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मंगलवार, जनवरी 28, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पायदान संख्या 13 : तेरे मेरे बीच में क्या है .. ( Tere Mere Beech Mein Kya Hai..)

हिंदी फिल्म संगीत में नायक नायिका की आपसी बातचीत को गीतों में ढालने की रिवायत पुरानी रही है। इस कोटि में एक और गीत शामिल हो गया है वार्षिक संगीतमाला की तेरहवीं सीढ़ी पर। इसे लिखा पटकथा लेखक व गीतकार जयदीप साहनी ने, धुन बनाई सचिन ज़िगर ने और अपनी बेहतरीन आवाज़ से इसमें जान फूँकी मोहित चौहान और सुनिधि चौहान ने। झीनी रे झीनी के बारे में बात करते हुए मैंने आपको बताया था कि संगीतकार सचिन ज़िगर के लिए ये साल बेहतरीन रहा है। शुद्ध देशी रोमांस की पटकथा और चरित्र चित्रण भले ही मुझे पसंद ना आया हो पर इस फिल्म का संगीत दिल के करीब रहा।

अब इसी गीत के आरंभिक संगीत पर गौर करें।  रिक्शे के हार्न, नुक्कड़ में खेलते बच्चों की आवाज़ों के साथ गिटार और ट्रामबोन्स का मेल आपको एक बार में ही गीत के मस्ती भरे मूड में ले आता है। नायक और नायिका की नोंक झोंक को जयदीप अपने शब्दों में बड़ें प्यार अंदाज़ में विकसित करते हैं। गीत में इस्तेमाल किए गए उनके कुछ रूपक 'चद्दर खद्दर की,अरमान हैं रेशम के...'  या 'अरमान खुले हैं , जिद्दी बुलबुलें हैं ..' मन को सोहते हैं।

ये नोंक झोंक सजीव लगे इसके लिए जरूरी था कि मोहित और सुनिधि की गायिकी का गठजोड़ शानदार हो और गीत सुनने के बाद आप तुरंत इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि इन दोनों ने इस गीत की अदाएगी में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सचिन जिगर का मिली मिली है ,ज़रा खिली खिली है के बाद एकार्डियन, गिटार और ट्रामबोन्स का सम्मिलित संगीत संयोजन आप को थिरकने पर मजबूर कर देता है।

तो आइए थोड़ा झूमते हैं सचिन जिगर की इस बेहतरीन संगीत रचना के साथ..


ऐ सुन, सुन ले ना सुन मेरा कहना तू
हो गफ़लत में ..गफ़लत में ना रहना तू
हम्म जो दिन तेरे दिल के होंगे, तो होगी मेरी रैना..
तू अभी भी सोच समझ ले , कि फिर ये ना कहना
कि तेरे मेरे बीच में क्या है
ये तेरे मेरे बीच में क्या है
हम्म चद्दर..
हो चद्दर खद्दर की,अरमान हैं रेशम के
हो चद्दर खद्दर की,अरमान हैं रेशम के
मिली मिली है ,ज़रा खिली खिली है
फाइनली चली है मेरी लव लाइफ
मिली मिली है ,ज़रा खिली खिली है
literally silly है मेरी लव लाइफ

हो तेरे तेरे मेरे मेरे
तेरे मेरे तेरे  बीच में
ये तेरे मेरे बीच में
तेरे तेरे ..तेरे मेरे तेरे बीच में
तेरे मेरे बीच में, कभी जो राज़ हो कोई
धूप में छिपी-छिपी, कहीं जो रात हो कोई

हो तेरे मेरे बीच में, कभी जो बात हो कोई
जीत में छिपी-छिपी, कहीं पे मात हो कोई
पूछूँगा हौले से, हौले से ही जानूँगा
जानूँगा मैं हौले से, तेरा हर अरमान
अहां… अरमान खुले हैं , जिद्दी बुलबुलें हैं
अरमान खुले हैं, जिद्दी बुलबुलें हैं
मिली मिली है ,ज़रा खिली खिली है ..लव लाइफ
हे सुन ....

