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बुधवार, अप्रैल 17, 2019

क्या कमाल थी ताजमहल में रोशन और साहिर की जुगलबंदी ! : जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं ...

संगीतकार रोशन और गीतकार साहिर लुधयानवी ने यूँ तो कई फिल्मों में साथ साथ काम किया पर 1963 में प्रदर्शित ताजमहल उनके साझा सांगीतिक सफ़र का अनमोल सितारा थी। दोनों को उस साल ताजमहल के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। रोशन को सबसे अच्छे फिल्म संगीत के लिए और साहिर को जो वादा किया है निभाना पड़ेगा गीत लिखने के लिए। बतौर संगीतकार यूँ तो रोशन की गीत, ग़ज़ल और कव्वाली रचने में माहिरी थी पर उनमें आत्मविश्वास की बेहद कमी थी इसलिए अपने गीतों की असफलता का डर उन्हें हमेशा सताता था। वो अक्सर अपने संगीतोबद्ध गीतों पर दूसरों की राय से बहुत प्रभावित हो जाया करते थे। ऐसी मनोस्थिति में फिल्मफेयर का ये पहला पुरस्कार उनके लिए कितना मायने रखता होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।



ताजमहल में जो गीत सबसे मकबूल हुआ वो था जो वादा किया है निभाना पड़ेगा। मेरी नज़र में गीत के बोलों के ख्याल से साहिर का सबसे अच्छा काम जो बात तुझमें है तेरी तस्वीर में नहीं में था पर फिल्मफेयर हमेशा से गुणवत्ता से ज्यादा लोकप्रियता पर विश्वास करता आया है इसलिए इस गीत को कोई पुरस्कार तब नहीं मिला। अपनी प्रेयसी के किन खूबसूरत पहलुओं को उसकी तस्वीर उभार नहीं पाती इसे साहिर ने कितने प्यार से गूँथा था गीत के इन अंतरों में।  

रंगों में तेरा अक्स ढाला, तू ना ढल सकी
साँसों की आँच, जिस्म की खुशबू ना ढल सकी
तुझ में जो लोच है, मेरी तहरीर में नहीं


बेजान हुस्न में कहाँ, रफ़्तार की अदा
इन्कार की अदा है ना इकरार की अदा
कोई लचक भी जुल्फ-ए-गिरहगीर में नहीं

जो बात तुझमें है, तेरी तस्वीर में नहीं


गीतों में ऐसी कविता आजकल भूले भटके ही मिलती है। ऐसी पंक्तियाँ कोई साहिर जैसा शायर ही लिख सकता था जिसने प्रेम को बेहद करीब से महसूस किया हो। रफ़ी साहब ने इसे गाया भी बड़ी मुलायमियत से था।


रोशन ने मैहर के अताउल्लाह खान से जो सारंगी सीखी थी उसका अपने गीतों में उन्होंने बारहा प्रयोग किया। इस गीत में भी तबले के साथ सारंगी की मोहक  तान को आप जगह जगह सुन सकते हैं।

इसी फिल्म का  सवाल जवाब वाले अंदाज़ में रचा एक युगल गीत भी तब काफी लोकप्रिय हुआ था। साहिर की कलम यहाँ भी क्या खूब चली थी..  दो मचलते प्रेमियों की मीठी तकरार कितनी सहजता से उभरी थी उनकी लेखनी  में ..

पाँव छू लेने दो फूलों को इनायत होगी 
दिल की बेचैन उमंगों पे करम फ़रमाओ 
इतना रुक रुक के चलोगी तो क़यामत होगी 

शर्म रोके है इधरशौक़ उधर खींचे है 
क्या खबर थी कभी इस दिल की ये हालत होगी



वैसे तो हिंदी फिल्म संगीतकारों में मदनमोहन को फिल्मी ग़ज़लों का बेताज बादशाह माना गया है पर अगर संगीतकार रोशन द्वारा संगीतबद्ध ग़ज़लों को आँका जाए तो लगेगा कि उनकी ग़ज़लों और नज़्मों को वो सम्मान नहीं मिला जिनकी वे हक़दार थीं। लता मंगेशकर मदनमोहन की तरह रोशन की भी प्रिय गायिका थीं। रोशन ने उनकी आवाज़ में दुनिया करे सवाल तो, दिल जो ना कह सका, रहते थे कभी जिनके दिल में जैसी प्यारी ग़ज़लें रचीं। सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में उनके द्वारा संगीतबद्ध नज़्म शराबी शराबी ये सावन का मौसम भी मुझे बेहद प्रिय है।


