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सोमवार, मार्च 18, 2024

वार्षिक संगीतमाला 2023 : आधा तेरा इश्क़, आधा मेरा .. ऐसे हो पूरा चंद्रमा..

2023 के 25 शानदार गीतों की इस वार्षिक संगीतमाला का सफ़र आधे से ज़्यादा पूरा हो चुका है और काफी अंतराल के बाद आज की इस पायदान पर एक बार फिर गूँजेगी अरिजीत सिंह की आवाज़। पर इस गीत से जुड़ी रोचक बात ये है कि जब पहली बार इस गीत का मुखड़ा लिखा और गाया गया तो अरिजीत वहाँ परिदृश्य में थे ही नहीं।


इस गीत का संगीत देने वाले श्रेयस पुराणिक अपने गीतों को अक्सर सिद्धार्थ गरिमा की जोड़ी से लिखवाते रहे हैं। उनके इस साथ की वज़ह हैं संजय लीला भंसाली जिनकी फिल्मों में इस तिकड़ी ने साथ साथ काम किया है।

महाराष्ट के नागपुर से छत्तीसगढ़ के अंदरुनी इलाकों में अपना आरंभिक जीवन बिताने वाले श्रेयस मुंबई में सुरेश वाडकर से संगीत विद्यालय में अपना हुनर तराशने आए थे। संगीत साधना करते हुए उन्हें संजय लीला भंसाली का सहायक बनने का मौका मिला। बाजीराव मस्तानी की गणेश आरती उनके द्वारा ही कम्पोज़ की गयी थी। मूलतः गायक का सपना लिए हुए श्रेयस के संगीतकार बनने का ये पहला कदम था। श्रेयस आजकल ओटीटी के साथ साथ स्वतंत्र संगीत के जरिए भी अपनी धुनें श्रोताओं तक पहुंचा रहे हैं।



जब उन्होंने सिद्धार्थ गरिमा के साथ मिलकर इस गीत का मुखड़ा बनाया तो ये जरूर महसूस किया कि इसे किसी बड़ी फिल्म के लिए रख लेना चाहिए। ख़ैर वो बात आई गयी हो गयी। फिर दीवाली की एक पार्टी में पहुँचे श्रेयस ने वहां जमी जमाई महफ़िल के बीच इस गीत को यूं ही गाना शुरु कर दिया। उसी पार्टी में एनिमल के निर्देशक संदीप वांगा भी मौज़ूद थे। उन्होंने गीत सुना और सुनकर इतने प्रभावित हुए कि फिर गिटार के साथ कई बार और सुना। वे गीत की तारीफ़ करते  हुए चले गए। 

कुछ दिनों बाद उनके कार्यालय से वो फोन आ ही गया जिसकी श्रेयस बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे थे। उनकी हामी भरने के बाद ही गीत का बाकी हिस्सा फिल्म की परिस्थिति को देख के लिखा गया।

एनिमल के इस गीत में कमाल के बोल लिखे हैं सिद्धार्थ और गरिमा ने। मुखड़ा ही देखिए कितना प्यारा है जो करवाचौथ की फिल्म की परिस्थिति में एकदम फिट बैठता है... आधा तेरा इश्क़, आधा मेरा .. ऐसे हो पूरा चंद्रमा...तारा तेरा इक तारा मेरा, बाकी अँधेरा आसमां..। नायक नायिका की सहज प्रेम कथा तो ये है नहीं। उसके कुछ बदरंग पहलू भी हैं जिनके रहते हुए भी कभी कभी सतरंगे इश्क़ की फुलझड़ियाँ निकलती रहती हैं और इसे विरोधाभास को शब्द देती हुए गीतकार जोड़ी लिखती है..बदरंग में सतरंगा है ये इश्क़ रे.. जोगी मैं और गंगा है ये इश्क़ रे।

पर नायक नायिका के इस जटिल रिश्ते को उनकी लिखी इस पंक्ति में बखूबी समझा जा सकता है मैं समंदर, परिंदा है ये इश्क़ रे....मन मातम और जिंदा है ये इश्क़ रे

पहले इसे श्रेयस ने ख़ुद गाया था पर फिल्म का हिस्सा बनते ही ये गीत अरिजीत का हो गया। श्रेयस ख़ुद मानते हैं कि अरिजीत उसे जिस स्तर पर ले गए वो शायद ही वहाँ ले जा पाते।

