जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से!
अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम..
हनी, बनी और सागर इन तीन नामों से आप शायद ही परिचित होंगे पर इन्होंने डेढ़ साल पहले जो गीत रचा वो आप सबने जरूर ही गुनगुनाया होगा। जी हां मैं बात कर रहा हूं तू है तो दिल धड़कता है कि जिसका संगीत निर्देशन किया है हनी-बनी की बेहद युवा जोड़ी ने। आवाज़ दी है बनी और सागर ने और लिखा है सागर ने।
फिल्म मिस्टर एंड मिसेज माही में शामिल इस गीत ने 2024 में संगीत जगत में खासा तहलका मचाया। फिल्म के इतर गायिका नीति मोहन इस गीत का एक अंतरा गा के इसकी शोहरत में और इज़ाफ़ा किया। वैसे इतनी कम उम्र में इन कलाकारों का सितारा चमका तो वो इंटरनेट की बदौलत ही जहां गीत का मुखड़ा ऐसा वायरल हुआ कि इस युवा तिकड़ी को रातों रात एक पहचान मिल गई। पर आप सब के मन में ये सवाल तो आ ही रहा होगा कि आख़िर ये गीत बना कैसे और इन तीन अनजान से कलाकारों की झोली में गिरा कैसे?
दरअसल पंजाबी गीतों के एक गीतकार और कम्पोज़र हैं राजीव अरोड़ा जिन्हें दुनिया "जानी" के नाम से जानती है। इनकी एक टीम "जानी" है जिनका हिस्सा ये तीन कलाकार भी हैं। फिल्म में आने के करीब एक साल पहले सागर ने गीत का मुखड़ा लिखा था। उस दिन इनके दोस्त राग यमन की प्रैक्टिस कर रहे थे दा रा री र रा ..और उससे सागर ने बोलों में ढाला कोई नहीं है मेरा जरूरत मेरी....फिर मुखड़े को उन्होंने अपनी मां के बारे में सोचते हुए पंजाबी में लिखा जो बाद में हिंदी में कुछ इस शक्ल में आया
कोई नहीं मेरा जरूरत तेरी, लागे ना जिया देखूं ना जो सूरत तेरी
तू है तो दिल धड़कता है तू है तो सांस आती है तू ना तो घर घर नहीं लगता तू है तो डर नहीं लगता
पर इसके आगे जब पूरा गीत लिखने की बारी आती तो उन्होंने इसे इस तरह लिखा कि लोग इसे अपने प्रिय, अपने हमसफ़र के लिए गा सकें। एक साल तक ये लोग गाना बनाने के बाद बैठे रहे। आश्वस्त नहीं थे कि गाना किसी को पसंद आयेगा।
फिर ऐसा हुआ कि मिस्टर एंड मिसेज माही में जानी एक गीत का संगीत दे रहे थे और उन्हें एक और अदद गीत की तलाश थी। उन्होंने इस गीत का मुखड़ा बनी सागर से सुन रखा था और उन्होंने उसी रिकॉर्डिंग की फरमाइश कर दी। स्टूडियो में बैठे बैठे सिर्फ गिटार के साथ रिकॉर्ड किया वो वॉयस नोट सबको इतना पसंद आया कि बिना धुन में छेड़ छाड़ किए गाने के बाकी अंतरे लिखने का आदेश आया और फिर सागर ने ये बोल लिखे
तू है तो ग़म ना आते हैं तू है तो मुस्कुराते हैं कि तेरे बिन सो नहीं सकते किसी के हो नहीं सकते तू है तो हां ...... तू है तो
तुझसे मेरा जीना मरना जान तेरे हाथ में सौ जनम भी कम क्यों लागे लागे तेरे साथ में
मैं मुसाफ़िर तू मुसाफ़िर इस मोहब्बत के सफ़र में दो अकेले रोएं मिलके मिलके दोनों रब के घर में साथ तेरे ना सफ़र वो सफ़र नहीं लगता
तू है तो दिल धड़कता ...
है अगर ये ख्वाब तो फिर नींद ना टूटे कभी सांस छूटे हाथ से पर हाथ ना छूटे कभी
मैं नासमझ नादान हूं आके मुझको थाम ले लागे मुझको रब बुलाए जब तू मेरा नाम ले तू समंदर गहरा है सागर नहीं लगता
तू है तो दिल धड़कता है...
