जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से!
अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम..
जगजीत सिंह ने न जाने कितनी भावप्रवण ग़ज़लें गाई होंगी पर अपने कंसर्ट के बीचों बीच चुटकुले सुनकर माहौल को एकदम हल्का फुल्का कर देना उन्हें बखूबी आता था। उनके और लता जी की मजाहिया स्वभाव का नतीजा ये था कि जब भी वे लोग साथ मिलते आधा घंटा एक दूसरे को चुटकुले सुनाने के लिए तय होता था।
जगजीत जी के साथ चित्रा जी ग़ज़लों की एक महफ़िल में
अपनी निजी ज़िंदगी में भी वो ऐसे ही थे। आज उनका एक बेहद पुराना वीडियो मिला जहां वे दोस्तों की एक महफिल में अपनी मशहूर गजल सरकती जाए है रुख से नकाब आहिस्ता आहिस्ता सुना रहे हैं। इधर कुछ जल्दी जल्दी है और उधर कह कर उनका चित्रा की ओर मजाहिया लहजे में देखना लाजवाब कर गया। साथ ही ये वीडियो मुझे उनके जीवन को वो मोड़ याद दिला गया जहां से उन्होंने साथ साथ रहने का निश्चय किया था।
दरअसल चित्रा जी की पहली शादी अपने से कहीं ज्यादा उम्र के देबू दत्ता से हुई थी। रिश्ता देबू की तरफ से ही आया था पर बाद में उन्हें लगा कि उन्होंने अपने लिए बेमेल हमसफ़र चुन लिया है। चित्रा को दूसरा घर दिलाकर वो अलग रहने लगे और बाद में उनसे तलाक ले लिया। इस अलग अलग रहने से थोड़े दिन पहले ही जगजीत चित्रा के संपर्क में आए थे। जब चित्रा अपनी बेटी के साथ अलग रहने लगीं तो वो उन दोनों का ख्याल रखने लगे। साथ साथ जिंगल गाने से लेकर कंसर्ट तक करने में ये रिश्ता और प्रगाढ़ हुआ और एक दिन बुखार में तपते शरीर लिए जगजीत ने चित्रा से प्रणय निवेदन भी कर दिया।
पर चित्रा जी की मानसिक स्थिति जगजीत के प्रेम को तुरंत स्वीकार करने के लायक नहीं थी। एक तो कागजी तौर पर पहले पति से तलाक हुआ नहीं था और दूसरे बेटी को ले के भी वो असमंजस की स्थिति में थीं। इसलिए अंतिम हामी भरने के पहले हमारे जगजीत जी को उनके घर के कई चक्कर लगाने पड़े।
अब वीडियो देखिए और समझिए कि जगजीत ने जल्दी जल्दी किस मजाहिया लहजे में कहा और कितने शरारती अंदाज़ में आहिस्ता आहिस्ता कह कर चित्रा की ओर देखा। सबके सामने जगजीत को ऐसा करते देख चित्रा जी शर्मा गईं। उनकी शर्मीली खिलखिलाहट और जगजीत जी का गाने का तरीका आप सब के मन को भी जरूर आनंदित करेगा ऐसा मेरा विश्वास है :)।
कलाकार कितनी भी बड़ा क्यूँ ना हो जाए फिर भी जिसकी कला को देखते हुए वो पला बढ़ा है उसके साथ काम करने की चाहत हमेशा दिल में रहती है। सत्तर के दशक में जब जगजीत बतौर ग़ज़ल गायक अपनी पहचान बनाने में लगे थे तो उनके मन में भी एक ख़्वाब पल रहा था और वो ख़्वाब था सुर कोकिला लता जी के साथ गाने का।
जगजीत करीब पन्द्रह सालों तक अपनी इस हसरत को मन में ही दबाए रहे। अस्सी के दशक के आख़िर में 1988 में अपने मित्र और मशहूर संगीतकार मदनमोहन के सुपुत्र संजीव कोहली से उन्होंने गुजारिश की कि वो लता जी से मिलें और उन्हें एक ग़ज़लों के एलबम के लिए राजी करें। लता जी मदनमोहन को बेहद मानती थीं इसलिए जगजीत जी ने सोचा होगा कि वो शायद संजीव के अनुरोध को ना टाल पाएँ।
पर वास्तव में ऐसा हुआ नहीं। जगजीत सिंह की जीवनी से जुड़ी किताब बात निकलेगी तो फिर में सत्या सरन ने लिखा इस प्रसंग का जिक्र करते हुए लिखा है कि
लता ने कोई रुचि नहीं दिखाई, उन्होंने ये पूछा कि उनको जगजीत सिंह के साथ गैर फिल्मी गीत क्यों गाने चाहिए? हालांकि बतौर गायक वो जगजीत सिंह को पसंद करती थीं। इसके आलावा वे उन संगीतकारों के लिए ही गाना चाहती थीं जिनके साथ उनकी अच्छी बनती हो।
लता जी को मनाने में ही दो साल लग गए। एक बार जब इन दो महान कलाकारों का मिलना जुलना शुरु हुआ तो आपस में राब्ता बनते देर ना लगी। लता जी ने जब जगजीत की बनाई रचनाएँ सुनीं तो प्रभावित हुए बिना ना रह सकीं। जगजीत ने भी उन्हें बताया की ये धुनें उन्होंने सिर्फ लता जी के लिए सँभाल के रखी हैं। दोनों का चुटकुला प्रेम इस बंधन को मजबूती देने में एक अहम कड़ी साबित हुआ। संगीत की सिटिंग्स में बकायदा आधे घंटे अलग से इन चुटकुलों के लिए रखे जाने लगे। लता जी की गिरती तबियत, संजीव की अनुपलब्धता की वज़ह से ग़ज़लों की रिकार्डिंग खूब खिंची पर जगजीत जी ने अपना धैर्य बनाए रखा और फिर सजदा आख़िरकार 1991 में सोलह ग़ज़लों के डबल कैसेट एल्बम के रूप में सामने आया जो कि मेरे संग्रह में आज भी वैसे ही रखा है।
मुझे अच्छी तरह याद है कि तब सबसे ज्यादा प्रमोशन जगजीत व लता के युगल स्वरों में गाई निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल हर तरह हर जगह बेशुमार आदमी..फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी को मिला था। भागती दौड़ती जिंदगी को निदा ने चंद शेरों में बड़ी खूबसूरती से क़ैद किया था। खासकर ये अशआर तो मुझे बेहद पसंद आए थे
रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र आख़िरी साँस तक बेक़रार आदमी
यूँ तो इस एलबम में मेरी आधा दर्जन ग़ज़लें बेहद ही पसंदीदा है पर चूंकि आज बात लता और जगजीत की युगल गायिकी की हो रही है तो मैं आपको इसी एलबम की एक दूसरी ग़ज़ल ग़म का खज़ाना सुनवाने जा रहा हूँ जिसे नागपुर के शायर शाहिद कबीर ने लिखा था। शाहिद साहब दिल्ली में केंद्र सरकार के मुलाज़िम थे और वहीं अली सरदार जाफरी और नरेश कुमार शाद जैसे शायरों के सम्पर्क में आकर कविता लिखने के लिए प्रेरित हुए। चारों ओर , मिट्टी के मकान और पहचान उनके प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह हैं। जगजीत के आलावा तमाम गायकों ने उनकी ग़ज़लें गायीं पर मुझे सबसे ज्यादा आनंद उनकी ग़ज़ल ठुकराओ या तो प्यार करो मैं नशे में हूँ गुनगुनाने में आता है। 😊
जहाँ तक ग़म का खज़ाना का सवाल है ये बिल्कुल सहज सी ग़ज़ल है। दो दिल मिलते हैं, बिछुड़ते हैं और जब फिर मिलते हैं तो उन साथ बिताए दिनों की याद में खो जाते हैं और बस इन्हीं भावनाओं को स्वर देते हुए शायर ने ये ग़ज़ल लिख दी है। इस ग़ज़ल की धुन इतनी प्यारी है कि सुनते ही मज़ा आ जाता है। तो आप भी सुनिए पहले लता और जगजीत की आवाज़ में..
ग़म का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी ग़म का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी ये नज़राना तेरा भी है, मेरा भी अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना
अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना राग पुराना तेरा भी है, मेरा भी राग पुराना तेरा भी है, मेरा भी ग़म का खज़ाना .... तू मुझको और मैं तुमको, समझाऊँ क्या तू मुझको और मैं तुमको समझाऊँ क्या दिल दीवाना तेरा भी है, मेरा भी दिल दीवाना तेरा भी है, मेरा भी ग़म का खज़ाना तेरा भी है, मेरा भी शहर में गलियों, गलियों जिसका चर्चा है शहर में गलियों, गलियों जिसका चर्चा है वो अफ़साना तेरा भी है, मेरा भी मैखाने की बात ना कर, वाइज़ मुझसे मैखाने की बात ना कर, वाइज़ मुझसे आना जाना तेरा भी है, मेरा भी ग़म का खज़ाना तेरा भी है....
यूँ तो जगजीत और लता जी की आवाज़ को उसी अंदाज़ में लोगों तक पहुँचा पाना दुसाध्य
कार्य है पर उनकी इस ग़ज़ल को हाल ही में उभरती हुई युवा गायिका प्रतिभा सिंह
बघेल और मोहम्मद अली खाँ ने बखूबी निभाया। हालांकि गीत के बोलों को गाते हुए बोल की छोटी मोटी भूलें हुई हैं उनसे। लाइव कन्सर्ट्स में ऐसी ग़ज़लों को
सुनने का आनंद इसलिए भी बढ़ जाता है क्यूँकि मंच पर बैठे साजिंद भी अपने खूबसूरत
टुकड़ों को मिसरों के बीच बड़ी खूबसूरती से सजा कर पेश करते हैं। अब यहीं देखिए मंच
की बाँयी ओर वॉयलिन पर दीपक पंडित हैं जो जगजीत जी के साथ जाने कितने
कार्यक्रमों में उनकी टीम का हिस्सा रहे। वहीं दाहिनी ओर आज के दौर के जाने
पहचाने बाँसुरी वादक पारस नाथ हैं जिनकी बाँसुरी टीवी पर संगीत कार्यक्रमों से
लेकर फिल्मों मे भी सुनाई देती है।
सजदा का जिक्र अभी खत्म नहीं हुआ है। अगले आलेख बात करेंगे इसी एल्बम की एक और ग़ज़ल के बारे में और जानेंगे कि चित्रा जी को कैसी लगी थी लता जी की गायिकी ?
