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गुरुवार, दिसंबर 14, 2017

किसे पेश करूँ : जब साहिर ने मदन मोहन के लिए लिखे एक ही रदीफ़ पर तीन नग्मे Kise Pesh Karoon ?

ग़ज़लों को संगीतबद्ध करने में अगर किसी संगीतकार को सबसे ज्यादा महारत हासिल थी तो वो थे मदन मोहन। ग़ज़लों के सानिध्य में वो कैसे आए इसके लिए आपको उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में एक बार झाँकना होगा। मदन मोहन के पिता इराक के पुलिस विभाग में मुनीम थे। बगदाद में ही मदन मोहन का जन्म हुआ। पर जब इराक अंग्रेजों के चंगुल से निकल आजाद हुआ, मदनमोहन का परिवार बगदाद से पहले लाहौर और फिर मुंबई आ कर बस गया। 

मदन मोहन के पिता तो उस वक्त बाम्बे टॉकीज़ में नौकरी करने लगे वहीं मदन मोहन ने पढ़ाई के बाद फौज में जाना मुनासिब समझा। पर संगीत के प्रति बचपन से रुझान रखने वाले मदन मोहन को लगा कि उन्होंने अपने व्यवसाय का गलत चुनाव कर लिया है। लिहाजा फौज की नौकरी से इस्तीफा दे कर उन्होंने संगीत से जुड़कर काम करने के लिए लखनऊ की राह पकड़ी। वो वहाँ आल इंडिया रेडियो  में सहायक संगीत संयोजक का काम करने लगे। यहीं उनकी मुलाकात ग़ज़ल गायिका बेगम अख्तर और उभरते हुए गायक तलत महमूद से हुई। यही वो समय था जब ग़ज़लों को करीब से सुनने व परखने का मौका मदन मोहन को नजदीक से मिला।


यूँ तो एक शाम मेरे नाम पर मदन मोहन की संगीतबद्ध कई ग़ज़लों का जिक्र हो चुका है पर आज आपसे मैं बात करना चाहूँगा 1964 में प्रदर्शित हुई एक ऐसी फिल्म की जिसका नाम ही "ग़ज़ल" था। आगरे की सरज़मी पर रची इस कहानी में गीतों को लिखने का जिम्मा मिला था साहिर लुधियानवी को। मिलता भी ना कैसे? कहानी का नायक ही शायर जो  था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक जैसी बहर, रदीफ़ और काफिये के साथ साहिर ने इस फिल्म में दो ग़ज़लें और एक गीत लिखा। साहिर ने इन तीनों में रदीफ़ के तौर पर "किसे पेश करूँ" का इस्तेमाल किया। पर ये मदन मोहन साहब की कारीगिरी थी कि इन मिलते जुलते गीतों के लिए उन्होंने ऐसी धुन तैयार की वो सुनने में बिल्कुल अलग अलग लगते हैं।

सुनील दत्त और मीना कुमारी द्वारा अभिनीत इस प्रेम कहानी का खाका ये तीनों नग्मे खींचते से चलते हैं। जहाँ नायिका पहली ग़ज़ल में  हमदम की तलाश में अपनी भावनाएँ व्यक्त कर रही हैं तो दूसरी ग़ज़ल में उनकी गायिकी से प्रभावित होकर शायर महोदय अपने दिल में पैदा हुई हलचल की कहानी पेश कर रहे हैं। वहीं अपनी प्रेमिका से ना मिल पाने की तड़प इसी फिल्म के अन्य गीत रंग और नूर की बारात किसे पैश करूँ..  में नज़र आती है। रंग और नूर की बारात .. तो इस फिल्म का सबसे लोकप्रिय नग्मा रहा पर उसी मीटर में साहिर ने जो दो ग़ज़लें लिखी वो कम खूबसूरत नहीं थीं। तो आइए सुनें इन दोनों ग़ज़लों को लता और रफ़ी की आवाज़ में

नग़्मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूँ
ये छलकते हुए जज़्बात किसे पेश करूँ

शोख़ आँखों के उजालों को लुटाऊँ किस पर
मस्त ज़ुल्फ़ों की स्याह रात किसे पेश करूँ

गर्म सांसों में छुपे राज़ बताऊँ किसको
नर्म होठों में दबी बात किसे पेश करूँ

कोइ हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ




साहिर के खूबसूरत बोलों से मुझे सबसे ज्यादा न्याय लता की आवाज़ करती है। वैसे भी लता दी ने मदन मोहन के लिए जो गीत गाए उनकी अदाएगी बेमिसाल रही।

 

इश्क़ की गर्मी-ए-जज़्बात किसे पेश करूँ
ये सुलग़ते हुए दिन-रात किसे पेश करूँ

हुस्न और हुस्न का हर नाज़ है पर्दे में अभी
अपनी नज़रों की शिकायात किसे पेश करूँ

तेरी आवाज़ के जादू ने जगाया है जिन्हें
वो तस्सव्वुर, वो ख़यालात किसे पेश करूँ

ऐ मेरी जान-ए-ग़ज़ल, ऐ मेरी ईमान-ए-ग़ज़ल
अब सिवा तेरे ये नग़मात किसे पेश करूँ

कोई हमराज़ तो पाऊँ कोई हमदम तो मिले
दिल की धड़कन के इशारात किसे पेश करूँ

जहाँ तक रंग और नूर की बारात किसे पैश करूँ. का ताल्लुक है तो उस गीत का दर्द रफ़ी की आवाज़ में पूरी ईमानदारी से झलका था।  वैसे इन तीनों में आपको कौन सी ग़ज़ल/ गीत प्यारा लगता है?

रविवार, सितंबर 03, 2017

हसरत की वो 'हसरत' जो कभी पूरी नहीं हुई : तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी Teri Zulfon se Judai to...

सितंबर का महीना हसरत जयपुरी साहब की रुखसती का महीना है। करीब दो दशक गुजर गए उन्हें हमारा साथ छोड़े हुए। फिर भी रेडियो पर आज भी उनके गीतों की फ़रमाइशें  ख़त्म होने का नाम नहीं लेतीं। उनके गीतों को जब देखता हूँ तो मुझे लगता है कि वो आम आदमी के शायर थे जो दिल की बात बड़ी सीधी सी जुबान में कह देते थे। अब बरसात का मौसम है। नायिका को उनके आने का तकाज़ा है और हसरत की कलम चल उठती है कि जिया बेकरार है, आई बहार है आ जा मोरे साजना तेरा इंतजार है।  


इकबाल हुसैन के नाम से जन्मे हसरत, जयपुर के बाशिंदे थे। किशोरावस्था में अपने पहले प्रेम का शिकार हुए और यहीं से शायरी का कीड़ा उनके मन में कुलबुलाने लगा। उनकी पहली प्रेयसी राधा थीं जो बाजू वाले मकान के झरोखों से ताक झाँक करते हुए उनका दिल चुरा ले गयीं। उसी राधा की शान में हसरत साहब ने अपना पहला शेर कहा..

तू झरोखे से जो झांके तो मैं इतना पूछूँ
मेरे महबूब कि तुझे प्यार करूँ या ना करूँ

सन चालीस में जब वे मुंबई आए तो नौकरी की तलाश में बस कंडक्टर बन गए। पर इस उबाऊ सी नौकरी में भी उन्होंने रस ढूँढ ही लिया। ग्यारह रुपये माहवार की नौकरी में भी जब खूबसूरत नाज़नीनें उनकी बस में चढ़तीं तो वे उनके हुस्न से इतने प्रभावित हो जाते कि उनसे टिकट के पैसे माँगना भी उन्हें गवारा ना होता था। वो कहा करते कि वे सारी कन्याएँ उनके लिए प्रेरणा का काम करती थीं जिनकी शान में वो मुशायरों में अपने अशआर गढ़ते थे। ऐसी ही किसी मुशायरे में पृथ्वीराज कपूर ने उन्हें देखा और फिर उनकी सिफारिश राज कपूर तक पहुँच गई। एक बार जब वो शंकर, जयकिशन, शैलेंद्र की चौकड़ी का हिस्सा बने तो उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा।



अब प्यार तो हसरत ने किया पर उसके मुकम्मल होने की 'हसरत' रह ही गयी। पर राधा को वो कभी भूले नहीं। उनका सदाबहार गीत ये मेरा प्रेमपत्र पढ़ कर के कि तुम नाराज ना होना कि तुम मेरी ज़िंदगी हो.. भी राधा को ही समर्पित था। उनका इस गीत के अंतरे में चाँद में दाग और सूरज में आग का हवाला देते हुए अपने महबूब को उनसे भी खूबसूरत बताने का अंदाज़ निराला था।

रोज़मर्रा के जीवन से गीत का मुखड़ा बना लेने  का हुनर भगवान ने उन्हें खूब बख्शा था। कहते हैं कि एक बार शंकर जयकिशन के साथ विदेश में उन्होंने एक महिला को बेहद चमकीली सी ड्रेस में देखा और उनके मुख से बेसाख़्ता  ये जुमला निकला कि बदन पे सितारे लपेटे  हुए ओ जाने तमन्ना किधर जा रही हो.. और फिर तो वो  गीत बना और इतना लोकप्रिय भी हुआ। ऐसे ही उनके बेटे के जन्म पर खुशी खुशी वो कह पड़े कि तेरी प्यारी प्यारी सूरत को किसी की नज़र ना लगे चश्मेबद्दूर..। बाद में ये पंक्तियाँ  भी एक मशहूर गीत का मुखड़ा  बनीं।

आज उन्हीं हसरत जयपुरी साहब का एक गाना मुझे याद आ रहा है फिल्म जब प्यार किसी से होता है से जो 1961 में रिलीज़ हुई थी। निर्माता निर्देशक नासिर हुसैन ने अपनी इस पहली फिल्म के सारे गाने रफ़ी और लता से गवाए  थे। फिल्म तो हिट हुई ही थी पर साथ ही इसके गाने जिया हो जिया हो जिया कुछ बोल दो, सौ साल पहले मुझसे तुमसे प्यार था और तेरी जुल्फों से ....... खासे लोकप्रिय हुए थे। 

इन गीतों में मुझे जो सबसे पसंद रहा वो था  तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी क़ैद माँगी थी, रिहाई तो नहीं माँगी थी..। बड़ा प्यारा लगता था इसे गुनगुनाना। क़ैद के साथ रिहाई का जिक्र होते ही दिल में दर्द वाला तार ख़ुद ब खुद झंकृत हो जाता था और आँखो की छलकती मय वाले  शेर के तो क्या कहने! वैसे तो आपने इस गीत के तीन अशआर सुने होंगे पर एक चौथा भी शेर लिखा था हसरत साहब ने जो फिल्माया नहीं गया।

उन दिनों देव आनंद साहब काफी सजीले नौजवान हुआ करते थे। आशा पारिख जी के साथ उन पर ये गीत फिल्माया गया था। गीत की परिस्थिति कुछ यूँ थी कि एक महफिल सजी है जिसमें अपने साथ हुए धोखे को आशा पारिख एक छोटी सी नज़्म के सहारे नायक के दोहरे चरित्र पर तंज़ कसती हैं और फिर जवाब में देव साहब ये गीत गा उठते हैं। 

तो आइए शंकर जयकिशन की धुन और हसरत साहब की लेखनी के इस गठजोड़ को रफ़ी की आवाज़ में फिर याद कर लेते  हैं आज की इस शाम को...



इस हिरसो-हवस की दुनिया में
अरमान बदलते देखे हैं
धोख़ा है यहाँ, लालच है यहाँ
ईमान बदलते देखे हैं
दौलत के सुनहरे जादू से
ऐ दिल ये तड़पना अच्छा है
चाँदी के खनकते सिक्कों पर
इंसान बदलते देखे  हैं ....



तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी, रिहाई तो नहीं माँगी थी

मैंने क्या ज़ुल्म किया, आप खफ़ा हो बैठे
प्यार माँगा था, खुदाई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी...

मेरा हक़ था तेरी आँखों की छलकती मय पर
चीज़ अपनी थी, पराई तो नहीं माँगी थी

क़ैद माँगी थी...

अपने बीमार पे, इतना भी सितम ठीक नहीं
तेरी उल्फ़त में, बुराई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी...

चाहने वालों को कभी, तूने सितम भी ना दिया
तेरी महफ़िल से, रुसवाई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी...

गुरुवार, अक्टूबर 06, 2016

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये... घुम भूलेछी Hum Bekhudi mein tumko .. Ghum bhulechhi nijhum

सन 1958 में इक फिल्म आई थी काला पानी। नवकेतन का बैनर था और फिल्म के संगीतकार थे, देव आनंद के दिलअजीज़ सचिन देव बर्मन। बतौर नायक देव आनंद ने इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता था। फिल्म का संगीत भी काफी मशहूर हुआ था। ये वो दौर था जब सचिन दा और लता दी के बीच की अनबन ज़ारी थी। यही वज़ह थी  कि फिल्म में नायिका के सभी गीत आशा जी ने गाए थे। देव आनंद और मधुबाला की मीठी नोंक झोंक से भरा  गीत अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना को तो लोग आज भी याद करते हैं। वहीं नज़र लागी राजा तोरे बँगले पर..होठों पर एक मुस्कुराहट जरूर ले आता है। पर इस फिल्म का सबसे शानदार नग्मा था मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में। याद आया ना आपको हाँ वही हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये


पर जानते हैं इस गीत की धुन सचिन दा ने कब रची थी? फिल्म के रिलीज़ होने के करीब एक साल पहले। दरअसल बंगाल में ये परंपरा रही है कि वहाँ के संगीतकार हर साल दुर्गा पूजा के समय अपनी नई धुनों के साथ एक एलबम जरूर निकालते थे। सन 1957 के दशहरे में रिलीज़  किये गए एलबम के  एक गीत के बोल थे ..घुम भूलेची निझुम इ निशिथे जेगे थाकी और इन्हें लिखा था गौरीप्रसाद मजुमदार ने।सचिन दा ने अपनी इस  संगीतबद्ध रचना को खुद ही आवाज़ दी थी । तो सचिन दा की आवाज़ में इस गीत  को सुनने के पहले क्यूँ ना इस गीत के भावों से आपका परिचय करा दिया जाए?

घुम भूलेछी  निझुम इ निशिथे.. जेगे थाकी
आर आमरी मोतोन, जागे नींदे, दूती पाखी, घुम्म....


पिछले कई दिनों से मैं नींद को भूल सा गया हूँ, रात भर जागता रहता हूँ ठीक उसी तरह जिस तरह प्यार में डूबे ये दो पंक्षी सूने आकाश को ताकते हुए जग रहे हैं।

कोथा दिये चिले, आसिबे गो फीरे
चाँद जाबे दूरे, आकाशरो तीरे
ताय, तोमारे आमि, बारे बारे पीछू डाकी
घुम भूलेची..घुम्म...


तुम कहाँ चले गए लौटने का वादा करके! देखो अब तो चाँद भी खिसकता हुआ आकाश के कोने में जा चुका है और उसके साथ भटकता मेरा मन तुम्हें बार बार पुकार रहा है

ऐके ऐके ओइ डूबे गेलो तारा
तबू तूमी ओगो दिले ना तो शारा
हाय एलेया जेनो, आलो होए, दिलो फांकी
घुम भूलेची..घुम्म...


एक एक कर सारे तारे डूबने लगे हैं और सुबह के धुँधलके में मैं तुम्हें ढूँढ रहा हूँ। रात के इस अंतिम प्रहर में मृगतृष्णा सी तुम्हारी झलक का छलावा रोशनी के आने के बाद टूट चुका है।

  

काला पानी के गीत में सचिन दा ने इसी धुन का इस्तेमाल किया। अपनी किताब सरगमेर निखद में वे कहते हैं "मैंने इस गीत का मुखड़ा ग़ज़ल की तरह और अंतरा गीत की तरह रचा। मैं जैसा चाहता था रफ़ी ने इस गीत को वैसा ही निभाया।"

सच, रफ़ी साहब ने मजरूह सुल्तानपुरी के बोलों पर जिस तरह इस गीत की अदायगी की उसके लिए प्रशंसा के जितने भी शब्द लिखे जाएँ, कम होंगे। नशे में अपना ग़म गलत करते देव आनंद के दिल की करुण पुकार को पर्दे पर रफ़ी ने अपनी आवाज़ से जीवंत कर दिया था। सचिन दा ने बंगाली गीत में शुरुआत सरोद से की थी पर काला पानी में रफ़ी की आवाज़ के साथ नाममात्र का संगीत रखा। सचिन दा के "घुम्म.." के बाद की कलाकारी को रफ़ी आलाप के साथ "हम.." के बाद ले आए। "चले गए" को वो दुबारा जिस तरह गाते हैं तो कलेजा मुँह को आ जाता है। मजरूह का लिखा दूसरे अंतरा मुझे गीत की जान लगता है खासकर तब जब वो कहते हैं डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले...शीशे में आपको भी उतारे चले गये

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये
साग़र में ज़िन्दगी को उतारे चले गये

देखा किये तुम्हें हम, बनके दीवाना
उतरा जो नशा तो, हमने ये जाना
सारे वो ज़िन्दगी के सहारे चले गये
हम बेखुदी में...

तुम तो ना कहो हम, खुद ही से खेलें
डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले
शीशे में आपको भी उतारे चले गये
हम बेखुदी में...

 तो आइए एक बार फिर सुनते हैं रफ़ी साहब के इस गीत को..

रविवार, मई 31, 2015

आपके हसीन रुख पे आज नया नूर है..कितना जानते हैं आप गीतकार अनजान को ?

पिछले पन्द्रह बीस दिनों से मुल्क से बाहर सैर सपाटे पर गया हुआ था। इसीलिए इस ब्लॉग पर शांति छाई रही। जाने के पहले गीतकार अनजान के बारे में लिखने का मन था। जाने के पहले व्यस्तता इतनी रही कि उन पर शुरु किया गया आलेख पूरा ना कर सका।

बचपन में जब हम रेडियों सुनते थे और उद्घोषक गीतकार के रूप में अनजान का नाम बताते थे तो ऐसा लगता था मानो इस गीत के गीतकार का नाम उद्घोषक को भी पता नहीं है। बाद में ये खुलासा हुआ कि अनजान ख़ुद किसी गीतकार का नाम है। वैसे अनजान , अनजान के नाम से पैदा नहीं हुए थे। उनका वास्तविक नाम लालजी पांडे था और उनका जन्म बनारस में हुआ था। अनजान को शुरु से ही कविता पढ़ने औरलिखने  का शौक़ था।  बड़े बुजुर्ग कहा करते कि बनारस में रहे तो एक दिन हरिवंश राय 'बच्चन' जैसी काव्यात्मक ऊँचाइयों को छू पाओगे। ख़ैर ये तो हो ना सका पर बच्चन खानदान से उनका नाता बरसों बाद किसी और रूप मे जाकर जरूर जुड़ा।

पचास के दशक की बात है। उन दिनों ही गायक मुकेश बनारस के क्लार्क होटल में पधारे। होटल के मालिक ने उन्हें अनजान की कविताएँ सुनने का आग्रह किया। मुकेश ने सुना भी और कहा कि मुंबई आकर बतौर गीतकार भाग्य आजमाओ। ख़ैर बात आई गई हो गयी।

अनजान ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से बी कॉम की डिग्री ली थी। इरादा था कि बैंक में नौकरी करेंगे। युवावस्था में ही अनजान को दमे की बीमारी ने जकड़ लिया।। डॉक्टर ने कहा कि अगर अनजान बनारस जैसी सूखी जलवायु वाले इलाके में रहेंगे तो ये रोग बढ़ता ही जाएगा और ज़िदगी भी ख़तरे में पड़ सकती है। साथ ही ये सलाह भी दी कि  आपको किसी ऐसी जगह जाना होगा जहाँ पास में समुद्र तट हो। तब उन्हें गायक मुकेश की बात याद आई और वो अकेले ही रोज़ी रोटी की तलाश में मुंबई चले आए। मु्बई में मुकेश ने उनकी मुलाकात  प्रेमनाथ से करायी जो उस वक़्त Prisoner of Golconda (1956) बना रहे थे। अनजान को मिला ये पहला काम था पर दुर्भाग्यवश फिल्म भी फ्लॉप हुई और उसका संगीत भी। अनजान के लिए ये कठिन घड़ी थी। उनके बेटे समीर उन दिनों की बात करते हुए कहते हैं।

"उस दौर में हालत ये थी कि पिताजी ने कई बार किसी बड़ी इमारत में सीढ़ियों की नीचे वाली जगह में  रातें बिताईं। उनके पास तब दो जोड़ी कपड़े हुआ करते थे। वे कुएँ से पानी खींचते और वहीं नहाते। एक कपड़ा वहीं धुलता और दूसरा वे पहनते।"

अगले सात साल उनका गुजारा छोटी मोटी फिल्मों में काम और ट्यूशन कर चला। फिर 1963 में बनारस के निर्माता निर्देशक त्रिलोक जेटली प्रेमचंद के उपन्यास पर आधारित अपनी  फिल्म गोदान के लिए उत्तर प्रदेश की भाषा को समझने वाला गीतकार ढूँढ रहे थे और उन्होंने इसके लिए अनजान को चुना।  इस तरह अनजान को एक और बड़े कैनवास पर काम करने का मौका मिला। गोदान भी नहीं चली पर उसके गीतों पर लोगों का ध्यान जरूर गया।  भोजपुरी रंग में रँगा मोहम्मद रफ़ी का गाया वो मस्ती भरा नग्मा तो याद होगा ना आपको

पिपरा के पतवा सरीखे डोले रे मनवा कि हियरा में उठत हिलोल,
पूरवा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा कि चल अब देसवा की ओर

अनजान का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ था। उन्हें अपने अगले बड़े मौके के लिए छः सालों का और इंतज़ार करना पड़ा। जी पी सिप्पी की फिल्म बंधन (1969) के लिए उन्हें नरेंद्र बेदी कल्याण जी आनंद जी से मिलवाने ले गए। अनजान ने उस फिल्म के लिए बिन बदरा के बिजुरिया कैसे चमके जैसा लोकप्रिय गीत लिखा। ये गीत उनकी ज़िंदगी के लिए अहम पड़ाव था क्यूँकि इस गीत के माध्यम से वो उस संगीतकार जोड़ी से मिले जिन्होंने सत्तर के दशक में उनके कैरियर की दशा और दिशा तैयार कर दी।

पर आज मैं आपको अनजान का वो गीत सुनवाने जा रहा हूँ जो उन्होंने साठ के दशक में ओ पी नैयर साहब के लिए लिखा था। बहारे फिर भी आएँगी का ये गीत नैयर साहब के साथ अनजान का इकलौता गीत था। अनजान के लिए ये नग्मा एक चुनौती के रूप में था क्यूँकि उनकी पहचान तब तक ठेठ हिंदी और पुरवइया गीतों के गीतकार के रूप में बन रही थी। उस वक़्त के तमाम नामी गीतकार उर्दू जुबाँ पर अच्छा खासा दखल रखते थे सो इस गीत के लिए अनजान ने उसी अनुरूप अपना अंदाज़ बदला।

क्या रोमांटिक गीत लिखा था अनजान साहब ने. और उतनी ही खूबसूरत धुन बनाई ओ पी नैयर साहब ने। गीत के बोलों के बीच बजती बाँसुरी और इंटरल्यूड्स का पियानो और इन सबके बीच रफ़ी साहब की इत्ती प्यारी रससिक्त आवाज़ जिसमें नायिका को छेड़ती हुई एक चंचलता है और साथ ही प्रणय का छुपा छुपा सा आमंत्रण। ये गीत ऐसा है जिसे गुनगुनाने और सुनने से ही मन में एक ख़ुमार सा छा जाता है।

आपके हसीन रुख पे आज नया नूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है
आपकी निगाह ने कहा तो कुछ ज़ुरूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है

खुली लटों की छाँव में खिला-खिला ये रूप है
घटा से जैसे छन रही सुबह-सुबह की धूप है
जिधर नज़र मुड़ी उधर सुरूर ही सुरूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है

झुकी-झुकी निगाह में भी है बला की शोखियाँ
दबी-दबी हँसी में भी तड़प रही हैं बिजलियाँ
शबाब आपका नशे में खुद ही चूर-चूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है

जहाँ-जहाँ पड़े क़दम वहाँ फिजा बदल गई
कि जैसे सर-बसर बहार आप ही में ढल गई
किसी में ये कशिश कहाँ जो आप में हुज़ूर है
मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कुसूर है



क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कोई ऐसा चेहरा सामने आ गया हो जिससे नज़रें हटाने का दिल ही नहीं करे और फिर बरबस ये गीत याद आ गया हो.. ख़ैर इसमें ना आपका कुसूर है ना ऐसे किसी चेहरे का, गलती तो सिर्फ उन्हें बनाने वाले सृष्टिकर्ता की है जो आँखों को ऐसा बेबस कर देते हैं कि वे उन्हें निहारते हुए  झपकने का नाम ही नहीं लेतीं :)।

अनजान के गीतों की यात्रा अभी खत्म नहीं हुई। इस आलेख की अगली कड़ी में आपसे साझा करूँगा संघर्ष के इन दिनों से शोहरत की बुलंदियों तक तय किया गया अनजान का सफ़र..

शनिवार, जुलाई 26, 2014

मदन मोहन के संगीत में रची बसी वो शाम : आप को प्यार छुपाने की बुरी आदत है... Aap ko pyar chhupane ki buri aadat hai

पिछले हफ्ते की बात है। दफ़्तर के काम से रविवार की शाम पाँच बजे दिल्ली पहुँचा। पता चला पास ही मैक्स मुलर मार्ग पर स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में संगीतकार मदनमोहन की स्मृति में संगीत के कार्यक्रम का आयोजन हो रहा है। कार्यक्रम साढ़े छः बजे शुरु होना था पर दस मिनट की देरी से जब हम  पहुँचे तो वहाँ तिल धरने की जगह नहीं थी। श्रोताओं में ज्यादातर चालीस के ऊपर वाले ही बहुमत में थे पर पुराने गीतों की महफिल में ऐसा होना लाज़िमी था। कुछ मशहूर हस्तियाँ जैसे शोभना नारायण भी दर्शक दीर्घा में नज़र आयीं।


उद्घोषकों ने मदनमोहन के संगीतबद्ध गीतों के बीच बगदाद में जन्मे इस संगीतकार की ज़िंदगी के छुए अनछुए पहलुओं से हमारा परिचय कराया। मुंबई की आरंभिक पढ़ाई, देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में रहना, पिता के आग्रह पर सेना में नौकरी करना, उनका कोपभाजन बनते हुए भी फिल्मी दुनिया में अपने बलबूते पर संगीतकार की हैसियत से पाँव जमाना, लता के साथ उनके अद्भुत तालमेल, फिल्मी ग़ज़लों को लयबद्ध करने में उनकी महारत, उनका साहबों वाला रोबीला व्यक्तित्व,  हुनर के हिसाब से उनको लोकप्रियता ना मिलने का ग़म और शराब में डूबी उनकी ज़िदगी के कुछ आख़िरी साल ..उन ढाई घंटों में उनका पूरा जीवन वृत आँखों के सामने घूम गया।

पर इन सबके बीच उनके कुछ मशहूर और कुछ कम बज़े गीतों को सुनने का अवसर भी मिला। ऐसे कार्यक्रमों में कितना भी चाहें आपके सारे पसंदीदा नग्मों की बारी तो नहीं आ पाती। फिर भी 'ना हम बेवफ़ा है ना तुम बेवफ़ा हो...', 'लग जा गले से हसीं रात हो ना हो...', 'तुम्हारी जुल्फों के साये में शाम कर दूँगा..', 'झुमका गिरा रे...' जैसे सदाबहार नग्मों को सुनने का अवसर मिला तो वहीं 'इक हसीं शाम को दिल मेरा खो गया...',  'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है...', 'नैनों में बदरा छाए...', 'ज़रा सी आहट होती है....', 'कोई शिकवा भी नहीं कोई भी शिकायत भी नहीं...' जैसे गीतों को live सुन पाने की ख़्वाहिश..ख़्वाहिश ही रह गयी।

इन्हीं गीतों के बीच  एक युगल गीत भी पेश किया गया जिसे कई सालों बाद अचानक और सीधे आर्केस्ट्रा के साथ मंच से सुनने में काफी आनंद आया। एक हल्की सी छेड़छाड़ और चंचलता लिए इस गीत को 1965 में आई फिल्म "नीला आकाश" में मोहम्मद रफ़ी और आशा ताई ने गाया था। इस गीत को लिखा था राजा मेहदी अली खाँ ने। मदनमोहन और राजा साहब की संगत ने हिंदी फिल्म संगीत को कितने अनमोल मोती दिए वो तो आप सब जानते ही हैं। राजा साहब से जुड़े इस लेख में आपको पहले ही उनके बारे में विस्तार से बता चुका हूँ। उसी लेख में इस बात का भी जिक्र हुआ था कि किस तरह उन्होंने हिंदी फिल्मी गीतों में 'आप' शब्द का प्रचलन बढ़ाया। आज जिस गीत की बात मैं आपसे करने जा रहा हूँ वो भी इसी श्रेणी का गीत है।

देखिए तो इस खूबसूरती से राजा साहब ने गीत की पंक्तियाँ गढ़ी हैं कि हर अगली पंक्ति पिछली पंक्ति का माकूल जवाब सा लगती है।
आप को प्यार छुपाने की बुरी आदत है
आप को प्यार जताने की बुरी आदत है

आपने सीखा है क्या दिल के लगाने के सिवा,
आप को आता है क्या नाज दिखाने के सिवा,
और हमें नाज उठाने की बुरी आदत है

किसलिए आपने शरमा के झुका ली आँखें,
इसलिए आप से घबरा के बचा ली आँखें,
आपको तीर चलाने की बुरी आदत है

हो चुकी देर बस अब जाइएगा, जाइएगा,
बंदा परवर ज़रा थोड़ा-सा क़रीब आइएगा,
आपको पास न आने की बुरी आदत है


तो आइए सुनते हैं राग देस पर आधारित इस मधुर युगल गीत को

 


वैसे तो सर्वव्यापी धारणा रही है लड़कों में अपने प्यार का इज़हार करने का उतावलापन रहता है, वहीं लड़कियाँ शर्म ओ हया से बँधी उसे स्वीकार करने में झिझकती रही हैं। पर वक़्त के साथ क्या आप ऐसा महसूस नहीं  करते कि मामला इतना स्टीरियोटाइप भी नहीं रह गया है। पहल दोनों ओर से हो रही है। सोच रहा हूँ कि अगर आज गीतकार को ये परिस्थिति दी जाए तो वो क्या लिखेगा। है आपके पास कोई कोरी कल्पना ?

सोमवार, जून 23, 2014

ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए..मज़रूह की यादों में सचिन दा Aise to na Dekho .. Majrooh remembers S D Burman

पिछली पोस्ट में तीन देवियाँ फिल्म के गीत के बारे में चर्चा करते वक़्त बात हुई थी मज़रूह साहब के बारे में। आज आपसे गुफ़्तगू होगी इसी फिल्म के एक और गीत के बारे में। पर रफ़ी साहब के गाए इस नाज़ुक से नग्मे का जिक्र करूँ, उससे पहले आपको ये बताना चाहूँगा कि मज़रूह साहब कैसे याद करते थे सचिन देव बर्मन साहब के साथ गुजरे उन सालों को।

आपको बता ही चुका हूँ मज़रूह कम्यूनिस्ट विचारधारा से काफी प्रभावित थे। सचिन दा से उनकी पहली मुलाकात वामपंथियों के एक सम्मेलन में कोलकाता में हुई थी। सचिन दा ने मज़रूह से पहले साहिर लुधयानवी के साथ कुछ फिल्मों में काम किया। फिर किसी बात पर उनकी साहिर से अनबन हो गई तो उन्होंने मज़रूह को फिल्म Paying Guest के गाने लिखने के लिए बुलाया। 

मज़रूह को परिस्थिति दी गयी कि एक वकील अपनी महबूबा के लिए गा रहा है। मज़रूह ने सोचा वकील है थोड़ा सौम्य होगा तो उसी मिजाज़ का गाना लिख कर दे दिया। निर्देशक उनके इस प्रयास से तनिक भी खुश नहीं हुए कहा पहले फिल्म देखिए फिर गाना लिखिए। मज़रूह ने फिल्म देखी और अपना सिर ठोक लिया। उन्होंने कहा कि आपने मुझसे वकील के लिए गाना लिखने को क्यूँ कहा? सीधे कहते कि एक लोफ़र के लिए गाना लिखना है जो इक लड़की के पीछे पड़ा है और तब मज़रूह ने लिखा माना जनाब ने पुकारा नहीं, क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं जो बेहद लोकप्रिय हुआ।

बिमल दा की फिल्म में मज़रूह ने सचिन दा के लिए एक गाना लिखा जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये...। इस कालजयी गीत (जो मुझे बेहद प्रिय है) के बारे में मैंने पहले यहाँ भी लिखा था पर फिल्म में इस गीत को फिल्माने पर विवाद खड़ा हो गया। फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से ये गीत नायक नायिका द्वारा टेलीफोन करते हुए फिल्माया जाना था पर विमल दा जैसे यथार्थवादी निर्देशक फिल्म के नाम पर इतनी सिनेमेटिक लिबर्टी लेने के लिए तैयार नहीं थे। मज़रूह बताते हैं आमतौर पर डरपोक समझे जाने वाले सचिन दा इस बार बहादुरी से अड़ गए और थोड़ी देर इधर उधर टहलने के बाद बिमल दा से बोले "अगर तुम इस फिल्म में मेरा गाना नहीं लेगा तो हम पिक्चर नहीं करेगा"। सचिन दा के इस रूप को देखने के बाद बिमल दा को उनकी बात माननी पड़ी और इतिहास गवाह है कि इस गीत ने कितनी वाहवाहियाँ बटोरीं।

सचिन दा के बारे में मशहूर था कि वो अपने यहाँ आने वालों को चाय नाश्ते के लिए ज़्यादा नहीं पूछते थे। इसी मद्देनज़र मज़रूह साहब ने एक किस्सा बयाँ किया था। वाक़या ये था कि
एक बार सचिन दा , उनका सहायक, साहिर और मज़रूह गाड़ी से चर्चगेट से कहीं जा रहे थे। रास्ते में सचिन दा ने एक केला निकाला और खाने लगे। फिर उन्होंने साहिर से पूछा "कोला लेगा"? साहिर और मज़रूह अचरज़ में पड़ गए कि कहाँ से सचिन दा का दरिया - ए  -रहमत जोश मारने लगा ? अभी दोनों इसी असमंजस में थे कि सचिन दा ने कहा ड्राइवर गाड़ी रोको और फिर साहिर की ओर मुख़ातिब होकर बोले जाओ ओ दिखता है... जा कर ले लो।

सचिन दा के बारे में मज़रूह की याद की पोटलियों से निकले कई किस्से और भी हैं पर वो फिर कभी। आइए अब बात की जाए तीन देवियों के इस बेहद प्यारे से नग्मे की।

 
सचिन दा इस बाद के हिमायती थे कि गीत में उतना ही संगीत दिया जाए जितनी जरूरत हो। कहीं बेख्याल हो कर कहीं छू लिया किसी ने में आप इसका नमूना देख ही चुके हैं पर जहाँ तक ऐसे तो ना देखो की बात है यहाँ सचिन दा की शुरुआती धुन और इंटरल्यूड्स गीत के मूड में और जान डाल देते हैं। राग ख़माज पर आधारित इस गीत को हिंदुस्तानी ज़ुबान की जिस रससिक्त चाशनी में घोला है मज़रूह ने कि बोलों को पढ़कर ही मन में एक ख़ुमार सा छाने लगता है। अब इसी अंतरे को लीजिए यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें..बढ़ के बेखुदी हसीं गेसू खोलें..खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

अब आप ही बताइए काजल से सजी आँखों के बीच कोई अपनी खूबसूरत लटों को लहरा दे तो आसमान में बदली छाए ना छाए दिल तो इन काली घटाओं के आगोश में भींग ही उठेगा ना। रफ़ी ने इसी चाहत को गीत के हर अंतरे में अपनी अदाएगी के द्वारा इस तरह उभारा मानो वो ख़ुद मदहोशी की हालत में गाना गा रहे हों। तो आइए आज की शाम जाम के तौर पर इस गीत का रसपान किया जाए


ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए
ख़ूबसूरत सी कोई हमसे ख़ता हो जाए

तुम हमें रोको फिर भी हम ना रुकें
तुम कहो काफ़िर फिर भी ऐसे झुकें
क़दम-ए-नाज़ पे इक सजदा अदा हो जाये

ऐसे तो न देखो....

यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें
बढ़ के बेखुदी हसीं गेसू खोलें
खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

ऐसे तो न देखो.....

हम तो मस्ती में जाने क्या क्या कहें
लब-ए-नाज़ुक से ऐसा ना हो तुम्हें
बेक़रारी का गिला हम से सिवा हो जाये
ऐसे तो न देखो
.....

फिल्म तीन देवियाँ में ये गीत देव आनंद और नंदा पर फिल्माया गया था।

शनिवार, जून 14, 2014

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने... जब मज़रूह की ग़ज़ल परवान चढ़ी रफ़ी की आवाज़ में (Mazrooh, Rafi in Teen Deviyan)

पिछले हफ्ते गुजरे सालों के सुपरस्टार देवानंद पर फिल्माए गानों को देख रहा था। साठ के दशक में किशोर को देव आनंद की आवाज़ का पर्याय माना जाने लगा था , पर अगर गौर किया जाए तो इसी दौरान मोहम्मद रफ़ी को भी पर्दे पर देव आनंद की आवाज बनने के मौके मिले जिन्हें उन्होंने खूबसूरती से निभाया भी। ऐसी ही एक फिल्म थी 1965 में प्रदर्शित हुई 'तीन देवियाँ' जिसके संगीतकार थे सचिन देव बर्मन और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी। फिल्म तो निहायत औसत दर्जे की थी पर इसका संगीत इतना मशहूर हुआ कि फिल्म को हिट करा गया।


मज़रूह साहब कमाल के गीतकार थे। अब आप ही बताइए कि जिस शख़्स ने 1946 में 'शाहजहाँ' के गीतों को लिख कर शोहरत पाई हो और जो उसके पाँच दशकों के बाद भी 'क़यामत से क़यामत तक' और 'जो जीता वही सिंकदर' जैसी फिल्मों के गीतों को लिखकर युवा दिलों पर राज करता रहा ऐसी उपलब्धि उनसे पहले किस गीतकार के हाथ लगी थी? यही वज़ह थी कि किसी गीतकार को अगर फिल्म जगत का सबसे बड़ा 'दादा साहब फालके पुरस्कार' सबसे पहले मिला तो वो मज़रूह साहब ही थे।

पर वास्तव में मज़रूह साहब को अंत तक इस बात का मुगालता रहा कि पुरस्कार मिला भी तो गीतकार की हैसियत से जबकि उनका सपना हमेशा अपने समकालीन फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तरह एक प्रतिष्ठित ग़ज़लकार बनने का ही था। चालीस के दशक में वो मुंबई एक मुशायरे में शिरक़त करने ही आए थे और उनकी ग़ज़लों से प्रभावित हो कर एक निर्माता नेजब उन्हें गीतकार बनने का मौका दिया तो उन्होंने उसे ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि ये इज़्ज़त की नौकरी नहीं है। पर जिगर मुरादाबादी के ये समझाने पर कि बतौर जीविका चलाने के लिए तुम ये काम करो, बाकी ग़ज़लें लिखते रहो....वो मान गए। पचास के दशक के बाद से ये धारदार कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा को कार्यान्वित ना होते देख उसमें सक्रिय भागीदारी से तो विमुख हो ही गया था, साथ ही वक़्त के साथ ग़ज़लों से भी दूर होता चला गया।

गीतकार के रूप में इतनी सफलता हाथ लगी कि उन्हें अपने हुनर पर और समय देने का अवसर ही नहीं मिला। पर जब जब फिल्मों में ग़ज़ल लिखने का उन्हें मौका मिला उन्होंने अपना कौशल दिखाने में कोताही नहीं की। अब तीन देवियाँ फिल्म के इस गीत को लें क्या मतला (प्रारंभिक शेर) लिखा था मज़रूह ने

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने

मैं तो कहता हूँ बस इसी शेर को गुनगुनाते हुए घंटों निकालें जा सकते हैं। कितनी आम सी बात को इस करीने से पकड़ा मज़रूह साहब ने कि तन मन गुदगुदा उठे। वैसे बाकी के मिसरे भी अच्छे भले हैं और रफ़ी की आवाज़ का साथ पाकर और फड़क उठे हैं।

वैसे मज़रूह अगर सामने होते तो एक बात जरूर पूछता उनसे जब गाना देव आनंद गा रहे थे तो फिर चौथे मिसरे में 'किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने' कैसे कह गए? कोई स्त्रीसूचक शब्द जैसे महज़बीं/दिलनशीं और मुनासिब होता। शायद शेर के बहर यानि मीटर की बंदिशों को तोड़ना उन्हें गवारा ना लगा हो।

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने , कहीं बेख़याल होकर

मेरे दिल मैं कौन है तू, कि हुआ जहाँ अँधेरा
वहीं सौ दिये जलाये, तेरे रुख़1 की चाँदनी ने
 
कभी उस परी का कूचा, कभी इस हसीं की महफ़िल
मुझे दरबदर फिराया, मेरे दिल की सादगी ने

है भला सा नाम उसका, मैं अभी से क्या बताऊं
किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने

अरे मुझपे नाज़ वालों, ये नयाज़मन्दियाँ2 क्यों
है यही करम तुम्हारा, तो मुझे ना दोगे जीने

कई ख्वाब.....कहीं बेख़याल होकर

1. चेहरा, 2.अहसान


सचिन देव बर्मन के साथ इसी फिल्म में मजरूह ने एक और प्यारा गीत लिखा था जो मुझे इससे भी प्यारा लगता है। पर अभी मैं आपको इस गीत की ख़ुमारी से जगाना नहीं चाहता तो उस गीत की बातें अगली प्रविष्टि में।

शुक्रवार, अप्रैल 04, 2014

तुम्हारी जुल्फ के साये में शाम कर लूँगा..कैसे कह पाए कैफ़ी अपनी पहली ग़ज़ल ? Tumhari Zulf ke saaye..Kaifi Azmi

साठ के दशक में एक फिल्म आयी थी नौनिहाल। संगीतकार थे मदनमोहन। इस फिल्म के सारे गीत कैफ़ी आज़मी ने लिखे थे।  आज भी कैफ़ी आज़मी की पहचान गीतकार के बजाए एक शायर के रूप में ज्यादा है। पर काग़ज़ के फूल से ले कर अर्थ तक जितनी भी फिल्मों में कैफ़ी साहब ने लिखा, उनका काम सराहा गया। लोग उनकी तुलना साहिर से करते हैं। साहिर और कैफ़ी दोनों ही कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित थे। जहाँ साहिर ने फिल्मी गीतों में भी अपनी राजनीतिक सोच को व्यक्त किया वहीं कैफ़ी अपनी विचारधारा को अपनी शायरी की जुबान बनाते रहे पर फिल्मी गीतों में अपने लेखन को उन्होंने इस सोच से परे रखा। इससे पहले कि मैं आपसे नौनिहाल की इस ग़ज़ल की चर्चा करूँ, कैफ़ी साहब की ज़िंदगी से जुड़ा एक वाक़या आपसे बाँटना चाहूँगा।


एक इंसान.शायर कैसे बनता है ये हर काव्य प्रेमी जानना चाहता है। अब कैफ़ी साहब को ही ले लीजिए। उनके अब्बाजान ख़ुद तो शायर नहीं थे पर उन्हें कविता की पूरी समझ थी। उनसे बड़े तीनों भाई शायरी के बड़े उस्ताद थे। छुट्टियों में वो जब घर आते तो सारा कस्बा उनको सुनने उमड़ पड़ता। बालक कैफ़ी जब अपने भाइयों की वाहवाही सुनते तो उन्हें लगता कि क्या मैं भी कभी इनकी तरह शेर कह पाऊँगा। दुख की बात ये थी की इन महफिलों में उन्हें ज्यादा देर बैठना ही नसीब न होता था। उनके पिता उन्हें जब तब पान बनवाने का काम थमा कर वहाँ से भगा देते थे।

कैफ़ी के पिता जब बहराइच में थे तो वहाँ एक तरही मुशायरा हुआ। तरह थी (Word pattern for Qafiya & Radeef) मेहरबाँ होता, राजदाँ होता...कैफ़ी साहब को मौका मिला तो उनके मन में बहुत दिनों से जो चल रहा था वो शेर की शक़्ल में बाहर आ गया.. उन्होंने पढ़ा

वह सबकी सुन रहे हैं,सबको दाद ए शौक़ देते हैं
कहीं ऐसे में मेरा किस्सा ए गम बयाँ होता

लोगों ने तारीफ़ की  कि बड़ी अच्छी याददाश्त है, क्या बढ़िया ढंग से पढ़ते हो। दरअसल सब यही सोच रहे थे कि  कैफ़ी ने अपने भाईयों की ग़ज़ल उड़ाकर अपने नाम से यहाँ पढ़ दी है। जब उनके पिता ने भी यही शक़ ज़ाहिर किया तो  कैफ़ी फूट फुट कर रो पड़े। सब लोगों ने कहा कि अगर तुमने ये ग़ज़ल लिखी है तो तुम्हें एक इम्तिहान देना पड़ेगा। कैफ़ी साहब को मिसरा (शेर की एक पंक्ति) थमा दिया गया ''इतना हँसों की आँख से आँसू निकल पड़ें''। अब इस कठिन मिसरे पर कैफ़ी को पूरी ग़ज़ल बनानी थी। कैफ़ी उसी कमरे में दीवार की ओर मुँह कर के बैठ गए और थोड़ी देर में तीन चार शेर लिख डाले। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि  कैफ़ी साहब तब सिर्फ ग्यारह साल के थे।  कैफ़ी साहब ने लिखा था...

इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल1 पड़े
हँसने से हो सुकून ना रोने से कल2 पड़े

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी-पी के अश्क-ए-ग़म
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

एक तुम के तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़3 है
एक हम के चल पड़े तो बहरहाल चल पड़े

मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े
1.विघ्न  2. चैन  3. उतार चढ़ाव

तो ये थी कैफ़ी आज़मी की शायर बनने की दास्ताँ। लौटते हैं नौनिहाल की उस ग़ज़ल पर। क्या लिखा था कैफ़ी आज़मी साहब ने और क्या धुन बनाई मदनमोहन ने..वल्लाह ! मदन मोहन ग़ज़लों को इस खूबी से संगीतबद्ध करते थे कि लता जी आज भी उनको ''ग़ज़लों के शाहजादे'' के नाम से याद किया करती हैं। सितार और वॉयलिन का बेहतरीन इस्तेमाल किया है इस गीत के संगीत संयोजन में उन्होंने। पर कैफ़ी के अशआरों में धार ना होती तो मदनमोहन का संगीत कहाँ उतना प्रभावी हो पाता?

इस  ग़ज़ल के हर मिसरे को पढ़ते ही मन के तार रूमानियत के रागों से झंकृत होने लगते हैं । जिस अंदाज़ में रफ़ी साहब ने इन खूबसूरत लफ्जों को अपनी आवाज़ दी है  लगता है कि वक़्त ठहर जाए, ये ग़ज़ल और उससे उभरते अहसास मन की चारदीवारी से कभी बाहर ही ना निकलें।

तुम्हारी जुल्फ के साये में शाम कर लूँगा..
सफ़र इस उम्र का, पल में.., तमाम कर लूँगा

नजर.. मिलाई तो, पूछूँगा इश्क का.. अंजा..म
नजर झुकायी तो खाली सलाम कर लूँगा,

तुम्हारी जुल्फ ...

जहा..न-ए-दिल पे हुकूमत तुम्हे मुबा..रक हो..
रही शिकस्त. तो वो अपने नाम कर लूँगा
तुम्हारी जुल्फ ...



वैसे जानना चाहूँगा कि आप इस ग़ज़ल को सुनकर कैसा महसूस करते हैं?

गुरुवार, अप्रैल 12, 2012

जब भी ये दिल उदास होता है : जब गीत का मुखड़ा बना एक ग़ज़ल का मतला !

कुछ गीतों का कैनवास फिल्मों की परिधियों से कहीं दूर फैला होता है। वे कहीं भी सुने जाएँ, कभी भी गुने जाएँ वे अपने इर्द गिर्द ख़ुद वही माहौल बना देते हैं। इसीलिए परिस्थितिजन्य गीतों की तुलना में ये गीत कभी बूढ़े नहीं होते। गुलज़ार का फिल्म सीमा के लिए लिखा ये नग्मा एक ऐसा ही गीत है। ना जाने कितने करोड़ एकाकी हृदयों को इस गीत की भावनाएँ उन उदास लमहों में सुकून पहुँचा चुकी होंगी। कम से कम अगर अपनी बात करूँ तो सिर्फ और सिर्फ इस गीत का मुखड़ा लगातार गुनगुनाते हुए कितने दिन कितनी शामें यूँ ही बीती हैं उसका हिसाब नहीं।

कहते हैं प्रेम के रासायन को पूरी तरह शब्दों में बाँध पाना असंभव है। पर शब्दों के जादूगर गुलज़ार गीत के पहले अंतरे में लगभग यही करते दिखते हैं। होठ का चुपचाप बोलना, आँखों की आवाज़ और दिल से निकलती आहों में साँसों की तपन को महसूस करते हुए भी शायद हम कभी उन्हें शब्दों का जामा पहनाने की सोच भी नहीं पाते, अगर गुलज़ार ने इसे ना लिखा होता।

गुलज़ार के लिखे गीतों में से बहुत कम को मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ मिली है।  पर मौसम, स्वयंवर, बीवी और मकान, देवता , कशिश और कोशिश जैसी फिल्मों में गुलज़ार के लिखे गिने चुने जो गीत रफ़ी साहब को गाने को मिले उन सारे गीतों पर अकेला ये गीत भारी पड़ता है। सीमा 1971  में प्रदर्शित हुई पर कुछ खास चली नहीं पर ये गीत खूब चला। मुझे हमेशा ये लगता रहा है कि रफ़ी की आवाज़ और गुलज़ार के लाजवाब बोलों की तुलना में शंकर जयकिशन का संगीत फीका रहा। संगीतकार शंकर की बदौलत गायिका शारदा भी इस गीत का हिस्सा बन सकीं। आप अंतरों के बीच उनके आलाप और कहीं कहीं मुखड़े में उनकी आवाज़ सुन सकते हैं।


जब भी ये दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है


होठ चुपचाप बोलते हों जब
साँस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो
आँखें जब दे रही हों आवाज़ें
ठंडी आहों में साँस जलती हो, 

ठंडी आहों में साँस जलती हो
जब भी ये दिल ...

आँख में तैरती हैं तसवीरें
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए

एक मासूम सा सवाल लिए
जब भी ये दिल ...

कोई वादा नहीं किया लेकिन
क्यों तेरा इंतजार रहता है
बेवजह जब क़रार मिल जाए
दिल बड़ा बेकरार रहता है
दिल बड़ा बेकरार रहता है
जब भी ये दिल ...

इस गीत को फिल्माया गया था कबीर बेदी और सिमी ग्रेवाल की जोड़ी पर। देखिए तो कितने बदले बदले से लग रहे हैं इस गीत में ये कलाकार।


पर अगर आप ये सोच रहे हों कि मुझे गुलज़ार के इस गीत की अचानक क्यूँ याद आ गई तो आपका प्रश्न ज़ायज है। वैसे तो किसी गीत के ज़हन में अनायास उभरने का कई बार कोई कारण नहीं होता। पर कल जब मैं गुलजार की एक किताब के पन्ने उलट रहा था तो उनकी एक ग़ज़ल पर नज़रे अटक गयीं। ग़ज़ल का मतला वही था जो इस गीत का मुखड़ा है.। तो आप समझ सकते हैं ना कि जितना प्यार हम सबको इस मुखड़े से है उतना ही दिलअज़ीज ये गुलज़ार साहब को भी है तभी तो उन्होंने इसी पर एक ग़ज़ल भी कह डाली।

जब भी ये दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है

गो बरसती नहीं सदा आँखें
अब्र तो बारह मास होता  है


छाल पेड़ों की सख़्त है लेकिन
नीचे नाख़ून के माँस होता है

जख्म कहते हैं दिल का गहना है
दर्द दिल का लिबास होता है

डस ही लेता है सब को इश्क़ कभी
साँप मौका-शनास होता है


सिर्फ उतना करम किया कीजै
आपको जितना रास होता है

जिन अशआरों को bold किया है वो दिल के ज्यादा करीब हैं। वैसे इश्क़ की तुलना सर्प दंश से करने के ख़याल के बारे में आपका क्या ख़याल है ?

रविवार, सितंबर 11, 2011

शम्मी कपूर और मोहम्मद रफ़ी : कैसे तय किया इन महान कलाकारों ने सुरीले संगीत का साझा सफ़र - भाग 2

इस कड़ी के पिछले भाग में आपने जाना कि किस तरह रफ़ी साहब और शम्मी कपूर की सफल जोड़ी की शुरुआत हुई। दिन बीतते गए और इन दोनों कलाकारों के बीच की समझ बढ़ती चली गई।


1967 में शम्मी साहब की एक फिल्म आई 'An Evening in Paris'. फिल्म के संगीतकार थे एक बार फिर शम्मी के चहेते शंकर जयकिशन । पर संयोग कुछ ऐसा हुआ कि जब निर्माता निर्देशक शंकर सामंत इस फिल्म के गीत की रिकार्डिंग करवा रहे थे तब शम्मी कपूर को भारत से बाहर जाना पड़ गया। इधर शम्मी गए उधर फिल्म के एक गीत 'आसमान से आया फरिश्ता...' की रिकार्डिंग भी हो गई। शम्मी साहब जब वापस आए तो ये जानकर बिल्कुल आगबबूला हो उठे और शक्ति दा और जयकिशन से उलझ पड़े। बाद में समझाने पर वो गीत सुनने को तैयार हुए और सुनकर दंग रह गए कि रफ़ी ने बिना उनसे बात किए गीत में वो सब किया जिसकी वो उम्मीद रखते थे। शम्मी जी रफ़ी साहब के पास गए और पूछा ये सब कैसे हुआ? रफ़ी साहब का जवाब था...
"ओ पापा मैंने पूछ्या ये गाना कौन गा रहा है ये गाना जो आपने बताया आसमान से आया फरिश्ता... और ओ जानेमन... कौन गाएगा ऐसा गाना। मुझसे कहा गया कि शम्मी कपूर साहब गा रहे हैं ये गाना। ओए होए शम्मी कपूर गाना गा रहा है तो आसमान से आया फरिश्ता पर वो एक हाथ इधर फैलाएगा और जानेमन के लिए तो वो हाथ भी फैलाएगा और टाँगे भी। तो मैंने वैसा ही सोचकर गा दिया।"
वैसे An Evening in Paris के बाकी गानों में भी रफ़ी साहब ने शम्मी जी की अदाएगी को ध्यान में रखकर अपनी आवाज़ में उतार चढ़ाव किए। अकेले अकेले... की शुरुआत जिन ऊँचे सुरों से होती है और फिर रफ़ी शम्मी के मस्तमौला अंदाज़ में गीत को जिस तरह नीचे लाते हैं उसका आनंद हर सुननेवाला बयाँ कर सकता है।

अकेले अकेले कहाँ जा रहे हो
हमें साथ ले लो जहाँ जा रहे हो
कोई मिट रहा है तुम्हें कुछ पता है
तुम्हारा हुआ हैं तुम्हें कुछ पता है
ये क्या माज़रा है तुम्हें कुछ पता है,  अकेले....
 


फिल्म के शीर्षक गीत आओ तुमको दिखलाता हुँ पेरिस की इक रंगीं शाम.. हो या शैलेंद्र के शब्दों की मधुरता से मन को सहलाता ये नग्मा...
रात के हमसफ़र थक के घर को चले
झूमती आ रही है सुबह प्यार की

रफ़ी ने अपनी गायिकी से शम्मी कपूर की इस फिल्म को हिट करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।

रफ़ी ,शम्मी कपूर और शंकर जयकिशन की तिकड़ी ने साठ के दशक में इतने गुनगुनाने लायक नग्मे दिए कि उनमें कुछ को छाँटना बेहद मुश्किल है पर An Evening in Paris के आलावा फिल्म 'प्रिंस' का ये गीत जिसमें शम्मी का पर्दे पर साथ वैजयंतीमाला ने दिया था दिल को बहुत लुभाता है। जैसे ही आप रफ़ी को
बदन पे सितारे लपेटे हुए
ओ जाने तमन्ना किधर जा रही हो
जरा पास आओ तो चैन आ जाए
गाते हुए सुनते हैं मन शम्मी की अदाओं के साथ थिरकने लगता है।





रफ़ी साहब को जिस गीत के लिए पुरस्कृत किया गया वो था अपनी प्रियतमा से बिछड़ने के दर्द को समाहित किए हुए शैलेंद्र का लिखा ये रूमानी नग्मा..

दिल के झरोखे में तुझको बिठा कर
यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर
रखूँगा मैं दिल के पास
मत हो मेरी जाँ उदास


द्रुत लय में बना क्या कमाल का गीत था ये, शैलेंद्र का लिखा हर अंतरा लाजवाब और शंकर जयकिशन का बेमिसाल आर्केस्ट्रा,बाकी कसर शम्मी रफ़ी की युगल जोड़ी ने पूरी कर दी थी।



शम्मी कपूर को लोग डान्सिंग स्टार की पदवी भी देते हैं। उनकी इस छवि को हमारे दिलो दिमाग में बसाने का श्रेय बहुत हद तक 1966 में आई उनकी फिल्म तीसरी मंजिल को दिया जाना चाहिए। ॠषि कपूर ने अपने एक साक्षात्कार में शम्मी कपूर की नृत्य प्रतिभा के बारे में बड़े पते की बात की थी। अगर आप शम्मी कपूर के गीतों को ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे कि शायद ही कैमरे का फोकस उनके पैरों पर हो। यानि शम्मी नृत्य में पैरों का इस्तेमाल करते ही नहीं थे पर अपनी इस कमी को वो अपने चेहरे, आँखों और हाथों के हाव भावो और शरीर की लचक से पूरा कर लेते थे। उस ज़माने में उनकी ये स्टाइल इस कदर लोकप्रिय हो गई थी कि उनके सहकलाकारों ने हू-ब-हू वही करना सीख लिया था। आशा पारिख के साथ अभिनीत तीसरी मंजिल का उनका वो नग्मा कौन भूल सकता है जिसमें शम्मी जैसी अदाएँ आशा जी ने भी दिखलाई थीं।



तीसरी मंजिल भी रफ़ी साहब और शम्मी कपूर की संयुक्त सफलता का एक नया अध्याय जोड़ गई। तुमने मुझे देखा, दीवाना हुआ बादल जैसे रोमांटिक और ओ हसीना जुल्फोंवाली तथा आ जा आ जा मैं हूँ प्यार तेरा जैसे झूमते झुमाते गीत आम जनमानस के दिल में बस गए। पर इस सफलता के पीछे नाम था एक नए संगीतकार पंचम का। पंचम के अनुसार उनका नाम, इस फिल्म के लिए मजरूह ने सुझाया था पर शम्मी जयकिशन को ही रखना चाहते थे। बाद में जयकिशन के कहने पर उन्होंने पंचम द्वारा संगीतबद्ध सभी गीतों को सुना और फिर कहा तुम पास हो गए.. आगे से तुम्हीं मेरी फिल्मों के लिए संगीत निर्देशित करोगे। 

दुर्भाग्यवश ऐसे मौके ज्यादा नहीं आए। तीसरी मंजिल के निर्माण के दौरान ही शम्मी कपूर की पत्नी गीता बाली का स्माल पॉक्स की वजह से असामयिक निधन हो गया। सत्तर के दशक में राजेश खन्ना के फिल्म जगत में पदार्पण के साथ ही इन दोनों कलाकारों का सबसे अच्छा समय बीत गया। शम्मी का वजन इतना बढ़ गया कि वे हीरो के किरदार के काबिल नहीं रहे। वहीं रफ़ी की चमक भी किशोर दा की बढ़ती लोकप्रियता की वज़ह से फीकी पड़ गई।

मोहम्मद रफ़ी ने यूँ तो हर किस्म के गाने गाए पर शम्मी कपूर की वज़ह से उन्हें अपनी गायिकी का वो पक्ष उभारने में मदद मिली जो उनके शर्मीले स्वाभाव के बिल्कुल विपरीत थी। जुलाई 1980 की उस सुबह को शम्मी वृंदावन में थे जब उन्हें किसी राहगीर ने बताया कि उनकी आवाज़ चली गई। पहले तो शम्मी कपूर को समझ नहीं आया कि ये बंदा क्या कह रहा है पर जब उन्हें पता चला कि उनकी आवाज़ से उसका इशारा रफ़ी साहब की ओर है तो वो ग़मज़दा हो गए। उन्हें इस बात का बेहद मलाल रहा कि वो रफ़ी साहब की अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो पाए।  मुझे नहीं लगता कि आज कल के अभिनेता संगीतकार व गायक के साथ इतना वक़्त बिताते हों जितना शम्मी कपूर ने बिताया।  

आज ये दोनों महान हस्तियाँ हमारे बीच नहीं है। पर गीत संगीत की जो अनुपम भेंट हमें शम्मी कपूर और मोहम्मद रफ़ी विरासत में दे गए हैं, को क्या हम उसे कभी भुला पाएँगे ? शायद कभी नहीं।


आज इस प्रविष्टि के साथ एक शाम मेरे नाम के छठवें साल के इस सफ़र में 500 पोस्ट्स का सफ़र पूरा हुआ । आशा है आपका साथ यूँ ही बना रहेगा।

सोमवार, सितंबर 05, 2011

शम्मी कपूर और मोहम्मद रफ़ी : कैसे तय किया इन महान कलाकारों ने सुरीले संगीत का साझा सफ़र - भाग 1

शम्मी कपूर को गुजरे तीन हफ्ते हो चुके हैं। शम्मी कपूर व मोहम्मद रफ़ी ने मिलकर हिंदी फिल्म संगीत का जो अद्भुत अध्याय रचा है उस पर लिखने की बहुत दिनों से इच्छा थी। पर पहले अन्ना के आंदोलन को लेकर ये इच्छा जाती रही और फिर कार्यालय की व्यस्तताओं ने कंप्यूटर के कुंजीपटल के सामने बैठने नहीं दिया। दरअसल मैं जब भी शम्मी कपूर के बारे में सोचता हूँ तो मुझे सत्तर और अस्सी के दशक का श्वेत श्याम और बाद का रंगीन दूरदर्शन याद आ जाता है। साठ के दशक में जब शम्मी कपूर या शमशेर राज कपूर रुपहले पर्दे पर अपनी फिल्मों की सफलताओं के झंडे गाड़ रहे थे तब तक तो मेरा इस दुनिया में पदार्पण ही नहीं हुआ था। शम्मी कपूर की फिल्मी दुनिया व उनके गीतों से मेरा पहला परिचय दूरदर्शन की मार्फत ही हुआ था।

वो दूरदर्शन ही था जो हम सब को गुरुवार और रविवार को बारहा शम्मी कपूर की फिल्में दिखाया करता था। सच कहूँ तो शुरु शुरु में हम तीनों भाई बहनों को शम्मी जी के नैन मटक्के और उनकी थरथराती अदाएँ बिल्कुल नागवार गुजरती थीं। पर जैसे जैसे वक़्त गुजरा हमें उनके तौर तरीके पसंद आने लगे। शायद इसकी वज़ह ये रही कि हमने उनकी फिल्मों को एक दूसरे नज़रिए से देखना शुरु किया। गीतों में उनकी तरफ़ से डाली गई उर्जा इनके समर्पण को देख सुन हो कर अपने मन को भी तरंगित होता पाया। उनकी फिल्मों के गीत हम बड़े चाव से सुनने लगे। आज जब वे इस दुनिया में नहीं हैं उनके द्वारा अभिनीत गीतों के साथ उन्हें ये श्रृद्धांजलि देना चाहता हूँ।
शम्मी कपूर के गीतों की लोकप्रियता में रफ़ी साहब का कितना बड़ा योगदान था ये किसी से छुपा नहीं है। रफ़ी साहब और शम्मी कपूर की इस बेमिसाल जोड़ी का सफ़र कैसे शुरु हुआ और फिर परवान चढ़ा इसी बात पर चर्चा करेंगे आज की इस पोस्ट में। साथ ही होंगे रफ़ी साहब के गाए और शम्मी कपूर पर फिल्माए मेरे दस पसंदीदा नग्मे। शम्मी कपूर ने सबसे पहले रफ़ी साहब को जबलपुर में एक संगीत के कार्यक्रम में देखा। शम्मी उस वक़्त कॉलेज में थे और वहाँ अपने एक रिश्तेदार से मिलने गए थे। पचास के दशक में शम्मी कपूर की आरंभिक फिल्मों रेल का डिब्बा, लैला मजनूँ, शमा परवाना, हम सब चोर हैं में शम्मी के गाए अधिकांश गीत रफ़ी साहब की ही आवाज़ में थे। पर ये फिल्में ज्यादा सफल नहीं हुईं और उनके संगीत ने भी कोई खास धूम नहीं मचाई। शम्मी कपूर अक्सर अपने गीतों की रिकार्डिंग देखने जाया करते थे। 1957 में नासिर हुसैन की फिल्म तुमसा नहीं देखा के गीतों की रिकार्डिंग चल रही थी। गीत था सर पे टोपी लाल.. ओ तेरा क्या कहना...। शम्मी कपूर ने अपने एक साक्षात्कार में इस गीत के बारे में कहा था

"मैं रफ़ी साहब के पास रिकार्डिंग रूम  में गया और उनसे कहा कि ये गीत मैं गाने वाला हूँ। मेरे कुछ सुझाव हैं कि गीत के इन इन हिस्सों को आप यूँ गाइए तो मुझे उस पर अभिनय करने में सहूलियत होगी। रफ़ी साहब ने कहा ठीक है आपने जैसा कहा वैसी ही कोशिश कर के देखता हूँ। आप विश्वास नहीं करेंगे कि रफ़ी ने जिस तरह से मेरे सुझावों से भी बढ़कर उस गीत के लहजे को ढाला कि वो एक अलग ऊँचाई पर चला गया। यहीं से रफ़ी साहब के साथ मेरी एक जोड़ी की शुरुआत हो गई ।"
रफ़ी साहब और शम्मी की इस जुगलबंदी में मैंने पहला गीत जो लिया है वो है 1959 में आई फिल्म 'दिल दे के देखो से' । इस गीत को लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन बनाई थी उषा खन्ना ने। इस गीत की खास बात ये है कि ये उषा जी की पहली संगीत निर्देशित फिल्म थी वहीं बतौर नायिका आशा पारिख जी की भी ये पहली फिल्म थी। ये याद दिलाना जरूरी होगा कि रफ़ी की संगत के साथ सह नायिका के रूप में आशा पारिख का साथ भी शम्मी कपूर के लिए बेहद सफल रहा।

कहना होगा कि जिस सुकून जिस तबियत से रफ़ी साहब ने उषा जी की इस बेहतरीन कम्पोजीशन को अपनी आवाज़ दी है कि क्या कहने। मजरूह के बोल भी कम असरदार नहीं। मिसाल देखिए

हम और तुम और ये समां
क्या नशा नशा सा है
बोलिए ना बोलिए
सब कुछ सुना सुना सा है  





रफ़ी साहब की शांत धीर गंभीर आवाज़ शम्मी कपूर के लिए शोख और चंचल हो उठी। उन्होंने अपनी गायिकी में शम्मी के हाव भावों को इस तरह उतारा की ये भिन्न करना मुश्किल हो गया कि इस गीत को शम्मी कपूर गा रहे हैं या रफ़ी साहब। साठ के दशक में ही रिलीज हुई फिल्म 'बदतमीज' का ये गाना याद आ रहा है जिसमें रफी साहब गाते हैं...

बदतमीज कहो या कहो जानवर
मेरा दिल तेरे दिल पे फिदा हो गया
बचा लो कोई,सँभालो कोई,
ओ मेरी जाने जाँ मैं तबाह हो गया
होलल्ला होलल्ला होलल्ला होलल्ला




द्रुत गति से गाए इस गीत में रफ़ी साहब जब अपने दिल को बमुश्किल सँभालते हुए होल्ल्ला होलल्ला की लय पकड़ते हैं तो शम्मी कपूर की अदाओं की मस्ती गीत के बोलों में सहज ही समा जाती है। साधना के साथ गाए इस गीत में जो चंचलता थी वो तो आपने महसूस की होगी पर फिल्म राजकुमार में जहाँ एक बार फिर शम्मी कपूर और साधना की जोड़ी थी रफ़ी शम्मी कपूर के लिए एक अलग से संजीदा अंदाज़ में नज़र आए



शम्मी कपूर और रफ़ी की इस जोड़ी ने नैयर साहब के साथ सफलता का एक और सोपान हासिल किया है 1964 में आई फिल्म 'कश्मीर की कली' में। इस फिल्म का एक गीत था तारीफ़ करूँ क्या उसकी जिसने तुझे बनाया। शम्मी कपूर चाहते थे अपनी प्रेमिका के प्रति अपने जज़्बे को उभारने के लिए इस जुमले तारीफ़ करूँ क्या उसकी ....को तरह तरह से दोहराएँ। पर ओ पी नैयर अड़ गए कि उससे गाना लंबा और उबाऊ हो जाएगा। शम्मी दुखी होकर रफ़ी साहब के पास गए। रफ़ी ने उनकी परेशानी सुनी और कहा कि मैं  नैयर को समझाता हूँ। नैयर ने उनसे भी वही कहा पर रफ़ी ने उन्हें ये कहकर मना लिया कि अगर वो ऐसा चाहता है तो एक बार कर के देखते हैं अगर तुम्हें पसंद नहीं आया तो हटा देना। जब गीत पूरा बना तो सब को अच्छा लगा और  शम्मी कपूर को नैयर और रफ़ी साहब दोनों ने सराहा ।

ये घटना दिखाती है कि शम्मी कपूर और रफ़ी साहब की जोड़ी इतनी सफ़ल क्यूँ हुई। मैं आपको ये गीत तो नहीं पर इसी फिल्म के दो और गीत सुनाना चाहूँगा जो मेरे बहुत प्रिय हैं। एक तो ये रोमांटिक गीत..'दीवाना हुआ बादल .....बहार आई...ये देख के दिल झूमा ...ली प्यार ने अँगड़ाई 'जिसे एक बार गुनगुनाकर ही मन हल्का हो जाता है





और दूसरा एस. एच. बिहारी का लिखा ये शानदार नग्मा जिसमें मनोहारी सिंह के सेक्सोफोन ने एक ना छू सकने वाली बुलंदियों तक पहुँचाया है। क्या संगीत, क्या शब्द और क्या गायिकी ...बेमिसाल शब्द भी छोटा जान पड़ता है इस गीत के लिए... सच ऐसी मेलोडी बार बार जन्म नहीं लेती

है दुनिया उसी की ज़माना उसी का,
मोहब्बत में जो हो गया हो किसी का...
लुटा जो मुसाफ़िर दिल के सफ़र में
है जन्नत यह दुनिया उसकी नज़र में
उसी ने है लूटा मज़ा ज़िंदगी का
मोहब्बत में ...
 
है सज़दे के काबिल हर वो दीवाना
के जो बन गया हो तसवीर-ए-जानाँ   
करो एह्तराम उस की दीवानगी का
मोहब्बत में ...

बर्बाद होना जिसकी अदा हो
दर्द-ए-मोहब्बत जिसकी दवा हो
सताएगा क्या ग़म उसे ज़िंदगी का
मोहब्बत में ...




शम्मी कपूर एक ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने अपनी फिल्मों के संगीत को जबरदस्त अहमियत दी। वे खुशकिस्मत रहे कि उनकी इस मुहिम में रफ़ी साहब जैसे गायक और शंकर जयकिशन व ओ पी  नैयर जैसे संगीतकारों का साथ मिला। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में उपस्थित हूँगा रफ़ी और शम्मी साहब के इस जोड़ी के पाँच अन्य चुनिंदा गीतों और उनसे जुड़ी बातों को लेकर...

शुक्रवार, अप्रैल 01, 2011

ठहरिए होश में आ लूँ तो चले जाइएगा..मन को गुदगुदाता रफ़ी साहब का नग्मा..

