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रविवार, नवंबर 23, 2025

पुस्तक चर्चा : चांदपुर की चंदा, अतुल कुमार राय

चांदपुर की चंदा अशिक्षा, गरीबी व लाचारी में पनपते एक निश्चल प्रेम की कहानी है जो साथ ही साथ ग्रामीण परिवेश में बदहाल शिक्षा प्रणाली, पुरुष प्रधान समाज में बच्चियों की चिंतनीय स्थिति, असीमित भ्रष्टाचार और समाज में होते नैतिक मूल्यों के पतन का खाका खींचती है। उपन्यास की कथा बलिया जिले के चांदपुर गांव के इर्द गिर्द घूमती है। यूं तो मेरा ददिहाल बलिया रहा है पर वहां जीवन का एक बेहद छोटा सा हिस्सा ही बीता है। ये जरूर है कि वहां की भाषा और बातचीत के लहजे से वाकिफ हूं और इतना विश्वास से कह सकता हूं कि लेखक अतुल कुमार राय ने उसे बखूबी पकड़ा है। 



अतुल का ये पहला उपन्यास है जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी द्वारा हिंदी भाषा की कृतियों के लिए 2023 युवा पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। एक तबला वादक से फेसबुक पर उनके विभिन्न विषयों पर सतत लेखन का मैं साक्षी रहा हूं। आज वो मुंबई की फिल्मी दुनिया में बतौर पटकथा लेखक और गीतकार का किरदार अदा करने के लिए अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

इस उपन्यास में नायक और नायिका समेत तमाम किरदार हैं जो इस प्रेम कथा के इर्द गिर्द के समाज को प्रतिबिंबित करते हैं। 

निश्चय ही गांव कस्बों से निकले युवाओं को ये प्रेम कथा कभी गुदगुदाएगी तो कभी अश्रु विगलित भी करेगी। उस उम्र संधि से आगे निकल गए लोगों के लिए पूरी किताब तो नहीं पर उसके कुछ अंश अवश्य प्रभावित करेंगे। यूं तो उन सारे प्रसंगों का यहां उल्लेख नहीं कर पाऊंगा, पर कुछ का जिक्र करना बनता है। जैसे कि लेखक द्वारा लिया गया चांदपुर गांव का ये व्यंग्यात्मक परिचय जो आज की हिंदी पट्टी के गांवों के तथाकथित विकास की कलई खोलता है।

"यहाँ से गिनकर दो मिनट चलने पर एक प्राइमरी और एक मिडिल स्कूल भी बना है। जिसकी दीवारों पर गिनती, पहाड़ा के अलावा ‘सब पढ़ें-सब बढ़ें’ का बोर्ड लिखा तो है, लेकिन कभी-कभी बच्चों से ज्यादा अध्यापक आ जाते हैं, तो कभी समन्वय और सामंजस्य जैसे शब्दों की बेइज्जती करते हुए एक ही मास्टर साहेब स्कूल के सभी बच्चों को पढ़ा देते हैं। 

स्कूल के ठीक आगे पंचायत भवन है, जिसके दरवाजे में लटक रहे ताले की किस्मत और चाँदपुर की किस्मत में कभी खुलना नहीं लिखा है। मालूम नहीं कब ग्राम सभा की आखिरी बैठक हुई थी लेकिन पंचायत घर के बरामदे में साँड़, गाय, बैल खेत चरने के बाद सुस्ताते हुए मुड़ी हिला-हिलाकर गहन पंचायत करते रहते हैं और कुछ देर बाद पंचायत भवन में ही नहीं गाँव की किस्मत पर गोबर करके चले जाते हैं। 

हाँ, गाँव के उत्तर एक निर्माणाधीन अस्पताल भी है। जो लगभग दो साल से बीमार पड़ा है। उसकी दीवारों का कुल जमा इतना प्रयोग है कि उस पर गाँव की महिलाओं द्वारा गोबर आसानी से पाथा जा सकता है।"

उपन्यास में मंटू द्वारा चंदा को लिखा गया प्रेम पत्र अब इंटरनेट पर वायरल हो गया है। प्रेम पत्र तो ख़ैर लाजवाब है ही। इस चिट्ठी के पढ़ कर हंसते हंसते पेट फूल जाएगा अगर आपका भोजपुरी का ठीक ठाक ज्ञान हो तो। लेखक का मुहावरे के रूप में यह कहना कि मोहब्बत में अखियां आन्हर और आदमी वानर हो जाता है दिल जीत ले जाता है।

"मेरी प्यारी चंदा तुमको याद है तुम पिछले साल पियरका सूट पहनकर शिव जी के मंदिर में दीया बारने आई थी। ए करेजा, जो दीया मंदिर में जलाई थी, वो तो उसी दिन बुता गया। लेकिन जो दीया मेरे दिल में जर गया है न, वो आज तक भुकभुका रहा है। आज हम रोज तुम्हारे प्रेम के मंदिर में दीया जराते हैं, रोज मूड़ी पटककर अगरबत्ती बारते हैं। डीह बाबा, काली माई, पिपरा पर के बरम बाबा, से लेकर बउरहवा बाबा मंदिर तक जहाँ भी जाते हैं, हर जगह दिल में तीर बनाकर लिख आते हैं- ‘चाँदपुर की चंदा’। लेकिन ए पिंकी, हमको इहे बात समझ में नहीं आता कि हमारे पूजा-पाठ में कौन अइसन कमी है जो दिल की बजती घंटी तुमको सुनाई नहीं दे रही है?"

"तुमको का पता कि तुम्हारे एक ‘हाँ’ के चक्कर में आज हम तीन साल से इंटर में फेल हो रहे हैं। साला जेतना मेहनत लभ लेटर लिखने में किए हैं, ओतना मेहनत पढ़ाई में कर लिए होते तो अब तक यूपी में लेखपाल होकर खेतों की चकबंदी कर रहे होते। लेकिन का करोगी! मोहब्बत में अँखिया आन्हर और आदमी बानर हो जाता है न। हमारा भी हाल बानर का हाल हो गया है।"

प्रेम के बारे में लेखक के उद्गार पढ़कर आपको लगेगा कि वो आपके मन की बात ही कह रहे हों मसलन

“आज पहली बार पता चला कि जीवन में प्रेम हो तो बाढ़ आँधी-तूफान में भी खुश रहा जा सकता है। और प्रेम न हो तो सावन की सुहानी बौछार भी जेठ की धूप के समान है।”

या फिर

"जहाँ शरीर का आकर्षण खत्म होता है वहाँ प्रेम का सौंदर्य शुरू होता है। फिर प्रेमी करीब रहे या दूर रहे, वो मिले या बिछड़ जाए। बिना इसकी परवाह किए वहाँ प्रेम किया जा रहा होता है।"

और हां अतुल, नायिका के माध्यम से आपने महादेवी वर्मा की बेहतरीन कविता जाग तुझको दूर जाना की याद दिलवा दी इसके लिए पुनः धन्यवाद। उपन्यास में इस कविता का उल्लेख बार बार होता है और वो नायिका के मन में विकट परिस्थितियों में भी आशा की एक किरण जगाती है जिसके सहारे वो जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग अंततः ढूंढ ही लेती है। अच्छा साहित्य चाहे किस काल खंड में रचा गया हो उसे समाज या व्यक्ति विशेष को उद्वेलित करने की क्षमता होती है ये भली भांति चंदा के चरित्र स्पष्ट हो जाता है। तो इस चर्चा का समापन महादेवी जी की उन्हीं पंक्तियों के साथ

बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!



बुधवार, नवंबर 16, 2022

क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा Qissa Qissa Lucknowa

क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा राजकमल द्वारा प्रकाशित एक ऐसी किताब हैं जो छोटे छोटे चुटीले क़िस्सों के माध्यम से से लखनऊ की तहज़ीब और संस्कृति के दर्शन कराती है। अगर आपका संबंध किसी भी तरह से लखनऊ शहर से रहा है या आप उर्दू जुबां की मुलायमियत के शैदाई हैं तो एक बार ये किताब जरूर पढ़नी चाहिए आपको। हिमांशु ने बड़ी मेहनत से लखनऊ के आवामी किस्से छांटें हैं इस किताब में। हिमांशु खुद भी एक बेहतरीन किस्सागो हैं और वो इन कथाओं को अपनी आवाज में जनता के सामने एक विशिष्ट अंदाज़ में अपने कार्यक्रमों में सुनाते भी रहे हैं। हालांकि मुझे अब तक उन्हें आमने-सामने सुनने का मौका नहीं मिल सका है। इस किताब की प्रस्तावना में हिमांशु लिखते हैं

ये क़िस्सागोई की किताब है। ये मेरे क़िस्से नहीं हैं, मेरे शहर के हैं। मैं फ़क़त क़िस्सागो हूँ। इन्हें सुनाने वाला। ज़बानी रिवायत में क़िस्सा सुनाने के अन्दाज़ को बड़ी अहमियत हासिल है। ये अन्दाज़ ही है जो पुराने क़िस्से को भी नई शान और दिलकशी अता करता है। क्योंकि ये अन्दाज़ हर सुनाने वाले का ‘अपना’ होता है। हो सकता है बहुत से लोगों ने ये क़िस्से पहले सुन रखे हों मगर मैं इन क़िस्सों को अपने अन्दाज़ में सुनाना चाहता था। अपने समय के लोगों को। ख़ासकर उन लोगों को, जिन्होंने ये क़िस्से पहले कभी नहीं सुने। ये उस लखनऊ के क़िस्से हैं जहाँ मैं पैदा हुआ, पला बढ़ा और रहता हूँ, और मैं इस लखनऊ को अपने अन्दाज़ में सबको दिखाना चाहता हूँ। क्योंकि ये मेरे लोगों के क़िस्से हैं। उन लोगों के, जिनके क़िस्से ‘लखनवी’ ब्रांड के क़िस्सों में अक्सर शामिल नहीं किए जाते। ये ‘लखनवी’ क़िस्से नहीं हैं, ये ‘लखनउवा’ क़िस्से हैं।




तकरीबन पौने दो सौ पन्नों की इस किताब के सारे किस्से एक जैसे नहीं हैं। कुछ तो बेहद दिलचस्प हैं, तो कुछ चलताऊ और कुछ थोड़े नीरस भी। इनमें वहां के लोगों की नफ़ासत, हाजिर जवाबी, फ़िक़राकशी, अन्दाज़ ए गुफ़्तगू और खुद्दारी की दास्तान बिखरी पड़ी हैं जो आपको रह रह कर गुदगुदाएंगी। पर इन सारे क़िस्सों में एक क़िस्सा मुझे अब हमेशा याद रहेगा। ये क़िस्सा कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला से जुड़ा है। बात 1938 की है जब लखनऊ में ऑल इंडिया रेडियो का स्टेशन खुला था पर वहां के उर्दू माहौल की वजह से निराला रेडियो में अपना कविता पाठ करने से कतराते थे। उस समय के नामी साहित्यकार पढ़ीस के कहने पर वे रेडियो पर अपना काव्य पाठ करने को तैयार हुए आगे क्या हुआ यह लेखक की जुबान में पढ़िए