आधा तेरा इश्क़, आधा मेरा .. ऐसे हो पूरा चंद्रमा
हो तारा तेरा इक तारा मेरा, बाकी अँधेरा आसमां
ना तेरे संग लागे, बांधे जो पीपल पे धागे
ये सुरमे के धारे, बहते है नज़रे बचा के
बदरंग में सतरंगा है ये इश्क़ रे
जोगी मैं और गंगा है ये इश्क़ रे

माथे से लगा लूँ हाथ, छू के मैं पैर तेरे
हो रख लूँ मैं तन पे ज़ख्म, बना सारे बैर तेरे
रुकणा नी तू, हुण रुसना नी मैं
तेरा नी रहा, ना खुद दा वी मैं
दुनिया तू है मेरी
पर न आना अब न आना
मैं नीं आना शहर तेरे

जो फेरे संग लागे, रखते वो हमको जला के
वो वादे झूठे वादे, ले जा तू कसमें लगा के
रग रग में मलंगा है ये इश्क़ रे
क्यू लहू में ही रंगा है ये इश्क़ रे
हो बदरंग में.. 

तू मेरी सारी यादें, पानी में आज बहा दे
ये तेरी भीगी आँखें, रख लू लबों से लगा के
मैं समंदर, परिंदा है ये इश्क रे
मन मातम और जिंदा है ये इश्क़ रे
हो बदरंग में ...

तो आइए सुनते हैं गिटार आधारित इस शब्द प्रधान धुन को अरिजीत की आवाज़ में


वार्षिक संगीतमाला 2023 में मेरी पसंद के पच्चीस गीत
  1. वो तेरे मेरे इश्क़ का
  2. तुम क्या मिले
  3. पल ये सुलझे सुलझे उलझें हैं क्यूँ
  4. कि देखो ना बादल..नहीं जी नहीं
  5. आ जा रे आ बरखा रे
  6. बोलो भी बोलो ना
  7. रुआँ रुआँ खिलने लगी है ज़मीं
  8. नौका डूबी रे
  9. मुक्ति दो मुक्ति दो माटी से माटी को
  10. कल रात आया मेरे घर एक चोर
  11. वे कमलेया
  12. उड़े उड़नखटोले नयनों के तेरे
  13. पहले भी मैं तुमसे मिला हूँ
  14. कुछ देर के लिए रह जाओ ना
  15. आधा तेरा इश्क़ आधा मेरा..सतरंगा
  16. बाबूजी भोले भाले
  17. तू है तो मुझे और क्या चाहिए
  18. कैसी कहानी ज़िंदगी?
  19. तेरे वास्ते फ़लक से मैं चाँद लाऊँगा
  20. ओ माही ओ माही
  21. ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
  22. मैं परवाना तेरा नाम बताना
  23. चल उड़ चल सुगना गउवाँ के ओर
  24. दिल झूम झूम जाए
  25. कि रब्बा जाणदा

    रविवार, फ़रवरी 21, 2016

    वार्षिक संगीतमाला 2015 पायदान # 4 : मोहे रंग दो लाल Mohe Rang Do Laal....

    आजकल हिंदी फिल्मों  में एक चलन सा है कि फिल्म में कोई शास्त्रीय गीत या ग़ज़ल की बात हो तो निर्माता निर्देशक बिना उसे सुने पहले ही नकार देते हैं कि भाई कुछ हल्का फुल्का झूमता झुमाता हो तो सुनें ये तो जनता से नहीं झेला जाएगा। वैसे भी ज्यादातर फिल्मों की कहानियाँ ऐसी होती भी नहीं कि भारतीय संगीत की इन अनमोल धरोहरों को फिल्म में उचित स्थान मिल पाए। 

