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सोमवार, नवंबर 03, 2008

अनिल कुंबले - क्रिकेट के प्रति पूर्णतः कटिबद्ध इस जीवट खिलाड़ी के खेल जीवन से जुड़े वो यादगार पल...

अनिल कुंबले ने कल दिल्ली टेस्ट के आखिरी दिन प्रथम श्रेणी क्रिकेट से संन्यास ले लिया। नब्बे के दशक से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले अनिल के १८ वर्षों के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सफ़र का मैं साक्षी रहा हूँ। इस दौरान भारत ले लिए दिया गया उनका योगदान किसी भी हिसाब से सुनील गावस्कर और कपिल देव से कमतर नहीं है, ऐसा मेरा मानना है।


कुंबले का नाम आते ही एक ऐसे खिलाड़ी की शक्ल ज़ेहन में उभर कर आती है जिसने हमेशा टीम के हित को सर्वोपरि रखा। ये खिलाड़ी जब भी मैदान में उतरा अपना सर्वस्व झोंक कर आया। इसलिए अंतिम टेस्ट के लिए जैसे ही कुंबले को ये लगा कि शारीरिक रूप से वो पूर्णतः सक्षम नहीं हैं, उसने इस श्रृंखला के बीच में ही ये निर्णय ले लिया कि अलविदा कहने का वक़्त आ गया है।


अनिल को 'जंबो' की उपमा उनकी तेज गति से फेकी जाने वाली फ्लिपर (Flipper) की वज़ह से ही नहीं मिली बल्कि इसमें उनके जंबो साइज पाँवों का भी हाथ रहा :)। अनिल मेरे हमउम्र तो हैं ही, साथ ही वो हमारी जात बिरादिरी वाले भी हैं। चौंक गए ! अरे जनाब मेरे कहने का मतलब ये था कि वो भी एक यांत्रिकी यानि मेकेनिकल इंजीनियर (वो भी Distinction Holder) हैं। अब ये अलग बात है कि अपने चुस्त दिमाग का प्रयोग उन्होने क्रिकेट के मैदान में अपनी गेंदों की लेंथ, गति और फ्लाइट के बदलाव में दे डाला और तभी तो १३२ टेस्ट में ६१९ विकेट झटक डाले।

जितने मैचों में उन्होंने भारत को अपनी गेंदबाजी के बल पर जिताया है वो उनसे ज्यादा नामी खिलाड़ियो से कहीं अधिक है। वैसे तो कितने ही मौके हैं जो कुंबले ने तमाम भारतीयों के लिए यादगार बना दिए पर आज इस महान खिलाड़ी की विदाई के समय उनमें से कुछ पलों को आपसे फिर बाँटना चाहूँगा जिसे याद कर मन आज भी बेहद रोमांचित हो उठता है।


फरवरी १९९९, फिरोजशाह कोटला, दिल्ली

पाकिस्तान की टीम को जीतने के लिए अंतिम पारी में ४०० से ऊपर रन बनाने हैं। जीत असंभव है बस मैच बचाने की जुगत है। पहले स्पेल में अनिल भी कुछ खास नहीं कर पाते हैं। स्कोर १०१ तक जा पहुँचता है वो भी बिना कोई विकट खोए। पर अनिल का दूसरा स्पेल पाकिस्तानी बल्लेबाजों के लिए प्राणघातक साबित होता है। अफ़रीदी, सईद अनवर , इज़ाज अहमद, सलीम मलिक, इंजमाम जैसे धुरंधर बल्लेबाज कुंबले के शिकार बनते चले जाते हैं। हालत ये है कि सक़लीन मुश्ताक का जब नौवाँ विकेट गिरता है तो श्रीनाथ कोशिश करते हैं कि वो गलती से आखिरी विकेट ना ले जाएँ। वसीम अकरम के आउट होते ही भारत को मिलती है एक जबरदस्त जीत और कुंबले को एक ऍसा व्यक्तिगत मुकाम जिसे क्रिकेट इतिहास में सिर्फ एक और बार ही संपादित किया गया हो। तो आइए फिर से महसूस करें खुशी के उन पलों को और देखें कुंबले ने कैसे किए थे अपने ये दस शिकार


जब मैं बंगलोर गया था तो एम जी रोड के पास अनिल कुंबले के नाम का वो चौक भी दिखाई पड़ा था जो कर्नाटक सरकार ने उनकी इस उपलब्धि के उपहार स्वरूप दिया था।