इस गीत का सबसे सशक्त पहलू है गीत की धुन और उतने ही प्यारे इसके सहज और दिल को छूने वाले बोल। गिटार के साथ बीच बीच में बजता तबला अजीम जी के सुझाव पर डाला गया। गीत का दोनों अंतरों के बीच के फिलर के तौर पर प्रसिद्ध वादक पारसनाथ से कुछ ऐसा बजाने को कहा गया जिसमें शांति और सुकून हो कृष्ण की बंसी की तरह और पारस ने क्या ही धुन निकाली बांसुरी की।
फिल्म आई और चली गई पर ये गीत अभी भी लोगों की जुबान पर है। पिछली पायदान पर विराजमान जोड़ी के आमिर मीर ने भी इसे अपने गहरी आवाज़ में इसे पूरे दिल से गाया है। फिलहाल तो आप फिल्म में बनी और सागर के सम्मिलित स्वरों में और फिर नीति मोहन द्वार गाए हुए इसके दोनों वर्जन सुन लीजिए।
चलते चलते ये लंबा सफ़र वार्षिक संगीतमाला की तीसरी सीढ़ी तक ले आया है जहां न कोई गीत है न कोई कव्वाली। यहां पर है एक प्यारी सी ग़ज़ल जिसे अपनी आवाज़ से संवारा है पिता पुत्र की जोड़ी ने। ये जोड़ी है गुजरात के कच्छ से ताल्लुक रखने वाली उस्मान मीर और आमिर मीर की।
ग़ज़लें मुझे हमेशा से प्रिय रही हैं पर सच बताऊं तो जगजीत जी के जाने के बाद नए ग़ज़ल गायक और उनकी धुन रचने वाले वो जादू नहीं जगा पा रहे। अव्वल तो जो ग़ज़लें चुनी जाती हैं वो भावों की गहराइयों को पकड़ नहीं पातीं और फिर जब शब्द बेअसर हों तो संगीत का लुत्फ़ भी कहां आ पाता है। ऐसे में जब मैने उस्मान और आमिर की जुगलबंदी को सुना तो मुझे बरबस मोहम्मद हुसैन और अहमद हुसैन की गाई ग़ज़लें याद आ गईं। तब एक भाई एक सुर में ग़ज़ल के मिसरे को उठाते तो दूसरे भाई अंदाज़ को बदल कर उसी मिसरे को एक अलग रूप प्रदान कर देते थे। उस्मान और आमिर ने भी इस ग़ज़ल को उसी शैली में गाया है।
उस्मान एक मामूली घर से आते थे। उनके पिता हुसैनभाई गुजराती लोक संगीत जैसे भजन और संतवाणी में तबला वादक थे। उस्मान मीर को बचपन से ही संगीत में रुचि थी। नवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और पिता के साथ तबला वादन करने लगे। परन्तु मन में उनकी इच्छा गायक बनने की थी। संगीत की प्रारंभिक शिक्षा तो उन्होंने अपने पिता से ही ली पर आगे गायिकी उन्होंने इस्माइल दातार जी से सीखी।
कहते हैं कि एक बार गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन, वे तबला वादक के रूप में श्री मोरारी बापू के आश्रम गए, जहाँ पर लोगों ने उनकी गायन प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए उन्हें बापू से मिलवाया। यहीं से उन्हें गायिकी का एक मंच मिला जो फिल्मों से होता हुआ आज स्वतंत्र संगीत सृजन करने तक आ पहुंचा है।
रही फ़हमी बदायूंनी साहब की लिखी इस ग़ज़ल की बात तो इस सहज पर असरदार सी ग़ज़ल की शुरुआत उस्मान मीर फ़हमी साहब की ही एक क़ता से करते हैं
कोई दुनिया में चेहरा देखता है,
कोई चेहरे में दुनिया देखता है तेरी आँखों में बस ये देखता हूँ,
कि मेरी आँखों में तू क्या देखता है
किसी के चेहरे में अपनी दुनिया सजा लेने वाली बात हो या फिर अपनी दृष्टि को अपने प्रिय के दृष्टिकोण तक सीमित कर लेने की,या फिर अपना दुख सुख भुलाकर सिर्फ अपने हमसफ़र की चिंताओं में घुले रहने की..प्रेम की जो पराकाष्ठा हो सकती है वो इस क़ता और इसके आगे के अशआर में झलकती है। ये अलग बात है कि इस तरह की भावनाएं धीरे धीरे आम सोच से विलुप्त हो रही हैं।
तेरे जैसा कोई मिला ही नहीं
कैसे मिलता कहीं पे था ही नहीं
तू जहाँ तक दिखाई देता है
उससे आगे मैं देखता ही नहीं
तेरे बारे में सोचने वाला
अपने बारे में सोचता ही नहीं
यार तुम को कहाँ कहाँ ढूँढा
जाओ तुम से मैं बोलता ही नहीं
दवे साहब का तार वाद्यों से सजा संगीत संयोजन भी बेहद मधुर लगता है। तबले के साथ साथ उस्मान मीर हारमोनियम भी क्या खूब बजाते हैं। इस ग़ज़ल के कुछ शेर जो नहीं इस्तेमाल हुए भी पढ़ने लायक हैं।
घर के मलबे से घर बना ही नहीं ज़लज़ले का असर गया ही नहीं
मुझ पे हो कर गुज़र गई दुनिया मैं तिरी राह से हटा ही नहीं
कल से मसरूफ़-ए-ख़ैरियत मैं हूँ शेर ताज़ा कोई हुआ ही नहीं
रात भी हम ने ही सदारत की बज़्म में और कोई था ही नहीं
याद है जो उसी को याद करो
हिज्र की दूसरी दवा ही नहीं