ताजमहल के लिए भी उन्होंने साहिर से एक ग़ज़ल लिखवाई जुर्म ए उल्फत पे हमें लोग सज़ा देते हैं। बिल्कुल नाममात्र के संगीत पर भी इस ग़ज़ल की धुन का कमाल ऐसा है कि दशकों बाद भी इसका मुखड़ा हमेशा होठों पर आ जाया करता है। साहिर की शायरी का तिलिस्म लता की आवाज़ में क्या खूब निखरा है। राग अल्हैया बिलावल पर आधारित इस धुन में मुझे बस एक कमी यही लगती है कि अशआरों के बीच संगीत के माध्यम से कोई अंतराल नहीं रखा गया।


जुर्म--उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं 
कैसे नादान हैंशोलों को हवा देते हैं 

हम से दीवाने कहीं तर्क-ए-वफ़ा करते हैं 
जान जाये कि  रहे, बात निभा देते हैं 

आप दौलत के तराज़ू में दिलों को तौलें 
हम मोहब्बत से मोहब्बत का सिला देते हैं 


तख़्त क्या चीज़ है और लाल--जवाहर क्या है 
इश्क़ वाले तो खुदाई भी लुटा देते हैं 

हमने दिल दे भी दिया अहद---वफ़ा ले भी लिया 
आप अब शौक़ से  दे दें, जो सज़ा देते हैं 


(उल्फ़त : प्रेम ,  तर्क-ए-वफ़ा : बेवफ़ाई,  सिला :प्रतिकार,  लाल--जवाहर : माणिक, अहद---वफ़ा :वफ़ा का वादा )


ग़ज़ल लता के मधुर से आलाप से शुरु होती है। आलाप खत्म होते ही आती है सारंगी की आहट। फिर तो साहिर के शब्द और लता की मधुर आवाज़ के साथ इश्क का जुनूनी रूप बड़े रूमानी अंदाज़ में ग़ज़ल का हर शेर उभारता चला जाता है। रोशन की धुन में उदासी है जिसे आप इस गीत को गुनगुनाते हुए महसूस कर सकते हैं। तो आइए सुनते हैं लता की आवाज़ में ये ग़ज़ल

गुरुवार, दिसंबर 14, 2017

किसे पेश करूँ : जब साहिर ने मदन मोहन के लिए लिखे एक ही रदीफ़ पर तीन नग्मे Kise Pesh Karoon ?

ग़ज़लों को संगीतबद्ध करने में अगर किसी संगीतकार को सबसे ज्यादा महारत हासिल थी तो वो थे मदन मोहन। ग़ज़लों के सानिध्य में वो कैसे आए इसके लिए आपको उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में एक बार झाँकना होगा। मदन मोहन के पिता इराक के पुलिस विभाग में मुनीम थे। बगदाद में ही मदन मोहन का जन्म हुआ। पर जब इराक अंग्रेजों के चंगुल से निकल आजाद हुआ, मदनमोहन का परिवार बगदाद से पहले लाहौर और फिर मुंबई आ कर बस गया। 

मदन मोहन के पिता तो उस वक्त बाम्बे टॉकीज़ में नौकरी करने लगे वहीं मदन मोहन ने पढ़ाई के बाद फौज में जाना मुनासिब समझा। पर संगीत के प्रति बचपन से रुझान रखने वाले मदन मोहन को लगा कि उन्होंने अपने व्यवसाय का गलत चुनाव कर लिया है। लिहाजा फौज की नौकरी से इस्तीफा दे कर उन्होंने संगीत से जुड़कर काम करने के लिए लखनऊ की राह पकड़ी। वो वहाँ आल इंडिया रेडियो  में सहायक संगीत संयोजक का काम करने लगे। यहीं उनकी मुलाकात ग़ज़ल गायिका बेगम अख्तर और उभरते हुए गायक तलत महमूद से हुई। यही वो समय था जब ग़ज़लों को करीब से सुनने व परखने का मौका मदन मोहन को नजदीक से मिला।


