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शुक्रवार, जनवरी 25, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 5 : मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा.... Manwaa

साल के पच्चीस शानदार गीतों के सफ़र का अंतिम पड़ाव अब नजदीक आ रहा है। बचे पाँच गीतों में तीन तो आपने अवश्य सुने होंगे पर जो दो नहीं सुने उनमें से एक से आपको आज मिलवाने का इरादा है। ये गीत है फिल्म अक्टूबर का  और इसे बनाने वाली जो गीतकार संगीतकार की जोड़ी है वो मुझे बेहद प्रिय रही है। आप समझ ही गए होंगे कि मैं स्वानंद किरकिरे और शांतनु मोइत्रा की बात कर रहा हूँ। संगीतमाला के पन्द्रह वर्षों के  सफ़र में इस जोड़ी ने कमाल के गीत दिए हैं। इनके द्वारा सृजित बावरा मन, चंदा रे, रात हमारी तो, बहती हवा सा था वो, क्यूँ नए नए से दर्द.., अर्जियाँ दे रहा है दिल आओ जैसे तमाम गीत हैं जो मेरी संगीतमालाओं में अलग अलग सालों में बज चुके हैं। विगत कुछ सालों से इन मित्रों ने दूसरे संगीतकारों और गीतकारों के साथ काम किया है। शांतनु अंतिम बार दो साल पहले पिंक के अपने गीत के साथ संगीतमाला में दाखिल हुए थे। 



शांतनु तो कहते हैं कि उनके लिए फिल्मों में संगीत देना एक शौकिया काम है। असली मजा तो उन्हें घूमने फिरने में आता है। घूमने फिरने के बीच वक़्त मिलता है तो वो संगीत भी दे देते हैं। एक समय किसी एक फिल्म पर काम करने वाले शांतनु फिल्म संगीत में कैसे दाखिल हुए इसकी कहानी भी बड़ी रोचक है।  नब्बे के दशक में वे एक विज्ञापन कंपनी के ग्राहक सेवा विभाग में काम कर रहे थे जब अचानक कंपनी के एक निर्देशक प्रदीप सरकार को एक जिंगल संगीतबद्ध करने की जरूरत पड़ी। जब वक़्त पर कोई नहीं मिला तो शांतनु ने जिम्मेदारी ली। जानते हैं क्या था वो जिंगल बोले मेरे लिप्स आइ लव अंकल चिप्स। उन्हीं प्रदीप सरकार ने बाद में उन्हें परिणिता का संगीत देने का मौका दिया।  
स्वानंद  किरकिरे व शांतनु मोइत्रा 

स्वानंद की थियेटर से जुड़ी पृष्ठभूमि उनसे गीत भी लिखवाती है और साथ साथ अभिनय भी करवाती है। हाल ही अपनी मराठी फिल्म में अभिनय के लिए उन्हें पुरस्कार मिला है और पिछले साल उनकी कविताओं की किताब आपकमाई भी बाजार में आ चुकी है।

अक्टूबर तो एक गंभीर विषय पर बनाई गयी फिल्म है जहाँ नायिका एक हादसे के बाद कोमा में है। नायक उसका सहकर्मी है पर उसकी देख रेख करते हुए वो उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है। शायद उसके मन में एक आशा है कि नायिका के मन में भी शायद ऐसा कोई भाव उसके प्रति रहा हो। ये आशा भी इसलिए है  कि हादसे के ठीक पहले उसने नायक के बारे में पूछा था। बता सकने की हालत में तो ख़ैर नायिका है नहीं पर इस नायक के मन का क्या किया जाए? वो तो उदासी की चादर लपेटे रुआँसा इस इंतजार में है कि कभी तो प्रिय जगेगी अपनी नींद से। स्वानंद मन के इस विकल अंतर्नाद को बेकल हवा, जलता जियरा और चुभती बिरहा जैसे बिंबों का रूप देते हैं। 

कहना ना होगा कि ये नग्मा साल के कुछ चुनिंदा बेहतर लिखे गए गीतों में अपना स्थान रखता है। मुझे उनकी सबसे बेहतरीन पंक्ति वो लगती है जब वो कहते हैं सोयी सोयी एक कहानी..रूठी ख्वाब से, जागी जागी आस सयानी..लड़ी साँस से। फिल्म की पूरी कथा बस इस एक पंक्ति में सिमट के रह जाती है।
सुनिधि चौहान 

इस गीत के संगीत में गिटार एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। प्रील्यूड की मधुर धुन का तो कहना ही क्या। गिटार के पीछे हैं एक बार फिर अंकुर मुखर्जी जिनकी बजाई मधुर धुन अपने चाव लगा में सुनी थी। मुखड़े के बाद गिटार और ताल वाद्य की मिश्रित रिदम गीत के अंत तक साथ चलती है। मेरा मानना है कि 2018 में सुनिधि चौहान  के गाए बेहतरीन गीतों में मनवा सबसे ऊँचा स्थान रखता है। गीत का दर्द  उनकी आवाज़ से रिसता सा महसूस होता है। गीत में पार्श्व से उभरता आलाप प्रणव विश्वास का है।

मनवा एक ऐसा गीत है जिसे आप फिल्म के इतर भी सुनें तो उसके प्रभाव से आप घंटों मुक्त नहीं होंगे। रिमिक्स और रैप के शोर में ऐसी धुनें आजकल कम ही सुनाई देती हैं। शांतनु चूँकि मेरी पीढ़ी के हैं इसलिए उनकी बात समझ आती है जब वो कहते हैं..
"मैं जब बड़ा हो रहा था तो आल इंडिया रेडियो पर लता मंगेशकर, पंडित रविशंकर के साथ पश्चिमी शास्त्रीय संगीत सुना करता था। एक रेडियो स्टेशन पर तब हर तरह का संगीत बजा करता था। उस वक़्त हमारे पास चैनल बदलने का विकल्प नहीं था। मुझे हमेशा लगा है कि संगीत में ऍसी ही विभिन्नता होनी चाहिए और ये श्रोता को निर्णय लेना है कि उसे क्या सुनना है, क्या नहीं सुनना है? जो संगीत की विविधता इस देश में है वो अगर आप बच्चों और युवाओं को परोसेंगे नहीं तो वो उन अलग अलग शैलियों में रुचि लेना कैसे शुरु करेंगे?"
युवा निर्माता निर्देशक व संगीतकार शांतनु के उठाए इस प्रश्न की गंभीरता समझेंगे ऐसे मुझे विश्वास है।
तो चलिए अब सुनते हैं सुनिधि का गाया ये नग्मा 

मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा
मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा
जलता जियरा, चुभती बिरहा
जलता जियरा, चुभती बिरहा
सजनवा आजा, नैना रो रो थके
सजनवा आजा, नैना रो रो थके
मनवा रुआंसा...

धीमे धीमे चले, कहो ना 
कोई रात से
हौले हौले ढले, कहो ना 
मेरे चाँद से
सोयी सोयी एक कहानी 
रूठी ख्वाब से
जागी जागी आस सयानी
लड़ी साँस से
साँवरे साँवरे, याद में बावरे
नैना. नैना रो रो थके
मनवा रुआँसा...नैना रो रो थके


 

वार्षिक संगीतमाला 2018  
1. मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
2जब तक जहां में सुबह शाम है तब तक मेरे नाम तू
3.  ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
4.  आज से तेरी, सारी गलियाँ मेरी हो गयी
5.  मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा 
6.  तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा
7.  नीलाद्रि कुमार की अद्भुत संगीत रचना हाफिज़ हाफिज़ 
8.  एक दिल है, एक जान है 
9 . मुड़ के ना देखो दिलबरो
10. पानियों सा... जब कुमार ने रचा हिंदी का नया व्याकरण !
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 
24. वो हवा हो गए देखते देखते
25.  इतनी सुहानी बना हो ना पुरानी तेरी दास्तां

रविवार, फ़रवरी 05, 2017

वार्षिक संगीतमाला 2016 पायदान # 13 : कारी कारी रैना सारी सौ अँधेरे क्यूँ लाई, क्यूँ लाई Kaari Kaari

फिल्में जब हमारी रोजमर्रा की समस्याओं को हूबहू पर्दे पर उतारती हैं तो आप कई दिनों तक उस विषय से जुड़ी सामाजिक विकृतियों को और गहराई से महसूस करते हैं। पिंक एक ऐसी ही फिल्म थी। लड़कियों के प्रति लड़कों की सोच को ये समाज किस तरह परिभाषित करने में मदद करता है या यूँ कहें कि भ्रमित करता है, उससे आप सब वाकिफ़ ही होंगे। पिंक में इसी सोच की बखिया उधेड़ने का काम किया गया था। इस संवेदनशील विषय से जुड़ा इसका मुख्य गीत ऍसा होना था जो फिल्म की थीम को कुछ अंतरों में समा ले और श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दे कि अगर ऐसा है तो आख़िर ऐसा क्यूँ है? तनवीर गाज़ी की सशक्त लेखनी, शान्तनु मोईत्रा की गंभीर धुन और नवोदित पाकिस्तानी गायिका की ज़ोरदार आवाज़ ने सम्मिलित रूप से ऐसा मुमकिन कर दिखाया। 


