एम एम करीम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
एम एम करीम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, नवंबर 16, 2025

वार्षिक संगीतमाला 2024 : Top 10 किसी रोज़ बरस जल थल कर दे

संगीत नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों से मैथिली ठाकुर आजकल एक बेहद चर्चित नाम हो गया है। बिहार के चुनाव में उन्होंने इतनी कम उम्र में लड़ने का निश्चय किया और पिछले हफ्ते अपने चुनाव क्षेत्र से विजयी भी हुईं।  बहरहाल  पिछले तीन चार सालों  से उन्होंने बड़ी लगन से अपने आप को मिथिला सहित तमाम अन्य बोलियों में लिखे गए लोक गीतों की अग्रणी गायिका के रूप में स्थापित किया है । राजनीति में उनके पदार्पण से संगीतप्रेमियों को पहली चिंता ये हुई की क्या वे अपनी गायिकी को मांजने के लिए पूरा वक़्त दे पाएंगी? ख़ैर इस प्रश्न का जवाब तो आने  वाले समय देगा पर आज तो मैंने उनका ज़िक्र इसलिए किया क्यूंकि अजय देवगन और तब्बू द्वारा अभिनीत फिल्म औरों  में कहाँ दम था  के लिए गाया उनका गीत मेरी वार्षिक संगीतमाला  के दस बेहतरीन गीतों में शामिल है। 



बिहार के मधुबनी शहर से ताल्लुक रखने वाली मैथिली को शास्त्रीय संगीत की शिक्षा उनके पिता रमेश ठाकुर से मिली। उनके दोनों भाई भी संगीत से जुड़े हैं और उनके साथ ही एक तिकड़ी के रूप में फेसबुक और यू ट्यूब पर अपनी कला का जौहर दिखलाते रहे हैं।  मैथिली की लोकप्रियता में सोशल मीडिया के इन मंचों का विशेष योगदान है।  
मैथिली ने अपने नाम को सार्थक करते हुए पहल मिथिला में गाए जाने वाले  लोकगीतों से की पर लोगों की फरमाइश पर वो अन्य बोलियों के लोकगीत भी गाने लगीं जो उन्हें सम्पूर्ण भारत और विदेशों में भी एक समर्पित श्रोता वर्ग दिलवा गया।  



वैसे तो मैथिली ने ये निर्णय लिया था की वे लोकगीतों को ही अपना पूरा समय देके भारत की इस सांस्कृतिक विरासत का प्रचार प्रसार करेंगी। फ़िल्मी गीतों को सामान्यतः वे अपनी आवाज़ नहीं देतीं।  शायद इसकी एक और वज़ह संभवतः शुरुआती दिनों में रियलिटी शो में मिला रिजेक्शन भी रहा हो। पर जब ऑस्कर विजेता एम एम कीरवानी के संगीत निर्देशन में उन्हें मनोज मुन्तशिर का लिखा ये गीत गाने को मिला तो वो इतने अच्छे लिखे और  संगीतबद्ध गीत को गाने से मना  नहीं कर पाईं। 

एम॰ एम॰ कीरावनी और मनोज मुंतशिर की जोड़ी जब जब साथ आयी है इन दोनों ने मिलकर कुछ अद्भुत रचा है। याद कीजिए वर्ष 2013 में आई फिल्म  स्पेशल 26 का वो गीत कौन मेरा,  मेरा क्या तू लागे क्यूँ  तो बांधे मन से मन के धागे जो उस साल की संगीतमाला में शिखर के  तीन गीतों में शामिल हुआ था या फिर दो साल बाद फिल्म बेबी में इस जोड़ी ने एक और बड़ा प्यारा गीत दिया जिसके बोल थे मैं तुझसे प्यार नहीं करती जिसमें मनोज ने लिखा 

वो अलमारी कपड़ो वाली लावारिस हो जाती है
ये पहनूँ या वो पहनूँ
ये उलझन भी खो जाती है
मुझे ये भी याद नही आता
रंग  कौन से मुझको प्यारे हैं
मेरे शौक, पसंद मेरी
बिन तेरे सब बंजारे हैं