कई शायर ऐसे रहे हैं जिनकी किसी एक कृति ने उनका नाम हमेशा के लिए हमारे दिलो दिमाग पर नक़्श कर दिया। कफ़ील आज़र का नाम कौन जानता अगर उनकी नज़्म बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी .. को जगजीत जी ने अपनी आवाज़ नहीं दी होती। अथर नफ़ीस साहब वो इश्क़ जो हमसे रूठ गया से हमेशा अपनी याद दिला जाते हैं। प्रेम वारबर्टनी का नाम सिर्फ तभी आता है जब राजेंद्र व नीना मेहता की गाई नज़्म तुम मुझसे मिलने शमा जलाकर ताजमहल में आ जाना का जिक्र होता है। वहीं राजेंद्र नाथ रहबर का नाम तभी ज़हन में उभरता है जब तेरे खुशबू से भरे ख़त मैं जलाता कैसे..... सुनते वक़्त जगजीत की आवाज़ कानों में गूँजती है।
ऐसा नहीं कि इन शायरों ने और कुछ नहीं लिखा। कम या ज्यादा लिखा जरूर पर वे पहचाने अपनी इसी रचना से गए। ऐसे ही एक शायर थे हफ़ीज़ होशियारपुरी साहब जिनका ताल्लुक ज़ाहिरन तौर पर पंजाब के होशियारपुर से था। वही होशियारपुर जहाँ से जैल सिंह और काशी राम जैसी हस्तियाँ राजनीति में अपनी चमक बिखेरती रहीं। स्नातक की पढ़ाई होशियारपुर से पूरी कर हफ़ीज़ लाहौर चले गए। वहाँ तर्कशास्त्र में आगे की पढ़ाई की। हफ़ीज़ साहब के नाना शेख गुलाम मोहम्मद शायरी में खासी रुचि रखते थे। उनकी याददाश्त इतनी अच्छी थी कि हजारों शेर हमेशा उनकी जुबां पर रहते थे। उन्हें ही सुनते सुनते हफ़ीज़ भी दस ग्यारह साल की उम्र से शेर कहने लगे। बाद में लाहौर में पढ़ाई करते समय फ़ैज़ और राशिद जैसे समकालीन बुद्धिजीवियों का असर भी उनकी लेखनी पर पड़ा।
हफ़ीज़ होशियारपुरी
आज़ादी के आठ बरस पहले उन्होंने कृष्ण चंदर के साथ रेडियो लाहौर में भी काम किया। मंटो भी उनको अपना करीबी मानते थे। मशहूर शायर नासिर काज़मी के तो वो गुरु भी कहे जाते हैं पर इतना सब होते हुए भी उनकी लिखी चंद ग़ज़लें ही मकबूल हुईं और अगर एक ग़ज़ल का नाम लिया जाए जिसकी वज़ह से आम जनता उन्हें आज तक याद रखती है तो वो "मोहब्बत करने वाले कम न होंगे..." ही होगी। जनाब मेहदी हसन ने इस ग़ज़ल के कई शेर अपनी अदायगी में शामिल किये। उनके बाद फरीदा खानम, इकबाल बानो और हाल फिलहाल में पापोन ने भी इसे अपनी आवाज़ से सँवारा है पर मुझे इस ग़ज़ल को हमेशा मेहदी हसन साहब की आवाज़ में ही सुनना पसंद रहा है। जिस तरह से उन्होंने ग़ज़ल के भावों को पढ़कर अपनी गायिकी में उतारा है उसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम होगी।
इस ग़ज़ल का मतला तो सब की जुबां पर रहता ही है पर जो शेर मुझे सबसे ज्यादा दिल के करीब लगता है वो ये कि ज़माने भर के ग़म या इक तेरा ग़म... ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे.. किसी की याद की कसक भी इतनी प्यारी होती है कि उस ग़म को महसूस करते हुए भी आशिक अपने और ग़म भुला देता है। हफ़ीज़ साहब ने अपनी इसी बात को अपने लिखे एक अन्य शेर में यूँ कहा है
अब उनके ग़म से यूँ महरूम ना हो जाएँ कभी
वो जानते हैं कि इस ग़म से दिल बहलते हैं
चलिए ज़रा होशियारपुरी साहब की इस पूरी ग़ज़ल को पढ़ा जाए। जिन अशआर को मेहदी हसन ने गाया है उन्हें मैंने चिन्हित कर दिया है Bold करके।
मोहब्बत करने वाले कम न होंगे तेरी महफ़िल में लेकिन हम न होंगे मैं अक्सर सोचता हूँ फूल कब तक शरीक-ए-गिर्या-ए-शबनम न होंगे
मैं जानता हूँ तुम हो ही ऐसी कि तुम्हें चाहने वालों की कभी कमी नहीं रहेगी। हाँ पर देखना कि चाहनेवालों की उस महफिल में तुम्हें मेरी कमी हमेशा महसूस होगी। अब ऐसा तो हो नहीं सकता कि सुबह की ओस पूरे पौधे पर गिरे पर उसके रुदन की पीड़ा फूल तक ना पहुँचे?
ज़रा देर-आश्ना चश्म-ए-करम है सितम ही इश्क़ में पैहम न होंगे
ठीक है जनाब कि उन्होंने मेरी ओर थोड़ी देर से ही अपनी नज़र-ए-इनायत की। मैं क्यूँ मानूँ कि आगे भी वे मुझ पे ऐसे ही सितम ढाते रहेंगे? दिलों की उलझने बढ़ती रहेंगी अगर कुछ मशवरे बाहम न होंगे ज़माने भर के ग़म या इक तेरा ग़म ये ग़म होगा तो कितने ग़म न होंगे
अगर हमारी बातचीत में यूँ ही खलल पड़ता रहे तो दिल की उलझनें तो बढ़ती ही रहेंगी। लेकिन ये भी है कि इन उलझनों से मन में उठती बेचैनी और दर्द अगर रहा तो इस ग़म की मिठास से बाकी के ग़म तो यूँ ही दफा हो जाएँगे।
कहूँ बेदर्द क्यूँ अहल-ए-जहाँ को वो मेरे हाल से महरम न होंगे हमारे दिल में सैल-ए-गिर्या होगा अगर बा-दीद-ए-पुरनम न होंगे
इस दुनिया को क्यूँ बेदर्द कहूँ मैं? सच तो ये है कि उन्हें मेरे दिल का हाल क्या मालूम ? मैंने कभी अपनी आँखों में सबके सामने नमी आने नहीं दी भले ही दिल में दर्द का सैलाब क्यूँ न बह रहा हो। अगर तू इत्तेफ़ाक़न मिल भी जाए तेरी फ़ुर्कत के सदमें कम न होंगे 'हफ़ीज़ ' उनसे मैं जितना बदगुमां हूँ वो मुझसे इस क़दर बरहम न होंगे
अब तो अगर कहीं मुलाकात हो भी जाए तो जो सदमा तेरी जुदाई में सहा है वो नहीं कम होने वाला। पता नहीं मुझे अब भी क्यूँ ऐसा लगता है कि जितना मैं उन पर अविश्वास करता रहा, शक़ की निगाह से देखता रहा उतनी नाराज़गी उनके मन में मेरे प्रति ना हो।
तो आइए सुनें इस खूबसूरत ग़ज़ल को मेहदी हसन की आवाज़ में..