तो इससे पहले इस गीत की खूबियों की चर्चा करें कुछ बातें गायिका क़ुरातुलेन बलोच के बारे में। 29 वर्षीय क़ुरातुलेन बलोच का आरंभिक जीवन मुल्तान पाकिस्तान में गुजरा। माता पिता के अलगाव के बाद वो अमेरिका के वर्जीनिया में चली गयीं। उन्होंने कभी संगीत की कोई पारंपरिक शिक्षा नहीं ली।  2010 में दोस्तों के कहने पर पहली बार उन्होंने अपनी प्रिय गायिका रेशमा का गाया गीत अखियों नूँ रैण दे यू ट्यूब पर लगाया जो इंटरनेट पर काफी सराहा गया। संगीत में उनके कैरियर में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब 2011 में एक धारावाहिक हमसफ़र के शीर्षक गीत वो हमसफ़र था , मगर उससे हमनवाई ना थी, कि धूप छाँव का आलम रहा जुदाई ना थी को गाकर उन्होंने रातों रात पूरे पाकिस्तान में जबरदस्त लोकप्रियता हासिल कर ली। हालांकि चार साल पहले हुई एक सड़क  दुर्घटना में गले पर चोट की वज़ह से उनकी आवाज़ जाते जाते बची।

क़ुरातुलेन बलोच
नुसरत फतेह अली खाँ, रेशमा, आबिदा परवीन, पठाने खाँ को बचपन से सुनते हुए क़ुरातुलेन सूफ़ी और लोक संगीत की ओर उन्मुख हो गयीं। आज उनकी गायिकी में लोग जब रेशमा का अक़्स देखते हैं तो वो बेहद गर्वान्वित महसूस करती हैं। क़ुरातुलेन को कारी कारी गाने का प्रस्ताव फिल्म के एक निर्माता रॉनी लाहिड़ी ने रखा।  जब क़ुरातुलेन ने फिल्म का विषय सुना तो उन्हें इस गीत के लिए हामी भरते जरा भी देर नहीं लगी। उनका कहना था कि वो  ख़ुद पाकिस्तान के सामंती समाज से लड़कर गायिकी के क्षेत्र में उतरी हैं इसलिए ऐसी कोई फिल्म जो महिलाओं के प्रतिरोध को दर्शाती है का हिस्सा बनना उनके लिए स्वाभाविक व जरूरी था।

पर कुरातुलेन की आवाज़ का असर तब तक मारक नहीं होता जब शायर तनवीर गाज़ी ने वैसे बोल नहीं रचे होते। अमरावती से ताल्लुक रखने वाले तनवीर को फिल्म जगत से जुड़े डेढ दशक बीत गया। पन्द्रह वर्ष पहले उन्होंने फिल्म मंथन में सुनिधि चौहान द्वारा गाए एक आइटम नंबर को अपने बोल दिए थे पर पहली बार उनकी प्रतिभा का सही उपयोग पिंक में जाकर हुआ। 

तनवीर ग़ाज़ी 
तनवीर ने इस गीत के आलावा फिल्म के लिए एक कविता तू ख़ुद की खोज़ में निकल तू किस लिए हताश है लिखी जिसे अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज़ दी। तनवीर गीतकार के आलावा एक लोकप्रिय शायर भी हैं और देश के विभिन्न हिस्सों में होने वाले मुशायरों में एक जाना पहचाना नाम रहे हैं। अपना परिचय वो अपने एक शेर में वो कुछ यूँ देते हैं

मैं बिन पंखों का जुगनू था जहाज़ी कर दिया मुझको
ग़ज़ल ने छू लिया तनवीर गाज़ी कर दिया मुझको

लड़कियों के साथ आए दिन होने वाली अपराधिक घटनाओं से आहत तनवीर की लेखनी गीत के मुखड़े में पूछ बैठती है उजियारे कैसे, अंगारे जैसे..छाँव छैली, धूप मैली क्यूँ हैं री? दूसरे अंतरे में तो उनके शब्द दिल के आर पार हो जाते हैं जब वो कहते हैं कि पंखुड़ी की बेटी है, कंकड़ों पे लेटी है..बारिशें हैं तेज़ाब की..ना ये उठ के चलती हैं, ना चिता में जलती है..लाश है ये किस ख़्वाब की। शांतनु मोइत्रा ने गीत की इन दमदार पंक्तियों को गिटार आधारित धुन के साथ बड़ी संजीदगी से पिरोया है। तो आइए एक बार फिर सुनते हैं ये गीत..


कारी कारी रैना सारी सौ अँधेरे क्यूँ लाई, क्यूँ लाई
रौशनी के पाँवों में ये बेड़ियाँ सी क्यूँ आईं, क्यूँ आईं
उजियारे कैसे, अंगारे जैसे
छाँव छैली, धूप मैली क्यूँ हैं री


तितलियों के पंखों पर रख दिए गए पत्थर
ए ख़ुदा तू गुम हैं कहाँ
रेशमी लिबासों को चीरते हैं कुछ खंजर
ए ख़ुदा तू गुम हैं कहाँ
क्या रीत चल पड़ी हैं, क्या आग जल पड़ी हैं
क्यूँ चीखता हैं सुरमई धुआँ
क्या रीत चल पड़ी हैं, क्या आग जल पड़ी हैं
क्यूँ चीखता हैं सुरमई धुआँ

कारी कारी रैना ....क्यूँ हैं री

पंखुड़ी की बेटी है, कंकड़ों पे लेटी है
बारिशें हैं तेज़ाब की
ना ये उठ के चलती हैं, ना चिता में जलती है
लाश है ये किस ख़्वाब की

रातो में पल रही हैं, सडको पे चल रही हैं
क्यूँ बाल खोले दहशते यहाँ
रातो में पल रही हैं, सडको पे चल रही हैं
क्यूँ बाल खोले दहशते यहाँ

कारी कारी रैना ....क्यूँ हैं री


फिल्म में ये गीत टुकड़ों में प्रयुक्त होता है इसलिए एक बार सुनने में अंतरों के बीच का समय कुछ ज्यादा लगता है।


वार्षिक संगीतमाला  2016 में अब तक 

मंगलवार, जनवरी 20, 2015

वार्षिक संगीतमाला 2014 पायदान # 16 : अर्जियाँ दे रहा है दिल आओ.. Tu Mera Afsana.

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर है मेरे चहेते गायकों की युगल जोड़ी यानि पापोन और श्रेया घोषाल ! पापोन पिछली बार वार्षिक संगीतमाला में अवतरित हुए थे 2012 मैं और वो भी सरताजी बिगुल के साथ यानी चोटी की पॉयदान पर बर्फी के यादगार गीत क्यूँ ना हम तुम के साथ। पिछले साल पापोन ने फिल्म लक्ष्मी और Happy Ending के लिए दो प्यारे से गाने गाए थे ..सुन री बावली तू अपने लिए ख़ुद ही माँग ले दुआ  (लक्ष्मी) और  तेरी याद में हुआ मैं सजायाफ़्ता  (Happy Ending)। पर वार्षिक संगीतमाला में उनके जिस गीत ने अपनी जगह बनाई है वो है विद्या बालन की फिल्म बॉबी जासूस से। पापोन को ये गीत फिल्म की सह निर्माता और अभिनेत्री दीया मिर्जा की वज़ह से मिला जो मेरी तरह ही उनकी मखमली आवाज़ की शैदाई हैं। इस गीत में पापोन का साथ दिया नए ज़माने की स्वर कोकिला श्रेया घोषाल ने।


बॉबी जासूस के इस गीत के साथ संगीतमाला में दूसरी बार प्रवेश कर रही है शान्तनु मोइत्रा और स्वानंद किरकिरे की जोड़ी।  गीत के बनने की कहानी भी काफी दिलचस्प है। फिल्म के निर्माता और निर्देशक के साथ म्यूजिक सिटिंग चल रही थी। शान्तनु ने अपनी एक धुन सुनाई। किसी ने कोई प्रश्न नहीं किया ना ही कुछ आलोचना की। शान्तनु को समझ आ गया कि मामला कुछ जमा नहीं। उन्होंने थोड़ा जोख़िम लेते हुए अपनी एक दूसरी धुन निकाली जो शास्त्रीयता का पुट लिए हुई थी। जब उन्होंने उठ कर गाना शुरु किया तो सब उन्हें मंत्रमुग्ध से बैठे बैठे एकटक देखते रहे और दीया तो इतनी भावुक हो उठीं कि उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

गीत तो स्वीकृत हो गया पर उसे शब्दों का ज़ामा पहनाने की जवाबदेही स्वानंद को सौंपी गई और उन्होंने अपने हुनर से उसमें चार चाँद लगा दिए। ज़रा गौर फरमाइए इन काव्यात्मक बोलों पर आहटें कुछ नई सी जागी हैं..मौसीक़ी एक नई सी सुन जाओ या फिर जागी सी आँखों को, दे दो ना पलकों की चादर ज़रा..रूखे से होठों को, दे दो ना साँसों की राहत ज़रा। इतने प्यारे बोलों को सुनकर किसका मूड रूमानी ना हो जाए। वैसे क्या आपको पता है कि बहुगुण सम्पन्न स्वानंद एक गीतकार के रूप में अपने आप को स्थापित करने के बाद आजकल  क्रेजी कक्कड़ फैमिली में निभाए अपने किरदार की वज़ह से भी ढेरों वाहवाही लूट रहे हैं।