यूँ तो एक शाम मेरे नाम पर मदन मोहन की संगीतबद्ध कई ग़ज़लों का जिक्र हो चुका है पर आज आपसे मैं बात करना चाहूँगा 1964 में प्रदर्शित हुई एक ऐसी फिल्म की जिसका नाम ही "ग़ज़ल" था। आगरे की सरज़मी पर रची इस कहानी में गीतों को लिखने का जिम्मा मिला था साहिर लुधियानवी को। मिलता भी ना कैसे? कहानी का नायक ही शायर जो  था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक जैसी बहर, रदीफ़ और काफिये के साथ साहिर ने इस फिल्म में दो ग़ज़लें और एक गीत लिखा। साहिर ने इन तीनों में रदीफ़ के तौर पर "किसे पेश करूँ" का इस्तेमाल किया। पर ये मदन मोहन साहब की कारीगिरी थी कि इन मिलते जुलते गीतों के लिए उन्होंने ऐसी धुन तैयार की वो सुनने में बिल्कुल अलग अलग लगते हैं।

सुनील दत्त और मीना कुमारी द्वारा अभिनीत इस प्रेम कहानी का खाका ये तीनों नग्मे खींचते से चलते हैं। जहाँ नायिका पहली ग़ज़ल में  हमदम की तलाश में अपनी भावनाएँ व्यक्त कर रही हैं तो दूसरी ग़ज़ल में उनकी गायिकी से प्रभावित होकर शायर महोदय अपने दिल में पैदा हुई हलचल की कहानी पेश कर रहे हैं। वहीं अपनी प्रेमिका से ना मिल पाने की तड़प इसी फिल्म के अन्य गीत रंग और नूर की बारात किसे पैश करूँ..  में नज़र आती है। रंग और नूर की बारात .. तो इस फिल्म का सबसे लोकप्रिय नग्मा रहा पर उसी मीटर में साहिर ने जो दो ग़ज़लें लिखी वो कम खूबसूरत नहीं थीं। तो आइए सुनें इन दोनों ग़ज़लों को लता और रफ़ी की आवाज़ में

नग़्मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूँ
ये छलकते हुए जज़्बात किसे पेश करूँ

शोख़ आँखों के उजालों को लुटाऊँ किस पर
मस्त ज़ुल्फ़ों की स्याह रात किसे पेश करूँ

गर्म सांसों में छुपे राज़ बताऊँ किसको
नर्म होठों में दबी बात किसे पेश करूँ

कोइ हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ




साहिर के खूबसूरत बोलों से मुझे सबसे ज्यादा न्याय लता की आवाज़ करती है। वैसे भी लता दी ने मदन मोहन के लिए जो गीत गाए उनकी अदाएगी बेमिसाल रही।

 

इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ
ये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ

हुस्न और हुस्न का हर नाज़ है पर्दे में अभी
अपनी नज़रों की शिकायात किसे पेश करूँ

तेरी आवाज़ के जादू ने जगाया है जिन्हें
वो तस्सव्वुर, वो ख़यालात किसे पेश करूँ

ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल, ऐ मेरी ईमान-ए-ग़ज़ल
अब सिवा तेरे ये नग़मात किसे पेश करूँ

कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ

जहाँ तक रंग और नूर की बारात किसे पैश करूँ. का ताल्लुक है तो उस गीत का दर्द रफ़ी की आवाज़ में पूरी ईमानदारी से झलका था।  वैसे इन तीनों में आपको कौन सी ग़ज़ल/ गीत प्यारा लगता है?

शुक्रवार, जुलाई 08, 2011

रात भी है कुछ भीगी-भीगी, चाँद भी है कुछ मद्धम-मद्धम...