पिछले महीने एक शाम मेरे नाम की ये महफिल चौदह साल पुरानी हो गई। इस ग़ज़ल से उलट आपसे यही उम्मीद रहेगी कि आपकी इस ब्लॉग के प्रति मोहब्बत भी बरक़रार रहे और इस महफिल में सालों साल आप हमारे साथ शिरकत करते रहें।
रूना लैला एक ऐसी गायिका हैं कि जिनकी आवाज़ की तलब मुझे हमेशा कुछ कुछ अंतराल पर लगती रहती है। आज की पीढ़ी से जब भी मैं उनके गाए गीतों के बारे में पूछता हूँ तो ज्यादातर की जुबां पर दमादम मस्त कलंदर का ही नाम होता है। जहाँ तक मेरा सवाल है मुझे तो उनकी आवाज़ में हमेशा घरौंदा का उनका कालजयी गीत तुम्हें हो ना हो मुझको तो इतना यकीं है ही ज़हन में रहता है।
वैसे क्या आपको पता है कि रूना जी ने बचपन में कला के जिस रूप का दामन थामा था वो संगीत नहीं बल्कि नृत्य था। संगीत तो उनकी बड़ी बहन दीना लैला सीखती थीं। पर उनकी देखा देखी उन्होंने भी शास्त्रीय संगीत में अपना गला आज़माना शुरु कर दिया। दीना को एक संगीत समारोह में गाना था पर उनका गला खराब हो गया और रूना ने उस बारह साल की छोटी उम्र में बहन की जगह कमान सँभाली। उनकी गायिकी इतनी सराही गयी कि उन्होंने संगीत सीखने पर गंभीरता से ध्यान देना शुरु किया। चौदह साल की उम्र में उन्होंने पहली बार पाकिस्तानी फिल्म में गाना गाया।
उबैद्दुलाह अलीम व रूना लैला
साठ के दशक के अंतिम कुछ सालों से लेकर 1974 तक उन्होंने पाकिस्तानी फिल्मों और टीवी के लिए काम किया। फिल्मों के इतर रूना जी ने अपनी गायिकी के आरंभिक दौर में फ़ैज़ और उबैदुल्लाह अलीम की कुछ नायाब ग़ज़लों को अपनी आवाज़ दी थी। रंजिश ही सही के आलावा उनकी गाई कुछ ग़ज़लों को मैंने पहले भी सुनवाया है। फ़ैज़ का लिखा हुआ आए कुछ अब्र कुछ शराब आए.., सैफुद्दीन सैफ़ का गरचे सौ बार ग़म ए हिज्र से जां गुज़री है... उबैदुल्लाह अलीम की बना गुलाब तो काँटे चुभा गया इक शख़्स उनकी गायी मेरी कुछ प्रिय ग़ज़लों में एक है।
अलीम साहब कमाल के शायर थे। वे भोपाल में जन्मे और फिर सियालकोट व कराची में पले बढ़े। उन्होंने रेडियो और टीवी जगत की विभिन्न संस्थाओं में साठ और सत्तर के दशक में अपना योगदान दिया। कुछ दिनों तो बसो मेरी आँखों में, अजीज इतना ही रखो कि जी सँभल जाए, कुछ इश्क़ था कुछ मजबूरी थी जैसी नायाब ग़ज़लों को लिखने वाले इस शायर और उनसे जुड़ी बातों को यहाँ बाँटा था मैंने। आज मैं आपको इन्हीं अलीम साहब की लिखी एक ग़ज़ल सुनवाने जा रहा हूँ जो उनके ग़ज़ल संग्रह के नाम से बने एलबम चाँद चेहरा सितारा आँखें का भी बाद में हिस्सा बनी। रूना जी ने इसके शुरु के चार अशआर गाए हैं वो बेहद ही दिलकश हैं।
कोई धुन हो मैं तेरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने मे उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तेरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिसको मिलना नहीं फिर उससे मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ
पीटीवी के इस श्वेत श्याम वीडियो में रूना जी ने इस ग़ज़ल को करीब 20-22 की उम्र में गाया होगा। इसके कुछ सालों बाद वो बांग्लादेश चली गयीं। यही वो समय था जब उन्होंने हिंदी फिल्मों के लिए भी गाने रिकार्ड किए। फिलहाल सुनिए इस ग़ज,ल को उनकी आवाज़ में..
इस ग़ज़ल के कुछ अशआर और भी थे तो मैंने सोचा कि क्यूँ ना आपको ये पूरी ग़ज़ल इसे लिखनेवाले शायर की आवाज़ में भी सुना दूँ।
अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ
रूना जी पिछले दिसंबर में गुलाबी गेंद से खेले गए भारत बांग्लादेश टेस्ट मैच में अतिथि के रूप में कोलकाता आई थीं। बतौर संगीतकार उन्होंने पिछले दिसंबर में ही एक एलबम रिलीज़ किया है जिसका नाम है Legends Forever । इस एलबम के सारे गीत बांग्ला में हैं पर अन्य नामी कलाकारों के साथ उन्होंने इस एलबम में हरिहरण और आशा जी की आवाज़ का इस्तेमाल किया है।
जब उनसे इस भारत यात्रा के दौरान पूछा गया कि पुराने और अभी के संगीत में क्या फर्क आया है तो उन्होंने कहा कि
पहले हम एक गीत गाने के पहले वादकों के साथ रियाज़ करते थे। एक गलती हुई तो सब कुछ शुरु से करना पड़ता था। रिकार्डिंग के पहले भी घंटों और कई बार दिनों तक रियाज़ चलता था और इसका असर ये होता था कि गीत की आत्मा मन में बस जाती थी। आज तो हालत ये है कि आप स्टूडियो जाते हैं, वहीं गाना सुनते हैं और रिकार्ड कर लेते हैं। टेक्नॉलजी ने सब कुछ पहले से आसान बना दिया है और हमें थोड़ा आलसी।
रूना जी के इस कथन से शायद ही आज कोई संगीतप्रेमी असहमत होगा। वे इसी तरह संगीत के क्षेत्र में आने वाले सालों में भी सक्रियता बनाए रखेंगी ऐसी उम्मीद है।
कई बार नए कलाकार कुछ ऐसी पुरानी ग़ज़लों की याद दिला देते हैं जिनसे सालों से राब्ता टूटा हुआ था। पिछले हफ्ते जनाब मेहदी हसन की गायी ऐसी ही एक नायाब ग़ज़ल सुनने को मिली। दरअसल गणेशोत्सव में हर साल संगीतकार व गायक शंकर महादेवन के यहाँ सुरों की महफिल जमती है। इस बार उस आयोजन में युवा गायिका हिमानी कपूर ने बड़े प्यार से हकीम नासिर की इस ग़ज़ल के कुछ शेर गुनगुनाए और सच में सुन के आनंद आ गया।
मेहदी हसन/ हिमानी कपूर
अब जब इस ग़ज़ल की बात हो रही है तो उसे रचने वाले हकीम नासिर साहब के बारे में भी कुछ जान लिया जाए। जनाब काबिल अजमेरी की तरह नासिर साहब की पैदाइश राजस्थान के अजमेर में हुई थी। विभाजन के बाद उनका परिवार कराची में बस गया। घर का पुश्तैनी काम ही हकीमी था सो नासिर साहब ने भी बाप दादा के बनाए कराची के निजामी दवाखाने में हकीमी की। कॉलेज के ज़माने में नासिर साहब ने नियमित रूप से क्रिकेट भी खेली। कराची के हमदर्द कॉलेज से हिकमत की पढ़ाई करने के दौरान ही उन्हें शायरी का चस्का लगा।
हकीम नासिर
हकीम मोहम्मद नासिर मोहब्बतों के ही शायर रहे। उनकी सबसे ज्यादा मकबूल ग़ज़ल "जब से तूने मुझे दीवाना बना .. " है जिसे आबिदा परवीन ने अपनी रुहानी आवाज़ से कालजयी बना दिया। हकीम साहब से उनके हर मुशायरे में इस ग़ज़ल को पढ़ने की गुजारिश होती रहती थी। याद के लिए चंद अशआर इसी ग़ज़ल के आप सब की नज़र
जब से तूने मुझे दीवाना बना रक्खा है
संग हर शख़्स ने हाथों में उठा रक्खा है
उस के दिल पर भी कड़ी इश्क़ में गुज़री होगी
नाम जिस ने भी मोहब्बत का सज़ा रक्खा है
इश्क़ के सामने कौन नहीं बेबस हो जाता है और इसी बेबसी पर उनकी एक ग़ज़ल और याद आ रही है जिसमें उन्होंने लिखा था
इश्क़ कर के देख ली जो बेबसी देखी न थी
इस क़दर उलझन में पहले ज़िंदगी देखी न थी
आप से आँखें मिली थीं फिर न जाने क्या हुआ
लोग कहते हैं कि ऐसी बे-ख़ुदी देखी न थी
हाकिम नासिर के इश्क़िया मिज़ाज की गवाही देते ये अशआर भी खूब थे..
ये दर्द है हमदम उसी ज़ालिम की निशानी
दे मुझ को दवा ऐसी कि आराम न आए
मैं बैठ के पीता रहूँ बस तेरी नज़र से
हाथों में कभी मेरे कोई जाम न आए
तो आइए अब बात करें उस ग़ज़ल की जिससे आज की बात शुरु हुई थी। एक अजीब सी तड़प है इस ग़ज़ल में।जिससे मोहब्बत थी उसका साथ छूट गया पर उसके बावज़ूद शायर को इस बात का यकीं है कि जिस शिद्दत से उसने मुझे प्यार किया था वो शिद्दत अपने मन में वो और किसी के लिए नहीं ला पाएगी। अब अगर ये शायर की खुशफहमी है तब तो कोई बात ही नहीं पर अगर यही हक़ीक़त है तो फिर मन ये सवाल जरूर करता है कि इतने प्यारे रिश्ते को तोड़ने की जरूरत क्या थी? पर ये भी तो सच है ना कि रिश्तों की डोर कब पूरी तरह अपने हाथ में रही है?
ज़िंदगी को न बना लें वो सज़ा मेरे बाद हौसला देना उन्हें मेरे ख़ुदा मेरे बाद
कौन घूँघट को उठाएगा सितम-गर कह के और फिर किस से करेंगे वो हया मेरे बाद
हाथ उठते हुए उन के न कोई देखेगा किस के आने की करेंगे वो दुआ मेरे बाद
फिर ज़माने में मोहब्बत की न पुर्सिश* होगी रोएगी सिसकियाँ ले ले के वफ़ा मेरे बाद
किस क़दर ग़म है उन्हें मुझ से बिछड़ जाने का हो गए वो भी ज़माने से जुदा मेरे बाद
वो जो कहता था कि ‘नासिर’ के लिए जीता हूँ उस का क्या जानिए क्या हाल हुआ मेरे बाद * पूछ बहरहाल मेहदी हसन साहब की ये ग़ज़ल आपने सुनी ही होगी।
हिमानी ने भी इस ग़ज़ल के कुछ अशआरों को बड़े दिल से निभाया है। हिमानी की आवाज़ का मैं तब से प्रशंसक रहा हूँ जब वे 2005 के सा रे गा मा पा में पहली बार संगीत के मंच पर दिखाई पड़ी थीं। पहली बार जब उनकी आवाज़ में जिया धड़क धड़क जिया धड़क धड़क जाये... सुना था तो रोंगटे खड़े हो गए थे।
हिमानी ने पिछले एक दशक में बैंड बाजा बारात और बचना ऐ हसीनों सहित सात आठ फिल्मों के लिए गाने गाए हैं पर एक दो गानों को छोड़कर उनके बाकी गाने उतने लोकप्रिय नहीं हुए। इंटरनेट के युग में उनके जैसे हुनरमंद कलाकार अब अपने सिंगल्स खुद ही निकाल रहे हैं। हिमानी का मानना है कि फिल्मों के बजाए Independent Music करने में सहूलियत ये होती है कि आप अपनी पसंद के गीत चुनते हैं और दर्शकों से सीधे मुखातिब होते हैं।
ये ग़ज़ल भी उन्होंने यू ट्यूब पर पहली बार ॠषिकेश में गंगा के किनारे यूँ ही रिकार्ड की थी पर जैसा मैंने आपको ऊपर बताया कि हाल ही में इसे उन्होंने शंकर महादेवन के घर में सुनाया। आप भी सुन लीजिए उनका ये प्यारा सा प्रयास...
