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गुरुवार, मार्च 19, 2026

वार्षिक संगीतमाला 2024 सरताज गीत : मैनू विदा करो ...अब विदा करो मेरे यारा

वार्षिक संगीतमाला 2024 को विदा करने का वक़्त आ गया है उस साल के सबसे शानदार गीत के साथ जिसे सुन या देख कर शायद ही किसी शख़्स की आँखें न भीगीं हों। कभी किसी ज़माने में पंजाब के मशहूर कवि शिव कुमार बटालवी ने इसी शीर्षक से एक कविता लिखी थी जिसे गीतकार इरशाद कामिल ने फिल्म अमर सिंह चमकीला में विदाई गीत का मुखड़ा बना लिया और बाकी के अंतरों में जाते हुए व्यक्ति के भावों को ऐसा पकड़ा कि वो हम सबका गीत बन गया।


ऐसा कहा जाता है कि अमर सिंह चमकीला की हत्या इसलिए की गई  क्योंकि उनके गीतों के विषय सामाजिक मान्यताओं और नैतिकता के पैमानों पर खरे नहीं उतरते थे। अतिवादियों ने इसलिए उन्हें और उनकी सह गायिका अमरजोत को इस दुनिया से चलता कर दिया। आख़िर चमकीला का अपराध क्या इतना बड़ा था कि उन्हें ऐसी सजा मिली?

मुझे ऐसा लगता है कि आख़िरी वक़्त आने पर हम सब दिल से बड़े हो जाते हैं। हमारा हृदय उदार हो जाता है। जब जीवन रहा ही नहीं तो उसमें होने वाली ज्यादतियों की शिकायत भी नहीं रह जाती। शारीरिक पीड़ा के इन क्षणों में भी अपने प्रियजनों के सुखद भविष्य की कामना होठों पर चली ही आती है। इरशाद कामिल व्यक्ति की इसी मनोस्थिति का गीत में मार्मिक चित्रण करते हैं। अरिजीत सिंह ने क्या डूब के इस गीत को गाया है जोनिता गांधी के साथ। ये भी कैसा संयोग है कि इस गीत के आने के डेढ़ साल बाद अरिजीत ने बतौर पार्श्व गायक फिल्मी दुनिया को अलविदा कह दिया।

वैसे शुरुआत में रहमान का इरादा दिलजीत दोसांझ से इस गीत को गवाने का था जो फिल्म में अमर सिंह चमकीला की भूमिका निभा रहे थे। फिर ये ख़्याल उभरा कि कहानी में जब चमकीला मर चुका तो गाना किसी दूसरे की आवाज़ में गवाना चाहिए और फिर अरिजीत का नाम सामने आया। उनका हिस्सा रिकॉर्ड होने के बाद  लगा कि मृत्यु तो अमनजोत की भी हुई है तो उसके लिए एक महिला स्वर को भी गीत में होना चाहिए और इस तरह इस गीत का एक अंतरा जोनिता को मिला।

संसार को छोड़ने के पल के बारे में हर इंसान कभी न कभी विचार तो करता ही है। पर रहमान, इरशाद कामिल , इम्तियाज़ अली ने अरिजीत के साथ मिलकर इस विषय को गीत में ढाल कर अजर अमर बना दिया है। दशकों बाद भी इस गीत की भावनाएं अलग अलग परिपेक्ष्य में लोगों के दिल को जरूर झिझोड़ती रहेंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

चलते इस गीत के इस रूप में आने का वाक़या भी आपको बताता चलूँ। इस गीत के अपने अस्तित्व में आने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।

"रात के ढाई बज रहे थे। संगीतकार ए आर रहमान अपने मुंबई वाले स्टूडियो में इम्तियाज़ अली और इरशाद कामिल के साथ बैठे थे। अचानक रहमान ने कहा कि स्टूडियो की सारी लाइट बंद कर देते हैं। बत्तियां तो बुझा दी गईं पर उनके स्थान पर मोमबत्तियों और दीयों को जलाया गया। रहमान अपने पियानो पर अपने उंगलियाँ चलने लगे।  मुखड़ा तो पहले ही बन चुका था पर  बाकी अंतरों पर काम अगले दो घंटों में हुआ।"

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,अब विदा करो मेरे यारा,

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
मैंने जाना है उस पार

तुम सभी साफ सही, हूँ मटमैला मैं,
तुम सभी पाक मगर पाप का दरिया मैं,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार

झूठ भला क्यूँ बोलोगे तुम,
सब सच कहते हो,
मेरी नहीं है दुनिया जिसमें,
तुम सब रहते हो 


साथ तुम्हारे और रहूँ  मैं,
मेरा तो मन था,
सच है यहाँ पे जो भी बुरा था,
मेरे कारण था 

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार 

मेरे सर पे सारी तोहमत तुम धर देना,
मैं तो मैं हूँ रूह भी मेरी पागल कर देना,
तुम खुश रहना, सब कुछ सहना, मुझको आता है,
टूटे तारे का धरती से कैसा नाता है 

मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यारा,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
मैंने जाना है उस पार 

तुम सभी साफ सही (साफ सही) हूँ मटमैला मैं,
तुम सभी पाक मगर (पाक मगर) पाप का दरिया मैं,
मैनू विदा करो मैनू विदा करो जी,
अब विदा करो मेरे यार...!!!


 


 

आशा है 2024 का सरताज गीत और पच्चीस गीतों की ये शृंखला आप सब को पसंद आई होगी। जिस तरह से मेरी कार्यालय की व्यस्तता बढ़ रही हैं उसका सीधा असर आपने इस संगीतमाला के लंबे खिंच जाने के तौर पर देखा होगा। मुझे पता नहीं की 2025 की संगीतमाला को आप तक इस रूप में पहुंचा पाऊंगा या नहीं पर पिछले 20-22 सालों से चल रही इस गीतमाला के जो श्रोता और पाठक रहे हैं उनका ढेर सारा आभार!