    पर ऐसे भी निर्माता निर्देशक हैं जो जुनूनी होते हैं जिन्हें जनता से ज्यादा अपनी सोच पर, अपनी कहानी पर विश्वास होता है और वो संगीत की सभी विधाओं को अपनी फिल्म में जरूरत के हिसाब से सम्मिलित करने में ज़रा भी नहीं हिचकिचाते। संजय लीला भंसाली एक ऐसे ही निर्देशक व संगीतकार हैं। फिल्मांकन तो उनका   जबरदस्त होता ही है, संगीतकार का किरदार निभाते हुए फिल्म के गीत संगीत पर भी उनकी गहरी पकड़ रहती है। यही वज़ह है कि विविधताओं से परिपूर्ण बाजीराव मस्तानी का पूरा एलबम साल 2015 के सर्वश्रेष्ठ एलबम कहलाने की काबिलियत रखता है। 


    वार्षिक संगीतमाला की चौथी पायदान पर जो गीत शोभा बढ़ा रहा है उसमें शास्त्रीयता की झनकार भी है और मन को गुदगुदाती एक चुहल भी! इस गीत को लिखा है गीतकार जोड़ी सिद्धार्थ गरिमा ने और इसे अपनी आवाज़ से सँवारा है श्रेया घोषाल व बिरजू महाराज ने। शास्त्रीय संगीत के जानकार इस गीत को कई रागों का मिश्रण बताते हैं।

    चिड़ियों की चहचहाहट, गाता मयूर , शहनाई की मधुर तान, घुँघरुओं की पास आती आवाज़ और मुखड़े के पहले सितार की सरगम। कितना कुछ सँजो लाएँ हैं संजय लीला भंसाली मुखड़े के पहले के इस प्रील्यूड में जो राग मांड पर आधारित है। गीत का मुखड़ा जहाँ राग पुरिया धनश्री पर बना है वहीं अंतरे राग विहाग पर। पर ये श्रेया की सधी हुई मधुर आवाज़ का कमाल है कि इस कठिन गीत के उतार चढ़ावों को वो आसानी से निभा जाती हैं।  इंटरल्यूड्स में बाँसुरी की मधुर तान व  बिरजू महाराज के बोलों के साथ घुँघरु, सरोद व तबले की जुगलबंदी सुनते ही बनती है।

    देवदास में पहला मौका देने वाले संजय सर के बारे में श्रेया कहती हैं कि वो गानों के बारे ज्यादा कुछ नहीं बताते। हाँ पर वो लता जी के आवाज़ के इतने बड़े शैदाई हैं कि ये जरूर कहते हैं कि अगर लता जी इसे गाती तो कैसे गातीं। पर बाजीराव के गीत अपने आप में कहानी से इतने घुले मिले थे कि मुझे उनसे ज्यादा कुछ पूछने की जरूरत ही नहीं पड़ी।



    इस गीत को लिखा है सिद्धार्थ गरिमा की जोड़ी ने जिनसे आपकी पहली मुलाकात मैं भंसाली साहब की पिछली फिल्म गोलियों की रासलीला राम लीला के गीतों में  करा चुका हूँ। सिद्धार्थ पहले हैदराबाद में विज्ञापन जगत से जुड़े थे और राजस्थान की गरिमा टीवी में शो का निर्माण करती थीं। फिर दोनों ही मुंबई की रेडियो मिर्ची में आ गए पर यहाँ भी उनके किरदार अलग थे यानि एक निर्माता और दूसरा लेखक का । पहली बार साझा लेखन का काम उन्होंने रियालिटी शोज को लिखने में किया। फिर संजय लीला भंसाली ने राम लीला के लिए उन्हें पटकथा लेखक व गीतकार की दोहरी जिम्मेदारी सौंपी जो वो बाजीराव मस्तानी में भी निभा रहे हैं। सिद्धार्थ गरिमा अपने इस गीत के बारे में कहते हैं..

    ये गीत फिल्म में तब आता है जब नायक व नायिका प्रेम की शुरुआत हो रही है। नायिका नायक को नंद के लाल यानि कृष्ण के नाम से संबोधित कर रही है क्यूँ कि वो उसी भगवान की पूजा करती है। आखिर कृष्ण प्रेम ,भक्ति व चुहल के प्रतीक जो हैं और वही वो अपने प्रिय में भी देख रही है। वो ऐसे गा रही है मानो प्रभु के लिए भजन हो पर वास्तव में उसका इशारा अपने प्रियतम की ओर है। इसीलिए वो अपने प्रिय से कह रही है मुझे लाल रंग में रंग दो क्यूँकि लाल है रंग प्रेम का, उन्माद का, भक्ति का..।

    यही वजह थी की गीतकार द्वय ने शब्दों के चयन में ब्रज भाषा के साथ  खड़ी बोली का मुलम्मा चढ़ाया ताकि हम और आप उसे अपने से जोड़ सकें।  नायिका की कलाई मरोड़ने, चूड़ी के टूटने और इन सब के बीच के उस क्षण चोरी चोरी से गले लगाने का ख्याल मन में गुदगुदी व सिहरन सी पैदा कर देता है और इसी ख्याल को अपने शब्दों के माध्यम से सिद्धार्थ गरिमा  गीत के अंत तक बरक़रार रखते हैं। तो आइए शास्त्रीयता की चादर ओढ़े इस बेहद रूमानी गीत का आनंद लें आज की शाम..

    मोहे रंग दो लाल, मोहे रंग दो लाल
    नंद के लाल लाल
    छेड़ो नहीं बस रंग दो लाल
    मोहे रंग दो लाल

    देखूँ देखूँ तुझको मैं हो के निहाल
    देखूँ देखूँ तुझको मैं हो के निहाल
    छू लो कोरा मोरा काँच सा तन
    नैन भर क्या रहे निहार

    मोहे रंग दो लाल
    नंद के लाल लाल
    छेड़ो नहीं बस रंग दो लाल
    मोहे रंग दो लाल

    मरोड़ी कलाई मोरी
    मरोड़ी कलाई मोरी
    हाँ कलाई मोरी
    हाँ कलाई मरोड़ी.. कलाई मोरी
    चूड़ी चटकाई इतराई
    तो चोरी से गरवा लगाई

    हरी ये चुनरिया
    जो झटके से छीनी
    हरी ये चुनरिया
    जो झटके से छीनी

    मैं तो रंगी
    हरी हरि के रंग
    लाज से गुलाबी गाल

    मोहे रंग दो लाल
    नंद के लाल लाल
    छेड़ो नहीं बस रंग दो लाल
    मोहे रंग दो लाल
    मोहे रंग दो लाल




    वार्षिक संगीतमाला 2015

    शनिवार, मार्च 08, 2014

    वार्षिक संगीतमाला 2013 रनर्स अप : तुझ संग बैर लगाया ऐसा, रहा ना मैं फिर अपने जैसा (Laal Ishq )

    वार्षिक संगीतमाला के पिछले दो महीनों का सफ़र पूरा करने के बाद  आज बारी है शिखर से बस एक पॉयदान दूर रहने वाले गीत की और दोस्तों यहाँ पर गीत है फिल्म गोलियों की रासलीला यानि रामलीला का। संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्मों के संगीत से मेरी हमेशा अपेक्षाएँ रही हैं। इसकी वज़ह है हम दिल दे चुके सनम, देवदास और साँवरिया का मधुर संगीत। पर जब वार्षिक संगीतमाला के गीतों के चयन के लिए मैंने रामलीला का गीत संगीत सुना तो मुझे निराशा ही हाथ लगी सिवाए इस एक गीत के। पिछले महीने जब ये फिल्म टीवी पर दिखाई गयी तो मेरी उत्सुकता सबसे ज्यादा इस गीत का फिल्मांकन देखने की थी। भगवान जाने देश के अग्रणी समाचार पत्रों ने क्या सोचकर इस फिल्म को पाँच स्टार से नवाज़ा था। गीत का इंतज़ार करते करते मुझे पूरी फिल्म झेलनी पड़ी क्यूँकि पूरा  गीत फिल्म में ना होकर उसकी credits के साथ आया। 


    फिल्म चाहे जैसी हो दूसरी पॉयदान के इस गीत को बंगाल के मुर्शीदाबाद से ताल्लुक रखने वाले अरिजित सिंह ने जिस भावप्रवणता से गाया है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। मुखड़े के पहले का उनका आलाप और फिर पीछे से उभरता कोरस आपका ध्यान खींच ही रहा होता है कि अरिजित की लहराती सी आवाज़ आपके दिल का दामन यूँ पकड़ती है कि गीत सुनने के घंटों बाद भी आप उसकी गिरफ़्त से मुक्त होना नहीं चाहते।

    मेरे लिए ये आश्चर्य की बात थी कि इस फिल्म में संजय लीला भंसाली ने संगीत निर्देशन की कमान भी खुद ही सँभाली है। संजय ने  पूरे गीत में ताल वाद्यों के साथ  मजीरे का इस्तेमाल किया है। साथ ही अंतरों के बीच गूँजती शहनाई भी कानों को सुकून देती है। संजय कहते हैं कि गुजारिश के गीतों को संगीतबद्ध करने के बाद मुझे ऐसा लगा कि एक निर्देशक से ज्यादा कौन समझ सकता है कि पटकथा को किस तरह के संगीत की जरूरत है। मैं ऐसा संगीत रचने की कोशिश करता हूँ  जिसे मैं या मेरे साथ काम करने वाले गुनगुना सकें..गा सकें।

    वार्षिक संगीतमाला में शामिल पिछले कुछ गीतों की तरह इस गीत के गीतकार द्वय भी फिल्म के पटकथा लेखक हैं। सिद्धार्थ और गरिमा की इस जोड़ी के लिए ये पहला ऐसा मौका था।

    वैसे इस फिल्म के गीतों को लिखने और संजय के साथ काम करने का उनका अनुभव कैसा रहा ये जानना भी आपके लिए दिलचस्प रहेगा..संजय के साथ गीत संगीत को लेकर होने वाली तकरारों  के बारे में वे कहते हैं
    "संगीत और बोल, सितार और तबले की तरह हैं। जुगलबंदी तो बनती है। कोई बोल सुनाने के बाद संजय सर की पहली प्रतिक्रिया एक चुप्पी होती थी। हम लोग उनसे पूछते थे सर वो अंतरा आप को कैसा लगा? उनका जवाब होता वो अंतरा नहीं संतरा था। और कुछ ही दिनों बाद संजय सर उस संतरे पर अपनी शानदार धुन बना देते। गीत के बोलों पर उनकी सामान्य सी प्रतिक्रिया कुछ यूँ होती थी तुम कितने cheap हो सालों !"
    सिद्धार्थ गरिमा ने इश्क़ को इस गीत में लाल, मलाल, ऐब और बैर जैसे विशेषणों से जोड़ा है जो फिल्म की कथा के अनुरूप है। इश्क़  में मन के हालात को वो बखूबी बयाँ करते हैं जब वो लिखते हैं तुझ संग बैर लगाया ऐसा..रहा ना मैं फिर अपने जैसा। अब इस बैरी इश्क़ का खुमार ऐसा है कि दिल कह रहा है कि ये काली रात जकड़ लूँ ...ये ठंडा चाँद पकड़ लूँ आप मेरे साथ ये कोशिश करेंगे ना ?

    ये लाल इश्क़, ये मलाल इश्क़
    यह ऐब इश्क़, ये बैर इश्क़
    तुझ संग बैर लगाया ऐसा
    तुझ संग बैर लगाया ऐसा

    रहा ना मैं फिर अपने जैसा
    हो.. रहा ना मैं फिर अपने जैसा
    मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
    मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
    मेरा नाम, तेरा नाम
    मेरा नाम इश्क़
    ये लाल इश्क़, ये मलाल इश्क़
    यह ऐब इश्क़, ये बैर इश्क़

    अपना नाम बदल दूँ.. (बदल दूँ)
    या तेरा नाम छुपा लूँ (छुपा लूँ)
    या छोड़ के सारी याद मैं बैराग उठा लूँ
    बस एक रहे मेरा काम इश्क़
    मेरा काम इश्क़, मेरा काम इश्क़
    मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
    मेरा नाम, तेरा नाम...

    ये काली रात जकड लूँ
    ये ठंडा चाँद पकड़ लूँ
    ओ.. ये काली रात जकड लूँ
    ये ठंडा चाँद पकड़ लूँ
    दिन रात के अँधेरी भेद का
    रुख मोड के मैं रख दूँ
    तुझ संग बैर लगाया ऐसा
    रहा ना मैं फिर अपने जैसा
    हो.. रहा ना मैं फिर अपने जैसा
    मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
    मेरा नाम इश्क़, तेरा नाम इश्क़
    मेरा नाम, तेरा नाम...



     

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