आज तो ना हमारे बीच हकीम मोहम्मद नासिर हैं और ना ही मेहदी हसन साहब लेकिन जब तक उनकी गायिकी का परचम फहराने वाले ऐसे युवा कलाकार हमारे बीच रहेंगे उनकी याद हमेशा दिल में बनी रहेगी।
सत्तर के दशक में जगजीत जी ने कई ग़ज़लें गायीं। कभी निजी महफिलों में तो कभी स्टेज शो में। वो वक़्त ग्रामोफोन का हुआ करता था। चुनिंदा ग़ज़लें ही रिकार्ड होती थीं। जब कैसेट का युग आया तो भी उस शुरुआती दौर में HMV का एकाधिकार रहा। नतीजा ये हुआ कि जगजीत जी की बहुत सारी ग़ज़लें उनके उसे पहली बार गाने के कई दशकों बाद किसी एलबम का हिस्सा बनीं। आज इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिकी की लिखी जो ग़ज़ल आपको सुनाने जा रहा हूँ वो इसी कोटि की है।
इस ग़ज़ल को लिखने वाले सीमाब अकबराबादी के पोते इफ़्तिख़ार इमाम सिद्दिकी से आपकी मुलाकात मैंने फिल्म अर्थ के लिए लिखी उनकी चर्चित ग़ज़ल तू नहीं तो ज़िदगी में और क्या रह जाएगाके जिक्र के दौरान की थी। दादा की मौत के बाद उनका परिवार आगरा से मुंबई आया और विकट परिस्थितियों में शायर पत्रिका का सालों साल बिना रुके संपादन करता रहा। वे अपने किसी भी साक्षात्कार में फक्र से ये बताना नहीं भूलते कि एक समय वो भी था जब निदा फ़ाज़ली जैसा शायर उन्हें ख़त लिखता था कि उनकी शायरी पत्रिका में छाप दी जाए।
इमाम साहब की ज़िंदगी ने तब दुखद मोड़ लिया जब वर्ष 2002 में चलती ट्रेन पर चढ़ने की कोशिश में वो गिर पड़े और उस दुर्घटना के बाद उमका कमर से नीचे का हिस्सा बेकार हो गया। आज उनकी ज़िंदगी व्हीलचेयर के सहारे ही घिसटती है, फिर भी वो इसी हालत में 'शायर' के संपादन में जुटे रहते हैं। कुछ साल पहले भास्कर को दिए अपने साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि
"हमारी विरासत शायरी है। हम उसे आगे ले जाने के लिए हर सुबह आंखें खोलते हैं और रात में पलकें झपकाते हैं तो इस यकीन के साथ कि अगली सुबह फिर अदब को मज़बूती देने के लिए सांस लेते हुए उठेंगे। यही हमारी ज़िंदगी है। कई बार कुछ लोग कहते हैं कि जिस साहित्यिक समाज के लिए हमने सब कुछ दांव पर लगा दिया, उसने बेकद्री की है, लेकिन हमें ऐसा कतई नहीं लगता। तमाम संस्थाओं ने मान-सम्मान दिया है, हमारी ग़ज़लें पढ़ी-सुनी हैं, ‘शायर’ को अब तक हाथोहाथ लिया है तो चंद दुखों के आगे लोगों की मोहब्बत को हम कैसे नाकाफी कह दें।
जगजीत सिंह, चित्रा सिंह, पंकज उधास और सुधा मल्होत्रा जैसे गायक और गायिकाओं ने मेरे कलाम गाए, निदा फाज़ली और बशीर बद्र को फ़िल्म इंडस्ट्री से इंट्रोड्यूस कराने का मुझे मौका मिला, कृश्नचंदर, महेंदरनाथ, राजिंदर सिंह बेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास से सोहबत रही- और बताइए, दौलत क्या होती है। "
इमाम साहब का ये जज़्बा यूँ ही बना रहे। उनकी मशहूर ग़ज़लों की तो रिकार्डिंग उपलब्ध नहीं पर उनको अगर आप तरन्नुम में गाते सुन लें तो यूँ महसूस होगा कि सफेद बालों के इस वृद्ध इंसान के भीतर रूमानियत से भरा एक युवा दिल आज भी धड़क रहा है।
वैसे तो मुझे उनकी ये पूरी ग़ज़ल ही प्यारी लगती है पर इसके दो शेर खासतौर पर दिल के करीब लगते हैं। पहला तो वो जिसमें इमाम साहब कहते हैं जिसे मिलना ही नहीं उससे मोहब्बत कैसी...सोचता जाऊँ मगर दिल में उतरता देखूँ और दूसरा वो चंद लम्हे जो तेरे कुर्ब के मिल जाते हैं...इन्ही लम्हों को मैं सदियों में बदलता देखूँ। जिन्हें हम पसंद करते हैं उनके साथ ज़िदगी बीते ना बीते उनका स्थान दिल की गहराइयों में वैसे ही बना रहता है और जब कभी ऐसी शख्सियत से मुलाकात होती है तो उन बेशकीमती पलों को हम हृदय में तह लगाकर रख देते हैं और जब जब मन होता है उन यादों को ओढ़ते बिछाते रहते हैं।
तू जो आ जाए तो इस घर को सँवरता देखूँ एक मुद्दत से जो वीरां है वो बसता देखूँ ख़्वाब बनकर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम को निख़रता देखूँ जिसे मिलना ही नहीं उससे मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में उतरता देखूँ चंद लम्हे जो तेरे कुर्ब के मिल जाते हैं इन्ही लम्हों को मैं सदियों में बदलता देखूँ (कुर्ब : निकटता ) जगजीत जी ने इसी बहर में पाकिस्तान के मशहूर शायर अहमद नदीम कासिमी का भी एक शेर गाया है जो कुछ यूँ है
दिल गया था तो ये आँखें भी कोई ले जाता मैं फ़क़त एक ही तस्वीर कहाँ तक देखूँ 😄 -
स्टेज शो में तब जगजीत बहुत कुछ मेहदी हसन वाली शैली अपनाते थे। यानी ग़ज़ल के अशआरों के बीच श्रोताओं को उनकी शास्त्रीय गायिको सुनने का लुत्फ मिल जाया करता था। जगजीत ने इस ग़ज़ल में राग दुर्गा पर आधारित बंदिश का इस्तेमाल किया है।
जगजीत जी को ग़ज़लों के साथ कई नए तरह के वाद्य यंत्र जैसे वॉयलिन, पियानो, सरोद आदि इस्तेमाल करने का श्रेय दिया जाता है पर नब्बे के दशक के बाद उनके संगीत संयोजन में एक तरह का दोहराव आने लगा। अगर आप उस समय के एलबमों को सुनते हुए बड़े हुए हैं तो उनकी ये ग़ज़ल और उसका संगीत संयोजन आपको ग़ज़ल गायिकी की पारंपरिक शैली की ओर ले जाता मिलेगा। मुझे तो लुत्फ़ आ गया इसे सुन कर। आप भी सुनें।
इब्ने इंशा का आज यानी 15 जून को जन्मदिन है। अगर वो आज हमारे साथ रहते तो उनकी उम्र 92 की होती। इब्ने इंशा मेरे पसंदीदा साहित्यकारों में से एक रहे हैं। शायर इसलिए नहीं कह रहा कि मुझे उनके लिखे व्यंग्य भी बेहद उम्दा लगते हैं। उर्दू की आखिरी किताब पढ़ते वक़्त जितना मैं हँसते हँसते लोटपोट हुआ था उसके बाद वैसी कोई मजेदार किताब पढ़ने को नहीं मिली। उनके यात्रानामों का अभी तक हिंदी में अनुवाद नहीं आया है। जिस दिन आएगा उस दिन चीन जापान से लेकर मध्य पूर्व के उनके यात्रानामों को पढ़ने की तमन्ना है।
जो लोग कविता को पढ़ पढ़ कर रस लेते हैं उनके लिए इब्ने इंशा जैसा कोई शायर नहीं है। इंशा जी की शायरी में जहाँ एक ओर शोखी है, शरारत है तो वहीं दूसरी ओर एक बेकली, तड़प और एक किस्म की फकीरी भी है। अपने दुख के साथ साथ समाज के प्रति अपने दायित्व को उनकी नज़्में बारहा उभारती हैं। ये बच्चा किसका बच्चा है और बगदाद की एक रात उनकी ऍसी ही श्रेणी की लंबी नज़्में हैं।
आजकल के शायरों में अगर चाँद किसी की नज़्मों और गीतों मे बार बार दिखता है तो वो गुलज़ार साहब हैं पर जिनलोगों ने इब्ने इंशा को पढ़ा है वो जानते हैं कि चाँद के तमन्नाइयों में इंशा सबसे ऊपर हैं। बचपन में उनकी शायरी से मेरा परिचय जगजीत सिंह की गाई ग़ज़ल कल चौदहवीं की रात थी, से ही हुआ था। इंशा ने अपनी पहली किताब का भी नाम चाँदनगर रखा। इंशा ने इस बात का जिक्र भी किया है कि उनका घर एक रेलवे स्टेशन के पास था जिसके ऊपर बने पुल पर वो घंटों चर्च के घंटा घर की आवाज़ें सुनते और चाँद को निहारा करते थे। चाहे वो एकांत में रहें या शहर की भीड़ भाड़ में, चाँद से उनकी प्रीति बनी रही। चाँदनगर की प्रस्तावना में अपनी शायरी के बारे में इंशा लिखते हैं...
मैं शुरु से स्वाभाव का रूमानी था पर मैं ऍसे संसार का वासी हूँ जहाँ सब कुछ प्रेममय नहीं है। मेरी लंबी नज़्में मेरे आस पास की घटनाओं का कटु सत्य उजागर करती हैं। हालांकि कई बार ऐसा लेखन मेरी रूमानियत के आड़े आता रहा। फिर भी मैंने कोशिश की चाहे प्रेम हो या जगत की विपदा जब भी लिखूँ मन की भावनाओं को सच्चे और सशक्त रूप में उभारूँ।
अब फर्ज करो को ही लीजिए। कैसी शरारत भरी नज़्म है कि एक ओर तो उनके दिल में दबा प्रेम इस रचना के हर टुकड़े से कुलाँचे मार कर बाहर निकलना चाहता है तो दूसरी ओर अपनी ही भावनाओं को हर दूसरी पंक्ति में वो विपरीत मोड़ पर भी ले जाते हैं ताकि सामने वाले के मन में संशय बना रहे। ये जो इंसानी फितरत है वो थोड़ी बहुत हम सबमें हैं। प्रेम से लबालब भरे पड़े हैं पर जब सीधे पूछ दिया जाए तो कह दें नहीं जी ऐसा भी कुछ नहीं हैं। आपने आखिर क्या सोच लिया और फिर बात को ही घुमा दें? अपनी बात कहते हुए जिस तरह इंशा ने हम सब की मनोभावनाओं पर चुपके से सेंध मारी है,वो उनकी इस रचना को इतनी मकबूलियत दिलाने में सफल रहा।
इब्ने इंशा को उनके जन्मदिन पर याद करने के लिए उनकी बेहद लोकप्रिय नज़्म पढ़ने की कोशिश की है। यूँ तो इब्ने इंशा की इस नज़्म को छाया गाँगुली और हाल फिलहाल में जेब बंगेश ने अपनी आवाज़ से सँवारा है पर जो आनंद इसे बोलते हुए पढ़ने में आता है वो संगीत के साथ सुनने में मुझे तो नहीं आता। आशा है आप भी पूरे भावों के साथ साथ ही में पढ़ेंगे इसको
फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों
फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता, जी से जोड़ सुनाई हो फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो
फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूंढे हमने बहाने हों फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सचमुच के मयख़ाने हों
फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी पीत हमारी हो फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो
फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो
पिछले हफ्ते आपको मैंने नूरजहाँ का गाया एक गीत सुनवाया था और ये वादा भी किया था कि उन्हीं की आवाज़ में मकबूल शायर नासिर काज़मी साहब की कुछ ग़ज़लों को आपके सामने लाऊँगा। नासिर साहब की पैदाइश पंजाब के अंबाला की थी। आजादी के बाद वो लाहौर जाकर बस गए। फिर पहले कुछ साल पत्रकारिता और साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन का काम किया। बाद में वो रेडियो पाकिस्तान से भी जुड़े।
यूँ तो नासिर साहब की लिखी ग़ज़लों को लगभग हर बड़े फ़नकार ने गाया है पर मेरा उनकी शायरी से प्रथम परिचय गुलाम अली की वज़ह से अस्सी के दशक में हुआ। ये वो जमाना था जब कैसेट्स की जगह बाजार में एल पी रिकार्ड बिका करते थे। तब पैनासोनिक के टेपरिकार्डर भी नेपाल से मँगाये जाते थे। हमारे भी एक रिश्तेदार नेपाल से सटे बिहार के मोतिहारी जिले से ताल्लुक रखते थे। काम के सिलसिले में उनका नेपाल में आना जाना लगा रहता था। उन्हीं से कहकर हमारे घर में तब कुछ कैसेट्स मँगवाए गए थे। इनमें ज्यादातर कैसेट्स भारत और पाकिस्तानी कलाकारों द्वारा लंदन के रॉयल अलबर्ट हॉल में किये गए कार्यक्रमों के थे।
उसी में एक कैसेट था गुलाम अली साहब का था जिसमें अकबर इलाहाबादी की हंगामा हैं क्यूँ बरपा, मोहसीन नकवी की इतनी मुद्दत बाद मिले हो और आवारगी के साथ नासिर काज़मी साहब की मशहूर ग़ज़ल दिल में इक लहर सी उठी है अभी..कोई ताज़ा हवा चली है अभी.... भी शामिल थी। गुलाम अली ने अपने खास अंदाज़ में इस ग़ज़ल को यूँ गाया था मानो आवाज़ में लहरे उठ रही हों। छोटी बहर की ग़ज़लों में नासिर साहब को कमाल हासिल था। उनकी इस ग़ज़ल के चंद शेर जो मुझे बेहद पसंद आए थे वो थे
कुछ तो नाज़ुक मिज़ाज हैं हम भी और ये चोट भी नई है अभी भरी दुनिया में जी नहीं लगता जाने किस चीज़ की कमी है अभी सो गये लोग उस हवेली के एक खिड़की मगर खुली है अभी
अस्सी के दशक में ही गुलाब अली साहब ने आशा जी के साथ मिल कर एलबम किया। एलबम का नाम था मेराज ए ग़ज़ल। एलबम की बारह ग़ज़लों में एक तिहाई पर नासिर काज़मी का नाम था। उस एलबम में नासिर साहब की जो ग़ज़ल सबसे ज्यादा बजी उसका मतला कुछ यूँ था गए दिनों का सुराग़ लेकर किधर से आया किधर गया वो...अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो। बड़ी बहर की इस ग़ज़ल में नासिर साहब ने जो शेर लिखे थे वो वाहवाही के हक़दार थे। अब देखिये एक ही ग़ज़ल में दो ऐसे शेर थे जो ख़्याल में एक दूसरे से बिल्कुल जुदा हैं।
पहले शेर में आलम ये है कि नासिर साहब को ग़म और खुशी दोनों में अपने हमदम की यादें बेचैन करती थीं । बाग का हर फूल उसकी खुशबू की गवाही देता था। कानों में सुनाई देने वाला हर गीत मानो ऐसा लगता कि उसी के लिए लिखा गया हो।
ख़ुशी की रुत हो कि ग़म का मौसम नज़र उसे ढूँढती है हर दम वो बू-ए-गुल था कि नग़मा-ए-जान मेरे तो दिल में उतर गया वो
वहीं एक अलग ही रंग सामने आ जाता है दूसरे शेर में जब वही प्रियतम यादों से उतरने लगता है। अब तो ना उसकी यादें परेशान करती हैं और ना ही उन उदास सावन की रुतों में उसका इंतज़ार खलता है। हाँ एक हल्की सी कसक दिल में उठती है जब उसका जिक्र आता है पर ये कसक अब कोई पीड़ा नहीं देती। कष्ट हो तो कैसे उसके दिए जख्म भर जो चुके हैं।
न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा यूँ ही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो
नासिर साहब को घुड़सवारी और शिकार तो भाते थे ही उन्हें घूमने का भी बड़ा शौक था। गाँवों में विचरना, नदी के किनारे टहलना, पेड़ों और पंक्षियों को निहारना और पहाड़ों में वक़्त बिताना उन्हें खासा पसंद था। वे कहा करते थे कि यही वो वक़्त होता था जब वो प्रकृति के करीब होते और कविता हृदय में आकार लेती। प्रकृति के बदलते रूपों पर मनुष्य की कभी पकड़ तो रही नहीं पर उन गुजरते खूबसूरत लमहों को शब्दों के जाल में तो बाँधा जा ही सकता था। नासिर साहब ने इन्हीं पलों को क़ैद करने के लिए कविता लिखनी शुरु की।
ख़ैर हम बातें कर रहे थे उनकी ग़ज़लों की। नासिर साहब की लिखी एक ग़ज़ल जो उदासी के लमहों में हमेशा मेरे साथ होती थी वो थी दिल धड़कने का सबब याद आया .. वो तेरी याद थी अब याद आया। इसे पहली बार मैंने पंकज उधास की आवाज़ में सुना था और तभी से इसका मतला जुबाँ पर चढ़ गया था। बाद में इसे जब नूरजहाँ की दिलकश आवाज़ में सुना तो इस ग़ज़ल का दर्द और उभर आया।
नासिर काज़मी की ग़ज़लों की खासियत उनका सरल लहजा है़। पर इस सरल लहजे में गहरी बात कहने का जो हुनर उनके पास था वो आप इन अशआरों में ख़ुद ही महसूस कर सकते हैं। जब किसी की याद बुरी तरह सताए तो बस इस ग़ज़ल के साथ अपने को बहा दीजिए, आँसुओं के साथ साथ दिल का खारापन भी जाता रहेगा।
दिल धड़कने का सबब याद आया वो तेरी याद थी अब याद आया आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त तू मुसीबत में अजब याद आया दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा मर रहेंगे अगर अब याद आया फिर कई लोग नज़र से गुज़रे फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन जब वो रुख़सत हुए तब याद आया बैठ कर साया-ए-गुल में "नासिर" हम बहुत रोये वो जब याद आया
यूँ तो इस ग़ज़ल को नूरजहाँ के आलावा गुलाम अली, जगजीत सिंह, आशा भोसले और पंकज उधास ने भी गाया है पर जो असर नूरजहाँ की आवाज़ का है वो और कहीं नहीं मिलता।