गुरुवार, जनवरी 08, 2026

वार्षिक संगीतमाला 2024 Top 5 : तू क्या जाने मेरे यार

2024 की मेरी संगीतमाला बेहद धीमी रफ़्तार से आगे बढ़ी है। इसका एक कारण तो कार्यालय में बढ़ती जिम्मेदारियां हैं। जो लोग मुझे जानते हैं वो ये भी जानते होंगे कि मेरा खाली वक़्त संगीत के अलावा  सैर सपाटे, चिड़ियों और तितलियों की तस्वीरें लेने और उनके बारे में लिखने में लगता है। यही वज़ह है कि 2026 आ गया और मैं अभी तक 2024 की संगीतमाला की आख़िरी कुछ पायदानों में अटका हूं। पाठक गण से मैं अपनी इस मंथर गति के लिए क्षमा प्रार्थी हूं🙏।



खैर धीरे धीरे ही सही मेरी गीतमाला की ये पैसेंजर ट्रेन आ पहुंची है अपनी पांचवी पायदान पर जिस पर फिल्म अमर सिंह चमकीला का गाना वो जो पहली बार सुनते ही मेरा मनपसंद गीत बन गया था वो भी तब जबकि इसे गाया था एक अनजान गायिका ने जिन्हें इस गीत के पहले मैंने सुना ही नहीं था।

जी हां आपने सही पहचाना ये गायिका हैं यशिका सिक्का। यशिका का परिवार संगीत से जुड़ा परिवार नहीं है पर उनके पिता को संगीत सुनने का बड़ा शौक़ था। उन्हें अपनी बेटी की आवाज़ पर इतना भरोसा था कि न केवल उन्होंने यशिका को संगीत की तालीम दिलवाई पर साथ ही संगीत से जुड़े रियलिटी शो में भी भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। वो अलग बात है कि यशिका की आवाज़ की बनावट परंपरागत न होने के कारण उन्हें ज्यादातर नाकामयाबी मिली। यशिका को भी ये बात मन में बैठने लगी कि शायद वो पार्श्व गायिकी के लायक नहीं हैं। पर पिता के विश्वास का कमाल था कि उन्हें जिंगल, कच्चे गीत और स्वतंत्र संगीत करने के प्रस्ताव मिलने लगे।

यशिका सिक्का

करीब एक दशक के संघर्ष के बाद अमर सिंह चमकीला में उन्हें नरम कलेजा गाने के लिए बुलाया गया। हुआ यूं कि रहमान को चमकीला के लिए पंजाबी गायकों की तलाश थी। फिल्म के संगीत को अंतिम रूप देने के पहले तमाम कलाकारों को बुलाकर उनसे ढेर सारे गाने गवाए गए। इन गायकों में यशिका भी एक थीं जिनकी आवाज़ रहमान को बिल्कुल अलग सी लगी। हालांकि नरम कलेजा में उनके हिस्से में बस गीत का छोटा टुकड़ा ही आया। 

इस बात के दस महीने बीतने के बाद अचानक ही उन्हें तू क्या जाने मेरे यार को गाने के लिए एक रात दस बजे बुलाया गया। दो बजे संगीत के जादूगर रहमान आए और उन्होंने 15 मिनट में धुन तैयार कर दी जिसे यशिका ने अगले दस मिनट में गा भी दिया और इस तरह गीत का मूल स्वरूप अस्तित्व में आया। गीत में परिवर्तन अगले कुछ महीने में होते रहे पर यशिका के मन में ये सवाल चलता रहा कि क्या उनकी आवाज़ अंततः फिल्म में रहेगी?

दरअसल इस गीत के लिए भी इम्तियाज़ अली और रहमान श्रेया घोषाल का नाम पहले सोच रहे थे पर जब इम्तियाज़ ने यशिका वाला वर्जन सुना तो वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कहा कि इसे ही रहने देते हैं।  वैसे भी यशिका की आवाज़ फिल्म के पंजाबी किरदार पर खूब जमी भी है।

यशिका बताती हैं कि इस गीत की सबसे कठिन जगह अंतिम वाले अंतरे में आती है जब सच्चियाँ मोहब्बतां के आगे की कुछ पंक्तियां उन्हें बिना बीच में सांस लिए ही गानी थीं और उन्होंने उसे क्या खूब  निभाया है। गीत के अंत में उनकी गुनगुनाहट को बार बार सुनने का दिल करता है। रिलीज़ होने के बाद बेहद लोकप्रिय हुआ पर दुख की बात ये थी कि यशिका के पिता जिन्होंने उनके संगीत की नींव रखी, ये देखने के लिए  जीवित नहीं रहे।

गीतकार इरशाद कामिल ने इस गीत में एक युवा स्त्री की आसक्तियों, उसकी आकांक्षाओं को भली भांति शब्दों में बांधा है। उनके शब्दों के चुनाव को देखिए तन का ताज भी मन का राज भी,अपना आज भी तुझपे है देना वार। प्रेम में डूबी हुई स्त्री के पूर्ण समर्पण का भाव कितनी स्पष्टता से उभरा है यहां। उसी भाव को आगे और गहरा कर के वे लिखते हैं

जीत लूं ज़माने से मैं जंग करके, तुझ पे दुपट्टे वाला रंग करके,
सूट से अपने मैं लूंगी मिला, रखना तुझे सीने पे अब मैंने

अपने प्रिय को इन पंक्तियों में अपने दिल के पास रखने का क्या नायाब तरीका ढूंढा है यहां नायिका ने!

मुखड़े के पहले ताल वाद्यों के साथ तुम्बी (विजय यमला) और मेंडोलिन (एस एम सुभानी) का रिदम मन को लुभाता है जिसे पराग छाबड़ा ने अरेंज किया है। पंजाबी लोक संगीत का स्वाद इन्हीं वाद्यों की वज़ह से गीत में उभर कर आया है। वहीं मुखड़े के बाद प्रतीक श्रीवास्तव का बजाया सरोद ध्यान खींचता है। 

तू क्या जाने मेरे यार, हाय
तू क्या जाने मेरे यार
छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ,
छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ
नैना चोर से, इक दिन जोर से,
करना है तुझको प्यार,
हाय......  नैना चोर से इक दिन जोर से,
करना है तुझको प्यार 
तू क्या जाने मेरे यार, हाय.... तू क्या जाने मेरे यार 


तन का ताज भी मन का राज भी,
अपना आज भी तुझपे है देना वार,
तू क्या जाने मेरे यार, हाय.... तू क्या जाने मेरी जान

सच्चियाँ मोहब्बतां बुलंद करके,रखना पिटारी में तू बंद करके
रुसना भी हंसना भी नाल तेरे, सबसे छुपा रखना अंग संग मैंने
हाय आय आय आए 
जीत लूं ज़माने से मैं जंग करके, तुझ पे दुपट्टे वाला रंग करके,
सूट से अपने मैं लूंगी मिला, रखना तुझे सीने पे अब मैंने
हाय आय आय आए। .. 

छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ,
छुप छुप तकती हूँ, कह ना सकती हूँ,
तू क्या जाने मेरे यार, तू क्या जाने मेरे यार 

हो संग ना छोड़ दे इश्क़ निचोड़ दे,
बजने दे तन के तार,
हाय संग ना छोड़ दे इश्क़ निचोड़ दे,
बजने दे तन के तार 
तू क्या जाने मेरे यार, हाय
तू क्या जाने मेरी जान 

तो आइए सुनते हैं यशिका की आवाज़ में पांचवीं पायदान का ये गीत

शुक्रवार, मार्च 29, 2024

वार्षिक संगीतमाला 2023 : आजा रे, आ, बरखा रे, कब से नहीं देखा रे..

एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला के 25 शानदार गीतों की इस शृंखला में अब आपको दस गीत ही सुनवाने बचे हैं। इन गीतों में ज्यादातर मेरे बेहद प्रिय रहे हैं। आज जो गीत मैं आपको सुनवाने जा रहा हूँ वो एक गैर फिल्मी गीत है जिसमें अरिजीत सिंह ने बतौर संगीतकार की भूमिका निभाई है। एक समय प्रीतम के सहायक रहे अरिजीत ने तीन साल पहले पगलेट के संगीत के लिए भी खासी वाहवाही लूटी थी। यहाँ भी वो अपने संगीत से श्रोताओं का दिल जीतने में सफल रहे हैं।

मानसून के मौसम में पिछले साल जुलाई में रिलीज़ हुए इस गीत को लिखा था इरशाद कामिल साहब ने। इरशाद कामिल के लिए बरखा के बोलों को लिखना अतीत की यादों में भींगने जैसा था। बारिश बहुत लोगों के लिए एक मौसम से बढ़कर है। ये अपने साथ हममें से कितनों के मन में भावनाओं का ज्वार लेकर आती है। इरशाद ने कोशिश की इस गीत के द्वारा वे इन जज़्बातों को शब्द दे सकें। 
बड़ी कोमल शब्द रचना है इरशाद की इस गीत में। कुछ पंक्तियाँ तो बस मन को यूँ ही सहलाती हुई निकल जाती हैं जैसे कि झोंका हवा का पुकारे, ग़म को बहा ले जा रे.. या फिर आजा रे, आ, बरखा रे, मीठे तू कर दिन खारे। सच में बरखा सिर्फ एक गीत नहीं है बल्कि एक कैफ़ियत है जिसमें प्रेम, विरह और आख़िरकार मिलन के भाव बारिश की बूँदो में बहते चले आते हैं।
इस फिल्म का वडियो शूट बंगाल में हुआ। इस गीत का वीडियो देखते हुए मुझे परवीन शाकिर की वो नज़म याद आ गयी..

बारिश में क्या तन्हा भीगना लड़की
उसे बुला जिसकी चाहत में
तेरा तन-मन भीगा है
प्यार की बारिश से बढ़कर क्या बारिश होगी
और जब उस बारिश के बाद
हिज्र की पहली धूप खुलेगी
तुझ पर रंग के इस्म खुलेंगे
अरिजीत सिंह ने बरखा से जुड़े इस गीत में कुछ बेहद मधुर स्वरलहरियाँ सृजित की हैं। गिटार पर आदित्य शंकर का बजाया टुकड़ा जो मुखड़े के बाद और अंतरों के बीच बजता है मुझे बेहद मधुर लगा। गिटार के अलावा निर्मल्य डे की बजाई बाँसुरी भी कानों में रस घोलती है। साथ में कहीं कहीं पियानो की टुनटुनाहट भी सुनाई दे जाती है और फिर सोने पर सुहागा के तौर पर अरिजीत का एक प्यारा आलाप तो है ही
आजा रे, आ, बरखा रे, कब से नहीं देखा रे
झोंका हवा का पुकारे, ग़म को बहा ले जा रे
पानी की छाँव में, बूँदों के पाँव में बाँधे तू झाँझरें
हो, आजा रे, आ, बरखा रे, कब से नहीं देखा रे
झोंका हवा का पुकारे, ग़म को बहा ले जा रे

बहा के ले जाना दुख बीते कल के
गहरे-हल्के, पुराना धो जाना
आजा रे, आ, बरखा रे, मीठे तू कर दिन खारे
तेरी नज़र को उतारे, कब से नहीं देखा रे

आजा, बरखा
बोलो, क्या बोलूँ, मैं ना तो क्या तू?
तू ना हो तो, मैं क्या बोलूँ? तू है तो मैं हूँ

आजा रे, आ, बरखा रे, कब से नहीं देखा रे
कब से नहीं देखा रे, आजा रे, आ, बरखा रे
पानी की छाँव में, बूँदों के पाँव में
हो, आजा रे, आ, बरखा रे
झोंका हवा का पुकारे, ग़म को बहा ले जा रे

गायिकी की दृष्टि से सुनिधि के लिए पिछला साल बेहतरीन रहा। हालांकि इस गाने के एक हिस्से को मैंने श्रेया और जैन की आवाज़ में सुना तो वो मुझे बारिश की सोंधी बूँदों की तरह ही मन को और शीतल कर गया।
सुनिधि के अपने इस गीत के बारे में कहना था कि हमने कोशिश की है बारिश को समर्पित एक गीत रचने की जो उस मौसम के साथ मन में उमड़ती घुमड़ती भावनाओं को भी व्यक्त कर जाता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को उनकी आवाज़ में।


वार्षिक संगीतमाला 2023 में मेरी पसंद के पच्चीस गीत
  1. वो तेरे मेरे इश्क़ का
  2. तुम क्या मिले
  3. पल ये सुलझे सुलझे उलझें हैं क्यूँ
  4. कि देखो ना बादल..नहीं जी नहीं
  5. आ जा रे आ बरखा रे
  6. बोलो भी बोलो ना
  7. रुआँ रुआँ खिलने लगी है ज़मीं
  8. नौका डूबी रे
  9. मुक्ति दो मुक्ति दो माटी से माटी को
  10. कल रात आया मेरे घर एक चोर
  11. वे कमलेया
  12. उड़े उड़नखटोले नयनों के तेरे
  13. पहले भी मैं तुमसे मिला हूँ
  14. कुछ देर के लिए रह जाओ ना
  15. आधा तेरा इश्क़ आधा मेरा..सतरंगा
  16. बाबूजी भोले भाले
  17. तू है तो मुझे और क्या चाहिए
  18. कैसी कहानी ज़िंदगी?
  19. तेरे वास्ते फ़लक से मैं चाँद लाऊँगा
  20. ओ माही ओ माही
  21. ये गलियों के आवारा बेकार कुत्ते
  22. मैं परवाना तेरा नाम बताना
  23. चल उड़ चल सुगना गउवाँ के ओर
  24. दिल झूम झूम जाए
  25. कि रब्बा जाणदा