इस गीत के लिए भी मनोज की शब्द रचना कमाल की है।  वियोग के संताप को कितनी खूबी से इन शब्दों में पकड़ा है गीतकार ने  तन में तेरी छुअन तलाशूं, मन में तेरी छाप पिया, भाप के जैसे पल उड़ जाएं, प्रीत को है ये श्राप पिया। कीरावनी साहब की धुन का उतर चढाव किसी भी गायिका के लिए कठिन साबित हो सकता था पर मैथिली ने इतनी कम उम्र में  भी उसे ठीक ठाक ही निभाया है। वैसे मेरी इच्छा है की सुनिधि चौहान की आवाज़ में भी कभी इस गीत को सुनने का अवसर मिले। 
मनोज, नीरज व एम एम कीरावनी


आदित्य देव ने हारमोनियम और सारंगी का मुखड़े के पहले और अंतरों के बीच शानदार इस्तेमाल किया है जो गीत में तैरती उदासी और बेचैनी की प्रतिध्वनि करता है।  साथ में तबले और तार वाद्यों की संगत तो है ही। सारंगी पर दिलशाद खान और हारमोनियम पर खुद आदित्य देव ने बखूबी कमान संभाली है।  इनके बजाए हिस्सों को बार बार सुनने  का दिल करता है।  

तो आइये सुनते हैं ये संवेदनशील नग्मा मैथिली ठाकुर की आवाज़ में 
 
किसी रोज़, किसी रोज़, किसी रोज़, किसी रोज़
किसी रोज़ बरस जल थल कर दे, ना और सताओ साहिब जी
मैं युगों युगों की तृष्णा हूं, तू मेरी घटा हो साहिब जी
किसी रोज़, किसी रोज़ बरस जल थल कर दे
ना और सताओ साहिब जी...

पत्थर जग में कांच के लम्हे, कैसे सहेजूं समझ न आए
तेरे मेरे बीच में जो है, ज्ञानी जग ये जान न पाए
तन में तेरी छुअन तलाशूं, मन में तेरी छाप पिया
भाप के जैसे पल उड़ जाएं, प्रीत को है ये श्राप पिया
कैसे रोकूं जल अंजुरी में, 
भेद बताओ साहिब जी...

किसी रोज़, किसी रोज़ बरस जल थल कर दे
ना और सताओ...साहिब जी...

मंदिर पूजे, दरगाहों में जाके चढाई भेंट पिया जी
माथे से ये बिरह की रेखा कोई ना पाया भेद पिया जी
तू ही तो पहली प्रीत है मेरी तू ही तो अंतिम आस मेरी
कोई बहाना ढूँढ के आ जा टूट ना जाए साँस मेरी
दिल का कोई दोष नहीं है, दिल ना दुखाओ साहिब जी

किसी रोज़, किसी रोज़ बरस जल थल कर दे
ना और सताओ...साहिब जी..


बुधवार, जनवरी 18, 2023

एम एम कीरावनी : नाचो नाचो को छोड़िए क्या आपने उनके संगीतबद्ध ये गीत सुने हैं? M M Keeravani

संगीत हो या साहित्य हमें अपने कलाकारों का हुनर तब नज़र आता है जब वो किसी विदेशी पुरस्कार से सम्मानित होते हैं। हाल ही में एम एम करीम साहब जो दक्षिण की फिल्मों में एम एम कीरावनी के नाम से जाने जाते हैं को RRR के उनके गीत नाचो नाचो (नाटो नाटो) के लिए विश्व स्तरीय गोल्डन ग्लोब पुरस्कार से नवाज़ा गया।