मई २००२, एंटीगुआ
भारत और वेस्ट इंडीज के बीच एंटीगुआ में चौथा टेस्ट मैच चल रहा है। वेस्ट इंडीज के तेज गेंदबाज मरविन डिल्लन एक बाउंसर फेंकते हैं। अनिल इससे पहले कि गेंद की लाइन से अपने आप को हटा पाएँ गेंद उनके गाल पर जा लगती है। शुरु में तो ऍसा लगता है कि सिर्फ बाहरी कटाव है पर जब रात में दर्द बढ़ता है तो पता लगता है कि जबड़े में ही क्रैक है। पर जुझारुपन और जीवटता की मिसाल देखिए, चौथे दिन के खेल में सिर पर बैंडेज बाँधे ये खिलाड़ी मैदान पर उतरता है और लारा जैसे महान बल्लेबाज को आउट करने में सफल हो जाता है।


अगस्त २००७, क्वीन्स पार्क, ओवल

ओवल में दूसरा टेस्ट इंग्लैंड और भारत के बीच खेला जा रहा है। रनो का अंबार लग रहा है। धोनी की आतिशी पारी का अनायास अंत हुआ है और मैदान में कुंबले हैं। लग रहा है भारत की पारी जल्दी ही सिमट जाएगी क्यूंकि दूसरे छोर पर श्री संत हैं जिनका टेंपरामेंट जगजाहिर है। पर अपनी टेस्ट जीवन की १५१ वीं पारी में कुंबले पूरे फार्म में हैं। तेंदुलकर की तरह ही कवर ड्राइव लगा रहे हैं। और ये क्या अब तो वो अपने पहले शतक के पास भी पहुँच गए हैं।
हमारे दिल की धड़कने बढ़ गई हैं। निचले क्रम के बल्लेबाज का शतक, ऊपरी क्रम के बल्लेबाज की तुलना में हमारे लिए हजार गुना ज्यादा महत्त्व रखता है। शतक से अब एक शाट की दूरी है पर ये गेंद तो बल्ले के निचले किनारे से निकल कर विकेट की बगल से होती हुई सीमारेखा की ओर जा रही है । वहीं कुंबले पहला रन पूरा कर दूसरे के लिए भाग रहे हैं और अब तो गिर भी पड़े हैं पर शतक पूरा हो गया है। हमारी आँखे खुशी के अतिरेक से सजल हो उठीं हैं और उधर ड्रेसिंग रूम में तो जश्न का माहौल है ही।

नवंबर २००८ फिरोजशाह कोटला, दिल्ली
कुंबले कैच लेते वक़्त फिर घायल हैं। बायें हाथ में फिर 11 टाँकें पड़े हैं फिर भी आस्ट्रेलियाई टीम को आल आउट भी करना है। हरभजन नहीं है तो मैदान में उनकी जरूरत है। इंशांत शर्मा और अमित मिश्रा जैसे युवा खिलाड़ियों से लेकर लक्ष्मण तक आसान कैच नहीं ले पा रहे। कुंबले क्षेत्ररक्षण से खुश नहीं। मिशेल जानसन सीधा कुंबले के सिर के ऊपर से गेंद को उठाते हैं। पर कुंबले ने कॉल कर दिया है कि पीछे दौड़ते हुए भी वे ही कैच लेंगे और वो चोटिल हाथ से भी कैच पकड़ लेते हैं। हमें नहीं पता कि ये उनका अंतिम शिकार है क्यूँकि उनकी आँखों में विकेट लेने की भूख अब भी दिखती है पर ३८ साल की उम्र में शायद शरीर और साथ नहीं दे रहा।


आज ये दुख नहीं बल्कि खुशी का मौका है एक महान खिलाड़ी की विदाई का जिसने अपने विनम्र स्वभाव और खेल के प्रति अटूट कटिबद्धता से इस देश में ही नहीं बल्कि विदेशी खिलाड़ियों के बीच एक सम्मान का स्थान बनाया। आशा है अंतिम टेस्ट में भारतीय टीम कुंबले को सीरीज जीतने का तोहफा जरूर देगी।
आज इस देश को अनिल जैसे जीवट खिलाड़ियों की जरूरत है जिन्हें ना केवल अपनी काबिलियत पर भरोसा है पर अपनी प्रतिभा को तराशते रहने के लिए निरंतर मेहनत करने की इच्छा शक्ति भी है।

अनिल, अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जीवन में खुशियाँ बटोरें ये मेरी और तमाम भारतवासियों की शुभकामना है।

सोमवार, जून 23, 2008

१९८३ विश्व कप क्रिकेटः यादें पच्चीस साल पहले की -हाय उस रात मैं क्यूँ सो गया...