जो नींद तूने छीन ली तो, तो मैं भी लूँगा चैना
तू अभी भी सोच समझ ले , तो फिर ये ना कहना
कि तेरे मेरे बीच में क्या है ...क्या है ?
तुम्हें पता तो है क्या है
कि तेरे मेरे बीच में क्या है
बातें...लम्बी बातें हैं छोटी सी रातें हैं
लम्बी लम्बी बातें हैं, छोटी सी रातें हैं
मिली मिली है ...


वैसे ज़रा बताइए तो आपको आपसी गपशप में बढ़ते ऐसे कौन से गीत सबसे ज्यादा गुदगुदाते हैं?

शनिवार, अक्टूबर 23, 2010

साजिश में शामिल सारा ज़हाँ है, हर ज़र्रे ज़र्रे की ये इल्तिज़ा है,ओ रे पिया...

राहत फतेह अली खाँ मौसीकी की दुनिया में एक ऐसा नाम है जिसे सुनकर ही मन इस सुकून से भर उठता है कि अब जो आवाज़ कानों में छलकेगी वो दिलो दिमाग को यकीनन 'राहत' पहुँचाएगी। हिंदी फिल्म पाप के अपने गाए गीत लगन लागी तुमसे मन की लगन से.. अपना बॉलीवुड़ का सफ़र शुरु करने वाले राहत हर साल कुछ चुनिंदा गाने गाते हैं पर कमाल की बात ये हैं कि उनमें से अधिकांश आम और खास दोनों तरह के संगीतप्रेमियों के दिल में समान असर डालते हैं।
इस साल भी उन्होंने कुछ कमाल के गीत गाए हैं और इस बात का सुबूत आप एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला 2010 में निश्चय ही पाएँगे। पर इस ब्लॉग पर होने वाले सालाना वार्षिक संगीतमाला का जलसे में तो अभी भी करीब ढाई महिने का समय बाकी है।

राहत साहब का नाम अक्सर उनके चाचा नुसरत फतेह अली खाँ के साथ लिया जाता है। कव्वालियों के बेताज बादशाह नुसरत की सांगीतिक विरासत को राहत ने आगे बढ़ाने की कोशिश की है। पर उनके साथ अपनी किसी तरह की तुलना को वो बेमानी बताते हैं। राहत एक ऍसे परिवार में पैदा हुए जहाँ सिर्फ संगीत की तालीम को असली पढ़ाई माना जाता था। सात साल की आयु से ही उन्हें संगीत की शिक्षा दी जाने लगी थी। और तो और क्या आप मानेंगे की नौ साल की छोटी उम्र में ही उन्होंने अपना पहला स्टेज शो दे दिया था।

संगीत के प्रति उनका ये समर्पण उनकी गायिकी में झलकता है। वे कोई गीत तभी गाते हैं जब उसके बोल उन्हें पसंद आते है् अन्यथा वो गीत गाने से ही मना कर देते हैं। किसी गीत के बोल उसकी आत्मा होते हैं। शायद यही वज़ह है कि गाते वक़्त अपने को गीत की भावनाओं से इस क़दर जुड़ा पाते हैं मानो गीतकार की कही हुई बातें उन पर खुद ही बीत रही हैं।

चलिए आज आपको राहत साहब का वो गाना सुनवाते हैं जो उन्होंने वर्ष 2008 में सलीम सुलेमान के संगीतनिर्देशन में फिल्म 'आजा नच ले' के लिए गाया था। इस गीत के बोल लिखे थे जयदीप साहनी ने। जयदीप के इस गीत में अपने पिया के लिए एक विकल पुकार है। पूरे गीत के बोलों में जगह जगह हाए शब्द का प्रयोग हुआ है। राहत जितनी बार 'हाए' कहते हैं हर बार उसका लहज़ा और उस से जुड़ी तड़प रह रह कर उभरती है।




ओ रे पिया हाए..हाए..हाए

उड़ने लगा क्यूँ मन बावला रे
आया कहाँ से ये हौसला रे
ओ रे पिया हाए

वैसे भी जब हवा की छूती सरसराहट, बारिश की मचलती बूँदें सब मिलकर उनकी ही याद दिलाएँ तो फिर मन को मसोस कर कहाँ तक रखा जा सकता है...