सच पूछिए तो मुझे ये सुनकर कुछ खास खुशी नहीं मिली क्योंकि जिसने भी करीम के संगीत का अनुसरण किया है वो सहज ही बता देगा कि उन्होंने जो नगीने दक्षिण भारतीय और हिन्दी फिल्म संगीत को दिए हैं उनके समक्ष उनकी ये बेहद साधारण सी कृति है। पर हमारी मानसिकता तो ये है कि गोरी चमड़ी वालों ने पुरस्कार दिया नहीं और हम लहालोट होने लगे। मुझे चिंता इस बात की है ऐसे गीतों को पुरस्कार मिलता देख संगीत से जुड़ी नई पीढ़ी भारतीय संगीत की अद्भुत गहराइयों से गुजरे बिना इसे ही अपना आदर्श न मान ले।
करीम साहब तो अस्सी के दशक के आख़िर से ही दक्षिण में अपनी प्रतिभा की वज़ह से लोगों की नज़र में आने लगे थे पर हिंदी फिल्मों में पहली बार वो नब्बे के दशक के मध्य में आई फिल्म क्रिमिनल से लोकप्रिय हुए। इस फिल्म का उनका गीत तू मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए आज भी जब बजता है तो मन झूम उठता है।
पर उनका हिंदी फिल्मों में सबसे बढ़िया काम मुझे एक अनजानी सी फिल्म इस रात की सुबह नहीं में लगता है। एक बेहद कसी पटकथा लिए हुई कमाल की फिल्म थी वो जिसमें उनका संगीतबद्ध गीत मेरे तेरे नाम नये हैं ये दर्द पुराना है जीवन क्या है तेज़ हवा में दीप जलाना है मन को अंदर तक भिगो डालता है। इसी फिल्म का चुप तुम रहो भी तब बेहद पसंद किया गया था। करीम का दुर्भाग्य ये भी रहा कि जिन हिंदी फिल्मों में शुरुआती दौर में उन्होंने उल्लेखनीय संगीत दिया वो ज्यादा नहीं चलीं। फिल्म ज़ख्म का वो सदाबहार गीत जाने कितने दिनों के बाद गली में आज चांद निकला हो या रोग का दर्द भरा नग्मा "मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी..." आज भी लोगों की जुबां पर रहता है चाहे उन्हें उस फिल्म का नाम याद हो या नहीं। जिस्म के गीत "आवारापन बंजारापन.." और "जादू है नशा है..." का नशा तो श्रोताओं पर सालों साल रहा। सुर जैसी संगीतमय फिल्म में उनके गीत "कभी शाम ढले..", "जाने क्या ढूंढता है..", "दिल में जागी धड़कन ऐसे.." भी काफी सराहे गए थे।
हाल फिलहाल में स्पेशल 26 में उनका गीत "कौन मेरा क्या तू लागे" इतना सुरीला था कि इस गीत को जितनी बार भी सुनूं मन नहीं भरता। बेबी में उनका संगीतबद्ध गीत "मैं तुझसे प्यार नहीं करती" भी सुनने लायक है।
हर कलाकार चाहता है कि उसे उसके बेहतरीन काम से याद किया जाए। काश ऐसे गुणी संगीतकार को हम उनकी इन बेमिसाल कृतियों के लिए सम्मान देते। संगीत की इतनी शानदार विरासत रहने के बाद भी हम अच्छे भारतीय संगीत के लिए ऐसा पुरस्कार विकसित नहीं कर पाए जिसे पाने वाले पर सारी दुनिया ध्यान देती। इसीलिए आज हम गर्वित महसूस करने के लिए किसी गोल्डन ग्लोब या ग्रैमी की बाट जोहते हैं।

विश्व स्तरीय पुरस्कार किसी भी कलाकार के लिए सम्मान की बात है पर विश्व के संगीत प्रेमियों तक हमारी सबसे अच्छी कृति कैसे पहुंचे इस प्रक्रिया में और सुधार लाने की जरूरत है।