    शुक्रवार, जनवरी 26, 2024

    वार्षिक संगीतमाला 2023 : ओ माही ओ माही तेरी वफ़ा पर हक़ हुआ मेरा

    वार्षिक संगीतमाला की अगली कड़ी में आज एक गीत फिल्म डंकी से। ये फिल्म तो लोगों ने उतनी पसंद नहीं की, हां पर इसके एक दो गाने यू ट्यूब पर खूब बजे, इंस्टा की रीलों पर छा गए। अब इसका सबसे ज्यादा श्रेय तो मैं संगीतकार प्रीतम को देना चाहता हूं।

    प्रीतम एक ऐसे संगीतकार हैं जिनकी मेलोडी पर जबरदस्त पकड़ है। वो ये बखूबी समझते हैं कि श्रोताओं को कैसी सिग्नेचर धुन, कैसे इंटरल्यूड्स पसंद आयेंगे। ज्यादातर वे इरशाद कामिल और अमिताभ भट्टाचार्य के साथ अपने गीत रचते हैं जो उनकी बनाई धुनों के साथ न्याय करने में सक्षम हैं।


    तो डंकी फिल्म का जो गीत मेरे पसंदीदा गीतों की सूची में आया है वो है ओ माही ओ माही। मुखड़े के पहले के बीस सेकेंड में ही प्रीतम अपनी आरंभिक धुन से ध्यान खींच लेते हैं।

    माही शब्द को केंद्र में ले के दर्जनों गीत बन होंगे पर मजाल है कि श्रोता आज तक इससे ऊबे हों। इस गीत की तो ओ माही के दुहराव वाली पंक्ति ही लोगों के मन में रच बस गई है। दरअसल आज भी युवा अपने प्रेम का इज़हार करने के लिए ऐसे फिल्मी गीतों का सहारा लेते हैं जिसके बोल प्यारे पर सहज हों और जिसका संगीत कर्णप्रिय हो।

    वार्षिक संगीतमाला का ये गीत किस पायदान पर अंततः आएगा उसका खुलासा तो बाद में होगा पर इतना तो तय है कि सुरीले गीतों की इस साल की फेरहिस्त में अरिजीत सिंह का नाम बार बार आएगा।

    तो अगर आपने इरशाद कामिल का लिखा ये गीत न सुना हो तो सुन लीजिए।

    यारा तेरी कहानी में, हो जिकर मेरा
    कहीं तेरी खामोशी में, हो फिकर मेरा
    रुख तेरा जिधर का हो हो उधर मेरा
    तेरी बाहों तलक ही है ये सफ़र मेरा
    ओ माही ओ माही..ओ माही ओ माही
    तेरी वफ़ा पर हक़ हुआ मेरा
    ओ माही ओ माही...ओ माही ओ माही
    लो मैं क़यामत तक हुआ तेरा..

    बातों को बहने दो बाहों में रहने दो 
    हैं सुकून इनमें 
    रास्ते हो बेगाने, झूठे वो अफसाने 
    तू न हो जिनमें 
    हो थोड़ी उमर है प्यार ज़्यादा मेरा 
    कैसे बताएं ये सारा तेरा होगा 
    मैंने मुझे है तुझको सौंपना 
    राहों पे बाहों पे राहों पनाहों पे आहों पे बाहों पे 
    साहों सलाहों पे मेरे इश्क़ पे हुआ हक़ तेरा
    ओ माही ओ माही...ओ माही ओ माही
    लो मैं क़यामत तक हुआ तेरा..

    गुरुवार, मार्च 24, 2022

    वार्षिक संगीतमाला Top Songs of 2021 : तेरे रंग रंगा मन महकेगा तन दहकेगा Tere Rang

    वार्षिक संगीतमाला के आखिरी मोड़ तक पहुँचने में बस दो गीतों का सफ़र तय करना रह गया है। अब आज के गीत के बारे में बस इतना ही कहना चाहूँगा कि जिन्हें भी भारतीय शास्त्रीय संगीत से थोड़ा भी प्रेम होगा उन्हें संगीतमाला में शामिल इस अनूठे गीत के मोहपाश में बँधने में ज़रा भी देर नहीं लगेगी। ये गीत है ए आर रहमान के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म अतरंगी रे का। मुझे पूरा यकीन है कि ये गीत आपमें से बहुतों ने नहीं सुना होगा पर गुणवत्ता की दृष्टि से मुझे तो ये फिल्म अंतरंगी रे ही नहीं बल्कि पिछले साल के सर्वश्रेष्ठ गीतों में एक लगा।


    यूँ तो पूरी फिल्म में रहमान साहब का संगीत सराहने योग्य है पर इस गीत को जिस तरह से उन्होंने विकसित किया है तमाम उतार चढ़ावों के साथ, वो ढेर सी तारीफ़ के काबिल है। इतनी बढ़िया धुन को अगर अच्छे बोल नहीं मिलते तो सोने पे सुहागा होते होते रह जाता। लेकिर इरशाद कामिल ने प्रेम के रंगों में रँगे इस अर्ध शास्त्रीय गीत को बड़े प्यारे बोलों से सजाया है। गीत में बात है वैसे प्रेम की जैसा राधा से कृष्ण ने किया हो। गीत का आग़ाज़ द्रुत गति के बोलों से  इरशाद कामिल कुछ यूँ करते हैं

    तक तड़क भड़क, दिल धड़क धड़क गया, अटक अटक ना माना
    लट गयी रे उलझ गयी, कैसे कोई हट गया, मन से लिपट अनजाना
    वो नील अंग सा रूप रंग, लिए सघन समाधि प्रेम भंग
    चढ़े अंग अंग फिर मन मृदंग, और तन पतंग, मैं संग संग..और कान्हा

