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मंगलवार, मई 14, 2019

कैसे बना अराधना का सदाबहार नग्मा 'रूप तेरा मस्ताना'? Story Behind 'Roop Tera Mastana'

इस साल सितंबर में राजेश खन्ना व शर्मिला टैगोर की कालजयी फिल्म अराधना को पचास साल हो जाएँगे। इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा के दो महान कलाकारों की किस्मत बदल कर रख दी थी। फिल्म के नायक राजेश खन्ना इसी फिल्म की बदौलत स्टारडम की सीढियाँ चढ़ते हुए सुपरस्टार बन गए वहीं इस फिल्मों के गीतों की वज़ह से किशोर कुमार का सितारा ऐसा चमका कि वे सत्तर के दशक में सबसे लोकप्रिय गायक का मुकाम हासिल करने में सफल हुए। इन दोनों को शोहरत की बुलंदियों तक पहुँचाने में पर्दे के पीछे दो किरदार थे। फिल्म के निर्देशक शक्ति सामंत और संगीतकार सचिन देव बर्मन।

आज भी इस फिल्म के सारे गाने उतने ही प्यार से सुने जाते हैं जितने दशकों पहले सुने जाते थे। मेरे सपनों की रानी, कोरा काग़ज़ था ये मन मेरा, सफल होगी तेरी अराधना, बागों में बहार है, गुनगुना रहे हैं भँवरे, चंदा है तू मेरा सूरज है तू जैसे तमाम गीत आज भी रेडियो के विविध चैनलों में अक्सर सुनाई दे जाते हैं।


इसी फिल्म का एक और मस्ती से भरा गीत था रूप तेरा मस्ताना जिसकी बीट्स पर शायद ही कोई ऐसा हो जिसने ठुमके ना लगाए हों।  फिल्म सचिन दा की झोली में कैसे आई? ये गीत कैसे अपनी अंतिम शक्ल में आया? इन सब के पीछे एक रोचक दास्तां छिपी है। तो चलिए आज इस गीत की याद दिलाने के साथ इन किस्सों से भी आप सबको रूबरू करा दूँ

अराधना के रिलीज़ होने के दो साल पहले शक्ति सामंत की फिल्म An evening in Paris रिलीज़ हुई थी। फिल्म में शंकर जयकिशन का संगीत जबरदस्त हिट हुआ था तो ये ज़ाहिर सी बात लग रही थी कि अगली फिल्म में भी शक्ति दा शंकर जयकिशन का ही दामन थामेंगे। इसीलिए जब एक सुबह अपने सहयोगियों के साथ शक्ति दा सचिन देव बर्मन के घर पहुँचे तो दादा उन्हें देख कर चकित हुए। खागेश देव बर्मन सचिन दा पर लिखी अपनी किताब The world of his music में लिखते हैं कि

"शक्ति सामंत ने सचिन दा से कहा कि मैं इक कम बजट की फिल्म बना रहा हूँ। शंकर जयकिशन को रखना इस बजट में मेरे लिए मुश्किल है इसलिए आप के पास आया हूँ कि अगर आप...
सचिन दा बिफर उठे कि तुम मुझसे कम पैसों में काम कराना चाहते हो? बजट कम है  इसलिए मेरे पास आए हो, ऐसा सुनकर मुझे अच्छा लगेगा क्या? ये सब कहने के बजाए इतना नहीं कह सकते थे कि मुझसे संगीत निर्देशन करवाना चाहते हो?
सचिन दा पैसों के बारे में बात नहीं करते थे। पैसों का मोलभाव करना उन्हें राजसी परिवेश में पले बढ़े होने की वजह से अपनी शान के खिलाफ लगता था। पर उस दिन वो बोल उठे।
चलो ठीक है पिछली फिल्म में तुमने मुझे 75000 रुपये दिए थे। इस बार मैं 80000 रुपये लूँगा।
शक्ति सामंत ने पूरी विनम्रता से उन्हें उत्तर दिया - सर इस मद में फिल्म में एक लाख का प्रावधान है।
सचिन दा एकदम से प्रफुल्लित हो उठे। बोले एक लाख! तुम देखना इस फिल्म का संगीत ख़ुद अपनी आवाज़ बनेगा, सारे रिकार्ड तोड़ देगा।"
सचिन दा, शक्ति सामंत, राजेश खन्ना और पंचम के साथ
जैसा सचिन दा ने कहा था वैसा बाद में हुआ भी। फिल्म तो सचिन दा ने ले ली और उसके गीत बनने शुरु हुए।रूप तेरा मस्ताना गीत किस तरह अपने अस्तित्व में आया इसके पीछे दो अलग अलग मत हैं। एक तो वो जो किशोर कुमार के पुत्र अमित कुमार, संगीत से जुड़े कार्यक्रमों में बताते रहे हैं और दूसरा ब्रजेन विश्वास का कथ्य जो सचिन की टीम के तबला वादक रहे। ब्रजेन विश्वास की बात का जिक्र खागेश देव बर्मन ने भी अपनी किताब में भी किया है। खागेश जी  ने ब्रजेन विश्वास के हवाले  इस प्रसंग की चर्चा अपनी किताब में कुछ यूँ की है

एक बार जब सचिन दा मुंबई से कोलकाता आए तो अपने घर में हारमोनियम बजाते हुए बोल उठे कि जानते हो शक्ति ने मुझे अपनी फिल्म में संगीत  निर्देशन की जिम्मेदारी सौंपी है। उसमें मुझे एक सेक्सी नंबर भी करना है। 
उसी के बारे में सोच रहा था कि मुझे ख्याल आया कि एक बार मैं अपने मित्र के घर गया था। बहुत देर तक दरवाजा खटखटाने के बाद वो निकला तो उसने कहा कि क्षमा करें दादा मैं अपने बेटे की शादी कर रहा हूँ इसीलिए उसे धोती पहना रहा था । वहीं एक छोटी लड़की मिट्टी के चूल्हे से खेल रही थी। जब उसने शादी वाले बालक को देखा तो जोर से हँस पड़ी और बोली तुम इस छोटे बच्चे की शादी करोगे? लड़के के  पिता ने कहा कि हाँ अभी इसलिए कर रहा हूँ कि आगे जा के ये बिगड़ न जाए। ये सुनकर वो लड़की हँसी और गाने लगी 
कालके जाबो ससुर बाड़ी, आजके खाइ गारा गरी
(यानी कल ससुराल जाना है इसलिए मैं आज खुशी से झूम रही हूँ) 
शक्ति दा की बात सुनकर मुझे यही गाना याद आ गया। मैं इसी गीत का टेंपो कम करके किशोर को गाने को कहूँगा। रही सेक्सी बनाने की बात तो गीत के बीच किशोर को गहरी साँसों के साथ आहें भरने को बोलूँगा।

