँ बच्चन की चयन अमिताभ बच्चन का : बच्चन प्रेमियों के लिए एक अमूल्य पुस्तक !

पिछले हफ्ते हरिवंश राय बच्चन की कविताओं के इस संकलन को पढ़ा। इस संकलन की खास बात ये है कि इसमें संकलित सत्तर कविताओं का चयन अमिताभ बच्चन ने किया है। अमिताभ ने इस संकलन में अपने पिता द्वारा चार दशकों में लिखी गई पुस्तकों आकुल अंतर, निशा निमंत्रण, सतरंगिनी, आरती और अंगारे, अभिनव सोपान, मधुशाला, मेरी कविताओं की आधी सदी, मधुबाला, चार खेमे चौंसठ खूँटे, बहुत दिन बीते, दो चट्टानें , त्रिभंगिमा, मिलन यामिनी, जाल समेटा, एकांत संगीत और कटती प्रतिमाओं की आवाज़ में से अपनी पसंदीदा कविताएँ चुनी हैं।


अमिताभ के लिए उनके पिता की लिखी ये कविताएँ क्या मायने रखती हैं? अमिताभ इस प्रश्न का जवाब इस पुस्तक की भूमिका में कुछ यूँ देते हैं..
मैं यह नहीं कह सकता कि मुझे उनकी सभी कविताएँ पूरी तरह समझ आती हैं। पर यह जरूर है कि उस वातावरण में रहते रहते, उनकी कविताएँ बार बार सुनते सुनते उनकी जो धुने हैं, उनके जो बोल हैं वह अब जब पढ़ता हूँ तो बिना किसी कष्ट के ऐसा लगता है कि यह मैं सदियों से सुनता आ रहा हूँ, और मुझे उस कविता की धुन गाने या बोलने में कोई तकलीफ़ नहीं होती। मैंने कभी बैठकर उनकी कविताएँ रटी नहीं हैं। वह तो अपने आप मेरे अंदर से निकल पड़ती हैं।
ज़ाहिर है कि इस संकलन में वो कविताएँ भी शामिल हैं जिनसे शायद ही हिन्दी काव्य प्रेमी अनजान हो पर जिन्हें बार बार पढ़ने पर भी मन एक नई धनात्मक उर्जा से भर उठता है। जो बीत गई सो बात गई, है अँधेरी रात तो दीवा जलाना कब मना है, इस पार प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा, जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला.., नीड़ का निर्माण फिर फिर, मधुशाला की रुबाइयाँ, अग्निपथ व बुद्ध और नाचघर को ऐसी ही लोकप्रिय कविताओं की श्रेणी में रखा जा सकता है। पर इनके आलावा भी इस पुस्तक में आम बच्चन प्रेमियों के लिए उनकी उन रचनाओं का भी जखीरा है जिसे शायद आपने पहले ना पढ़ा हो और जिसका चुंबकीय आकर्षण उनके सस्वर पाठ करने पर आपको मजबूर करता है।

इस पुस्तक में शामिल बच्चन जी कुछ जानी अनजानी  रचनाओं को आज आपके सम्मुख लाने की कोशिश कर रहा हूँ जिनमें दर्शन भी है और प्रेम भी,एकाकीपन के स्वर हैं तो दिल में छुपी वेदना का ज्वालामुखी भी।

 (1)
मैनें चिड़िया से कहा, मैं तुम पर एक
कविता लिखना चाहता हूँ।
चिड़िया नें मुझ से पूछा, 'तुम्हारे शब्दों में
मेरे परों की रंगीनी है?'
मैंने कहा, 'नहीं'।
'तुम्हारे शब्दों में मेरे कंठ का संगीत है?'
'नहीं।'
'तुम्हारे शब्दों में मेरे डैने की उड़ान है?'
'नहीं।'
'जान है?'
'नहीं।'
'तब तुम मुझ पर कविता क्या लिखोगे?'
मैनें कहा, 'पर तुमसे मुझे प्यार है'
चिड़िया बोली, 'प्यार का शब्दों से क्या सरोकार है?'
एक अनुभव हुआ नया।
मैं मौन हो गया!