    गीत को गाया है कर्नाटक संगीत के सिद्धस्त गायक हरिचरण शेषाद्री ने नये ज़माने की स्वर कोकिला श्रेया घोषाल के साथ। चेन्नई के एक सांगीतिक पृष्ठभूमि से आने वाले हरिचरण दक्षिण भारतीय फिल्मों के लिए नया नाम नहीं हैं पर हिंदी फिल्मों में संभवतः ये उनका पहला गीत है। 

    हरिचरण शेषाद्री श्रेया घोषाल के साथ

    रहमान साहब ने हिंदी फिल्मों में ना जाने कितने हुनरमंद कलाकारों को मौका देकर उनके कैरियर को उभारा है। साधना सरगम, नरेश अय्यर, बेनी दयाल, चित्रा, श्रीनिवास, विजय प्रकाश, अभय जोधपुरकार, चिन्मयी श्रीपदा, शाशा तिरुपति... ये फेरहिस्त दिनोंदिन लंबी होती ही जाती है। इसीलिए सारे नवोदित गायकों का एक सपना होता है कि वो रहमान के संगीत निर्देशन में कभी गा सकें। हरिचरण इसी जमात के एक और सदस्य बन गए हैं।

    हरिचरण भी रहमान के कन्सर्ट में बराबर शिरकत करते रहे हैं। जिस आसानी से इस बहते हुए गीत को उन्होंने श्रेया घोषाल के साथ निभाया है वो मन को सहज ही आनंद से भर देता है।

    मुरली की ये धुन सुन राधिके, मुरली की ये धुन सुन राधिके, मुरली की ये धुन सुन राधिके

    धुन साँस साँस में बुन के, धुन सांस सांस में बुन के
    कर दे प्रेम का, प्रीत का, , मोह का शगुन

    मुरली की ये धुन सुन राधिके...

    हो आना जो आके कभी, फिर जाना जाना नहीं
    जाना हो तूने अगर, तो आना आना नहीं
    तेरे रंग रंगा, तेरे रंग रंगा
    मन महकेगा तन दहकेगा

    तुमसे तुमको पाना, तन मन तुम..तन मन तुम
    तन से मन को जाना..उलझन गुम...उलझन गुम
    तुमसे तुमको पाना तन मन तुम
    जिया रे नैना, चुपके चुपके हारे
    मन गुमसुम, मन गुमसुम

    डोरी टूटे ना ना ना, बांधी नैनो ने जो संग तेरे
    देखे मैंने तो, सब रंग तेरे सब रंग तेरे
    फीके ना हो छूटे ना ये रंग

    तेरे रंग रंगा.. शगुन

    इस अर्ध शास्त्रीय गीत में क्या नहीं है तानें, आलाप, कोरस, मन को सहलाते शब्द, कमाल का गायन, ताल वाद्यों की थाप के बीच चलते गीत के अंत में बाँसुरी की स्वरलहरी और इन सब के ऊपर रहमान की इठलाती धुन जो तेरे रंग रंगा, तेरे रंग रंगा मन महकेगा तन दहकेगा.. तक आते आते दिल को प्रेम रस से सराबोर कर डालती है। 


    निर्देशक आनंद राय रहमान के इस जादुई संगीत से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस म्यूजिकल के अंत में A film by A R Rahman का कैप्शन दे डाला। आनंद तो यहाँ तक कहते हैं कि मेरा बस चले तो मैं रहमान के सारे गानों को सिर्फ अपनी फिल्मों के लिए रख दूँ। वहीं श्रेया कहती हैं कि ऊपरवाला रहमान के हाथों संगीत का सृजन करता है। स्वयम् ए आर रहमान इस फिल्म की संगीत की सफलता का श्रेय इसकी पटकथा को देते हुए कहते हैं कि 

    जिस फिल्म की कथा देश के एक कोने से दूसरे कोने तक जा पहुँचती है तो बदलती जगहों और किरदारों के अनुसार संगीत को भी अलग अलग करवट लेनी पड़ती है। मैं शुक्रगुजार हूँ ऐसी कहानियों को जो संगीत में कुछ नया करने का अवसर हमें दे पाती हैं।

    वार्षिक संगीतमाला 2021 में अब तक

    बुधवार, फ़रवरी 02, 2022

    वार्षिक संगीतमाला Top Songs of 2021 जैसे रेत ज़रा सी Rait Zara Si

    राँझणा और तनु वेड्स मनु जैसी कामयाब फिल्में बनाने वाले आनंद राय जब एक बार फिर धनुष को अपनी नयी फिल्म अतरंगी रे में सारा और अक्षय कुमार के साथ ले कर आए तो आशा बँधी कि फिल्म कुछ वैसा ही जादू दोहरा पाएगी। धनुष के शानदार अभिनय के बावज़ूद अपनी लचर पटकथा की वज़ह से फिल्म तो कोई कमाल दिखला नहीं सकी जैसी आशा थी अलबत्ता संगीतकार ए आर रहमान एलबम में अपनी छाप छोड़ने में पूरी तरह सफल हुए। यही वज़ह है कि इस फिल्म के तीन गीत पिछले साल के शानदार गीतों की इस संगीतमाला में अपनी जगह बना पाए हैं।



    जहाँ तक रेत ज़रा सी का सवाल है तो यहाँ क्या मेलोडी रची है रहमान साहब ने। अगर आप दूर से भी इस गीत को सुनें तो सहज ही धुन की मधुरता आपको इसे गुनगुनाने पर मजबूर कर देगी। ज्यादातर धुनें पहले बनती हैं शब्द बाद में लिखे जाते हैं। जब भी कोई धुन बनती है तो संगीतकार या तो कच्चे बोलों से काम चलाता है या फिर अनर्गल बोलों का सहारा लेता है जिसे अंग्रेजी में Gibberish कहा जाता है। नेट पर मुझे इस गीत का ऐसा ही आडियो मिला जिसमें रहमान इस धुन को कुछ ऐसे ही बोलों से विकसित कर रहे हैं। तो सुनिए आप भी 

       

    पर आकाश में सिर्फ चाँद हो तो क्या रात अपनी सारी खूबसूरती बिखेर पाएगी? नहीं ना उसे तो ढेर सारे तारों की टिमटिमाहट भी चाहिए। शब्दों की यही जगमगाहट गीतकार इरशाद कामिल लाए हैं और उस चमक को अपनी गायिकी से हम तक पहुँचाया है अरिजीत सिंह और शाशा तिरुपति की युगल जोड़ी ने।

