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गुरुवार, दिसंबर 01, 2016

ऐ ज़िंदगी गले लगा ले : क्यूँ तकलीफ़ हुई थी गुलज़ार को ये गीत रचने में? Aye Zindagi Gale Laga Le...

पुरानी फिल्मों के गीतों को नए मर्तबान में लाकर फिर पेश करने का चलन बॉलीवुड में कोई नया नहीं है। मूल गीतों की गुणवत्ता से अगर इन नए गीतों की तुलना की जाए तो ये उनके सामने कहीं नहीं ठहरते। पर नए लिबासों में इन गीत ग़ज़लों के आने से एक फ़ायदा ये जरूर रहता है कि हर दौर के संगीतप्रेमी उन पुराने गीतों से फिर से रूबरू हो जाते हैं। अब कुछ साल पहले की तो बात है। मेहदी हसन साहब की ग़ज़ल गुलो में रंग भरे को हैदर में अरिजीत ने गाकर उसमें लोगों की दिलचस्पी जगा दी थी। 


फिलहाल तो "वज़ह तुम हो" की वज़ह से हमें किशोर दा का सदाबहार नग्मा पल पल दिल के पास तुम रहती हो बारहा सुनाई दे रहा है तो वहीं "डियर ज़िंदगी" हमें इलयराजा, गुलज़ार और सुरेश वाडकर के कालजयी गीत ऐ ज़िंदगी गले लगा ले......  की याद दिला रही है।

गुलज़ार और इलयराजा
क्या प्रील्यूड्स और इंटरल्यूड्स रचे थे इस गीत के इलयराजा ने। पश्चिमी वाद्य के साथ सितार का बेहतरीन मिश्रण किया था उन्होंने संगीत संयोजन में । सदमा तो 1983 में पर्दे पर आई थी पर इसके एक साल पहले निर्देशक बालू महेन्द्रू इसका तमिल रूप मूंदरम पिरई ला चुके थे। पर आश्चर्य की बात ये है कि तमिल वर्सन में इस धुन का आपको कोई गीत नहीं मिलेगा। 

ऍसा कहा जाता है कि मूल तमिल गीत Poongatru Puthidanadhu के लिए जब हिंदी अनुवाद की बात आई तो गुलज़ार को उसके मीटर पर गीत लिखने में मुश्किल हुई। फिर निर्णय लिया गया कि इसके लिए एक नई धुन बनेगी। इलयराजा की धुन कमाल की थी पर गुलज़ार को इसके लिए ख़ुद काफी पापड़ बेलने पड़े थे। ख़ुद उनके शब्दों में..
"बड़ी इन्ट्रिकेट थी इस गीत की स्कैनिंग। मूल तमिल गीत के मीटर को पकड़ना था। गाने के म्यूजिक में टिउऊँ सा आता था  ऐ ज़िंदगी गले लगा ले..टिउऊँ 😆😆 । उसके नोट्स कुछ वैसे थे। मुझे कुछ नहीं सूझा तो वहाँ पर मैंने लफ़्ज़ "है ना" डाल  दिया। अब मुझे लगा पता नहीं इलयराजा को वो पसंद आएगा या नहीं पर उन्होंने दो मिनटों में ऊपर का म्यूजिक बदल कर है ना को अपनी धुन के मुताबिक कर लिया।"

बड़ी संवेदनशील फिल्म थी सदमा और उसके गीत भी। मुझे लगता है कि आज इस गीत को एक क्लासिक का दर्जा मिला है तो वो इसके मुखड़े की वज़ह से। इंसानों से भरी इस दुनिया भी हमें कभी बेगानियत का अहसास दिला जाती है। बड़े अकेले अलग थलग पड़ जाते हैं हम और तब लगता है कि ये ज़िंदगी हमें थोड़ी पुचकार तो ले। कोई राह ही दिखा दे, किसी रिश्ते का किनारा दिला दे...