नासिर साहब की लिखी और नूरजहाँ की गाई एक और मशहूर ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है। ये ग़ज़ल है नीयत-ए-शौक़ भर न जाये कही..... तू भी दिल से उतर न जाये कहीं। दरअसल हम जिसे चाहते हैं उसे कोसते भी हैं तो कभी उसकी चिंता में घुलते रहते हैं। ऐसे ही विपरीत मनोभावों को नासिर ने इस ग़ज़ल में जगह दी है। मतले में अपने प्रिय से जी भर जाने की बात करते हैं और फिर ये आरजू भी व्यक्त कर देते हैं कि प्रियतम जब लौट कर आए तो उन्हें छोड़ कर ना जाए।
नीयत-ए-शौक़ भर न जाये कहीं तू भी दिल से उतर न जाये कहीं आज देखा है तुझे देर के बाद आज का दिन गुज़र न जाये कहीं न मिला कर उदास लोगों से हुस्न तेरा बिखर न जाये कहीं आरज़ू है के तू यहाँ आये और फिर उम्र भर न जाये कहीं आओ कुछ देर रो ही लें "नासिर" फिर ये दरिया उतर न जाये कहीं
नासिर साहब की लिखी कोई और ग़ज़ल जो आपको पसंद हो तो बताएँ। मुझे जानकर खुशी होगी।
जगजीत सिंह के जाने के बाद ग़ज़ल के एलबमों का अकाल सा हो गया है। संगीत कंपनियों को लगता है कि लोगों को ख़ालिस ग़ज़ल की समझ नहीं है इसलिए ग़ज़लों के जो इक्का दुक्का एलबम रिलीज़ होते हैं उनमें सम्मिलित ग़ज़लों के बोल इतने छिछले होते हैं कि वो ग़ज़ल कम हल्के फुल्के गीत ज्यादा लगते हैं। यही वज़ह रही है कि पिछले सालों में नामी कलाकारों की फेरहिस्त होने के बावज़ूद ऐसे एलबम अपनी कोई विशेष छाप नहीं छोड़ पाए। दरअसल ग़ज़लों की रुह उनके शब्दों में बसती है। दो पंक्तियों के मिसरे में गहरे से गहरे भाव को कह देने की सलाहियत ही ग़ज़ल को विशिष्ट बनाती है। ग़जल में अरबी फारसी शब्दों का ज्यादा समावेश ना हो पर उसके भाव गहरे हों, इन दो बातों में संतुलन बिठाने में जगजीत सिंह को महारत हासिल थी। खूबसूरत कविता और उसपर उनकी आवाज़ सोने पे सुहागा का काम करती थी।
आवाज़ें तो आज भी हमारे पास हैं पर गायकों और निर्माताओं द्वारा एलबम में सही ग़ज़लों का चुनाव इस युग की सबसे बड़ी समस्या है। संगीत निर्माताओं को समझना चाहिए कि ग़ज़लों को सुनने समझने वाला एक अपेक्षाकृत छोटा ही सही पर एक प्रबुद्ध वर्ग है जो आज यू ट्यूब के ज़माने में भी अच्छी ग़ज़लों को हाथों हाथ वायरल बना सकता है। ग़ज़लों के सरलीकरण से ऐसा ना हो कि वे ना तो आम श्रोता तक पहुँच पाएँ ना खास तक।
कुछ दिनों पहलें ग़ज़लों की तलाश मुझे एक ऐसे एलबम तक ले गई जो आज से चार साल पहले एक नई कंपनी रेड रिबन ने रिलीज़ की थी। नए पुराने कलाकारों का एक अच्छा संगम था इस एलबम में। एक ओर राशिद खाँ, अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन, अनूप जलोटा जैसे उस्ताद ग़ज़ल गायक थे तो दूसरी ओर सोनू निगम, कविता कृष्णामूर्ति, जावेद अली और अरिजीत सिंह जैसे मशहूर पार्श्व गायकों की आवाज़ें भी। एलबम का नाम था कुछ दिल ने कहा। पूरे एलबम में कुल ग्यारह ग़ज़लें थी जिन्हें लिखा था गुजराती ग़ज़लकार हर्ष ब्रह्मभट्ट ने।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हर्ष ब्रह्मभट्ट गुजरात सरकार में अतिरिक्त सचिव के पद से रिटायर हुए। प्रशासनिक सेवा में योगदान करते हुए पिछले दो दशकों में उनके कई ग़ज़ल संग्रह जैसे कंदील, सरगोशी, मेरा अपना आसमान, ख़ामोशी है इबादत आदि प्रकाशित हुए। जहाँ तक इस एलबम की बात है मैं ये तो नहीं कहूँगा कि मुझे सारी ग़ज़लें पसंद आयीं पर कुछ तो निश्चय ही दिल को छू गयीं। उनमें से एक थी...आसमां की परी सी लगती हो जिसे सुनकर दिल खुश हो गया और मैंने इसे रिकार्ड कर लिया। आप भी सुनिए
आसमां की परी सी लगती हो तुम मुझे ज़िंदगी सी लगती हो
फूल भी सज़दे करते हों जिसको ऐसी दिलकश कली सी लगती हो
खुशबू दिल की ज़मीं से आती है तुम इस पर चली सी लगती हो
सादगी का सरापा हो पैकर और फिर भी सजी सी लगती हो
यानि सिर से पैर तक तुम सादगी की प्रतिमूर्ति पर तुम्हारा लावण्य कुछ ऐसा है कि तुम फिर भी सजी सी लगती हो।
इस ग़ज़ल को एलबम में हुसैन बंधुओं ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में गाया है। वो ग़ज़ल आप यहाँ सुन सकते हैं।
वैसे पूरे एलबम में इतने नामचीन गायकों में सबसे ज्यादा मन को सुकून दे गए अरिजीत सिंह। आपको याद होगा कि हैदर में अरिजीत ने मेहदी हसन की मशहूर ग़ज़ल गुलों में रंग भरे को निभाने की ईमानदार कोशिश की थी। फिर यू ट्यूब पर आज जाने की ज़िद ना करो को गाने का प्रयास सराहा गया था। पर ये दोनों अपने आप में मशहूर ग़ज़लें थीं। कुछ दिल ने कहा में उनकी गायिकी को इस रूप में सुनना एक ताज़ी हवा सा लगा। उन्हें सुनकर ये समझ आता है कि फिल्मी गीतों के साथ साथ ग़ज़ल गायिकी में भी वो नाम कमा सकते हैं बशर्ते उन्हें सही मौके मिलें।
ज़िंदगी के खट्टे मीठे अनुभवों से गुजरते हुए अंत में एक वक़्त ऐसा आता है जब हम माज़ी के उन लमहों को मन के तराजू में तौलते हैं। ये ग़ज़ल उन्हीं लमहों को फिर से जिंदा करती चलती है। ग़ज़ल का संगीत संयोजन भी कर्णप्रिय और इसका श्रेय जाता है मशहूर भजन व ग़ज़ल गायक अनूप जलोटा को।
रिश्तों के सारे मंज़र चुपचाप देखता हूँ हाथों में सबके खंजर चुपचाप देखता हूँ
जिसमें पला है मेरे बचपन का लम्हा लम्हा उजड़ा हुआ सा वो घर चुपचाप देखता हूँ
धरता है कितने तोहमत मुझपे वजूद मेरा जब भी मैं दिल के अंदर चुपचाप देखता हूँ
वो रहगुज़र कभी जो मंज़िल की इब्तिदा थी उसको मैं अब पलटकर चुपचाप देखता हूँ
हाथों में सबके खंजर हाथों में सबके खंजर रिश्तों के सारे मंज़र चुपचाप देखता हूँ
बाहर बारिश की झमाझम है और मन भी थोड़ा रिमझिम सा हो रहा है तो सोच रहा हूँ कि क्यूँ ना आज आपको हरिहरण साहब की गायी वो हल्की फुल्की पर बेहद मधुर ग़ज़ल सुनाऊँ जिसके कुछ अशआर कुछ दिनों से मन में तरलता सी घोल रहे हैं।
हरिहरण ने ये ग़ज़ल अपने एलबम काश में वर्ष 2000 में रिकार्ड की थी। 'काश' उस समय तक के हरिहरण के एलबमों से थोड़ी भिन्नता लिए जरूर था। सामान्यतः हरिहरण ग़ज़लों में हमेशा से अपनी शास्त्रीयता के लिए जाने जाते रहे हैं। ग़ज़ल में परंपरागत रूप से इस्तेमाल होने वाले वाद्य यंत्रों जैसे हारमोनियम, सारंगी और तबले के साथ हरिहरण का आलाप आपने भी कई ग़ज़लों में सुना होगा। पर जगजीत सिंह की तरह ही वक़्त के साथ उन्होंने भी कई एलबमों में नए नए प्रयोग करने की कोशिश की। जनवरी 1999 से इस एलबम की तैयारी शुरु हुई पर इसे बनने में पूरा एक साल लग गया। बकौल हरिहरण
"मुझे इस एलबम को पूरा रिकार्ड करने में इतना समय इसलिए लगा क्यूँकि इन ग़ज़लों को मैं उस आवाज़ व संगीत के साथ पेश करना चाहता था जो वर्षों से मेरे मन में रच बस रही थी। आप इसे आज के प्रचलित वाद्यों के साथ कविता और ठेठ गायिकी का मिश्रण मान सकते हैं।"
हरिहरण ने अपने इस प्रयोग को तब Urdu Blues की संज्ञा दी थी। अब ये एलबम उस वक़्त सराहा तो गया था पर इतना भी नहीं कि इसे हरिहरण के सर्वोत्तम एलबमों में आँका जा सके। इसका एक कारण हरिहरण की चुनी हुई कुछ ग़ज़लों में शब्दों की गहराई का ना होना भी था।
ख़ैर एलबम की कुछ पसंदीदा ग़ज़लों में एक थी मैकदे बंद करे लाख जमाने वाले. जिसे मैं आज आपको सुनवाने जा रहा हूँ। गिटार और बांसुरी के साथ उस्ताद रईस खान का सितार मन को तब चंचल कर देता है जब ग़ज़ल के मतले में हरिहरण की आवाज़ कुछ ये कहती सुनाई पड़ती है
मैकदे बंद करे लाख ज़माने वाले शहर में कम नहीं आँखों से पिलाने वाले
सच ही तो है , जिसने भी हुस्न और शोखियों का स्वाद उनकी आँखों के पैमाने से पिया है उसे भला मयखाने जाने की क्या जरूरत?