बारिश के मौसम को ध्यान में रखते हुए कुछ दिनों पहले मैंने लता जी का गाया फिल्म 'परख' का गीत सुनवाया था। बारिश का मौसम अभी थमा नहीं है। अब आज मेरे शहर का मौसम देखिए ना। बाहर ठंडी बयारें तो है ही और उनकी संगत में बारिश की रेशमी फुहार भी है। तो इस भीगी रात में भींगा भींगा सा रूमानियत से भरा इक नग्मा हो जाए।


आज का ये नग्मा मैंने चुना है फिल्म 'मुझे जीने दो' से जो सन 1963 में प्रदर्शित हुई थी। इसके संगीतकार थे जयदेव साहब। वैसे क्या आपको पता है कि जयदेव पहली बार पन्द्रह साल की उम्र में घर से भागकर मुंबई आए थे तो उनका सपना एक फिल्म अभिनेता बनने का था। यहाँ तक कि बतौर बाल कलाकार उन्होंने सात आठ फिल्में की भी। पर पिता के अचानक निधन ने उनके कैरियर की दिशा ही बदल दी। घर की जिम्मेवारियाँ सँभालने के लिए जयदेव लुधियाना आ गए। बहन की शादी करा लेने के बाद जयदेव ने चालिस के दशक में लखनऊ के उस्ताद अकबर अली से संगीत की शिक्षा ली। जयदेव ने पहले उनके लिए और बाद में एस डी बर्मन जैसे संगीतकार के सहायक का काम किया। जयदेव का दुर्भाग्य रहा कि उनके अनूठे संगीत निर्देशन के बावजूद उनकी बहुत सारी फिल्में जैसे रेशमा व शेरा, आलाप,गमन व अनकही नहीं चलीं। पर 'मुझे जीने दो' और 'हम दोनों' ने उन्हें व्यवसायिक सफलता का मुँह दिखलाया।

जयदेव शास्त्रीय संगीत के अच्छे जानकार थे। उनके रचित गीत अक्सर किसी ना किसी राग पर आधारित हुआ करते थे। 'मुझे जीने दो' का ये गीत 'राग धानी' पर आधारित है। वस्तुतः राग धानी, राग मालकोस से निकला हुआ राग है। शास्त्रीय संगीत के जानकार राग धानी को राग मालकोस का रूमानी , मिठास भरा रूप मानते हैं। 

पर ये गीत अगर इतना मधुर व सुरीला बन पड़ा है तो उसमें जयदेव के संगीत से कहीं अधिक साहिर लुधियानवी के बोलों और लता जी की गायिकी का हाथ था।  साहिर के बारे में ये कहा जाता था कि वो मानते थे कि गीत के लोकप्रिय होने में सबसे बड़ा हाथ गीतकार का होता है। इसी वज़ह से किसी भी फिल्म में काम करने के पहले उनकी शर्त होती थी कि उनका पारिश्रमिक संगीतकार से एक रुपया ज्यादा रहे।

वैसे साहिर की शायरी इसकी हक़दार भी थी। अब इसी गीत को लें । शब्दों के दोहराव का कितना खूबसूरत प्रयोग किया है साहिर ने गीत के हर अंतरे में। पहले अंतरे में साहिर लिखते हैं
तुम आओ तो आँखें खोलें
सोई हुई पायल की छम छम
अब आप ही बताइए, एक मुज़रेवाली इससे बेहतर किन लफ़्जों से महफिल में आए अपने प्रशंसकों का दिल जीत सकती है? और गीत के तीसरा अंतरे में इस्तेमाल किए गए प्राकृतिक रूपकों को सुनकर तोदिल से बस वाह वाह ही निकलती है। ज़रा इन पंक्तियों पर गौर फ़रमाएँ

तपते दिल पर यूँ गिरती है
तेरी नज़र से प्यार की शबनम
जलते हुए जंगल पर जैसे
बरखा बरसे रुक-रुक थम-थम


वैसे तो शोख और चंचल गीतों के लिए आशा ताई कई संगीतकारों की पहली पसंद हुआ करती थीं पर यहाँ लता जी ने भी अपनी गायिकी में गीत के हाव भावों को बड़ी खूबसूरती से पकड़ा है। मसलन जब लता होश में थोड़ी बेहोशी है..गाती हैं तो लगता है बस अब मूर्छित हो ही गयीं।