ऐ ज़िंदगी गले लगा ले
हमने भी तेरे हर इक ग़म को
गले से लगाया है......  है ना

हमने बहाने से, छुपके ज़माने से
पलकों के परदे में, घर भर लिया 
तेरा सहारा मिल गया है ज़िंदगी

छोटा सा साया था,  आँखों में आया था
हमने दो बूंदो से मन भर लिया 
हमको किनारा मिल गया है ज़िंदगी


तो आइए सुनें ये गीत सुरेश वाडकर की आवाज़ में. 



डियर ज़िंदगी में इस गीत के मुखड़े और पहले अंतरे का इस्तेमाल किया है अमित त्रिवेदी ने। पर अरिजीत की आवाज़ में ये गीत भला ही लगता है अगर आप इंटरल्यूड्स में ड्रम और स्ट्रिंग के शोर को नज़रअंदाज़ कर दें तो। वैसे इस गीत को अमित ने अलिया भट्ट से भी गवाया है। तो आपको मैं अरिजीत का वो वर्सन सुनवा रहा हूँ जिसमें इंटरल्यूड्स हटा दिए गए हैं। ये रूप शायद मेरी तरह आपको भी अच्छा लगे।

शनिवार, दिसंबर 19, 2009

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे : शहरयार की एक दिलकश ग़ज़ल सुरेश वाडकर के स्वर में

पिछले एक हफ्ते से ब्लॉगों की दुनिया से दूर रहा। सोचा था कि जाने के पहले सुरेश वाडकर की ये सर्वप्रिय ग़ज़ल सिड्यूल कर आपके सुपुर्द करूँगा पर उसके लिए भी वक़्त नहीं मिला। ख़ैर अब अपनी यात्रा से लौट आया हूँ तो ये ग़ज़ल आपके सामने हैं। इसे लिखा था शहरयार यानि कुँवर अखलाक़ मोहम्मद खान साहब ने।

यूँ तो शहरयार ने चंद फिल्मों के लिए ही अपनी ग़ज़लें लिखी हैं पर वे ग़ज़लें हिन्दी फिल्म संगीत के लिए मील का पत्थर साबित हुई हैं। अब चाहे आप उमराव जान की बात करें या गमन की। ये बात गौर करने की है कि इन दोनों फिल्मों के निर्देशक मुजफ़्फर अली थे। दरअसल शहरयार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जब उर्दू विभाग में पढ़ाते थे तब मुजफ्फर भी वहीं के छात्र थे और शहरयार साहब के काव्य संग्रह से वो इतने प्रभावित हुए कि उनकी दो ग़ज़लों को उन्होंने फिल्म गमन में ले लिया।

उनकी शायरी को विस्तार से पढ़ने का मौका तो अभी तक नहीं मिला पर उनकी जितनी भी ग़ज़लें सुनी हैं उनकी भावनाओं से खुद को जोड़ने में कभी दिक्कत महसूस नहीं की। लेखक मोहनलाल, भारतीय साहित्य की इनसाइक्लोपीडिया (Encyclopedia of Indian Literature, Volume 5) में शहरयार साहब की शायरी के बारे में लिखते हैं

शहरयार ने अपनी शायरी में कभी भी संदेश देने या निष्कर्ष निकालने की परवाह नहीं की। वो तो आज के आदमी के मन में चल रहे द्वन्दों और अध्यात्मिक उलझनों को शब्दों में व्यक्त करते रहे। उनकी शायरी एक ऍसे आम आदमी की शायरी है जो बीत रहे समय और आने वाली मृत्यु जैसी जीवन की कड़वी सच्चाइयों के बीच झूलते रहने के बावज़ूद अपनी अभी की जिंदगी को खुल कर जीना चाहता है। शहरयार ऍसे ही व्यक्ति के ग़मों और खुशियों को अपने अशआरों में समेटते चलते हैं।