(2)
जानकर अनजान बन जा।

पूछ मत आराध्य कैसा,
जब कि पूजा-भाव उमड़ा;
मृत्तिका के पिंड से कह दे
कि तू भगवान बन जा।
जानकर अनजान बन जा।


आरती बनकर जला तू
पथ मिला, मिट्टी सिधारी,
कल्पना की वंचना से
सत्‍य से अज्ञान बन जा।
जानकर अनजान बन जा।


किंतु दिल की आग का
संसार में उपहास कब तक?
किंतु होना, हाय, अपने आप
हत विश्वास कब तक?
अग्नि को अंदर छिपाकर,
हे हृदय, पाषाण बन जा।
जानकर अनजान बन जा।

(3)
सन्नाटा वसुधा पर छाया,
नभ में हमनें कान लगाया,
फ़िर भी अगणित कंठो का यह राग नहीं हम सुन पाते हैं
कहते हैं तारे गाते हैं

स्वर्ग सुना करता यह गाना,
पृथ्वी ने तो बस यह जाना,
अगणित ओस-कणों में तारों के नीरव आँसू आते हैं
कहते हैं तारे गाते हैं

उपर देव तले मानवगण,
नभ में दोनों गायन-रोदन,
राग सदा उपर को उठता, आँसू नीचे झर जाते हैं
कहते हैं तारे गाते हैं


 (4)
कोई पार नदी के गाता!

भंग निशा की नीरवता कर,
इस देहाती गाने का स्वर,
ककड़ी के खेतों से उठकर, आता जमुना पर लहराता!
कोई पार नदी के गाता!

होंगे भाई-बंधु निकट ही,
कभी सोचते होंगे यह भी,
इस तट पर भी बैठा कोई, उसकी तानों से सुख पाता!
कोई पार नदी के गाता!

आज न जाने क्यों होता मन,
सुन कर यह एकाकी गायन,
सदा इसे मैं सुनता रहता, सदा इसे यह गाता जाता!
कोई पार नदी के गाता!

(5)
आज मुझसे बोल, बादल!

तम भरा तू, तम भरा मैं,
गम भरा तू, गम भरा मैं,
आज तू अपने हृदय से हृदय मेरा तोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

आग तुझमें, आग मुझमें,
राग तुझमें, राग मुझमें,
आ मिलें हम आज अपने द्वार उर के खोल, बादल!
आज मुझसे बोल, बादल!

भेद यह मत देख दो पल--
क्षार जल मैं, तू मधुर जल,
व्यर्थ मेरे अश्रु, तेरी बूँद है अनमोल बादल!
आज मुझसे बोल, बादल

171 पृष्ठों की इस पुस्तक का सबसे रोचक पहलू है इसके साथ दिया गया परिशिष्ट जिसमें अमिताभ बच्चन ने बड़ी संवेदनशीलता से बाबूजी से जुड़ी अपने बचपन की स्मृतियों को पाठकों के साथ बाँटा है। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित 180 रुपये मूल्य की ये पुस्तक बच्चन प्रेमियों के लिए अमूल्य धरोहर साबित होगी ऐसा मेरा मानना है।

सोमवार, जनवरी 16, 2012

वार्षिक संगीतमाला 2011 - पॉयदान संख्या 17 : जानिए अमित जी का हाल - ए - दिल !

अमिताभ बच्चन के अभिनय का तो हम सभी लोहा मानते हैं। उनके धारदार अभिनय को दर्शकों के दिल में बसाने में उनकी आवाज़ का बहुत बड़ा हाथ है। बचपन मे फिल्मों के प्रोमो रेडिओ पर आते थे 'प्रायोजित कार्यक्रम' के नाम से। अगर फिल्म अमित जी की हो तो कहना ही क्या। हम उनकी आवाज़ सुनने के लिए ट्रांजिस्टर के साथ कान लगाए फिरते। अमित जी के डॉयलॉग ज्यूँ ही कानों में पड़ते लगता कि आज का दिन ही बन गया। फिल्मी पर्दे पर भी उनकी स्क्रीन प्रेसेंस का अहम हिस्सा थी उनकी आवाज़....