फ़हमी बदायूंनी का डेढ़ साल पहले ही निधन हुआ था। उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मे फ़हमी को छोटे बहर की ग़ज़ल कहने में कमाल हासिल था। ये ग़ज़ल उसका जीता जागता उदाहरण है। फ़हमी साहब एक बेहद विनम्र स्वभाव के मालिक थे। उनकी किताबों में दस्तकें निगाहों की’ और ‘पांचवी सम्त’ के बाद तीसरी किताब ‘हिज्र की दूसरी दवा’ देवनागरी लिपि में प्रकाशित हुई है।
उनका ही एक और कमाल का शेर है कि
मुंह में जब तक ज़बान बाक़ी है आप की दास्तान बाक़ी है।
ले तो सकता हूँ नाम क़ातिल का मसअला ये है जान बाक़ी है।
संजय लीला भंसाली अपनी फिल्मों के उत्कृष्ट संगीत के लिए जाने जाते रहे हैं। जब दो साल पहले लाहौर में मुजरों और जिस्मफरोशी के लिए मशहूर हीरामंडी पर उन्होंने वेब सीरीज बनाई तो इसके आठ भागों के लिए ठुमरियों, कव्वाली और ग़ज़लों से सजा आठ गीतों का एक गुलदस्ता भी बना जो मूल कथानक से कहीं ज्यादा सराहा गया।
मुझे इस एल्बम के कई गीत अच्छे लगते हैं पर मेरी इस संगीतमाला में इनमें से दो ही शामिल हो पाए। पहला तो कल्पना गंधर्व का गाया इक बार देख लीजिए तो दूसरा आज का गीत चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है जिसे संजय लीला भंसाली ने श्रेया घोषाल से गवाया। इन दोनों ही गीतों को तुराज ने ही लिखा है। संजय लीला भंसाली की एक खूबी है कि कलाकारों को सुनने परखने के बाद अगर वे उनसे प्रभावित होते हैं तो फिर वे उनकी फिल्मों के अभिन्न अंग बन ही जाते है।
गीतकार ए एम तुराज को भंसाली साहब ने 2010 में गुजारिश के लिए गाने लिखने को कहा था। उसके बाद बाजीराव मस्तानी, गंगूबाई और फिर हीरामंडी में जब जब उन्हें काव्यात्मक गीतों की जरूरत हुई उन्होंने तुराज का हाथ पकड़ा और तुराज ने भी उन्हें निराश नहीं किया। इस गीत के संगीत को अरेंज करने वाले श्रेयस पुराणिक के साथ भंसाली जी का पुराना नाता रहा है।
श्रेया घोषाल को तो फिल्मी दुनिया मेला पहला बड़ा ब्रेक संजय लीला भंसाली की बदौलत देवदास में मिला था और उसके बाद उनकी हर फिल्म में श्रेया का गाया कोई गाना होता ही है। भंसाली श्रेया से अपनी पहली मुलाकात के बारे में कहते है।
बात 1999-2000 की होगी। मैं उस दिन इस्माइल दरबार के साथ दिन भर बैठा था। हम लोग एक अच्छी गायिका की तलाश में थे। सोलह साल की श्रेया तब अपने पिताजी के साथ मेरे घर आई थी। मैं दिन भर लक्ष्मीकांत जी की एक धुन गुनगुना रहा था। जब श्रेया आई तो मैंने उसे कुछ गुनगुनाने को कहा और कमाल देखिए कि श्रेया ने वही गीत सुनाया जो मैं दिन भर से गा रहा था। तभी मैंने जान लिया कि इससे मेरा कुछ अंदर का रिश्ता है जो शायद अब ज़िंदगी भर बरक़रार रहे।
प्रेम में डूबे हुए दिल को जब ठेस लगती है तो मन एकदम से उसे स्वीकार नहीं पाता है। तरह तरह के प्रश्न मन मस्तिष्क में उठने लगते हैं कि आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? भला पूर्णिमा के दिन भी किसी ने चांद को किसी ने ढलते देखा है? पर मेरा प्यार तो उरूज़ पर आते आते ही अचानक बिखर गया। लुटे पिटे दिल की हालत बयां करें तो किससे? हालत ये है कि सीने में दर्द छुपाए चेहरे पर मुस्कुराहट का लबादा ओढ़ना पड़ रहा है। तुराज़ इसी मनोदशा को कुछ यूं शब्द देते हैं।
चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है हाय, पानी में...., हाय, पानी में...कौन जलता है? चौदहवीं शब को कहाँ, चाँद कोई ढलता है...
दर्द ऐसा कि हँसी आती है साँस सीने में, फँसी जाती है जिसमें काँटे बिछे हों मंज़िल तक जिसमें काँटे बिछे हों मंज़िल तक ऐसे रस्ते पे, कौन चलता है? हाय, पानी में, हाय, पानी में.....हा..य, पानी में कौन जलता है? चौदहवीं शब ....ढलता है
जीता हुआ इश्क़, हार बैठे... हैं इसी तरह दिल को, मार बैठे हैं जैसे हमने मले हैं, हाथ अपने जैसे हमने मले हैं हाथ अपने ऐसे हाथों को कौन मलता है? हाय, पानी में..हाँ..हाय, पानी में कौन जलता है? चौदहवीं ....ढलता है
संजय लीला भंसाली की राग यमन कल्याण से प्रेरित प्यारी धुन तुरंत श्रोता का ध्यान अपनी ओर खींचती है। मुखड़ों और अंतरों के बीच श्रेयस का संगीत संयोजन इस उप शास्त्रीय गीत के लिए खरा उतरता है। कहीं सारंगी और सितार की झनझनाहट, तो कहीं जलतरंग की आहट। तबले पर तो संदेश कदम शुरू से अंत तक अपना जलवा बरकरार रखते हैं।