मेरी सोच यह है कि साहित्य को अपने दौर से अपने समाज से जुड़ा होना चाहिए, मैं साहित्य को मात्र मन की मौज नहीं मानता, मैं समझता हूँ जब तक दूसरे आदमी का दुख दर्द शामिल न हो तो वह आदमी क्यों पढ़ेगा आपकी रचना को। जाहिर है दुख दर्द ऐसे हैं कि वो कॉमन होते हैं। जैसे बेईमानी है, झूठ है, नाइंसाफी है, ये सब चीजें ऐसी हैं कि इनसे हर आदमी प्रभावित होता है। कुछ लोग कहते हैं कि अदब से कुछ नहीं होता है। मैं कहता हूँ कि अदब से कुछ न कुछ होता है।

अब १९७९ में प्रदर्शित गमन फिल्म की इसी ग़ज़ल पर गौर करें मुझे नहीं लगता कि हममें से ऍसा कोई होगा जिसने इन सवालातों को जिंदगी के सफ़र में कभी ना कभी अपने दिल से ना पूछा हो। मुझे यूँ तो इस ग़ज़ल के सारे अशआर पसंद हैं पर दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे.. वाला शेर सुनते ही मन खुद बा खुद इस गीत को गुनगुनाते हुए इसमें डूब जाता है।

दरअसल एक शायर की सफलता इसी बात में है कि वो अपने ज़रिए कितने अनजाने दिलों की बातें कह जाते हैं।

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है?
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है?

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेज़ान सा क्यूँ है?

तन्हाई की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ों
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है?

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है?

ऊपर से जयदेव का कर्णप्रिय सुकून देने वाला संगीत जिसमें सितार , बाँसुरी और कई अन्य भारतीय वाद्य यंत्रों का प्रयोग मन को सोहता है। तो लीजिए सुनिए इस गीत को सुरेश वाडकर की आवाज़ में 


रविवार, जुलाई 05, 2009

सुरमयी शाम, साँस लेते साए और जागती परछाइयाँ : सुनिए हृदयनाथ मंगेशकर और गुलज़ार की इस अद्भुत जुगलबंदी को !


कभी कभी ब्लॉग पर जब हम पोस्ट डालते हैं तो बहुधा कई विचार जिन्हें हम पोस्ट करते करते रुक जाते हैं वो टिप्पणियों के माध्यम से फिर से उभर कर आ जाते हैं। माया मेमसाब के गीत मेरे सराहने जलाओ सपने के बारे में लिख रहा था तो साथ ही इस फिल्म में हृदयनाथ मंगेशकर की गाई एक बेहतरीन बंदिश भी सुनवाने की इच्छा थी और इसके सबसे लोकप्रिय गीत इक हसीं निगाह.. की भी बात करनी थी। पर लगा की भिन्न भिन्न मूडों के इन गीतों को एक पोस्ट में बाँधना सहज नहीं होगा तो उनसे जुड़ा अनुच्छेद हटा दिया और देखिए नीरज जी, यूनुस और अनुराग ने अपनी टिप्पणियों में उन्हीं गीतों की चर्चा भी की।

तो आइए आज बात करते हैं हृदयनाथ मंगेशकर के संगीतबद्ध दो गीतों की, जिनमें से एक को उन्होंने अपनी आवाज़ भी दी है। यूँ तो हृदयनाथ मंगेशकर गैर फिल्मी एलबमों (मीरा बाई के भजन और ग़ालिब की ग़जलों पर) के आलावा कई हिंदी फिल्मों हरिश्चंद्र तारामती, चक्र धनवान, सुबह, मशाल, लाल सलाम जैसी फिल्मों का संगीत दे चुके हैं पर मुझे नब्बे के दशक में आई फिल्म लेकिन और माया मेमसॉब में उनके द्वारा दिया गया संगीत सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।