अमिताभ ने बहुत कम गीत गाए हैं पर जब जब उन्होंने अपनी आवाज़ का इस्तेमाल बतौर पार्श्व गायक किया उनका जादू वहाँ भी चला। जब स्कूल में थे तो उनकी फिल्म नटवरलाल का गीत 'मेरे पास आओ मेरे दोस्तों इक किस्सा सुनो..' हम बच्चों को इतना पसंद आता था कि क्या कहें। गीत सुनकर हँसते हँसते हालत खराब हो जाती थी। फिर आई उनकी फिल्म सिलसिला। किशोरावस्था में इस फिल्म के लिए उनका गाया हुआ गीत नीला आसमान सो गया... सुनते तो लगता पूरे ज़हाँ का दुख अपने दिल में ही समा गया है। वहीं रँग बरसे.. की मस्ती से पूरा बदन थिरक उठता।

विगत कुछ वर्षों में अमिताभ हर साल इक्का दुक्का फिल्मों में अपनी आवाज़ देते रहे हैं। वर्ष 2007 में विशाल भारद्वाज के संगीत निर्देशन में फिल्म निःशब्द के लिए उनका गाया संवेदनशील गीत रोज़ाना जिएँ रोज़ाना मरें तेरी यादों में हम मेरी वार्षिक संगीतमाला का हिस्सा बना था। इस साल एक बार फिर उनके गीत ने कदम रखा है संगीतमाला की सत्रहवीं पॉयदान पर। फिल्म बुड्ढा होगा तेरा बाप के इस गीत में अमिताभ पर्दे पर हेमा जी से अपने हाल- ए- दिल का इज़हार कर रहे हैं।

अमिताभ अपने एक साक्षात्कार में इस गीत के बारे में कहते हैं
जब संगीतकार विशाल शेखर ने मुझे इस फिल्म के गीत गवाने की इच्छा ज़ाहिर कि तो मुझे लगा कि मैंने एक बुरा स्वप्न देख लिया। पर वे अच्छे मित्र हैं इसलिए उनकी बात नज़रअंदाज़ भी नहीं कर सकता था। हम लोग एक साथ स्टूडिओ में बैठे। हँसी मजाक के साथ गप्पें चल रही थीं कि किसी ने कोई वाद्य यंत्र उठाया और बस यूँ ही एक धुन तैयार हो गई।

विशाल शेखर अमिताभ की आवाज़ का असर भली भांति जानते हैं। इसलिए अमिताभ जब गीत शुरु करते हैं तो संगीत संयोजन नाममात्र का ही है। अमिताभ जब एक बार गीत के मुखड़े और एकमात्र अंतरे को गा लेते हैं तो ताल वाद्यों की बढ़ती रिदम के साथ गीत की पुनरावृति होती है। बीच बीच में पार्श्व गायिका मोनाली ठाकुर की  मधुर तान गूँजती है  जो मन को भली लगती है।

इस गीत के बोलों का क्रेडिट सम्मिलित रूप से दिया गया है गीतकार स्वानंद किरकिरे और अन्विता दत्त गुप्तान को। तो आइए सुनते हैं इस मधुर गीत को..


हाल-ए-दिल हाल-ए-दिल
तुमसे कैसे कहूँ
यूँ कभी आ के मिल
तुमसे कैसे कहूँ

यादों में ख्वाबों में
आप की छब में रहें
हाल ए दिल हाल ए दिल
तुमसे कैसे कहूँ

हम तो उधड़ से रहे
होठ यूँ सिल से रहे
तेरी ही जुल्फों के धागे
यूँ तो सौ ख़त भी लिखे
कई पन्ने रट भी लिए
तेरी कहानी दोहराते
कबसे ये कह रहे
आपकी छब में रहे
हाल-ए-दिल हाल-ए-दिल.....

गुरुवार, जनवरी 24, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १६ - रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें...तेरी यादों में हम..