शान्तनु का गीत एक द्रुत लय से शुरु होता है पर असली आनंद तब आता है जब शास्त्रीयता का रंग लिए अर्जियाँ दे रहा है दिल आओ वाला हिस्सा कानों में पड़ता है। गीत में सितार और तबले का व्यापक इस्तेमाल हुआ है। अंतरों के बीच सितार से जुड़े कुछ टुकड़े ध्यान खींचते हैं। इस गीत के दो वर्सन है। इन दो रुपों में फर्क बस इतना है कि पहले में जो हिस्सा पापोन गाते हैं उसे दूसरे में श्रेया निभाती हैं। मुझे तो दोनों ही रूप पसंद हैं..देखें आपको कौन सा अच्छा लगता है।

 

तू मेरा अफ़साना, तू मेरा पैमाना, तू मेरी आदत इबादत है तू
तू मेरा मुस्काना, तू मेरा घबड़ाना, तु मेरी गुस्ताखी माफ़ी है तू
तू मेरी रग रग में, तू मेरी नस नस में
तू मेरी जाँ है और तू मेरी रुह
तू ही जुनूँ भी है तू ही नशा भी है
तू ही दुआ मेरी, सज़दा भी तू


अर्जियाँ दे रहा है दिल आओ
सुन लो कुछ कह रहा है दिल आओ
आहटें कुछ नई सी जागी हैं
मौसीक़ी इक नई है सुन जाओ

अर्जियाँ दे....तू

जागी सी आँखों को, दे दो ना पलकों की चादर ज़रा
रूखे से होठों को, दे दो ना साँसों की राहत ज़रा
तनहा सी  रातों को दे दो ना ख़्वाबों की सोहबत ज़रा
ख़्वाहिशे ये कहें, दे दो ना अपनी सी
उल्फ़त ज़रा

रंजिशें भूल कर चले आओ
अर्जियाँ दे रहा है दिल आओ...

बिन तेरे ज़िंदगी यूँ ही बेवज़ह बेमानी लगे
बिन तेरे ज़िंदगी, जैसे अधूरी कहानी लगे
बिन तेरे बस्तियाँ क्यूँ दिल की सूनी वीरानी लगे
बिन तेरे ज़िंदगी, क्यूँ ख़ुद ही ख़ुद से बेगानी लगे

मर्जियाँ मोड़ कर चले आआो
अर्जियाँ दे रहा है दिल आओ...




वैसे ये गीत मैं जितनी बार सुन रहा हूँ ये उतना ही बेहतर लग रहा है और शायद संगीतमाला के अंत तक ये कुछ छलांगे मारता और ऊपर पहुँच जाए तो आश्चर्य नहीं.. :)


वार्षिक संगीतमाला 2014

मंगलवार, जनवरी 13, 2015

वार्षिक संगीतमाला 2014 पायदान # 19 : चार कदम बस चार कदम, चल दो ना साथ मेरे Char Kadam ..

वार्षिक संगीतमाला की अगली सीढ़ी पर है स्वानंद, शान्तनु और शान की तिकड़ी। मुझे याद है कि इससे पहले इस तिकड़ी की भागीदारी से एक और गाना एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला की शोभा बढ़ा चुका है। वो गीत था फिल्म Three Idiots का और गाने के बोल थे बहती हवा सा था वो। 


पाँच साल बाद इस तिकड़ी ने फिल्म पीके में एक और मधुर गीत की रचना की है। मुझे ऐसा लगता रहा है कि शान जिस आवाज़ के मालिक हैं उसका सदुपयोग कुछ ही संगीतकार कर पा रहे हैं। अपनी जानदार और ताज़ी आवाज़ से शान गीत के स्तर को और उठाने में कामयाब रहे हैं। वैसे इस गीत की आख़िर में श्रेया घोषाल ने भी दो पंक्तियाँ के माध्यम से अपनी आवाज़ की मिठास घोली है।   शान इस गीत की के बारे में कहते हैं...
सच कहूँ तो मुझे भी ये भरोसा नहीं था कि इस गीत को इतनी सफलता मिलेगी। शायद इसकी वज़ह ये है कि इसमें तेज बीट्स और ऊँचे सुर के बोल नहीं है। इस गीत को सुनकर एक गर्मजोशी भरे प्यार का ख्याल आता है। ये मेरे गाए बेहतरीन गीतों में से एक है। बेल्जियम के उस पुल पर जहाँ ये गीत फिल्माया गया है, से मेरी यादें जुड़ी हैं क्यूँकि वहाँ सपरिवार मैं छुट्टियाँ मनाने जा चुका हूँ।

स्वानंद किरकिरे के लेखन का मैं शुरुआती दिनों से प्रशंसक रहा हूँ और विगत वर्षों की वार्षिक संगीतमालाओं में उनके डेढ़ दर्जन गीत अपना स्थान बना चुके हैं। स्वानंद ने ये गीत पीके के लिए सोच कर नहीं लिखा था। कविता के रूप में ये गीत वो पहले ही लिख चुके थे और वो भी फेसबुक पर। जब अपनी फेसबुकिया कविता स्वानंद ने निर्देशक राजकुमार हिरानी को सुनाई तो उन्होंने जस का तस इसे फिल्म में ले लिया। 

शान्तनु मोइत्रा इस फिल्म के लिए संगीतबद्ध गीतों में इस गीत को अपना पसंदीदा मानते हैं। शान्तनु के दिमाग में इस रोमांटिक गीत की धुन तैयार करते हुए दो बातें थीं एक तो यूरोप और दूसरा वहाँ का नृत्य वाल्टज़ (Waltz)। इन्हीं दोनों पहलुओं ने उन्हें गीत का मूड बनाने में मदद की। पियानो, गिटार और इंटरल्यूड्स में यूरोपीय कोरस का सहारा ले के उन्होंने ये माहौल खूबसूरती से रचा भी है। हालांकि उन पर ये आरोप भी लगे कि इस धुन को उन्होंने फिल्म Beyond Sunset के गीत  Waltz for a night पर आधारित कर बनाया। 

मैंने जब ये गीत सुना तो पाया कि दोनों गीतों के बोल तो अलग हैं ही,  धुन की शुरुआत में भी हल्की सी साम्यता  है पर उसे उन्होंने इस गीत में एक अलग ढंग से विकसित किया है। बहरहाल उस गीत की धुन तुलना के लिए आप यहाँ सुन सकते हैं। इसलिए मुझे इस आरोप में ज्यादा दम नहीं लगा । बहरहाल आइए अब सुनें ये गीत



 बिन पुछे मेरा नाम और पता, रस्मों को रख के परे
चार कदम बस चार कदम, चल दो ना साथ मेरे

बिन कुछ कहे, बिन कुछ सुने, हाथों में हाथ लिए
चार कदम बस चार कदम, चल दो ना साथ मेरे

राहों में तुमको जो धूप सताए, छाँव बिछा देंगे हम
अंधेरे डराए तो जा कर फलक पे चाँद सज़ा देंगे हम
छाए उदासी लतीफ़े सुना कर तुझको हँसा देंगे हम
हँसते हँसाते यूँही गुनगुनाते चल देंगे चार कदम

तुमसा मिले जो कोई रहगुज़र, दुनिया से कौन डरे
चार कदम क्या सारी उमर, चल दूँगी साथ तेरे  क्यूँ

फिल्म में अनुष्का और सुशांत के पहली बार मिलने से ले कर रिश्तों में बँधने का प्रसंगइस गीत के माध्यम से  बस चार मिनटों में ही निपटा दिया गया। हॉल में जब मैं ये फिल्म देख रहा था तो गीत खत्म होते के साथ बगल की सीट से आवाज़ आई I swear..It was damn quick man और मैं बड़ी मुश्किल से अपनी हँसी रोक पाया। बहरहाल ये रहा इस गीत का वीडियो..