सचिन दा ने जो धुन बनाई उसका कलेवर आंचलिक था। अमित कुमार के हिसाब से वो भटियाली था। गीत की परिस्थितियों से ये धुन जम नहीं रही थी। किशोर दा और पंचम दोनों ही ये महसूस कर रहे थे। अंत में हिम्मत बाँध कर पंचम ने अपने स्टाइल में कालके जाबो ससुर बाड़ी को संगीतबद्ध किया और पिता को सुनाया। सचिन दा को भी वो धुन पसंद आई और  आनंद बक्षी के बोलों की मदद से ये गीत अपना अंतिम स्वरूप ले पाया।

अमित कुमार इस प्रसंग का जिक्र कुछ दूसरी तरह से करते हैं पर उनके कथन से ज्यादा विश्वसनीयता ब्रजेन विश्वास की बातों में लगती है। बहरहाल अमित किस तरह सचिन दा की मूलधुन का जिक्र करते हैं वो देखने लायक है।

 

गायक भूपेंद्र का कहना है कि रूप तेरा मस्ताना की धुन सचिन दा की ही थी। अमित कुमार भी यही कहते हैं। धुन भले ही सचिन दा की हो पर जिस तरह के संगीत संयोजन के लिए पंचम जाने जाते थे उसकी स्पष्ट झलक इस गीत के प्रील्यूड और इंटरल्यूड में सुनाई देती है।

कॉलेज के ज़माने में किशोर कुमार के गाए चुनिंदा गीतों को मैंने कैसेट में रिकार्ड करवाया था। ये गीत साइड A का पहला गीत हुआ करता था। किशोर दा की आवाज़ और पश्चिमी वाद्यों की सुरीली धमक युवा मनों को मस्ती के रंग में ऐसी तरंगित कर देती थी कि आगे के गाने सुनने के बजाए इसी गाने को रिपीट मोड में बारहा बजाया जाता था। तो चलिए एक बार और सुनते हैं ये गीत..

रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना 
भूल कोई हमसे ना हो जाये

रात नशीली मस्त समा है 
आज नशे में सारा जहाँ है
आए शराबी मौसम बहकाए  
रूप तेरा मस्ताना....

आँखों से आँखें मिलती हैं ऍसे 
बेचैन हो के तूफ़ाँ में जैसे
मौज कोई साहिल से टकरा
रूप तेरा मस्ताना...

रोक रहा है हमको ज़माना 
दूर ही रहना पास ना आना
कैसे मगर कोई दिल को समझाए ...
रूप तेरा मस्ताना...

रविवार, अप्रैल 23, 2017

चाँद फिर निकला, मगर तुम न आए : सचिन दा व मजरूह की जुगलबंदी का कमाल Chand Phir Nikla

1957 में एस डी बर्मन साहब की तीन फिल्में प्रदर्शित हुई थीं। प्यासा, पेइंग गेस्ट और नौ दौ ग्यारह। हिट तो ये तीनों फिल्में रहीं। पर इनमें गुरुदत्त की प्यासा हर लिहाज़ से अलहदा फिल्म थी। फिल्म का संगीत भी उतना ही चला। फिल्म के गीतकार थे साहिर लुधियानवी। अक्सर जब गीतकार संगीतकार मिलकर इस तरह की सफल फिल्में देते हैं तो उनकी जोड़ी और पुख्ता हो जाती है  पर सचिन दा की उसी साल रिलीज़ फिल्मों में साहिर का नाम नदारद था और उनकी जगह ले ली थी मजरूह सुल्तानपुरी ने।

सचिन दा और साहिर की अनबन की पीछे उनके अहम का टकराव था। साहिर को एक बार ओ पी नैयर ने एक फिल्मी पार्टी में ये कहते सुना था कि मैंने ही सचिन दा को बनाया है। ज़ाहिर है साहिर के मन में ये बात रही होगी कि गीतकार के रूप में उनका योगदान संगीतकार से ज्यादा है। ऐसा कहा जाता है कि प्यासा के निर्माण के दौरान वे अपना पारिश्रमिक सचिन दा से एक रुपये ज्यादा रखने पर अड़े रहे। शायद उनके इस रवैये से सचिन दा खुश नहीं थे।

सचिन दा की मजरूह के साथ आत्मीयता थी। इसलिए जब पेइंग गेस्ट में गीतकार को चुनने का वक़्त आया तो उन्होंने मजरूह को बुला लिया। सचिन दा मजरूह को मुजरू कह कर बुलाते थे। चाय, काफी और पान के साथ दोनों की घंटों सिटिंग चलती। सचिन दा धुन रचते और बोलों से धुन का तालमेल बिठाते। कभी कभी तो एक ही गीत के लिए दस या बीस धुनें बनती। ये सिलसिला तब तक चलता जब तक सचिन दा खुद संतुष्ट नहीं हो जाते। अगर कहीं दिक्कत होती तो मुजरू को बोल बदलने को कहते।


पेइंग गेस्ट के लिए सचिन दा ने एक बेहद मधुर धुन  बनाई थी जिस पर मजरूह ने मुखड़ा दिया था चाँद फिर निकला मगर तुम ना आए। विरह की भावना से ओतप्रोत इस गीत में जिस तरह मजरूह ने चाँद जैसे बिम्ब का प्रयोग किया था वो इस गीत को अनुपम बना देता है।

चाँद फिर निकला, मगर तुम न आए
जला फिर मेरा दिल, करुँ क्या मैं हाय
चाँद फिर निकला …


पर मुझे इस गीत की सबसे दिल को छूती पंक्ति वो लगती है जब मजरूह पहले अंतरे में कहते हैं