वार्षिक संगीतमाला की इस पायदान पर गीत वो, जिसे पहले तो मैंने रखा था बीसवीं सीढ़ी पर बार-बार सुनने के बाद ये और ज्यादा अच्छा लगने लगा। इस गीत के साथ ही एक नई तिकड़ी का आगमन हो रहा है इस गीतमाला में। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ये गीत, इस साल के सबसे रूमानी गीतों में एक है। इसके बोलों को लिखा चंडीगढ़ के युवा गीतकार मुन्ना धीमन ने। मुन्ना बचपन से ही लेखन में रुचि लेते आए हैं। नाटकों के लिए स्क्रिप्ट से लेकर कैडबरी के एड जिंगल तक की रचना उन्होंने की है।

इस गीत में कहीं कोई बनावटीपन नहीं दिखता। बस निश्चल प्रेम में कहे गए सीधे सच्चे से शब्द जो सीधे दिल पर जाकर लगते हैं और इसलिए असरदार साबित होते हैं।

पर मुन्ना के बोलों को अपनी गहरी संवेदनशील आवाज़ से सँवारा है अमिताभ बच्चन ने। अमिताभ के गाए गंभीर गीतों में मुझे 'सिलसिला ' का उनका गाया गीत नीला आसमान सो गया.... सबसे ज्यादा पसंद है। इस गीत को नीचे के सुरों से जैसे उन्होंने ऊपर की ओर उठाया है वो मन को छू लेता है। अपनी गायिकी में अमिताभ ने मुन्ना के भावों को यथासंभव उभारने की कोशिश की है।

इस गीत के साथ ही पहली बार इस साल आए हैं विशाल भारद्वाज इस गीतमाला में। विशाल ने पिछले साल ओंकारा में अपने बेमिसाल संगीत से सारे सुधी संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया था। विशाल इस गीत के बारे में कहते हैं
"कि जब इस गीत की रिकार्डिंग चल रही थी तो अमित जी ने कहा कि विशाल, तुम्हारे सामने मैं ये गीत गाने में असहज महसूस करूँगा इसलिए तुम स्टूडियो के बाहर ही बैठो।"

विशाल का मत है कि जिस खूबसूरती से अमित जी ने इस गीत को निभाया है कि उन्हें अन्य सितारों के लिए भी पार्श्व गायन करना चाहिए।

किसी ऐसे शख्स जिससे हमने कभी बेइंतहा मोहब्बत की हो, उसे जिंदगी से भौतिक रूप से अलग करना जितना सहज है, उतना ही कठिन है उसे अपनी यादों से जुदा करना। सोते जागते जिंदगी के हर लमहे में वो चेहरा मंडराता ही रहता है। किस हद तक हम इन यादों में डूबते चले जाते हैं वो आप इस गीत के लफ़्जों में महसूस कर सकते हैं
रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें
तेरी यादों में हम...तेरी यादों में हम
रोज़ाना...

उंगली तेरी थामे हुए हर लमहा चलता हूँ मैं
उंगली तेरी थामे हुए हर लमहा चलता हूँ मैं
तुझको लिए घर लौटूँ और, घर से निकलता हूँ मैं
इक पल को भी जाता नहीं तेरे बिन कहीं
यूँ रात दिन, बस तुझमें ही, बस तुझमें ही
लिपटा रहता हूँ मैं
रोज़ाना...रोज़ाना...रोज़ाना..रोज़ाना

रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें...
रोज़ाना जलें रोज़ाना घुलें
तेरी यादों में हम...तेरी यादों में हम
रोज़ाना...रोज़ाना...रोज़ाना..हम्म..रोज़ाना

हर दिन तेरी, आँखों से इस, दुनिया को तकता हूँ मैं
तू जिस तरह, रखती थी घर, वैसे ही रखता हूँ मैं
तेरी तरह, संग संग चलें, यादें तेरी
यूँ हर घड़ी, बातों में बस, बातों में तेरी
गुम सा रहता हूँ मैं
रोज़ाना...

कुछ गाऊँ तो याद आते हो
गुनगुनाऊँ तो याद आते हो
कुछ पहनूँ तो याद आते हो
कहीं जाऊँ तो याद आते हो
कुछ खोने पे याद आते हो
कुछ पाऊँ तो याद आते हो

रोज़ाना चले, यादों पर तेरी
ज़िंदगी का सफ़र....
तुझसे है रोशन, तुझसे है जिंदा
ये दिल का शहर... ये दिल का शहर..
रोज़ाना..रोज़ाना..रोज़ाना.........
तो आइए सुनें फिल्म निशब्द से लिया हुआ ये भावपूर्ण गीत




इस संगीतमाला के पिछले गीत

शुक्रवार, सितंबर 28, 2007

मधुशाला की चंद रुबाईयाँ हरिवंश राय बच्चन , अमिताभ और मन्ना डे के स्वर में...

