जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से!
अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम..
होली की पर्व तो बीत गया है। आशा है आपने रंगों का ये त्योहार सोल्लास मनाया होगा। अब देखिए ना होली बीतने के बाद भी मैं आपसे रंग की ही बात करने वाला हूँ। नहीं नहीं ये वो वाला रंग नहीं बल्कि तीस के दशक के लोकप्रिय कवि बलबीर सिंह 'रंग' की लेखनी का रंग है।
यूँ तो बलबीर जी, गोपाल सिंह नेपाली और हरिवंश राय बच्चन जैसे कवियों के समकालीन थे पर उनके या उनकी कविताओं के बारे में वैसी चर्चा मैंने कम से कम स्कूल और कॉलेज के दिनों में होती नहीं सुनी। हिंदी की पाट्य पुस्तकों में भी उनका जिक्र नहीं आया था। नेट के इस युग में उनकी कुछ कविताओं को अनायास पढ़ने का मौका मिला तो ऐसा लगा कि बच्चन जी की हीकोई कविता पढ़ रहा हूँ क्यूँकि उनकी कविता में भी उसी किस्म की गेयता महसूस हुई। बाद में मुझे ज्ञात हुआ कि बलबीर सिंह रंग अपने ज़माने के गीत लिखने वाले कवियों में अग्रणी स्थान रखते थे।
बलबीर सिंह रंग पेशे से एक किसान थे पर खेतिहर परिवार के इस सपूत को कविताई करने का चस्का बचपन से लग गया था। 'रंग' जी का जन्म उत्तर प्रदेश के एटा जिले के गाँव नगला कटीला में 14 नवंबर 1911 को हुआ था। उन्होंने ने गीतों के आलावा ग़ज़लों को भी लिखा। अपने काव्य संकलन सिंहासन में अपने किसानी परिवेश के बारे में उन्होंने लिखा है
"मैं परंपरागत किसान हूँ, धरती के प्रति असीम मोह और पूज्य-भावना किसान का जन्मजात गुण है, यही उसकी शक्ति है और यही उसकी निर्बलता। मैं स्वीकार करता हूँ कि मुझमें भी यही संस्कार सबसे प्रबलतम रूप में रहा है, आज भी है । ग्रामीण जीवन की वेदनाएँ, विषमताएँ और हास-विलास दोनों ही मेरी कविता की प्रेरणा और पूँजी है।'
रंग जी के बारे में मशहूर है कि किस तरह मथुरा में आयोजित एक कवि सम्मेलन में मंच संचालक ने अपनी कविता पाठ को आतुर एक नवोदित कवि को नहीं बुलाया तो उस युवा की बेचैनी देखकर रंग जी ने संचालक को उसे मंच पर न्योता देने को कहा। उस नवयुवक की कविताओं को श्रोताओं से भरपूर सराहना मिली और आगे जाकर वो कवि गीतकार शैलेंद्र के नाम से मशहूर हुआ जिसके बारे में हम सब जानते हैं। शैलेंद्र जी भी इस बात को नहीं भूले और वे जब भी मुंबई आए उनका उचित सत्कार किया।
रंग जी का एक लोकप्रिय गीत है जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है। जब भी मैं इस कविता को सुनता था मुझे आशा कम, विश्वास बहुत होने की बात थोड़ी विचित्र लगती थी। ये जो जुमला है उसे क्रिकेट कमेंट्री करने वाले बारहा इस्तेमाल करते हैं पर उलट कर। गेंदबाज ने अपील जरूर की पर उसमें आशा और उत्साह ज्यादा था पर विश्वास कम। उत्साह तो ख़ैर अपील के साथ होता ही है पर आशा इसलिए कि कहीं अंपायर उँगली उठा ही दे। अब रंग जी की बात करूँ तो अगर किसी से मिलने का विश्वास हो तो आशा तो जगेगी ही कम क्यूँ होगी?
इन पंक्तियों की दुविधा तो मैं आज तक सुलझा नहीं पाया हूँ। अगर आपकी कोई अलग सोच हो तो जरूर बाँटिएगा। इस संशय के बावज़ूद भी ये कविता जब भी मैं पढ़ता हूँ तो इसकी लय और इसके हर छंद में अपने प्रिय से कवि के मिलने की प्रबल होती इच्छा मन को छू जाती है। अपने एकतरफा प्रेम का प्रदर्शन कितने प्यारे और सहज बिंबों से किया है रंग जी ने..वहीं कविता के अंत में वे अतीत को बिसार कर नए भविष्य की रचना करने का भाव जगा ही जाते हैं।
जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है सहसा भूली याद तुम्हारी उर में आग लगा जाती है विरह-ताप भी मधुर मिलन के सोये मेघ जगा जाती है, मुझको आग और पानी में रहने का अभ्यास बहुत है जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है धन्य-धन्य मेरी लघुता को, जिसने तुम्हें महान बनाया, धन्य तुम्हारी स्नेह-कृपणता, जिसने मुझे उदार बनाया, मेरी अन्धभक्ति को केवल इतना मन्द प्रकाश बहुत है जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है अगणित शलभों के दल एक ज्योति पर जल-जल मरते एक बूँद की अभिलाषा में कोटि-कोटि चातक तप करते, शशि के पास सुधा थोड़ी है पर चकोर की प्यास बहुत है जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है
(चातक, Pied Cuckoo के बारे में ऐसा माना जाता है कि यह वर्षा की पहली बूंदों को ही पीता है वहीं चकोर French Partridge के बारे में ये काल्पनिक मान्यता रही है कि ये पक्षी रात भर चाँद की ओर देखा करता है और चंद्रकिरणों का रस पीकर ही जीवित रहता है। )
मैंने आँखें खोल देख ली हैं नादानी उन्मादों की मैंने सुनी और समझी हैं कठिन कहानी अवसादों की, फिर भी जीवन के पृष्ठों में पढ़ने को इतिहास बहुत है जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है ओ ! जीवन के थके पखेरू, बढ़े चलो हिम्मत मत हारो, पंखों में भविष्य बंदी है मत अतीत की ओर निहारो, क्या चिंता धरती यदि छूटी उड़ने को आकाश बहुत है जाने क्यों तुमसे मिलने की आशा कम, विश्वास बहुत है
(शब्दार्थ : शशि - चंद्रमा, सुधा - अमृत, उर - हृदय, मेघ - बादल, स्नेह कृपणता - प्रेम का उचित प्रतिकार ना देना, उसमें भी कंजूसी करना, शलभ - कीट पतंगा, पखेरू - पक्षी, अतीत - बीता हुआ)
दीपावली एक ऐसा पर्व है जिसे अकेले मनाने का मन नहीं होता। दीपावली के पहले की सफाई से लेकर उस दिन एक साथ पूजा करना, बड़ों से आशीर्वाद लेना ,बच्चों की खुशियों में साझेदार बनना मुझे हमेशा से बेहद पसंद रहा है। खुशकिस्मत हूँ की मेरा कार्य मुझे ऐसे दीपावली मना पाने की सहूलियत देता है। पर सेना, पुलिस , अस्पताल और अन्य जरुरी सेवाओं में लगे लोगों को देखता हूँ तो मन में यही ख्याल आता है कि काश जंग ही नहीं होती, अपराध नहीं होते , लोग आपस में खून खराबा नहीं करते तो इन आकस्मिक और जरुरी सेवाओं की फेरहिस्त भी छोटी हो जाती। दरअसल एक साथ जुटने , खुशियों को बांटने के अलावा ये प्रकाशोत्सव हमें मौका देता है की हम अपनी उन आंतरिक त्रुटियों को दूर करें ताकि घृणा , वैमनस्य, हिंसा जैसी भावनाएँ हमारे पास भी न भटकें।
आख़िर दीपावली में हम अपने घर भर में उजाला क्यों करते हैं? इसीलिए ना कि बाहर फैली रौशनी की तरह हमारा अंतर्मन भी प्रकाशित हो। हम सब के अंदर का कलुष रूपी तमस दीये की लौ के साथ जलकर सदविचार में तब्दील हो सके। हिंदी के प्रखर कवि गोपाल दास नीरज की एक कविता याद आ रही है जिसमें उन्होंने इसी विचार को अपने ओजपूर्ण शब्दों से संवारा था ।
जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल, उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले, लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी, निशा की गली में तिमिर राह भूले, खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग, उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए। जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में, कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी, मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी, कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी, चलेगा सदा नाश का खेल यों ही, भले ही दिवाली यहाँ रोज आए। जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में, नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा, उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के, नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा, कटेंगे तभी यह अँधेरे घिरे अब स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए
इस कविता के माध्यम से कवि ये कहना चाहते हैं कि दीपावली में दीपक जलाकर रोशनी करना तो उत्सव का एक रूप है जो कि रात तक सिमट जाता है। पर वास्तव हमें ये पर्व ये संदेश देता है कि असली दीवाली तब मनेगी जब इस संपूर्ण संसार के लोगों के हृदय अंदर से जगमग हो जाएँ। ये तभी संभव हो पाएगा हर मानव के अंदर सदाचार, ईमानदारी व कर्मठता का दीप जल उठेगा।
दीपावली का ये मंगल पर्व एक शाम मेरे नाम के पाठकों के लिए खुशिया लाए और हम सब को एक बेहतर मानव बनने को प्रेरित कर सके इन्हीं आशाओं और शुभकामनाओं के साथ!
धर्मवीर भारती को किशोरावस्था तक अपनी प्रिय पत्रिका धर्मयुग का संपादक भर जानता रहा। गुनाहों का देवताऔर सूरज का सातवाँ घोड़ा तो बहुत बाद में ही पढ़ा। सूरज का सातवाँ घोड़ा पढ़ते हुए ही उनकी एक खूबसूरत कविता से भी रूबरू हुआ जो इसी नाम की एक फिल्म में गीत बन कर भी उभरी। गीत के बोल थे ये शामें सब की सब शामें क्या इनका कोई अर्थ नहीं..