वार्षिक संगीतमाला 2014

रविवार, जून 08, 2014

सीखो ना नैनों की भाषा पिया. Seekho Na Nainon Ki Bhasha Piya

करीब तीन हफ्तों के लंबे अंतराल के बाद इस ब्लॉग पर लौट रहा हूँ। क्या करूँ घर की एक शादी, फिर कनाडा का अनायास दौरा और वापस लौटकर कार्यालय की व्यस्तताओं ने यहाँ चाह कर भी आने की मोहलत नहीं दी। पर कभी कभी इन व्यस्तताओं के बीच भी कुछ मधुर सुनने को मिल जाता है। अब इसी गीत की बात लीजिए। इसे पिछले हफ्ते अपने कार्यालयी दौरों के बीच एक शाम मित्रों के साथ गाने गुनगुनाने की बैठक में पहली बार सुना और तबसे ही इसकी गिरफ्त में हूँ। तो सोचा आप तक इसे पहुँचा कर इस गिरफ़्त से आज़ादी ले लूँ। 

इस गीत को गाया है हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ हिंदी पॉप में भी अपना दखल देने वाली शुभा मुद्गल जी ने। शुभा जी की आवाज़ जहाँ एक ओर पारंपरिक ठुमरी, ख़याल और दादरा की याद दिला देती है वहीं अली मोरे अँगना, अब के सावन, प्यार के गीत सुना जा रे जैसे गैर फिल्मी गीतों की भी, जो दस पन्द्रह साल पहले बेहद लोकप्रिय हुए थे और आज भी लोगों के दिलो दिमाग से गए नहीं हैं। 1999 में उनका एक एलबम आया था 'अब के सावन' जिसे संगीतबद्ध किया था शान्तनु मोइत्रा ने । इस एलबम का एक गीत था 'सीखो ना नैनों की भाषा पिया..' जिसे लिखा था प्रसून जोशी ने।


काव्यात्मक गीतों की रचना में आज प्रसून जोशी अग्रणी गीतकारों में माने जाते हैं। ये गीत इस बात को साबित करता है कि उनका ये हुनर उनके शुरुआती दिनों से उनके साथ रहा है।  रूपा पब्लिकेशन द्वारा पिछले साल अपनी प्रकाशित पुस्तक Sunshine Lanes में इस गीत की चर्चा करते हुए उन्होंने लिखा है..
"मैंने इस गीत पर दिल्ली में काम करना शुरु किया क्यूँकि उस वक़्त वही मेरा ठिकाना था। पर जब 'अब के सावन' एलबम के गीतों की रिकार्डिंग शुरु हुई तो मुझे रिकार्डिंग टीम के साथ मुंबई जाना पड़ा। वहीं जुहू के शांत होटल के एक कमरे में ये गीत अपनी आख़िरी शक़्ल ले सका। ठुमरियाँ लिखना मुझे हमेशा से प्रिय रहा है। ये गीत भले ठुमरी की परिभाषा में पूरी तरह ख़रा नहीं उतरता पर फिर भी उसकी सुगंध को गीत की अदाएगी के साथ आप महसूस कर सकते हैं।
किसी भी प्रेमी की सबसे बड़ी हसरत उसे समझे जाने की होती है। सिर्फ शब्दों के ज़रिए नहीं पर उन छोटी छोटी बातों से जो उसकी भावनाओं और भाव भंगिमाओं में रह रह कर प्रकट होती हैं। मैंने इस गीत में इसी भाव को और गहराई से परखने की कोशिश की। वैसे तो ये गीत नारी मनोभावों को ज़रा ज्यादा छूता है पर ऐसा भी नहीं है कि पुरुषों में अपने आप को समझे जाने की चाहत नहीं होती।"
प्रसून की बातें तो आपने पढ़ लीं। ज़रा देखिए उन्होंने इस गीत में लिखा क्या है..

सीखो ना नैनों की भाषा पिया
कह रही तुमसे ये खामोशियाँ
सीखो ना
लब तो ना खोलूँगी मैं समझो दिल की बोली
सीखो ना नैनों की भाषा पिया...

सुनना सीखो तुम हवा को
सनन सन सनन सन कहती है क्या
पढ़ना सीखो.. सल..वटों को
माथे पे ये बलखा के लिखती हैं क्या

आहटों की है अपनी जुबाँ
इनमें भी है इक दास्तान
जाओ जाओ जाओ जाओ जाओ पिया

सीखो ना नैनों की भाषा...

ठहरे पानी जैसा लमहा
छेड़ो ना इसे हिल जाएँगी गहराइयाँ
थमती साँसों के शहर में
देखो तो ज़रा बोलती हैं क्या परछाइयाँ

कहने को अब बाकी है क्या
आँखों ने सब कह तो दिया
हाँ जाओ जाओ जाओ जाओ जाओ पिया

इसीलिए हुज़ूर अगली बार जब अपने प्रियतम के साथ हों तो बहती हवा की सनसनाहट में ये देखना ना भूलिए कि वो उन्हें गुदगुदा रही है या उकता रही है। अगर वो एकटक आपकी आँखों में आँखें डाले बैठे हों तो कुछ बोल कर प्रेम में डूबे उन गहरे जज़्बातों को हल्का ना कीजिए।बल्कि उनके साथ उनमें और डूबिए। वो लमहा तो गुजर जाएगा पर उसकी कसक, उसकी मुलायमियत आप वर्षों महसूस कर सकेंगे।

बहरहाल मैंने जिस दिन ये गीत सुना उस दिन ना तो फिज़ाओं में हवाएँ थीं और ना तो आकाश की गोद में उमड़ती घटाएँ। थी तो बस ढलती शाम में एक प्यारी सी आवाज़ जो गीत के बोलों के उतार चढ़ावों , उसकी भावनाओं को भली भांति प्रतिध्वनित करती हुई गर्मी की उस उष्णता को शीतलता में बदल रही थी। शायद यही कारण था कि शाखों से झूलते पत्ते भी बिना हिले डुले एकाग्रचित्त होकर इस गीत का आनंद ले रहे थे। 

इस गीत को सुनने के बाद मैंने तुरंत घर आकर शुभा मुद्गल की आवाज़ में इस गीत को सुना। पर अपने प्रिय संगीतकार शान्तनु मोइत्रा के संगीत संयोजन ने मुझे बेहद निराश किया। इस गीत को एक ठहराव और सुकून वाले न्यूनतम संगीत संयोजन की जरूरत थी जिसका मज़ा शान्तनु ने गीत के साथ चलती ताल वाद्यों की गहरी बीट्स से थोड़ा तो जरूर खराब कर दिया। अगर ऐसा नहीं होता तो शुभा जी की गायिकी और निखर कर  सामने आती।

नेट पर मैंने इस गीत को बिना संगीत के सुनना चाहा और मुझे कई अच्छी रिकार्डिंग्स हाथ लगी। उनमें से एक थी निकिता दाहरवाल की सो वही आपको पहले सुना रहा हूँ। इसी गीत को युवा गायिका और फिलहाल इंग्लैंड में अपनी शिक्षा पूरी कर रही निकिता दहरवाल ने भी पूरे मनोयोग से गाया है। निकिता की आवाज़ की तुलना शुभा जी की खुले गले वाली गहरी आवाज़ से तो नहीं की जा सकती पर उसने गीत की भावनाओं को सहजता से अपनी आवाज़ में पकड़ने की कोशिश जरूर की है।



और अब सुनिए इसे शुभा मुद्गल की आवाज़ में..



वैसे लोचनों की इस भाषा को पढ़ने में आपका अनुभव कैसा रहा है? क्या ऐसा तो नहीं कि आपने समझ कर भी उसे नज़रअंदाज़ कर दिया हो या फिर उनमें निहित भावनाओं को जरूरत से ज्यादा आँका हो ?

पुनःश्च दिसंबर 2019 इसी हफ्ते इस शानदार गीत को अपनी प्यारी आवाज़ से एक नई ऊँचाई पर पहुँचाया है हिमानी कपूर ने। जिन्हें इस गीत से प्यार है उन्हें ये वर्सन भी पसंद आएगा ऐसी मुझे उम्मीद है

मंगलवार, नवंबर 08, 2011

शान्तनु, स्वानंद, जेब , हानीया के इस गीत पर बताएँ तो क्या ख़्याल है ?

विगत कुछ दिनों से टीवी पर निजी चैनलों ने बॉलीवुड गीतों से परे भारतीय संगीत में झाँकने की कोशिश की है। ऐसे कलाकारों को बढ़ावा दिया है जो लीक से हटकर कुछ करना चाहते हैं। जो संगीत को अपने जीवन की साधना मानते हैं और अपनी कला को बाजार के अनुरूप ढालने की बजाए अपने मूल्यों पर संगीत की रचना करते हैं। संगीत चैनल के नाम पर संगीत के आलावा सब कुछ परोसने वाला MTV पिछले कुछ महिनों में MTV Unplugged, MTV Roots और Coke Studio at MTV जैसे अलहदा कार्यक्रम ले के आया है। कुछ दिनों पहले इसी सिलसिले में मैंने आपको MTV Roots पर शंकर टकर और निराली कार्तिक की प्रस्तुतियों से रूबरू कराया था। इधर कुछ दिनों से Star World पर हर रविवार एक नए कार्यक्रम की शुरुआत हुई है। कार्यक्रम का नाम है The Dewarists । ये ऐसे संगीतज्ञों का साझा प्रयास है जिनके लिए संगीत एक जुनून है जो संगीत के माध्यम से नए ध्वन्यात्मक प्रयोगों से घबराते नहीं, जिन्हें एक नए गीत की खोज में  सरहदों की दीवार तोड़ कर एक नई जगह में साथ साथ विचरने से भी परहेज़ नहीं।

अमूमन मैं Star World नहीं देखता। पर जब मुझे पता चला कि इस कार्यक्रम में स्वानंद शान्तनु की जोड़ी के साथ पाकिस्तान की जेब हानिया (जएब, हानीया ) का गठजोड़ हो रहा है तो मन में खुशी का ठिकाना नहीं रहा। स्वानंद को बतौर गीतकार और गायक मैं बहुत पसंद करता हूँ। शान्तनु मोइत्रा के साथ गाए उनके गीत मेरी वार्षिक संगीतमालाओं की ऊपरी पॉयदानोँ पर हमेशा बजते रहे हैं। वहीं जएब का अफ़गानी गीत पैमोना.. सुनने के बाद मैं उनकी आवाज़ का कायल हो चुका हूँ. पर ऐसा मेरे साथ हुआ हो ऐसा भी नहीं है। शान्तनु  बताते हैं कि पैमोना सुनते ही मुझे लगा कि काश हम जएब हानिया के साथ कोई गीत बनाते, इसीलिए जब The Dewarists ने हमें ऐसा करने का मौका दिया तो हमने दोनों हाथ से लपक लिया। पर एक दूसरे के संगीत के प्रति ये सम्मान एकतरफा नहीं है। जएबहानीया भी बावरा मन देखने चला एक सपना की उतनी बड़ी प्रशंसक हैं जितना की मैं और आप।
 