माया मेमसॉब का कैसेट 1993 में स्ट्रलिंग कंपनी (Sterling) ने ज़ारी किया था। इस फिल्म का सबसे प्रचलित गीत था इक हसीन निगाह का दिल पे साया है, जादू है जुनून है कैसी माया है ये माया है...जिसे कुमार शानू और लता जी ने अलग अलग गाया था। कुमार शानू की आवाज़ में इस गीत की कुछ पंक्तियाँ सुन कर ही इस कैसेट को खरीद लिया गया था। पर बाद में जब गीत सुन लिए गए तो ये चर्चा भी खूब चली थी कि देखिए कुमार शानू इक हसीं निगाह को कुछ इक हसिन निगाह जैसा उच्चारित करते हैं। पर इस बात को नज़रअंदाज कर दें तो ये गीत उनकी आवाज़ पर फबा भी खूब था और शायद यही वज़ह थी कि एक अलग हटके बनी इस फिल्म का गीत होते हुए भी सिबाका गीत माला की भिन्न पॉयदानों पर कई हफ्तों तक ये गीत अपनी शोभा बढ़ाता रहा था। ये भी सही है कि गुलज़ार की चिरपरिचित छाप से परिपूर्ण इस कैसेट के बाकी गीत उतने नहीं बजे..

कुछ वैसा ही हाल १९९१ में प्रदर्शित फिल्म लेकिन का रहा जहाँ एक बार फिर गुलज़ार और हृदयनाथ मंगेशकर की जोड़ी थी। यारा सिली सिली और कुछ हद तक केसरिया बालमा तो लोकप्रिय हुए पर बाकी गीत पर लोगों की निगाह कम ही गई। मेरी आज की प्रविष्टि आपको इन फिल्मों के ऍसे ही एक-एक गीत की याद दिलाने की एक कोशिश है।

इन दोनों गीतों की विषयवस्तु में एक साम्यता है ये दोनों परछाइयों की बातें करते हैं। वैसे सायों की दुनिया से गुलज़ार का रिश्ता पुराना है। याद है ना आपको सितारा फिल्म में आशा जी का गाया वो नग्मा

ये साए हैं..
ये दुनिया है , परछाइयों की

भरी भीड़ में खाली तनहाइयों की

ये साए हैं..

जब इंसान अपना अक़्स ही खो दे तो उसमें और उसकी परछाईं में ज्यादा फर्क नहीं रह जाता। पर यहाँ तो कल्पना ही दूसरी है। छाया में उमंग है, उल्लास है, चाहत है एक नई प्यारी सी काया को पाने की, सजने सँवरने की, मायावी दुनिया में कदम रखने की...।

हृदयनाथ जी ने अपनी सधी गायिकी से इस छोटी सी बंदिश में जो जादू उत्पन्न किया है, उसका अनुभव इसे सुनकर ही किया जा सकता है। अपनी स्वरलहरियों के उतार चढ़ाव से मात्र कुछ शब्दों से कितना जबरदस्त प्रभाव पैदा किया जा सकता है ये गीत इस की जीती जागती मिसाल है। वैसे इस गीत में हृदयनाथ मंगेशकर के साथ पार्श्व में जो आवाज़ उभरती है वो लता की नहीं है जैसा कई जगहों पर उल्लेख है, बल्कि आशा जी की है। रोचक तथ्य ये है कि इस गीत को एकल गीत के रूप में ही रचा गया था। हुआ ये कि रिकार्डिंग के समय अपने भाई के साथ आशा जी भी चली आईं और फिर लगा कि अगर पार्श्व से नारी स्वर रहे तो गीत और प्रभावी बन सकता है और इस तरह आशा जी भी अपनी हमिंग के साथ गीत का हिस्सा बन गई़।


तो सुनिए हृदयनाथ मंगेशकर का दिव्य स्वर इस गीत में

छाया जागी...
छाया जागी...
छाया जागी जागी
छाया जागी जागी
छाया जागी जागी
छाया जागी...........छाया जागी
चंचल चंचल कोमल चंचल चंचल
चंचल कोमल कोमल चंचल चंचल
काया माँगी.........काया माँगी
काया माँ...........गी काया माँगी काया माँगी
सज के सोलह सिंगार
चली सपनों के सपनों के पार
सज के सोलह सिंगार
चली सपनों के सपनों के पार
माया लागी ....
माया लागी माया लागी माया लागी माया लागी
माया लागी लागी
माया लागी लागी