संजय जानते थे कि एल्बम के इस सबसे सुरीले गीत के साथ कोई न्याय कर सकता है तो वो हैं श्रेया घोषाल। तो आइए सुनें उन्हीं की आवाज़ में ये गीत
2024 की मेरी संगीतमाला बेहद धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ी है। इसका एक कारण तो कार्यालय में बढ़ती जिम्मेदारियां हैं। जो लोग मुझे जानते हैं वो ये भी जानते होंगे कि मेरा खाली वक़्त संगीत के अलावा सैर सपाटे, चिड़ियों और तितलियों की तस्वीरें लेने और उनके बारे में लिखने में लगता है। यही वज़ह है कि 2026 आ गया और मैं अभी तक 2024 की संगीतमाला की आख़िरी कुछ पायदानों में अटका हूं। पाठक गण से मैं अपनी इस मंथर गति के लिए क्षमा प्रार्थी हूं🙏।
खैर धीरे धीरे ही सही मेरी गीतमाला की ये पैसेंजर ट्रेन आ पहुंची है अपनी पांचवी पायदान पर जिस पर फिल्म अमर सिंह चमकीला का गाना वो जो पहली बार सुनते ही मेरा मनपसंद गीत बन गया था वो भी तब जबकि इसे गाया था एक अनजान गायिका ने जिन्हें इस गीत के पहले मैंने सुना ही नहीं था।
जी हां आपने सही पहचाना ये गायिका हैं यशिका सिक्का। यशिका का परिवार संगीत से जुड़ा परिवार नहीं है पर उनके पिता को संगीत सुनने का बड़ा शौक़ था। उन्हें अपनी बेटी की आवाज़ पर इतना भरोसा था कि न केवल उन्होंने यशिका को संगीत की तालीम दिलवाई पर साथ ही संगीत से जुड़े रियलिटी शो में भी भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। वो अलग बात है कि यशिका की आवाज़ की बनावट परंपरागत न होने के कारण उन्हें ज्यादातर नाकामयाबी मिली। यशिका को भी ये बात मन में बैठने लगी कि शायद वो पार्श्व गायिकी के लायक नहीं हैं। पर पिता के विश्वास का कमाल था कि उन्हें जिंगल, कच्चे गीत और स्वतंत्र संगीत करने के प्रस्ताव मिलने लगे।
यशिकासिक्का
करीब एक दशक के संघर्ष के बाद अमर सिंह चमकीला में उन्हें नरम कलेजा गाने के लिए बुलाया गया। हुआ यूं कि रहमान को चमकीला के लिए पंजाबी गायकों की तलाश थी। फिल्म के संगीत को अंतिम रूप देने के पहले तमाम कलाकारों को बुलाकर उनसे ढेर सारे गाने गवाए गए। इन गायकों में यशिका भी एक थीं जिनकी आवाज़ रहमान को बिल्कुल अलग सी लगी। हालांकि नरम कलेजा में उनके हिस्से में बस गीत का छोटा टुकड़ा ही आया।
इस बात के दस महीने बीतने के बाद अचानक ही उन्हें तू क्या जाने मेरे यार को गाने के लिए एक रात दस बजे बुलाया गया। दो बजे संगीत के जादूगर रहमान आए और उन्होंने 15 मिनट में धुन तैयार कर दी जिसे यशिका ने अगले दस मिनट में गा भी दिया और इस तरह गीत का मूल स्वरूप अस्तित्व में आया। गीत में परिवर्तन अगले कुछ महीने में होते रहे पर यशिका के मन में ये सवाल चलता रहा कि क्या उनकी आवाज़ अंततः फिल्म में रहेगी?
दरअसल इस गीत के लिए भी इम्तियाज़ अली और रहमान श्रेया घोषाल का नाम पहले सोच रहे थे पर जब इम्तियाज़ ने यशिका वाला वर्जन सुना तो वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा कि इसे ही रहने देते हैं। वैसे भी यशिका की आवाज़ फिल्म के पंजाबी किरदार पर खूब जमी भी है।
यशिका बताती हैं कि इस गीत की सबसे कठिन जगह अंतिम वाले अंतरे में आती है जब सच्चियाँ मोहब्बतां के आगे की कुछ पंक्तियां उन्हें बिना बीच में सांस लिए ही गानी थीं और उन्होंने उसे क्या खूब निभाया है। गीत के अंत में उनकी गुनगुनाहट को बार बार सुनने का दिल करता है। रिलीज़ होने के बाद बेहद लोकप्रिय हुआ पर दुख की बात ये थी कि यशिका के पिता जिन्होंने उनके संगीत की नींव रखी, ये देखने के लिए जीवित नहीं रहे।
गीतकार इरशाद कामिल ने इस गीत में एक युवा स्त्री की आसक्तियों, उसकी आकांक्षाओं को भली भांति शब्दों में बांधा है। उनके शब्दों के चुनाव को देखिए तन का ताज भी मन का राज भी,अपना आज भी तुझपे है देना वार। प्रेम में डूबी हुई स्त्री के पूर्ण समर्पण का भाव कितनी स्पष्टता से उभरा है यहां। उसी भाव को आगे और गहरा कर के वे लिखते हैं
जीत लूं ज़माने से मैं जंग करके, तुझ पे दुपट्टे वाला रंग करके, सूट से अपने मैं लूंगी मिला, रखना तुझे सीने पे अब मैंने
अपने प्रिय को इन पंक्तियों में अपने दिल के पास रखने का क्या नायाब तरीका ढूंढा है यहां नायिका ने!