ये रात कहती है वो दिन गये तेरे
ये जानता है दिल के तुम नहीं मेरे

खड़ी मैं हूँ फिर भी निगाहें बिछाये
मैं क्या करूँ हाय के तुम याद आए
चाँद फिर निकला …


रात के साथ दिन के इस सहज मेल से अच्छे दिन चले जाने का जो भाव पैदा किया मजरूह ने उसका जवाब नहीं।
 
सुलगते सीने से धुँआ सा उठता है
लो अब चले आओ के दम घुटता हैं
जला गये तन को बहारों के साये
मैं क्या करुँ हाय के तुम याद आए
चाँद फिर निकला …


मजरूह अपने साक्षात्कारों में अक्सर कहा करते थे कि सचिन दा को ज्यादा साज़ और साज़िंद पसंद नहीं थे। वे  अक्सर कोशिश करते कि कम से कम वाद्य यंत्रों से काम चलाया जाए। शंकर जयकिशन से उलट आर्केस्ट्रा के प्रयोग से वो दूर रहना पसंद करते थे। सचिन दा का मानना था कि गाने पर अगर ज्यादा  जेवर चढ़ेगा तो गाना तो फिर दिखेगा ही नहीं। प्रील्यूड व इंटरल्यूड्स को छोड़ दें तो इस गीत में लता की आवाज़ के साथ घटम के आलावा कोई ध्वनि नहीं आती। पर मजरूह के बोल और सचिन दा की मेलोडी इतनी जबरदस्त थी कि वहाँ  संगीत का आभाव ज़रा भी नहीं खटकता। यही वजह है कि ये गीत छः दशकों बाद भी हम सबके दिलों पर अपनी गिरफ्त बनाए हुए है।

फिल्म में देव आनंद की प्रतीक्षा करती नूतन के गीत को भावों को अपनी भाव भंगिमा से जोड़ा है कि लता की आवाज़ का दर्द पर्दे पर भी बखूबी उभर आता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को..

गुरुवार, अक्टूबर 06, 2016

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये... घुम भूलेछी Hum Bekhudi mein tumko .. Ghum bhulechhi nijhum

सन 1958 में इक फिल्म आई थी काला पानी। नवकेतन का बैनर था और फिल्म के संगीतकार थे, देव आनंद के दिलअजीज़ सचिन देव बर्मन। बतौर नायक देव आनंद ने इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता था। फिल्म का संगीत भी काफी मशहूर हुआ था। ये वो दौर था जब सचिन दा और लता दी के बीच की अनबन ज़ारी थी। यही वज़ह थी  कि फिल्म में नायिका के सभी गीत आशा जी ने गाए थे। देव आनंद और मधुबाला की मीठी नोंक झोंक से भरा  गीत अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना को तो लोग आज भी याद करते हैं। वहीं नज़र लागी राजा तोरे बँगले पर..होठों पर एक मुस्कुराहट जरूर ले आता है। पर इस फिल्म का सबसे शानदार नग्मा था मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में। याद आया ना आपको हाँ वही हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये


पर जानते हैं इस गीत की धुन सचिन दा ने कब रची थी? फिल्म के रिलीज़ होने के करीब एक साल पहले। दरअसल बंगाल में ये परंपरा रही है कि वहाँ के संगीतकार हर साल दुर्गा पूजा के समय अपनी नई धुनों के साथ एक एलबम जरूर निकालते थे। सन 1957 के दशहरे में रिलीज़  किये गए एलबम के  एक गीत के बोल थे ..घुम भूलेची निझुम इ निशिथे जेगे थाकी और इन्हें लिखा था गौरीप्रसाद मजुमदार ने।सचिन दा ने अपनी इस  संगीतबद्ध रचना को खुद ही आवाज़ दी थी । तो सचिन दा की आवाज़ में इस गीत  को सुनने के पहले क्यूँ ना इस गीत के भावों से आपका परिचय करा दिया जाए?

घुम भूलेछी  निझुम इ निशिथे.. जेगे थाकी
आर आमरी मोतोन, जागे नींदे, दूती पाखी, घुम्म....


पिछले कई दिनों से मैं नींद को भूल सा गया हूँ, रात भर जागता रहता हूँ ठीक उसी तरह जिस तरह प्यार में डूबे ये दो पंक्षी सूने आकाश को ताकते हुए जग रहे हैं।

कोथा दिये चिले, आसिबे गो फीरे
चाँद जाबे दूरे, आकाशरो तीरे
ताय, तोमारे आमि, बारे बारे पीछू डाकी
घुम भूलेची..घुम्म...


तुम कहाँ चले गए लौटने का वादा करके! देखो अब तो चाँद भी खिसकता हुआ आकाश के कोने में जा चुका है और उसके साथ भटकता मेरा मन तुम्हें बार बार पुकार रहा है

ऐके ऐके ओइ डूबे गेलो तारा
तबू तूमी ओगो दिले ना तो शारा
हाय एलेया जेनो, आलो होए, दिलो फांकी
घुम भूलेची..घुम्म...


एक एक कर सारे तारे डूबने लगे हैं और सुबह के धुँधलके में मैं तुम्हें ढूँढ रहा हूँ। रात के इस अंतिम प्रहर में मृगतृष्णा सी तुम्हारी झलक का छलावा रोशनी के आने के बाद टूट चुका है।

  

काला पानी के गीत में सचिन दा ने इसी धुन का इस्तेमाल किया। अपनी किताब सरगमेर निखद में वे कहते हैं "मैंने इस गीत का मुखड़ा ग़ज़ल की तरह और अंतरा गीत की तरह रचा। मैं जैसा चाहता था रफ़ी ने इस गीत को वैसा ही निभाया।"

सच, रफ़ी साहब ने मजरूह सुल्तानपुरी के बोलों पर जिस तरह इस गीत की अदायगी की उसके लिए प्रशंसा के जितने भी शब्द लिखे जाएँ, कम होंगे। नशे में अपना ग़म गलत करते देव आनंद के दिल की करुण पुकार को पर्दे पर रफ़ी ने अपनी आवाज़ से जीवंत कर दिया था। सचिन दा ने बंगाली गीत में शुरुआत सरोद से की थी पर काला पानी में रफ़ी की आवाज़ के साथ नाममात्र का संगीत रखा। सचिन दा के "घुम्म.." के बाद की कलाकारी को रफ़ी आलाप के साथ "हम.." के बाद ले आए। "चले गए" को वो दुबारा जिस तरह गाते हैं तो कलेजा मुँह को आ जाता है। मजरूह का लिखा दूसरे अंतरा मुझे गीत की जान लगता है खासकर तब जब वो कहते हैं डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले...शीशे में आपको भी उतारे चले गये

हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये
साग़र में ज़िन्दगी को उतारे चले गये

देखा किये तुम्हें हम, बनके दीवाना
उतरा जो नशा तो, हमने ये जाना
सारे वो ज़िन्दगी के सहारे चले गये
हम बेखुदी में...

