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बुधवार, अगस्त 05, 2009

आँखों को नम करता पंजाबी लोकगीत 'छल्ला' रब्बी की रुहानी आवाज़ में..

कुछ गीत ऍसे होते हैं जिनकी भावनाएँ भाषा की दीवारों को लाँघती किस तरह हमारे ज़हन में समा जाती हैं ये हमें पता ही नहीं लगता। बात पिछले दिसंबर की है मैं हर साल की तरह ही अपनी वार्षिक संगीतमालाओं के लिए साल के श्रेष्ठ २५ गीतों का चुनाव कर रहा था और तभी मैंने इस पंजाबी लोकगीत को पहली बार सुना और बिना शब्द के अर्थ जाने ही इसे सुन कर मन भारी हो गया। आखिर रब्बी शेरगिल जब गाते हैं तो उनकी आवाज़ और हमारे दिल के बीच शब्दों का ये पुल ना भी रहे तो भी फर्क नहीं पड़ता।
मैंने इस गीत को अपने प्रथम पाँच गीतों में डाल भी दिया पर बाद में इसे अपनी सूची से इसलिए हटाना पड़ा क्योंकि इस गीत के बोल और अर्थ मुझे तब उपलब्ध नहीं हो पाए थे। फिर कुछ दिन पहले सावन के इस मौसम ने 'छल्ले ' की याद फिर से दिला दी। तो फिर मैं चल पड़ा अपनी उसी तलाश में और फिर इस छल्ले की गुत्थी सुलझती गई...

इससे पहले हम रब्बी शेरगिल के एलबम अवेंगी जा नहीं (Avengi Ja Nahin) यानि 'आओगी या नहीं' के इस गीत की चर्चा करें ये समझना जरूरी है कि पंजाबी लोकगीत का ये लोकप्रिय रूप 'छल्ला' कब गाया जाता है?

जैसा नाम से स्पष्ट है 'छल्ला लोकगीत' के केंद्र में वो अगूँठी होती है जो प्रेमिका को अपने प्रियतम से मिली होती है। पर जब उसका प्रेमी दूर देश चला जाता है तो वो अपने दिल का हाल किससे बताए ? हाँ जी आपने सही पहचाना ! और किससे ? उसी छल्ले से जो उसके साजन की दी गई एकमात्र निशानी है। यानि 'छल्ला लोकगीत' छल्ले से कही जाने वाली एक विरहणी की आपबीती है। छल्ले को कई पंजाबी गायकों ने समय समय पर पंजाबी फिल्मों और एलबमों में गाया गया है। इस तरह के जितने भी गीत हैं उनमें रेशमा, इनायत अली, गुरुदास मान और शौकत अली के वर्सन काफी मशहूर हुए। पर मुझे तो रब्बी का गाया हुआ ये छल्ला लोकगीत सबसे ज्यादा पसंद है। तो आइए देखें क्या कह रहे हैं रब्बी अपने इस 'छल्ले' में..


ये अगूँठी अब मेरे वश में नहीं रही ! देखिए ना ये मेरी बात ही नहीं सुनती है। अब तो लगता है ये मुझसे ज्यादा मेरी माँ की सुनने लगी है। पता नहीं इस पर किसने जादू टोना कर दिया है।

छल्ला वस नहीं ओ मेरे हे
छल्ला वस नहीं ओ मेरे हे
छल्ला वस नहीं ओ मेरे
छल्ला वस नहीं ओ मेरे
छल्ला वस मेरी माँ दे
घल्ले गीताँ जाँगे
वे गल सुन छलया
हाए कीताँ किस इस ते टूना

मुझे तो ये छल्ला नलकूप से निकलती हुई उस धार की तरह लगता है जो ना जाने किस ओर बह जाए। वैसे मेरा प्यार भी तो तेरी कोई खबर ना आने की वज़ह से इस धारा समान ही हो गया है जिसकी दशा और दिशा का अब तो मुझे भी ज्ञान नहीं।
ओ मेरे प्रेम के प्रतीक छल्ले मेरी बात सुन ! क्या तू नहीं जानता कि अब इस प्यार से भरे मेरे कोमल हृदय में इक काँटा उग गया है जो रह रह कर मुझे टीस रहा है।