तानाबाना तानाबाना बुनती हवा हाए..
बुनती हवा
बूँदें भी तो आए नहीं, बाज यहाँ हाए..
साजिश में शामिल सारा ज़हाँ है
हर ज़र्रे ज़र्रे की ये इल्तिज़ा है
ओ रे पिया, ओ रे पिया हाए
ओ रे पिया

राहत की गायिकी का सबसे सुखद पहलू है, उनका अपनी गायिकी में शास्त्रीय संगीत की सीखी हुई विधा का अद्भुत प्रयोग। उनके लगभग हर गीत में एक सरगम सुनने को आपको मिलेगी जिसका टेम्पो सरगम के साथ बढ़ता चला जाता है। गीत के साथ जब अंतरे के बाद इस सरगम को सुनते हैं तो गीत प्रेम की भावनाओं से भी कहीं आगे आपको एक अलग ही दुनिया में ले जाता है। राहत की गायिकी का ये पहलू उन्हें दूसरे गायकों से अलग कर देता है।

नि रे, रे रे गा
गा गा मा
मा मा पा
पा मा गा रे सा
सा रे रे सा
गा गा रे
मा मा गा
पा पा मा
धा धा पा
नि नि सा सा सा
पा सा मा पा धा नि सा नि
रे नि सा सा सा....

नज़रें बोलें दुनिया बोले
दिल कि ज़बाँ हाए दिल कि ज़बाँ
इश्क़ माँगे इश्क़ चाहे कोई तूफाँ

हाए चलना आहिस्ते इश्क नया है
पहला ये वादा हमने किया है
ओ रे पिया हाए ..

नंगे पैरों पे अंगारो
चलती रही हाए चलती रही
लगता है कि गैरों में
मैं पलती रही हाए
ले चल वहाँ जो
मुल्क तेरा है
ज़ाहिल ज़माना
दुश्मन मेरा है
ओ रे पिया हाए ..

राहत को 'लाइव' इस गीत को गाते देखना चाहेंगे....


एक शाम मेरे नाम पर राहत फतेह अली खाँ

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

वार्षिक संगीतमाला 2009 :पॉयदान संख्या 15 - धूप खिली जिस्म गरम सा है, सूरज यहीं ये भरम सा है..

फिल्म जगत में बहुत से तो नहीं, पर कुछ पटकथा लेखक जरूर हुए हैं जिन्होंने बतौर गीतकार भी नाम कमाया है। गुलज़ार से तो हम सब वाकिफ़ हैं ही। जावेद साहब ने भी सलीम के साथ कई यादगार पटकथाएँ लिखी पर अपने गीतकार वाले रोल में तभी आए जब पटकथा लेखन का काम उन्होंने छोड़ दिया।

आज के संगीत परिदृश्य में एक ऐसा ही एक युवा गीतकार है जिसने बतौर पटकथा लेखक भी उतना ही नाम कमाया है। चक दे इंडिया जैसी पटकथा से चर्चित हुए जयदीप साहनी ने तुझमें रब दिखता है... जैसे गीत की रचना भी की है। आज इस साल वार्षिक संगीतमाला की १५ वीं पॉयदान पर पहली बार पदार्पित हुए हैं वो संगीतकार सलीम सुलेमान की जोड़ी के साथ।


जयदीप द्वारा लिखे इस गीत के बोलों में एक दार्शनिकता है जो सलीम सुलेमान के शांत बहते संगीत में उभर कर सामने आती है।

पंखों को हवा ज़रा सी लगने दो
दिल बोले सोया था अब जगने दो
दिल दिल में है दिल की तमन्ना सो
..चलो जरा सी तपने दो
उड़ने दो ...उड़ने दो ...
हवा ज़रा सी लगने दो.... दो
सोया था अब जगने दो
पंखों को हवा ज़रा सी लगने दो


वैसे भी हम सभी उड़ना ही तो चाहते हैं या उड़ नहीं भी पाते तो उसका स्वप्न जरूर देखते हैं। चाहे वो कामयाबी की उड़ान हो या सुखों के लोक में हमेशा विचरने की चाह। पर जयदीप लक्ष्य की सोच कर उड़ान भरने का संदेश इस गीत से नहीं देते। वो रुक कर, सँभल कर उड़ान भरने को तो कहते हैं पर साथ ही ये कहना भी नहीं भूलते कि एक बार सही उड़ान भर कर भटकना भी जरूरी है। सुलझाव भरी जिंदगी की उम्मीद करने के पहले बिखराव का सामना करने की क्षमता लाना जरूरी है।