सायों से जुड़े दूसरे गीत को गाया है सुरेश वाडकर जी ने। सुरेश वाडकर इस गीत को याद करते हुए कहते हैं
ये गीत पहले मराठी में रिकार्ड हुआ था । बाद में जब हिंदी में इसे इस फिल्म के लिए रिकार्ड किया जाना था तो रिकार्डिंग वाले दिन लता दी भी स्टूडिओ में मौजूद थीं। उन्हें अपने सामने देखकर मुझे ऐसा लग रहा था कि इनके सामने मेरी आवाज़ क्या निकलेगी। फिर भी मेंने वो गीत गाया। गाने के बाद लता जी आयीं और कहा सुरेश बहुत अच्छा गया बस "साँस लेते हैं जिस तरह साए में..." साँस को एक अलग लहज़े में गाओ और फिर उन्होंने वो कर के भी दिखाया।
ये गीत उन गीतों में से है जिसकी गायिकी और संगीत ने मुझमें ऍसी कैफ़ियत भर दी कि इसके शब्दों की गहराइयों में पहुँचने के पहले ही ये मेरे मन में रच बस गया था। और जब इस गीत के लिए लिखे गुलज़ार के खूबसूरत लफ़्जों को जिंदगी की कई शामों में करीब से गुजरने का मौका मिला तो ये गीत दिल के और करीब होता चला गया। दरअसल ये गीत उन गीतों में हैं जहाँ शब्द, संगीत और गायिकी तीनों मिलकर ऍसा पुरज़ोर असर पैदा करते हैं कि आप इस गीत में डूबते चले जाते हैं।

वैसे क्या आपको नहीं लगता कि इन सायों की दुनिया भी कुछ अजीब सी है। ऍसे तो साये हमारे साथ हमेशा रहते हैं पर दिवस के अवसान के साथ इनका विस्तार बढ़ता चला जाता है। फिर क्यूँ ना अपनी असली रंगत तक पहुँचने के लिए ये शाम का इंतज़ार करें।

सुरमई शाम इस तरह आए
साँस लेते हैं जिस तरह साए




पर नायक को तो इस शाम का इंतज़ार किसी दूसरी वज़ह से है। शायद ये शाम भी वही मंज़र दुहरा दे.. जिसमें वो तो नहीं दिखी थी पर उसके साये की खुशबू ज़ेहन में उतर सी गई थी।

कोई आहट नहीं बदन की कोई
फिर भी लगता है तू यहीं हैं कहीं
वक़्त जाता सुनाई देता है
तेरा साया दिखाई देता है
जैसे खुशबू नज़र से छू जाए
साँस लेते हैं जिस तरह साए



आज वो आस पास नहीं पर दिन के घंटे ज्यों ज्यों गुजरते हैं दिल पर के ऊपर का बोझ हल्का होता जाता है। वो शाम और तेरा वो साया खयालों के ज़रिए दिल के पास जो आ जाता है

दिन का जो भी पहर गुजरता है
इक अहसान सा उतरता है
वक़्त के पाँव देखता हूँ मैं
रोज़ ये छाँव देखता हूँ मैं
आए जैसे कोई खयाल आए
साँस लेते हैं जिस तरह साए
सुरमयी शाम इस तरह आए..

तो आइए महसूस करें गुलज़ार के शब्दों को इस गीत के ज़रिए


अगर आपने इस गीत को ध्यान से सुना हो तो इस बात पर गौर किया होगा कि इस गीत के आंरंभ और इंटरल्यूड में पाश्चात्य वाद्य यंत्रों का प्रयोग है और अंतरे में मुख्यतः तबला सुनाई देता है। है ना सुंदर मिश्रण !इस गीत को विनोद खन्ना और डिंपल पर फिल्माया गया है।

सोमवार, अगस्त 25, 2008

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है .सुनिए सुरेश वाडकर की आवाज़ में