मतले के बाद का शेर सुनकर तो बस आह ही उभरती है, कोई पुरानी कसक याद दिला ही जाता है ये नामुराद शेर
काश मुझको भी लगा ले तू कभी सीने से मेरी तस्वीर को सीने से लगाने वाले
ग़ज़ल का अगला शेर सुनने के पहले आप घटम और सितार की मधुर जुगलबंदी सुन सकते हैं। वैसे इस एलबम में ड्रम्स या घटम जैसे ताल वाद्यों को बजाया था मशहूर ड्रमर शिवमणि ने ।
हम यकीं आप के वादे पे भला कैसे करें आप हरगिज़ नहीं हैं वादा निभाने वाले
इस ग़ज़ल को किसने लिखा ये ठीक ठीक पता कर पाना मुश्किल है। कुछ लोग इसे ताज भोपाली की ग़ज़ल बताते हैं। पर हरिहरण साहब ने एक जगह जरूर ये कहा था कि मैंने इस एलबम में ताहिर फ़राज़, मुन्नवर मासूम, मुजफ्फर वारसी, वाली असी, कैफ़ भोपाली, शहरयार और क़ैसर उल जाफ़री की ग़ज़लें ली थीं। अब इनमें से जिन जनाब की भी ये ग़ज़ल हो आख़िरी शेर में सादी जुबां में ज़िदगी की एक हकीक़त ये कह कर बयाँ की है कि
अपने ऐबों पर नज़र जिनकी नहीं होती है आईना उनको दिखाते हैं ज़माने वाले
तो आइए इस बरसाती मौसम में आप भी मेरे साथ इस ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाइए...
बहुत सारी पसंदीदा ग़ज़लें होती हैं जिनके तीन चार अशआर डॉयरी के पन्नों पर नोट कर हम उन्हें पूरा मान लेते हैं। बरसों वहीं अशआर हमारे ज़हन में रह रह कर उठते और पलते रहते हैं। ऐसे में जब उसी ग़ज़ल के चंद और अशआर अचानक से सामने आ जाते हैं तो लगता है कि बैठे बिठाए कोई सौगात मिल गयी हो। लखनऊ से ताल्लुक रखने वाले शायर कृष्ण बिहारी नूर की इस मशहूर ग़ज़ल के पाँच शेर बरसों से मेरे पास थे पर कल उनसे जुड़ी एक किताब पढ़ते हुए ग़ज़ल के चंद शेर और हाथ लगे तो सोचा आप तक उनकी ये पूरी कृति पहुँचा दूँ।
इस ग़ज़ल से जुड़े एक किस्से का जिक्र कन्हैयालाल नंदन जी ने अपने एक आलेख में किया है। तब नंदन जी मुंबई में पत्र पत्रकारिता से जुड़े काम के सिलसिले में पदस्थापित थे। नूर साहब एक मुशायरे के सिलसिले में मुंबई आए हुए थे और नवी मुंबई के वासी में ठहरे थे जो कि मुख्य शहर से काफी दूर का इलाका है। उन्होंने नंदन जी को फोन कर कहा कि वो उनसे मिलना चाहते हैं। कन्हैयालाल नंदन को यही लगा कि इतनी दूर से ख़ुद फोन कर मिलने की बात कर रहा है तो जरूर इसे मुझसे कोई काम होगा। पर डेढ़ घंटे बाद जब नूर हाज़िर हुए तो उनसे उनके आने का उद्देश्य जान कर नंदन आश्चर्यचकित रह गए। नूर साहब का कहना था कि बस एक नई ग़ज़ल लिखी है वही आप जैसे संवेदनशील श्रोता को सुनाना चाहता था। वो ग़जल यही ग़ज़ल थी जिसका जिक्र मैंने आज आपसे छेड़ा है।
तो चलिए देखते हैं कि आख़िर क्या कहना चाहा था कृष्ण बिहारी नूर ने अपनी इस ग़ज़ल में...
हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि ये शरीर प्रकृति के पंच तत्वों से निर्मित है और भगवान का वास हर जगह है। यानि अपने अंदर भी अगर हम पवित्र मन से झांकें तो वहाँ परमात्मा जरूर दिखेंगे। कृष्ण बिहारी नूर ने इस सोच को अपने मतले में ढालते हुए लिखा कि
आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है, मुझ में और फिर मानना पड़ता है के ख़ुदा है मुझ में
नूर साहब की ये विशेषता थी कि वो अपनी शायरी में सूफ़ियत के साथ मोहब्बत का रंग बड़े सलीके से घोला करते थे। अब अगले शेर में वो परमपिता या अपने महबूब से मुख़ातिब हैं इसका फैसला तो आप ही कीजिए। पर जो भी है इस मोहब्बत का आलम ये है कि इसने उन्हें अपने आप से जुदा कर दिया है। अब तो उसका इख्तियार उनके ज़हन पर हो गया है
अब तो ले-दे के वही शख़्स बचा है मुझ में मुझको मुझसे अलग करके छुपा है मुझ में
ऐसे अगर आपको चाहने वाला आपकी हर छोटी छोटी बात को आत्मसात करते हुए आपके अंतर्मन को टटोलने की कोशिश करने लगे तो फिर अपने हाल के बारे में आप भी कह उठेंगे कि
मेरा ये हाल उघड़ती हुई परतें जैसे, वो बड़ी देर से कुछ ढूँढ रहा है मुझ में
ये तो मुझे पूरी ग़ज़ल में सबसे कमाल का शेर लगता है। कितनी तरह के अच्छे बुरे अहसासों, विराधाभासों से दिल जूझता रहता है। ठीक मौसम की बदलती रंगत की तरह। ये अहसास कभी सुकून के पल ले आते हैं तो कभी बेहिसाब बेचैनी। इन बदलती भावनाओं के बीच दिल की फ़िज़ा जो रंग बिखेरती है उन्हें शब्दों में बयाँ करना आसान है क्या?
जितने मौसम हैं वो सब जैसे कहीं मिल जाएँ इन दिनों कैसे बताऊँ जो फ़ज़ा है मुझ में
आप मेरे करीब भी नहीं आएँ, दूर से ही मेरे बारे में कोई राय बना लें तो इसमें मेरा क्या कुसूर? मेरे सच्चे दिल की पुकार और व्यक्तित्व की चमक को महसूस करने के लिए आपको मेरे संग कुछ वक़्त तो ज़ाया करना ही पड़ेगा।
वो ही महसूस करेगा जो मुख़ातिब होगा ऐसे अनदेखे उजाले की सदा है मुझमें
मैंने तो सोचा था कि उनकी नज़दीकियाँ पूरे जिस्म में एक ख़ुमारी सी ले आती हैं। पर मैं नहीं जानता था कि उनके लिए मेरा प्रेम एक नशा नहीं जो चढ़ के उतर जाएगा। वो तो मेरे शरीर के हर कोने में दौड़ते लहू की भांति मेरी नस नस में है जो मेरी साँस थमने से ही रुकेगा।
नशा-ए-मय की तरह समझा था क़ुरबत उसकी वो तो मानिंद ए लहू दौड़ रहा है मुझमें
आईने की भी अपनी सीमाएँ हैं। वो बस आपका बाहरी रूप रंग ही दिखा पाता है। आपके अंदर का अक़्स उसकी पहुँच से कोसों दूर है।
आईना ये तो बताता है के मैं क्या हूँ लेकिन आईना इस पे है ख़ामोश कि क्या है मुझ में
टोंक देता है, कदम जब भी ग़लत उठता है ऐसा लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझमें
अब तो बस जान ही देने की है बारी ऐ 'नूर' मैं कहाँ तक करूँ साबित के वफ़ा है मुझ में
ये तो थे ग़ज़ल के पूरे शेर। नूर साहब की आवाज़ में जब ये ग़ज़ल नहीं मिली तो मैंने सोचा क्यूँ ना इसे अपनी आवाज़ में ही रिकार्ड कर लूँ। तो ये रही नूर साहब की भावनाओं तक अपनी आवाज़ से पहुँचने की मेरी कोशिश।
नब्बे के दशक में हरिहरण फिल्म संगीत और ग़ज़ल गायिकी में एक सितारे की तरह चमके थे। इस दौरान उनकी ग़ज़लों के कई एलबम आए जिनमें से एक था 1992 में रिलीज़ हुआ हाज़िर। इस एलबम की पहली ग़ज़ल (जो सबसे लोकप्रिय हुई थी) का मतला कुछ यूँ था मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, जिया जिया ना जिया ..है एक साँस का झगड़ा, लिया लिया ना लिया
ये उन दिनों की बात थी जब इंजीनियरिंग कॉलेज के चार साल पूरे होने आए थे और इश्क़ था कि हमारी ज़िदगानी से मुँह छुपाए घूम रहा था। ऐसे में इस ग़ज़ल के मतले को मन ही मन मैं कुछ यूँ गुनगुनाने को मज़बूर हो गया था।
मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, किया किया ना किया है तो ये रोज़ का लफड़ा, लिया लिया ना लिया 😁
सच तो ये था कि उन दिनों भी कहकशाँ व गालिब जैसे जगजीत के एलबमों का जादू
मेरे सिर चढ़ कर बोल रहा था। हरिहरण की गायिकी लुभाती तो थी पर जगजीत की
आवाज़ का मैं कुछ ज्यादा ही मुरीद था। उस वक्त दूरदर्शन पर भी नियमित रूप
से हरिहरण के कार्यक्रम आया करते थे। मुझे याद है कि ऐसे ही एक महफिल में
उन्होंने एक प्यारे से गीत को अपनी आवाज़ दी थी जिसके बोल थे मेरी साँसों
में बसी है, तेरे दामन की महक, जैसे फूलों में उतर आई हो उपवन की महक। कभी
इस गीत की रिकार्डिंग हाँ लगी तो जरूर आपसे साझा करूँगा।
प्रियंका बार्वे
तो फिर अचानक ही इतने सालों बाद मुझे हरिहरण की याद कहाँ से आ गयी। हुआ यूँ कि कुछ दिनों पहले मराठी फिल्मों की प्रतिभावान गायिका प्रियंका बार्वे की आवाज़ में ये ग़ज़ल सुनने को मिल गयी। प्रियंका ने बिना किसी संगीत के शुरुआत के तीन अशआर गा कर मन में मिठास सी घोल दी। सच तो ये है कि कुछ ग़ज़लें बिना संगीत के आभूषण के सुनी जाएँ तो ज्यादा आनंद देती हैं और मेरे ख़्याल से ये एक ऐसी ही ग़ज़ल है।
पुणे के संगीतज्ञों के परिवार से ताल्लुक रखने वाली प्रियंका ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा अपनी दादी मालती पांडे बार्वे से ली। फिलहाल प्रियंका का इरादा गायिकी के साथ साथ अभिनय के क्षेत्र में उतरने का भी है। पिछले साल वे फिरोज़ खान द्वारा निर्देशित नाटक मुगल ए आज़म में अनारकली के रूप में नज़र आयीं। प्रियंका की इस प्रस्तुति को सुन कर ऐसा लगा कि उन्हें मराठी के आलावा हिंदी फिल्मों और ग़ज़लों में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरना चाहिए।
इस ग़ज़ल को लिखा है ब्रिटेन में रहने वाले उर्दू के नामचीन शायर डा. सफ़ी हसन ने। आपको जान कर अचरज होगा कि पाकिस्तान से ताल्लुक रखने वाले और फिलहाल बर्मिंघम में बसे सफ़ी साहब पेशे से एक वैज्ञानिक हैं। कितना खूबसूरत मतला लिखा था सफ़ी साहब ने। जिसे इश्क़ का रोग लग गया उसकी तो हर साँस ही गिरवी हो जाती है। फिर उसका जीना क्या और मरना क्या?