स्वानंद और शान्तनु के सांगीतिक सफ़र के बारे में तो पहले भी बता चुका हूँ। जएब व हानिया पेशावर के संगीत से जुड़े परिवार से ताल्लुक रखती हैं। जएब बताती हैं कि उनके बचपन के समय पाकिस्तान में जिया उल हक़ की सरकार थी। जिया ने सार्वजनिक संगीत समारोह पर रोक लगा दी थी इसलिए तब महफ़िलें एक दूसरे के घरों या पारिवारिक जलसों में जमती थीं। इसलिए इन दोनों बहनों को महदी हसन, आबिदा परवीन, इकबाल बानो जैसे कलाकारों को घर में ही सुनना नसीब हो गया था। जएब फक्र से कहती हैं कि सात साल की उम्र में ही उन्हें साबरी ब्रदर्स के साथ गाने का मौका मिला। आगे की शिक्षा के लिए अमेरिका गईं तो अपना हारमोनियम और गिटार लेकर। वहाँ पढ़ाई के साथ संगीत भी चलता रहा। फिर इंटरनेट पर अपलोड एक गीत पहले अमेरिका में लोकप्रिय हुआ और फिर पूरे पाकिस्तान में। आगे की कहानी तो यहाँ है ही



The Dewarists की एक ख़ासियत ये भी है कि ये कार्यक्रम दर्शकों को एक गीत बनने से पहले जो मिल जुल कर मेहनत होती है उसकी एक झलक भी दिखलाता है। अब इस गीत की बात करें तो शान्तनु अपने दिमाग में बैठी एक धुन बार बार गुनगुनाते हैं। जएब उस धुन को पकड़ कर सत्तर के दशक में महदी हसन के गाए एक दर्री गीत की कुछ पंक्तियाँ सुनाती हैं।

दी शब के तू अज़ मेह्र बाबाम
मेह्र बाबाम आमदाबूदी..आमदाबूदी
मतलब आप आज चाँद की तरह आसमान पर आए हैं इस बात की हमें बहुत खुशी हैं।

शान्तनु सुनकर उत्साहित हो उठते हैं। कहते हैं इसे शुरुआत में रखकर हम गाने का मूड बनाएँगे। स्वानंद को भी ये गीत के मूल भाव के लिए लाजवाब लगता है। आख़िर सरहद पार से आए मेहमानों के आने से सभी का मन हर्षित है ही। आगे की पंक्तियों के लिए सब स्वानंद की ओर आस लगाए हैं। स्वानंद हँसते हुए कहते हैं घबराएँ नहीं आगे के बोल मिल जाएँगे..आख़िर इसी की तो दुकान है अपनी। ये कहते हुए वो बाथरूम की ओर चल पड़ते हैं। अब चौंकने की बारी जएब व हानिया की है कि माज़रा क्या है। शान्तनु हँसते हुए कहते हैं कि ये स्वानंद की पुरानी आदत है। गीत के बोल उन्हें टॉयलेट में ही सूझते हैं। कुछ देर बाद स्वानंद इन पंक्तियों के साथ हाज़िर हो जाते हैं

धड़कनों की ताल बाजे साँसों का इकतारा

आँगन में सजाए बैठे सूरज चंदा तारा
चलो बाँट ले हम ज़िंदगी
जरा आज यूँ कर लें
कहो क्या ख़्याल है

सबके मुँह से एक साथ वाह वाही निकलती है। उधर हानिया भी रात भर बैठ कर एक धुन बनाती रही हैं और आज उसके लिए उन्हें शब्द भी मिल गए हैं जो गीत के मुखड़े से खूब जम रहे हैं..


आप से दो बातें करने

यादों को जेबों में भरने
आए हैं हम कुछ दिनों के बाद
यारों की सोहबत में आ के
धीरे से कुछ गुनगुना के
यूँ ही कट जाते हैं दिन और रात

शान्तनु के गीतों में कभी शोर नहीं होता। गीत के अंतरों के बीच की ताली और सितार जैसा बजता गिटार मन को थपकियाँ सा देता प्रतीत होता है और उसपर जएब और स्वानंद की दमदार आवाज़ें। शान्तनु कहते हैं..मेरी लिए जएब और स्वानंद की आवाज़ें ही सबसे बड़े वाद्ययंत्र हैं।

शान्तनु ने अगले दो अंतरों की भी रचना कर ली है जिसकी काव्यात्मकता देखते ही बनती हैं। आख़िर यूँ ही स्वानंद हमारे प्रिय गीतकार नहीं ! पूरा गीत बनकर तैयार हो गया है। संगीत से एक दूसरे के करीब रहे ये कलाकार अब मन से भी एक दूसरे के करीब आ गए हैं। संगीत भला क्या सरहदों में बँटा रह सकता है?

दीशब के तू अज़ मेह्र बा बाम
मेह्र बा बाम आमदाबूदी..आमदाबूदी

धड़कनों की ताल बाजे साँसों का इकतारा
आँगन में सजाए बैठे सूरज चंदा तारा
चलो बाँट ले हम ज़िंदगी
जरा आज यूँ कर लें
कहो क्या ख़्याल है

इक ज़हाँ छोटा सा अपना
इक ज़हाँ तुम्हारा
मुस्कान चाहें मीठी हो
या आँसू एक खारा
चलो बाँट लें ग़म और खुशी
थोड़ी गुफ़्तगू कर लें
कहो क्या ख्याल है
आप से दो बातें करने
यादों को जेबों में भरने
आए हैं हम कुछ दिनों के बाद
यारों की सोहबत में आ के
धीरे से कुछ गुनगुना के
यूँ ही कट जाते हैं दिन और रात

मुट्ठी में तुम भींच लाना सावन हरा
इक धनक तुम भी तोड़ लाना फ़लक़ से ज़रा
खट्टी बट्टी बाँट लेंगे किरणों का कतरा
इक सिक्का धूप हम से लेना गर कम लगा
बेतुक ही बेमलब हँस लें हम
क्यूँ ना ही इस लमहे में हाँ जी लें हम

चलो बाँट ले हम ज़िंदगी
जरा आज यूँ कर लें
कहो क्या ख़्याल है

आप से दो बातें करने...
दीशब के तू अज़ मेह्र बा बाम
मेह्र बा बाम आमदाबूदी..आमदाबूदी



इस पोस्ट से संबंधित कड़ियाँ

रविवार, अगस्त 14, 2011

पूछे जो कोई मेरी निशानी रंग हिना लिखना, गोरे बदन पे उँगली से मेरा नाम अदा लिखना

छः साल पहले यानि 2005 में कश्मीर समस्या की पृष्ठभूमि पर एक फिल्म बनी थी नाम था 'यहाँ'! फिल्म ज्यादा भले ही ना चली हो पर इसके गीत आज भी संगीतप्रेमी श्रोताओं के दिल में बसे हुए हैं,खासकर इसका ये रोमांटिक नग्मा। गुलज़ार ने अपनी लेखनी से ना जाने कितने प्रेम गीतों को जन्म दिया है पर उनकी लेखनी का कमाल है कि हर बार प्यार के ये रंग बदले बदले अल्फ़ाज़ों के द्वारा मन में एक अलग सी क़ैफ़ियत छोड़ते है।
'यहाँ' फिल्म का ये गीत सुनकर दिल सुकून सा पा लेता है। श्रेया घोषाल की स्निग्ध आवाज़ और पार्श्व में शान्तनु मोएत्रा के बहते संगीत पर गुलज़ार के बोल गज़ब का असर करते हैं। गुलज़ार गीत के मुखड़े से ही रूमानियत का जादू जगाते चलते हैं। नायिका का ये कहना कि यूँ तो मेरी रंगत हिना से मिलती जुलती है पर जब तुम्हारा स्पर्श मुझे मिलता है मेरी हर बात एक अदा बन जाती है,अन्तरमन को गुदगुदा जाता है..

फिल्म यहाँ की कहानी एक कश्मीरी लड़की और फ़ौज के एक अफ़सर के बीच आतंकवाद के साए में पलते प्रेम की कहानी है। ज़ाहिर है प्रेमी युगल आशावान हैं कि आज नहीं तो कल ये हालात बदलेंगे ही...गुलज़ार पहले अंतरे में यही रेखांकित करना चाहते हैं

पूछे जो कोई मेरी निशानी
पूछे जो कोई मेरी निशानी
रंग हिना लिखना
गोरे बदन पे
उँगली से मेरा
नाम अदा लिखना
कभी कभी आस पास चाँद रहता है
कभी कभी आस पास शाम रहती है..

झेलम में बह लेंगे..
वादी के मौसम भी
इक दिन तो बदलेंगे
कभी कभी आस पास चाँद रहता है
कभी कभी आस पास शाम रहती है..