पिछली पोस्ट की टिप्पणी में पंडित नरेंद्र शर्मा की पुत्री लावण्या जी ने 'मधुशाला' की रचना से जुड़ी एक बेहद रोचक जानकारी बाँटी है। लावण्या जी लिखती हैं
"......मधुशाला लिखने से पहले के समय की ओर चलें। श्यामा, डा.हरिवंश राय बच्चन जी की पहली पत्नी थीं जिसके देहांत के बाद कवि बच्चन जी बहुत दुखी और भग्न ह्र्दय के हो गये थे। तब इलाहाबाद के एक मकान में मेरे पापा जी के साथ कुछ समय बच्चन जी साथ रहे। तब तक बच्चन जी , ज्यादातर गद्य ही लिखते थे। पापा जी ने उन्हें "उमर खैयाम " की रुबाइयाँ " और फिट्ज़्जराल्ड, जो अँग्रेजी में इन्हीं रुबाइयों का सफल अनुवाद कर चुके थे, ये दो किताबें, बच्चन जी को भेंट कीं और आग्रह किया था कि
"बंधु, अब आप पद्य लिखिए " और "मधुशाला " उसके बाद ही लिखी गई थी।........"

'मधुशाला' की लोकप्रियता जैसे-जैसे बढ़ती गई हर कवि सम्मेलन में हरिवंश राय 'बच्चन' जी इसकी कुछ रुबाईयाँ सुनानी ही पड़तीं। मैंने सबसे पहले की कुछ रुबाईयाँ मन्ना डे की दिलकश आवाज़ में सुनी थी। उसी कैसेट में हरिवंश राय 'बच्चन' जी की आवाज में ये रुबाई सुनने का मौका मिला था। आप भी सुनें...



मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।

मन्ना डे की सधी आवाज़ में HMV पर रिकार्ड किया हुआ कैसेट तो आप सब सुन चुके ही होंगे। पर अमिताभ बच्चन की आवाज में 'मधुशाला' की पंक्तियाँ सुनने का आनंद अलग तरह का है। वो उसी लय में 'मधुशाला' पढ़ते हैं जैसे उनके पिताजी पढ़ते थे। और अमिताभ की आवाज़ तो है ही जबरदस्त। पीछे से बजती मीठी धुन भी मन में रम सी जाती है और बार-बार हाथ रिप्ले बटन पर दब जाते हैं। तो पहलें सुनें अमिताभ की आवाज में 'मधुशाला' की चंद रुबाईयाँ जो उन्होंने पिता के सम्मान में किए गए कवि सम्मेलन के दौरान सुनाईं थीं।




अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला ।

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीह्वा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आँसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कांधा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहाँ पर कभी रही हो मधुशाला।

और चिता पर जाये उंढेला पत्र न घ्रित का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राणप्रिये यदि श्राद्ध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कर खुलवा देना मधुशाला।
'मधुशाला' लिखने के बाद बच्चन जी ने कुछ रुबाईयाँ और लिखीं थी जिनमें से कुछ का जिक्र मैंने पिछली पोस्ट में किया था। वहीं अपनी टिप्पणी में संजीत ने जिस रुबाई का ज़िक्र किया है उसे सुनकर आँखें नम हो जाती हैं। बच्चन जी ने इसके बारे में खुद लिखा था...

".......जिस समय मैंने 'मधुशाला' लिखी थी, उस समय मेरे जीवन और काव्य के संसार में पुत्र और संतान का कोई भावना केंद्र नहीं था। अपनी तृष्णा की सीमा बताते हुए मृत्यु के पार गया, पर श्राद्ध तक ही

प्राणप्रिये यदि श्राद्ध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कर खुलवा देना मधुशाला।

जब स्मृति के आधार और आगे भी दिखलाई पड़े तो तृष्णा ने वहाँ तक भी अपना हाथ फैलाया और मैंने लिखा....

पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला। .........."

मन्ना डे ने बड़े भावपूर्ण अंदाज में इन पंक्तियों को अपना स्वर दिया है। सुनिए और आप भी संग गुनगुनाइए ....

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
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Madhushala
कसप Kasap
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उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
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English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
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Lolita
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स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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