मुखड़े के पहले ताल वाद्यों के साथ तुम्बी (विजय यमला) और मेंडोलिन (एस एम सुभानी) का रिदम मन को लुभाता है जिसे पराग छाबड़ा ने अरेंज किया है। पंजाबी लोक संगीत का स्वाद इन्हीं वाद्यों की वज़ह से गीत में उभर कर आया है। वहीं मुखड़े के बाद प्रतीक श्रीवास्तव का बजाया सरोद ध्यान खींचता है।
तू क्या जाने मेरे यार, हाय तू क्या जाने मेरे यार छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ, छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ नैना चोर से, इक दिन जोर से, करना है तुझको प्यार, हाय...... नैना चोर से इक दिन जोर से, करना है तुझको प्यार तू क्या जाने मेरे यार, हाय.... तू क्या जाने मेरे यार
तन का ताज भी मन का राज भी, अपना आज भी तुझपे है देना वार, तू क्या जाने मेरे यार, हाय.... तू क्या जाने मेरी जान
सच्चियाँ मोहब्बतां बुलंद करके,रखना पिटारी में तू बंद करके रुसना भी हंसना भी नाल तेरे, सबसे छुपा रखना अंग संग मैंने हाय आय आय आए जीत लूं ज़माने से मैं जंग करके, तुझ पे दुपट्टे वाला रंग करके, सूट से अपने मैं लूंगी मिला, रखना तुझे सीने पे अब मैंने हाय आय आय आए। ..
छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ, छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ, तू क्या जाने मेरे यार, तू क्या जाने मेरे यार
हो संग ना छोड़ दे इश्क़ निचोड़ दे, बजने दे तन के तार, हाय संग ना छोड़ दे इश्क़ निचोड़ दे, बजने दे तन के तार तू क्या जाने मेरे यार, हाय तू क्या जाने मेरी जान
तो आइए सुनते हैं यशिका की आवाज़ में पांचवीं पायदान का ये गीत
जीवन की चुनौतियों से जूझते हुए बहुधा ऐसा होता है कि हम हिम्मत हार जाते हैं। अपने पर से भरोसा उठने लगता है। किसी काम को करने के पहले इतना अगर मगर सोच लेते हैं कि खुले मन से उस कार्य को अच्छे तरीके से कर भी नहीं पाते। नतीजन कई बार असफलता हाथ लगती है जो तनाव को जन्म देती है। ये दुष्चक्र कभी कभी हमें अवसाद की ओर ढकेल देता है।
स्वानंद, श्रेया और कनिष्क सेठ
गीतकार संगीतकार स्वानंद किरकिरे ने रोजमर्रा की जिंदगी में आने वाली इसी भावना को पकड़ा और एक लोरियों सा मुलायम गीत रच दिया जो सच पूछिए तो एक तरह का आत्मालाप है जिसे शायद ही किसी ने दिल से महसूस नहीं किया होगा। 2024 में जितने भी स्वतंत्र गीत बने उसमें किसी गीत की भी शब्द रचना इतनी उत्कृष्ट नहीं होगी जितनी इस गीत की है।
जब बुरे ख़्यालों से मन परेशान हो जाता है तो हम कल्पना के सागर में भटकते हुए ऋणात्मक सोच के दलदल में धंसते चले जाते हैं। ऐसे में एक ढाढस संजीवनी का काम करता है। ये गीत इस बात की ताकीद करता है कि ये ढाढस हमें अपने अंदर से ही लाना होगा। अपनी काबिलियत पर भरोसा करना होगा। उदासियों के जाल से मुक्त होने के लिए अपना दुलार खुद करना होगा।
स्वानंद को पता था कि उन्होंने एक व्यक्ति की मनोभावना को इस गीत में बड़ी बारीकी से पकड़ा है। अब उन्हें तलाश थी एक ऐसी आवाज़ की जो इस गीत को इसके उचित मुकाम तक ले जाए। इसके लिए उनके मन में एक ही आवाज़ थी और वो आवाज़ थी श्रेया घोषाल की। श्रेया ने जब इस गीत के लिए हां कि तो स्वानंद की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। श्रेया के आने से गीत निखरा भी उसी अंदाज़ में।
मन को शांत करती धुन, काव्यात्मक बोल और श्रेया का दिव्य स्वर एक ऐसा मिश्रण था जो किसी को भी मुग्ध कर दे।
ख़ुद श्रेया घोषाल का कहना था कि
ये गाना ऐसा था कि रिकॉर्डिंग के समय हम इसे गाए जा रहे थे। ये ऐसे बैठ गया था मेरे जेहन में जैसे कि मेरा ही कोई हिस्सा हो। इस गीत का टेम्पो बच्चे को सुनाई जाने वाली लोरियों जैसा है। शूट में आने के पहले कल ही मैंने अपने बच्चे को सुलाते वक़्त ये गाना सुनाया था।
कोक स्टूडियो भारत ने इस गीत में संगीत arrange करने की जिम्मेदारी सौंपी कनिष्क सेठ को जो लोकप्रिय गायिका कविता सेठ के पुत्र हैं। स्वानंद और श्रेया की सलामी जोड़ी ने शुरुआत इतनी अच्छी दे दी थी कि नाममात्र का संगीत भी इस गीत के लिए काफी था। कनिष्क ने इसके लिए तार और ताल वाद्यों के साथ अंत में हल्के हल्के कोरस का सहारा लिया जो गीत में अंतर्निहित सुकून को एक विस्तार देता है।
भीड़ है ख़यालोंकी, इक अकेला मन
नोचती खरोंचती, ये सोच ज़ख्म दे कोई मेरे मन को लगा दे मरहम सो जा रे
खींचता दिशा दिशा, तनाव बेरहम
रे मन तू गुमसुम गुपचुप सो जा रे रे मन तू गुमसुम गुपचुप सो जा रे
ख़यालों से ना डर, कल की छोड़ दे फिक्र ख़यालों से ना डर, कल की छोड़ दे फिक्र आज नींद के अंधेरों में खो जा रे रे मन तू गुमसुम गुपचुप सो जा रे रे मन तू गुमसुम गुपचुप सो जा रे सो जा रे
दिल में जो सहमा सहमा डर है या मलाल है दिल में जो सहमा सहमा डर है या मलाल है सच कहूँ जो भी है वो सिर्फ़ इक ख़याल है तेरे ही तसव्वुरों का खोखला कमाल है मुस्कुरा मुस्कुरा, क्यों दर्द की लड़ियाँ पिरोता रे खोल दे तू इस घड़ी सुकून का झरोखा रे
ख़यालों से ना डर...... सो जा रे
कि पलकों की दो खिड़कियाँ तू हौले बंद कर ले कि धड़कनों की थपकियों से तू ज़रा सँवर ले साँसों की सुन ले लोरी, पलने की जैसे डोरी तू ही साथी तेरा, न खुद से ही तू थोड़ा प्यार और दुलार कर जा रे सो जा रे...