गीत के दूसरा और तीसरे अंतरे में श्रोता अपने आप को प्रकृति से जुड़े गुलज़ार के चिर परिचित मोहक रूपकों से घिरा पाते हैं। शाम की फैली चादर, चाँद की निर्मल चाँदनी, गिरती बर्फ , फैलती धुंध, बदलते रंग और जलती लकड़ियों की आँच सब कुछ तो है जो जवाँ दिलों को एक दूसरे से अलग होने नहीं देती.. । गुलज़ार की लेखनी एक अलग ही धरातल पर तब जाती दिखती है जब वो कहते हैं..शामें बुझाने आती हैं रातें, रातें बुझाने, तुम आ गए हो.। ये सब पढ़ सुन कर बस एक आह सी ही निकलती है...

आऊँ तो सुबह
जाऊँ तो मेरा नाम सबा लिखना
बर्फ पड़े तो बर्फ पे मेरा नाम दुआ लिखना
ज़रा ज़रा आग वाग पास रहती है
ज़रा ज़रा कांगड़ी का आँच रहती है
कभी कभी आस पास चाँद रहता है
कभी कभी आस पास शाम रहती है..

जब तुम हँसते हो
दिन हो जाता है
तुम गले लगो तो
दिन सो जाता है
डोली उठाये आएगा दिन तो
पास बिठा लेना
कल जो मिले तो
माथे पे मेरे सूरज उगा देना
ज़रा ज़रा आस पास धुंध रहेगी
ज़रा ज़रा आस पास रंग रहेंगे

पूछे जो कोई मेरी निशानी...शाम रहती है..
इस गीत में श्रेया का साथ दिया है शान ने। श्रेया इस गीत को अपने गाए सर्वप्रिय गीतों में से एक मानती हैं। इस गीत के बारे में अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि
इस गीत में ऐसा कुछ है जो मुझे अपनी ओर खींचता है। वे इसके शब्द नहीं हैं, ना ही मेरी गायिकी और ना ही इसका संगीत पर इन तीनों के समन्वय से बनी इस गीत की पूर्णता ही मुझे इस गीत को बार बार सुनने को मजबूर करती है।

श्रेया के मुताबिक इस फिल्म के संगीतकार शान्तनु मोएत्रा एक ऐसे संगीतकार हैं जिनका संगीत संयोजन इस तरह का होता है कि वो गीत में वाद्य यंत्रों का नाहक इस्तेमाल नहीं करते। श्रेया का कहना बिल्कुल सही है।शांतनु की इस विशिष्ट शैली को हम उनकी बाद की फिल्मों परिणिता, खोया खोया चाँद और एकलव्य दि रॉयल गार्ड जैसी फिल्मों में भी देखते आए हैं।

यहाँ फिल्म अभिनेत्री मिनीषा लांबा की पहली फिल्म थी। फिल्म में उनका अभिनय और फिल्म का छायांकन चर्चा का विषय रहे थे। इस गीत के वीडिओ में आप फिल्म की इन दोनों खूबियों का सुबूत सहज पा लेंगे....
चलते चलते जरा याद कीजिए की विगत बीस सालों (1990 -2010) में गुलज़ार के लिखे रूमानी नग्मों में आपको सबसे ज्यादा कौन पसंद हैं? अपनी पसंद बताइएगा। फिलहाल मेरी पसंद तो ये रही..

सोमवार, जनवरी 18, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 : पायदान संख्या 21 - क्या आपकी जिंदगी से भी कोई शख्स गुमशुदा है?

हिंदी फिल्म संगीत में कई बार ऍसा होता है कि जब आप किसी गीत को सिर्फ सुनते हैं तो वो आप पर जबरदस्त प्रभाव डालता है पर फिल्म को देखते समय वो गीत कहानी में घुलता मिलता नज़र नहीं आता। पर दूसरी ओर परिस्थितिजन्य गीत होते हैं जो कहानी की पटकथा के अनुसार अपने आप को ढाल लेते हैं। ऐसे गीत एकबारगी सुनने में तो वो असर नहीं डालते पर फिल्म देखने के बाद धीरे धीरे मन में बैठने लगते हैं। वार्षिक संगीतमाला 2009 की 21 वीं पॉयदान पर एक ऐसा ही गीत विराजमान है। इस गीत की धुन बनाई शान्तनु मोइत्रा ने, इसे लिखा स्वानंद किरकिरे ने और अपनी मखमली आवाज़ से इसमें रंग भरे गायक शान ने।

स्वानंद किरकिरे को फिल्म '3 Idiots' की पटकथा लिखते समय से ही इस परियोजना में शामिल कर लिया गया था। इसलिए इस फिल्म के सारे गीतों के बोल पटकथा की धारा के साथ बहते नज़र आए। All Izz Well की उत्पत्ति के बारे में स्वानंद जी की राय से मैं आपको पहले ही अवगत करा चुका हूँ। आज जानते हैं कि स्वानंद के जोड़ीदार शान्तनु क्या कहते हैं इस गीत के बारे में ।

वैसे शान्तनु मोइत्रा एक ऐसे संगीतकार हैं जो अपनेआप को पूर्णकालिक संगीतकार नहीं मानते। एड जिंगल करते करते फिल्म उद्योग का रास्ता देखने वाले शान्तनु को संगीत से उतना ही प्यार है जितना कि खगोल विज्ञान, घुमक्कड़ी और पर्वतारोहण से। साल में वो चुनिंदा फिल्म करते हैं। हजारों ख्वाहिशें ऐसी और परिणिता के माध्यम से 'एक शाम मेरे नाम' की वार्षिक संगीतमाला 2004 और 2005 में ऊपर की पॉयदानों पर धूम मचा चुके हैं।

शान्तनु इस गीत के बारे में कहते हैं
हमारा ये गीत ऍसे एक शख़्स की कहानी कहता है जो हमारी जिंदगी में आया,हमें जानने की कोशिश की,जिसने हमारे दिल को छुआ और फिर अपने विचारों से आगे बढ़ने की रोशनी दिखाकर इतनी सहजता से हमारी जिंदगी से अलग हो गया जैसे कुछ हुआ ही ना हो। सालों बाद जब आप उसके बारे में सोचते हैं तो लगता है अरे वो तो कभी स्मृति पटल से दूर गया ही नहीं। और मन अनायास ही उद्विग्न हो उठता है कि आखिर वो गया कहाँ?

शान्तनु ने जो बात कही है उसकी सच्चाई से शायद ही मुझे या आपको संदेह होगा। इसी बात को पुरज़ोर ढंग से रखने में गायक गीतकार और संगीत निर्देशक की जोड़ी कामयाब हुई है। स्वानंद के सहज बोल,शान्तनु का बहता संगीत खासकर मुखड़े के बाद का टुकड़ा और इंटरल्यूड्स मन को बेहद सुकून देते हैं। शान की आवाज़ की मुलायमियत आपको अतीत की यादों की पुरवाई में भटकने को बाध्य करती है।

तो आइए इस गीत के बोलों को पढ़ते हुए सुनें इस गीत को


बहती हवा सा था वो
उड़ती पतंग सा था वो
कहाँ गया उसे ढूँढो...

हम को तो राहें थीं चलाती
वो खुद अपनी राह बनाता
गिरता सँभलता मस्ती में चलता था वो
हम को कल की फिक्र सताती
वो बस आज का जश्न मनाता
हर लमहे को खुल के जीता था वो
कहाँ से आया था वो
छूके हमारे दिल को
कहाँ गया उसे ढूँढो

सुलगती धूप में छाँव के जैसा
रेगिस्तान में गाँव के जैसा
मन के घाव में मरहम जैसा था वो
हम सहमे से रहते कुएँ में
वो नदिया में गोते लगाता
उल्टी धारा चीर के तैरता था वो
बादल आवारा था वो
प्यार हमारा था वो
कहाँ गया उसे ढूँढो

हम को तो राहें थीं चलाती.....
.........कहाँ गया उसे ढूँढो




चलते चलते एक मज़ेदार तथ्य जो इस से गीत से जुड़ा है वो आपसे बाँटता चलूँ। जब इस गीत की रिकार्डिंग पूरी हो चुकी थी तो निर्देशक राजकुमार हिरानी के बुलावे पर आमिर स्टूडिओ आए।

हिरानी ने तब आमिर से कहा जानते हो फिल्म में इस गीत के आलावा कब ये गीत पूरे देश में बजेगा? आमिर असमंजस में थे कि राजकुमार जी ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा ये तुम्हारा Funeral Song होगा ये। मरोगे तब टेलीविजन पर इसी गीत के माध्यम से तुम्हें याद किया जाएगा। ये सुनकर आमिर हँस पड़े।

मंगलवार, जनवरी 05, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 - पायदान संख्या 25 : आज के युवा छात्रों की जिंदगी में झाँकते स्वानंद किरकिरे

थ्री इडियट्स के गाने मैंने करीब तीन हफ्ते पहले सुने थे और एक बारगी सुन कर मन उतना प्रसन्न भी नहीं हुआ था। कारण थे स्वानंद किरकिरे। हजारों ख्वाहिशें ऍसी में उनका पहला गीत बावरा मन देखने चला एक सपना हो या परिणिता का रात हमारी चाँद की सहेली है या फिर और उसके बाद खोया खोया चाँद में उनके गीतों की काव्यात्मकता हो या फिर लागा चुनरी में दाग में दो बहनों की अल्हड़ चंचलता को उभारता उनका प्यारा गीत हो, वो हमेशा मन में अपने गीतों से अलग सा अहसास जगाते थे।