धूप खिली जिस्म गरम सा है
सूरज यहीं ये भरम सा है
बिखरी हुई राहें हजारों सुनो
थामो कोई फिर भटकने दो
उड़ने दो ...उड़ने दो ...
हवा ज़रा सी लगने दो.... दो
सोया था अब जगने दो
पंखों को हवा ज़रा सी लगने दो



दिल की पतंग चलो दिखाती है
ढील तो दो देखो कहाँ पे जाती है
उलझे नहीं तो कैसे सुलझोगे
बिखरे नहीं तो कैसे निखरोगे

उड़ने दो ....उड़ने दो
हवा ज़रा सी लगने दो.... दो
सोया था अब जगने दो
पंखों को हवा ज़रा सी लगने दो

सलीम सुलेमान ने गिटार की मधुर धुन के साथ गीत का आगाज़ किया है। सलीम मर्चेंट अपनी गायिकी से चक दे इंडिया ,फैशन, कुर्बान आदि फिल्मों में पहले ही प्रभावित कर चुके हैं। उनके स्वर की मुलायमियत गीत के मूड के साथ खूब फबती है।

तो आइए सुनें सलीम का गाया फिल्म रॉकेट सिंह का ये गीत



मंगलवार, फ़रवरी 17, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 8 :रूप कुमार राठौड़ की मखमली आवाज़ जो दिखाती है रब का रास्ता...

वार्षिक संगीतमाला २००८ में डेढ़ महिने का सफ़र पूरा कर हम सब आ चुके हैं आठवीं पॉयदान पर। और इस पॉयदान पर गीत उस फिल्म का जिसे लोकप्रियता में एक शाम मेरे नाम के हिंदी और रोमन संस्करणों के पाठकों ने कुल मिलाकर अबतक सबसे ज्यादा वोट दिए हैं। जी हाँ इस संगीतमाला की आठवीं पॉयदान पर फिल्म रब ने बना दी जोड़ी का वो गीत जिसे लिखा जयदीप साहनी ने, धुन बनाई सलीम सुलेमान ने और अपनी मखमली आवाज़ से निखारा रूप कुमार राठौड़ ने..


रूप कुमार राठौड़ एक ऍसे गायक हैं जिन्हें बतौर पार्श्व गायक , चुनिंदा गीत ही मिलते हैं पर उसमें वे वो प्रभाव पैदा करते हैं जो सालों साल मन से नहीं निकल पाता। अब वो चाहे बार्डर का गीत संदेशे आते हों हो या अनवर का मौला मेरे मौला। और पिछले साल मनोरमा फिल्म का गीत तेरे सवालों के वो जवाब जो मैं दे ना, दे ना सकूँ में उनके लगाए बेहतरीन ऊँचे सुर, उस गीत को मेरी संगीतमाला की छठी पॉयदान तक ले गए थे।

क्या आप जानते हैं कि इतनी सधी आवाज़ के मालिक रूप कुमार राठौड़ ने संगीत का ये सफ़र एक गायक के तौर पर नहीं बल्कि तबला वादक की हैसियत से शुरु किया था? अस्सी के दशक की शुरुआत में जब ग़जलों का स्वर्णिम काल चल रहा था तब रूप कुमार राठौड़ सारे मशहूर गज़ल गायकों के चहेते तबला वादक थे। बाद में जब पत्नी सोनाली राठौड़ ने उनसे गाने के लिए प्रेरित किया तो वो गायिकी के क्षेत्र में आ गए।

रूप कुमार राठौड़ का परिवार संगीतिक विभूतियों से भरा पड़ा है। पिता पंडित चतुर्भुज राठौड़ खुद एक शास्त्रीय गायक थे। बड़े भाई श्रवण एक मशहूर संगीतकार रहे जिन्होंने नदीम के साथ मिलकर नब्बे के दशक में कई हिट फिल्में दीं और छोटे भाई विनोद भी पार्श्व गायक हैं।