**********************************************

M M Kareem के संगीतबद्ध मेरे चार पसंदीदा नग्मे


1. कौन मेरा, क्या तू लागे

2. मेरे तेरे नाम नये हैं


3. मैने दिल से कहा ढूंढ लाना खुशी


4. तू मिले दिल खिले


आशा है आपने भी ये गीत सुने होंगे ही। अगर न सुने हों तो सुनिएगा।

रविवार, सितंबर 12, 2021

तू मिले दिल खिले .. अनूप शंकर Tu Mile Dil Khile Anoop Shankar

बदलते वक़्त के साथ एक शाम मेरे नाम में एक नया सिलसिला शुरु करने जा रहा हूँ और वो है मशहूर गानों को आज के कलाकारों द्वारा गाए जा रहे बिना आर्केस्ट्रा वाले अनप्लग्ड वर्सन का जो कि आलेख के हिसाब से भले छोटे हों पर आपके दिलों में देर तक राज करेंगे।


क्रिमिनल नब्बे के दशक में तब रिलीज़ हुई थी जब अस्सी के दशक के उतार के बाद हिंदी फिल्म संगीत फिर अपनी जड़ें जमा रहा था। फिल्म के संगीत निर्देशक थे एम एम क्रीम। तब नागार्जुन का सितारा दक्षिण की फिल्मों में पहले ही चमक चुका था और महेश भट्ट उसे हिंदी फिल्मों में उनकी लोकप्रियता भुनाने की कोशिश कर रहे थे। फिल्म तो कोई खास नहीं चली पर गीत संगीत के लिहाज से इस फिल्म का एक ही गीत बेहद पसंद किया गया था और वो था तू मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए। हालांकि क्रीम साहब की ये कंपोजिशन पूरी तरह मौलिक नहीं थी औेर उस वक़्त के बेहद लोकप्रिय बैंड एनिग्मा की एक धुन से प्रेरित थी। पर इतना सब होते हुए भी इंदीवर के बोलों को गुनगुनाना लोगों को भला लगा था और आज भी इस गीत को पसंद करने वालों की कमी नहीं है।

कुछ दिन पहले केरल से ताल्लुक रखने वाले गायक अनूप शंकर ने एक समारोह में इस गीत को इतना बेहतरीन गाया कि सुनने वाले वाह वाह कर उठे। मजे की बात ये रही कि स्वयम् नागार्जुन भी अपनी पत्नी अमला के साथ वहाँ मौज़ूद थे। गीत को सुनते वक़्त उनके चेहरे की मुस्कान अनूप की बेहतरीन गायिकी पर मुहर लगा गयी। उस समारोह में अनूप ने कुछ और गीत भी गुनगुनाए थे और इस गीत को उन्होंने तीन मिनट के बाद गाया है। आशा है गीत का ये टुकड़ा आपको भी उतना ही पसंद आएगा जितना मुझे आया है।



42 वर्षीय शंकर संगीत से जुड़े परिवार से आते हैं। फिल्मों के लिए तो वो गाते ही रहे हैं। साथ ही साथ उन्होंने बतौर गीतकार भी काम किया है। इतना ही नहीं दक्षिण भारत में कई टीवी कार्यक्रमों में उन्होंने संचालक की भूमिका बखूबी निभाई है। अनूप की आवाज़ में पूरा गीत ये रहा।

शुक्रवार, फ़रवरी 19, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 पायदान # 5 : मैं तुझ से प्यार नही करती .. Main Tujhse Pyar Nahin Karti...

क्या किसी से प्यार करने के लिए उसे कहा जाना भी जरूरी है? हाँ जरूर कहना चाहिए। पर कभी हम ये खुल कर स्वीकार करने से हिचकते हैं। हर रिश्ते की अपनी जटिलताएँ होती हैं और चाहते हुए भी हम अपने मन की बात होठों पर नहीं ला पाते।अलबत्ता ये भी सही नहीं कि हम 'डिनायल मोड' में ही चले जाएँ यानि जो कहना चाहते हैं उससे ठीक उलट कहें। दिमाग चाहता भी नहीं है कि स्पष्ट रूप से कह दें और दिल है कि अंदर ही अंदर परेशान किए देता है। भावनाओं का ये विरोधाभास अगर सबसे प्यारे तरीके से किसी गीत में उभरा है तो वो था फिल्म घरौंदा के लिए रूना लैला का गाया, नक़्श ल्यालपुरी का लिखा व जयदेव का संगीतबद्ध अमर अजर गीत मुझे प्यार तुमसे नहीं है नहीं है मगर ये राज मैंने अब तक न जाना..। आज भी उस गीत को ना जाने कितनी बार भी सुन लूँ मन नहीं भरता। क्या गीत था वो भी! 