    इस गीत के मुखड़े को सुनकर  बचपन के वो दिन आ जाते हैं  जब रेत के टीले पर चढ़ते उतरते मस्ती करते हम बच्चे अपनी हथेलियों में मुट्ठी भर भर कर रेत का घर बनाने कर लिए ले जाया करते थे पर हर कदम के साथ रेत उँगलियों के कोनों से गिरती जाती और लक्ष्य तक पहुँचते हुए ज़रा सी ही रह जाती थी। 

    इस फिल्म में धनुष और सारा का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है जो रेत की तरह दिल रूपी हथेली से कभी उड़ता तो कभी फिसलता चला जाता है। इन भावों को कितनी सरलता से कामिल कुछ यूँ व्यक्त करते हैं ...रोज़ मोहब्बत पढ़ता है, दिल ये तुमसे जुड़ता है...हवाओं में यूँ उड़ता है, हो जैसे रेत ज़रा सी....हाथ में तेरी खुशबू है, खुशबू से दिल बहला है...ये हाथों से यूँ फिसला है, हो जैसे रेत ज़रा सी


    होना तेरा होना, पाना तुमको पाना
    जीना है ये माना, पल भर में सदियां
    है सदियों में, जीना है ये माना
    हाथ में तेरी खुशबू है, खुशबू से दिल बहला है
    ये हाथों से यूँ फिसला है, हो जैसे रेत ज़रा सी
    रोज़ मोहब्बत पढ़ता है, दिल ये तुमसे जुड़ता है
    हवाओं में यूँ उड़ता है, हो जैसे रेत ज़रा सी

    ये हलचल, दिल की ये हलचल
    बोले आज आस पास तू मेरे
    बिखरा हूँ मैं तो, कुछ पल हवा में
    तेरे भरोसे को थामे
    चलना भी है बदलना भी है
    तुझमें ही तो ढलना भी है

    दिल थोड़ा जज़्बाती है, भर जाता है बातों से
    ये फिर छलके यूँ आँखों से, हो जैसे रेत जरा सी
    हाथ में तेरी खुशबू है, सच पुछो तो अब यूँ है
    तू चेहरे पे मेरे ठहरा, हो जैसे रेत ज़रा सी


    अरिजीत तो दर्द भरे प्रेम गीतों के बेताज बादशाह हैं ही शाशा तिरुपति ने भी दिल थोड़ा जज़्बाती है.. गाते हुए उनका बखूबी साथ दिया है। शाशा का अरिजीत के साथ गाया ये तीसरा युगल गीत हैं और वो मानती हैं कि अरिजीत के साथ उनकी आवाज़ गानों में फबती है। रहमान के बारे में उनका कहना है कि वो गीत बनाते समय ही मन में एक प्रारूप बना लेते हैं हैं कि ये गीत किससे गवाना है? रहमान ने इस गीत में ताल वाद्यों के साथ बाँसुरी और सरोद का इस्तेमाल किया है। करीम कमलाकर की बजाई बाँसुरी गीत सुनने के बाद में भी मन में बजती रहती है। रहमान का गीत है तो अंतरों के बीच कोरस का होना तो स्वाभाविक ही है।

    तो आइए सुनें इनकी आवाज़ में ये मीठा सा नग्मा।

     

    वार्षिक संगीतमाला 2021 में अब तक

    अगर आप सोच रहे हों कि मैंने हर साल की तरह इस गीत की रैंक क्यूँ नहीं बताई तो वो इसलिए कि इस साल परिवर्तन के तौर पर गीत किसी  क्रम में नहीं बजेंगे और गीतों की मेरी सालाना रैंकिंग सबसे अंत में बताई जाएगी। 

    सोमवार, जनवरी 24, 2022

    वार्षिक संगीतमाला 2021 Top 15 हाय चकाचक चकाचक हूँ मैं Chaka Chak

    गीतकारों के लिए हर साल एक चुनौती रहती है कि कोई ऐसा शब्द गीत के मुखड़े के इर्द गिर्द बुनें जिसे सुनते ही लोगों की उत्सुकता उस गीत के प्रति बढ़ जाए। ए आर रहमान के संगीत निर्देशन में बनी फिल्म अतरंगी रे में ये काम किया चका चक वाले गीत ने जो आज पिछले साल के 15 शानदार गीतों की इस शृंखला में आज शामिल हो रहा है। इसे लिखा इरशाद कामिल ने। रिलीज़ होने के साथ कामिल का ये गीत सारा अली खाँ के लटकों झटकों और श्रेया घोषाल की गायिकी की बदौलत बड़ी आसानी से लोकप्रिय होता चला गया। 


    वैसे साफ सुंदर व्यवस्थित किये हुए किसी भी अहाते और कमरे के लिए ये कहना कि भई तुमने तो आज पूरा घर चकाचक कर रखा है पर किसी लड़की के साथ विशेषण के रूप में इस लफ़्ज़ के इस्तेमाल का श्रेय तो कामिल साहब को मिलेगा ही।

    शादी के समय में संगीत के कार्यक्रमों में गाना नाचना होता ही रहता है। पहले ज़माने में लोकगीत गाए जाते थे और उसकी भाषा भी बेबाक ही हुआ करती थी। मौका ऐसा रहता था कि ऐसे हँसी मजाक की छूट थी और आज भी है। फर्क इतना है कि आजकल लोक गीत की जगह फिल्मी गानों ने ले ली है। कोई अचरज नहीं कि इस गीत पर भी आप युवाओं को अगली शादी में नाचता गाता देखें।

    इरशाद कामिल के इस गीत के माध्यम से नायिका अपनी चाहत का खुला इज़हार कर रही है, बिना किसी संकोच के अपनी शारीरिक और भावनात्मक इच्छाओं, खूबियों और कमियों को बताते हुए ये साबित कर देना चाह रही है कि नायक के लिए वो कितना सही चुनाव रहती।