तो आइए सुनें इस गीत को जो आपके अंदर एक विश्वास तो जगाएगा ही पर साथ ही साथ मन को सुकून भरी दुनिया में भी पहुंचा देगा।
वार्षिक संगीतमाला की अगली पेशकश है 2024 में काफी लोकप्रिय रही वेब सीरीज हीरामंडी से। यूं तो हीरामंडी में शामिल तमाम गीत सुनने के काबिल हैं पर इस बार की संगीतमाला में इस धारावाहिक के दो गीतों को सुनने का अवसर आप सबको मिलेगा। सकल बन फूल रही सरसों, आज़ादी और नजरिया की मारी भले ही इस श्रृंखला का हिस्सा न बन पाए हों पर आप उन्हें भी अवश्य सुनें।
ऐसा शायद ही होता है कि किसी वार्षिक संगीतमाला में दो गीत ऐसे हों जिन्हें एक ही परिवार के सदस्यों ने गाया हो। गायकों की इस भीड़ में अगर वो रिश्ता भाई बहन का हो तो और भी अचरज की बात हो जाती है। मैं बात कर रहा हूं गायक पृथ्वी गंधर्व और उनकी बहन कल्पना गंधर्व की। पृथ्वी गंधर्व का गाया हुआ निर्मोहिया इस गीतमाला की बीसवीं पायदान पर आप पहले ही सुन चुके हैं और आज सातवीं सीढ़ी पर उनकी बहन कल्पना हम सबसे सुना रही हैं नेटफ्लिक्स की सीरीज हीरामंडी का ये गीत।
जिस परिवार के उपनाम में गंधर्व का जिक्र हो तो लगने लगता है कि वो संगीत से जुड़ा होगा। कल्पना के नाना वादक थे और उन्होंने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी के साथ कई फिल्मों में काम किया। दादा ने सारंगी को अपना वाद्य चुना वहीं पिता ने वायलिन पर महारत हासिल की।
पृथ्वी और कल्पना ने बचपन से शास्त्रीय संगीत के साथ ग़ज़ल और उप शास्त्रीय संगीत अपने नाना से सीखा। ये दोनों उज्जैन घराने की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। पृथ्वी को तो मैं बतौर ग़ज़ल गायक मैं पिछले कुछ सालों से सुन रहा हूं पर कल्पना की गायिकी से मैं हीरामंडी के माध्यम से ही परिचित हो सका। हालांकि इसके पहले भी उन्होंने तनु वेड्स मनु रिटर्न और सरबजीत के गाने गाए हैं।
कल्पना गंधर्व
हीरामंडी के लिए गाने का मौका उन्हें अचानक से ही मिला। भंसाली साहब अक्सर नई आवाज़ों को मौका देते रहे हैं। अक्सर उनकी महफिलों में नए कलाकारों को आमंत्रित किया जाता है। वे उनसे कुछ सुनाने की फरमाइश करते हैं और आवाज़ अच्छी लगी तो फिर वहीं उस गायक या गायिका को अपने किसी गीत के लिए चुन भी लेते हैं। कल्पना से भी उन्होंने एक ग़ज़ल गंवाई और ये गीत रिकॉर्ड कर लिया। हालांकि कौन से गीत पर कब संपादन की कैंची चल जाए ये डर कल्पना को भी सता रहा था। साथ ही उनके मन में ये संशय भी था कि क्या इसे नेटफ्लिक्स ठीक से प्रमोट करेगी क्योंकि ओटीटी वाले इस मामले में हमेशा कोताही बरतते पाए गए हैं।
इस गीत को लिखा है ए एम तुराज़ ने जो अक्सर संजय लीला भंसाली की फिल्मों में गीत लिखते पाए जाते हैं। तुझे याद कर लिया है आयत की तरह..., इक दिल है इक जान है..., अब तोहे जाने न दूंगी भंसाली साहब की फिल्मों के लिए लिखे उनके कुछ ऐसे गीत हैं जो मेरे बेहद पसंदीदा रहे हैं।
हीरामंडी का संगीत यूं तो खासा पसंद किया गया पर इक बार देख लीजिए.. के रिलीज़ होने के बाद आलम ये था कि लोगों ने इंस्टाग्राम पर इस गीत को लेकर बेतहाशा रील बनाईं। लड़कियों में तो ये गीत खासा लोकप्रिय हुआ। शायद ही कोई नवोदित गायिका हों जिन्होंने इस गीत की शुरुआती पंक्तियां नहीं गाई। संजय लीला भंसाली की धुन को कल्पना ने अपनी गायिकी से इस मुकाम पर पहुंचा दिया कि तुराज़ का ये गीत सबकी जुबान पर आ गया।
इक बार देख लीजिए
इक बार देख लीजिए
दीवाना बना दीजिए
जलने को हैं तैयार हम
परवाना बना दीजिए
इक बार देख लीजिए
इतनी पिएँ कि जा ना सकें
उठ कर कहीं भी हम
आँखों को अपनी आप एक
मय-ख़ाना बना दीजिए
इक बार देख लीजिए
कुछ भी दिखाई ना दे हमें
सिवा आप के कहीं पे
सारे जहां से आप हमको
बेगाना बना दीजिए
इक बार देख लीजिए....