शाम का पहर बड़ा अजीब सा है। दोस्तों का साथ रहे तो कितना जीवंत हो उठता है और अकेले हों तो कब अनायास ही मन में उदासी के बादल एकदम से छितरा जाएँ पता ही नहीं चलता। फिर तो हवा के झोकों के साथ अतीत की स्मृतियाँ मन को गीला करती ही रहती हैं। धर्मवीर भारती को भी लगता है शाम से बड़ा लगाव था। पर जब जब उन्होंने दिन के सबसे खूबसूरत पहर पर कविताएँ लिखीं उनमें ज़िंदगी से खोए लोगों का ही पता मिला। उनके ना होने की तड़प मिली।
अब भारती जी की इसी कविता को लीजिए मायूसी के इस माहौल में डूबी शाम में वो उम्मीद कर रहे हैं एक ऐसे अजनबी की जो शायद जीवन को नई दिशा दे जाए। पर वक़्त के साथ उनकी ये आस भी आस ही रह जाती है। अजनबी तो नहीं आते पर किसी के साथ बिताए वे पल की यादें पीड़ा बन कर रह रह उभरती है।
कविता की अंतिम पंक्तियों में भारती जी जीवन का अमिट सत्य बयान कर जाते हैं। जीवन में कई लोग आते हैं जिनसे हमारा मन का रिश्ता जुड़ जाता है। उनके साथ बीता वक़्त मन को तृप्त कर जाता है। पर यही लगाव, प्रेम उनके जुदा होने से दिल में नासूर की तरह उभरता है। हमें विचलित कर देता है। शायद शाम के समय जब हम अपने सबसे ज्यादा करीब होते हैं हमारा दिल अपने बंद किवाड़ खोलता है और भारती जी जैसा कवि हृदय तब कुछ ऐसा महसूस करता है...
(1)
शाम है, मैं उदास हूँ शायद अजनबी लोग अभी कुछ आएँ देखिए अनछुए हुए सम्पुट कौन मोती सहेजकर लाएँ कौन जाने कि लौटती बेला कौन-से तार कहाँ छू जाए!
बात कुछ और छेड़िए तब तक हो दवा ताकि बेकली की भी द्वार कुछ बन्द, कुछ खुला रखिए ताकि आहट मिले गली की भी!
देखिए आज कौन आता है कौन-सी बात नयी कह जाए या कि बाहर से लौट जाता है देहरी पर निशान रह जाए देखिए ये लहर डुबोये, या सिर्फ़ तटरेख छू के बह जाए!
कूल पर कुछ प्रवाल छूट जाएँ या लहर सिर्फ़ फेनवाली हो अधखिले फूल-सी विनत अंजुली कौन जाने कि सिर्फ़ खाली हो?
(2)
वक़्त अब बीत गया बादल भी क्या उदास रंग ले आए देखिए कुछ हुई है आहट-सी कौन है? तुम? चलो भले आए!
अजनबी लौट चुके द्वारे से दर्द फिर लौटकर चले आए क्या अजब है पुकारिए जितना अजनबी कौन भला आता है एक है दर्द वही अपना है लौट हर बार चला आता है!
अनखिले गीत सब उसी के हैं अनकही बात भी उसी की है अनउगे दिन सब उसी के हैं अनहुई रात भी उसी की है जीत पहले-पहल मिली थी जो आखिरी मात भी उसी की है!
एक-सा स्वाद छोड़ जाती है ज़िन्दगी तृप्त भी व प्यासी भी लोग आए गए बराबर हैं शाम गहरा गई, उदासी भी!
सम्पुट : दोनों हथेलियों को मिलाने और टेढ़ा करने से बना हुआ गड्ढा जिसमें भरकर कुछ दिया या लिया जाता है, प्रवाल : कोरल, कूल : किनारा
तो आइए सुनिए इस कविता के भावों तक पहुँचने की मेरी एक कोशिश..
बहुत सारी पसंदीदा ग़ज़लें होती हैं जिनके तीन चार अशआर डॉयरी के पन्नों पर नोट कर हम उन्हें पूरा मान लेते हैं। बरसों वहीं अशआर हमारे ज़हन में रह रह कर उठते और पलते रहते हैं। ऐसे में जब उसी ग़ज़ल के चंद और अशआर अचानक से सामने आ जाते हैं तो लगता है कि बैठे बिठाए कोई सौगात मिल गयी हो। लखनऊ से ताल्लुक रखने वाले शायर कृष्ण बिहारी नूर की इस मशहूर ग़ज़ल के पाँच शेर बरसों से मेरे पास थे पर कल उनसे जुड़ी एक किताब पढ़ते हुए ग़ज़ल के चंद शेर और हाथ लगे तो सोचा आप तक उनकी ये पूरी कृति पहुँचा दूँ।
इस ग़ज़ल से जुड़े एक किस्से का जिक्र कन्हैयालाल नंदन जी ने अपने एक आलेख में किया है। तब नंदन जी मुंबई में पत्र पत्रकारिता से जुड़े काम के सिलसिले में पदस्थापित थे। नूर साहब एक मुशायरे के सिलसिले में मुंबई आए हुए थे और नवी मुंबई के वासी में ठहरे थे जो कि मुख्य शहर से काफी दूर का इलाका है। उन्होंने नंदन जी को फोन कर कहा कि वो उनसे मिलना चाहते हैं। कन्हैयालाल नंदन को यही लगा कि इतनी दूर से ख़ुद फोन कर मिलने की बात कर रहा है तो जरूर इसे मुझसे कोई काम होगा। पर डेढ़ घंटे बाद जब नूर हाज़िर हुए तो उनसे उनके आने का उद्देश्य जान कर नंदन आश्चर्यचकित रह गए। नूर साहब का कहना था कि बस एक नई ग़ज़ल लिखी है वही आप जैसे संवेदनशील श्रोता को सुनाना चाहता था। वो ग़जल यही ग़ज़ल थी जिसका जिक्र मैंने आज आपसे छेड़ा है।
तो चलिए देखते हैं कि आख़िर क्या कहना चाहा था कृष्ण बिहारी नूर ने अपनी इस ग़ज़ल में...
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि ये शरीर प्रकृति के पंच तत्वों से निर्मित है और भगवान का वास हर जगह है। यानि अपने अंदर भी अगर हम पवित्र मन से झांकें तो वहाँ परमात्मा जरूर दिखेंगे। कृष्ण बिहारी नूर ने इस सोच को अपने मतले में ढालते हुए लिखा कि
आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझ में
नूर साहब की ये विशेषता थी कि वो अपनी शायरी में सूफ़ियत के साथ मोहब्बत का रंग बड़े सलीके से घोला करते थे। अब अगले शेर में वो परमपिता या अपने महबूब से मुख़ातिब हैं इसका फैसला तो आप ही कीजिए। पर जो भी है इस मोहब्बत का आलम ये है कि इसने उन्हें अपने आप से जुदा कर दिया है। अब तो उसका इख्तियार उनके ज़हन पर हो गया है
अब तो ले-दे के वही शख़्स बचा है मुझ में मुझको मुझसे अलग करके छुपा है मुझ में
ऐसे अगर आपको चाहने वाला आपकी हर छोटी छोटी बात को आत्मसात करते हुए आपके अंतर्मन को टटोलने की कोशिश करने लगे तो फिर अपने हाल के बारे में आप भी कह उठेंगे कि
मेरा ये हाल उघड़ती हुई परतें जैसे, वो बड़ी देर से कुछ ढूँढ रहा है मुझ में
ये तो मुझे पूरी ग़ज़ल में सबसे कमाल का शेर लगता है। कितनी तरह के अच्छे बुरे अहसासों, विराधाभासों से दिल जूझता रहता है। ठीक मौसम की बदलती रंगत की तरह। ये अहसास कभी सुकून के पल ले आते हैं तो कभी बेहिसाब बेचैनी। इन बदलती भावनाओं के बीच दिल की फ़िज़ा जो रंग बिखेरती है उन्हें शब्दों में बयाँ करना आसान है क्या?