    अब इरशाद तो जो भी कहना चाह रहे हों मेरा ध्यान पहली बार पलँग टूटने से ज्यादा तपती दुपहरी, लड़की गिलहरी सी, पटना की चाट हो 16 स्वाद, माटी में मेरे प्यार की खाद जैसी मज़ेदार पंक्तियों पर पहले गया। बाकी रहमान साहब ने नादस्वरम और बाकी ताल वाद्यों से दक्षिण भारतीय शादी का ऐसा समां बाँधा है कि मन गीत के माहौल में रमता चला जाता है। श्रेया घोषाल की खनकती आवाज़ तो लुभाती ही है पर जिस मस्ती, उर्जा और उत्साह के साथ उन्होंने इस गीत को निभाया है वो काबिलेतारीफ़ है।


    वैसे कोई पटना वाला बताएगा कि सोलह स्वादों वाली चाट वहाँ कहाँ नसीब होती है? ☺

    वार्षिक संगीतमाला 2021 में अब तक

    अगर आप सोच रहे हों कि मैंने हर साल की तरह इस गीत की रैंक क्यूँ नहीं बताई तो वो इसलिए कि इस साल परिवर्तन के तौर पर गीत नीचे से ऊपर के क्रम में नहीं बजेंगे और गीतों की मेरी सालाना रैंकिंग सबसे अंत में बताई जाएगी। 

    शुक्रवार, मार्च 19, 2021

    वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत #3 शायद कभी ना कह सकूँ मैं तुमको Shayad

    ढाई महीने का ये सफ़र हमें ले आया है वार्षिक संगीतमाला की तीसरी पायदान पर जहाँ गाना वो जो पिछले साल की शुरुआत में आया और आते ही संगीतप्रेमियों के दिलो दिमाग पर छा गया। अब तक ये पन्द्रह करोड़ से भी ज्यादा बार इंटरनेट पर सुना जा चुका है। जी हाँ ये गाना था लव आज कल 2  से शायद

    प्रीतम, इरशाद कामिल और अरिजीत सिंह जब साथ आ जाएँ तो कमाल तो होना ही है। तीन साल पहले भी एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला में यही तिकड़ी तीसरे स्थान पर थी जब हैरी मेट सेजल के गीत हवाएँ के साथ। एक बार फिर वैसा ही  जादू जगाने में सफल हुए हैं ये तीनों इस नग्मे में ।

    प्रीतम अपनी धुनों को तब तक माँजते हैं जब तक उन्हें यकीन नहीं हो जाता कि श्रोता उसे हाथों हाथ लेंगे। उनके गीतों में सिग्नेचर ट्यून का इस्तेमाल बारहा होता है और ये ट्यून इतनी आकर्षक होती है कि सुनने वाला दूर से ही सुन के पहचान जाता है कि ये वही गीत है। यहाँ भी मुखड़े के बाद जो धुन बजती है वो तन मन प्रफुल्लित कर देती है। 



    इरशाद कामिल ने प्रेम के इकतरफे स्वरूप को इतने सहज शब्दों में इस गीत में उतारा है कि शायद ही कोई हो जो इस गीत की भावनाओं के मर्म से अछूता रह पाए । हर प्रेमी की ये इच्छा होती है कि सामने वाला बिना कहे उसकी बात समझ सके। अब ये इच्छा भगवान पूरी भी कर दें तो भी उस 'शायद' की गुंजाइश बनी रहती है क्यूँकि सामने वाला भी तो कई बार समझ के नासमझ बना रहता है। इसीलिए गीत के मुखड़े में इरशाद लिखते हैं.. शायद कभी ना कह सकूँ मैं तुमको...कहे बिना समझ लो तुम शायद...शायद मेरे ख्याल में तुम एक दिन...मिलो मुझे कहीं पे गुम शायद । देखिए कितना सुंदर और अनूठा प्रयोग है शायद शब्द का कि वो पहली और तीसरी पंक्ति की शुरु में आता है तो दूसरी और चौथी की आख़िर में। आँखों को ख्वाब देना खुद ही सवाल करके..खुद ही जवाब देना तेरी तरफ से वाली पंक्ति भी बड़ी खूबसूरत बन पड़ी है।

    अरिजीत की गायिकी के लिए युवाओं में एक जुमला खासा मशहूर है और वो ये कि अरिजीत के गाने और मम्मी के ताने सीधे दिल पे लगते हैं। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि अगर ये गाना अरिजीत के आलावा किसी और से गवाया गया होता तो उसका प्रभाव तीन चौथाई रह जाता। ऊंचे व नीचे सुरों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें आजकल के अपने समकालीन पुरुष गायकों से कहीं ऊपर ले जाती  है। 

    प्रीतम के संगीत संयोजन में गिटार का प्रमुखता से इस्तेमाल होता है। मजे की बात ये है कि इस गीत की प्रोग्रामिंग से लेकर एकास्टिक गिटार पर अरिजीत की उँगलियाँ ही थिरकी हैं। वुडविंड वाद्य यंत्रों से बनी मनमोहक सिग्नेचर धुन बजाने वाले हैं निर्मल्य डे। तो आइए सुनते हैं एक बार फिर इस गीत को जो शुरुआत तो एक मायूसी से होता है पर अंतरे तक पहुँचते पहुँचते आपको गीत की धुन में डुबाते हुए एक धनात्मक उर्जा से सराबोर कर देता है

    शायद कभी ना कह सकूँ मैं तुमको 
    कहे बिना समझ लो तुम शायद 
    शायद मेरे ख्याल में तुम एक दिन 
    मिलो मुझे कहीं पे गुम शायद 

    जो तुम ना हो रहेंगे हम नहीं 
    जो तुम ना हो रहेंगे हम नहीं 
    ना चाहिए कुछ तुमसे ज्यादा 
    तुमसे कम नहीं 
    जो तुम ना हो तो हम भी हम नहीं ..कम नहीं 

    आँखों को ख्वाब देना खुद ही सवाल करके
    खुद ही जवाब देना तेरी तरफ से 

    बिन काम काम करना जाना कहीं हो चाहे 
    हर बार ही गुज़रना तेरी तरफ से 
    ये कोशिशें तो होंगी कम नहीं 
    ये कोशिशें तो होंगी कम नहीं 
    ना चाहिए कुछ तुमसे ज्यादा ...जो तुम ना हो


     

    लव आज कल 2 तो लॉकडाउन के पहले आई पर इसके गाने कोविड काल में भी लोगों को सुहाते रहे। आप में से बहुत लोगों को पता ना हो कि लॉकडाउन में प्रीतम ने अरिजीत और इरशाद कामिल के साथ मिलकर गीत का एक और अंतरा रचा था जिसके बोल कुछ यूँ थे.. 