अगर इस गीत को रूप साहब की आवाज़ में सुनकर आप गीत की भावपूर्ण मेलोडी से अभिभूत हो जाते हैं तो उसका श्रेय गीतकार और संगीतकार की जोड़ी को भी जाता है। जयदीप साहनी के लिए इस तरह के गीत को रचना एक अलग अनुभव था। अपने प्यार को अपना अराध्य मानने का ख्याल भारतीय संस्कृति में कोई नया नहीं है पर आजकल इस परिकल्पना को लेकर बनाए गए गीतों की तादाद बेहद कम रह गई है। जयदीप के लिए मुश्किल ये थी कि वो खुद भी इस तरह की सोच से मुतास्सिर नहीं थे फिर भी उन्होंने कहानी की माँग के हिसाब से इस विचार को अपने बोलों में ढाला और जो परिणाम निकला वो तो आप देख ही रहे हैं। जयदीप खुद अपने प्रयास से बेहद संतुष्ट हैं और कहते हैं कि
"अपनी सोच की चारदीवारी में जो गीतकार बँध के रह गया वो अलग अलग पटकथाओं के अनुरूप गीतों की रचना कैसे कर पाएगा?"

चलिए बातें तो आज बहुत हो गईं अब सुनते हैं ये बेहद प्यारा सा नग्मा


तू ही तो जन्नत मेरी, तू ही मेरा जूनून
तू ही तो मन्नत मेरी, तू ही रूह का सुकून
तू ही अँखियों की ठंडक, तू ही दिल की है दस्तक
और कुछ ना जानूँ, मैं बस इतना ही जानूँ
तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूँ
सज़दे सर झुकता है, यारा मैं क्या करुँ

कैसी है ये दूरी, कैसी मजबूरी
मैंने नज़रों से तुझे छू लिया
कभी तेरी खुशबू, कभी तेरी बातें
बिन माँगे ये जहां पा लिया
तू ही दिल की है रौनक, तू ही जन्मों की दौलत
और कुछ ना जानूँ, बस इतना ही जानूँ
तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूँ...

छम छम आए, मुझे तरसाए
तेरा साया छेड़ के चूमता..
तू जो मुस्काए, तू जो शरमाये
जैसे मेरा है ख़ुदा झूमता..
तू मेरी है बरक़त, तू ही मेरी इबादत
और कुछ ना जानूँ, बस इतना ही जानूँ
तुझमें रब दिखता है, यारा मैं क्या करूँ ...

और पर्दे पर शाहरुख अनुष्का की जोड़ी पर फिल्माए इस मधुर गीत की झलक आप यहाँ देख सकते हैं

शनिवार, जनवरी 31, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 13 : जानिए हौले हौले हवा चलती है के रचित होने के पीछे की सोच

तो आ गई है वार्षिक संगीतमाला के बीचों बीच की 13 वीं पायदान और यहाँ गीत वो जो पूरे देश को अपने लफ़्जों के बल पर हौले हौले झुमा रहा है। तो किसने लिखा ये गीत? एक समय तो मीडिया में ये खबरें भी आ गईं कि इसे लिखने वाले कोई और हैं और उन सज्जन ने टीवी पर इस गीत से सुसज्जित इक किताब भी दिखा डाली जो उनके हिसाब से कई साल पहले ही छप गई थी। खैर मीडिया की कई कहानियों की तरह वो स्टोरी भी आई गई हो गई। खैर, मैं तो यही मान कर चलूँगा कि ये गीत जयदीप साहनी का ही लिखा है जो इससे पहले चक दे इंडिया के गीतों को लिख कर चर्चा में आ चुके हैं।

वेसे क्या आप बता सकते हैं कि जयदीप और जावेद अख्तर में क्या समानता है? भई इन दोनों ने फिल्म जगत मं अपने कैरियर की शुरुआत बतौर पटकथा लेखक से की। ये अलग बात है कि जावेद साहब अब गीतों की रचना में ही वक़्त लगाते हैं जबकि जयदीप अभी भी पटकथा लेखक के तौर पर ज्यादा जाने जाते हैं।