ओए छल्ला बंबी दा पाणी हीं
छल्ला बंबी दा पाणी हीं
छल्ला बंबी दा पाणी
कित्थे बह जे ना जाणी
असन ख़बर को ना जाणी
वे गल सुन छलया, वे गल सुन छलया
तेरी बेरी इक उगया ऍ कंडा

आज अपने इस गुँथी लंबी चोटी को देखा तो इसी में मुझे तू नज़र आया और उसी स्वप्निल सी अवस्था में मैंने तुझे चूम लिया। मैं जानती हूँ कि मेरी चाहतें अंधी हो गई हैं पर मैंने वही किया जो मेरे हृदय ने मुझे करने को कहा। क्या मैंने कुछ गलत किया ? अगर ऍसा है तो छल्ले तू मुझे जो सजा देना चाहता है दे ले।

छल्ला गुत इक लम्मी हीं
छल्ला गुत इक लम्मी हीं
छल्ला गुत इक लम्मी
असाँ सुपने सी चुम्मी
होइ नीयत सी अन्नी
असाँ दिल दी सी मन्नी
वे गल सुन छलया
हूँ दे लै जेहड़ी देनी ऐ सज़ा
कभी कभी तो लगता है कि छल्ले तू उस अकेले खड़े पीपल के पेड़ की तरह है जिसके ऊपर तो भगवान का वास है और जो नीचे इस विशाल धरती को भी सँभाले हुए है। तू सोच रहा होगा ये कैसी समानता है? है ना छल्ले ! उस पीपल के पेड़ की तरह तू भी तो नहीं जानता कि इस धरती रूपी मेरे दिल में प्यार की जड़े कितनी गहराई तक समाई हुई हैं।

ओए छल्ला बोड़िक कल्ला हा
छल्ला बोड़िक कल्ला हा
छल्ला बोड़िक कल्ला
उँदे फड़ जाए पल्ला
थल्ले धरत उते अल्लाह
वे गल सुन छलया, वे गल सुन छलया
अरे जाँदी अ किन्नी दुंघियाँ जड़ाँ
इस गल दा ओस खुद नूँ नहीं पता

छल्ले मेरा दिल भटक रहा है। मन में शंकाएँ उत्पन्न हो रही हैं। मुझे तो तू आजकल वैसी अमिया के जैसा लगने लगा है जो कभी नहीं पकीं। लगता है मुझे साधु संतों के पास जाना पड़ेगा जो मेरा ये उन्मत चित्त शांत कर सकें। अब तो दिल को सुकूं देने का एक ही रास्ता बचा है उन बीते लमहों को याद करने का जो तूने और मैंने एक साथ बिताए थे...

छल्ला वस नहीं मेरे
छल्ला वस मेरी माँ दे
छल्ला वस मेरी .... दे
छल्ला अम्बियाँ कचियाँ
मत्ता दे कोई सचियाँ
लै ये लेखे जो बचियाँ
वो तैरी मेरियाँ घड़ियाँ
वे गल सुन छलया

छल्ला बोड़िक कल्ला
उँदे फड़ जाए पल्ला
थल्ले धरत उते अल्लाह
वे गल सुन छलया, वे गल सुन छलया,
वे गल सुन छलया, वे गल सुन छलया...

(मेरा पंजाबी का ज्ञान सीमित है। पंजाबी शब्दों के अर्थ ढूँढ कर इस लोकगीत में छुपी भावनाओं को अपनी सोच के हिसाब से समझने की कोशिश की है। अगर लफ्जों को लिखने में त्रुटि रह गई हो तो कृपया इंगित करें।)


रब्बी की गायिकी हमेशा की तरह बेमिसाल है। उनके इस गीत में वाद्य यंत्रों का प्रयोग सीमित किंतु मारक है। शुरु के दो अंतरे के बाद जिस तरह से उन्होंने गीत का स्केल बदला है वो सुनने लायक है। ऊँचे सुरों के माध्यम से वो प्रेमिका की उदासी, बेकली और अकेलेपन को उस ऊँचाई पर ले जाते हैं कि श्रोता की आँखें अश्रुसिक्त हुए बिना नहीं रह पातीं। कम से कम मेरा तो यही अनुभव रहा है बाकी आप खुद इसे सुन कर देखें...



एक शाम मेरे नाम पर रब्बी शेरगिल

मंगलवार, फ़रवरी 19, 2008

वार्षिक संगीतमाला 2007 : पायदान संख्या 5 - तेरे बिन, सन सोणिया कोई होर नहीं ओ लभना

हाँ तो दोस्तों करीब डेढ़ महिने की संगीतमय यात्रा को पूरा कर मैं आ पहुँचा हूँ इस संगीतमाला की 5 वीं सीढ़ी पर। अब इस गीत के बारे में लिखने के लिए मुझे कुछ ज्यादा नहीं करना क्योंकि पिछले सितंबर में इस के बारे में मैं विस्तार से लिख चुका हूँ। जी हाँ पाँचवी पायदान के हीरो हैं रब्बी शेरगित जिनके इस गीत को फिल्म दिल्ली हाइट्स में शामिल किया गया था। तो आइए एक बार फिर से बात करें इस गीत के बारे में....

पश्चिमी रॉक , लोक संगीत और सूफ़ियाना बोल का मिश्रण सुनने में आपको कुछ अटपटा सा नहीं लगता। ज़ाहिर है जरुर लगता होगा। मुझे भी लगा था जब मैंने इस नौजवान को नहीं सुना था। पर 2005 में जब मैंने 'बुल्ला कि जाणा मैं कौन' सुना तो रब्बी शेरगिल की गायिकी का मैं कायल हो गया। आज, बुल्ले शाह के सूफी लफ़्जों को गिटार के साथ इतने बेहतरीन ढ़ंग से संयोजित कर प्रसिद्धि पाने वाले रब्बी शेरगिल किसी परिचय के मुहताज़ नहीं हैं। आज की तारीख़ में उनके पास प्रशंसकों की अच्छी खासी जमात है। पर रब्बी को ये शोहरत आसानी से नहीं मिली।

सितंबर १९८८ में ब्रूस स्प्रिंगस्टीन के कान्सर्ट में संगीत को अपना पेशा चुनने की ख़्वाहिश रखने वाले रब्बी सत्रह साल बाद अपना खुद का एलबम निकालने का सपना पूरा कर पाए। ख़ैर बुल्ला ..के बाजार में पहुँचने की दास्तान तो अपने आप एक पोस्ट की हकदार है, वो बात कल करेंगे। आज चर्चा करेंगे रब्बी के गाए इस गीत की जिसे एक बार सुन कर ही मन प्रेमी के शब्दों की मासूमियत में बहता चला जाता है। अब देखिए ना, पंजाबी मेरी जुबान नहीं फिर भी इस गीत के बोल, पंजाब की मिट्टी की ख़ुशबू मेरे इर्द गिर्द फैला ही जाते हैं।

अब भला एक अच्छे व्यक्तित्व के स्वामी, गिटार के इस महारथी को पंजाबी में गाने की कौन सी जरुरत आन पड़ी? रब्बी इस प्रश्न का जवाब कुछ यूं देते हैं....

"...हम जाट सिख लोगों को अपनी भाषा पर गर्व है। वो मेरे ज़ेहन से नहीं निकल सकती। दूसरी भाषा में सोचने का मतलब उसकी श्रेष्ठता को स्वीकार कर लेना होगा। वैसे भी अंग्रेजी में गाकर मुझे दूसरे दर्जे का रॉक सिंगर नहीं बनना। मैं कभी भूल नहीं सकता कि मैं कौन हूँ. ....."

काश हमारे हिंदी फिल्मों के कलाकार भी अपनी भाषा के बारे में ये सोच रखते!

खैर रब्बी की आवाज, उनके खुद के लिखे बोल, अंतरे के बीचों-बीच में गिटार की मधुर बंदिश इस गीत में खोने के लिए काफ़ी हैं। तो लीजिए इस गीत का आनंद उठाइए। क्या कहा पंजाबी नहीं आती !

गीत का दर्द तो आप इसकी भाषा जाने बिना भी महसूस कर सकेंगे पर आपकी सुविधा के लिए इस गीत का हिंदी अनुवाद भी इसके बोल के साथ साथ देने की कोशिश की है।

तेरे बिन, सन सोणिया
कोई होर नहींऽओ लभना
जो देवे, रुह नूँ सकून
चुक्के जो नखरा मेरा

तुम्हारे सिवा इस दुनिया में मूझे कोई और पसंद नहीं। तुम्हारे आलावा कौन है जो मेरे नखरे सहे और जिस का साथ दिल को सुकून दे सके?

मैं सारे घूम के वेखिया, अमरीका, रूस, मलेशिया
ना किते वी कोई फर्क सी, हर किसे दी कोई शर्त सी
कोई मंगदा मेरा सी समा, कोई हूंदा सूरत ते फ़िदा
कोई मंगदा मेरी सी वफा, ना कोई मंगदा मेरियां बला
तेरे बिन, होर ना किसे, मंगनी मेरियां बला
तेरे बिन, होर ना किसे, करनी धूप विच छां
तेरे बिन, सन सोणिया...


मैंने कहाँ कहाँ घूम कर नहीं देखा, अमरीका हो या रूस, या फिर मलेशिया। कहीं कोई फर्क नहीं है, सारे मतलबी हैं। सबकी कोई ना कोई शर्त है। कोई मेरा समय चाहता है तो कोई मेरे रूप पर मोहित है। किसी को वफादारी का वादा चाहिए। पर मेरी कमियाँ... वो तो कोई नहीं लेना चाहता....सिवाय तेरे। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि तुम मेरे लिए जिंदगी की इस कड़ी धूप में एक ठंडी छाँह की तरह हो।

जीवैं रुकिया, सी तुन ज़रा, नहीं ओ भूलणा मैं सारी उमर
जीवें अखियाँ सी अख्याँ चुरा, रोवेंगा सानू याद कर
हँस्या सी मैं हँसा अज़ीब, पर तू नहीं सी हँस्या
दिल विच तेरा जो राज सी, मैंनू तू क्यूँ नहीं दस्या
तेरे बिन, सानू एह राज, किसे होर नहींऽओ दसना
तेरे बिन, पीड़ दा इलाज, किस बैद कोलों लभना
तेरे बिन, सन सोणिया...

मैं जीवन भर भूल नहीं सकता वो दिन..जिस तरह तुम हौले से रुकी थी और मुझसे आँखे चुराते हुए कहा था कि मेरी याद तुम्हें रुलाएगी। इक अज़ीब सी हँसी हंसा था मैं पर तुम तो नहीं हँसी थी। तुमने क्यूँ नहीं कहा कि तुम्हारे दिल मे वो प्यारा सा राज नज़रबंद है। भला बताओ तो तुम्हारे आलावा ये राज मुझे कौन बता सकता है? तुम्हारे बिना वो कौन सा वैद्य है जो मेरे दिल का इलाज कर सकता है?

मिलिआँ सी अज्ज मैनू तेरा इक पत्रां
लिखिआ सी जिस तै, तुन शेर वारे शाह दा
पढ़ के सी ओस्नूँ, हांन्जू इक दुलिया
आँखांच बंद सी, सेह राज अज्ज खुलिया
कि तेरे बिन, एह मेरे हांन्जू, किसे होर नहींऽओ चुमना
कि तेरे बिन, एह मेरे हांन्जू मिट्टी विच रुंदणा

मुझे आज ही तेरा लिखा वो ख़त मिला जिसमें तूने वारिस शाह का वो शेर लिखा था। उसे पढ़कर अनायास ही आँसू का एक कतरा नीचे ढलक पड़ा.... वो राज खोलता हुआ जो मेरी आँखों मे अर्से से बंद था.। अब मेरे इन आँसुओं को तुम्हारे सिवा कोई और नहीं चूमेगा। सच तो ये है कि तुम्हारे बिना मेरे लिए इन आँसुओं को मिट्टी की गर्द फाँकना ही बेहतर है।

तेरे बिन, सन सोणिया
कोई होर नहींऽओ लभना
जो देवे, रुह नूँ सकून
चुक्के जो नखरा मेरा

इस गीत को दिल्ली हाइट्स में जिमी शेरगिल और नेहा धूपिया पर फिल्माया गया है। साथ-साथ रब्बी तो हैं ही..



शनिवार, सितंबर 22, 2007

'बुल्ला कि जाणां मैं कौण': आख़िर क्यूँ खींचता है ये गीत अपनी ओर ?

पिछली पोस्ट में बात हो रही थी रब्बी शेरगिल के गीत तेरे बिन.. की। आज कुछ बातें उनके सबसे लोकप्रिय नग्मे 'बुल्ला कि जाणां मैं कौण' की। क्या आप मानेंगे कि इस हृदय को छू लेने वाली इस सूफी धुन को बनने और बाज़ार तक पहुंचने में ५ साल लग गए। २००० में रब्बी को 'तहलका' ने लांच करने का अनुबंध किया पर अगस्त २००१ में बंगारू लक्ष्मण वाले स्टिंग आपरेशन ने 'तहलका' की नींव हिला दी। २००२ में मैग्नासाउंड ने उनके एलबम में दिलचस्पी लेनी शुरु की पर २००३ तक वो कंपनी ही खत्म हो गई। आखिरकार एक नई कंपनी फैटफिश रिकार्ड ने २००४ में रब्बी से करार किया तब जाकर २००५ में ये गीत संगीत प्रेमियों के दिल की आवाज़ बन सका। इससे ये बात साफ हो जाती है कि सिर्फ प्रतिभा ही आपको मंजिल तक नहीं पहुँचाती। साथ ही साथ भाग्य की लकीर भी होनी चाहिए आपके हाथों में..

एक रोचक तथ्य ये भी है कि रब्बी का ये गीत हम सबको ही नहीं पर अमिताभ बच्चन को भी बेहद पसंद है। तहलका की एक बोर्ड मीटिंग में ये गीत उसके निर्देशकों के बीच वितरित हुआ। बाद में तहलका के लोगों को श्वेता बच्चन ने बताया कि पिताजी की गाड़ी में लगातार ये गीत बजता रहता है।

पर आख़िर क्या खास है इस गीत में? क्यूँ खींचता है ये हम सबको अपनी ओर? शायद इस प्रश्न की वज़ह से जो जिंदगी के किसी ना किसी मुक़ाम पर हम सबको मथता ही रहा है

बुल्ला कि जाणां मैं कौन?

जिंदगी के उन रुके ठहरे लमहों में आपने क्या ये कभी नहीं सोचा..
अपने बारे में..अपनी पहचान के बारे में ?
इस दुनिया में आने के अपने मक़सद के बारे में ?
जरूर सोचा होगा और पाया होगा कि हमने अपने आप को बाँट रखा है इस पहचान के नाम पर
देश, धर्म, शहर , भाषा, जाति के छोटे छोटे खानों में..
ये जानते हुए भी कि इन बंद ख़ानों में अपने आप को समेट कर जीना सही नहीं फिर भी इनसे निकलने की कोशिश नहीं करते हम..
शायद हम लड़ना नहीं चाहते समाज के बनाए इन खोखले दायरों और दीवारों से..आखिर एक कनफर्मिस्ट हो कर जीना इतना आसान जो है ...



अठारहवीं सदी के सूफी कवि बुल्ले शाह भी इंसान द्वारा बनाए गए इन निरर्थक हिस्सों की ओर इशारा करते हुए हमें इनसे ऊपर उठने की बात बताते है्।खुद रब्बी इस गीत के बारे में कहते हैं

"...Bulla Ki Jana is all about us not knowing who we are, of thinking of life in terms of boxes, until we are enlightened. And then, you realise how meaninglessly you’ve compartmentalised life....”

तो चलिए एक बार फिर से मेरे साथ इस गीत के सफ़र पर इसके बोलों को समझते हुए। शाब्दिक अर्थों में सीधे ना जाकर मैंने कवि के भावों को पढ़ने की कोशिश की है। अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ।

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बुल्ला कि जाणां मैं कौन ?

ना मैं मोमिन विच मसीताँ
ना मैं विच कुफ्र दियां रीताँ
ना मैं पाकां विच पलीताँ
ना मैं अन्दर वेद किताबाँ
ना मैं रहदाँ भंग शराबाँ
ना मैं रिंदाँ मस्त खराबाँ
ना मैं शादी ना ग़मनाकी
ना मैं विच पलीति पाकी
ना मैं आबी ना मैं खाकी
ना मैं आतिश ना मैं पौण
बुल्ला कि जाणां मैं कौन ?

ना मेरी मस्जिद में आस्था है, ना व्यर्थ की पूजा पद्धतियों में। ना मैं शुद्ध हूँ ना मैं अशुद्ध। मैं धर्मग्रंथों को पढ़ने की इच्छा नहीं रखता । ना ही मुझे भांग या शराब की लत है और ना ही उनका सा मतवालापन । ना तुम मुझे पूर्णतः स्वच्छ मानो, ना ही गंदगी से भरा हुआ। ना जल, ना थल, ना अग्नि ना वायु , मेरा जन्म इन सबसे कहीं परे है..एक अनजाने रहस्य से गुथा हुआ......

ना मैं अरबी ना लहोरी
ना मैं हिन्दी शहर नगौरी
ना हिन्दु ना तुर्क पेशावरी
ना मैं भेद मज़हब दा पाया
ना मैं आदम हव्वा जाया
ना मैं अपणा नाम कराया
आव्वल आखिर आप नूँ जाणां
ना कोइ दूजा होर पहचाणां
मैं थों होर न कोई सियाणा
बुल्ला शाह खडा है कौण

बुल्ला कि जाणां मैं कौन?


मुझे देश, भाषा और धर्म की सरहदों में मत बाँटों। ना मैं अरब का हूँ, ना लाहौर का,. ना नगौर मेरा शहर हे ना हिंदी मेरी भाषा। ना तो मैं हिंदू हूँ, ना पेशावरी तुर्क। ना मुझे धर्मों का तत्त्व ज्ञान है ना मैं दावा करता हूँ कि मैं आदम और हव्वा की संतान हूँ। ये जो मेरा नाम है वो ले कर इस दुनिया में मैं नहीं आया । मैं पहला था, मैं ही आखिरी हूँ। ना मैंने किसी और को जाना है ना मुझे ये जानने की जरूरत है। गर अपने होने का सत्य पहचान लूँ तो फिर मुझ सा बुद्धिमान और कौन होगा?

ना मैं मूसा न फरौन.
ना मैं जागन ना विच सौण
ना मैं आतिश ना मैं पौण
ना मैं रहदां विच नादौण
ना मैं बैठां ना विच भौण
बुल्ला शाह खडा है कौण
बुल्ला कि जाणां मैं कौन


ना तो मैं मूसा हूँ और ना ही फराओ । ना तो मैं अग्नि से और ना ही हवा से पैदा हुआ हूँ। मुझे तो ये खुद भी पता नहीं कि मैं जागृत अवस्था में हूँ या निंदासा, रुका हुआ हूँ ये कालांतर से चलता जा रहा हूँ। ना मेरा कोई शहर है । सच तो ये है कि मैं बुल्ले शाह आज तक अपने अक्स की तालाश में हूँ।
इस गीत का वीडियो आप यहाँ देख सकते हैं।

मंगलवार, सितंबर 18, 2007

रब्बी शेरगिल : तेरे बिन, सन सोणिया कोई होर नहीं ओ लभना...सुनिए इस पंजाबी गीत को हिंदी अनुवाद के साथ...

पश्चिमी रॉक , लोक संगीत और सूफ़ियाना बोल का मिश्रण सुनने में आपको कुछ अटपटा सा नहीं लगता। ज़ाहिर है जरुर लगता होगा। मुझे भी लगा था जब मैंने इस नौजवान को नहीं सुना था। पर 2005 में जब मैंने 'बुल्ला कि जाणा मैं कौन' सुना तो रब्बी शेरगिल की गायिकी का मैं कायल हो गया। आज, बुल्ले शाह के सूफी लफ़्जों को गिटार के साथ इतने बेहतरीन ढ़ंग से संयोजित कर प्रसिद्धि पाने वाले रब्बी शेरगिल किसी परिचय के मुहताज़ नहीं हैं। आज की तारीख़ में उनके पास प्रशंसकों की अच्छी खासी जमात है। पर रब्बी को ये शोहरत आसानी से नहीं मिली।

सितंबर १९८८ में ब्रूस स्प्रिंगस्टीन के कान्सर्ट में संगीत को अपना पेशा चुनने की ख़्वाहिश रखने वाले रब्बी सत्रह साल बाद अपना खुद का एलबम निकालने का सपना पूरा कर पाए। ख़ैर बुल्ला ..के बाजार में पहुँचने की दास्तान तो अपने आप एक पोस्ट की हकदार है, वो बात कल करेंगे। आज चर्चा करेंगे रब्बी के गाए इस गीत की जिसे एक बार सुन कर ही मन प्रेमी के शब्दों की मासूमियत में बहता चला जाता है। अब देखिए ना, पंजाबी मेरी जुबान नहीं फिर भी इस गीत के बोल, पंजाब की मिट्टी की ख़ुशबू मेरे इर्द गिर्द फैला ही जाते हैं।

अब भला एक अच्छे च्यक्तित्व के स्वामी, गिटार के इस महारथी को पंजाबी में गाने की कौन सी जरुरत आन पड़ी? रब्बी इस प्रश्न का जवाब कुछ यूं देते हैं....

"...हम जाट सिख लोगों को अपनी भाषा पर गर्व है। वो मेरे ज़ेहन से नहीं निकल सकती। दूसरी भाषा में सोचने का मतलब उसकी श्रेष्ठता को स्वीकार कर लेना होगा। वैसे भी अंग्रेजी में गाकर मुझे दूसरे दर्जे का रॉक सिंगर नहीं बनना। मैं कभी भूल नहीं सकता कि मैं कौन हूँ. ....."

काश हमारे हिंदी फिल्मों के कलाकार भी अपनी भाषा के बारे में ये सोच रखते!

खैर रब्बी की आवाज, उनके खुद के लिखे बोल, अंतरे के बीचों-बीच में गिटार की मधुर बंदिश इस गीत में खोने के लिए काफ़ी हैं। तो लीजिए इस गीत का आनंद उठाइए।क्या कहा पंजाबी नहीं आती !

गीत का दर्द तो आप इसकी भाषा जाने बिना भी महसूस कर सकेंगे पर आपकी सुविधा के लिए इस गीत का हिंदी अनुवाद भी इसके बोल के साथ साथ देने की कोशिश की है।

तेरे बिन, सन सोणिया
कोई होर नहींऽओ लभना
जो देवे, रुह नूँ सकून
चुक्के जो नखरा मेरा

तुम्हारे सिवा इस दुनिया में मूझे कोई और पसंद नहीं। तुम्हारे आलावा कौन है जो मेरे नखरे सहे और जिस का साथ दिल को सुकून दे सके?

मैं सारे घूम के वेखिया, अमरीका, रूस, मलेशिया
ना किते वी कोई फर्क सी, हर किसे दी कोई शर्त सी
कोई मंगदा मेरा सी समा, कोई हूंदा सूरत ते फ़िदा
कोई मंगदा मेरी सी वफा, ना कोई मंगदा मेरियां बला
तेरे बिन, होर ना किसे, मंगनी मेरियां बला
तेरे बिन, होर ना किसे, करनी धूप विच छां
तेरे बिन, सन सोणिया...


मैंने कहाँ कहाँ घूम कर नहीं देखा, अमरीका हो या रूस, या फिर मलेशिया। कहीं कोई फर्क नहीं है, सारे मतलबी हैं। सबकी कोई ना कोई शर्त है। कोई मेरा समय चाहता है तो कोई मेरे रूप पर मोहित है। किसी को वफादारी का वादा चाहिए। पर मेरी कमियाँ... वो तो कोई नहीं लेना चाहता....सिवाय तेरे। इसीलिए तो मैं कहता हूँ कि तुम मेरे लिए जिंदगी की इस कड़ी धूप में एक ठंडी छाँह की तरह हो।

जीवैं रुक्या  सी तू ज़रा, नहींo भूलणा मैं सारी उमर
जीवें अखियाँ सी अक्खयाँ चुरा, रोवेंगा सानू याद कर
हँस्या सी मैं हँसा अज़ीब, पर तू नहीं सी हँस्या
दिल विच तेरा जो राज सी, मैंनू तू क्यूँ नहीं दसया
तेरे बिन, सानू एह राज, किसे होर नहींऽओ दसना
तेरे बिन, पीड़ दा इलाज, किस बैद कोलों लभना
तेरे बिन, सन सोणिया...

मैं जीवन भर भूल नहीं सकता वो दिन..जिस तरह तुम हौले से रुकी थी और मुझसे आँखे चुराते हुए कहा था कि मेरी याद तुम्हें रुलाएगी। इक अज़ीब सी हँसी हंसा था मैं पर तुम तो नहीं हँसी थी। तुमने क्यूँ नहीं कहा कि तुम्हारे दिल मे वो प्यारा सा राज नज़रबंद है। भला बताओ तो तुम्हारे आलावा ये राज मुझे कौन बता सकता है? तुम्हारे बिना वो कौन सा वैद्य है जो मेरे दिल का इलाज कर सकता है?

मिलिआँ सी अज्ज मैनू.. तेरा इक पत्रां
लिखिआ सी जिस तै, तुन शेर वारे शाह दा
पढ़ के सी ओस्नूँ, हांन्जू इक दुलिया
आँखांच बंद सी, सेह राज अज्ज खुलिया
कि तेरे बिन, एह मेरे हांन्जू, किसे होर नहींऽओ चुमना
कि तेरे बिन, एह मेरे हांन्जू मिट्टी विच रुंदणा

मुझे आज ही तेरा लिखा वो ख़त मिला जिसमें तूने वारिस शाह का वो शेर लिखा था। उसे पढ़कर अनायास ही आँसू का एक कतरा नीचे ढलक पड़ा वो राज खोलता हुआ जो मेरी आँखों मे अर्से से बंद था.। अब मेरे इन आँसुओं को तुम्हारे सिवा कोई और नहीं चूमेगा। सच तो ये है कि तुम्हारे बिना मेरे लिए इन आँसुओं को मिट्टी की गर्द फाँकना ही बेहतर है।

तेरे बिन, सन सोणिया
कोई होर नहींऽओ लभना
जो देवे, रुह नूँ सकून
चुक्के जो नखरा मेरा

इस गीत को दिल्ली हाइट्स में जिमी शेरगिल और नेहा धूपिया पर फिल्माया गया है। साथ-साथ रब्बी तो हैं ही..





अगली पोस्ट में बात करेंगे रब्बी के सबसे लोकप्रिय गीत की जिसे रिलीज होने से पहले सुना अमिताभ बच्चन और वी. एस. नएपाल जैसी नामी हस्तियों ने और एक बार सुन कर ही वे इस गीत में खो गए..
 

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इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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