मरीज़-ए-इश्क़ का क्या है, जिया जिया ना जिया है एक साँस का झगड़ा, लिया लिया ना लिया
सफ़ी साहब आगे फर्माते हैं कि अगर दर्द से पूरा शरीर ही छलनी हो तो दिल को रफ़ू कर के कौन सी ठंडक मिलने वाली है?
बदन ही आज अगर तार-तार है मेरा तो एक चाक-ए-ग़रेबाँ, सिया सिया ना सिया
और इसकी तो बात ही क्या ! पसंदीदा शेर है मेरा इस ग़ज़ल का। जनाब सफ़ी हसन यहाँ कहते हैं की भले ही उनका नाम मेरे होठों पर नहीं आया पर क्या कभी उन्हें अपने ख्यालों से दूर कर पाया हूँ?
ये और बात के तू हर रह-ए-ख़याल मे है कि तेरा नाम जुबाँ से, लिया लिया ना लिया मेरे ही नाम पे आया है जाम महफ़िल मे ये और बात के मै ने, पिया पिया ना पिया ये हाल-ए-दिल है 'सफ़ी' मैं तो सोचता ही नही कि क्यों किसी ने सहारा, दिया दिया ना दिया
वैसे चलते चलते हरिहरण की आवाज़ में पूरी ग़ज़ल भी सुनते जाइए। तबले पे हरिहरण जी का साथ दे रहे हैं मशहूर वादक ज़ाकिर हुसैन ।
कुछ महीने पहले WhatsApp और फेसबुक पर एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें ज़मीन पर बैठा एक शख़्स गा रहा था। उसके कपड़े पर चूने के छींटे थे और पीछे उसका साथी दीवारों की पुताई में व्यस्त था। पर दो मिनट के वीडियो में उसकी सधी हुई गायिकी ने मुझे ऍसा प्रभावित किया कि कुछ दिनों तक तो ये ग़ज़ल होठों से चिपकी ही रही।
इंटरनेट पर तो ये तुरंत ही पता चल गया कि ये ग़जल सज्जाद अली की गायी है। वही सज्जाद अली जिनकी आवाज़ की ओर मेरा ध्यान बोल फिल्म के गीत दिन परेशां है, रात भारी है से गया था। सज्जाद ने पहली बार इस ग़ज़ल को अपने एलबम कोई तो बात हो.... में पन्द्रह वर्ष पहले 2002 में शामिल किया था। चार साल पहले जब इसका वीडियो यू ट्यूब पर रिलीज़ हुआ लोगों ने इसे काफी पसंद किया। सज्जाद के बारे में पहले भी यहाँ काफी कुछ लिख चुका हूँ। संगीत में दशकों से सक्रिय रहते हुए पचास वर्षीय सज्जाद फिलहाल दुबई में रहते हैं और इक्का दुक्का ही सही अपने सिंगल्स रिलीज़ करते रहते हैं।
पर जैसा मैंने शुरुआत में कहा कि इस ग़ज़ल से मेरी मुलाकात उस शख़्स ने करवायी जो पाकिस्तान में पेंटर बाबा के नाम से अपनी गायिकी के लिए जाना जाता है पर उनका वास्तविक नाम है ज़मील अहमद। सज्जाद ने जब अपनी गायी इस ग़ज़ल को ज़मील की आवाज़ में सुना तो वो भी ज़मील के हुनर की दाद दिए बिना नहीं रह सके। वैसे ज़मील ने इस अचानक मिली लोकप्रियता के बाद ग़ुलाम अली की ग़ज़ल चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला को भी अपनी आवाज़ दी है।
सज्जाद अली व आफ़ताब मुज़्तर
वैसे क्या आपको पता है कि इस ग़ज़ल को किसने लिखा? इसे लिखा है आफ़ताब मुज़्तर ने जो कराची से ताल्लुक रखते हैं और लेखक व शायर होने के साथ साथ एक रिसर्व स्कॉलर भी हैं। आफ़ताब साहब की इस ग़ज़ल में यूँ तो आठ अशआर थे पर सज्जाद ने गाने के लिए इनमें से चार को चुना। अपनी इस ग़ज़ल के बारे में आफ़ताब कहते हैं कि इस ग़ज़ल का वो शेर साहिल पे खड़े हो.. उनके उस्ताद ख़ालिद देहलवी को बेहद पसंद था और जब भी वे उनके पास जाते उस्ताद इस शेर की फर्माइश जरूर करते। तो आइए इस ग़ज़ल को सुनाने से पहले रूबरू कराते हैं आपको इसके सारे अशआरों से..
हर ज़ुल्म तेरा याद है, भूला तो नहीं हूँ ऐ वादा फ़रामोश मैं तुझ सा तो नहीं हूँ
ऐ वक़्त मिटाना मुझे आसान नहीं है इंसान हूँ कोई नक़्श-ए-कफ़-ए-पा तो नहीं हूँ
तुम्हारा ढाया हर सितम मुझे याद है पर क्या करूँ मैं तुम्हारे जैसा तो हूँ
नहीं जो अपने हर वादे से मुकर जाए। ऐ वक़्त मुझे उन पदचिन्हों की तरह ना
समझो जिस पर चल कर तुम उसका निशां मिटा दो।
चुपचाप सही मसलेहतन वक़्त के हाथो, मजबूर सही, वक़्त से हारा तो नहीं हूँ
उनके लिए लड़ जाऊँगा तक़दीर मैं तुझ से हालांकि कभी तुझसे मैं उलझा तो नहीं हूँ
आज मैं सब कुछ जानते हुए किसी प्रयोजन से चुप हूँ। मेरी इस मजबूरी, इस चुप्पी का ये मतलब मत लगा लेना कि मैंने तुम्हारे सामने अपने घुटने टेक दिए हैं। यूँ तो भाग्य ने जिस ओर चलाया उसी ओर चलता रहा हूँ। पर जब बात उनकी हो तो फिर अपनी तक़दीर से दो दो हाथ करने में मुझे परहेज़ नहीं।
ये दिन तो उनके तग़ाफ़ुल ने दिखाए मैं गर्दिश ए दौरां तेरा मारा तो नहीं हूँ
साहिल पे खड़े हो तुम्हें क्या ग़म, चले जाना मैं डूब रहा हूँ, अभी डूबा तो नहीं हूँ
मुझे तो बेहाली कभी छू भी नही सकी थी, ये दौर तो अब तेरी बेरुखी की वज़ह से आया है। तेरे ग़म में आज बदहवास सा मैं डूब रहा हूँ। और तुम हो कि बस बस यूँ ही दूर खड़े किनारे से देख भर रहे हो। जाओ, बस संतोष कर लो इस बात का कि मैं अभी तक डूबा नहीं हूँ।
क्यूँ शोर बरपा है ज़रा देखो तो निकल कर मैं उसकी गली से अभी गुजरा तो नहीं हूँ
मुज़्तर मुझे क्यूँ देखता रहता है ज़माना दीवाना सही उनका तमाशा तो नहीं हूँ
लो अभी मैं उसकी गली तक पहुँचा भी नहीं और पहले से ही छींटाकशी शुरु हो गयी। आख़िर ज़माना मुझ पर ही क्यूँ बातें बनाता है? मैंने कोई तमाशा तो नहीं सिर्फ प्यार ही तो किया है।
यूँ तो सज्जाद ने इस ग़ज़ल में गिटार का खूबसूरती से उपयोग किया है पर इस ग़ज़ल के बोलों में जो दर्द और इसकी धुन में जो मिठास है वो बिना किसी संगीत के ही दिल में बस जाने का माद्दा रखती है। तो आइए सुनते हैं इसे सज्जाद अली की आवाज़ में।
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