तुम तो ना कहो हम, खुद ही से खेलें
डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले
शीशे में आपको भी उतारे चले गये
हम बेखुदी में...

 तो आइए एक बार फिर सुनते हैं रफ़ी साहब के इस गीत को..

सोमवार, जून 23, 2014

ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए..मज़रूह की यादों में सचिन दा Aise to na Dekho .. Majrooh remembers S D Burman

पिछली पोस्ट में तीन देवियाँ फिल्म के गीत के बारे में चर्चा करते वक़्त बात हुई थी मज़रूह साहब के बारे में। आज आपसे गुफ़्तगू होगी इसी फिल्म के एक और गीत के बारे में। पर रफ़ी साहब के गाए इस नाज़ुक से नग्मे का जिक्र करूँ, उससे पहले आपको ये बताना चाहूँगा कि मज़रूह साहब कैसे याद करते थे सचिन देव बर्मन साहब के साथ गुजरे उन सालों को।

आपको बता ही चुका हूँ मज़रूह कम्यूनिस्ट विचारधारा से काफी प्रभावित थे। सचिन दा से उनकी पहली मुलाकात वामपंथियों के एक सम्मेलन में कोलकाता में हुई थी। सचिन दा ने मज़रूह से पहले साहिर लुधयानवी के साथ कुछ फिल्मों में काम किया। फिर किसी बात पर उनकी साहिर से अनबन हो गई तो उन्होंने मज़रूह को फिल्म Paying Guest के गाने लिखने के लिए बुलाया। 

मज़रूह को परिस्थिति दी गयी कि एक वकील अपनी महबूबा के लिए गा रहा है। मज़रूह ने सोचा वकील है थोड़ा सौम्य होगा तो उसी मिजाज़ का गाना लिख कर दे दिया। निर्देशक उनके इस प्रयास से तनिक भी खुश नहीं हुए कहा पहले फिल्म देखिए फिर गाना लिखिए। मज़रूह ने फिल्म देखी और अपना सिर ठोक लिया। उन्होंने कहा कि आपने मुझसे वकील के लिए गाना लिखने को क्यूँ कहा? सीधे कहते कि एक लोफ़र के लिए गाना लिखना है जो इक लड़की के पीछे पड़ा है और तब मज़रूह ने लिखा माना जनाब ने पुकारा नहीं, क्या मेरा साथ भी गवारा नहीं जो बेहद लोकप्रिय हुआ।

बिमल दा की फिल्म में मज़रूह ने सचिन दा के लिए एक गाना लिखा जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये...। इस कालजयी गीत (जो मुझे बेहद प्रिय है) के बारे में मैंने पहले यहाँ भी लिखा था पर फिल्म में इस गीत को फिल्माने पर विवाद खड़ा हो गया। फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से ये गीत नायक नायिका द्वारा टेलीफोन करते हुए फिल्माया जाना था पर विमल दा जैसे यथार्थवादी निर्देशक फिल्म के नाम पर इतनी सिनेमेटिक लिबर्टी लेने के लिए तैयार नहीं थे। मज़रूह बताते हैं आमतौर पर डरपोक समझे जाने वाले सचिन दा इस बार बहादुरी से अड़ गए और थोड़ी देर इधर उधर टहलने के बाद बिमल दा से बोले "अगर तुम इस फिल्म में मेरा गाना नहीं लेगा तो हम पिक्चर नहीं करेगा"। सचिन दा के इस रूप को देखने के बाद बिमल दा को उनकी बात माननी पड़ी और इतिहास गवाह है कि इस गीत ने कितनी वाहवाहियाँ बटोरीं।

सचिन दा के बारे में मशहूर था कि वो अपने यहाँ आने वालों को चाय नाश्ते के लिए ज़्यादा नहीं पूछते थे। इसी मद्देनज़र मज़रूह साहब ने एक किस्सा बयाँ किया था। वाक़या ये था कि
एक बार सचिन दा , उनका सहायक, साहिर और मज़रूह गाड़ी से चर्चगेट से कहीं जा रहे थे। रास्ते में सचिन दा ने एक केला निकाला और खाने लगे। फिर उन्होंने साहिर से पूछा "कोला लेगा"? साहिर और मज़रूह अचरज़ में पड़ गए कि कहाँ से सचिन दा का दरिया - ए  -रहमत जोश मारने लगा ? अभी दोनों इसी असमंजस में थे कि सचिन दा ने कहा ड्राइवर गाड़ी रोको और फिर साहिर की ओर मुख़ातिब होकर बोले जाओ ओ दिखता है... जा कर ले लो।

सचिन दा के बारे में मज़रूह की याद की पोटलियों से निकले कई किस्से और भी हैं पर वो फिर कभी। आइए अब बात की जाए तीन देवियों के इस बेहद प्यारे से नग्मे की।

 
सचिन दा इस बाद के हिमायती थे कि गीत में उतना ही संगीत दिया जाए जितनी जरूरत हो। कहीं बेख्याल हो कर कहीं छू लिया किसी ने में आप इसका नमूना देख ही चुके हैं पर जहाँ तक ऐसे तो ना देखो की बात है यहाँ सचिन दा की शुरुआती धुन और इंटरल्यूड्स गीत के मूड में और जान डाल देते हैं। राग ख़माज पर आधारित इस गीत को हिंदुस्तानी ज़ुबान की जिस रससिक्त चाशनी में घोला है मज़रूह ने कि बोलों को पढ़कर ही मन में एक ख़ुमार सा छाने लगता है। अब इसी अंतरे को लीजिए यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें..बढ़ के बेखुदी हसीं गेसू खोलें..खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