पर साल 2015 की इस संगीतमाला में लगभग चालीस साल पुराने इस गीत को आज मैं क्यूँ याद कर रहा हूँ? दो वज़हें हैं जनाब इसकी। संगीतमाला की पाँचवी पायदान का गीत मन और मस्तिष्क की इसी उधेड़बुन को एक बार फिर सामने ला खड़ा करता है और दूसरी बात ये कि ये गीत एक ऐसी आवाज़ को मेरे सम्मुख ले आया है जिसमें रूना लैला की प्यारी आवाज़ सी एक ख़नक जरूर है और शायद ये आवाज़ ही इस गीत को पाँचवी पायदान तक पहुँचाने में सफल रही है।


ये अनजाना सा गीत है फिल्म बेबी का ! ना तो इसे टीवी पर प्रमोट किया गया ना ही इसे फिल्म में जगह मिली। हाँ इसी मुखड़े के दूसरे वर्जन को जिसे पापोन ने अपनी आवाज़ दी फिल्म में जरूर रखा गया। बेबी के इस गीत के गीतकार हैं मनोज मुन्तशिर जो पिछले साल तेरी गलियाँ ... की सफलता से आम जनता में पहचाने जाने लगे हैं। पर जहाँ तक मेरी इन वार्षिक संगीतमालाओं का सवाल है मनोज ने पहली बार मुझे The Great Indian Butterfly के गीत बड़े नटखट हैं तोरे कँगना....  से प्रभावित किया था। 

इस गीत का संगीत दिया है एम एम करीम यानि एम एम कीरावनी ने। कीरावनी साहब कमाल के संगीतकार हैं। हिंदी फिल्मों में कम ही संगीत देते हैं पर जब देते हैं तो उनके गीत भुलाए नहीं भूलते। दो साल पहले उनका संगीतबद्ध स्पेशल 26 का गीत कौन मेरा मेरा क्या तू लागे..... हम सब की जुबाँ पर था। दिवंगत निदा फाज़ली साहब का लिखा मेरे तेरे नाम नहीं है  और  फिल्म रोग का मैंने दिल से कहा ढूँढ लाना खुशी जैसे गीतों को कौन भूल सकता है? एम एम कीरावनी बधाई के पात्र हैं कि वो हिंदी फिल्मों में युवा प्रतिभावान तेलुगू गायकों को मौका देते रहे हैं। जहाँ स्पेशल 26 में उन्होंने चैत्रा अंगादिपुदी को मौका दिया था वहीं बेबी के इस गीत के लिए उनकी पसंद रहीं राम्या बेहरा ! आख़िर कौन हैं ये राम्या बेहरा?


आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में जन्मी राम्या संगीत के प्रति शुरु से गंभीर नहीं थीं। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि वो पार्श्व गायिका बनेंगी। हाँ इतना जरूर था कि वो बचपन में रेडियो पर आ रहे नग्मों को गुनगुनाया करती थीं। माँ पापा ने उनके हुनर को पहचाना और उन्हें गाने के लिए प्रेरित किया। अपनी माँ के कहने पर सातवीं कक्षा से उन्होंने संगीत विद्यालय में दाखिला लिया। स्थानीय तेलुगू चैनल मा टीवी पर सुपर सिंगर के आख़िरी दौर में प्रवेश कर लेना उनके आत्मविश्वास और अवसरों दोनों को बढ़ा गया।  एम एम कीरावानी ने ही सबसे पहले उन्हें तेलुगू फिल्मों में गाने का मौका दिया। बेबी के इस गीत के बारे में राम्या कहती हैं..