तो आइए सुनते हैं इस गीत को लता जी की सुरीली आवाज़ में


रात भी है कुछ भीगी-भीगी
चाँद भी है कुछ मद्धम-मद्धम
तुम आओ तो आँखें खोलें
सोई हुई पायल की छम छम

किसको बताएँ कैसे बताएँ
आज अजब है दिल का आलम
चैन भी है कुछ हल्का हल्का
दर्द भी है कुछ मद्धम मद्धम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम

तपते दिल पर यूँ गिरती है
तेरी नज़र से प्यार की शबनम
जलते हुए जंगल पर जैसे
बरखा बरसे रुक-रुक थम-थम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम
होश में थोड़ी बेहोशी है
बेहोशी में होश है कम कम
तुझको पाने की कोशिश में
दोनों जहाँ से खो ही गए हम
छम-छम, छम-छम, छम-छम, छम-छम

फिल्म में ये गीत फिल्माया गया था वहीदा जी और सुनील दत्त पर

सोमवार, जून 14, 2010

आप आए तो खयाल-ए-दिल-ए-नाशाद आया :साहिर, रवि व महेंद्र कपूर की यादगार सौगात.!.......

कल जगजीत सिंह की गाई एक ग़ज़ल की तलाश में यू ट्यूब पे निकला था कि भटकते-भटकते ये गीत सामने आ गया। अब इसे सुने एक अर्सा हो गया था। दोबारा सुना तो इसकी गिरफ़्त से निकलना मुश्किल था। आजकल कितने गीतों में ये माद्दा है कि वो पाँच मिनट के अंदर ही दर्शकों को नायक नायिका के प्रेम, बेवफाई और विरह की पूरी कहानी कह जाएँ। पर अगर गीतकार कोई और नहीं, साहिर लुधयानवी जैसा संज़ीदा शायर हो तो उनके लिए ये ज़रा भी मुश्किल काम नहीं रहा होगा। गुमराह फिल्म के यूँ तो सारे गीत ही चर्चित हुए थे, पर रेडिओ पर बाकी गीतों की तुलना में महेंद्र कपूर का गाया ये गीत कम ही बजा है। संगीतकार रवि के संगीत निर्देशन में महेंद्र कपूर के गाए गीत हमेशा से ज्यादा लोकप्रिय हुए हैं। गीत के आरंभ का संगीत संयोजन का अंदाज़ा आप गीत के वीडियो से भी लगा सकते हैं। 
महेंद्र कपूर और साहिर जैसे कलाकारों के बारे में तो पहले भी आपको बताता रहा हूँ। पर आज कुछ बातें इस नग्मे के संगीतकार रवि के बारे में। वैसे इस गीत के संगीतकार रवि यानि 'रवि शंकर शर्मा' आज भी हमारे बीच हैं। गुमराह के अलावा चौंदवीं का चाँद, हमराज, वक़्त, नीलकमल जैसी फिल्मों का गीत देने वाले रवि ने 1970 के बाद से हिंदी फिल्मों के लिए संगीत देना छोड़ दिया। 1982 में ये सिलसिला फिल्म 'निकाह' में उनके द्वारा संगीत निर्देशित करने से टूटा। पर इसी दशक में उन्होंने ये निर्णय लिया कि वो सिर्फ मलयालम फिल्मों के लिए बांबे रवि के नाम से संगीत निर्देशित करेंगे। अपनी प्रतिभा के बल पर रवि मलयालम फिल्मों में दिए अपने संगीत से भी छा गए। 

आज भी पुराने ज़माने की तरह रवि पहले गीतकारों द्वारा लिखे गीतों को सुनकर ही उसके अनुरूप संगीत देते हैं। विधिवत संगीत की शिक्षा ना लेते हुए भी रवि जी ने अपने लिए जो मुकाम बनाया है वो उनके लिए क्या किसी भी संगीतकार के लिए गर्व का विषय हो सकता है। फिलहाल तो महेंद्र कपूर के गाए इस गीत की रूमानियत में डूबिए और शाबासी दीजिए साहिर, रवि और कपूर साहब की इस तिकड़ी को जिनके सम्मिलित प्रयास से ये गीत इतना जानदार बन पड़ा है। पर उसके पहले मेरी आवाज़ में सुनिए इस गीत के मुखड़े और अंतरे की गुनगुनाहट... 