इस शब्द प्रधान गीत में म्यूजिक अरेंजर राजा पंडित ने सितार और वायलिन जैसे तार वाद्यों के साथ साथ तबले और हारमोनियम का इस्तेमाल किया है। राजा ने इस गीत के पहले अंतरे के बाद वायलिन और दूसरे में सितार और फिर गीत के अंत में हारमोनियम पर बजाए एक टुकड़े से सजाया है।
स्वतंत्र संगीत की ये खासियत होती है कि वो निर्बाध बहता है। एक ख़्याल, जब शब्दों के आंचल से छुपता छुपाता बाहर आकर एक आकार लेता है तो उस पर पटकथा की बंदिश नहीं होती, उसके पीछे होती है तो सृजन करने वाले की सोच। इस सोच को एक प्यारे गीत की शक्ल लेने के लिए पार करनी होती है एक सुरीली धुन रूपी पगडंडी।
वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर एक सहज पर प्यारा सा गीत मेरी जान.. एक ऐसा ही स्वतंत्र नग्मा है जो गीतकार संगीतकार गायक स्वानंद और उनके युवा पर बेहद सुरीली सहगायिका हंसिका पारीक, गिटारिस्ट श्रेय गुप्ता, भरत और तार वाद्यों पर अपनी महारत रखने वाले तापस दा के सम्मिलित प्रयासों से इस रूप में आया है।
किसी भी शख़्स के व्यक्तित्व में ढेर सारे रंग होते हैं। उन रंगों में कुछ तो अपने मन के अनुरूप होते हैं तो कुछ ऐसे जिनका होना हमें कचोटता है। पर एक बार जब वो व्यक्ति पसंद आने लगता है तो हम उसके हर पहलू को अपनाने को तैयार हो जाते हैं। यही तो है प्रेम की ताकत! ये गीत बस इसी बात को रेखांकित करता है।
इस गैर फिल्मी गीत को लिखा और इसकी धुन बनाई है स्वानंद किरकिरे ने और इस युगल गीत को उनके साथ आवाज़ दी है नवोदित गायिका हंसिका पारीक ने। नई आवाज़ों में हंसिका मुझे बेहद सुरीली लगती हैं। बतौर गायिका मैं उनके संगीत का पिछले दो तीन सालों से अनुसरण कर रहा हूं। अपनी मीठी आवाज़ के साथ साथ उन्हें शास्त्रीय संगीत की भी अच्छी पकड़ है। अजमेर से ताल्लुक रखने वाली 23 वर्षीय हंसिका संगीत विशारद हैं।
इंडियन आइडल जूनियर से टीवी पर हलचल मचाने के बाद उन्होंने स्वतंत्र संगीत की राह पकड़ी और फिर वो संगीतकार विशाल मिश्रा की नज़र में आईं। फिल्मों में विशाल ने ही उन्हें पहला मौका दिया। इस साल उन्होंने सय्यारा और आज़ाद फिल्म के हिट गीतों में अपना योगदान दिया है। इस संगीतमाला में उनका एकल गीत रतिया पहले ही बज चुका है।
स्वानंद की धुन सुनते ही मन इस गीत को गुनगुनाने का करने लगता है। शब्दों का उनका चयन भी इस गीत के प्रति श्रोताओं के लगाव को बढ़ाता है। ज़री वाली साड़ी की बात तो हम सभी करते हैं पर उस शब्द ज़री के जरिए किसी के स्वभाव का कितना सटीक खाका खींचा है स्वानंद ने.. वैसे नाज़ुक है ज़री सी, चुभती भी है अच्छी खासी। गीत के साथ बजते गिटार की कमान संभाली है श्रेय गुप्ता ने जो स्वानंद के कार्यक्रमों में अक्सर उनके साथ दिखाई पड़ते हैं।
पर गीत के अंतरों के बीच मेंडोलिन पर असली कमाल दिखला गए हैं तापस राय साहब जिनका बजाया संगीत का टुकड़ा मन को आनंदित कर देता है। स्वानंद के शब्दों में ये गीत अपनी कमियों और अच्छाइयों को स्वीकार करने वाला प्रेम गीत है। तो आइए सुनते हैं उनकी और हंसिका के स्वरों में ये युगल गीत
उसकी बातों में खनक है, उसकी आँखों में उदासी
उसके चलने में लचक है, पर वो सहमी है ज़रा सी उसके भीतर एक अगन है,पर वो शीतल है हवा सी वैसे नाज़ुक है ज़री सी, चुभती भी है अच्छी खासी
मेरी जान जान जान, मेरे दिल का ये मकान टूटा फूटा ही सही तू, बन जा इसका मेहमान मेरी जान जान जान, मेरे दिल का ये मकान
दर्द की एक टीस है तू, और है खुशियों की मुनादी ज़ख्म है तू गहरा दिल का, तू ही मरहम भी है साथी यादों वाली ख्वाबों वाली, हर गली क्यों तुझको भाती तू ख़यालों में तो रहता, पर समझ ना तुझको पाती मेरी जान जान जान, मेरे दिल का ये मकान टूटा फूटा ही सही तू, बन जा इसका मेहमान मेरी जान जान जान, मेरे दिल का ये मकान...