जयदीप के बारे में आपको कुछ और बताएँगे आगे की पायदानों में पर अभी तो ये जानिए कि क्या कहना है गीतकार जयदीप साहनी का इस गीत के बारे में..
संध्या अय्यर को हाल ही में दिए गए एक साक्षात्कार में जयदीप ने बताया कि "...ये गीत फिल्म के मुख्य पात्र सूरी की मनोदशा कहने का प्रयास करता है कि दिल से जुड़े मसलों के बारे में वो कैसे सोचता है। मेरा ये गीत एक ऐसे चरित्र की बात करता है जो खुद को विश्वास दिलाना चाहता है कि सब्र करने से काम अंत में जाकर बनता है। पर ये काम सूरी के लिए आसान नहीं क्योंकि उसी के दिल के दूसरे हिस्से की सोच बिल्कुल अलग है। यानि एक ओर सब्र तो दूसरी ओर लक्ष्य पाने की जल्दी। अब ना तो सूरी स्टाइलिश है, ना कोई प्रखर वक्ता और ना ही चुम्बकीय व्यक्तित्व का स्वामी। वो तो एक आम आदमी है, विद्युत विभाग का अदना सा कर्मचारी, जो वो जुमले बोल भी नहीं सकता जो भारतीय फिल्मों के नायक अक्सर प्रेम में पड़ने के बाद बोलते हैं। पर सूरी के पास एक खूबी तो है ही और वो है उसकी लगन और सच्चाई और वो अपनी इसी ताकत को खुद को बता रहा है। और इसी सोच पर मैंने इस गीत को रचा है।...."

शायद गीत की यही सच्चाई है जिसने इसे आम जन और समीक्षकों दोनों में इसे लोकप्रिय बनाया है। जयदीप साहनी के बोलों के साथ सलीम सुलेमान का संगीत पूरी तरह न्याय करता है। सुखविंदर सिंह ने हौले हौले चलने वाले नग्मे की खूबसूरत अदाएगी कर ये जतला दिया है कि उनका हुनर सिर्फ ऊँचे सुरों वाले डॉन्स नंबर तक ही सीमित नहीं।
तो आइए पहले चलें रब ने बना दी जोड़ी के इस गीत की शब्द यात्रा पर


हौले-हौले से हवा लगती है,
हौले-हौले से दवा लगती है,
हौले-हौले से दुआ लगती है, हाँ......

हाए ! हौले-हौले चंदा बढ़ता है,
हौले-हौले घूँघट उठता है,
हौले-हौले से नशा चढ़ता है... हाँ.......

तू सब्र तो कर मेरे यार
ज़रा साँस तो ले दिलदार
चल फिक्र नूँ गोली मार
यार है दिन जिंदड़ी दे चार
हौले हौले हो जाएगा प्यार, चलया
हौले हौले हो जाएगा प्यार, चलया

इश्क ए दी गलियाँ तंग हैं
शरमो शर्मीले बंद हैं
खुद से खुद की कैसी ये जंग है
पल पल ये दिल घबराए
पक पल ये दिल शरमाए
कुछ कहता है और कुछ कर जाए
कैसी ये पहेली मुआ.दिल मर जाना
इश्क़ में जल्दी बड़ा जुर्माना
तू सब्र........हौले.....प्यार

रब दा ही तब कोई होणा, करें कोई यूँ जादू टोणा
मन जाए मन जाए हाए मेरा सोणा
रब दे सहारे चल दे, ना है किनारे चल दे
कोई है ना कहारे चल दे
क्या कह के गया था शायर वो सयाना
आग का दरिया डूब के जाना
तू सब्र........हौले.....प्यार


गीत तो आप ने सुन लिया अब आइए जानते हैंइस रोचक वीडिओ में सलीम सुलेमान, जयदीप, शाहरुख, वैभवी आदि से कि कैसे बना ये गीत! (वैभवी मर्चेंट इस गीत की कोरियोग्राफर हैं।)

सोमवार, जनवरी 26, 2009

वार्षिक संगीतमाला 2008 - पायदान संख्या 16 : मर जावाँ... भीगे भीगे सपनों का जैसे खत है