आप आए तो खयाल ए दिले नाशाद आया 
कितने भूले हुए जख़्मों का पता याद आया  
('दिल‍- ए- नाशाद' का मतलब हैं दिल का दुखी, अप्रसन्न होना) 

आप के लब पे कभी अपना भी नाम आया था 
शोख नज़रों-सी मुहब्बत का सलाम आया था 
उम्र भर साथ निभाने का पयाम आया था 
आपको देख के वो अहदे वफ़ा याद आया 
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया 

रूह में जल उठे बुझती हुई यादों के दीये 
कैसे दीवाने थे हम, आपको पाने के लिए 
यूँ तो कुछ कम नहीं जो आपने ऐहसान किए 
पर जो माँगे से ना पाया वो सिला याद आया 
कितने भूले हुए ज़ख्मों का पता याद आया 

आज वो बात नहीं फिर भी कोई बात तो है 
मेरे हिस्से में ये हल्की-सी मुलाकात तो है 
ग़ैर का होके भी ये हुस्न मेरे साथ तो है 
हाय किस वक्त मुझे कब का गिला याद आया 

वो युग था प्रत्यक्ष यानि लाइव रिकार्डिंग का। अब क्या किसी गीत की रिकार्डिंग के पहले वाइलिन, सितार और बाँसुरी वादकों का समूह दिखता है जैसा कि इस गीत के वीडियो के आरंभ में दिखाया गया है।

 

फिल्म गुमराह में ये गीत फिल्माया गया है सुनील दत्त, माला सिन्हा व अशोक कुमार पर। सुनील दत्त गीत को गा तो रहे हैं पर माला सिन्हा ने भी गीत के भावों को अपनी चेहरे की भाव भंगिमाओं से जिस खूबसूरती से उभारा है वो देखते ही बनता है।

रविवार, जुलाई 12, 2009

काहे तरसाए जियरा... राग कलावती पर आधारित एक सम्मोहक युगल गीत !

कुछ दिनों पहले संगीतकार रोशन और साहिर की जोड़ी द्वारा रचित दिल जो ना कह सका के बारे में बाते हुईं थीं। आज से चार दिन बाद यानि 14 जुलाई को संगीतकार रौशन का जन्म दिन है तो मेंने सोचा कि क्यूँ ना साहिर के बोलों पर उनके संगीतबद्ध इस शास्त्रीय नग्मे को आपके सामने प्रस्तुत कर उनकी याद दिलाई जाए। लता जी के साथ तो रौशन साहब ने तो कई अद्भुत गीत दिए हैं पर आज का ये गीत लता जी का नहीं बल्कि आशा भोंसले और उषा मंगेशकर का गाया युगल गीत है।



अगर हिंदी फिल्मों में शास्त्रीय युगल गीतों की बात करें तो उनमें 1964 में आई फिल्म चित्रलेखा के इस गीत का जिक्र नहीं होना आश्चर्य की बात होगी। ये गीत राग कलावती पर आधारित है जो कि मध्यरात्रि के पूर्व गाया जाने वाला राग है। खैर मैं तो मंगेशकर बहनों की इस शास्त्रीय जुगलबंदी को किसी भी वक़्त सुनता हूँ, मन मुदित हो जाया करता है। संगीतकार रौशन की खासियत यही थी को वो अपनी धुनों में लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत के बीच ऍसा सामंजस्य स्थापित करते थे कि हृदय उनकी जादूगरी पर वाह वाह कर उठे। बेमिसाल गायिकी और संगीत के आलावा एक और बात इस गीत को अनोखा बनाती हैं वो हैं इसके बोल..