"ये पहले एक डमी गीत था। डमी गीत वो गीत होते हैं जिन्हें किसी से गवाकर उसकी रूपरेखा तैयार कर दी जाती है जिसकी सहायता से कोई नामी गायक उसे अपने स्वर में ढालता है। इसीलिए मैंने जब ये गीत रिकार्ड किया तो ये नहीं सोचा था कि ये फिल्म का हिस्सा बनेगा। मुझे यही लगा था कि इसे किसी बड़े गायक से गवाया जाएगा पर निर्देशक व गीतकार को मेरी आवाज़ जँच गई और इस गीत को रख लिया गया।"

राम्या का ये गीत फिल्म का तो नहीं पर एलबम का जरूर हिस्सा बना। राम्या हिंदी फिल्मों में और गीत गाने की ख़्वाहिश रखती हैं और जितनी प्यारी उनकी आवाज़ है उन्हें और मौके जरूर मिलने चाहिए।

मनोज मुन्तशिर गीत के अंतरे में अपने प्रिय से दूर रहती नारी के मानसिक हालातों को सहजता से उभारते हैं। इस गीत के लिए एम एम कीरवानी ने नाममात्र के संगीत का प्रयोग किया है। गीत के बोलों के पीछे मंद मंद बजता गिटार मन को सुकून देता है। पर दिल के तार जुड़ते हैं राम्या की आवाज़ से जिसे कीरवानी अपनी रागिनियों से प्रगाढ़ करते हैं । नायिका के हृदय की पीड़ा उनकी आवाज़ में यूँ ढल जाती हैं कि आप भी नायिका के दुख में शामिल हो जाते हैं। अगर आपको यकीन नहीं तो ख़ुद ही सुन लीजिए ना इस बेहद संवेदनशील  नग्मे को



मैं तुझ से प्यार नही करती
मैं तुझ से प्यार नही करती
पर कोई ऐसी शाम नहीं
जब मैं अपनी तन्हाई में
तेरा इंतज़ार नहीं करती
मैं तुझसे प्यार नहीं करती

मैं तुझसे प्यार नहीं करती
पर शहर में जिस दिन तू ना हो
ये शहर पराया लगता है
हर फूल लगे बेगाना सा
हर शज़र पराया लगता है
मैं तुझसे प्यार..

वो अलमारी कपड़ो वाली लावारिस हो जाती है
ये पहनूँ या वो पहनूँ
ये उलझन भी खो जाती है
मुझे ये भी याद नही आता
रंग  कौन से मुझको प्यारे हैं
मेरे शौक, पसंद मेरी
बिन तेरे सब बंजारे हैं


तुझसे प्यार नहीं करती
मैं तुझसे प्यार नहीं करती
मैं तुझसे प्यार नहीं करती
मैं तुझसे प्यार नहीं करती
पर ऐसा कोई दिन है क्या?
जब याद तुझे तेरी बातों को
सौ-सौ बार नही करती
सौ-सौ बार नही करती

वार्षिक संगीतमाला 2015

रविवार, मार्च 02, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान # 3 : कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे (Kaun Mera...Chaitra )

वार्षिक संगीतमाला की तीसरी पायदान पर एक ऐसा गीत है जिसके मुखड़े को गुनगुना कर उसमें छुपी मधुरता को आप महसूस कर लेते हैं। पिछले छः महिने से इस गीत की गिरफ्त में हूँ और आज भी इसे सुनते हुए मेरा जी नहीं भरता। ये गीत है फिल्म स्पेशल 26 से और इसके संगीतकार हैं एम एम करीम ( M M Kreem)। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि इस नाम का वो प्रयोग सिर्फ हिंदी फिल्मों के लिए करते हैं। वैसे उनका असली नाम एम एम कीरावानी (M M Keeravani)  है। 