जितने मौसम हैं वो सब जैसे कहीं मिल जाएँ इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझ में
आप मेरे करीब भी नहीं आएँ, दूर से ही मेरे बारे में कोई राय बना लें तो इसमें मेरा क्या कुसूर? मेरे सच्चे दिल की पुकार और व्यक्तित्व की चमक को महसूस करने के लिए आपको मेरे संग कुछ वक़्त तो ज़ाया करना ही पड़ेगा।
वो ही महसूस करेगा जो मुख़ातिब होगा ऐसे अनदेखे उजाले की सदा है मुझमें
मैंने तो सोचा था कि उनकी नज़दीकियाँ पूरे जिस्म में एक ख़ुमारी सी ले आती हैं। पर मैं नहीं जानता था कि उनके लिए मेरा प्रेम एक नशा नहीं जो चढ़ के उतर जाएगा। वो तो मेरे शरीर के हर कोने में दौड़ते लहू की भांति मेरी नस नस में है जो मेरी साँस थमने से ही रुकेगा।
नशा-ए-मय की तरह समझा था क़ुरबत उसकी वो तो मानिंद ए लहू दौड़ रहा है मुझमें
आईने की भी अपनी सीमाएँ हैं। वो बस आपका बाहरी रूप रंग ही दिखा पाता है। आपके अंदर का अक़्स उसकी पहुँच से कोसों दूर है।
आईना ये तो बताता है के मैं क्या हूँ लेकिन आईना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझ में
टोंक देता है, कदम जब भी ग़लत उठता है ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें
अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ 'नूर' मैं कहाँ तक करूँ साबित के वफ़ा है मुझ में
ये तो थे ग़ज़ल के पूरे शेर। नूर साहब की आवाज़ में जब ये ग़ज़ल नहीं मिली तो मैंने सोचा क्यूँ ना इसे अपनी आवाज़ में ही रिकार्ड कर लूँ। तो ये रही नूर साहब की भावनाओं तक अपनी आवाज़ से पहुँचने की मेरी कोशिश।
छुआछूत की समस्या ने एक समय इस देश में विकराल रूप धारण किया हुआ था।
आज़ादी के सात दशकों बाद हमारे समाज की रुढ़ियाँ ढीली तो हो गयी हैं पर फिर
भी गाहे बगाहे देश के सुदूर इलाकों से मंदिर में प्रवेश से ले कर पानी के
इस्तेमाल पर रोक जैसी घटनाएँ सामने आती ही रहती हैं। यानि कहीं ना कहीं आज भी सबको समान अधिकार देने के फलसफ़े को हममें से कई लोग दिल से स्वीकार नहीं कर पाए हैं। अगर ऐसा ना होता तो ना ये छिटपुट घटनाएँ होती और ना ही स्त्रियों को आज भी मंदिर या दरगाह के हर हिस्से में जाने के अपने अधिकार के लिए लड़ना पड़ रहा होता।
किसी आस्थावान व्यक्ति से भगवान का आशीर्वाद पाने का
अधिकार छीन लेना कितना घृणित लगता है ना? बरसों पहले इसी समस्या पर सियाराम
शरण गुप्त ने एक लंबी सी कविता लिखी थी। कविता क्या कविता के रूप में एक
कहानी ही तो थी उनकी ये रचना। वैसे भी सियाराम शरण जी अपनी कविताओं की
कथात्मकता के लिए जाने जाते थे। कविता का शीर्षक था एक फूल की चाह जो आजकल
NCERT की नवीं कक्षा में अपने संक्षिप्त रूप में पढ़ाई जाती है।
झांसी
से ताल्लुक रखने वाले सियाराम शरण गुप्त, हिंदी के प्रखर कवि मैथिली शरण
गुप्त के अनुज थे। गाँधी और विनोबा के विचारों से प्रभावित सियाराम शरण
गुप्त ने अपनी कविताओं में तात्कालीन सामाजिक कुरीतियों पर जबरदस्त
कुठाराघात किया है। अछूतों से सामाजिक भेदभाव को दर्शाती ये कविता एक छोटी बच्ची सुखिया और उसके पिता के इर्द गिर्द घूमती है।
महामारी में ज्वर से पीड़ित सुखिया मंदिर से देवी के
आशीर्वाद स्वरूप पूजा के एक फूल की कामना रखती थी पर तमाम कोशिशों के
बावज़ूद उसका पिता अपनी बेटी की ये अंतिम इच्छा पूरी नहीं कर पाता क्यूंकि
समाज के ठेकेदारों ने उसे अछूत का तमगा दे रखा है। सियारामशरण जी ने इस
घटना का कविता में मार्मिकता से चित्रण किया है।
भगवान के घर के रखवालों की ऐसी छोटी सोच पर प्रभावशाली ढंग से तंज़ कसते हुए कवि सुखिया के पिता की तरफ़ से सवाल दागते हुए कहते हैं कि
ऐ, क्या मेरा कलुष बड़ा है, देवी की गरिमा से भी किसी बात में हूँ मैं आगे, माता की महिमा से भी? माँ के भक्त हुए तुम कैसे, करके यह विचार खोटा माँ से सम्मुख ही माँ का तुम, गौरव करते हो छोटा!
इस
कविता को अंत तक पढ़ते हुए गला रूँध सा जाता है और आवाज़ जवाब दे जाती है।
फिर भी मैंने एक कोशिश की है सुनियेगा और बताइएगा कि क्या ये कविता आपके
दिल को झकझोरने में सफल हुई? कम से कम मुझे तो ऐसा ही महसूस हुआ इसे पढ़ते
हुए..
उद्वेलित कर अश्रु-राशियाँ, हृदय-चिताएँ धधकाकर,
महा महामारी प्रचण्ड हो, फैल रही थी इधर उधर।
क्षीण-कण्ठ मृतवत्साओं का, करुण-रुदन दुर्दान्त नितान्त,
भरे हुए था निज कृश रव में, हाहाकार अपार अशान्त।
बहुत रोकता था सुखिया को, ‘न जा खेलने को बाहर’,
नहीं खेलना रुकता उसका, नहीं ठहरती वह पल भर।
मेरा हृदय काँप उठता था, बाहर गई निहार उसे;
यही मानता था कि बचा लूँ, किसी भांति इस बार उसे।
भीतर जो डर रहा छिपाये, हाय! वही बाहर आया।
एक दिवस सुखिया के तनु को, ताप-तप्त मैंने पाया।
ज्वर से विह्वल हो बोली वह, क्या जानूँ किस डर से डर -
मुझको देवी के प्रसाद का, एक फूल ही दो लाकर।
बेटी, बतला तो तू मुझको, किसने तुझे बताया यह किसके द्वारा, कैसे तूने. भाव अचानक पाया यह? मैं अछूत हूँ, मुझे कौन हा! मन्दिर में जाने देगा देवी का प्रसाद ही मुझको, कौन यहाँ लाने देगा?
बार बार, फिर फिर, तेरा हठ!, पूरा इसे करूँ कैसे;
किससे कहे कौन बतलावे, धीरज हाय! धरूँ कैसे?
कोमल कुसुम समान देह हा!, हुई तप्त अंगार-मयी
प्रति पल बढ़ती ही जाती है, विपुल वेदना, व्यथा नई।
मैंने कई फूल ला लाकर, रक्खे उसकी खटिया पर
सोचा - शान्त करूँ मैं उसको, किसी तरह तो बहला कर।
तोड़-मोड़ वे फूल फेंक सब, बोल उठी वह चिल्ला कर -
मुझको देवी के प्रसाद का, एक फूल ही दो लाकर!
क्रमश: कण्ठ क्षीण हो आया, शिथिल हुए अवयव सारे,
बैठा था नव-नव उपाय की, चिन्ता में मैं मनमारे।
जान सका न प्रभात सजग से, हुई अलस कब दोपहरी,
स्वर्ण-घनों में कब रवि डूबा, कब आई सन्ध्या गहरी।
सभी ओर दिखलाई दी बस, अन्धकार की ही छाया
छोटी-सी बच्ची को ग्रसने, कितना बड़ा तिमिर आया!
ऊपर विस्तृत महाकाश में, जलते-से अंगारों से,
झुलसी-सी जाती थी आँखें, जगमग जगते तारों से।
देख रहा था - जो सुस्थिर हो, नहीं बैठती थी क्षण भर,
हाय! बही चुपचाप पड़ी थी, अटल शान्ति-सी धारण कर।
सुनना वही चाहता था मैं, उसे स्वयं ही उकसा कर -
मुझको देवी के प्रसाद का, एक फूल ही दो लाकर!
हे माते:, हे शिवे, अम्बिके, तप्त ताप यह शान्त करो;
निरपराध छोटी बच्ची यह, हाय! न मुझसे इसे हरो!
काली कान्ति पड़ गई इसकी, हँसी न जाने गई कहाँ,
अटक रहे हैं प्राण क्षीण तर, साँसों में ही हाय यहाँ!
अरी निष्ठुरे, बढ़ी हुई ही, है यदि तेरी तृषा नितान्त,
तो कर ले तू उसे इसी क्षण, मेरे इस जीवन से शान्त!
मैं अछूत हूँ तो क्या मेरी, विनती भी है हाय! अपूत,
उससे भी क्या लग जाएगी, तेरे श्री-मन्दिर को छूत?
किसे ज्ञात, मेरी विनती वह, पहुँची अथवा नहीं वहाँ,
उस अपार सागर का दीखा, पार न मुझको कहीं वहाँ।
अरी रात, क्या अक्ष्यता का, पट्टा लेकर आई तू,
आकर अखिल विश्व के ऊपर, प्रलय-घटा सी छाई तू!
पग भर भी न बढ़ी आगे तू, डट कर बैठ गई ऐसी,
क्या न अरुण-आभा जागेगी, सहसा आज विकृति कैसी!
युग के युग-से बीत गये हैं, तू ज्यों की त्यों है लेटी,
पड़ी एक करवट कब से तू, बोल, बोल, कुछ तो बेटी!
वह चुप थी, पर गूँज रही थी, उसकी गिरा गगन-भर भर
‘मुझको देवी के प्रसाद का, एक फूल तुम दो लाकर!’
“कुछ हो देवी के प्रसाद का, एक फूल तो लाऊँगा
हो तो प्रात:काल, शीघ्र ही, मन्दिर को मैं जाऊँगा।
तुझ पर देवी की छाया है, और इष्ट है यही तुझे;
देखूँ देवी के मन्दिर में, रोक सकेगा कौन मुझे।”
मेरे इस निश्चल निश्चय ने, झट-से हृदय किया हलका;
ऊपर देखा - अरुण राग से, रंजित भाल नभस्थल का!
झड़-सी गई तारकावलि थी, म्लान और निष्प्रभ होकर
निकल पड़े थे खग नीड़ों से, मानों सुध-बुध सी खो कर।
रस्सी डोल हाथ में लेकर, निकट कुएँ पर जा जल खींच,
मैंने स्नान किया शीतल हो, सलिल-सुधा से तनु को सींच।
उज्वल वस्र पहन घर आकर, अशुचि ग्लानि सब धो डाली।
चन्दन-पुष्प-कपूर-धूप से, सजली पूजा की थाली।
सुखिया के सिरहाने जाकर, मैं धीरे से खड़ा हुआ।
आँखें झँपी हुई थीं, मुख भी, मुरझा-सा था पड़ा हुआ।
मैंने चाहा - उसे चूम लें, किन्तु अशुचिता से डर कर
अपने वस्त्र सँभाल, सिकुड़कर, खड़ा रहा कुछ दूरी पर।
वह कुछ कुछ मुसकाई सहसा, जाने किन स्वप्नों में लग्न,
उसकी वह मुसकाहट भी हा! कर न सकी मुझको मुद-मग्न।
अक्षम मुझे समझकर क्या तू, हँसी कर रही है मेरी?
बेटी, जाता हूँ मन्दिर में, आज्ञा यही समझ तेरी।
उसने नहीं कहा कुछ, मैं ही, बोल उठा तब धीरज धर
तुझको देवी के प्रसाद का, एक फूल तो दूँ लाकर!
ऊँचे शैल-शिखर के ऊपर, मन्दिर था विस्तीर्ण विशाल
स्वर्ण-कलश सरसिज विहसित थे, पाकर समुदित रवि-कर-जाल।
परिक्रमा-सी कर मन्दिर की, ऊपर से आकर झर झर,
वहाँ एक झरना झरता था, कल-कल मधुर गान कर-कर।
पुष्प-हार-सा जँचता था वह, मन्दिर के श्री चरणों में,
त्रुटि न दिखती थी भीतर भी, पूजा के उपकरणों में।
दीप-दूध से आमोदित था, मन्दिर का आंगन सारा
गूँज रही थी भीतर-बाहर, मुखरित उत्सव की धारा।
भक्त-वृन्द मृदु-मधुर कण्ठ से, गाते थे सभक्ति मुद-मय -
“पतित-तारिणि पाप-हारिणी, माता, तेरी जय-जय-जय!”
“पतित-तारिणी, तेरी जय-जय” -मेरे मुख से भी निकला,
बिना बढ़े ही मैं आगे को, जानें किस बल से ढिकला!
माता, तू इतनी सुन्दर है, नहीं जानता था मैं यह;
माँ के पास रोक बच्चों की, कैसी विधि यह तू ही कह?
आज स्वयं अपने निदेश से, तूने मुझे बुलाया है;
तभी आज पापी अछूत यह, श्री-चरणों तक आया है।
मेरे दीप-फूल लेकर वे, अम्बा को अर्पित करके
दिया पुजारी ने प्रसाद जब, आगे को अंजलि भरके
भूल गया उसका लेना झट, परम लाभ-सा पाकर मैं।
सोचा - बेटी को माँ के ये, पुण्य-पुष्प दूँ जाकर मैं।
सिंह पौर तक भी आंगन से, नहीं पहुँचने मैं पाया,
सहसा यह सुन पड़ा कि - “कैसे, यह अछूत भीतर आया?
पकड़ो, देखो भाग न जावे, बना धूर्त यह है कैसा;
साफ-स्वच्छ परिधान किए है, भले मानुषों जैसा!
पापी ने मन्दिर में घुसकर, किया अनर्थ बड़ा भारी
कुलषित कर दी है मन्दिर की, चिरकालिक शुचिता सारी।” ऐ, क्या मेरा कलुष बड़ा है, देवी की गरिमा से भी किसी बात में हूँ मैं आगे, माता की महिमा से भी?
माँ के भक्त हुए तुम कैसे, करके यह विचार खोटा माँ से सम्मुख ही माँ का तुम, गौरव करते हो छोटा!
कुछ न सुना भक्तों ने, झट से, मुझे घेर कर पकड़ लिया;
मार-मार कर मुक्के-घूँसे, धम-से नीचे गिरा दिया!
मेरे हाथों से प्रसाद भी, बिखर गया हा! सब का सब,
हाय! अभागी बेटी तुझ तक, कैसे पहुँच सके यह अब।
मैंने उनसे कहा - दण्ड दो, मुझे मार कर, ठुकरा कर,
बस, यह एक फूल कोई भी, दो बच्ची को ले जाकर।
न्यायालय ले गए मुझे वे, सात दिवस का दण्ड-विधान
मुझको हुआ; हुआ था मुझसे, देवी का महान अपमान!
मैंने स्वीकृत किया दण्ड वह, शीश झुकाकर चुप ही रह
उस असीम अभियोग, दोष का, क्या उत्तर देता; क्या कह?
सात रोज ही रहा जेल में, या कि वहाँ सदियाँ बीतीं,
अविस्श्रान्त बरसा करके भी, आँखें तनिक नहीं रीतीं।
कैदी कहते - “अरे मूर्ख, क्यों ममता थी मन्दिर पर ही?
पास वहाँ मसजिद भी तो थी, दूर न था गिरजाघर भी।”
कैसे उनको समझाता मैं, वहाँ गया था क्या सुख से
देवी का प्रसाद चाहा था, बेटी ने अपने मुख से।
दण्ड भोग कर जब मैं छूटा, पैर न उठते थे घर को
पीछे ठेल रहा था कोई, भय-जर्जर तनु पंजर को।
पहले की-सी लेने मुझको, नहीं दौड़ कर आई वह
उलझी हुई खेल में ही हा! अबकी दी न दिखाई वह।
उसे देखने मरघट को ही, गया दौड़ता हुआ वहाँ
मेरे परिचित बन्धु प्रथम ही, फूँक चुके थे उसे जहाँ।
बुझी पड़ी थी चिता वहाँ पर, छाती धधक उठी मेरी,
हाय! फूल-सी कोमल बच्ची, हुई राख की थी ढेरी!
अन्तिम बार गोद में बेटी, तुझको ले न सका मैं हाय!
एक फूल माँ का प्रसाद भी, तुझको दे न सका मैं हा!
वह प्रसाद देकर ही तुझको, जेल न जा सकता था क्या?
तनिक ठहर ही सब जन्मों के, दण्ड न पा सकता था क्या?
बेटी की छोटी इच्छा वह, कहीं पूर्ण मैं कर देता
तो क्या अरे दैव, त्रिभुवन का, सभी विभव मैं हर लेता?
यहीं चिता पर धर दूँगा मैं, - कोई अरे सुनो, वर दो -
मुझको देवी के प्रसाद का, एक फूल ही लाकर दो!
(मृतवत्सा – जिस माँ की संतान मर गई हो, दुर्दांत – जिसे दबाना या वश में करना करना हो, कॄश – कमज़ोर, रव – शोर , तनु - शरीर• स्वर्ण घन - सुनहले बादल, तिमिर – अंधकार, विस्तीर्ण – फैला हुआ, रविकर जाल - सूर्य किरणों का समूह, अमोदित - आनंदपूर्ण, ढिकला - ठेला गया, सिंह पौर - मंदिर का मुख्य द्वार, परिधान - वस्त्र,• शुचिता – पवित्रता, सरसिज – कमल , अविश्रांत – बिना थके हुए , प्रभात सजग - हलचल भरी सुबह।)
कविताएँ तो स्कूल के ज़माने में खूब पढ़ीं। कुछ खूब पसंद आतीं तो कुछ पल्ले ही नहीं पड़तीं। सतपुड़ा के घने जंगल भी पसंद ना आने वाली कविताओं में ही एक थी। एक तो थी भी इतनी लंबी। दूसरे तब ये समझ के बाहर होता था कि किसी जंगल पर भी इतनी लंबी कविता लिखी जा सकती है। किसी जंगल में घूमना विचरना ही उस छोटी उम्र में हुआ ही कहाँ था? फिर भी परीक्षा के ख़्याल से ही कुछ रट रटा के ये पाठ निकालने की फिराक़ में थे कि घास पागल, कास पागल, शाल और पलाश पागल, लता पागल, वात पागल, डाल पागल, पात पागल पढ़कर हमने ये निष्कर्ष निकाल लिया था कि या तो ये कवि पागल था या इस कविता का मर्म समझते समझते हम ही पागल हो जाएँगे।
आज से ठीक दस साल पहले मुझे पचमढ़ी जाने का मौका मिला और वहाँ सतपुड़ा के घने जंगलों से पहली बार आमना सामना हुआ। अप्सरा, डचेस और बी जैसे जलप्रपातों तक पहुँचने के लिए हमें वहाँ के जंगलों के बीच अच्छी खासी पैदल यात्रा करनी पड़ी। सच कहूँ तब मुझे पग पग पर भवानी प्रसाद मिश्र की ये कविता याद आई और तब जाकर बुद्धि खुली कि कवि ने क्या महसूस कर ये सब रचा होगा। सतपुड़ा के जंगल के बीच बसे पचमढ़ी से जुड़े यात्रा वृत्तांत में मैंने जगह जगह इस कविता के विभिन्न छंदो को अपने आस पास सजीव होता पाया...
"सतपुड़ा के हरे भरे जंगलों में एक अजीब सी गहन निस्तब्धता है। ना तो हवा
में कोई सरसराहट, ना ही पंछियों की कोई कलरव ध्वनि। सब कुछ अलसाया सा,
अनमना सा। पत्थरों का रास्ता काटती पतली लताएँ जगह जगह हमें अवलम्ब देने के
लिये हमेशा तत्पर दिखती थीं। पेड़ कहीं आसमान को छूते दिखाई देते थे तो
कहीं आड़े तिरछे बेतरतीबी से फैल कर पगडंडियों के बिलकुल करीब आ बैठते थे।.."
अगर इन जंगलों की प्रकृति के बारे में आपकी उत्सुकता हो तो आप उस आलेख को यहाँ पढ़ सकते हैं।
भवानी प्रसाद मिश्र जी मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले से ताल्लुक रखते थे। गाँधीवादी थे सो कविताओं के साथ आजादी की लड़ाई में भी अपना योगदान निभाते रहे। कविताएँ तो हाईस्कूल से ही लिखनी शुरु कर चुके थे। गीत फरोश, चकित है दुख, गान्धी पंचशती, बुनी हुई रस्सी, खुशबू के शिलालेख, त्रिकाल सन्ध्या जैसे कई काव्य संग्रह उनकी लेखनी के नाम है। बुनी हुई रस्सी के लिए वो 1972 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हुए उनकी कविताएं भाषा की सहजता और गेयता के लिए जानी जाती थीं। कविताओं में सहज भाषा के प्रयोग की हिमायत करती उनकी ये उक्ति बार बार याद की जाती है....
जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख।
है ना पते की बात। वही कविता जिसका सिर पैर मुझे समझ नहीं आता था, अब मेरी प्रिय हो गई है। इसीलिए आज मैंने इस कविता को अपनी आवाज़ में रिकार्ड किया है। आशा है आप इसे सुनकर मुझे बताएँगे कि मेरा ये प्रयास आपको कैसा लगा?