रेडियो में विशुद्ध उर्दू पृष्ठभूमि के लोगों की भरमार थी जिनमें से बहुत सारे लोग हिन्दी लिखना-पढ़ना तो दूर रहा ठीक से हिन्दी बोलना भी नहीं जानते थे। तब रेडियो में शहज़ादे ‘रामचन्दर’ जलवा-अफ़रोज़ होते थे और राजा ‘दुशियंत’ ‘परकट’ होते थे। ‘परदीप’ से ‘परकाश’ मुंतशिर होता था।

निराला जी स्टेशन पर आए। उन्हें काव्य-पाठ करवाने की ज़िम्मेदारी अयाज़ साहब को मिली। निराला जी और अयाज़ साहब स्टूडियो में गए। बाहर ड्यूटी रूम में ड्यूटी ऑफिसर के अलावा स्टेशन डायरेक्टर मो. हसीब साहब ख़ुद बैठे थे। सब रेडियो पर निराला के ऐतिहासिक काव्यपाठ के साक्षी बनना चाहते थे। मगर निराला जी को स्टेशन तक लाने वाले पढ़ीस जी इस एहतमाम से दूर अपने काम में लगे हुए थे। आख़िर अयाज़ साहब की आवाज़ के साथ लाइव प्रसारण शुरू हुआ—अब आप हिन्दी में कविता-पाठ समाअत फ़रमाइए। कवी हैं—इसके बाद कुछ लडख़ड़ाते हुए बोले—“सूरियाकान्ता तिरपाठा निराली” क़ायदे से इसके तुरन्त बाद निराला जी का काव्यपाठ सुनाई देना था पर उसकी जगह सुनाई दी कुछ ‘हुच्च-हुच्च’ की आवाज़ें। और फिर सन्नाटा हो गया। किसी को कुछ समझ नहीं आया। हसीब साहब चिल्लाए—वाट इज़ दिस। ड्यूटी ऑफिसर हड़बड़ाहट में स्टूडियो की तरफ़ भागा। उसने शीशे से झाँककर जो स्टूडियो के अन्दर देखा तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने किसी तरह फिलर बजवाया और भाग के वापस पहुँचा हसीब साहब के पास। बोला—अयाज़ साहब! अयाज़ साहब! हसीब घबराकर स्टूडियो की तरफ़ भागे। झाँककर देखा तो भीमकाय निराला जी ने अयाज़ साहब की गर्दन अपने बाएँ हाथ के तिकोन में दबोच रखी थी। अयाज़ डर के मारे छटपटा भी नहीं पा रहे थे। निराला जी ग़ुस्से में तमतमा रहे थे, आँखें लाल-लाल थीं मगर जानते थे कि स्टूडियो में हैं इसलिए ख़ामोश थे। निराला जी के ग़ुस्से से सब वाक़िफ़ थे इसलिए किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही थी कि अयाज़ साहब को रेस्क्यू करवाए। आख़िर पढ़ीस को बुलवाया गया और उन्होंने अनुनय-विनय करके अयाज़ साहब को मुक्त करवाया। अब निराला जी का ग़ुस्सा पढ़ीस पर निकला। अवधी में बोले—तुमसे कहा रहय कि हमका रेडियो-फेडियो ना लयि चलउ। मुलु तुम न मान्यौ। ऊ गदहा हमका तिरपाठा निराली कहिस। पढ़ीस जी ने हाथ जोड़कर उनसे माफ़ी माँगी। निराला जी आख़िर शान्त हुए। पढ़ीस से बोले—अब हमका हियाँ से लइ चलौ...और इसके बाद बिना कुछ कहे वहाँ से चले आए।
इस किताब की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह नवाबी लखनऊ के ज़माने में आम लोगों के किस्सों को पाठक तक पहुंचाती है। किताब में प्रस्तुत किस्से इस बात की पुरज़ोर वकालत करते हैं कि लखनऊ की तहज़ीब के जो चर्चे किताबों में मिलते हैं उनका श्रेय सिर्फ लखनऊ के नवाबों को नहीं जाता बल्कि उसके सच्चे हक़दार वहां के हर वर्ग के लोग थे जिनके आचार व्यवहार ने लखनऊ को वह पहचान दिलाई। यही वजह है कि इस किताब में आप लखनऊ के रिक्शेवालों, नचनियों, गायकों, विक्रेताओं, खानसामों, फकीरों से लेकर नवाबों का जिक्र पाएंगे।
उस समय के माहौल को पढ़ने वाले के मन में बैठाने के लिए लेखक ने खालिस उर्दू का इस्तेमाल किया है जो वाज़िब भी है पर उर्दू के कठिन शब्दों का नीचे अर्थ न दिया जाना इस किताब की सबसे बड़ी कमजोरी है जो शायद आज के युवाओं को इसका पूरा लुत्फ़ उठाने में अवश्य बाधा उत्पन्न करेगी। आशा है कि किताब के अगले संस्करण इस बात पर ध्यान देंगे।


क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा ***

गुरुवार, सितंबर 15, 2022

नदी के द्वीप : अज्ञेय Nadi Ke Dweep

पिछले दो महीनों में मैंने पाँच किताबें पढ़ीं और उनमें सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ नदी के द्वीप से जिसे लिखा था अज्ञेय ने। निर्मल वर्मा की तरह अज्ञेय अपने क्लिष्ट लेखन के लिए जाने जाते हैं। इन लेखकों की किताबों को सरसरी निगाह से पढ़ जाने की हिमाकत आप नहीं कर सकते। उनके लिखे को मन में उतारने के लिए समय और मानसिक श्रम की जरूरत होती है। कई बार आप वैसी मनःस्थिति में नहीं रहते इसलिए उनसे कतराने की कोशिश करते हैं। शायद यही वज़ह है कि सैकड़ों पुस्तक पढ़ने के बाद मैं ये साहस कर पाया।

अज्ञेय का वास्तविक नाम सच्चिदानंद हीरालाल वात्सायन था। यूँ तो उन्होंने गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में काफी लेखन किया पर उनके लिखे दो उपन्यास शेखर एक जीवनी और नदी के द्वीप उनके गद्य लेखन की पहचान रहे। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले में जन्मे अज्ञेय भारत के विभिन्न प्रान्तों में रहे उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी हिस्सा लिया और जीवन के कई साल जेल में बिताए। ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अज्ञेय अपने लेखन में अपनी भाषा शैली और अपने पात्रों के सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण के लिए जाने जाते हैं।

नदी के द्वीप कमाल का उपन्यास है खासकर अपनी संरचना की दृष्टि से। ले दे के चार मुख्य पात्र जिनमें 3 तो एक प्रेम त्रिकोण का हिस्सा हैं और चौथा अपने कृत्यों से प्रेमी कम खलनायक ज्यादा महसूस होता है। उपन्यास के चारों मुख्य किरदार मध्यम वर्गीय पढ़े लिखे परिवेश से आते हैंखास बात ये है कि इन चारों के बीच का संवाद ज्यादातर पत्रों के माध्यम से चलता है। ज़ाहिर है इनके लिखे पत्र विद्वतापूर्ण है और कई बार दिल के तारों को छू लेते हैं। मसलन भुवन से जब गौरा अपने भविष्य के बारे में मार्गदर्शन चाहती है तो भुवन कितनी सुंदर बात लिख जाता है

"गौरा कोई किसी के जीवन का निर्देशन करे यह मैं शुरू से गलत मानता आया हूं, तुम जानती हो। दिशा-निर्देशन भीतर का आलोक ही कर सकता है; वही स्वाधीन नैतिक जीवन है, बाकी सब गुलामी है। दूसरे यही कर सकते हैं कि उस आलोक को अधिक द्युतिमान बनाने में भरसक सहायता दें। वही मैंने जब-तब करना चाहा है, और उस प्रयत्न में स्वयं भी आलोक पा सका हूं, यह मैं कही ही चुका। तुम्हारे भीतर स्वयं तीव्र संवेदना के साथ मानो एक बोध भी रहा है जो नीति का मूल है; तुम्हें मैं क्या निर्देश देता?"



कभी-कभी ये किरदार प्रत्यक्ष रूप से भी मिल लेते हैं। आपस में बौद्धिक बहसें करते हैं और इन बहसों के बीच अचानक ही गहरा कुछ निकल कर ऐसा आता है जिससे पाठक अज्ञेय की लेखनी से अभिभूत हो जाता है।

"फिर थोड़ा मौन रहा, दोनों सूनी रात को देखते रहे। लोग एक ही आकाश को, एक ही बादल को, एक ही टिमकते तारे को देखते हैं और उनके विचार बिल्कुल अलग-अलग लीकों पर चलते जाते हैं, पर ऐसा भी होता है कि वे लीकें समानांतर हों और कभी ऐसा भी होता है कि थोड़ी देर के लिए वे मिलकर एक हो जाएं; एक विचार, एक स्पंदन जिसमें सांझेपन की अनुभूति भी मिली हो। असंभव यह नहीं है, और यह भी आवश्यक नहीं है कि जब ऐसा हो तो उसे अचरज मानकर स्पष्ट किया ही जाए, प्रचारित किया ही जाए - यह भी हो सकता है कि वह स्पंदन फिर विभाजित हो जाए, विचार फिर समानांतर लीकें पकड़ लें।"

 

हम सब नदी के द्वीप हैं, द्वीप से द्वीप तक सेतु हैं। सेतु दोनों ओर से पैरों के नीचे रौंदा जाता है, फिर भी वह दोनों को मिलाता है एक करता है....!

 

" नीति से अलग विज्ञान बिना सवार का घोड़ा है, बिना चालक का इंजिन : वह विनाश ही कर सकता है। और संस्कृति से अलग विज्ञान केवल सुविधाओं और सहूलियतों का संचय है, और वह संचय भी एक को वंचित कर के दूसरे के हक में; और इस अम्बार के नीचे मानव की आत्मा कुचली जाती है, उसकी नैतिकता भी कुचली जाती है, वह एक सुविधावादी पशु हो जाता है…और यह केवल युद्ध की बात नहीं है, सुविधा पर आश्रित जो वाद आजकल चलते हैं वे भी वैज्ञानिक इसी अर्थ में हैं कि वे नीति-निरपेक्ष हैं : मानव का नहीं, मानव पशु का संगठन ही उन का इष्ट है। "

पर ये भी है कि पुस्तक के कुछ हिस्सों में किरदारों के व्याख्यान इतने गहरे और बोझिल हो जाते हैं कि उनकी एक एक पंक्ति पर दिमाग खपाने का दिल नहीं करता और उन हिस्सों को सरसरी निगाह से पढ़कर निकल जाना होता है बिना गहरे डूबे हुए। अज्ञेय पर पश्चिमी साहित्यकारों का अच्छा खासा प्रभाव रहा है। यही वज़ह है कि डी एच लारेंस व इलियट जैसे प्रख्यात अंग्रेजी कवियों की रचनाओं से पात्रों के माध्यम से पाठक रूबरू होता रहता है।

है तो यह एक प्रेम कथा ही और वो भी बिना किसी ज्यादा घुमाव या तेजी से बदलती घटनाओं के। कथा का कालखंड 80-90 साल पुराना है पर पर जिन व्यक्तित्वों को अज्ञेय ने गढ़ा है वह आज के चरित्रों से बहुत पुराने नहीं हैं। ऐसा इसलिए है कि अज्ञेय की दृष्टि तत्कालीन घटनाओं से ज्यादा व्यक्ति की आंतरिक चिंतन धारा और मानसिक उथल-पुथल पर ज्यादा है और आदमी तो अंदर से एक सदी में भी कहां बदला है?