आँध्रप्रदेश से आने वाले करीम ने सभी दक्षिण भारतीय भाषाओं में संगीत दिया है। हिंदी फिल्मों में अपना हुनर दिखाने का पिछले दो दशकों में जब भी उन्हें मौका मिला है, उन्होंने अपने प्रशंसकों को कभी निराश नहीं किया है। याद कीजिए नब्बे के दशक मैं फिल्म क्रिमिनल के गीत तुम मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए ने क्या धमाल मचाया था। फिर फिल्म इस रात की सुबह नहीं का उनका गीत तेरे मेरे नाम नहीं है और चुप तुम रहो बेहद चर्चित हुए थे। इसके बाद जख़्म, सुर, जिस्म और रोग जैसी फिल्मों में उनका संगीत सराहा गया।

फिल्म स्पेशल 26 के लिए करीम ने बतौर गीतकार इरशाद क़ामिल को चुना और देखिए क्या मुखड़ा लिखा उन्होंने..
कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे
क्यों तू बाँधे, मन से मन के धागे
बस चले ना क्यों मेरा तेरे आगे

समझ नहीं आता ना कि जब हम किसी अनजान को पसंद करने लगते हैं तो फिर दिल के तार उसकी हर बात और सोच से जुड़ने से लगते हैं और फिर ये असर इतना गहरा हो जाता है कि अपने आप पर भी वश नहीं रहता।

एम एम करीम ने इस रूमानी गीत को तीन अलग अलग कलाकारों पापोन, सुनिधि चौहान और चैत्रा से गवाया है। पर मुझे इन सबमें चैत्रा अम्बादिपुदी (Chaitra Ambadipudi) का गाया वर्सन पसंद है। करीम गीत की शुरुआत पिआनो और फिर बाँसुरी से करते हैं। इंटरल्यूड्स में वॉयलिन की धुन आपका ध्यान खींचती है पर इन सब के बीच चैत्रा अपनी मीठी पर असरदार आवाज़ से श्रोताओं का मन मोह लेती हैं।

तेलुगु फिल्मों में ज्यादातर गाने वाली बाइस वर्षीय चैत्रा के लिए हिंदी फिल्मों में गाने का ये पहला अवसर था। दिलचस्प बात यह भी है कि चैत्रा एक पार्श्व गायिका के साथ साथ सॉफ्टवेयर इंजीनियर भी हैं और फिलहाल माइक्रोसॉफ्ट में कार्यरत हैं। अपनी गुरु गीता हेगड़े से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा लेने वाली चैत्रा दक्षिण भारतीय फिल्मों में सौ से भी ज़्यादा नग्मों में अपनी आवाज़ दे चुकी हैं। वैसे उन्हें जितना संगीत से लगाव है उतना ही सॉफ्टवेयर से भी है और वे दोनों क्षेत्रों में अपना हुनर दिखाना चाहती हैं। तो आइए पहले सुनें उनकी सुरीली आवाज़ में ये बेहद मधुर नग्मा


कौन मेरा, मेरा क्या तू लागे
क्यों तू बाँधे, मन से मन के धागे
बस चले ना क्यों मेरा तेरे आगे


छोड़ कर ना तू कहीं भी दूर अब जाना
तुझको कसम हैं
साथ रहना जो भी हैं तू
झूठ या सच हैं, या भरम हैं
अपना बनाने का जतन कर ही चुके अब तो
बैयाँ पकड़ कर आज चल मैं दूँ, बता सबको

ढूंढ ही लोगे मुझे तुम हर जगह अब तो
मुझको खबर हैं
हो गया हूँ तेरा जब से मैं हवा में हूँ
तेरा असर है
तेरे पास हूँ, एहसास में, मैं याद में तेरी
तेरा ठिकाना बन गया अब साँस में मेरी


इस गीत का पापोन वाला वर्सन भी श्रवणीय है। उनकी आवाज़ का तो मैं हमेशा से कायल रहा हूँ। एम एम करीम ने बस यहाँ संगीत का कलेवर पश्चिमी रंग में रँगा है।

 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie