जब भी पुरानी ग़ज़लों की बात सोचता हूँ मुझे अस्सी का दशक रह रह कर याद आता है। अब अगर कोई ये कहे कि मियाँ तुम क्या देर से जगे हो ग़ज़लें तो हमारे बाप दादा के ज़माने से चलती आ रही हैं तो वो बात भी सही है। अस्सी के दशक से पुरानी कई ग़ज़लें सच पूछिए तो पिछले एक दशक में ही सुन पाया हूँ। पर अब करें क्या ग़ज़ल की भावनाओं को समझने की उम्र भी तो 1985 के बाद ही आई।
आज एक ऐसी ही ग़ज़ल आपके सामने पेश है जिसे अस्सी के दशक में ख़ासी लोकप्रियता हासिल हुई थी। इसे अपनी आवाज़ दी थी भजन सम्राट कहे जाने वाले अनूप जलोटा साहब ने। ये ग़ज़ल 1984 में रिलीज़ हुए उनके एलबम फरमाइश का अहम हिस्सा थी। पहली बार जब इसे सुना था तो मुझे जलोटा साहब का ग़ज़ल शुरु करने के पहले कहा गया शेर असमंजस में डाल गया था।
तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे
मै एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा ना लगे
जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
कि आसपास की लहरों को भी पता ना लगे
तुम्हारे बस मे अगर हो तो भूल जाओ हमें
तुम्हें भुलाने मे शायद हमें ज़माना लगे
न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में
वो मुँह छुपा के भी जाये तो बेवफ़ा ना लगे
हमारे प्यार से जलने लगी है इक दुनिया
दुआ करो किसी दुश्मन की बद्दुआ ना लगे
वैसे भी जिस संगीत को आप सुनते हुए बड़े होते हैं वो आपकी वास्तविक ज़िंदगी का हिस्सा हो जाता है। जब भी ऐसी ही कोई ग़ज़ल या गीत बरबस याद आता है तो अपने साथ उस समय की बहुत सी यादों को समेटता हुआ आता है।
आज एक ऐसी ही ग़ज़ल आपके सामने पेश है जिसे अस्सी के दशक में ख़ासी लोकप्रियता हासिल हुई थी। इसे अपनी आवाज़ दी थी भजन सम्राट कहे जाने वाले अनूप जलोटा साहब ने। ये ग़ज़ल 1984 में रिलीज़ हुए उनके एलबम फरमाइश का अहम हिस्सा थी। पहली बार जब इसे सुना था तो मुझे जलोटा साहब का ग़ज़ल शुरु करने के पहले कहा गया शेर असमंजस में डाल गया था।ग़ज़ल में बंदिशो अल्फाज़ ही नहीं काफी
जिगर का ख़ून भी चाहिए असर के लिए
जिगर का ख़ून भी चाहिए असर के लिए
इस 'जिगर के ख़ून' का मर्म समझने में मुझे तीन चार साल और लगे। फिर तो इस शेर के साथ पूरी ग़ज़ल को सुनना मुझे बहुत अच्छा लगने लगा। इसकी एक वज़ह ये भी थी कि क़ैसर उल ज़ाफरी साहब ने एक ऍसी रूमानी ग़ज़ल लिखी थी जो आसानी से एक हिंदी भाषी को भी समझ आ जाए। वैसे भी किशोरावस्था की दहलीज़ पर ऍसी भावनाएँ कुछ ज्यादा ही असर करती थीं।
वैसे अनूप जी ने भी बड़ी तबियत से इसका हर शेर गाया है। मतले में मौसम को छः बार कहने का उनका अंदाज़ निराला है। खूबसूरत वाद्य संयोजन के साथ साथ अपने चिरपरिचित अंदाज़ में अनूप भाई वाह वाही बटोरने वाला शास्त्रीय आलाप लेना भी नहीं भूले हैं।
अनूप जलोटा एक ऐसे गायक हैं जो उस ज़माने से लेकर आज तक सुने जाते रहे हैं। वे बारहा देश विदेशों में कनसर्ट देते रहते हैं। भक्ति संगीत के सैकड़ों एलबम में अपनी आवाज़ देने के बाद आजकल वो अपना समय भावी गायकों को सिखाने में लगाते हैं। उन्होंने गजल गायिकी बिल्कुल बंद तो नहीं की पर ग़ज़लों के अब उनके इक्का दुक्का एलबम ही आते हैं। तो देर किस बात की..बात शुरु की जाए उनके प्यारे शहर की
तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे
मै एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा ना लगे
जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
कि आसपास की लहरों को भी पता ना लगे
तुम्हारे बस मे अगर हो तो भूल जाओ हमें
तुम्हें भुलाने मे शायद हमें ज़माना लगे
न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में
वो मुँह छुपा के भी जाये तो बेवफ़ा ना लगे
हमारे प्यार से जलने लगी है इक दुनिया
दुआ करो किसी दुश्मन की बद्दुआ ना लगे
अनूप जलोटा की इस ग़ज़ल में जनाब क़ैसर-उल-जाफ़री के ये अशआर नहीं हैं..
कुछ इस अदा से मेरे साथ बेवफ़ाई कर
कि तेरे बाद मुझे कोई बेवफ़ा ना लगे
वो फूल जो मेरे दामन से हो गया मंसूब,
ख़ुदा करे उसे बाज़ार की हवा ना लगे
तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िन्दगी 'क़ैसर',
कि एक घूँट मे शायद ये बदमज़ा ना लगे
कुछ इस अदा से मेरे साथ बेवफ़ाई कर
कि तेरे बाद मुझे कोई बेवफ़ा ना लगे
वो फूल जो मेरे दामन से हो गया मंसूब,
ख़ुदा करे उसे बाज़ार की हवा ना लगे
तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िन्दगी 'क़ैसर',
कि एक घूँट मे शायद ये बदमज़ा ना लगे
क़ैसर-उल-जाफ़री एक ऍसे शायर हैं जिन्होंने मुशायरों की शोभा तो बढ़ाई ही है कई फिल्मों के गीत भी लिखे हैं। इतना ही नहीं क़ैसर साहब एक बुलंद आवाज़ के मालिक भी हैं। बड़ा आनंद आता है जब भी क़ैसर साहब की आवाज़ में ये ग़ज़ल सुनता हूँ। तो क्यूँ ना चलते चलते आप सब को भी उनकी आवाज़ से रूबरू कराता चलूँ !
चाँदनी था, कि ग़ज़ल था, कि सबा था क्या था
मैंने इक बार तेरा नाम सुना था क्या था
ख़ुदकुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा
मैंने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था
तुम तो कहते थे ख़ुदा तुमसे ख़फ़ा है क़ैसर
डूबते वक़्त इक हाथ बढ़ा था क्या था
चाँदनी था, कि ग़ज़ल था, कि सबा था क्या था
मैंने इक बार तेरा नाम सुना था क्या था
ख़ुदकुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा
मैंने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था
तुम तो कहते थे ख़ुदा तुमसे ख़फ़ा है क़ैसर
डूबते वक़्त इक हाथ बढ़ा था क्या था



