अब आप ही बताइए काजल से सजी आँखों के बीच कोई अपनी खूबसूरत लटों को लहरा दे तो आसमान में बदली छाए ना छाए दिल तो इन काली घटाओं के आगोश में भींग ही उठेगा ना। रफ़ी ने इसी चाहत को गीत के हर अंतरे में अपनी अदाएगी के द्वारा इस तरह उभारा मानो वो ख़ुद मदहोशी की हालत में गाना गा रहे हों। तो आइए आज की शाम जाम के तौर पर इस गीत का रसपान किया जाए


ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए
ख़ूबसूरत सी कोई हमसे ख़ता हो जाए

तुम हमें रोको फिर भी हम ना रुकें
तुम कहो काफ़िर फिर भी ऐसे झुकें
क़दम-ए-नाज़ पे इक सजदा अदा हो जाये

ऐसे तो न देखो....

यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें
बढ़ के बेखुदी हसीं गेसू खोलें
खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए

ऐसे तो न देखो.....

हम तो मस्ती में जाने क्या क्या कहें
लब-ए-नाज़ुक से ऐसा ना हो तुम्हें
बेक़रारी का गिला हम से सिवा हो जाये
ऐसे तो न देखो
.....

फिल्म तीन देवियाँ में ये गीत देव आनंद और नंदा पर फिल्माया गया था।

शनिवार, जून 14, 2014

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने... जब मज़रूह की ग़ज़ल परवान चढ़ी रफ़ी की आवाज़ में (Mazrooh, Rafi in Teen Deviyan)

पिछले हफ्ते गुजरे सालों के सुपरस्टार देवानंद पर फिल्माए गानों को देख रहा था। साठ के दशक में किशोर को देव आनंद की आवाज़ का पर्याय माना जाने लगा था , पर अगर गौर किया जाए तो इसी दौरान मोहम्मद रफ़ी को भी पर्दे पर देव आनंद की आवाज बनने के मौके मिले जिन्हें उन्होंने खूबसूरती से निभाया भी। ऐसी ही एक फिल्म थी 1965 में प्रदर्शित हुई 'तीन देवियाँ' जिसके संगीतकार थे सचिन देव बर्मन और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी। फिल्म तो निहायत औसत दर्जे की थी पर इसका संगीत इतना मशहूर हुआ कि फिल्म को हिट करा गया।


मज़रूह साहब कमाल के गीतकार थे। अब आप ही बताइए कि जिस शख़्स ने 1946 में 'शाहजहाँ' के गीतों को लिख कर शोहरत पाई हो और जो उसके पाँच दशकों के बाद भी 'क़यामत से क़यामत तक' और 'जो जीता वही सिंकदर' जैसी फिल्मों के गीतों को लिखकर युवा दिलों पर राज करता रहा ऐसी उपलब्धि उनसे पहले किस गीतकार के हाथ लगी थी? यही वज़ह थी कि किसी गीतकार को अगर फिल्म जगत का सबसे बड़ा 'दादा साहब फालके पुरस्कार' सबसे पहले मिला तो वो मज़रूह साहब ही थे।

पर वास्तव में मज़रूह साहब को अंत तक इस बात का मुगालता रहा कि पुरस्कार मिला भी तो गीतकार की हैसियत से जबकि उनका सपना हमेशा अपने समकालीन फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तरह एक प्रतिष्ठित ग़ज़लकार बनने का ही था। चालीस के दशक में वो मुंबई एक मुशायरे में शिरक़त करने ही आए थे और उनकी ग़ज़लों से प्रभावित हो कर एक निर्माता नेजब उन्हें गीतकार बनने का मौका दिया तो उन्होंने उसे ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि ये इज़्ज़त की नौकरी नहीं है। पर जिगर मुरादाबादी के ये समझाने पर कि बतौर जीविका चलाने के लिए तुम ये काम करो, बाकी ग़ज़लें लिखते रहो....वो मान गए। पचास के दशक के बाद से ये धारदार कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा को कार्यान्वित ना होते देख उसमें सक्रिय भागीदारी से तो विमुख हो ही गया था, साथ ही वक़्त के साथ ग़ज़लों से भी दूर होता चला गया।

गीतकार के रूप में इतनी सफलता हाथ लगी कि उन्हें अपने हुनर पर और समय देने का अवसर ही नहीं मिला। पर जब जब फिल्मों में ग़ज़ल लिखने का उन्हें मौका मिला उन्होंने अपना कौशल दिखाने में कोताही नहीं की। अब तीन देवियाँ फिल्म के इस गीत को लें क्या मतला (प्रारंभिक शेर) लिखा था मज़रूह ने

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने

मैं तो कहता हूँ बस इसी शेर को गुनगुनाते हुए घंटों निकालें जा सकते हैं। कितनी आम सी बात को इस करीने से पकड़ा मज़रूह साहब ने कि तन मन गुदगुदा उठे। वैसे बाकी के मिसरे भी अच्छे भले हैं और रफ़ी की आवाज़ का साथ पाकर और फड़क उठे हैं।

वैसे मज़रूह अगर सामने होते तो एक बात जरूर पूछता उनसे जब गाना देव आनंद गा रहे थे तो फिर चौथे मिसरे में 'किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने' कैसे कह गए? कोई स्त्रीसूचक शब्द जैसे महज़बीं/दिलनशीं और मुनासिब होता। शायद शेर के बहर यानि मीटर की बंदिशों को तोड़ना उन्हें गवारा ना लगा हो।

कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने , कहीं बेख़याल होकर

मेरे दिल मैं कौन है तू, कि हुआ जहाँ अँधेरा
वहीं सौ दिये जलाये, तेरे रुख़1 की चाँदनी ने
 
कभी उस परी का कूचा, कभी इस हसीं की महफ़िल
मुझे दरबदर फिराया, मेरे दिल की सादगी ने

है भला सा नाम उसका, मैं अभी से क्या बताऊं
किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने

अरे मुझपे नाज़ वालों, ये नयाज़मन्दियाँ2 क्यों
है यही करम तुम्हारा, तो मुझे ना दोगे जीने

कई ख्वाब.....कहीं बेख़याल होकर

1. चेहरा, 2.अहसान


सचिन देव बर्मन के साथ इसी फिल्म में मजरूह ने एक और प्यारा गीत लिखा था जो मुझे इससे भी प्यारा लगता है। पर अभी मैं आपको इस गीत की ख़ुमारी से जगाना नहीं चाहता तो उस गीत की बातें अगली प्रविष्टि में।

सोमवार, अक्टूबर 21, 2013

रंगीला रंगीला रंगीला रे...सुन मेरे बंधु रे : क्या था भाटियाली गीतों के प्रति सचिन दा का नज़रिया ?

पिछले हफ्ते थाइकैंड की यात्रा पर निकलने की वज़ह से एस डी बर्मन से जुड़ी श्रंखला का आख़िरी भाग आपके सम्मुख पहले नहीं ला सका। जैसा कि मैंने पिछली पोस्ट में जिक्र किया था कि इस कड़ी में मैं उन गीतों की बात करूँगा जिनके बारे में चर्चा करने का अनुरोध आपने अपनी टिप्पणियों में किया है। साथ ही एक सरसरी सी नज़र हिंदी फिल्मों में गाए उनके अन्य गीतों पर भी होगी...



तो आज की कड़ी की शुरुआत करते हैं निहार रंजन के पसंदीदा बाँग्ला गीत रंगीला रंगीला रंगीला रे..से। बर्मन दा ने अपनी आवाज़ में ये गीत सन 1945 में रिकार्ड किया था और ये बेहद लोकप्रिय भी हुआ था। खागेश देव बर्मन, सचिन दा से जुड़ी अपनी किताब में इस गीत के संदर्भ में लोक संगीत को निभाने में सचिन दा की माहिरी के बारे में संगीतकार व गायक कबीर सुमन को उद्धृत करते हुए कहते हैं

लोक संगीत की नब्ज़ जाने बगैर इस गीत की पंक्ति तुमी होइयो किनर बंधु, आमि गांगेर पानी के बाद ई ई.. स्वर को खींचना एक आम गायक के बस की बात नहीं है। खागेश का मानना है कि इस गीत में कुछ खास शब्दों पर जोर देने के लिए सचिन दा का रुकना और डुबियो गेलो बेला के पहले हे हे ..का प्रयोग डूबते सूरज की स्थिति को गायिकी द्वारा चित्रित करने में सहायक होता है।

इस गीत को पूर्वी बंगाल के कवि जसिमुद्दिन ने लिखा था। बाँग्लादेश में जसिमुद्दिन को लोक या ग्रामीण कवि के रूप में जाना जाता है। रंगीला रे एक नाविक द्वारा गाया भाटियाली प्रेम गीत है जिसमें वो अपनी प्रेमिका से पूछता है कि आख़िर तुम मुझे छोड़ कर कहाँ चली गयी?

बंधु रंगीला रंगीला रंगीला रे
आमरे छाड़ियर बंधु कोइ गैला रे

नाविक कहता है कि तुम अगर चंदा हो तो मैं नदी की बहती धारा हूँ। देखना ज्वार भाटा की बेला में हम एक हो जाएँगे। अगर तुम फूल हो तो तुम्हारी सुगंध के पीछे मैं बहती हवा के रूप में देश विदेश तब तक भटकूँगा जब तक पागल ना हो जाऊँ। वैसे बंगाली ना होने के बावज़ूद ये गीत सहज ही मन में बैठ जाता है। आप भी सुनकर देखिए..




वैसे हिंदी फिल्मों में भाटियाली गीतों की परंपरा सचिन दा ने सुजाता में गाए अपने बेहद लोकप्रिय गीत सुन मेरे बंधु रे सुनो मोरे मितवा ...से की। क्या सहज व प्यारे बोल लिखे थे मज़रूह ने इस गीत में...

होता तू पीपल मैं, होती अमरलता तेरी
तेरे गले माला बनके, पड़ी मुसकाती रे, सुन मेरे...
दीया कहे तू सागर मैं, होती तेरी नदिया
लहर लहर करती मैं पिया से मिल जाती.. रे सुन मेरे.



भाटियाली लोक संगीत के बारे में सचिन दा का अपना एक नज़रिया था। उन्होंने लोक संगीत से जुड़े अपने एक लेख में लिखा है..
"मेरे लिए भाटियाली मिट्टी की एक धुन है। इसकी जड़े ज़मीन से निकलती हैं और धरती ही इन धुनों को पोषित पल्लवित करती है। भाटियाली एक तरह से बहती नदी का गीत है। इसके सुर, इसके बोल, इसकी पीड़ा, इसकी खुशियाँ हमें बंगाल की नदियों की याद दिलाती हैं। भाटियाली गीत एक आम किसान का प्रेम गीत भी हो सकता है तो वहीं वो राधा कृष्ण के रास रंग को भी चित्रित कर सकता है। भाटियाली गीतों का मूड, उनकी कैफ़ियत दार्शनिकता में डूबे अकेलेपन को स्वर देती है पर ये दार्शनिकता बाउल गीतों से अलग होती है।"

1969 में आराधना के साथ एक और फिल्म आयी थी जिसका नाम था तलाश जिसका जिक्र हर्षवर्धन ने अपनी टिप्पणी में किया है। इस फिल्म में भी सचिन दा ने अपने अन्य फिल्मी गीतों की तरह पार्श्व से एक गीत गाया था। गीत के बोल थे मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में शीतल छाया तू, दुख के जंगल में। फिल्म के ठीक प्रारंभ में आने वाले इस गीत के बोल लिखे थे गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने। माँ की ममता को सर्वोपरि मानने वाले इस गीत की भावनाओं से भला कौन अपने आपको अलग कर सकता है?



इन गीतों के आलावा सचिन दा ने Eight Days,ताजमहल, प्रेम पुजारी,तेरे मेरे सपने,ज़िंदगी ज़िंदगी व सगीना जैसी फिल्मों में भी पार्श्व गायक की भूमिका अदा की पर इन फिल्मों के लिए उनके गाए गीत उतने चर्चित नहीं रहे। इस प्रविष्टि के साथ सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला का यहीं समापन करता हूँ। आशा है सचिन दा के गाए इन गीतों और उनके पीछे छुपे व्यक्तित्व से जुड़ी बातों को आपने पसंद किया होगा।

सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...

शुक्रवार, अक्टूबर 04, 2013

सफल होगी तेरी आराधना, काहे को रोये... जब पहली बार मिला सचिन दा को गायिकी के लिए नेशनल अवार्ड !

हिंदी फिल्मों में सचिन दा के गाए गीतों की इस चर्चा में आज बात 1969 में आई फिल्म 'आराधना' की। आपको तो याद ही होगा कि इस फिल्म के सुपरहिट गीतों ने नवोदित नायक राजेश खन्ना और गायक किशोर कुमार के कैरियर का रुख ही मोड़ दिया था। इस फिल्म में सचिन दा ने एक गीत गाया था..सफल होगी तेरी आराधना..काहे को रोये। सचिन देव बर्मन के गाए अधिकांश गीतों से उलट इस गीत में भाटियाली लोक संगीत का अक़्स नहीं था। दरअसल इस गीत की जो प्रकृति है वो बहुत कुछ बंगाल के प्रचलित लोक नाट्य  जात्रा (यात्रा) में आने वाले प्रतीतात्मक क़िरदार बिबेक (विवेक) से मिलती जुलती है!

 'जात्रा' जो हिंदी शब्द 'यात्रा' का बंगाली रूप है, एक सांगीतिक लोक नाट्य के रूप में चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आंदोलन से प्रचलित होना शुरु हुआ। जात्रा की शुरुआत धान की कटाई के साथ होती थी जब कलाकार जत्थों के रूप में गाँव देहात के अंदरुनी इलाकों तक पहुँच जाते। ये सिलसिला अगले मानसून के आने के पहले चलता रहता।
इस तरह के लंबे नाटकों में संगीत का प्रयोग, आरंभिक भीड़ जुटाने और नाटक के बीच के परिदृश्यों को जोड़ने के काम में होता था।  इन नाटकों में अक्सर एक प्रतीतात्मक क़िरदार बिबेक (विवेक) का मध्य में आगमन होता जो नैतिकता के आवरण में नाटक की परिस्थितियों को एक दार्शनिक की तरह तौलते हुए अपना दृष्टिकोण रखता। अगर आपने गौर किया हो तो  पाएँगे कि इससे पहले वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ...में भी आप 'बिबेक' की इस दार्शनिकता का स्वाद चख चुके हैं। सचिन दा के सामने दिक्कत यही थी उनके गीतों में दार्शनिकता का पुट भरने वाले गीतकार शैलेन्द्र आराधना के बनने से पहले ही दुनिया छोड़ चुके थे। बर्मन दा ने शैलेंद्र की अनुपस्थिति में ये काम आनंद बख्शी को सौंपा।


बख्शी साहब को अपने शब्दों से  घोर निराशा में डूबी एक अनब्याही माँ (जिस के सर से अचानक ही प्रेमी और पिता का आसरा छिन जाता है) के मन में आशा का संचार करना था। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सहज शब्दों में जिस सोच को पैदा करने की काबिलियत शैलेंद्र ने अपने गीतों में दिखाई थी, आनंद बख्शी ने इस गीत में भली भाँति उस परंपरा का निर्वाह किया। सचिन दा ने इस खूबी से गीत की भावनाओं को अपने स्वर में उतारा कि उन्हें 1970 में इस गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का नेशनल एवार्ड मिला।

सचिन दा गाने के साथ प्रयुक्त होने वाले वाद्यों के बारे में निश्चित सोच रखते थे। गीतों में आर्केस्ट्रा के इस्तेमाल को वौ गैरजरूरी समझते थे। उन्हें लगता था कि विविध वाद्य यंत्रों का अतिशय प्रयोग गीत की आत्मा को मार देता है, उसे उभरने नहीं देता। बाँसुरी, सरोद सितार जैसे भारतीय वाद्य यंत्र तो उन्हें प्रिय थे ही वो लोक संगीत में बजने वाले वाद्य यंत्र जैसे इकतारा का भी अपने गीतों में अक्सर इस्तेमाल करते थे। इस गीत के संगीत पक्ष की बात करें तो उससे जुड़ा एक बड़ा मजेदार किस्सा है जिसका जिक्र निर्माता शक्ति सामंत ने अपने संस्मरणों में किया है।

"सचिन दा को मैंने एक बार ही बड़े गुस्से में देखा है। बात तबकी है जब सफल होगी तेरी.... की रिकार्डिंग चल रही थी। पंचम ने उस गीत के लिए कुल मिलाकर बारह वादकों को बुला रखा था जबकि सचिन दा ने पंचम को कह रखा था कि गीत में ग्यारह से ज्यादा वादकों की जरूरत नहीं है। पर पूरा दिमाग लड़ाने के बाद भी पंचम ये निर्णय नहीं ले पाए कि इनमें से किसे छाँटा जाए। जब सचिन दा आए तो वे ये देख के आगबबूला हो गए। आख़िरकार गीत ग्यारह वादकों से ही रिकार्ड किया गया। बारहवें वादक ने कुछ बजाया भले नहीं पर उसे सचिन दा ने पूरा मेहनताना दे कर ही विदा किया।"

तो ऐसे थे हमारे सचिन दा । तो आइए उनकी आवाज़ में इस गीत को सुना जाए..


बनेगी आशा इक दिन तेरी ये निराशा
काहे को रोये, चाहे जो होए
सफल होगी तेरी आराधना
काहे को रोये...

समा जाए इसमें तूफ़ान
जिया तेरा सागर सामान
नज़र तेरी काहे नादान
छलक गयी गागर सामान
ओ.. जाने क्यों तूने यूँ
असुवन से नैन भिगोये
काहे को रोये...