आज बारी है इस संगीतमाला के गीत नम्बर सोलह की और इस पायदान पर गीत वो जिसकी, गायिका, संगीतकार और यहाँ तक की गीतकार भी इस साल पहली बार अपनी जगह बना रहे हैं। ये गीत मैंने तब सुना जब मैं इस संगीतमाला की सारी २५ पायदानें की सूची तैयार कर चुका था। पर इस साल की सा रे गा मा पा की विजेता वैशाली म्हाणे को जब मैंने ये गीत गाते सुना तो मुझे लगा कि इस गीत के लिए तो जगह बनानी पड़ेगी। पहली बार इस गीत को सुनते ही गायिका श्रुति पाठक की पीठ थपथपाने की इच्छा होती है। इस गीत में नीचे के सुरों को जिस तरह उन्होंने निभाया है वो निसंदेह तारीफ के काबिल है।

पर इस प्रशंसा की हक़दार सिर्फ श्रुति नहीं हैं। अगर श्रुति की गहरी आवाज़ का जादू आप पर होता है तो वो इरफ़ान सिद्दकी के बोलों की वज़ह से। प्रेम में डूबी एक लड़की की भावनाओं को जब वो इरफ़ान के इन शब्दों में हम तक पहुँचाती हैं तो मन बस गुलजारिश हो जाता है।

सोचे दिल कि ऍसा काश हो
तुझको इक नज़र मेरी तालाश हो
जैसे ख्वाब है आँखों में बसे मेरी
वैसे नीदों पे सिलवटें पड़े तेरी
भीगे भीगे अरमानों की राहत है
हाए गीली गीली ख्वाहिश भी तो बेहद है
मर जावाँ मर जावाँ तेरे इश्क़ पे मर जावाँ......
इरफान सिद्दकी एक युवा गीतकार हैं और गुलज़ार से खासे प्रभावित भी। वे कहते हैं कि गुलज़ार हल्के फुल्के शब्दो के साथ गहरे शब्दों के मिश्रण की कला जानते हैं। इरफ़ान वैसे तो गीत के बोल सहज रखने पर विश्वास रखते हैं पर वो ये भी महसूस करते हैं कि उर्दू शब्दों का प्रयोग करने से गीत का असर और बढ़ जाता है। जैसे इसी गीत की चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि उन्होंने नीचे की पंक्तियों में 'खत' और 'लत' का इस्तेमाल इसी लिहाज़ से किया
भीगे भीगे सपनों का जैसे ख़त है
हाए! गीली गीली चाहत की जैसे लत है
इसी गीत के साथ पहली बार बतौर संगीतकार सलीम सुलेमान ने इस साल की संगीतमाला में प्रवेश कर लिया है। सलीम सुलेमान इससे पहले पिछले साल डोर और चक दे इंडिया के गीतों के साथ वार्षिक संगीतमालाओं का हिस्सा बन चुके हैं। इस गीत में सलीम मर्चेंट ने अंतरे के बीच अरबी बोलों का समावेश किया है जो कुछ सुनने में इस तरह लगते हैं

रादी क्राह दी क्रावा, वल हवा वसाबाह
वादी क्राह हितावह्त, अल्लाह दुखा वसाबाह
लातेह्वाल फलाहवह्त, अल्लाह दुखा वसाबाह
वादी क्राह हितावह्त, अल्लाह दुखा वसाबाह

अब इस की लिखनें में भूलें तो अवश्य हुई होंगी पर चूंकि अरबी का जानकार नहीं हूँ इसलिए इसे नज़रअंदाज कर दीजिएगा। अंतरजाल पर इसके अनुवाद से इन लफ्ज़ों के भावों का अंदाज़ लगता है जो कुछ इस तरह से है...."भगवान साक्षी है कि तेरी याद में तरसने और अपना गुनाह कुबूल करने के बावजूद तुमने अपना वादा नहीं निभाया"

खैर सलीम का ये तरीका गाने में एक नयापन लाता है पर मुझे लगता है कि अरबी बोलों के बिना भी और हल्के संगीत संयोजन से भी गीत की प्रभाविकता बनी रहती। तो आइए सुने और देखें फैशन फिल्म का ये गीत

मर जावाँ मर जावाँ
तेरे इश्क़ पे मर जावाँ
भीगे भीगे सपनों का जैसे खत है
हाए गीली गीली चाहत की जैसे लत है
मर जावाँ मर जावाँ तेरे इश्क़ पे मर जावाँ......