पच्चीस साल पहले की बातों को याद करना कठिन है , पर इस घटना को मैं कैसे भूल सकता हूँ। जी हाँ, मैं १९८३ के विश्व कप की बात कर रहा हूँ। भारत में रंगीन टेलीविजन तो १९८२ के एशियाई खेलों के समय आया था पर १९८३ में हुए प्रूडेन्शियल विश्व क्रिकेट के सारे मैचों का सीधे प्रसारण की व्यवस्था यहाँ तो क्या इंग्लैंड में भी नहीं थी। यही वज़ह है कि उस प्रतियोगिता में जिम्बाब्वे के खिलाफ संकटमोचक की तरह उतरे कपिलदेव के शानदार नाबाद १७५ रनों का वीडिओ फुटेज उपलब्ध ही नहीं है।

जैसा कल IBN 7 पर टीम के सदस्य कह रहे थे कि हम पर उस वक़्त जीतने का कोई दबाव नहीं था। होता भी कैसे जिस टीम ने उससे पहले के सारे विश्व कपों में कुल मिलाकर एक मैच ही जीता हो, उससे ज्यादा उम्मीद भी क्या रखी जा सकती थी? प्रतियोगिता शुरु होने वक़्त मैं अपनी नानी के घर कानपुर गया हुआ था। भारत के पहले मैच के अगले दिन जब दूरदर्शन समाचार ने भारत के अपने पहले लीग मैच में ही वेस्ट इंडीज को पटखनी देने की खबर सुनाई, मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा। अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य को जब तक मैंने ये खबर नहीं सुनाई दिल को चैन नहीं पड़ा।

सुननेवालों ने तो खवर में उतनी दिलचस्पी नहीं दिखाई पर मेरे दिल में अपनी टीम के लिए आशा का दीपक जल चुका था। बीबीसी वर्ल्ड और दूरदर्शन से मिलती खबरें ही मैच के नतीजों को हम तक पहुँचा पाती थीं। भारतीय टीम को अपने ग्रुप में वेस्ट इंडीज, आस्ट्रेलिया और जिम्बाबवे से दो दो मैच खेलने थे। भारत ने अपने पहले तीन में दो मैच जीत लिए थे पर आस्ट्रेलिया से अपने पहले मैच में वो बुरी तरह हार गया था।

चौथे मैच में वेस्टइंडीज से हारने के बाद भी भारत प्रतियोगिता में पहले की दर्ज जीतों की वज़ह से बना हुआ था। पर १८ जून १९८३ में जिम्बाबवे के साथ खेला मैच भारत के लिए प्रतियोगिता का टर्निंग पव्याइंट था। भारत पहले बैटिंग करते हुए १७ रनों पर पाँच विकेट खो चुका था और ७८ तक पहुँचते पहुँचते ये संख्या सात तक पहुँच गई थी पर कप्तान कपिल देव ने अपने नाबाद १७५ रनों जिसमें सोलह चौके और छः छक्के शामिल थे स्कोर को आठ विकेट पर २६० तक पहुँचा दिया। भारत ने जिम्बाब्वे को इस मैच में ३१ रनों से हरा दिया था। विपरीत परिस्थितियों में मैच को जीतने के बाद मुझे विश्वास हो गया था कि अबकि अपनी टीम सेमी फाइनल में तो पहुँच ही जाएगी। और हुआ भी वही! अगले लीग मैच में आस्ट्रेलिया को हराकर भारत सेमी फाइनल में पहुँच चुका था।

अब तक मैं वापस पटना आ चुका था और सेमीफाइनल में जब भारत ने इंग्लैंड को हराया तब मैंने उसका सीधा प्रसारण बीबीसी वर्ल्ड से सुनने का पूर्ण आनंद प्राप्त किया था। फाइनल के दो दिन पहले से ही हमारे मोहल्ले के सारे बच्चे मैच के बारे में विस्तार से चर्चा करते रहते। दूरदर्शन ने फाइनल मैच के सीधे प्रसारण की व्यवस्था की थी। स्कूल की गर्मी की छुट्टियाँ शायद चल ही रहीं थी। हम दस बारह वच्चे पड़ोसी के घर में श्वेत श्याम टेलीविजन के सामने मैच शुरु होने के पंद्रह मिनट पहले ही जमीन पर चादर बिछाकर बैठ गए थे। पर जब भारत बिना पूरे साठ ओवर खेले ही १८३ रन बनाकर लौट आया, हम सारे बच्चों के चेहरों की उदासी देखने लायक थी। पहले तो प्रोग्राम रात भर पड़ोसी के घर
डेरा जमाए रखने का था। पर भारतीय बल्लेबाजों के इस निराशाजनक प्रदर्शन ने मुझे अपना विचार बदलने पर मज़बूर कर दिया। मन इतना दुखी था कि थोड़ा बहुत खा पी कर मैं जल्द ही सोने चल गया।

सुबह उठ के अखबार खोला तो जीत का समाचार देख के दंग रह गया। भागा भागा अपने टीवी वाले दोस्तों के घर गया कि भाई ये सब हुआ कैसे? बाद में कई बार उन यादगार लमहों की रेडियो कमेंट्री
सुनीं और वीडियो फुटेज भी देखा पर दिल में मलाल रह ही गया कि मैं उस रात क्यूँ सोया...


खेलों में कुछ खास ना कर पाने वाले देश के लिए वो जीत एक बहुत बड़ी जीत थी। उस जीत ने एकदिवसीय क्रिकेट में अच्छा करने के लिए आगे की भारतीय टीमों के लिए एक सपना जगाया। आज जब इस बात को पचीस साल बीतने वाले हैं , आइए उन लमहों को एक बार फिर से देखें यू ट्यूब के इस वीडियो के जरिए..




साथ ही उन खिलाड़ियों को मेरा कोटि कोटि सलाम जिन्होंने विश्व कप जीतकर एक मिसाल आगे की पीढ़ियों के लिए छोड़ दी..


क्रिकेट से जुड़ी मेरी कुछ अन्य पोस्ट :

बुधवार, सितंबर 26, 2007

टवेन्टी-टवेन्टी विश्व कप: हो गयी अनहोनी...जिताकर ले आया धोनी

१९८३ में वेस्टइंडीज के खिलाफ मात्र १८३ रन बनाने के बाद हम सब बच्चे अपने पड़ोसी के श्वेत श्याम टीवी को छोड़ निराश मन से शाम को अपने अपने घर लौट आए थे। साठ ओवरों में उस वक़्त की विश्व विजेता टीम वेस्टइंडीज ये रन संख्या नहीं पार कर पाएगी, ऐसा मैंने सपने में भी नहीं सोचा था और उस रात भरे मन से सो गए थे। पर अगली सुबह का अखबार कुछ और ही कहानी कह रहा था। उस मैच को लाइव ना देख पाने का दुख कई वर्षों तक सालता रहा ।

इसीलिए, २४ सालों बाद विश्व कप के किसी फाइनल को टीवी पर लाइव देखने का विशेष रोमांच तो था ही, पर साथ ही ये भी लग रहा था कि इस बार भाग्य भी हमारी टीम के साथ है। सच पूछें तो कल के फाइनल से कहीं ज्यादा आस्ट्रेलिया और पाकिस्तान के साथ इस प्रतियोगिता में पहले हुए मैच का मैंने जम के आनंद उठाया था।

कल तो शुरु से ही एक अज़ीब किस्म के तनाव ने मन में घर कर लिया था। खेल की ऊँच-नीच के साथ तनाव तो घटता बढ़ता गया पर भज्जी की गेदों पर मिसबा उल हक ने जिस तरह छक्के लगाए और हमारे भज्जी जिस तरह छक्के लगने के बाद भी यार्कर लेंथ की बॉल को फेंकने का असफल प्रयास करते रहे , ये तनाव अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया।

अंतिम ओवर के फेंके जाने के समय जब हम सब का गला सूख रहा था तो भला जोगिंदर शर्मा की क्या बिसात। भाई जी ने पहली बार में विकेट से एक हाथ के बजाए चार हाथ बाहर की गेंद डाली तो बस शुष्क मन से यही निकला
"सही जा रहे हो बेटा.."