सतपुड़ा के घने जंगल नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल।
झाड़ ऊँचे और नीचे, चुप खड़े हैं आँख मींचे, घास चुप है, कास चुप है मूक शाल, पलाश चुप है। बन सके तो धँसो इनमें, धँस न पाती हवा जिनमें, सतपुड़ा के घने जंगल ऊँघते अनमने जंगल।
सतपुड़ा के घने जंगल पचमढ़ी शहर के करीब
सड़े पत्ते, गले पत्ते, हरे पत्ते, जले पत्ते, वन्य पथ को ढक रहे-से पंक-दल मे पले पत्ते। चलो इन पर चल सको तो, दलो इनको दल सको तो, ये घिनौने-घने जंगल नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल।
अटपटी-उलझी लताएँ, डालियों को खींच खाएँ, पैर को पकड़ें अचानक, प्राण को कस लें कपाएँ। सांप सी काली लताएँ बला की पाली लताएँ लताओं के बने जंगल नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल।
सतपुड़ा के जंगल डचेस फॉल ले रास्ते में
मकड़ियों के जाल मुँह पर, और सर के बाल मुँह पर मच्छरों के दंश वाले, दाग काले-लाल मुँह पर, वात- झन्झा वहन करते, चलो इतना सहन करते, कष्ट से ये सने जंगल, नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल|
अजगरों से भरे जंगल अगम, गति से परे जंगल
सात-सात पहाड़ वाले, बड़े-छोटे झाड़ वाले, शेर वाले बाघ वाले, गरज और दहाड़ वाले, कम्प से कनकने जंगल, नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल।
इन वनों के खूब भीतर, चार मुर्गे, चार तीतर पाल कर निश्चिन्त बैठे, विजनवन के बीच बैठे, झोंपडी पर फूस डाले गोंड तगड़े और काले। जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती, और महुए से लपकती, मत्त करती बास आती, गूँज उठते ढोल इनके, गीत इनके, बोल इनके सतपुड़ा के घने जंगल नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल।
हांडी खोह, पचमढ़ी
जागते अँगड़ाइयों में, खोह-खड्डों खाइयों में, घास पागल, कास पागल, शाल और पलाश पागल, लता पागल, वात पागल, डाल पागल, पात पागल मत्त मुर्गे और तीतर, इन वनों के खूब भीतर।
क्षितिज तक फैला हुआ-सा, मृत्यु तक मैला हुआ-सा, क्षुब्ध, काली लहर वाला मथित, उत्थित जहर वाला, मेरु वाला, शेष वाला शम्भु और सुरेश वाला एक सागर जानते हो, उसे कैसा मानते हो? ठीक वैसे घने जंगल, नींद मे डूबे हुए-से ऊँघते अनमने जंगल|
धँसो इनमें डर नहीं है, मौत का यह घर नहीं है, उतर कर बहते अनेकों, कल-कथा कहते अनेकों, नदी, निर्झर और नाले, इन वनों ने गोद पाले। लाख पंछी सौ हिरन-दल, चाँद के कितने किरन दल, झूमते बन-फूल, फलियाँ, खिल रहीं अज्ञात कलियाँ, हरित दूर्वा, रक्त किसलय, पूत, पावन, पूर्ण रसमय सतपुड़ा के घने जंगल, लताओं के बने जंगल।
रामधारी सिंह 'दिनकर' की कविताएँ बचपन से मन को उद्वेलित करती रही हैं। पर स्कूल की पुस्तकों में उनके लिखे महाकाव्य कुरुक्षेत्र व रश्मिरथी के कुछ बेहद लोकप्रिय अंश ही रहा करते थे । स्कूल के दिनों में उनकी दो लोकप्रिय कविताएँ शक्ति और क्षमा व हिमालय हमने नवीं और दसवीं में पढ़ी थीं जो कुरुक्षेत्र का ही हिस्सा थीं। कुरुक्षेत्र तो महाभारत के शांति पर्व पर आधारित थी वहीं रश्मिरथी दानवीर कर्ण पर ! रश्मिरथी का शाब्दिक अर्थ वैसे व्यक्ति से है जिसका जीवन रथ किरणों का बना हो। किरणें तो ख़ुद ही सुनहरी व उज्ज्वल होती हैं। कर्ण के लिए ऐसे उपाधि का चयन दिनकर ने संभवतः उनके सूर्यपुत्र और पुण्यात्मा होने की वज़ह से किया हो।
रश्मिरथी के अंशों को मैंने शुरुआत में टुकड़ों में पढ़ा इस बात से अनजान कि ये पुस्तक बचपन से ही घर में मौज़ूद रही। रश्मिरथी यूँ तो 1952 में प्रकाशित हुई पर 1980 में जब करीब सवा सौ पन्नों की ये पुस्तक मेरे घर आई तो जानते हैं इसका मूल्य कितना था? मात्र ढाई रुपये!
जब किताब हाथ में आई तो समझ आया कि ये काव्य तो एक ऐसी रोचक कथा की तरह चलता है जिसे एक बार पढ़ना शुरु किया तो फिर बीच में इसे छोड़ना संभव नहीं। दिनकर, महाभारत के पात्र कर्ण की ये गाथा सात सर्गों यानि खंडों में कहते हैं। दिनकर की भाषा इतनी ओजमयी है कि शायद ही कोई उनके इस काव्य को बिना बोले हुए पढ़ सके। आज जन्माष्टमी के अवसर पर मैं आपको इस महाकाव्य के तीसरे सर्ग का वो हिस्सा सुनाने जा रहा हूँ जिसमें बारह वर्ष के वनवास और एक साल के अज्ञातवास को काटने के बाद पांडवों ने कौरवों से सुलह के लिए भगवान कृष्ण को हस्तिनापुर भेजा जो कौरवों की राजधानी हुआ करती थी। इस अंश को कई जगह कृष्ण की चेतावनी के रूप में किताबों में प्रस्तुत किया गया।
वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस बचाने को, भगवान् हस्तिनापुर आये, पांडव का संदेशा लाये। दो न्याय अगर तो आधा दो, पर, इसमें भी यदि बाधा हो, तो दे दो केवल पाँच ग्राम, रखो अपनी धरती तमाम। हम वहीं खुशी से खायेंगे, परिजन पर असि न उठायेंगे! दुर्योधन वह भी दे ना सका, आशीष समाज की ले न सका, उलटे हरि को बाँधने चला, जो था असाध्य साधने चला। जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।
हरि ने भीषण हुंकार किया, अपना स्वरूप-विस्तार किया, डगमग-डगमग दिग्गज डोले, भगवान कुपित होकर बोले जंजीर बढ़ा कर साध मुझे, हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।
यह देख, गगन मुझमें लय है, यह देख, पवन मुझमें लय है, मुझमें विलीन झंकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल, भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं। दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर, सब हैं मेरे मुख के अन्दर।
परिधि-बन्ध : क्षितिज , मैनाक-मेरु : दो पौराणिक पर्वत दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख, मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख, चर-अचर जीव, जग क्षर-अक्षर, नश्वर मनुष्य, सुरजाति अमर। शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र, शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।
दृग : आँख, शत कोटि : सौ करोड़ शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश, शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश, शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल, शत कोटि दण्डधर लोकपाल। जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें, हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें। जिष्णु : विष्णु के अवतार
भूलोक अटल पाताल देख, गत और अनागत काल देख यह देख जगत का आदि सृजन, यह देख महाभारत का रण मृतकों से पटी हुई भू है पहचान, कहाँ इसमें तू है अंबर में कुंतल जाल देख, पद के नीचे पाताल देख मुट्ठी में तीनो काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख सब जन्म मुझी से पाते हैं फिर लौट मुझी में आते हैं कुंतल :केश
जिह्वा से कढ़ती ज्वाला सघन, साँसों से पाता जन्म पवन पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर, हँसने लगती है सृष्टि उधर मैं जभी मूँदता हूँ लोचन छा जाता चारो ओर मरण लोचन : आँख बाँधने मुझे तो आया है, जंजीर बड़ी क्या लाया है? यदि मुझे बाँधना चाहे मन, पहले तो बाँध अनन्त गगन। सूने को साध न सकता है, वह मुझे बाँध कब सकता है? हित-वचन नहीं तूने माना, मैत्री का मूल्य न पहचाना, तो ले, मैं भी अब जाता हूँ, अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ। याचना नहीं, अब रण होगा, जीवन-जय या कि मरण होगा।
टकरायेंगे नक्षत्र-निकर, बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर, फण शेषनाग का डोलेगा, विकराल काल मुँह खोलेगा। दुर्योधन! रण ऐसा होगा। फिर कभी नहीं जैसा होगा। वह्नि : अग्निपुंज भाई पर भाई टूटेंगे, विष-बाण बँद से छूटेंगे, वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे, सौभाग्य मनुज के फूटेंगे। आखिर तू भूशायी होगा, हिंसा का पर, दायी होगा।
वायस : कौआ, श्रृगाल : सियार
थी सभा सन्न, सब लोग डरे, चुप थे या थे बेहोश पड़े। केवल दो नर न अघाते थे, धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे। कर जोड़ खड़े प्रमुदित, निर्भय, दोनों पुकारते थे 'जय-जय'!
विदुर तो पहले से ही कृष्ण भक्त थे इसलिए उन्हें प्रभु के विकराल रूप के दर्शन हुए। पर ऐसी कथा है कि विदुर ने जब धृतराष्ट्र से कहा कि आश्चर्य है कि भगवान अपने विराट रूप में विराज रहे हैं। इसपर धृतराष्ट्र ने अपने अंधे होने का पश्चाताप किया। पश्चाताप करते ही भगवन के इस विराट रूप देखने तक के लिए उनको दृष्टि मिल गयी।
मुझे तो इस कविता को पढ़ना और अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करना आनंदित कर गया। रश्मिरथी का ये अंश और पूरी किताब आपको कैसी लगती है ये जरूर बताएँ। तीसरे सर्ग के इस अंश का कुछ हिस्सा अनुराग कश्यप ने अपनी फिल्म गुलाल में भी इस्तेमाल किया था। उन अंशों को अपनी आवाज़ से सँवारा था पीयूष मिश्रा ने।
रमेश गौड़ को मैं नहीं जानता। कुछ दिन पहले व्हाट्सएप पर उनकी ये कविता एक मित्र ने भेजी और जी एकदम से उसे पढ़कर उदास हो गया। पता नहीं रमेश जी ने किसको सोचकर ये कविता लिखी होगी. पर इसमें उन सब लोगों का दर्द है जो अपनी छाया से दूर हैं। हम उसी व्यक्तित्व से तो जुड़ते हैं या जोड़ने की सोचते हैं जिसमें हमें अपना अक्स नज़र आता है या फिर ऐसी बात नज़र आती है जो हममें भले ना हो पर हम वैसा होना चाहते हैं। बरसों हम इसी काल्पनिक छाया के सपनों में डूबते उतराते रहते हैं। कभी तो ये कल्पना ज़िदगी की आपा धापी में दब सी जाती है तो कभी उस शख्स से सचमुच ही मिला देती है।
नेपथ्य में ताकती दो आँखें कुछ खोज रही हों जैसे, चित्र सोनमर्ग, जम्मू एवम् कश्मीर
अब ये छाया आभासी है या वास्तविक इससे क्या फर्क पड़ता है। उससे दूरी तो हमेशा ही खटकती है। अपनी छाया के बिना हम पूर्ण ही तो नहीं हो पाते। रमेश गौड़ इसी अपूर्णता को कुछ खूबसूरत और अनसुने से बिंबों में बाँटते हैं। कविता में मुझे विशेष रूप से संख्या के पीछे हटती इकाई, और बरसों बाद आई चिट्ठी के धुल जाने की बात दिल को छू गई। लगा कि जो उदासी इसे पढ़ने से मन में छाई है उसे तभी निकाल पाऊँगा जब इसे एक बार मन से पढ़ दूँ..