1965 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था 'मोहब्बत इसको कहते हैं'। अख़्तर मिर्जा द्वारा लिखी और निर्देशित इस छोटे बजट की फिल्म के कुछ गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। वैसे ये बता दूँ की ये वही अख़्तर मिर्जा हैं जिनके सुपुत्र सईद मिर्जा की बनाई फिल्में 'सलीम लँगड़े मत रो', 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यूँ आता है?', 'नसीम' और अस्सी के दशक में सोमवार रात को दूरदर्शन पर आने वाला धारावाहिक 'नुक्कड़' बेहद चर्चित रहे थे।

अख्तर मिर्जा की इस प्रेम कथा पर संगीत रचने का काम सौंपा गया था 'ख़य्याम' साहब को। ख़्य्याम साहब की खासियत रही है कि वो अपने गीत चुने हुए कवियों और शायरों से ही लिखवाते थे। लिहाज़ा इस फिल्म के लिए उन्होंने उस वक़्त के मशहूर शायर मजरूह सुल्तानपुरी को चुना।

प्रेमियों की आपसी चुहल और तकरार पर यूँ तो कितने ही गीत बने हैं पर रफ़ी और सुमन कल्याणपुर द्वारा गाए इस युगल गीत में इतनी मधुरता और सादगी है कि सुनने वाला बस सुनता ही रह जाता है। मोहम्मद रफ़ी ने इस गीत के हर अंतरे को इतना दिल से गाया है कि गीत की पंक्तियों सजीव हो उठती हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी संगीत प्रेमी इस गीत को सुनते वक़्त गुनगुनाने से अपने आप को रोक सके..



आइए सुनते हैं रफी और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में ये नग्मा...



ठहरिए होश में आ लूँ तो चले जाइएगा
उह हुँह...
आप को दिल में बिठा लूँ तो चले जाइयेगा
उह हुँह..आप को दिल में बिठा लूँ .........

कब तलक रहिएगा यूँ दूर की चाहत बन के
कब तलक रहिएगा यूँ दूर की चाहत बन के
दिल में आ जाइए इकरार-ए-मोहब्बत बन के
अपनी तकदीर बना लूँ तो चले जाइएगा
उह हुँह..आप को दिल में बिठा लूँ तो चले जाइएगा
आप को दिल में बिठा लूँ....

मुझको इकरार-ए-मोहब्बत से हया आती है
मुझको इकरार-ए-मोहब्बत से हया आती है
बात कहते हुए गर्दन मेरी झुक जाती है
देखिये सर को झुका लूँ तो चले जाइएगा
उह हुँह..देखिये सर को झुका लूँ तो चले जाइएगा
हाय... आप को दिल में बिठा लूँ.......

ऐसी क्या शर्म ज़रा पास तो आने दीजे
ऐसी क्या शर्म ज़रा पास तो आने दीजे
रुख से बिखरी हुई जुल्फें तो हटाने दीजे
प्यास आँखों की बुझा लूँ तो चले जाइएगा
ठहरिये होश में आ लूँ तो चले जाइएगा
हम हम हम... ला ला ला...
आप को दिल में बिठा लूँ तो चले जाइएगा
आप को दिल में बिठा लूँ

इस गीत को फिल्माया गया था शशि कपूर और नंदा पर...

शनिवार, मई 15, 2010

गीतकार राजा मेंहदी अली खाँ और उनका लिखा ये प्यारा नग्मा ' इक हसीन शाम को..'

राजा मेंहदी अली खाँ, जब भी ये नाम सुना तो लगा भला इतने रईस खानदान के चराग़ को गीत लिखने का शौक कैसे हो गया? गोकि ऍसा भी नहीं कि हमारे राजे महाराजे इस हुनर से महरूम रहे हों। तुरंत ही जनाब वाज़िद अली शाह का ख्याल ज़ेहन में उभरता है। पर उनकी मिल्कियत दिल्ली और अवध तक फैली हुई थी पर राजा साहब को क्या सूझी कि वो अपने बाप दादाओं की जमीदारी छोड़कर मुंबइया फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बन बैठे?
राजा साहब के बारे में जानने की इच्छा बहुत दिनों तक बनी रही पर उनके अनमोल गीतों और संगीतकार मदनमोहन के साथ उनकी अनुपम जोड़ी के किस्सों के आलावा कुछ ज्यादा हाथ नहीं लगा।

कुछ दिनों पहले फिल्म 'दुल्हन एक रात की' का अपना एक पसंदीदा नग्मा गुनगुना रहा था कि याद आया कि अरे ये गीत भी तो राजा साहब का ही लिखा हुआ है। राजा साहब के बारे में मेरा पुराना कौतुहल, फिर जाग उठा। इस बार उन पर लिखे कुछ लेख हाथ लगे। पता चला कि राजा साहब, अविभाजित भारत के करमाबाद की पैदाइश हैं। पिता बचपन में ही गुजर गाए और माता हेबे जी के संरक्षण में मेंहदी अली खाँ पले बढ़े। माँ अपने ज़माने उर्दू की क़ाबिल शायरा के रूप में जानी गयीं। चालिस के दशक में जब वो आकाशवाणी दिल्ली में काम कर रहे थे तो मुंबई से उन्हें सदात हसन मंटो का बुलावा आ गया। मंटों ने तब हिंदी फिल्मों में काम करना शुरु किया था।

पर राजा साहब ने आते ही अपनी शायरी के जलवे दिखाने शुरु कर दिये ऐसा भी नहीं था। आपको जानकर हैरानी होगी कि राजा साहब की फिल्म उद्योग में शुरुआत बतौर पटकथा लेखक के हुई। और तो और उन्होंने एक फिल्म के लिए छोटा सा रोल भी किया। पर पटकथालेखन और अभिनय उन्हें ज्यादा रास नहीं आया। 1947 की फिल्म दो भाई में राजा साहब को पहली बार गीत लिखने का मौका मिला । इस फिल्म का गीत "मेरा सुंदर सपना टूट गया..." बेहद चर्चित रहा। विभाजन और दंगों की आग में जल रहे देश में डटे रहने का फ़ैसला भी राजा साहब के भारत के प्रति प्रेम को दर्शाता है। और फिर फिल्म शहीद (1950) में देशप्रेम से ओतप्रोत उनके लिखे उस गीत को भला कौन भूल सकता है 'वतन की राह में वतन के नौजवान शहीद हो'.. '

पचास का दशक राजा मेंहदी अली खाँ के उत्कर्ष का दशक था। दशक की शुरुआत में संगीतकार मदनमोहन के साथ फिल्म 'मदहोश' में उनकी जो सफल जोड़ी बनी वो 'अनपढ़', 'मेरा साया', 'वो कौन थी', 'नीला आकाश', 'दुल्हन एक रात की' आदि फिल्मों में और पोषित पल्लवित होती गई।

राजा मेंहदी अली खाँ के लिखे गीतों पर नज़र रखने वाले फिल्म समीक्षकों का मानना है कि राजा ने ही फिल्मी गीतों में 'आप' शब्द का प्रचलन बढ़ाया। मसलन उनके लिखे इन गीतों को याद करें... 'आप की नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल मुझे...' या 'जो हमने दास्ताँ अपनी सुनाई आप क्यूँ रोए ' , 'आपने अपना बनाया मेहरबानी आपकी...'। मदन मोहन के आलावा राजा साहब ने ओ पी नैयर व सी रामचंद्र के संगीत निर्देशन में भी बेहतरीन नग्मे दिये। वैसे क्या आपको पता है कि 'मेरे पिया गए रंगून वहाँ से किया है टेलीफून.. ' भी राजा साहब का ही लिखा हुआ गीत है।

साठ के दशक के मध्य में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ 'अनीता' और 'जाल' जैसी फिल्में उनके फिल्मी सफ़र की आखिरी फिल्में थी। जुलाई 1996 में राजा साहब इस दुनिया से कूच कर गए। पर उनके रचे गीतों से आज भी वे हमारे मन में समाए हैं। आज की ये पोस्ट उस गीत के जिक्र बिना अधूरी रह जाएगी जिसकी वज़ह से राजा साहब की याद पुनः मन में आ गई।

फिल्म 'दुल्हन एक रात की' फिल्म का ये गीत मुझे बेहद पसंद है और क्यूँ ना हो 'शामों' से मेरे लगाव की बात क्या आप सब से छिपी हे। और फिर जहाँ गीत में ऐसी ही किसी शाम को अपने हमसफ़र की यादों में गोता लगाने का जिक्र हो तो वो गीत क्या दिलअज़ीज नहीं बन जाएगा ?

मदनमोहन द्वारा मुखड़े की आरंभिक धुन कमाल की है। यही कारण हे कि इस गीत के मुखड़े को गुनगुनाना मेरा प्रिय शगल रहा है। आज सोचा मोहम्मद रफ़ी साहब की मखमली आवाज़ में गाए पूरे गीत को गुनगुनाने की कोशिश करूँ। रफ़ी साहब ने जिस मस्ती से इस गीत को गाया है कि सुन कर ही मन झूम उठता है और होठ थिरकने लगते हैं।


इक हसीन.. शा..म को दिल मेरा... खो गया
पहले अपना, हुआ करता था, अब किसी का... हो गया

मुद्दतों से.., आ..रजू थी, जिंदगी में.. कोई आए
सूनी सूनी, जिंदगी में. कोई शमा.. झिलमिलाए
वो जो आए तो रौशन ज़माना हो गया
इक हसीन.. शा..म को दिल मेरा... खो गया

मेरे दिल के, कारवाँ को ले चला है.. आज कोई
शबनमी सी. जिसकी आँखें, थोड़ी जागी.. थोड़ी सोई
उनको देखा तो मौसम सुहाना हो गया
इक हसीन.. शा..म को दिल मेरा... खो गया
पहले अपना, हुआ करता था, अब किसी का... हो गया

मुझे झेल लिया है ! ठीक है जनाब अब रफ़ी की आवाज़ में भी इस गीत को सुनवाए देते हैं। वैसे फिल्म में इस गीत को फिल्माया गया था धर्मेंद्र व नूतन पर..


गुरुवार, नवंबर 19, 2009

फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो...

जिंदगी के इस सफ़र में ना जाने कितने लोग हमारे संपर्क में आते हैं। पर बीते समय में झाँक कर देखने पर क्या आपको नहीं लगता कि कुछ ऐसे चेहरे रह गए जिनसे अपने रिश्तों को समय रहते हम वो रूप नहीं दे पाए जो देना चाहते थे।

दिल खुशफहमियाँ पालता रहता है कि काश कभी उनसे एक मुलाकात और तो हो जिसमें हम ऍसे मरासिम बना सके जिन्हें परिभाषित करने में हमारे अंतरमन को कोई दिक्कत ना हो। पर अव्वल तो ऍसी मुलाकातें हो नहीं पाती और होती भी हैं तो माहौल ऐसा नहीं बन पाता कि रिश्तों के अधखुले सिरों को फिर से टटोला जा सके।

ये तो हुई वास्तविक जिंदगी की बात पर फिल्मों में ऐसी मुलाकातें अक्सर हो जाया करती हैं क्यूँकि उनके बिना कहानी आगे बढ़ती नहीं। इसीलिए तो गीतों का ये आशावादी दृष्टिकोण हमारे मन को सुकून देता है। साथ ही उन्हें गुनगुनाकर हम अपने आप को पहले से तरो ताज़ा और उमंगों से भरा महसूस करते हैं।

ऍसा ही एक गीत गाया था रफ़ी साहब ने फिल्म ये रात फिर ना आएगी के लिए और क्या कमाल गाया था। १९६५ में आई ये फिल्म अपने गीतों के लिए बेहद चर्चित रही थी। चाहे आशा जी का गाया 'यही वो जगह है... हो या फिर महेंद्र कपूर का गाया मेरा प्यार वो है..... हो, ओ पी नैयर द्वारा संगीत निर्देशित इस फिल्म के सारे गीत लाज़वाब थे। और इस गीत का तो शमसुल हूदा बिहारी ने, मुखड़ा ही बड़ा जबरदस्त लिखा था ...

फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो
हमसे एक और मुलाकात का वादा कर लो


वैसे बिहारी साहब अपने नाम के अनुरूप सचमुच बिहार के ही थे और पटना के पास स्थित आरा में उनका जन्म हुआ था। संगीतकार ओ पी नैयर के करीबियों का कहना है कि ओ पी नैयर ने बिहारी के मुखड़े को आगे बढ़ाते हुए पहला अंतरा ख़ुद ही रच डाला था। ये अंतरा गुनगुनाना मुझे बेहद पसंद रहा है इसलिए आज इसे यहाँ लगा दे रहा हूँ



वैसे आप मुझे ना झेलना चाहें तो रफ़ी साहब की गायिकी का आनंद यहाँ ले सकते हैं।




फिर मिलोगे कभी इस बात का वादा कर लो
हमसे इक और मुलाकात का वादा कर लो

दिल की हर बात अधूरी है अधूरी है अभी
अपनी इक और मुलाकात ज़रूरी है अभी
चंद लमहों के लिये साथ का वादा कर लो
हमसे इक और मुलाकात का वादा करलो
फिर मिलोगे कभी .....

आप क्यूँ दिल का हसीं राज़ मुझे देते हैं
क्यूँ नया नग़मा नया साज़ मुझे देते हैं
मैं तो हूँ डूबी हुई प्यार की तूफ़ानों में
आप साहिल से ही आवाज़ मुझे देते हैं
कल भी होंगे यहीं जज़्बात ये वादा करलो
हमसे इक और मुलाकात का वादा करलो
फिर मिलोगे कभी .....


इस गीत का दूसरा अंतरा आप इस वीडियो में देख सकते हैं जिसे आशा जी ने गाया है। ये गीत पर्दे पर फिल्माया गया था विश्वजीत और शर्मिला टैगोर जी पर

शुक्रवार, नवंबर 06, 2009

मुझे दर्द-ए-दिल का पता ना था, मुझे आप किसलिए मिल गए...

आदमी की फ़ितरत अज़ीब सी है। चाहता कुछ और है और कहता कुछ और। अब भला जिंदगी की राहों में कोई हसीन हमसफ़र मिल जाए तो इसमें दिक्कत कहाँ हैं जनाब ! पर देखिए अब कोई मिल गया तो इतरा रहे हैं ये कहते हुए कि मैं तो अकेले ही बड़े आराम से था। अब भइया एक अदद दिल की तलाश में मारे मारे फिरोगे और एक के साथ एक फ्री वाली स्कीम में दर्द लाज़िमी तौर पर मिलेगा तो क्या कलपने लगोगे :)?

पर ये तो हमारे आपके दिखाने की बात है। अंदर ही अंदर तो हम दर्द-ए-दिल को भी शिद्दत से महसूस करना चाहते हैं। फ़राज़ ऍसे तो नहीं कह गए

पहले पहल का इश्क़ अभी याद है फ़राज़
दिल खुद से चाहता है कि रुसवाइयाँ भी हों


पर जहाँ ये बात सही है, वहाँ इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जब हमारी समझ से अपने स्तर से बहुत अच्छा हमें अपना लेता है तो एक ओर तो हमें बड़ी खुशी मिलती है पर दूसरी ओर रह रह कर अंदर की हीन ग्रंथि हमें अपनी तुच्छता का अहसास भी दिलाती रहती है।

तो आज ऍसे ही भावनाओं से ओतप्रोत इस गीत की बात करना चाहता हूँ। इसे लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन बनाई थी चित्रगुप्त ने। मजरूह ने ये गीत शायद ऍसे ही किसी क़िरदार के लिए लिखा होगा। शायद इसलिए कि जिस फिल्म का ये गीत है वो मैंने देखी नहीं। फिल्म का नाम था 'आकाशदीप' जो १९६५ में प्रदर्शित हुई थी। वैसे यू ट्यूब के वीडिओ से ये स्पष्ट है कि इसे फिल्माया गया था धर्मेन्द और नंदा जी पर।

ये गीत रफ़ी साहब के गाए मेरे पसंदीदा गीतों में से एक है तो सुनिए रफ़ी की गायिकी का कमाल ..


वैसे यू ट्यूब के वीडिओ में इस गीत के तीनों अंतरे सुनने को मिलेंगे।


मुझे दर्द-ए-दिल का पता ना था
मुझे आप किसलिए मिल गए
मैं अकेला यूँ ही मजे में था
मुझे आप किसलिए मिल गए....

यूँ ही अपने अपने सफ़र में गुम
कही दूर मैं, कही दूर तुम
चले जा रहे थे जुदा, जुदा
मुझे आप किसलिए मिल गए....

मैं गरीब हाथ बढ़ा तो दूँ
तुम्हें पा सकूँ कि ना पा सकूँ
मेरी जाँ बहुत हैं ये फ़ासला
मुझे आप किसलिए मिल गए....

ना मैं चाँद हूँ, किसी शाम का
ना च़राग हूँ, किसी बाम का
मैं तो रास्ते का हूँ एक दीया
मुझे आप किसलिए मिल गए....


वैसे चलते चलते कुछ बाते संगीतकार चित्रगुप्त यानि चित्रगुप्त श्रीवास्तव के बारे में। यूँ तो चित्रगुप्त भोजपुरी फिल्मों के मूर्धन्य संगीतकार माने जाते हैं, पर हिंदी फिल्मों के लिए भी उन्होंने कुछ नायाब नग्मे दिए। चित्रगुप्त का ताल्लुक बिहार से था और रोचक तथ्य ये है कि मुंबई की मायानगरी में संगीतकार बनने के पहले वो कॉलेज में लेक्चरर थे। वैसे क्या आपको पता है कि चित्रगुप्त की सांगीतिक विरासत को किसने आगे बढ़ाया ? वही 'क़यामत से क़यामत तक ' की संगीतकार जोड़ी आनंद-मिलिंद ने, जो चित्रगुप्त के सुपुत्र हैं।

मंगलवार, जून 23, 2009

दिल जो ना कह सका...: रफ़ी, रौशन और मज़रूह की त्रिवेणी से निकला का एक यादगार नग्मा...

पिछले हफ्ते चैनल बदलते बदलते जी टीवी के लिटिल चैम्पस पर उँगलियाँ रुकीं तो रुकी की रुकी रह गईं। एक छोटे बालक को रफी साहब के इस गीत का एक हिस्सा गाते सुना तो मन आह्लादित हो गया। बीते दिनों के इन अनमोल मोतियों को आज के बच्चों के मुख से सुनना असीम संतोष की भावना से मन को भर देता है। कई दिनों के बाद ये गीत जब सुनने को मिला तो ज़ेहन से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। इसलिए सोचा कि क्यूँ ना इस आनंद को आप सब के साथ बाँटा जाए।

जिस गीत के बोल, धुन और गायिकी तीनों ही बेमिसाल हों तो आपको कहने को तो कुछ रह ही नहीं जाता, मन भावनाओं के आवेश से हिलोरें लेने लगता है और गीत खुद बा खुद होठों पर चला आता है ...

दिल जो ना कह सका
वही राज़-ए-दिल कहने की रात आई
दिल जो ना कह सका....



क्या धुन बनाई थी मुखड़े की संगीतकार रोशन ने कि आदमी मज़रूह सुल्तानपुरी के शब्दों की रवानी के साथ बहता ही चला जाता है। १९६५ में प्रदर्शित फिल्म भींगी रात का ये गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था और उस साल की बिनाका संगीतमाला में पाँचवे स्थान तक जा पहुँचा था। अगर मुखड़े के लिए गीतकार और संगीतकार की जादूगरी को दाद देने का जी चाहता है तो वहीं अंतरे में मोहम्मद रफी साहब की कलाकारी इस गीत को उनके गाए बेहतरीन गीतों में से एक मानने पर मज़बूर कर देती है।

ये गीत फिल्म में प्रदीप कुमार, अशोक कुमार और मीना कुमारी पर फिल्माया गया है।

गीतकार मज़रूह सुल्तानपुरी ने प्रेमिका की बेवफाई टूटे नायक (प्रदीप कुमार) के दिल में उठते मनोभावों को गीत के अलग अलग अंतरों में व्यक्त किया हैं।

दिल जो ना कह सका
वही राज़-ए-दिल कहने की रात आई
दिल जो ना कह सका....

नगमा सा कोई जाग उठा बदन में
झंकार की सी, थरथरी है तन में
झंकार की सी थरथरी है तन में
हो.. मुबारक तुम्हें किसी की
लरज़ती सी बाहों में
रहने की रात आई
दिल जो ना कह सका...

तौबा ये किस ने, अंजुमन सजा के
टुकड़े किये हैं गुनचा-ए-वफ़ा के
टुकड़े किये हैं गुनचा-ए-वफ़ा के
हो..उछालो गुलों के टुकड़े
कि रंगीं फ़िज़ाओं में
रहने की रात आई, दिल जो ना कह सका....

चलिये मुबारक जश्न दोस्ती का
दामन तो थामा आप ने किसी का
दामन तो थामा आप ने किसी का
हो...हमें तो खुशी यही है
तुम्हें भी किसी को अपना
कहने की रात आई, दिल जो ना कह सका...

सागर उठाओ दिल का किस को ग़म है
आज दिल की क़ीमत जाम से भी कम है
आज दिल की क़ीमत जाम से भी कम है
पियो चाहे खून-ए-दिल हो
हो...के पीते पिलाते ही रहने की रात आई
दिल जो ना कह सका...


नायक की दिल की पीड़ा कभी तंज़, कभी उपहास तो कभी गहरी निराशा के स्वरों में गूँजती है और इस गूँज को मोहम्मद रफ़ी अपनी आवाज़ में इस तरह उतारते हैं कि गीत खत्म होने तक नायक का दर्द आपका हो जाता है

तो फिर देर काहे कि सुनिए आप भी इस महान गायक को एक बेमिसाल गीत में



इसी गीत को लता मंगेशकर ने भी गाया है। पर मीना कुमारी वाले गीत का मिज़ाज़ कुछ अलग है। पर उस गीत की बात करेंगे इस कड़ी की अगली पोस्ट में..

मंगलवार, दिसंबर 19, 2006

चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है...

ये आफिस के दौरे मेरे इस चिट्ठे की गाड़ी पर बीच - बीच में ब्रेक लगा देते हैं । आज फिर से हाजिर हूँ इस गीत के साथ...
याद है ना, पिछली बार की शाम
मजाज के जीवन की उदासी ले के आई थी । आज मामला वैसा तो नहीं पर उससे खास जुदा भी नहीं ।
देखिये ना, जनाब मजरूह सुलतानपुरी अँधेरे के बीच खड़े होकर आवाजें लगा रहे हैं , उस हमसफर के लिये जो ना जाने कहाँ गुम हो गया है !
और तो और शायर के हृदय में छाई इस कालिमा को हटाने में ना सितारों की फौज काम आ रही है ना ही बहारों की खूबसूरती..
अब तो सच्चे दिल से लगाई इस पुकार का ही सहारा है.....शायद पहुँच जाए उन तक...




चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है
कहीं से लौट के आओ बहुत अँधेऽऽरा है

कहाँ से लाऊँ, वो रंगत गई बहाऽरों की
तुम्हारे साथ गई रोशनी नजाऽरों की
मुझे भी पास बुलाओ बहुत अँधेऽऽरा है
चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है

सितारों तुमसे, अँधेरे कहाँ सँभलते हैं
उन्हीं के नक्शे कदम से चराग जलते हैं
उन्हीं को ढ़ूंढ़ के लाओ बहुत अँधेरा है
चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है


अब आप सोच रहें होंगे कि इस गीत की याद मुझे अचानक कहाँ से आ गई । सो हुआ ये कि मेरे
रोमन हिन्दी ब्लॉग के एक पाठक ने भेंट स्वरूप मुझे ये गीत भेजा । यूँ तो चिराग के बाकी गीत मेरे सुने हुए थे पर ये गीत मैंने पहली बार, उस अनजान मित्र के जरिये ही सुना।
एक बार फिर शुक्रिया दोस्त इस प्यारे गीत को मुझ तक पहुँचाने के लिए । अब मुझे कोई गीत अच्छा लगे और वो आप सब के पास ना पहुँचे ये कभी हुआ है भला ? इस गीत को सुनने के लिये यहाँ
क्लिक कीजिए ।

चलचित्र चिराग (१९६९) के लिये ये गीत मोहम्मद रफी की आवाज में रिकार्ड किया गया था। धुन बनाई थी मदन मोहन साहब ने ।
 

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