मेरी जान जान जान, मेरा इतना कहना मान दो अधूरी सांसें मिलकर, कर ले ज़िंदगी आसान कि तेरे बिन जिया नहीं जाए, कि चैना ना आए तेरे बिन
पिछले साल की हिट फिल्मों में स्त्री 2 का नाम खास तौर पर लिया जाता है। एक हॉरर कॉमेडी के हिसाब से मुझे ये फिल्म बस ठीक ठाक ही लगी थी पर इसके गीतों को जिस तरह चौक चौराहों पर बजाया गया उससे ये तो जरूर लगता है कि इस फिल्म की सफलता में इसके संगीत का बहुत बड़ा योगदान था।
इस फिल्म के वैसे तो दो गाने इस संगीतमाला में शामिल हैं पर दसवीं पायदान का ये गीत पिछले साल एक बार सुनते ही मेरी इस फेरहिस्त में शामिल हो गया था। एक समय बारहवीं सीढ़ी पर विराजमान इस गीत ने छलांग लगा कर आठवीं सीढ़ी पर कब्जा जमाया था पर जैसे जैसे 25 गीतों की पूरी सूची तैयार होती गई तो ये दो सीढ़ियां नीचे गिरते जा पहुंचा प्रथम दस के दसवें पड़ाव पर।
कुछ गीतों की मेलोडी ऐसी होती है जिन्हें आप नज़र अंदाज़ नहीं कर पाते। अब तुम्हारे ही रहेंगे हम ऐसा ही सुरीला गीत है जो एक बार सुनते ही आपका हो के रहेगा। अमिताभ भट्टाचार्य शाश्वत रहने वाले प्रेम को सहज शब्दों में इस तरह बांधते हैं कि वरुण जैन और शिल्पा राव को सुनते हुए श्रोता इस गीत को साथ साथ गुनगुनाना शुरू कर देते हैं। अंग्रेजी का एक मुहावरा है Easy on the ears वो इस गीत के लिए बिल्कुल दुरुस्त बैठता है ।
वरुण जैन और शिल्पा राव
बॉलीवुड में ऐसे गीत किसी पटकथा के बीच में अपनी जगह बना लेते हैं और यही वज़ह है कि संगीतकार धुन को जल्द ही शब्दों का जामा पहनाकर अपने खजाने में जमा कर लेते हैं। सच तो ये है कि सचिन जिगर ने जब ये गीत बनाया था तब उन्हें भी नहीं पता था कि ये गीत किस फिल्म का हिस्सा बनेगा? तकरीबन बनने के एक साल बाद जब ये गीत स्त्री 2 के लिए चुना गया तो इसके शब्दों और संगीत में थोड़े बहुत सुधार किए गए। गायक वरुण जैन जिनकी आरंभिक संगीत यात्रा की चर्चा मैंने यहां की थी, ने गीत का अपना हिस्सा अलग रिकॉर्ड किया था। यही हाल शिल्पा का भी था। फिल्म के रिलीज़ के कुछ दिनों पहले दोनों गायक पहली बार जीवन में एक दूसरे से मिले।
वरुण बताते हैं कि शिल्पा राव के साथ किसी गीत में उनका नाम आना और अमिताभ भट्टाचार्य के रचे बोलों को अपनी आवाज़ देना उनके लिए एक स्वप्न के समान था क्योंकि बचपन से वो इन कलाकारों की गायिकी और रचनाधर्मिता का आनंद लेते आए थे।
सचिन - जिगर
बॉलीवुड में जैसा आजकल का चलन है कि अंतरों के बीच एक कोरस के इस्तेमाल का। यही trend सचिन जिगर ने यहां भी इस्तेमाल किया है जो कि सुनने में अच्छा ही लगता है। सचिन जिगर की धुन ही इतने कमाल की है कि गीत में अंतरों के बीच या मुखड़े के पहले वाद्य यंत्रों का प्रयोग ना के बराबर है।
फिर से मिलने की जहाँ पे, दे गए थे तुम कसम
देख लो आ कर वहीँ पे, आज भी बैठे हुए है हम
तुम्हारे थे तुम्हारे हैं, तुम्हारे ही रहेंगे हम
तुम्हारे थे तुम्हारे हैं, तुम्हारे ही रहेंगे हम
मुद्दतें भी चंद लम्हों, जैसी लगती हैं सनम
बात ही ऐसी तुम्हारे, इश्क़ में कुछ है..मेरे हमदम
तुम्हारे थे तुम्हारे हैं....
वादा था कब का अब जा के आए, फिर भी गनीमत आए तो हैं
आइए आइए शौक़ से आइए, आइए आके इस बार ना जाइए
बिछड़ के भी हमसफ़र से, वफ़ा जो कर पाए है
इस आतिश के समन्दर से, वही तो गुज़र पाए है
नहीं मिली हीर तो क्या, रहे उसी के वो फिर भी
तभी रांझे वही सच, मायने में कहलाए है..कहलाए है
वही सच्ची मोहब्बत है, कभी होती नहीं जो कम
तुम्हारे थे तुम्हारे हैं..
तो आइए सुनते हैं ये गीत जिसे राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर पर फिल्माया गया है।
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