सो मैंने फेसबुक पर जाकर उनसे अपनी निराशा प्रकट कर दी पर फिल्म में उनके गीतों का सफ़र देख इतना जरूर लग गया था कि काव्यात्मकता से हिंगलिश गानों का सफ़र उन्होंने फिल्म की स्क्रिप्ट के लिए ही तय किया होगा। और जब मैंने फिल्म देखी तो वहीं गीत जो बस ठीक-ठाक लग रहे थे फिल्मांकन के बाद बेहतरीन लगने लगे।

खुद स्वानंद साहब ने दैनिक हिंदुस्तान में दिए अपने साक्षात्कार में इस बारे में कहा

दरअसल गाने फिल्म की स्क्रिप्ट के हिसाब से लिखे जाते हैं। जैसे ‘खोया-खोया चाँद’ 1950 के आस-पास की फिल्म थी तो अल्फ़ाज़ भी वैसे ही ज़हीन थे।
परिणिता’ में बंगाल से जुड़ी कहानी थी तो गानों में भी काव्यात्मक्ता वैसी ही थी। ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ टपोरी और भाईगीरी पर थी, तो गाने भी वैसे ही टपोरीनुमा थे। एक एक्टर जैसे फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह मेकअप बदलता है तो वैसे ही एक गीतकार भी फिल्म की थीम की तरह ही अपना रूप बदलता है। ‘थ्री-इडियट्स’ जींस और टी-शर्ट पहनने वाले आज के स्टूडेंट्स की कहानी है तो लफ़्ज़ भी जींस-टी शर्ट वाले होने चाहिए।

तो वार्षिक संगीतमाला की 25 वीं पॉयदान पर इसी फिल्म का एक लोकप्रिय गीत जो आजकल अपने सर्वप्रिय जुमले 'आल इज्ज वेल' के लिए घर घर में चर्चित है। मुर्गे की बाँग से शुरु होता ये गीत सोनू निगम अपने अटपटे बोलों की वजह से आपका ध्यान पहले खींचता है, फिर गीत की मस्ती आपको झूमने पर विवश कर देती है। पर झूमने के साथ स्वानंद हँसी हंसी में आज के छात्र वर्ग की मानसिक स्थिति का भी बेहतरीन आकलन करते हैं। मुर्गी और अंडे के रूपक को विद्यार्थियों के लिए प्रयोग करने की बात पर उनका कहना है कि

मैंने इंटरनेट पर एक कार्टून देखा था, जिसमें मुर्गी का एक बच्चा हाफ-फ्राई देख रहा है और पूछ रहा है- ‘ब्रदर इज़ दैट यू’ (भाई क्या ये तुम हो)। तो यही इस गाने की फिलॉसफी भी रही कि मुर्गी क्या जाने अंडे का क्या होगा, लाइफ़ मिलेगी या तवे पे फ्राई होगा...’, ये बात एक स्टूडेंट के भविष्य के लिए भी फिट बैठती है कि ‘कोई ना जाने अपना फ्यूचर क्या होगा...होंठ घुमाओ, सीटी बजाओ..सीटी बजाके बोल भइया...ऑल इज़ वेल..’।

शान्तनु मोइत्रा के मस्त संगीत पर बने इस गीत को सोनू निगम ने स्वानंद किरकिरे और शान के साथ मिलकर पूरे मन से गाया है जिसे सुन कर आप महसूस कर सकते हैं..



जब लाइफ हो आउट आफ कंट्रोल
होठों को कर के गोल
होठों को कर के गोल
सीटी बजा के बोल

आल इज्ज वेल
मुर्गी क्या जाने अंडे का क्या होगा
लाइफ मिलेगी या तवे पे फ्राइ होगा
कोई ना जाने अपना फ्यूचर क्या होगा

होठ घुमा सीटी बजा.. भैया आल इज्ज वेल
अरे भइया आल इज्ज वेल
अरे चाचू आल इज्ज वेल

कनफ्यूजन ही कनफ्यूजन है
साल्यूशन कुछ पता नहीं
साल्यूशन जो मिला जो साला
क्वेश्चन क्या था पता नहीं
दिल जो तेरा बात बात पे घबराए
दिल पे रख के हाथ उसे तू फुसला ले
दिल ईडीयट है प्यार से उसको समझा ले
होठ घुमा सीटी बजा.. भैया आल इज्ज वेल
अरे भइया आल इज्ज वेल
अरे चाचू आल इज्ज वेल

स्कॉलरशिप की पी गया दारू
ग़म तो फिर भी मिटा नहीं
अगरबत्तियाँ राख हो गईं
गॉड तो आखिर मिला नहीं
बकरा क्या जाने उसकी माँ का क्या होगा
सींक घुसेगी या साला कीमा होगा

होठ घुमा सीटी बजा.. भैया आल इज्ज वेल


हँसी की फुहारों के साथ ये गीत इंजीनियरिंग कॉलेज के उन पुराने दिनों की याद दिला देता है जिसमें ये इडियोटिक लमहे भी अपने से लगने लगते हैं। यू ट्यूब पर इस गीत की झलक आप यहाँ देख सकते हैं


सोमवार, मार्च 16, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 3 : सत्ता की ये भूख विकट आदि है ना अंत है, अब तो प्रजातंत्र है...

वार्षिक संगीतमाला में अब बची है आखिरी की तीन पॉयदान। तीसरी पॉयदान पर गीत वो जिसे आपके सुनने की संभावना कम ही होगी क्यूंकि इस गीत की चर्चा हिंदी चिट्ठा जगत में अब तक तो नहीं हुई है। नुक्कड़ गीतों की शैली में रचा ये गीत एक समूह गीत है जो इस देश में प्रजातंत्र की गौरवशाली परंपरा को पहले तो याद करता है और फिर आज के लोकतंत्र में आए खोखलेपन का जिक्र करता है। अब जब की लोकसभा के चुनावों की घोषणा हो गई है अगर इलेक्ट्रानिक मीडिया की नज़र इस गीत पर जाए तो इसका इस चुनावी मौसम में अच्छा इस्तेमाल हो सकता है।

नुक्कड़ गीतों की शैली में रचा ये गीत एक समूह गीत है जो इस देश में प्रजातंत्र की गौरवशाली परंपरा को पहले तो याद करता है और फिर आज के लोकतंत्र में आए खोखलेपन का जिक्र करता है। दरअसल इस तरह के गीत हिंदी फिल्मों में बेहद कम नज़र आते हैं जबकि आज के सामाजिक राजनीतिक हालातों में ऍसे कई गीतों की जरूरत है जो साठ सालों से चल रहे इस लोकतंत्र के बावजूद पैदा हुई विसंगतियों को रेखांकित कर सकें। पर ऍसे गीत तभी लिखे जाएँगे जब इन विषयों को लेकर फिल्में बनाई जाएँगी।

इस गीत को लिखा है अशोक मिश्रा ने। अशोक मिश्रा को इस तरह के गीत की रचना करने का मौका दिया निर्देशक श्याम बेनेगल ने अपनी फिल्म वेलकम टू सज्जनपुर में ! गीतकार ने गीत के दोनों अंतरे में जो बातें कहीं है वो आज के राजनीतिक हालातों का सच्चा आईना हैं। चाहे वो सत्ता की कभी ना मरने वाली भूख हो या फिर नोटों के बल पर वोटों की ताकत को प्रभावशून्य करने की बात।

संगीतकार शान्तनु मोइत्रा ने लोक धुन का स्वरूप अपनाते हुए इस समूह गान के मुख्य स्वर में कैलाश खेर को चुना जो कि शत प्रतिशत सही और प्रभावी चुनाव रहा। कुल मिलाकर कैलाश की गूंजती आवाज़, प्रभावी बोल और गीत के अनुरूप बनाई गई प्यारी धुन ने इस गीत को वार्षिक संगीतमाला की पहली तीन पॉयदानों में ला खड़ा किया है। तो आइए इस गीत के माध्यम से याद करें प्रजातंत्र के मूल तत्त्वों को और अपने वोट की अहमियत को पहचानते हुए मतदान का संकल्प लें।


आदमी आज़ाद है, देश भी स्वतंत्र है
राजा गए रानी गई अब तो प्रजातंत्र है

जन के लिए, जन के द्वारा जनता का राज है
प्रजातंत्र सबसे बड़ा, हम सबको नाज़ है
वोट छोटा सा मगर शक्ति में अनंत है
अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

खिल रही थी कली कली, महके थी हर गली
आप कभी साँप हुए, हम हो गए छिपकली
सत्ता की ये भूख विकट आदि है ना अंत है

अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

अरे जिसकी लाठी उसकी भैंस आपने बना दिया
हे नोट की खन खन सुना के वोट को गूँगा किया
पार्टी फंड, यज्ञ कुंड घोटाला मंत्र है

अब तो प्रजातंत्र है, अब तो प्रजातंत्र है

आदमी आज़ाद है, देश भी स्वतंत्र है
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गुरुवार, सितंबर 11, 2008