साहिर एक मक़बूल शायर तो थे ही फिल्मों के लिए उनकी लिखी हुई ग़ज़लें भी उतनी ही मशहूर हुईं। पर वही शख्स शुद्ध हिंदी में भी उसी माहिरी के साथ गीत रचना कर सकता है ये बात इस गीत के शब्दों पर गौर करने से पता चल जाती है।
चलिए अब इस गीत का मूड टटोलते हैं। सावन का महिना प्रारंभ हो चुका है। ऍसे में अगर पिया जी परदेश में हों और लौटने का नाम नहीं ले रहे और ऊपर से बारिश की ये कल्की हल्की फुहारें तन मन में और आग लगा दें तो जियरा तो तरसेगा ही !

काहे तरसाए जियरा
काहे तरसाए जियरा, जियरा...
यवन ऋतु सजन जाके न आ...ए..
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा..

नित नीत जागे ना
नित नीत जा.. जागे ना, नित नीत जा.. जागे ना,
नित नीत जागे ना
सोया सिंगा...र, सोया सिंगा.......र
झनन झन झनन, नित ना बुला..ए
काहे जियरा तरसाए
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा..

नित नीत आए ना
नित नीत आ.. आए ना, नित नीत आ.. आए ना,
नित नीत आए ना
तन पे निखा...र, तन पे निखा......र
पवन मन सुमन नित ना खिला..ए
काहे जियरा तरसाए
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा


नित नीत बरसे ना
नित नीत बर. बरसे ना, नित नीत बर.. बरसे ना
नित नीत बरसे ना
रस की फुहार, रस की फुहा...र
सपन बन गगन, नित ना लुटा..ए
काहे जियरा तरसाए
काहे तरसाए जियरा, काहे तरसाए जियरा
जियरा...


संगीतकार रोशन ने इस गीत में विभिन्न वाद्य यात्रों में क्या कमाल बैठाया था। तबले की थाप, बाँसुरी की सुरीली गूँज और उनके बीच तार वाद्यों की झंकार। कई बार संगीत संयोजन पर हमारा ध्यान तब जाता है जब उस पेशकश को आर्केस्ट्रा के साथ देखा जाए। ऐसा ही एक प्रस्तुति मुझे नेट पर मिली। आप भी देखिए संगीत का कमाल



तो आइए सुनते हैं आशा और उषा जी की इस अद्भुत जुगलबंदी को चित्रलेखा फिल्म के इस गीत

शुक्रवार, अक्टूबर 19, 2007

दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें.. :आइए सुनें साहिर का लिखा ये खूबसूरत नग्मा

इंसान जब इश्क करता है तो उसका जुनूं उसे सारी दुनिया से लड़ने की ताकत दे देता है। लगता है कि अगर आपका महबूब आपके साथ हो तो फिर ज़हान साथ रहे, ना रहे क्या फ़र्क पड़ता है। पर जिसके भरोसे सारे जग की दुश्मनी मोल ली, अगर वही हमारी भावनाएँ समझ ना सके तो दिल का टूटना लाज़िमी है। किस किस को सफाई देते रहें और अगर दें भी तो किस अवलंब पर ? आखिर तुम्हारे ना समझ पाने का गम क्या कम है कि सारे ज़माने से लड़ते फिरें।

साहिर लुधयानवी ने इसी बात को अपनी इस नज़्म में पिरोया है। उनके सवाल के अंदर की बेबसी, लफ़्जों में उभर कर आई है। और लता जी की गायिकी साहिर के इस सवाल को दिल तक पहुँचाती है इक टीस के साथ। तो पेशे खिदमत है, रोशन का संगीतबद्ध किया हुआ फिल्म 'बहू बेगम' का ये गीत...



दुनिया करे सवाल तो हम क्या जवाब दें
तुमको न हो ख़याल तो हम क्या जवाब दें
दुनिया करे सवाल ...

पूछे कोई कि दिल को कहाँ छोड़ आये हैं
किस किस से अपना रिश्ता-ए-जाँ तोड़ आये हैं
मुश्किल हो अर्ज़-ए-हाल तो हम क्या जवाब दें
तुमको न हो ख़याल तो ...

पूछे कोई कि दर्द-ए-वफ़ा कौन दे गया
रातों को जागने की सज़ा कौन दे गया
कहने से हो मलाल तो हम क्या जवाब दें
तुमको न हो ख़याल तो ...


 

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