इसलिए किताब के प्राक्कथन में कहा गया है कि उपन्यास में लेखक ने व्यक्ति के विकसित आत्म को निरूपित करने की सफल कोशिश की है। वह व्यक्ति जो विराट समाज का अंग होते हुए भी उसी समाज की तीव्रगामी धाराओं, भावनाओं और तरंगों के बीच अपने भीतर एक द्वीप की तरह लगातार बनता, बिगड़ता और फिर बनता रहता है। वेदना जिसे मांजती है, पीड़ा जिसे व्यस्क बनाती है और धीरे-धीरे द्रष्टा।

जो विशुद्ध हिंदी भाषा के प्रेमी हैं उन्हें अज्ञेय की लेखनी से सीखने को बहुत कुछ मिलेगा। मैंने तो इस किताब को पढ़ते हुए हिंदी के दर्जन भर ऐसे शब्द जाने जिनका इस्तेमाल मैं तो अब तक नहीं करता था। जो लोग आोशो के दर्शन से प्रभावित हैं उन्हें जानकर अच्छा लगेगा कि हिंदी की प्रिय पुस्तकों में उन्होंने सिर्फ नदी के द्वीप का नाम शामिल किया था।

क्योंकि इस 310 पन्नों के इस उपन्यास को हिंदी की एक क्लासिक किताब का दर्जा प्राप्त है इसलिए आप में से कईयों ने इसे पढ़ा होगा। मैं जानना चाहूंगा कि आपको भुवन, रेखा, गौरा और चंद्र माधव में किस किरदार ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया और क्यूं ?
मुझसे पूछेंगे तो गौरा का सहज व्यक्तित्व मेरे दिल के सबसे करीब रहा। शायद इसलिए कि प्रेम जिस स्वरुप में उसे मिला या नहीं मिला वह उसी में संतोष करती हुई अपने ध्येय को साध्य करने के लिए पूरी मेहनत से जुटी रही। प्रेम में आहत होने के बावजूद उसके प्रेमी के व्यक्तित्व को मलिन करने की चेष्टाएं, उसके विश्वास पर जरा भी असर नहीं करतीं और फिर उसका सहज हास्य बोध मन को तरंगित भी करता रहता है।



नदी के द्वीप : *** 
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मंगलवार, जुलाई 05, 2022

An Actor's Actor : संजीव कुमार की अधिकृत आत्मकथा

संजीव कुमार हमेशा से हिंदी फिल्म जगत के मेरे पसंदीदा अभिनेता रहे हैं। पत्रिकाओं में उन पर छपे आलेखों से उनके जीवन की थोड़ी बहुत झलकियाँ मिलती रहीं पर ऐसे शानदार अभिनेता पर किसी किताब का ना होना अखरता था। अभी हाल ही में मुझे पता चला कि हनीफ झावेरी और सुमंत बात्रा द्वारा पिछले साल ही ये किताब पेंगुइन द्वारा प्रकाशित की गयी है। हनीफ फिल्म पत्रकार तो हैं ही नाटककारों की संस्था IPTA से भी जुड़े रहे और उसी के माध्यम से संजीव कुमार से उनकी पहली मुलाकात भी हुई। किताब में उनके सहलेखक सुमंत बात्रा वैसे तो वित्तीय सलाहकार और वकील हैं पर संजीव कुमार के बहुत बड़े प्रशंसक भी।

संजीव कुमार को गुजरे दशकों हो गए इसलिए लेखक द्वय के लिए उनसे जुड़ी जानकारियाँ जुटाने का काम ज़रा मुश्किल था। इस काम में ज़रीवाला परिवार और संजीव के संगी साथियों ने हनीफ झावेरी की बड़ी मदद की। सुमंत किताब लिखने के दौरान बाद में जुड़े और उन्होंने बतौर फैन संजीव से जुड़ी जो जानकारियाँ सहेजी थीं वो किताब को अंतिम रूप देने में सहायक हुईं।


करीब दो सौ पन्नों की इस पूरी किताब को चार पाँच हिस्सों में बाँटा जा सकता है। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, स्कूल में अभिनय से उनके लगाव और फिर नाटकों में उनकी हिस्सेदारी से लेकर बी ग्रेड फिल्मों तक उनका सफ़र आरंभिक अध्यायों में समेटा गया है। जानकीदास को अपना सचिव बनाने के बाद हिंदी फिल्मों में किस तरह उन्होंने एक के बाद एक झंडे गाड़े इसकी तो गाथा है ही, साथ ही उन फिल्मों के बनने के दौरान हुए मनोरंजक वाकयों का भी जिक्र है। किताब उनकी फिल्मों के बाहर की ज़िदगी से रूबरू कराती हुई, बीमारी से लड़ते हुए उनके अंतिम दिनों तक ले जाती है।

संजीव का बचपन बड़े उतार-चढ़ाव के बीच बीता। गुजरात से ताल्लुक रखने वाले जरीवाला परिवार ने शुरुआत में व्यापार में अच्छी सफलता हासिल की पर पिता के असमय निधन से और अर्जित संपत्ति पर परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा हथियाने के प्रयास की वजह से उनकी मां शांताबेन को परिवार चलाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा।

इन्हीं संघर्षों के बीच उन्होंने नाटकों की दुनिया में कदम रखा। साथ ही फिल्मालय से अभिनय का प्रशिक्षण भी लिया। नाटकों में कमाल का अभिनय दिखाने के बावज़ूद उन्हें ढंग की फिल्में मिलने में पूरा दशक लग गया। 

गुलज़ार के साथ संजीव कुमार ने अपनी फिल्मी सफ़र के सबसे अहम किरदार निभाए

जो भी संजीव कुमार की अदाकारी को पसंद करता है वह निश्चय ही उनकी आवाज़ और संवाद को अपनी विशिष्ट शैली से बोलने का कायल होगा। क्या आप यकीन कर सकते हैं कि संजीव फिल्म उद्योग में आने के पहले खुद ही अपनी कमजोर आवाज़ के प्रति सशंकित थे? वे निरंतर अपनी संवाद अदायगी का अभ्यास करते। एक ही पंक्ति को तरह तरह से बोलते हुए आवाज़ को तीव्रता से मुलायमियत की ओर ले जाते और उसमें अलग-अलग भावनाओं का पुट भरते हुए बदलाव करते थे। उनकी फिल्मों में इस मेहनत का नतीजा स्पष्ट दिखता है।



किताब में असली आनंद तब आता है जब फिल्मों के इतर आप उनके व्यक्तित्व के उन पहलुओं को पढ़ते हैं जिनके बारे में आप उनके अभिनीत किरदारों से शायद ही अंदाज़ा लगा पाएँ। अपने सहकलाकारों की मदद और उनके आपसी झगड़े सुलझाने की उनकी प्रवृति, उनकी सादगी, सेट पर की उनकी भयंकर लेट लतीफी, सामिष भोजन से उनका अतिशय प्रेम, एक दो पेग ले लेने के बाद उनके चेहरे पर चिपकी प्यारी मुस्कुराहट.. कितना कुछ है इस किताब में जो बतौर व्यक्ति संजीव कुमार के और करीब ले जाता है।

संजीव कुमार के बारे में कहा जाता है कि वह हंसमुख इंसान थे। सेट पर हमेशा कई कई घंटे विलंब से आते पर आने के बाद इस तरह का व्यवहार करते जैसे कुछ हुआ ही ना हो सह कलाकारों के चेहरे पर चढ़ी त्योरियाँ उनकी प्यारी मुस्कुराहट से कुछ पल में ही गायब हो जाती थीं। किताब में उनके ज़िदादिल व्यक्तित्व के कई प्रसंग हैं।
शतरंज के खिलाड़ी में शबाना आज़मी से काम करने के दौरान पूछा गया कि उन्हें  कितने पैसे मिल रहे हैं? शबाना ने पलटकर कहा कि सत्यजीत रे की  फिल्म में काम करने के लिए अगर उन्हें अपने हाथ भी कटवाने पड़े तो वो कटवा लेंगी। पास खड़े संजीव कुमार ने झट से चुटकी ली कि उनके हाथ तो सिप्पी साहब ने शोले में पहले ही कटवा दिए थे इसलिए वह ऐसा नहीं कर पाएंगे।😀
त्रिशूल की शूटिंग में शशि कपूर को एक दिन जल्दी  निकलना था शशि की हड़बड़ी देख संजीव कुमार शर्ट और टाई के साथ लुंगी पहनकर बाहर निकले और कैमरामैन से कहा कि तुम ऊपर से हाफ शॉट लो ताकि लुंगी ना दिखे। वह अलग बात है कि शशि कपूर का हंसते-हंसते इतना बुरा हाल हो गया कि शॉट काफी देर के बाद पूरा हो पाया।😁
किताब का प्राक्कथन शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा लिखा गया है जो उनके पारिवारिक मित्र थे।  संजीव कुमार की तरह सेट पर लेट आने में उनका नाम भी हिंदी फिल्म उद्योग मे् स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। वे लिखते हैं कि खिलौना की शूटिंग के दौरान जब संजीव जी की इस आदत से निर्माता एल वी प्रसाद परेशान हो गए तो उन्होंने शत्रुघ्न सिन्हा से कहा कि तुम तो उसके दोस्त हो, तुम उसके घर जाकर उसे साथ लेते आया करो। शत्रु जब उनके घर पहुँचते तो शूटिंग के वक्त उन्हें चाय सिगरेट के साथ आराम करता हुआ पाते। शत्रु तब फिल्मों में नए नए थे। उनको तो मानो अपना गुरु ही मिल गया। नतीजन दोनों संग संग विलंब से आने लगे।

प्रसाद जब उन दोनों से सवाल करते तो वे कहते आज माहिम चर्च के पास दो टैक्सी टकरा गयीं तो कभी ये कि माहिम चर्च के पास बस दुर्घटना हो गयी। तंग आकर एल वी प्रसाद ने दोनों से कहा कि तुम लोग परिस्थिति नहीं बदल सकते कम से कम घटना का स्थान तो बदल दिया करो। 😂

संजीव कुमार खाने पीने के बेहद शौकीन थे। अक्सर रात बिरात दोस्तों के घर पहुंच जाते थे। उनके भोजन प्रेम के कई किस्से इस किताब में आपको मिल जाएँगे। एक तो ये रहा :)
एक बार मौसमी चटर्जी अपने पति के साथ घर से निकल ही रही थीं कि संजीव कुमार आ गए। उन्हें जाते देख बस इतना कहा निकल रही हो तो निकलो। बस अपनी कामवाली को कह दो कि कुछ नॉनवेज  बना दे। फिर वह बैठे, फिल्म के वीडियो देखे, खाए पिए और चलते बने। एक बार तो इतनी रात में आ गए कि मौसमी चटर्जी को कहना पड़ा कि आप सिर्फ खाने के लिए यहां आते हैं? अगर ऐसा है तो ड्राइवर को भेज दीजिए हम डिब्बा भिजवा देंगे। 😡
आज भी अंगूर की यादें होठों पर हँसी ले ही आती हैं।

जिन हसीनाओं को संजीव जी से निकटता बनानी होती थी वो उनको डिब्बे भिजवाया करती थीं। संजीव कुमार ने शादी क्यों नहीं की ये प्रश्न भी उनके चाहने वालों के मन में उठता रहा है। किताब में लेखकों ने इस प्रश्न का उत्तर देने की कोशिश की है। प्रेम तो संजीव कुमार ने कई तारिकाओं से किया पर बात कभी बन नहीं पाई। नूतन तो पहले से शादीशुदा थीं और हेमा संजीव व उनके परिवार की शादी के बाद काम ना करने वाली शर्त को मान नहीं पायीं। सुलक्षणा पंडित वाले प्रसंग को एकतरफा बता कर किताब में ज्यादा विस्तार नहीं दिया गया है जो थोड़ा अजीब लगता है क्यूँकि सत्तर के दशक में संजीव कुमार से जुड़ी ख़बरों में सबसे ज्यादा चर्चे उन दोनों के ही होते थे।। 

खानपान पर उनका कोई कंट्रोल नहीं था।  हृदय की बीमारी उनका खानदानी रोग था। यही वज़ह थी कि अपने पिता व भाईयों की तरह ही वो उम्र में पचास का आँकड़ा छुए बिना ही चल बसे। उन्हें इस बात का आभास था
एक बार तबस्सुम ने संजीव कुमार से साक्षात्कार के दौरान पूछा कि वह अपनी उम्र से बड़े किरदार हमेशा क्यों निभाते हैं? संजीव का जवाब था  कि किसी भविष्यवक्ता ने कहा है कि मैं ज्यादा दिन नहीं जिऊंगा और इसीलिए मैं उस उम्र को पर्दे पर ही जी लेना चाहता हूं।

अगर आप संजीव कुमार के प्रशंसक हैं और उनके व्यक्तित्व, उनके शुरुआती संघर्ष और अपने सहकलाकारों के साथ उनके संबंध के बारे में जानना चाहते हैं तो ये किताब निश्चय ही पठनीय है। ए के हंगल, अंजू महेंद्रू, हेमा, राजेश खन्ना, नूतन, शत्रुघ्न सिन्हा, मौसमी चटर्जी, दिलीप कुमार, शर्मीला टैगोर, सारिका, शबाना आज़मी से जुड़े तमाम रोचक किस्से किताब मैं मौज़ूद हैं  जिनमें कुछ का जिक्र मैंने ऊपर किया।

बतौर लेखक हनीफ और बात्रा कहानी कहने की कला में औसत ही कहे जाएँगे, खासकर उन हिस्सों में जहाँ परिवार से जुड़े लोगों के कथ्य प्रस्तुत किए गए हैं। पर संजीव कुमार पर किया गया उनका शोध और उनके साथियों के संस्मरण इस किताब को बेहद रुचिकर बनाते हैं। वे बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने एक ऐसे अभिनेता के जीवन को उसके चाहने वालों के सामने प्रस्तुत किया है जिसके बारे में किताब की शक़्ल में पहले कुछ नहीं लिखा गया।

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An Actor's Actor : *** 

बुधवार, जून 08, 2022

निठल्ले की डायरी : हरिशंकर परसाई

पहले जब भी कोई नयी पुस्तक पढ़ता था इस ब्लॉग पर उसकी विस्तृत चर्चा किया करता था। विगत कुछ सालों में ये काम बड़ा श्रमसाध्य लगने लगा था। नतीजा ये हुआ इधर जितनी भी किताबें पढ़ीं, (जिनमें कुछ मित्रों की भी किताबें थीं) उनका जिक्र ना कर सका। कल जब निठल्ले की डायरी को खत्म किया तो लगा कि अगर इसके बारे में भी नहीं लिखा तो बंधु बांधव कहीं मुझे ही निठल्ला ना घोषित कर दें इसीलिए इस आदत को बनाए रखने की फिर से कोशिश कर रहा हूँ।


व्यंग्य की ज्यादा किताबें तो नहीं पढीं पर जब भी इस विधा की बात होती है तो मुझे उर्दू की आखिरी किताब की याद आ जाती है। इब्ने इंशा की लिखी इस किताब को पढ़कर मुझे बेहद आनंद आया था। उसके पहले परसाई जी की ही सदाचार का तावीज़ खरीद कर रखी थी पर थोड़ा पढ़ कर वह रखी ही रह गई।

इसीलिए जब हरिशंकर परसाई जी की बेहद चर्चित पुस्तक निठल्ले की डायरी को पढ़ा तो बहुत कुछ इंशा के व्यंग्य बाणों का तीखा अंदाज़ याद आ गया। वैसे भी भारत और पाकिस्तान के राजनेताओं का मिज़ाज जन जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार और दोनों देशों के आर्थिक और सामाजिक मसले मिलते जुलते ही हैं।

अब देखिए परसाई जी ने यह किताब 1968 में लिखी थी पर उस में उठाए गए मसले आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और शायद आगे भी रहें क्योंकि वक्त के साथ ना तो नेताओं और नौकरशाहों का चाल चरित्र बदला है ना देश की जनता का। किताब को पढ़ने से ये लगता है कि दशकों से नेताओं को ये पता है कि जनता को कैसे भरमाना है और जनता तो मूर्ख बनने को तैयार ही बैठी है। नेताओं, धर्मात्माओं, नौकरशाहों, व्यापारियों, डॉक्टरों, शिक्षकों के साथ साथ परसाई आम जन के आचार व्यवहार को भी अपने व्यंग्य का निशाना बनाने से नहीं चूकते। 


राजकमल से प्रकाशित 140 पन्ने की इस किताब में अलग-अलग विषयों पर लिखे 25 चुटीले और धारदार व्यंग्यों का समावेश है। पूरी किताब पढ़ने के लिए दो या तीन सिटिंग पर्याप्त है। इसके दो कारण हैं। पहला ये कि लेखक की भाषा ऐसी है जो आम व्यक्ति के दिमाग पर बोझ नहीं बनती और दूसरा कि उनके द्वारा चुने गए रुचिकर प्रसंग पाठक को अपने आसपास की जिंदगी में सहज ही मिल जाते हैं और इसी  वजह से विषय वस्तु से तारतम्य बैठाना आसान हो जाता है।

मिसाल के तौर पर कुछ बानगी देखिए।  भारतीय विश्वविद्यालयों में शोध की स्थिति पर देखिए परसाई जी क्या तड़का लगा रहे हैं
डॉक्टर साहब बोले पहले रिसर्च का अर्थ समझ लो इसका अर्थ है फिर से खोजना यानी जो पहले ही खोजा जा चुका है उसे फिर से खोजना रिसर्च कहलाता है। जो हमारे ग्रंथों में है उसे तुम्हें फिर से खोजना है। भारत के विश्वविद्यालयों में जो प्रोफ़ेसर आज हमारे विरोधी हैं उनके ग्रंथों और निष्कर्षों को तुम्हें नहीं देखना है क्योंकि तब तुम्हारा काम रिसर्च ना होकर सर्च हो जाएगा। दूसरी बात यह है कि विश्वविद्यालय ज्ञान का विशाल कुंड है। इसमें जितना ज्ञान भर सकता है उतना भरा हुआ है। लबालब भरा है यह कुंड। इसमें अगर बाहर से और ज्ञान लाकर भरा जाएगा तो यह कुंड फूट जाएगा। तुम जानते हो घासा बांध टूटने से दिल्ली के आसपास कितना विनाश हुआ था। हर अध्यापक और हर छात्र का यह कर्तव्य है कि इस कुंड में बाहर से ज्ञान जल न जाने दे वरना बांध टूटेगा और विनाश फैले का ऐसे हर छेद पर उंगली रखे रहो जहां से ज्ञान भीतर घुस रहा हो।
आजकल रोज़ सच्चा देश प्रेम क्या है, इस पर बहस चलती रहती है। परसाई जी की एक कथा में जिक्र है कि कैसे एक व्यक्ति के मन में देश सेवा करने की ललक जागी और उसने अपने शहर के दो व्यापारियों के खिलाफ सुबूत के आधार पर कालाबाजारी करने का आरोप लगाया। नतीजा क्या हुआ। देख लीजिए
मैंने कहा जनाब यह बात झूठ है 500 वाले ने तो स्टॉक यहां वहां कर दिया है पर 5000 वाले का गोदाम भरा है। आप अभी चलकर जब्त कर सकते हैं। साहब ने कहा - "जब कुछ है ही नहीं तो जब्त क्या किया जाएगा"? मुझे तो राजधानी से भी खबर मिली है कि उसके पास कुछ नहीं है। यहां खबर जब राजधानी से आती है तब वही सच होती है। हमारी सब खबरें उससे कट जाती हैं। राजधानी की एक आंख हमारी लाख आंखों से तेज होती है। जब वह खुलती है हमारी चौंधियां जाती हैं।😁😁

अगले ही दिन मेरे पीछे सरकार की गुप्तचर विभाग का आदमी लग गया। मैं उसे पहचानता था। पूछा भाई मेरे पीछे क्यों वक्त बर्बाद कर रहे हो? उसने कहा आप पर नज़र रखने का हुक्म हुआ है। मैंने पूछा मगर मैंने ऐसा किया क्या ? उसने जवाब दिया सरकार को खबर मिली है कि आप राष्ट्र विरोधी काम करते हैं। मेरे मुंह से निकला राष्ट्र विरोधी! तो क्या वे लोग ही राष्ट्र हैं?
हम सबको अपनी प्राचीन संस्कृति पर गर्व है उसकी अपनी उपलब्धियों पर अभिमान है पर अगर हम उसी की दुहाई देकर नित्य हो रहे नए अनुसंधान पर आंखें मूंद लें तो क्या वह सही होगा? परसाई कुछ लोगों की ऐसी ही सोच पर व्यंग्य बाण चलाते हुए लिखते हैं

जो लोग टैंक भेदी तोपों की तारीफ करते हैं, वे भूल जाते हैं कि टैंक तो आज बने हैं, पर टैंक भेदी तोपें हमारे यहां त्रेता युग में बनती थीं। भाइयों, कल्पना कीजिए उस दृश्य की। राम सुग्रीव से कह रहे हैं कि मैं बालि को मारूंगा।  सुग्रीव संदेह प्रकट करता है। कहता है बालि महाबलशाली है मुझे विश्वास नहीं होता कि आप उसे मार सकेंगे। तब क्या होता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम धनुष उठाते हैं। बाण का संधान करते हैं और ताड़ के वृक्षों की एक कतार पर छोड़ देते हैं। बाण एक के बाद एक साथ ताड़ों को छेद कर निकल जाता है। सुग्रीव चकित है। वन के पशु-पक्षी खग-मृग और लता-वल्लरी चकित हैं। सज्जनों जो एक बाण से 7 ताड़ छेद डालते थे उनके पास मोटे से मोटे टैंक को छेड़ने की तोप क्या नहीं होगी? भूलिए मत हम विश्व के गुरु रहे और कोई हमें कुछ नहीं सिखा सकता।😀

जैसा कि व्यंग्य से जुड़ी किताबों में होता है परसाई जी के सारे आलेख एक जैसे मारक नहीं है। पर छः सात आलेखों को छोड़ दें तो बाकी में वे अपनी बात तरीके से कहने में सफल रहे हैं। कुल मिलाकर मैं तो यही कहूँगा कि ये किताब आप सबको पढ़नी चाहिए अगर ना पढ़ी हो। वैसे इस ब्लॉग पर मेरे द्वारा पढ़ी अन्य पुस्तकों का मेरी रेटिंग के साथ सिलेसिलेवार जिक्र यहाँ पर

निठल्ले की डायरी : *** 



रविवार, मई 13, 2018

पाजी नज़्में, गुलज़ार : ऐ तू मला खूप आवडतो Paaji Nazmein

पिछले कुछ वर्षों में गुलज़ार एक फिल्म के गीतकार के तौर पर कम और बतौर शायर ज्यादा क्रियाशील नज़र आए हैं। करीब साल भर पहले अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा भी था कि उनकी प्राथमिकताएँ बदल गयी हैं। उन्हें ऐसा महसूस होता है कि बतौर शायर उनके पास देने को बहुत कुछ है और उस हिसाब से उनके पास वक़्त कम है। यही वज़ह है कि बच्चों के लिए उनका लेखन, अनुवाद और नज़्मों की नई प्रस्तुतियाँ पाठकों को बारहा पढ़ने को मिल रही हैं।

अपनी नज़्मों की श्रंखला की नई पेशकश के तौर पर दिसंबर 2017 में राधाकृष्ण से उनकी एक किताब आई जिनका उन्होंने नाम रखा था पाजी नज़्में। वैसे जानना नहीं चाहेंगे आप कि ख़ुद गुलज़ार क्या कहते हैं इन नज़्मों के बारे में

कहते हैं, कीचड़ में पत्थर मारो 
तो अपने ही मुँह पर आता है।
मैने तो यही सोचकर मारा था, 
मगर कुछ छींटे दूसरॊं के मुँह पर भी जा पड़े!
कान पकड़ के माफी मांग ली।
ये सब 'करो और कान पकड़ लो' वाली नज़्में हैं।
पाजी इसलिए कि अकसर गुद्दी पर धप पड़ती है और 
'धत पाजी' की आवाज़ आती है।
हालाँकि मज़ा लो, तो इतनी पाज़ी भी नही है!



इस बार देश के राजनैतिक माहौल पर भी गुलज़ार की नज़र है। लंबे चौड़े लुभावने वादों की आड़ में मूलभूत सुविधाएँ ना दे पाने का तंज़ 'हाइटेक इलेक्शन 'और 'बहुत से मसले लेकर गया था ' में झलकता है। वहीं मंत्रालयों की अदला बदली पर उनका व्यंग्य 'कहा गया है कैबिनट के सब वजीर' में गुदगुदाता है। मोबाइल पर हमारी बढ़ती निर्भरता पर चुटकी लेते हुए वे कहते है कि बिना मोबाइल खाली हाथ नज़र आ जाए कोई तो ख़्वामख़्वाह ही जाकर हाथ मिलाने को जी करता है। पुरानी तहज़ीब के धीरे धीरे गायब होने और समाज में बढ़ते दिखावे पर उनकी चिंता हल्के फुल्के तरीके से कई जगह उभरती है। इस दृष्टि से मुझे उनकी नज़्म 'कितना प्रोग्राम्ड है दिल ' मन को एक guilt feeling से भर देती है। गुलज़ार अपनी इस नज़्म में लिखते हैं

कितना प्रोग्राम्ड है दिल
चोट लगती है तो कुल चार मिनट रोता है
दो मिनट हँसता है, जब बॉस सुनाता है लतीफ़ा कोई 
होंट खुलते हैं फ़कत तीन ही इंच,, खैर से मुस्काए अगर 
कोई मर जाए तो भर लेता है गहरी आहें 
और मौके की तलब हो तो गिरा देता है गिन के आँसू
दस मिनट बाद इसे भूख भी लग जाती है
कितना होशियार है कितना प्रोग्राम्ड है ये दिल

आप कहेंगे कि इतनी संजीदगी है नज़्मों में फिर पाजीपना कहाँ है? पाजीपना तो साहब इस संग्रह के हर दूसरे चौथे पन्ने पर बिखरा पड़ा है। अब वो गंजे की खोपड़ी पर बैठी मक्खी का सवाल हो या एयरपोर्ट पर समय बिताने के लिए उनका आजमाया जाने वाला नुस्खा। ऐसे कई  दृष्टांत हैं इस संकलन में। कागज पर उकेरी  इन बदमाशियों का असली लुत्फ़ आता है उनकी उस पुरानी नज़्म को पढ़कर जिसमें वो भगवान को भी लपेटे में लेने से परहेज़ नहीं करते। गुलज़ार बड़े भोलेपन से पूछते हैं चिपचिपाते दूध में नहाते भगवन से कि

जब धुआँ देता, लगाता पुजारी, घी जलाता है कई तरह के छोंके देकर 
इक ज़रा छींक ही दो तुम, तो यक़ीं आए सब देख रहे हो

अब गुलज़ार की नज़्में हैं तो चाँद तो रहेगा ही। ये अलग बात है कि आधा दर्जन नज़्मों में शामिल होते हुए भी इस संकलन में चाँद एक दूसरे ही रूप में नज़र आया है। यहाँ उसका अक्स रूमानी बिल्कुल नहीं है। चाँद तो पुस्तक के नाम के अनुरूप खुराफातों में उलझा हुआ है। कभी टीवी टॉवर पर चढ़ जाता है, कभी चुपके से नज़्मों की चोरी कर लेता है तो कभी  बुझने की भी हिमाकत कर लेता है। ये जरूर है कि साठ से ऊपर नज़्मों के इस संग्रह में उनकी नटखट लेखनी हर बार आपको मुस्कुराने पर मजबूर नहीं कर पाती और कुछ पन्नों पर दोबारा लौटने का मन भी नहीं होता। 

पर जब भी इस किताब में गुलज़ार इश्क़ की बात करते हैं वो अपनी उसी पुरानी लय में लौटते दिखते हैं जिसकी वज़ह से लाखों करोड़ों लोग उनके मुरीद हैं। गुलज़ार के पास मोहब्बत के महीन अहसासों को बिनने का हुनर है। अब मुझको इतने से काम पर रख लो में अपनी इसी काबिलियत को उन्होंने इतने प्यारे तरीके से नज़्म का जामा पहनाया है कि पढ़कर मन का रोम रोम पुलकित हो जाता है। प्रेम की चाशनी में डूबी इतनी शुद्ध भावनाएँ कहाँ दिखती हैं आजकल.. तो सुनिए रूमानियत में डूबी गुलज़ार की भावनाओं को अपनी आवाज़ में पकड़ने की मेरी एक कोशिश।

मुझको इतने से काम पे रख लो...
जब भी सीने पे झूलता लॉकेट 
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूँ उसको

जब भी आवेज़ा उलझे बालों में

मुस्कुराके बस इतना सा कह दो 
आह चुभता है ये अलग कर दो

जब ग़रारे में पाँव फँस जाए

या दुपट्टा किवाड़ में अटके
एक नज़र देख लो तो काफ़ी है
'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है
लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है
मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा


मुझको इतने से काम पे रख लो...


इसी तरह उनकी एक नज़्म डिक्लेरेशन में ये बता देने की जिद है कि भले मैं तुम्हें पा नही् सका, भले ही तुम्हारी हसरत को यूँ दिल में बनाए रखना मुनासिब नहीं... फिर भी इस गुनाह को करने में मुझे कोई शर्मिंदगी नहीं। एक सुबह जब इश्क़ हुआ था जैसी मोहब्बत में डूबी नज़्मों को पढ़ने के बाद  गुलज़ार से कहने को दिल करता है ऐ तू मला खूप आवडतो यानि आप मेरे को खूब पसंद हैं।


डिक्लेरेशन
मैं जब लौटा वतन अपने…
यहाँ कस्टम के काउंटर पर खड़े सरकारी अफ़सर ने
मेरा सामान जब खोला…
मेरे कपड़े टटोले, मुझसे पूछा भी,
“कोई शै ग़ैरमुल्की है?
जिसका लाना ग़ैरवाजिब हो?
‘बयाननामे’ पे लिख के दस्तख़त कर दो!

मैं सब कुछ ला नहीं सकता था तेरे मुल्क से लेकिन
मैं तेरी आरज़ू को रोक न पाया, चली आई
मुनासिब तो नहीं फिर भी…
‘बयाननामे’ पे तेरा नाम लिख के, कर दिये हैं दस्तख़त मैंने!


पुस्तक के बारे में

  • पुस्तक का नाम : पाजी नज़्में
  • प्रकाशक  : राधाकृष्ण प्रकाशन
  • पृष्ठ संख्या  : 85 
  • मूल्य : Rs 125

मंगलवार, नवंबर 17, 2015

शांताराम : एक विदेशी अपराधी की नज़र में सत्तर के दशक का मुंबई! Shantaram by Gregory David Roberts

ग्रेगरी डेविड राबर्ट्स की शांताराम वर्ष 2003 में प्रकाशित हुई थी। वो अलग बात है कि मैं  इस किताब को इसके पहली बार छपने के बारह साल बाद पढ़ पाया और वो भी इसलिए कि मेरे एक अभिन्न मित्र ने अपनी इस पसंदीदा किताब को मुझे भेंट किया था । 933 पृष्ठों की इस मोटी किताब को मैंने घर से बाहर छुट्टियों के दौरान ही थोड़ा थोड़ा पढ़ा। इसी वज़ह से इसे ख़त्म करने में छः महीने से ज्यादा का वक़्त लग गया।

ग्रेगरी डेविड राबर्ट्स की निजी कथा वैसे तो जगज़ाहिर है फिर भी जिन लोगों ने इस लोकप्रिय किताब और उसके लेखक के बारे में ना सुना हो उन्हें बता दूँ कि आस्ट्रेलिया से ताल्लुक रखने वाले राबर्ट्स का अपने परिवार से साथ हेरोइन की लत का शिकार होने की वज़ह से छूटा। बाद में वो हेरोइन की अपनी तलब  लोगों को डरा धमका कर की गई पैसे की उगाही से पूरा करने लगे। नतीजन वे गिरफ़्तार हुए पर एक फिल्मी हीरो की तरह 1980 में आस्ट्रेलिया की जेल से भाग कर मुंबई आ पहुँचे। अस्सी का दशक उनका मुंबई में गुजरा। मुंबई में एक ओर तो उनका कुछ समय झोपड़पट्टियों में रहते हुए बतौर एक चिकित्सक बीता तो दूसरी ओर माफिया के संपर्क में रहते हुए उन्होंने उसके लिए पासपोर्ट की जालसाजी और काले धन को वैध बनाने जैसे काम किए। 1990 में वे फैंकफर्ट में फिर पकड़े गए और छः साल के लिए फिर से आस्ट्रेलिया की जेल में क़ैद रहे। इसी काल में उन्होंने मुंबई के अपने अनुभवों को शांताराम की शक़्ल में ढालना शुरु किया। जेल से निकलने के बाद उन्होंने बतौर लेखक अपनी ज़िन्दगी बितानी शुरू की। अब वो मेलबॉर्न में रहते  हैं और बीच बीच में भारत आते जाते रहे हैं।

शांताराम को पढ़ने वालों के मन में हमेशा ये जिज्ञासा रही है कि पुस्तक का कितना भाग राबर्ट्स के निजी जीवन का हिस्सा है और कितनी उनकी कल्पना। राबर्ट्स ने अपने आख़िरी साक्षात्कार में इस बाबत प्रश्नों का जवाब देते हुए कहा था..
"इस किताब के बहुत सारे प्रसंग मेरे जीवन से ज्यों के त्यों लिए गए हैं जबकी बाकी मेरे द्वारा रची कथा है जिसे मैंने अपने अनुभवों से बुना है। मैं अपनी ज़िंदगी की घटनाओं के इर्द गिर्द दो से तीन उपन्यासों को लिखना चाहता था। ये घटनाएँ उन विषयों से संबंधित थीं जो मेरे दिल के करीब थीं और जिन्हें मैं अपने जीवन की सच्ची घटनाओं से जोड़कर विकसित करना चाहता था।
ये एक उपन्यास है कोई आत्मकथा नहीं। सारे चरित्रों और संवादों को मैंने गढ़ा है। ये मायने नहीं रखता कि उसमें से कितना मेरी ज़िदगी में सचमुच घटा। महत्त्वपूर्ण ये है कि वो हम सब व हमारे समाज के लिए सही था या नहीं। मुझे अच्छा लगता है जब लोग पूछते हैं कि कार्ला कैसी है या ये कि आपने उतने सालों बाद तक अपने संवाद याद कैसे रखे? मुझे ये सोचकर खुशी होती है कि मेरे इन काल्पनिक चरित्रों में लोगों को वास्तविकता झलकी।"
पाँच भागों में बँटी इस किताब का कैनवास काफी वृहद है। मुंबई के मैरीन ड्राइव के पास की बस्ती से शुरु होकर ये उपन्यास आपको अफ़गानिस्तान के युद्ध क्षेत्र तक ले जाता है। मुंबई में रह रहे अवैध बस्तियों के बाशिंदों,  कानून से भागते विदेशियों, माफिया सरगनाओं, छोटे बड़े अपराधियों, ज़िहादियों जैसे सैकड़ों चरित्रों से अटा पड़ा है ये उपन्यास।  झोपड़पट्टियों के रोजमर्रा के जीवन को लेखक ने करीब से देखा है और इतने आभाव व गरीबी में जीवन बिताने वाले लोगों की जीवटता और उनसे मिलने वाली आत्मीयता को उन्होंने अपने किरदारों के माध्यम से बखूबी उभारा है । 

किताब का एक बड़ा हिस्सा सरकार की नाक के नीचे मुंबई के माफिया के फलते फूलते कारोबार और उनके अंदर पनपने वाले पेशेवर अपराधियों की मानसिकता को चित्रित करता है। किताब में शारीरिक प्रताड़ना और व्यक्तिगत हिंसा का दिल दहलाने वाला वर्णन है जो लेखक के निजी अनुभवों की वज़ह से और सजीव हो उठा है। पर पढ़ते वक़्त किताब के ये हिस्से विचलित भी बहुत करते हैं। ऐसा इसलिए भी है कि एक आम मध्यमवर्गीय शायद ही ऐसे चरित्रों से अपनी ज़िदगी में रूबरू हो पाता है।


अब जहाँ हिंसा है तो प्रेम भी होगा। पर नायिका के रूप में कार्ला के प्रेम को समझ पाना पाठक क्या लेखक के रूप में लिन के किरदार के लिए भी मुश्किल है। कथानक में अपराध व  प्रेम के साथ अध्यात्म का भी पुट है जो लिन और  माफिया सरगना अब्दुल ख़ादेर खान के वार्तालाप में उभर कर सामने आता है। हम व्यक्तिगत जीवन में जो करते हैं उसे सही और गलत के तराजू में कैसे तौला जाए इस बारे में भी लेखक खान के माध्यम से कुछ रोचक तर्क हमारे सामने रखते हैं।

मैं ऐसा तो नहीं कह सकता कि इस किताब ने शुरु से अंत तक मुझे बाँधे रखा पर ये जरूर कहूँगा कि लेखक अपने कथ्य के बीच बीच में  किरदारों के माध्यम से ऐसे बुद्धिमत्ता पूर्ण व चुटीले संवाद सामने लाते हैं कि पाठक लाजवाब हुए बिना नहीं रह पाता। ये कथ्य कभी आपके चेहरे पर मुस्कुराहट की रेखा खींच देते हैं तो कभी उनकी सच्चाई आपको एक नए सिरे से सोचने पर मज़बूर कर देती है। यही इस किताब का सबसे मजबूत पक्ष है।  मिसाल के तौर पर कुछ बानगियाँ देखें.

  • You know the difference between news and gossip, don't you? News tells you what people did. Gossip tells you how much they enjoyed it.
  • Men reveal what they think when they look away, and what they feel when they hesitate. With women, it's the other way around.
  • Sometimes we love with nothing more than hope. Sometimes we cry with everything except tears. In the end that’s all there is: love and its duty, sorrow and its truth. In the end that’s all we have - to hold on tight until the dawn.
  • Virtue is concerned with what we do and honour is concerned with how we do it.
  • If fate doesn't make you laugh, you just don't get the joke.
  • When greed meets control, you get a black market.
  • A politician is someone who promises you a bridge, even when there is no river.
  • Mistakes are like bad loves, the more you learn from them, the more you wish they’d never happened.
  •  A dream is a place where a wish and a fear meet. When the wish and fear are exactly the same, we call the dream a nightmare.
  •  It is always a fool's mistake to be alone with someone you shouldn't have loved.
  • I don't know what frightens me more, the power that crushes us, or our endless ability to endure it.
  • Civilization, after all, is defined by what we forbid, more than what we permit.
  • Fate gives all of us three teachers, three friends, three enemies, and three great loves in our lives. But these twelve are always disguised, and we can never know which one is which until we’ve loved them, left them, or fought them.
  • Nothing ever fits the palm so perfectly, or feels so right, or inspires so much protective instinct as the hand of a child
  • Most loves are like that ... You heart starts to feel like an overcrowded lifeboat. You throw your pride out to keep it afloat, and your self-respect and independence. After a while, you start throwing people out - your friends, everyone you used to know. And it's still not enough. The lifeboat is still sinking, and you know it's going to take you down with it. I've seen that happen to a lot of girls here. That's why I'm sick of love.

पिछले ही महीने दस साल से भी ज्यादा अंतराल के बाद राबर्ट्स ने शांताराम के बाद की घटनाओं को एक sequel की तरह अपनी किताब The Mountain Shadow के रूप में प्रकाशित किया है। पर अगर ये किताब आपकी इच्छा सूची में है तो फिर आपको शांताराम से गुजरना होगा क्यूँकि नए उपन्यास में लिन, कार्ला, संजय व जीत जैसे किरदार नए चरित्रों से मिलकर कहानी को आगे बढ़ाते हैं। 

रविवार, जून 28, 2015

नीला स्कार्फ ... Neela Scarf by Anu Singh Choudhary

स्कूल के ज़माने तक जो कहानियाँ पढ़ीं सो पढ़ी पर उसके बाद कॉलेज में गुजारे वक़्त से लेकर आज तक कहानियों से ज्यादा उपन्यास पढ़ने के प्रति मेरा रुझान रहा है। तो जो अब तक डेढ़ दो सौ किताबें पढ़ी हैं उनमें कहानी संग्रह का हिस्सा दहाई से कम ही रहा होगा। । कई कहानी संग्रह खरीद कर बस आलमारियों की शोभा बढ़ा रहे हैं। मेरी इस प्रवृति की वजह शायद ये है कि मुझे हर पात्र के चरित्र को अंदर तक समझने का हठ उपन्यास के विस्तार में ही मिल पाता है


इसीलिए पिछले दिसंबर में जब अनु सिंह चौधरी की किताब नीला स्कार्फ मुझे मिली तो आदतन दो कहानियों के बाद पढ़ने का सिलसिला रुक ही गया। फिर फरवरी के आख़िरी हफ्ते में अनु जी का एक साक्षात्कार देखा तो उनके पात्रों पर हुई चर्चा ने किताब की ओर फिर ध्यान आकृष्ट किया। राँची से कोयम्बटूर आने जाने में जो पाँच छः घंटे यात्रा में बीते वो पुस्तक को पूरा खत्म करने के लिए पर्याप्त निकले।

अनु  के लेखन से मैं उनके ब्लॉग मैं घुमंतू से पूर्व परिचित था। पर बतौर कहानीकार उन्हें जानने का मेरा ये पहला अनुभव है। इस संग्रह की कुल दर्जन भर कहानियों में लगभग तीन चौथाई कहानियों में मुख्य किरदार के रूप में एक नारी चरित्र है। अच्छी बात ये है कि इन चरित्रों में एकरूपता नहीं है। उनकी नायिकाएँ समाज के अलग अलग वर्गों और उम्र के हर पड़ावों से आती हैं। इसी वजह से कथानक का परिदृश्य  तेजी से बदलता जाता है और पाठकों को पुस्तक से बाँध कर रखता है।

जहाँ बिसेसर बो की प्रेमिका और देखवकी की बोलचाल में ठेठ बिहारी परिवेश की झलक मिलती है वहीं रूममेट, लिव इन और प्लीज़ डू नॉट डिस्टर्ब में आप अपने आप को शहरी हिंग्लिश में बात करते चरित्रों के बीच  घिरा पाते हैं। पर अनु की खूबी है उनकी भाषा पात्र के हिसाब से अपना लहजा बदलती रहती है। देखवेकी की सुशीला चाची के इन बिहारी बोलों को ही पढ़ लीजिए। किस तरह बेटी की शादी तय होने की भड़ास लड़के व उसके परिवार पर निकाल रही हैं..


व्यक्तिगत रूप से हिंदी कथ्य में अंग्रेजी के बेजा इस्तेमाल का मैं विरोधी रहा हूँ और इस किताब में कहीं कहीं ऐसे प्रयोग खटकते हैं जहाँ चरित्रों के हिसाब से भी अंग्रेजी के बजाए हिंदी का शब्द लिया जा सकता था।

तो आइए बात करते हैं इस किताब में सम्मिलित कहानियों की। रूममेट छोटे शहरों से संघर्ष कर महानगरीय जिंदगी में पहचान बनाने वाली लड़कियों की कहानी है जो अधपके रिश्तों और अरमानों को मूर्त रूप देने में एक दूसरे का संबल बनती हैं।  नीला स्कार्फ और लिव इन में लेखिका शादी के पहले और बाद के बनते बिगड़ते रिश्तों की पड़ताल करती नज़र आती हैं। पर जहाँ नीला स्कार्फ का स्वर धीर गंभीर है वहीं लिव इन में आज के डिजिटल प्रेम को वे हल्के फुल्के पर रोचक अंदाज़ में चित्रित कर जाती हैं। थोपे गए रिश्ते के अनुरूप अपने आपको ढालती और अपनी इच्छाओं को दमित कर गृहस्थी की गाड़ी खींचती स्त्री की आंतरिक व्यथा का मार्मिक चित्रण उनकी कहानी मुक्ति में दिखता है। शादी के बाद घर और बच्चों की जिम्मेवारेयों के बीच ख़ुद को घुटता महसूस करती महिलाओं को  मर्ज जिंदगी इलाज ज़िंदगी में वे अपना कृत्रिम रंगीन संसार रचने को प्रेरित करती हैं।

पर इस संग्रह की सारी कहानियों मे मुझे बिसेसर बो की प्रेमिका, कुछ यूँ होना उसका और मुक्ति खास पसंद आयी पर वहीं सिगरेट का आखिरी कश और प्लीज डू नॉट डिस्टर्ब इस कथा संग्रह की मुझे दो कमजोर कड़ियाँ लगीं।

दरअसल बिसेसर बो का किरदार इस कहानी संग्रह का सबसे सशक्त किरदार है। अनु बिसेसर बो उर्फ चंपाकली का परिचय अपनी पुस्तक में कुछ यूँ देती हैं..


पर बिसेसर बो भले ही जमींदारों के घर में काम कर कर हाड़ मांस जलाती हो पर आत्मसम्मान की भावना  उसमें कूट कूट कर भरी है  तभी तो बड़े मालिक की गलत नीयत का शिकार बनने से पहले वो उनको  ऐसा करारा जवाब देती है कि उनके नीचे की जमीन खिसक जाती है।


बिसेसर बो की ये निर्भयता उसे उन सभी कुलीन पढ़ी लिखी महिलाओं से आगे खड़ा कर देती है जो थोपे गए समझौतों के बीच अपनी ज़िंदगी को घसीट रही हैं। इसीलिए किताब पढ़ लेने के बाद भी वो याद रह जाती है। कुछ यूँ होना उसका पढ़कर लगता है कि बतौर शिक्षक हम किसी छात्र को उसके प्रकट व्यवहार से ही उद्दंड या अनुशासनहीन की श्रेणी में नहीं रख सकते। छात्रों से बेहतर परिणाम के लिए पढ़ाई के आलावा उनके सामाजिक पारिवारिक परिवेश से जुड़ी समस्याओं का निराकरण भी उतना ही जरूरी है।

पाठक इस संग्रह की हर एक कहानी से पूरी तरह जुड़े ना जुड़े पर उसमें कहीं कुछ बातों को अपने दिल से निकलता पाता है। दूसरों में अपने अक्स को प्यार करने की बात हो या यात्रा में अपनी पुरानी यादों के सबसे करीब होने की ऐसी कई छोटी छोटी मन को छू जाती हैं।

कुल मिलाकर ये एक ऐसा कहानी संग्रह है जिसे पढ़ना निश्चय ही आपको रुचिकर लगेगा। इस पुस्तक का प्रकाशन हिंद युग्म ने किया है। पहले संस्करण की सफलता के बाद पुस्तक का दूसरा संस्करण शीघ्र ही बाजार में आ रहा है।  चलते चलते इस कथा संग्रह की कहानी लिव इन के कुछ अंशों से आपको रूबरू कराऊँगा जो आपके दिल को अवश्य गुदगुदाएँगे और लेखिका की सहज सरस लेखन शैली की ओर भी आपका ध्यान आकृष्ट करेंगे।

सोमवार, मार्च 16, 2015

बेअदब साँसें : राहुल वर्मा की त्रिवेणियाँ Beadab Saansein

उपन्यास, कहानी, कविता, ग़ज़ल, नज़्म इन सब से इतर गुलज़ार साहब ने अपनी लेखनी से त्रिवेणी जैसी नई विधा को विकसित किया। वैसे वे ख़ुद कहते हैं कि त्रिवेणी जैसा ही कुछ एक समय टाइम्स ग्रुप की साहित्यिक पत्रिका सारिका में सत्तर के दशक के आरंभ में छपा करता था। पर गुलज़ार के प्रयासों का ही परिणाम था कि पिछले डेढ़ दशक में त्रिवेणी उनकी किताब के माध्यम से सबसे पहले 2001 में आम लोगों के बीच पहुँची। 

ज़ाहिर है उनके चाहने वालों में भी इस विधा को अपनाने की चाहत बढ़ी। इंदौर में पले बढ़े राहुल वर्मा का भी  अहसास के साथ शब्दों के फ़न को बरतने वाली त्रिवेणी के प्रति आकर्षण बढ़ा और अगस्त 2013 में उनकी ये किताब गुलज़ार की किताब के बारह साल बाद बाज़ार में आई। राहुल वर्मा की ये किताब कैसी है ये बताने से पहले एक आम कविता प्रेमी पाठक का ये जान लेना जरूरी है कि आख़िर त्रिवेणी होती क्या है? बकौल गुलज़ार
"शुरू शुरू में तो जब यह फॉर्म बनाई थी, तो पता नहीं था यह किस संगम तक पहुँचेगी - त्रिवेणी नाम इसीलिए दिया था कि पहले दो मिसरे, गंगा-जमुना की तरह मिलते हैं और एक ख़्याल, एक शेर को मुकम्मल करते हैं लेकिन इन दो धाराओं के नीचे एक और नदी है - सरस्वती जो गुप्त है नज़र नहीं आती; त्रिवेणी का काम सरस्वती दिखाना है तीसरा मिसरा कहीं पहले दो मिसरों में गुप्त है, छुपा हुआ है ।"
दो मिसरे कह कर तीसरे में सत्य उद्घाटित करने की इस कला में महारत हासिल करना इतना सरल भी नहीं है। गुलज़ार की इन दो मशहूर त्रिवेणियों को गौर से देखिए

उड़ के जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलाती रही वह शाख़ फ़िज़ा में
अलविदा कहने को ? या पास बुलाने के लिए ?

सामने आए मेरे देखा मुझे बात भी की
मुस्कराए भी ,पुरानी किसी पहचान की खातिर
कल का अखबार था ,बस देख लिया रख भी दिया

आकाश में उड़ रहे पंछी और हिलती शाख मामूली से ख़याल लगते हैं पर उसमें जब तीसरी पंक्ति जुड़ती है तो दिल के अंदर एक टीस सी उठती है जो पहली दो पंक्तियों में छिपे भाव को मुकम्मल बना देती है। अब दूसरी त्रिवेणी को देखें किसी पुराने परिचित से हल्की सी मुस्कारहट के दो बोल बोल लेने भर से ही उस रिश्ते के अंदर की पीड़ा कहाँ उभर पाती अगर तीसरी पंक्ति में उसकी तुलना गुलज़ार कल के अख़बार से नहीं करते। 

अगर सहज भाषा में कहूँ तो त्रिवेणी एक चलचित्र की तरह है जो पहली दो पंक्तियों में कहानी को गढ़ती तो है पर फिल्म की सोच, उसकी परिपूर्णता तीसरी पंक्ति के माध्यम से उसके क्लाइमेक्स में व्यक्त करती है।

राहुल कोई पूर्णकालिक साहित्यकार नहीं हैं। वकालत जैसे व्यवसाय से जुड़े होने के बावज़ूद उनका कविता प्रेम उन्हें पिछले सोलह वर्षों से त्रिवेणियों की रचना में संलग्न किए हुए है। अपने त्रिवेणी प्रेम की शुरुआत कैसे हुई ये उन्होंने इसी विधा के ज़रिए व्यक्त करना चाहा है..

नज़्म और ग़ज़ल से इतर करूँ, ये उसने टोका था
मेरे लिए भी अब दहलीज़ उलाँघने का, एक मौक़ा था
त्रिवेणी कुछ इस तरह से मिली है मुझे

राहुल वर्मा की इस किताब में दो सौ के करीब त्रिवेणियाँ है।  इन दौ सौ त्रिवेणियों में अधिकांश प्रेम से जुड़ी भावनाओं से ओतप्रोत हैं पर इसके आलावा कई त्रिवेणियों में उन्होंने अपने स्कूल, शहर और ज़िदगी की मुश्किलातों का भी जिक्र किया है। पर मेरा मानना है त्रिवेणियों की प्रकृति के हिसाब से ये संख्या बहुत ज्यादा है।

राहुल किताब की प्रस्तावना में कहते हैं कि आज के इस मशीनी युग में जहाँ वक़्त की मारामारी है वहाँ पाठक तीन पंक्ति में ही भावनाओं की इस त्रिधारा में बह जाता है। पर इस बहाव की निरंतरता बनाए रखने के लिए जज़्बातों की गहराई से निकलते जिन तेज थपेड़ों की जरूरत पड़ती है उसकी कमी इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक को महसूस होती है।

जब आप उनकी इस किताब से गुजरते हैं तो बीच बीच में अहसासों की सरगर्मियाँ आपके दिल को झकझोरती जरूर हैं पर किताब के कुछ हिस्सों में भावनाओं की सरिता बिना किसी आवेग के शिथिलता से भी बहती जाती है। कई जगह शब्दों, विचारों और एक जगह तो पूरी त्रिवेणी का दोहराव खटकता है।  मुझे लगता है कि अगर इस किताब को लेखक अपनी पचास बेहतरीन त्रिवेणियों तक सीमित रखते तो पाठकों को इसका एक एक पन्ना बार बार उलटने की इच्छा होती।

राहुल वर्मा की इस किताब से मैंने अपनी कुछ पसंदीदा त्रिवेणियाँ चुनी हैं। इन त्रिवेणियों को पढ़ कर मुझे जो आनंद मिला वो अपनी आवाज़ के माध्यम से आप तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूँ...


 (1)
सहर आई थी कितनी शरमाई हुई
रतजगी शब की यादें लिए अलसाई हुई
रातभर चाँद साथ ही तो था मेरे

(2)
क़तरा क़तरा मिलती है, क़तराते हुए मिलती है
ज़िदगी अब हमपे तरस खाते हुए मिलती है
तुम्हारे साथ होने का बड़ा ही फ़र्क था शायद

 (3)
चीखें थमती नहीं, आवाज़ें आती रहती हैं
कानों में डाल दो उँगली या रूई के फाहे
मेरे माज़ी के पन्ने फड़फड़ाते रहते हैं

 (4)
मैं तेरे दम से ज़िदा था
मैं तेरे ग़म से ज़िंदा हूँ
मेरे जीने की वज़ह हरदम ही रहे हो तुम

(5)
कौन दे जाता है रोज़ इनकी जड़ों में पानी
कौन है जो इनको किसी भी सूरत मरने नहीं देता
जख़्म ये मेरे अब तक किसकी रसद से ज़िंदा हैं

(6)
फिर किसी दर्द की कराह बढ़ी
फिर किसी टीस का दम घुटता है
फिर आज मेरी ये कलम, उम्मीद से है

(7)
घेरे रहते हैं हर पल पुरानी यादों के हसीं मंज़र
जेहन में माज़ी के कई किस्से भी चलते रहते हैं
लोग तन्हाई में भी तनहा कहाँ रहते हैं..

(8)
नज़रे मिली हो और सामने आ जाए चिलमन
चेहरे का नूर आँखें मुसलसल नहीं पी पातीं
बादलों के बीच आ के धूप तुतलाती बहुत है

 (9)
वो कि जब अलविदा कहा था ना तुमने मुझे
ज़िदगी अब तलक उसी रात पर अटकी सी पड़ी है
अब तो बस कहने को ही रोज़ सुबह होती है

(10)
तेरी वहशत, तेरी उम्मीदें और तेरे ख़याल
तेरी हसरत, तेरी यादें और तेरे ख़्वाब
बड़ी मसरूफियत रहती है, इन दिनों मुझे

(11)
मुझको बस एक ही शामत है बहुत
देर करने की तुमको आदत है बहुत
ऐ ज़िदगी! कब से तेरी राह तक रहा हूँ मैं

 (12)
पहली आई थी,बिना मेरी मर्ज़ी के
आख़िरी भी,बिन बताये आ जायेगी
बड़ी बेअदब होती हैं,ये साँसें..

पर लेखक की हिम्मत की इस बात के लिए दाद जरूर देनी चाहिए कि जिस आकाश पर गुलज़ार ने त्रिवेणी को बैठा रखा है उस विधा को अपनी पहली किताब का विषय बनाते समय ज़रा भी हिचकिचाहट महसूस नहीं की, ये जानते हुए भी कि इन्हें गुलज़ार की त्रिवेणियों के स्तर से तौला जाएगा।

बहरहाल उन्होंने एक ज़मीं तो तैयार की ही है जिसे नई पीढ़ी के लेखक समय के साथ और पुख्ता बनाते जाएँगे। जिस तरह अदम गोंडवी व दुष्यन्त कुमार जैसे शायरों ने ग़ज़ल को इश्क़ की सीमाओं से बाहर निकाल कर उसका दायरा बढ़ाया है वैसा ही कुछ त्रिवेणियों में आगे देखने को मिलेगा ऐसी उम्मीद है।

पुस्तक के बारे में
प्रकाशक :  हिन्द युग्म, पृष्ठ संख्या :112, मूल्य Rs 150

मंगलवार, नवंबर 11, 2014

सारा आकाश : राजेंद्र यादव Sara Aakash by Rajendra Yadav

राजेंद्र यादव मेरे प्रिय लेखक कभी नहीं रहे। कॉलेज के दिनों में कई बार उनकी कहानियों से साबका पड़ा और वो मुझ पर कोई खास असर नहीं छोड़ पायीं। पिछली बार उन्हें मैंने तब पढ़ा, जब उन्होंने मन्नू भंडारी के साथ उपन्यास एक इंच मुस्कान संयुक्त रूप से लिखा था। उस उपन्यास को पढ़ते हुए भी मन्नू जे के हिस्से तो तेजी से निकल जाते थे पर राजेंद्र जी के अध्यायों पर पढ़ाई की गाड़ी किसी पैसैंजर ट्रेन की माफ़िक घिसटती चलती थी। पर इतना सब होते हुए भी मुझे उनकी लिखी मशहूर किताब सारा आकाश को पढ़ने की इच्छा थी़। हाल भी में अपने मित्रों की पसंदीदा सूची में इसका नाम देखकर ये इच्छा फिर जोर पकड़ने लगी। बाकी  काम आनलाइन बाजार ने कर दिया।



राजेंद्र जी ने ये किताब 1952 में लिखी थी यानि आज से करीब साठ साल पहले। वैसे उसके करीब 8 साल पहले वे इसी पुस्तक को प्रेत बोलते हैं के नाम से लिख चुके थे। सारा आकाश में प्रेत बोलते हैं कि भूमिका और अंत दोनों को बदल दिया गया। राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में पाठकों की जिज्ञासा को देखते हुए प्रेत बोलते हैं के वे अंश भी दिए गए हैं जिन्हें सारा आकाश में बदला गया। अगर दोनों अंतों की तुलना करूँ तो सारा आकाश का अंत मुझे ज्यादा बेहतर लगा। निम्नमध्यम वर्गीय समाज को जिसने करीब से देखा हो या उसके अंग रहे हो वे बड़ी सहजता से इस कथा से अपने को जोड़ पाएँगे।  

बकौल राजेंद्र यादव सारा आकाश एक निम्नमध्यवर्गीय युवक के अस्तित्व के संघर्ष की, आशाओं, महत्त्वाकांक्षाओं और आर्थिक सामाजिक, सांस्कारिक सीमाओं के बीच चलते द्वन्द्व, हारने थकने और कोई रास्ता निकालने की बेचैनी की कहानी है। पुस्तक की भूमिका में लेखक बताते हैं कि किशोर मन में गूँजती रामधारी सिंह 'दिनकर' की ये पंक्तियाँ उपन्यास के नामाकरण का स्रोत बनीं

सेनानी, करो प्रयाण अभय, भावी इतिहास तुम्हारा है
ये नखत अमा के बुझते हैं, सारा आकाश तुम्हारा है

इन्हीं पंक्तियों के संदर्भ में ये उपन्यास अपनी सार्थकता खोजता है और इसलिए राजेंद्र जी कहते हैं कि इस कहानी के ब्याज, इन पंक्तियों को पुनः विद्रोही कवि को लौटा रहा हूँ कि आज हमें इनका अर्थ भी चाहिए। राष्ट्रकवि दिनकर ने राजेंद्र जी की इस बात का क्या जवाब दिया वो भी इस पुस्तक में है। सारा आकाश पर बाद में बासु चटर्जी द्वारा एक फिल्म भी बनाई गई जो आशा के विपरीत सफल रही। इस पुस्तक के भी कई संस्करण छपे। आठ लाख से ऊपर प्रतियाँ बिकीं।

बहरहाल लौटते हैं इस उपन्यास पर। इंटर की परीक्षा के ठीक पहले कथा के नायक समर के अनिच्छा से किए गए विवाह से उपन्यास की शुरुआत होती है। परीक्षा के तनाव के बीच आई इस नई मुसीबत को मानसिक रूप से झेलने में समर अपने आप को असमर्थ पाता है। माता पिता द्वारा लादे गए इस निर्णय का विरोध वो अपनी पलायनवादी रणनीति से करता है। ना वो अपनी पत्नी से कोई संबंध रखता है ना घर के अंदर घट रहे मसलों से। ज़ाहिर है ये परिस्थिति घर में आई नई बहू के लिए बेहद कठिन होती है पर प्रभा ना अपना धैर्य खोती है ना आत्मसंयम। पति पत्नी में बोलचाल ना होने का ये सिलसिला एक दिन टूटता है। 

दो सौ से ऊपर पृष्ठों की ये किताब पारिवारिक समस्याओं के चक्रव्यूह में उलझे समर और प्रभा की संघर्ष गाथा है। लेखक पुस्तक में संयुक्त परिवार की अवधारणा पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं। साथ ही शादी विवाह के आज के तौर तरीकों को पति पत्नी के बीच की मानसिक संवादहीनता का कारण मानते हैं।

निम्न मध्यम वर्गीय परिवार का खाका खींचते वक़्त लेखक ने उपन्यास में पुरुष और स्त्री पात्रों की मनोवृतियों को जिस तरह उभारा है उसका आकलन भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। आख़िर समर का प्रभा से साल भर ना बोलने का फैसला क्या इंगित करता है? समर जैसे पुरुष अपने दबंग पिता के सामने कितने निरीह क्यूँ ना हो पर स्त्री के सामने उनका अहंकार जागृत हो जाता है। ये घमंड उस परम्परागत  परिवेश से पनपता है जहाँ स्त्री को पुरुष से हमेशा नीचे समझा जाता है। इस निर्मूल अहंकार को स्त्रियों के खिलाफ़ हिंसा में तब्दील होने में देर नहीं लगती। पर ये प्रवृति पुरुषों तक सीमित है  ऐसा भी नहीं है। 

सत्ता हाथ में आते ही स्त्रियाँ भी नृशंसता की हदें पार कर जाती हैं और वो भी तब जब उन्होंने ख़ुद इसका दंश झेला हो। समर की माँ इसी तरह के चरित्र का एक रूप हैं। बहुओं के उत्प्रीड़न, बच्चों पर अपनी इच्छा को जबरदस्ती थोपने की प्रवृति से आज भी हमारा समाज मुक्त नहीं हो पाया है। 

आख़िर ऐसा क्यूँ है? पुराने ज़माने में लोग उतने पढ़े लिखे नहीं होते थे। पर शिक्षा का स्तर बढ़ने के बावज़ूद भी हमारी सोच का स्तर नहीं बढ़ा है। या यूँ कहें कि हम स्तर बढ़ाना नहीं चाहते। क्यूँकि वैसा करने से हमारी सहूलियत आड़े आती हैं। हमारी बरसों की जमाई पारिवारिक सत्ता छिन्न भिन्न होती नज़र आती है। सो हम रीति रिवाज़ो का सहारा लेने लगते हैं ताकि तार्किक प्रश्नों के जवाब में उनका आवरण ले सकें। 

पर आज के इस युग में नई पीढ़ी के लोग इतना तो कर सकते हैं कि दुनिया, समाज व परिवार के विचारों को आँख मूँद कर अनुसरण करने के बजाए इंसानियत के जज़्बे को ध्यान में रखकर अपना आचार व्यवहार विकसित कर सकें। अगर ऐसा वे नहीं करेंगे तो समर और प्रभा जैसी परिणति के वे भी शिकार होंगे। 

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