बावरा मन देखने चला एक सपना ...स्वानंद किरकिरे

सपने देखना किसे अच्छा नहीं लगता ?
खासकर तब, जब वो सोती नहीं वरन जागती आँखों से देखें जाएँ ......
कम से कम अपनी कहूँ तो बचपन से आज तक ऍसे कई सपने मेरे मन के साक्षी रहे हैं।

बच्चे थे तो सोचते कि अगर अपनी कैडबरी चॉकलेट की पूरी दुकान होती तो कितना अच्छा होता !
थोड़े बड़े हुए तो रेडिओ पर आने वाली क्रिकेट कमेंट्री का बुखार ऍसा चढ़ा कि हर किसी से यही कहते की मुझे तो सुशील दोशी जैसा कमेंट्री करने वाला बनना है।
किशोरावस्था की दहलीज पर पहुँचे तो अपने आफिसर्स हॉस्टल वाले घर की बॉलकोनी से दिखने वाली परम सुंदरियों का सानिध्य सुख प्राप्त करने के ख्वाब देखने लगे।


उम्र बढती गई पर स्वप्न बदलते गए। कुछ सपने पूरे हुए तो कुछ अधूरे ही रह गए। पर जागती आँखों से देखे जाने वाले इन सपनों का सिलसिला चलता रहा। सपने टूटते हैं तो दर्द सहने की शक्ति देते हैं और जगते है तो जिंदगी जीने का मकसद भी।

इसलिए जब पहली बार वर्ष २००५ के बेहतरीन गानों की सूची तैयार करते समय स्वानंद किरकिरे का लिखा और गाया, सपनों से जुड़ा ये गीत सुनने को मिला तो एक बार में ही ये गीत हृदय में स्थान बना गया। स्वानंद जी ने इस गीत को रंगमंच से जुड़े रहते हुए ही लिख लिया था। 'हजारों ख्वाहिशों ऐसी' बनाते समय जब सुधीर मिश्रा ने इसे सुना तो इससे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरत इसे अपनी फिल्म मे प्रयोग करने का मन बना लिया। शांतनु मोएत्रा के संगीत निर्देशन में बना ये गीत स्वानंद को फिल्म जगत में एक अलग पहचान दिलाने में कामयाब रहा।

दो तीन दिन पहले एक पाठक ने मुझसे पूछा कि क्या नोकिया की एड में पार्श्व में बजने वाले गीत के बारे में आपको कुछ पता है तो मुझे अपने रोमन ब्लॉग पर लिखी इस पुरानी पोस्ट की याद आई और मैंने सोचा क्यूँ ना इसे आप से फिर से बाँटा जाए..

बावरा मन देखने चला एक सपना
बावरा मन देखने चला एक सपना

बावरे से मन की देखो बावरी हैं बातें
बावरे से मन की देखो बावरी हैं बातें
बावरी सी धड़कने हैं बावरी हैं साँसें
बावरी सी करवटों से निंदिया दूर भागे
बावरे से नैन चाहें बावरे झरोखों से
बावरे नज़ारों को तकना
बावरा मन देखने चला एक सपना.....

बावरे से इस ज़हाँ में बावरा एक साथ हो
इस सयानी भीड़ में बस हाथों में तेरा हाथ हो
बावरी सी धुन हो कोई बावरा इक राग हो
ओ बावरी सी धुन हो कोई बावरा इक राग हो
बावरे से पैर चाहें बावारे तरानों के
बावरे से बोल पे थिरकना
बावरा मन देखने चला एक सपना.......

बावरा सा हो अंधेरा बावरी ख़ामोशियाँ
बावरा सा हो अंधेरा बावरी ख़ामोशियाँ
थरथराती लौ हो मद्धम बावरी मदहोशियाँ
बावरा एक घूँघटा चाहे हौले हौले बिन बताये
बावरे से मुखड़े से सरकना
बावरा मन देखने चला एक सपना.........
बावरा मन देखने चला एक सपना.........




तो अगर आप भी खुली पलकों से स्वप्न लोक में विचरण करने की ख्वाहिश रखते हों तो सुनना ना भूलिएगा इस बावरे से नग्मे को...



'एक शाम मेरे नाम' पर गीतकार स्वानंद किरकिरे से जुड़ी अन्य प्रविष्टियाँ

  1. रात हमारी तो चाँद की सहेली है.., संगीत -शान्तनु मोइत्रा, चलचित्र - परिणिता, गायक - चित्रा और स्वानंद

  2. हम तो ऐसे हैं भैया.. ..., संगीत- शान्तनु मोइत्रा चलचित्र - लागा चुनरी में दाग गायिका - सुनिधि चौहान और श्रेया घोषाल

  3. चंदा रे चंदा रे धीरे से मुसका.., संगीत- शान्तनु मोइत्रा चलचित्र - एकलव्य दि रॉयल गार्ड, गायिका - हमसिका अय्यर

  4. क्यूँ खोये खोये चाँद की फिराक़ में, तलाश में, उदास है दिल.... संगीत- शान्तनु मोइत्रा, चलचित्र - खोया खोया चाँद, गायक- स्वानंद किरकिरे

बुधवार, मई 21, 2008

रात हमारी तो चाँद की सहेली है...!

क्या ये सच नहीं है कि अँधेरे को हम सब पीड़ा और अवसाद का प्रतीक मानते हैं ?

पर लोगों की बात मैं क्यूँ मानूँ ?

मेरी नज़रों ने तो कुछ और ही देखा है... कुछ और ही महसूस किया है...
ज़ेहन की वादियों से कभी उन लमहों को चुन कर देखें...
दिल जब कहीं भटक रहा हो निरुद्देश्य और दिशाविहीन..
अपने चारों ओर की दुनिया जब बेमानी लगने लगी हो ....
यहाँ तक की आप अपनी परछाई से, अपने साये से भी दूर भागने लगे हों .....
किसी से बात करने की इच्छा ना हो....


ऍसे हालात में अपना गम अपनी कुंठा ले के आप कहाँ जाएँगे..
सोचिए तो?
पर मुझे सोचने की जरूरत नहीं...
ऍसे समय मेरा हमदम, मेरा वो मित्र हमेशा से मेरे करीब रहा है..
अपनी विशाल गोद में काली चादर लपेटे आमंत्रित करता हुआ..

पहली बार इससे दोस्ती तब हुई थी जब मैंने किशोरावस्था में कदम रखा था। ये वो वक़्त था जब छुट्टी के दिनों में सात बजे के बाद घर की बॉलकोनी में मैं और मेरा दोस्त घंटों खोए रहते थे। जाने कैसी चुम्बकीय शक्ति थी मेरे इस सहचर में कि शाम से ही उसके आने का मैं बेसब्री से इंतजार करता फिरता।

कॉलेज के दिनों में ये दोस्ती और गहरी होती गई। फ़र्क सिर्फ इतना था कि हॉस्टल के उस बंद कमरे में घुप्प अँधेरे के साथ कोई और साथ हो आया था।

अरे ! अरे ! आप इसका कोई और मतलब ना निकाल लीजिएगा।

वो तीसरा कोई और नहीं..वो गीत और गज़लें थीं जिनके बोल उस माहौल में एक दम से जीवंत हो उठते थे।

कभी वे दिल को सुकून देते थे...
तो कभी आँखों की कोरों को पानी...


इसलिए २००५ में फिल्म परिणीता का ये गीत जब भी मैं सुनता हूँ तो लगता है कि अरे ये तो मेरा अपना गीत है..अपनी जिंदगी में जिया है इसके हर इक लफ़्ज़ को मैंने...
गीत शुरु होता है स्वान्द किरकिरे की गूँजती आवाज से.. पार्श्व में झींगुर स्वर रात के वातावरण को सुनने वाले के पास पहुँचा देता है। शान्तनु मोइत्रा का संगीत के रूप में घुँघरुओं की आवाज़ का प्रयोग लाजवाब है और फिर स्वानंद किरकिरे के शब्द चित्र और गायिका चित्रा का स्वर मन की कोरों को भिंगाने में ज्यादा समय नहीं लेता।

रतिया कारी कारी रतिया
रतिआ अँधियारी रतिया
रात हमारी तो चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद आई वो अकेली है
चुप्पी की बिरहा है झींगुर का बाजे साज

रात हमारी तो चाँद की सहेली है
कितने दिनों के बाद आई वो अकेली है
संध्या की बाती भी कोई बुझा दे आज
अँधेरे से जी भर के करनी है बातें आज
अँधेरा रूठा है,अँधेरा ऐंठा है
गुमसुम सा कोने में बैठा है

अँधेरा पागल है, कितना घनेरा है
चुभता है डसता है, फिर भी वो मेरा है
उसकी ही गोदी में सर रख के सोना है
उसकी ही बाँहों में चुपके से रोना है
आँखों से काजल बन बहता अँधेरा

तो  सुनें रात्रि गीतों की श्रृंखला में परिणीता फिल्म का ये संवेदनशील नग्मा..



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(ये गीत २००५ की वार्षिक संगीतमाला जो उस वक्त मेरे रोमन हिंदी चिट्ठे पर चला करती थी का सरताज गीत था और ये प्रविष्टि भी तभी लिखी गई थी।)
 

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