कप्तान साहब अगली गेंद पर ना जाने क्या कह आए कि पहली बार तो जोगिन्दर मिस्बा को आफ स्टंप के बाहर छकाने में कामयाब हुए पर ओवर की दूसरी गेंद पर शर्मा जी ने एक ऐसा हाई फुलटॉस फेंका जिसे देखते ही कलेजा मुँह को आ गया। फिर भी हक के बल्ले से जब
शॉट निकला तो मुझे ऐसा लगा की ये तो लांग आफ पर ही आ रहा है। पर वो नामुराद, आखिरकार छक्का निकला।
अब चार गेंदों में छः रन....
अंत तो आ ही गया था. प्रश्न सिर्फ ये था कि वो कितनी जल्दी या कितनी देर से आता है।
मुझे यकीं हैं कि मेरी क्या, मेरे सारे देशवासियों के चेहरे के मनोभाव इन हालातों में ऍसे व्यक्ति के ही रहे होंगे जिसका सब कुछ लुट चुका हो।
तीसरी गेंद पर मिस्बा का बैक स्कूप मुझे तो सीमा के बाहर जाता दिखा क्यूँकि दो सेकेंड तक श्रीसंत कहीं भी फ्रेम
में नजर नहीं आ रहे थे। इधर श्रीसंत ने कैच लिया और उधर हमारे बेज़ार पड़े दिल में उमंगों की मुरझाई कोपलें एकदम से फूट पड़ीं।
वैसे ये पूरी दास्तां इस वीडियो में भी नज़र आएगी


ये असली मायने में टीम इंडिया की जीत थी। इस पूरी प्रतियोगिता में किसी ना किसी मैच मे खेलने वाले हर खिलाड़ी ने जीत में अपना योगदान दिया। ये जीत छोटे-छोटे शहरों से आने वाले खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा पुंज का काम करेगी इसमें कोई शक नहीं।
चाहे वो केरल जैसे क्रिकेट में कमजोर राज्य के श्रीसंत हों या हरियाणा के जोगिंदर शर्मा, राजनीति का गढ़ रही रायबरेली के रुद्र प्रताप सिंह हों या बड़ौदा के पठान बंधु.....इन खिलाड़ियों ने ये दिखा दिया है कि छोटे-छोटे शहरों में रहने वाले भी बड़े सपने देख सकते हैं ..उन्हें साकार कर सकते हैं। अब हमारे शहर राँची से ताल्लुक रखने वाले भारतीय टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धौनी (जो धोनी के नाम से ज्यादा मशहूर हैं) की ही बात करें।

धोनी खुद एक निम्न मध्यम वर्ग परिवार से आते हैं। वे हमारी घर के बगल की कॉलोनी श्यामली में रहते हैं। जब वे डी.ए.वी. श्यामली में थे तो पहले फुटबॉल के खेल में बतौर गोलकीपर हुआ करते थे। स्कूल के प्रशिक्षक ने उन्हें गोलकीपर से स्कूल की टीम का विकेट कीपर बना दिया। शीघ्र ही विकेटकीपर के साथ साथ लंबे छक्के मारने वाले खिलाड़ी के रूप में वो झारखंड में जानें जाने लगे। रणजी ट्राफी में एक दूसरे दर्जे की टीम बिहार का प्रतिनिधित्व करने के बावज़ूद उन्होंने देश के लिए खेलने की आशा नहीं छोड़ी। और मौका मिलते ही इतने कम समय में देखिए, वो खुद और पूरी टीम को किस मुकाम तक ले गए हैं।

राँची में तीन दिनों से लगातार बारिश हो रही है। पर जीत की खबर मिलते ही, बारिश में भी कल रात से धोनी के घर के बाहर भारी भीड़ जुटी हुई है। जश्न अभी तक थमा नहीं है...और इसकी पुनरावृति देश के हर कस्बे, हर ग्राम और शहर में हो रही होगी। अपने शहर के इस सुपूत के नेतृत्व में टीम के सारे खिलाड़ियों ने जिस एकजुटता के साथ संघर्ष करते हुए विजय प्राप्त की और देशवासियों को खुशियों के ये हसीन पल दिये वो पूरा देश हमेशा याद रखेगा।

पिछले कुछ महिने खेल के लिए अच्छे जा रहे हैं। पहले हॉकी का एशिया कप, फिर फुटबॉल का नेहरू कप और अब टवेन्टी-टवेन्टी विश्व कप की जीत 'चक दे इंडिया' का सही समां बाँधती नज़र आ रही है।

तो लगे रहो इंडिया तुमसे आगे भी ऐसी और कई उम्मीदें हैं......


(सभी चित्र साभार cricinfo.com)
 

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