सोचे दिल कि ऍसा काश हो
तुझको इक नज़र मेरी तालाश हो
जैसे ख्वाब है आँखों में बसे मेरी
वैसे नीदों पे सिलवटें पड़े तेरी
भीगे भीगे अरमानों की राहत है
हाए गीली गीली ख्वाहिश भी तो बेहद है
मर जावाँ मर जावाँ तेरे इश्क़ पे मर जावाँ......


मंगलवार, अप्रैल 15, 2008

मौला मेरे ले ले मेरी जान...सुनिए सलीम मर्चेंट का गाया ये संवेदनशील नग्मा..

आज एक गीत कुछ सूफियाना अंदाज का जिसे मैंने पिछले RMIM पुरस्कारों के दौरान नामित गीतों में होने की वज़ह से सुना था और एक बार सुनकर ही लगा था कि इसमें कुछ अलग बात है। इस गीत को फिल्म के कहानी के परिदृश्य में देखा जाए तो गीत की भावनाओं को समझने में आसानी होती है। गीत के पीछे का प्रसंग कुछ इस तरह से है ...

अपने देश के प्रति सब कुछ उत्सर्ग के के भी जब पूरी टीम की गलती का ठीकरा एक गोलकीपर पर फूटता है और अलग मज़हब होने की वजह से उसे जगह जगह गद्दार की उपाधि से विभूषित किया जाता है तो वो सोचने पर मजबूर हो जाता है। उसे लगता है कि भाई शुरु से तो मैं इसी मिट्टी का रहा, यहीं खेला, पला बढ़ा, । खुशियों के पल साथ साथ बाँटे। इसकी आन को अपना माना तो फिर आज ये सब क्यूँ सुनना पड़ा मुझे? क्या गलती हुई मुझसे। इस जलालत से तो मौत ही बेहतर थी...

इस गीत को गाया सलीम मर्चेंट के साथ कृष्णा ने । सलीम और उनके भाई सुलेमान चक दे इंडिया फिल्म से लिए गए गीत के संगीतकार हैं। सलीम सुलेमान नए संगीतकारों की जमात में एक उभरता नाम हैं। पिछले साल फिल्म डोर के लिए इनका लिखा नग्मा ये हौसला कैसे झुके काफी सराहा गया था।

इस गीत को लिखा है, जयदीप साहनी ने जो गीतकार से ज्यादा एक पटकथा लेखक की हैसियत से ज्यादा जाने जाते हैं। 'खोसला का घोसला' से लेकर 'चक दे इंडिया' में अपने पटकथा लेखन से इस कम्प्यूटर इंजीनियर ने बहुत वाहावाही लूटी है। पर इस दिल को छूने वाले गीत में उन्होंने दिखा दिया की उनकी प्रतिभा बहुआयामी है.

तो आईए सुनें ये मर्मस्पर्शी गीत...

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तीजा तेरा रंग था मैं तो
जीया तेरे ढंग से मैं तो
तू ही था मौला तू ही आन
मौला मेरे ले ले मेरी जान

तेरे संग खेली होली
तेरे संग की दीवाली
तेरे आँगनों की छाया
तेरे संग सावन आया
फेर ले तू चाहें नज़रें, चाहे चुरा ले
अब के तू आएगा रे शर्त लगा ले
तीजा तेरा रंग था मैं तो
जीया तेरे ढंग से मैं तो
तू ही था मौला तू ही आन
मौला मेरे ले ले मेरी जान

मिट्टी मेरी भी तू ही
वही मेरे घी और चूरी
वही रांझे मेरे वही हीर
वही सेवईयाँ वही खीर
तुझसे ही रूठना रे मुझे ही मनाना
तेरा मेरा नाता कोई दूजा ना जाना

तीजा तेरा रंग था मैं तो
जीया तेरे ढंग से मैं तो
तू ही था मौला तू ही आन
मौला मेरे ले ले मेरी जान
 

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