जैसे सूखा ताल बच रहे या कुछ कंकड़ या कुछ काई जैसे धूल भरे मेले में चलने लगे साथ तन्हाई, तेरे बिन मेरे होने का मतलब कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे सिफ़रों की क़तार बाक़ी रह जाए बिन इकाई ।
जैसे ध्रुवतारा बेबस हो, स्याही सागर में घुल जाए जैसे बरसों बाद मिली चिट्ठी भी बिना पढ़े धुल जाए, तेरे बिन मेरे होने का मतलब कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे लावारिस बच्चे की आधी रात नींद खुल जाए ।
जैसे निर्णय कर लेने पर मन में एक दुविधा रह जाए जैसे बचपन की क़िताब में कोई फूल मुँदा रह जाए, मेरे मन पर तेरी यादें अब भी कुछ ऐसे अंकित हैं जैसे खंडहर पर शासक का शासन-काल खुदा रह जाए...
रमेश गौड़ से अगर मेरे पाठकों में कोई परिचित हो तो जरूर मुझे आगाह करे। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में जानकर मुझे खुशी होगी...
अहमद फ़राज़ मेरे प्रिय शायरों में से एक रहे हैं। उन्हें पढ़ना या यूँ कहूँ कि बार बार पढ़ना मन को सुकून देता रहा है। शायरी की आड़ में उनकी चुहलबाजियाँ जहाँ मन को गुदगुदाती रही हैं वहीं उदासी के साये में उनके अशआर हमेशा मन को अपने सिराहने बैठे मिले हैं। इसी लिए गाहे बगाहे उनकी शायरी आपसे बाँटता रहा हूँ। आज जब उनकी एक ग़ज़ल रह रह कर होठों पर आ रही है उनसे जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा आपको बताना चाहता हूँ। बहुत पहले एक साक्षात्कार में उनके भाई मसूद क़ौसर से किसी ने पूछा कि फ़राज साहब का पहला शेर कौन सा था ?
उनके भाई साहब का कहना था कि बचपन में एक बार उनके वालिद़ पूरे घर भर के लिए कपड़े लाए। फ़राज़ को अपने कपड़ों से कहीं ज्यादा बड़े भाई के लिए लाए गए कपड़े पसंद आ गए और तभी उन्होंने अपनी पहली तुकबंदी इस शेर के माध्यम से व्यक्त की
लाए हैं सबके लिए कपड़े सेल से लाए हैं हमारे लिए कंबल जेल से
फ़राज को अपनी शायरी सुनाने का बड़ा शौक़ था। पढ़ते तो थे पेशावर में लड़कों के कॉलेज में पर उनकी शायरी के चर्चे पास के गर्ल्स कोलेज में भी होते। पाकिस्तान रेडियो में नौकरी भी मिली तो वे काम से ज्यादा अपने सहकर्मियों को हर दिन अपना नया ताज़ा शेर सुनाना नहीं भूलते थे। पर उनकी प्रतिभा ऐसी थी कि घर हो या दफ़्तर, उन्हें बड़े प्यार से सुना जाता था। हिसाब और भूगोल जैसे विषयों में वे हमेशा कमज़ोर रहे पर रूमानी खयालातों पर तो मानो पी एच डी कर रखी थी उन्होंने। वक़्त के साथ फ़ैज़ और अली सरदार जाफ़री जैसे प्रगतिशील शायरों की शायरी का असर भी उन पर पड़ा और यही वज़ह थी कि पाकिस्तान में जिया उल हक़ के समय उन्होंने सेना के शासन का पुरज़ोर विरोध भी किया।
आज आपसे उनकी जिस ग़ज़ल का जिक्र छेड़ रहा हूँ उसमें रूमानियत भी है और
दार्शनिकता का पुट भी।
कितने प्यारे अंदाज़ में वो कह जाते हैं कि शुरु शुरु में
तो इश्क़ एक मीठा सा अहसास जगाता है पर एक बार जब वो अपनी जड़े दिल में जमा
लेता है तो तमाम दर्द का सबब भी वही बन जाता है। दर्द भी ऐसा जनाब कि पल पल सहारा ढूँढे।
रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं इश्क आगाज़1 में हलकी सी खलिश2 रखता है बाद में सैकड़ों आज़ार3 से लग जाते हैं
फ़राज अपने अगले शेर में जीवन के एक कटु सत्य को प्रकट करते हुए कहते हैं एक बार आपने अपने ज़मीर को वासना के हवाले छोड़ दिया तो फिर वो उसका दास बन कर ही रह जाता है।
पहले पहल हवस इक-आध दुकां खोलती है फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते है
दुख में सुख को खोज लेना
भी कोई फ़राज से सीखे। अपनी पीड़ा को हल्का करने का कितना शातिर तरीका खोज
निकाला है उन्होंने.... :)
बेबसी भी कभी कुर्बत4 का सबब5 बनती है रो न पायें तो गले यार के लग जाते हैं
किसी के दुख के प्रति सहानुभूति प्रकट करना एक बात है
पर उसे अपनाना इतना आसान भी नहीं तभी तो फ़राज कहते हैं... कतरनें ग़म की जो गलियों में उडी फिरती है घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते है
और इस शेर की तो
बात ही क्या ! पूरी ग़ज़ल का हासिल है ये। वक्त बीतता है, उम्र बढ़ती है और
साथ साथ बढ़ता है हमारे अनुभवों का ख़जाना। भावनाएँ हमें रिश्तों में उलझाती हैं,
प्रेम करना सिखाती हैं और उन्हें फिर तोड़ना भी। उम्र की इस रफ़्तार में सिर्फ
चेहरे की सलवटें ही हमें परेशान नहीं करतीं। दामन पर पड़े दागों को भी दिल में सहेजना पड़ता है। .. ढोना
पड़ता है।
दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के फ़राज़ कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं
रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं
दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं
इश्क आगाज़* में हलकी सी खलिश* रखता है
बाद में सैकड़ों आज़ार* से लग जाते हैं
पहले पहल हवस इक-आध दुकां खोलती है
फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते है
बेबसी भी कभी कुर्बत* का सबब* बनती है
रो न पायें तो गले यार के लग जाते हैं
कतरनें ग़म की जो गलियों में उडी फिरती है
घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते है
दाग़ दामन के हों, दिल के हों या चेहरे के फ़राज़
कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं
1.शुरुआत 2.बेचैनी 3.दर्द 4.नज़दीकी 5. कारण
फ़राज की इस ग़ज़ल को अपनी आवाज़ में पढ़ने की कोशिश की है। सुनने के लिए नीचे के बटन पर क्लिक करें..
और अगर फ़राज के रंग में और रँगना चाहते हैं तो इन्हें पढ़ें..
मिर्जा ग़ालिब मेरी ज़िंदगी में पहली बार उन पर बने टीवी सीरियल की वज़ह से आए थे। अस्सी का दशक ख़त्म हो रहा था। जगजीत सिंह की आवाज़ के साथ उनकी गाई ग़ज़लों का चस्का लग चुका था। ग़ालिब सीरियल देखने की वज़ह भी जगजीत ही थे। पर गुलज़ार के निर्देशन और नसीरुद्दीन शाह की कमाल की अदाकारी की वज़ह से चचा गालिब भी प्रिय लगने लगे थे। उर्दू जुबान के लफ्जों को समझने का दौर जारी था पर चचाजान की भाषा में इस्तेमाल अरबी फ़ारसी के शब्द सर के ऊपर से गुजरते थे। वो तो गुलज़ार ने उस सीरियल में उनके अपेक्षाकृत सरल शेर इस्तेमाल किए जिसकी वज़ह से ग़ालिब की कही बातों का थोड़ा बहुत हमारे पल्ले भी पड़ा और जितना पड़ा उसी में दिल बाग बाग हो गया।
तब मैं इंटर में था। पढ़ाई लिखाई तो एक ओर थी पर किशोरावस्था में जैसा होता है एक अदद दोस्त की कमी से बेवज़ह दिल में उदासी के बादल मंडराते रहते थे। ऐसे में जब जगजीत की आवाज़ में हजारों ख़्वाहिशें ऐसी की हर ख़्वाहिश में दम निकले, आह को चाहिए बस उम्र बसर होने तक, दिल ही तो है ना संगो खिश्त सुनते तो मायूस दिल को उस आवाज़ में एक मित्र मिल जाता। सो जैसे ही वो दो कैसटों का एलबम बाजार में आया उसी दिन अपने घर ले आए।
आज उसी में से एक ग़ज़ल का जिक्र कर रहे हैं जिसे पहले पहल ग़ालिब ने लिखा और बाद में दाग़ देहलवी साहब ने उसी ज़मीन पर एक और ग़ज़ल कही जो गालिब की कृति जैसी कालजयी तो नहीं पर काबिले तारीफ़ जरूर है।
तो पहले आते हैं चचा की इस ग़ज़ल पर। चचा का जब भी जिक्र होता है तो एक अज़ीम शायर के साथ साथ एक आम से आदमी का चेहरा उभरता है। सारी ज़िदगी उन्होंने मुफ़लिसी में गुजारी। घर का खर्च चलाने के लिए जब तब कर्जे लेते रहे। सात औलादें हुई पर सब की सब ख़ुदा को प्यारी हो गयीं। लेकिन अपनी जिंदगी पर कभी उन्होंने इन तकलीफ़ों को हावी नहीं होने दिया। हँसते मुस्कुराते रहे और जीवन की छोटी छोटी खुशियों को जी भर कर जिया। फिर चाहे वो आम के प्रति उनका लगाव हो या फिर उनकी चुहल से भरी हाज़िर जवाबी। पर उनके भीतर की गहरी उदासी रह रह कर उनकी ग़ज़लों में उभरी और ये ग़ज़ल उसका ही एक उदाहरण है।
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त1 दर्द से भर न आये क्यों
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यों
1. ईंट और पत्थर
दैर2 नहीं, हरम3 नहीं, दर नहीं, आस्तां4 नहीं
बैठे हैं रहगुज़र5 पे हम, ग़ैर हमें उठाये क्यों
2. मंदिर 3. काबा 4. चौखट 5.रास्ता
क़ैद- ए -हयात- ओ -बंद- ए -ग़म6 अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाये क्यों
6. जीवन की क़ैद और गम का बंधन
हाँ वो नहीं ख़ुदापरस्त, जाओ वो बेवफ़ा सही
जिसको हो दीन-ओं-दिल अज़ीज़, उसकी गली में जाये क्यों
"ग़ालिब"-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन-से काम बन्द हैं
रोइए ज़ार-ज़ार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों
आज भी जब गुमसुम होता हूँ तो इस ग़ज़ल को सुनना अच्छा लगता है। अपना ग़म हर
मिसरे से छन के आते दर्द के विशाल सागर में मानो विलीन सा हो जाता है। तो
सुनिए ये ग़ज़ल जगजीत सिंह और फिर चित्रा जी की आवाज़ों में...
पर आज ये ग़ज़ल याद आई जब मैंने इसी ज़मीन पर कही दाग़ देहलवी की ग़ज़ल
पढ़ी। दाग रूमानी शायर थे सो उन्होंने शब्दों का धरातल तो वही रखा पर ग़ज़ल
का मिजाज़ बदल दिया। जहाँ गालिब की ग़जल सुन जी भर उठता है वहीं दाग़ की
चुहल मन को गुदगुदाती है। अब मतले को ही देखिए। दाग़ कहते हैं
दिल ही तो है ना आए क्यूँ, दम ही तो है ना जाए क्यूँ हम को ख़ुदा जो सब्र दे तुझ सा हसीं बनाए क्यूँ
यानि
ईश्वर ने हमें दिल दिया है तो वो धड़केगा ही और ये जाँ दी है तो जाएगी ही।
अगर ख़ुदा ने तुम्हें ये बेपनाह हुस्न बख़्शा है तो मुझे भी ढेर सारा सब्र दिया तुम्हारे इस खूबसूरत दिल तक देर सबेर पहुँचने के लिए।
गो नहीं बंदगी कुबूल पर तेरा आस्तां तो है काबा ओ दैर में है क्या, खाक़ कोई उड़ाए क्यूँ
आख़िर
तेरी आसमानी चौखट तो हमेशा मेरे सिर पर रहेगी फिर मंदिर और मस्जिद क्यूँ
जाए तुझे पूजने? इसी वज़ह से कोई मेरी बेइज़्ज़ती करे क्या ये सही है?
लोग हो या लगाव हो कुछ भी ना हो तो कुछ नहीं बन के फरिश्ता आदमी बज़्म ए जहान में आए क्यूँ
लोगों
से भरी इस दुनिया में अगर इंसान आया है तो वो प्यार के फूल खिलायेगा ही।
अगर तुम सोचते हो ऐसा ना हो तो फिर उसे इस संसार में भेजने की जरूरत ही
क्या है?
जुर्रत ए शौक़ फिर कहाँ वक़्त ही जब निकल गया अब तो है ये नदामतें सब्र किया था हाए क्यूँ
शायर को अफ़सोस है कि अपने दिल पर सब्र रखकर उसने वक़्त रहते इश्क़ नहीं किया। अब तो वो ऐसा सोचने से भी कतराते हैं ।
रोने पे वो मेरे हँसे रंज़ में मेरे शाद हो छेड़ में है कुछ तो मज़ा वर्ना कोई सताए क्यूँ
उन्हें
मुझे रोता देख हँसी आती है और तो और मेरी शिकायत से वो खुश हो जाते हैं।
पर क्या सच में ऐसा है। उनके छेड़ने से मेरा हृदय भी तो पुलक उठता है नहीं
तो वे सताते क्यूँ।
ग़ालिब की ग़ज़ल तो आपने जगजीत व चित्रा जी की आवाज़ में सुन ली दाग़ की ग़ज़ल को मेरी आवाज़ में सुन लीजिए..
एक शाम मेरे नाम पर फ़ैज़ की शायरी से जुड़ी लंबी महफिलें अंजाम ले चुकी हैं। पुराने पाठकों को याद होगा कि उन की ग़ज़लों और नज़्मों पर एक दफ़े मैंने तीन कड़ियों की एक श्रंखला की थी।उन तीन भागों की लिंक तो ये रहीं.
जो उनकी शायरी के मुरीद हैं उन्हें ये आलेख जरूर रास आएँगे ।
बीस नवंबर को फ़ैज़ की पुण्यतिथि के रोज़ उनकी बहुत सारी ग़ज़लें और नज़्म एक बार फिर नज़रों से गुजरी और इस नज़्म को देख दिल एकबारगी सिहर उठा। सोचा इसी बहाने इस महान शायर की दमदार लेखिनी को एक बार फिर से याद कर लूँ।
अब देखिए ना इश्क़ इंसान को मजबूती देता है, खुशी के पल मुहैया कराता है तो वहीं कभी ये हमें बिल्कुल असहाय, अकेला और आत्मविश्वास से परे भी ढकेल देता है। फ़ैज़ की ये नज़्म कुछ ऐसे ही उदास लमहों की कहानी कहती है। नज़्म की शुरुवात में फ़ैज़ कहते हैं..
मेरी-तेरी निगाह में जो लाख इंतज़ार हैं जो मेरे-तेरे तन-बदन में लाख दिल-फ़िगार1 हैं जो मेरी-तेरी उँगलियों कीबेहिसी2 से सब क़लम नज़ार3 हैं जो मेरे-तेरे शहर में हर इक गली में मेरे-तेरेनक़्श-ए -पा4 के बेनिशाँ मज़ार हैं
1 . घायल , 2. संवेदनहीन , 3 . कमज़ोर , 4 पदचिन्ह
इस कभी ना ख़त्म होने वाले इंतज़ार ने पुरानी यादों की रह रह कर उभरती टीस से मिलकर शायर के दिल के कोने कोने को घायल कर दिया है। यहाँ तक कि प्रेमी के साथ साथ कदमों से नापी शहर की दहलीज़ भी गुम सी हो गई लगती है। ये अलग बात है कि हमारा ये प्रेमी शायर हमसफ़र के साथ उन गुम से पलों को मन ही मन पूजता है तभी तो वे उसे 'बेनिशाँ मज़ार' से लगते हैं । जिन उँगलियों ने कभी वो मुलायम सा हाथ पकड़ा था वो संवेदनहीन हो चली हैं। ऐसे हालात में कवि की कलम कमज़ोर ना हो तो क्या हो?
जो मेरी-तेरी रात के सितारे ज़ख़्म-जख़्म हैं जो मेरी-तेरी सुबह के गुलाब चाक-चाक हैं
यह ज़ख़्म सारे बे-दवा यह चाक सारे बे-रफ़ू किसी पे राख चाँद की किसी पे ओस का लहू
कवि आगे कहते हैं कि तुम्हारे बिना सितारों से सजी वो रातें देखता हूँ तो उनके टिमटिमाते हृदय में भी मुझे अपने जख़्मों की परछाई नज़र आती है। अब तो वो गुलाब जिनके साथ हमारी कितनी सुबहें साथ कटी थीं चीरे हुए से लगते हैं। फ़ैज की काव्यात्मक सोच का उत्कृष्ट नमूना तब देखने को मिलता है जब वे रातों में अपने दिल पर चाँद की राख मलते नज़र आते हैं। वही सुबह गुलाबों पर गिरी ओस उन्हे हृदय से रिसते लहू जैसी प्रतीत होती है। सच, अब तो उनके लिए प्रेम का ये ये मर्ज़ लाइलाज़ हो चला है ।
यह है भी या नहीं बता यह है कि महज़ जाल है मेरे-तुम्हारे अन्कबूत- ए -वहम5 का बुना हुआ जो है तो इसका क्या करें नहीं है तो भी क्या करें बता, बता, बता, बता
5 . संशय की मकड़ी
अवसाद की इन घड़ियों में व्यक्ति के लिए प्रेम संशय की स्थिति उत्पन्न कर देता है। क्या वो मुझसे सच में प्रेम करती है/करता है? क्या मैं उसके लायक हूँ? क्या मेरा प्यार महज़ एक खुशफ़हमी है? ऐसे अनेक प्रश्न उसे मथते रहते हैं। नज़्म के आख़िरी भाग में फ़ैज़ ऐसी ही मनोदशा को हमारे सामने लाते हैं एक उलझन के साथ ! सच तो ये है कि प्रेम को स्वीकार करने से ही तो दिल में आई आफ़त कम नहीं हो जाती। प्रेम तो तब भी परिस्थितियों का दास बन कर ही रहता है। दिल तो अब भी सवाल करता है जो है तो इसका क्या करें...नहीं है तो भी क्या करें।
फ़ैज़ की इस संवेदनशील नज़्म की उदासी को अपनी आवाज़ में क़ैद करने की कोशिश की है। उम्मीद है आपको पसंद आएगी। रिकार्डिंग के लिए इस पंक्ति में हल्का सा बदलाव किया है बता, बता, मुझे बता .. क्या करें.. क्या करें।
दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई। नित विकसित होती ये तकनीकें दूरियों को इस तेजी से पाटेंगी ये किसे पता था? आज हालात ये हैं कि इंटरनेट पर चंद कदमों के फ़ासले पर आप किसी से भी अपने तार जोड़ सकते हैं। पर ये भी है कि इन आभासी डोरियों के जोड़ बड़े नाज़ुक होते हैं । जरूरत से ज्यादा आप उसे खींच नहीं सकते। ये जोड़ तभी पुख्ता होते है जब हम अपने उन पसंदीदा लोगों के साथ कुछ वक़्त साथ साथ बिता पाते हैं। यही वज़ह है कि कॉलेज की दोस्तियाँ कभी फीकी नहीं पड़तीं क्यूँकि उनके साथ गुज़रे हुए लमहों की एक बड़ी सी पोटली होती है।
पर अपनी अपनी दिनचर्या की गुलाम बनी इस दुनिया में अपने मोहल्लों, अपने शहरों में रहने वालों के लिए ही वक़्त नहीं निकल पाता तो उस आभासी दुनिया की बिसात क्या? पर यही तो सहूलियत है उस दुनिया की जो एक हल्के फुल्के चुटकुले, एक छोटे से लाइक या फिर टिप्पणियों की चंद पंक्तियों से ही उस शख़्स को ये जतलाने में कामयाब रहती है कि उस पल के लिए ही सही किसी ने उसके बारे में सोचा तो है। पर जैसा लोभी ये मन है ना उसे चैन कहाँ आता है? वो तो फिर भी सोचता है चंद घड़ियाँ... .नहीं नहीं पूरा दिन उस शख़्स के साथ बिताने का।
आज जब मैं गुलज़ार साहब की नज़्म 'पूरा दिन' पढ़ रहा था तो मेरे दिल में यही ख़्याल आ रहे थे। वैसे भी गुलज़ार के शब्द हमारी रोज़ की ज़िंदगी का इतना सजीव खाका खींचते हैं कि उससे आपने आप को जोड़ने में कुछ सेकेंड से ज्यादा नहीं लगते। इन ख्यालों को अपनी आवाज़ के माध्यम से मूर्त रूप देने की कोशिश की है। पसंद आए तो बताइएगा..
मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है, झपट लेता है, अंटी से कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की आहट भी नहीं होती, खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं गिरेबान से पकड़ कर ..माँगने वाले भी मिलते हैं "तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है " ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर अभी 2-4 लम्हे खर्च करने के लिए रख ले, बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं, जब होगा, हिसाब होगा बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं अपने लिए रख लूँ, तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है !!
गजानन माधव मुक्तिबोध हिन्दी के एक प्रखर कवि थे। पर स्कूल में बिहार बोर्ड की भाषा सरिता के दसवीं तक के सफ़र में ना उनकी किसी कविता से साबका पड़ा ना उसके बाद ही। इंटर के बाद तो वैसे ही कॉलेज में हिंदी से नाता टूट गया सो मुक्ति बोध को जानते कैसे? सच पूछिए तो मेरे लिए हिंदी कविता भक्ति, श्रंगार, प्रेम, वीर रस से होती हुई जयशंकर प्रसाद, महादेवी, पंत व निराला जैसे छायावादी कवियों तक ही सिमट गई। हिंदी कविता में छायावाद से प्रयोगवाद के जिस सफ़र में गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे कवियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई उससे कम से कम मैं तो अनजान ही रहा।
गजानन माधव मुक्तिबोध Gajanan Madhav Muktibodh
जो लोग मेरी तरह मुक्तिबोध के लेखन से उतने परिचित नहीं रहे हैं उन्हें ये बताना आवश्यक रहेगा कि उनकी पैदाइश शिवपुरी में हुई थी जो मध्यप्रदेश के मुरैना जिले का हिस्सा है। वे एक मध्यमवर्गीय खानदान से ताल्लुक रखते थे। पिता माधवराव यूँ तो पुलिस में थे पर ईमानदारी से जीवन जीने में विश्वास रखते थे। उज्जैन में वो इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत हुए और वहीं मुक्तिबोध की प्रारंभिक शिक्षा भी शुरु हुई। स्नातक की डिग्री लेने के बाद पहले वे स्कूल में पढ़ाने लगे। बाद में राजनंदगाँव से जब परास्नातक (MA) की डिग्री हासिल हुई तो कॉलेज में प्राध्यापक पद पर नियुक्त हुए।
माता पिता की सहमति के बगैर उन्होंने शादी तो की पर अपनी पत्नी से उनका तारतम्य ना बैठ सका। लकवे की वज़ह से वे अपनी ज़िदगी का अर्धशतक भी पूरा ना कर पाए। ये विडंबना ही रही कि वे अपने ज्यादातर काव्य संग्रहों को ख़ुद छपते और सम्मान पाते नहीं देख पाए। पिछले हफ्ते उनकी पुण्यतिथि पर जब उनकी कविताओं की चर्चा हुई तो उनकी प्रमुख रचनाओं को पढ़ने की इच्छा हुई। उनकी दो कविताएँ जो मन के किसी कोने को छू गई को आज अपनी आवाज़ में प्रस्तुत करने की एक कोशिश कर रहा हूँ।
मुक्तिबोध कि जो पहली कविता मैंने यहाँ चुनी है उसकी भावनाओं से आपमें से ज्यादातर अपने आप को जोड़ पाएँगे। कोई हमें कितना प्यारा है? कितना दिलअजीज़ है? हमारे मन में उसके लिए कितनी कद्र है? क्या हम हमेशा उसको सीधे सीधे बतला पाते हैं.. नहीं ना! अंदर से ख़्वाहिश तो बहुत रहती है कि वो हमारी भावनाओं को पढ़ लें पर प्रत्यक्ष में हम वो कह नहीं पाते। रिश्तों की ऐसी पेंच में फँसे होते हैं कि कह सुन कर उनकी गिरहों को ऐसा नहीं बना देना चाहते कि उनमें हमेशा हमेशा के लिए गाँठ लग जाए। पर पूरी चुप्पी भी बेचैन हृदय को कहाँ बर्दाश्त होने वाली है। सो संकेतों व प्रतीकों का सहारा लेने लगते हैं अपने भीतर अंकुरित होती कोमल भावनाओं के संप्रेषण के लिए। ये छोटे छोटे इशारे ही काफी होते हैं दिल की मिट्टी को आपसी स्नेह से भिंगोए रखने के लिए। मुक्तिबोध की इस कविता के नायक नायिका आसमान और धरती हैं। धरती के प्रति अपनी आत्मीयता को आसमान किस तरह व्यक्त कर रहा है आइए देखते हैं इन पंक्तियों में..
बहुत दिनों से बहुत दिनों से बहुत-बहुत सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना और कि साथ यों साथ-साथ फिर बहना बहना बहना मेघों की आवाज़ों से कुहरे की भाषाओं से रंगों के उद्भासों से ज्यों नभ का कोना-कोना है बोल रहा धरती से जी खोल रहा धरती से त्यों चाह रहा कहना उपमा संकेतों से रूपक से, मौन प्रतीकों से मैं बहुत दिनों से बहुत-बहुत-सी बातें तुमसे चाह रहा था कहना! जैसे मैदानों को आसमान, कुहरे की मेघों की भाषा त्याग बिचारा आसमान कुछ रूप बदलकर रंग बदलकर कहे।
मुक्तिबोध की दूसरी कविता इस बात को पुरज़ोर तरीके से रखती है कि इस संसार में बिना किसी कलुष के निर्मल हृदय रखने वाले इंसान को ख़ुद कितनी व्यथा से गुजरना पड़ता है। वो तो सबकी अच्छाई में विश्वास कर लेता है। सबकी पीड़ा को अपना लेता है। हर मुस्कुराहट में उसे एक पवित्रता नज़र आती है। किसी के हृदय की बेचैनी महसूस कर वो ख़ुद अधीर हो उठता है। पर फिर भी वो बार बार छला जाता है। वास्तविकता तो ये है कि इस कपटी संसार को तो वो निरा मूर्ख ही नज़र आता है।
पर वो करे भी तो क्या करे अंदर का रुदन छुपाकर हँसे भी तो किसके लिए? जिस संसार से भावनाओं के तार उसने जोड़ रखे थे वो तो उसका इस्तेमाल कर आगे बढ़ चुका है। अब उसके सहारे की जरूरत जो नहीं रह गई है । पर नहीं अभी सारे रास्ते बंद नहीं हुए। उसका जीवन व्यर्थ नहीं है क्यूँकि वो मन का सच्चा है। नई पगडंडियाँ अब भी बाँह पसारे बुला रहीं हैं उसे।
शायद उनमें उसके अस्तित्व, उसके वज़ूद के पीछे की कई और कहानियाँ दफन हों।
शायद इन पंगडंडियों पर चलकर बटोरी कहानियों से वो जीवन के उपन्यास को एक मूर्त रूप दे सके ..
मुझे कदम-कदम पर चौराहे मिलते हैं बाँहें फैलाए! एक पैर रखता हूँ कि सौ राहें फूटतीं, मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ, बहुत अच्छे लगते हैं उनके तजुर्बे और अपने सपने.... सब सच्चे लगते हैं, अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है, मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ, जाने क्या मिल जाए! मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है, हर एक छाती में आत्मा अधीरा है प्रत्येक सस्मित में विमल सदानीरा है, मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में महाकाव्य पीडा है, पलभर में मैं सबमें से गुजरना चाहता हूँ, इस तरह खुद को ही दिए-दिए फिरता हूँ, अजीब है जिंदगी! बेवकूफ बनने की खातिर ही सब तरफ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ, और यह देख-देख बडा मजा आता है कि मैं ठगा जाता हूँ... हृदय में मेरे ही, प्रसन्नचित्त एक मूर्ख बैठा है हँस -हँसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है, कि जगत.... स्वायत्त हुआ जाता है। कहानियाँ लेकर और मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते जहाँ ज़रा खडे होकर बातें कुछ करता हूँ .... उपन्यास मिल जाते ।
नाको झील: किन्नौर का एक खूबसूरत पड़ाव
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नाको, जो कभी एक छोटा सा गाँव था, आज एक कस्बे का रूप ले चुका है। पर्यटन के
लिहाज़ से देखा जाए तो किन्नौर जिले का आखिरी छोर होने की वजह से, जो भी
रिकांगपिओ स...
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