बात १९८९ सितंबर की है। BIT MESRA में इंजीनियरिंग का वो प्रथम वर्ष था। स्पोर्ट्स और NSS लेने वालों को सप्ताह में दो दिन, काँलेज के स्पोर्ट्स ग्राउंड में भरी दोपहरी में कॉलेज के दो चक्कर लगाने होते थे। मैदान की स्थिति कुछ ऍसी थी कि ठीक उसके एक सिरे से कुछ दूरी पर कॉलेज का हॉस्टल नंबर सात के सामने का हिस्सा पड़ता था जहाँ हमारे इमीडियट सीनियर रहा करते थे।

ये वही साल था जब यश चोपड़ा निर्देशित फिल्म चाँदनी रिलीज हुई थी और उसके सारे गीत खासकर उसका टाइटल ट्रेक बेहद मशहूर हुआ था। तो जैसे ही हमारे बैच के स्पोर्ट्स और NSS लेने वाले लड़के लड़कियों की दौड़ शुरु होती एक अलग तरह का ड्रामा शुरु हो जाता। जब कन्याओं का दस्ता हॉस्टल नंबर सात वाले सिरे के पास पहुँचता, वहाँ के लड़के अपनी खिड़कियों की पैरापेट पर चढ़ कर समवेत स्वर में अपना गायन शुरु कर देते...चाँदनी ओ मेरी चाँदनी..... । लड़कियाँ झेंपती, मुस्कुरातीं और आगे बढ जातीं।वहीं हमारे बैच के लड़के अंदर ही अंदर कुपित होते..सोचते कि इन्हें देख कर हमें इस गीत को गाने की इच्छा होती है पर मुए ये गा रहे हैं। पर मेरी आज की ये पोस्ट इसी फिल्म के दूसरे गीत से जुड़ी हुई है..

जैसा कि आप को पता ही होगा कि चाँदनी का संगीत दिया था शिव- हरि ने यानि महान संगीतज्ञ संतूर वादक शिव कुमार शर्मा और बाँसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया की जोड़ी ने। शिव-हरि की ये जोड़ी एक ज़माने में यश चोपड़ा की हर फिल्म में नज़र आती थी। चाँदनी के आलावा सिलसिला, लमहे ओर डर में उनके दिए संगीत को आज भी लोग उतने ही चाव से सुनते हैं। इस फिल्म का एक गीत था जिसे सुरेश वाडकर ने गाया था लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है... जो मुझे अस्सी के बाद के सावन के गीतों में सबसे दिल के करीब लगता है।

गीत की शुरुआत, संतूर की मधुर धुन से होती है और फिर मुखड़े और पहले अंतरे के बीच के इंटरल्यूड में अन्य वाद्य यंत्रों के साथ जिस खूबसूरती से इसका प्रयोग हुआ उसमें शिव कुमार शर्मा की छाप स्पष्ट दिखती है। वहीं अंतरे के बीच में अनुपमा देशपांडे के आलाप का भी बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। सुरेश वाडकर के सनी, लेकिन, सदमा में गाए गीतों की श्रेणी में मुझे ये गीत भी लगता है।

लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है
वही आग सीने में फिर जल पड़ी है
लगी आज सावन की ...

कुछ ऐसे ही दिन थे वो जब हम मिले थे
चमन में नहीं फूल दिल में खिले थे
वही तो है मौसम मगर रुत नहीं वो
मेरे साथ बरसात भी रो पड़ी है
लगी आज सावन की ...

कोई काश दिल पे ज़रा हाथ रख दे
मेरे दिल के टुकड़ों को एक साथ रख दे
मगर यह है ख्वाबों ख्यालों की बातें
कभी टूट कर चीज़ कोई जुड़ी है
लगी आज सावन की....

आनंद बख्शी का लिखे इस गीत के शब्द कुछ ऍसे हैं कि इसे सुनते ही दिल में मायूसी के बादल घुमड़ने लगते हैं और आखें खुद-ब-खुद नम हो जाती हैं। तो आइए सुनें हृदय को छूते इस गीत को


'एक शाम मेरे नाम' पर संगीत के सावनी रंगों में रंगिए इन प्रविष्टियों के साथ
 

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