    चाहत कसम नहीं है, कोई रसम नहीं है
    दिल का वहम नहीं है, पाना है तुमको
    ख़्वाबों में गाँव जिसका, रस्ता ना आम जिसका
    चाहत है नाम जिसका ,पाना है तुमको
    हो तुम जहाँ मिलेंगे हम वहीं
    ना चाहिए कुछ तुमसे ज्यादा 
    तुमसे कम नहीं 
    जो तुम ना हो तो हम भी हम नहीं ..कम नहीं 

    चलिए चलते चलते उस वर्जन को भी सुन लिया जाए :)



    वार्षिक संगीतमाला 2020

    रविवार, फ़रवरी 07, 2021

    वार्षिक संगीतमाला 2020 : गीत # 11 ओ मेहरबाँ क्या मिला यूँ जुदा हो के बता Meharbaan

    वार्षिक संगीतमाला की ग्यारहवीं सीढ़ी पर जो गीत आपका इंतजार कर रहा है उसके शीर्षक को ले कर थोड़ा विवाद है। जब पहली बार मैंने फिल्म लव आज कल का ये गीत सुना था तो समझ नहीं आया कि इसे मेहरमा लिख कर क्यूँ प्रचारित किया जा रहा है। उर्दू में इससे एक मिलता जुलता शब्द जरूर है महरम जिसका शाब्दिक अर्थ होता है एक बेहद अतरंग मित्र। अगर आपको याद हो तो फिल्म कहानी के सीक्वल कहानी 2 ने इसी शब्द को केंद्र में रखकर अमिताभ भट्टाचार्य ने एक गीत भी लिखा था। गीत में गायक दर्शन रावल इस शब्द को मेहरवाँ जैसा उच्चारित करते हैं जो कि मेहरबाँ के करीब है। 


    क़ायदे से बात माशूका की मेहरबानी की हो रही थी तो इसे मेहरबां नाम से ही प्रमोट किया जाना चाहिए था। पता नहीं इरशाद कामिल जैसे नामी गीतकार और निर्देशक इम्तियाज़ अली का ध्यान इस ओर क्यूँ नहीं गया। बहरहाल लव आज कल का ये गीत आज गीतमाला की इस ऊँचाई पर पहुँचा है तो इसके सबसे बड़े हक़दार इसके संगीतकार प्रीतम हैं। 

    प्रीतम के बारे में एक बात सारे निर्देशक कहते हैं कि वो संगीत रिलीज़ होने के अंत अंत तक अपनी धुनों में परिवर्तन करते रहते हैं। उनकी इस आदत से निर्माता निर्देशक खीजते रहते हैं पर वे ये भी जानते हैं कि प्रीतम की ये आदत संगीत को और परिष्कृत ढंग से श्रोताओं को पहुँचाने की है। मैंने पिछली पोस्ट में प्रीतम के गीतों में सिग्नेचर ट्यून के इस्तेमाल का जिक्र किया था। यहाँ भी उन्होंने शिशिर मल्होत्रा की बजाई वॉयला की आरंभिक धुन से श्रोताओं का दिल जीता है।

    प्रीतम ने इस गीत में दर्शन रावल और अंतरा मित्रा की आवाज़ों का इस्तेमाल किया है। अंतरा प्रीतम की संगीतबद्ध फिल्मों का अभिन्न हिस्सा रही हैं। उनकर गाए सफल गीतों में दिलवाले का गेरुआ और कलंक का ऐरा गैरा याद आता है जिनमें प्रीतम का ही संगीत निर्देशन था। यहाँ उन्हें एक ही अंतरा मिला है नायिका के तन्हा मन को टटोलने का। 

    दर्शन रावल पहली बार एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला का हिस्सा बने हैं। इसलिए मेरा फर्ज बनता है कि उनसे आप सब का परिचय करा दूँ। यू ट्यूब के स्टार तो वो पहले ही से थे पर चोगड़ा तारा की सफलता के बाद से बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने वाले चौबीस वर्षीय दर्शन रावल गुजरात के अहमदाबाद शहर से ताल्लुक रखते हैं। बचपन से उन्हें कविता लिखने और उसे गाने का शौक़ लग चुका था। स्कूल में जब उन्हें समूह गान में पीछे की पंक्ति में रखा जाता था तो वे उतना ही जोर से गाने लगते थे ताकि उनकी आवाज़ अनसुनी ना रह जाए। अपनी इस आदत की वज़ह से उन्हें कई बार उस सामूहिक गीत से ही हटा दिया जाता था। इंजीनियरिंग में भी वे खुराफात करते रहे और एक बार पर्चा लीक करने की क़वायद में कॉलेज से बाहर कर दिए गए। पर उन्हें तो हमेशा से गायक ही बनना था और देखिए स्कूल व कॉलेज का वही नटखट लड़का अब अपनी आवाज़ की बदौलत युवाओं में कितना लोकप्रिय हो रहा है। 

    नायक नायिका के बिछोह से उपजे इस गीत का दर्द भी उनकी आवाज़ में बखूबी उभरा है।  तो आइए सुनते हैं एक बार फिर इस गीत को

    चाहिए किसी साये में जगह, चाहा बहुत बार है 
    ना कहीं कभी मेरा दिल लगा, कैसा समझदार है 
    मैं ना पहुँचूँ क्यों वहां पे. जाना चाहूँ मैं जहाँ 
    मैं कहाँ खो गया, ऐसा क्या हो गया 
    ओ मेहरवाँ क्या मिला यूँ जुदा हो के बता 
    ओ मेहरवाँ क्या मिला यूँ जुदा होके बता 
    ना ख़बर अपनी रही ना ख़बर अपनी रही 
    ना रहा तेरा पता ओ मेहरवाँ ... 

    जो शोर का हिस्सा हुई वो आवाज़ हूँ 
    लोगो में हूँ पर तन्हा हूँ मैं, हाँ तन्हा हूँ मैं 
    दुनिया मुझे मुझ से जुदा ही करती रहे 
    बोलूँ मगर ना बातें करूँ, ये क्या हूँ मैं 

    सब है लेकिन मैं नही हूँ 
    वो जो थोड़ा था सही, 
    वो हवा हो गया, क्यों खफा हो गया 
    ओ मेहरवाँ क्या मिला.... 


     .

    वार्षिक संगीतमाला 2020


     

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    इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

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