दीया टूटे तो है माटी
जले तो ये ज्योति बने
बहे आँसू तो है पानी
रुके तो ये मोती बने
ओ.. ये मोती आँखों की
पूँजी है ये ना खोये
काहे को रोये...

कहीं पे है दुःख की छाया
कहीं पे है खुशियों की धूप
बुरा भला जैसा भी है
यही तो है बगिया का रूप
ओ..फूलों से, काँटों से
माली ने हार पिरोये
काहे को रोये...


 

ये तो थे सचिन दा के गाए मेरे प्रियतम चार नग्मे। इस श्रंखला की आख़िरी कड़ी में मैं उन गीतों की बात करूँगा जिनके बारे में चर्चा करने का अनुरोध आपने अपनी टिप्पणियों में किया है। साथ ही एक सरसरी सी नज़र हिंदी फिल्मों में गाए उनके अन्य गीतों पर भी.. 

सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...


शनिवार, सितंबर 28, 2013

डोली में बिठाई के कहार.. जब सचिन दा ने पंचम की फिल्म में गाया कोई गीत !

सचिन देव बर्मन से जुड़ी इस श्रंखला  में बात चल रही है उनकी गायिकी से जुड़े कुछ पहलुओं की। अब तक चर्चा हुई बंदिनी और गाइड में गाए उनके कालजयी गीतों की। सचिन देव बर्मन के गाए गीतों की एक खासियत ये भी रही है कि वे किसी नायक पर नही फिल्माए गए बल्कि पार्श्व से आती आवाज़ के रूप में चलचित्रों में शामिल किए गए। वैसे भी सचिन देव बर्मन जिस आवाज़ के मालिक थे वो शायद ही उनके फिल्मी नायकों पर फबती। पार्श्वगीतों को फिल्म में रखने का एक फ़ायदा ये भी होता है वो किसी क़िरदार की भावना को ना व्यक्त कर, फिल्म की पूरी परिस्थिति को अपने दायरे में समेट लेते हैं।

ऐसा ही एक गीत था 1971 में आई फिल्म 'अमर प्रेम' का ! फिल्म के संगीत निर्देशक थे पंचम। इसी फिल्म में सचिन देव बर्मन ने एक गीत को आवाज़ दी थी डोली में बिठाई के कहार...लाए मोहे सजना के द्वार । वैसे सचिन दा का पंचम की किसी फिल्म के लिए गाया ये पहला और अंतिम गीत था। यूँ तो अमर प्रेम के सारे गीतों के संगीत निर्देशन का श्रेय पंचम के नाम है पर पंचम के वरीय सहयोगी और वादक मनोहारी सिंह की बात मानी जाए तो उनके अनुसार फिल्म बनते वक्त इस गीत के संगीत संयोजन का काम सचिन दा ने ही किया था। इस गीत की धुन जिसमें गीत के बोलों के बीच बाँसुरी का अच्छा इस्तेमाल है, दादा बर्मन के संगीत की अमिट छाप का संकेत देती है।

बहरहाल ये गीत अमरप्रेम की कास्टिंग के साथ आता है। आजकल तो शादी विवाह में डोली का प्रचलन रहा नहीं। पर एक ज़माना वो भी था जब डोली में दुल्हन अपने पिया के घर पहुँचती थी और फिर उसी घर की हो कर ही रह जाती थी। बड़ा चिरपरिचित संवाद हुआ करता था फिल्मों में उन दिनों कि डोली में आने के बाद अब इस घर से मेरी अर्थी ही निकलेगी।

यानि सामाजिक तानाबाना ऐसा बुना जाता था कि उस पराए घर के आलावा नवविवाहिता किसी और ठोर की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। ऐसे माहौल में पली बढ़ी युवती को घर से अचानक ही निकाल दिया जाए तो कैसी मानसिक वेदना से गुजरेगी वो? गीतकार आनंद बक्षी को फिल्म की इन्हीं परिस्थिति के लिए गीत की रचना करनी थी। गीत तो उन्होंने बड़ा दर्द भरा लिखा पर उसमें निहित भावनाओं में प्राण फूँकने के लिए जरूरत थी, सचिन दा जैसी आवाज़ की।

सचिन दा जिस अंदाज़ में ओ रामा रे... कहकर गीत का आगाज़ करते हैं वो गीत में छुपी पीड़ा की ओर इशारा करने के लिए काफी होता है। सचिना दा की गूँजती आवाज़ के साथ बजती बाँसुरी के बाद आती है इस गीत की ट्रेडमार्क धुन (डोली में बिठाई के कहार के ठीक पहले) जो इस गीत की पहचान है। पूरे गीत में इसका कई बार प्रयोग हुआ है। तो आइए मन को थोड़ा बोझिल करते हैं अमर प्रेम के इस गीत के साथ..


हो रामा रे, हो ओ रामा
डोली में बिठाई के कहार
लाए मोहे सजना के द्वार
ओ डोली में बिठाई के कहार
बीते दिन खुशियों के चार, देके दुख मन को हजार
ओ डोली में...

मर के निकलना था, ओ, मर के निकलना था
घर से साँवरिया के जीते जी निकलना पड़ा
फूलों जैसे पाँवों में, पड़ गए ये छाले रे
काँटों पे जो चलना पड़ा
पतझड़, ओ बन गई पतझड़, ओ बन गई पतझड़  बैरन बहार              
डोली में बिठाई के कहार...

जितने हैं आँसू मेरी, ओ, जितने हैं आँसू मेरी
अँखियों में, उतना नदिया में नाहीं रे नीर
ओ लिखनेवाले तूने लिख दी ये कैसी मेरी
टूटी नय्या जैसी तक़दीर
उठा माझी, ओ माझी, उठा माझी,
ओ माझी रे, उठा माझी
उठे पटवार 
डोली में बिठाई के कहार...

टूटा पहले मेरे मन, ओ, टूटा पहले मन अब
चूड़ियाँ टूटीं, ये सारे सपने यूँ चूर
कैसा हुआ धोखा आया पवन का झोंका
मिट गया मेरा सिंदूर
लुट गए, ओ रामा, लुट गए, ओ रामा मेरे लुट गए
सोलह श्रंगार         
डोली में बिठाई के कहार...


सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...

बुधवार, सितंबर 18, 2013

वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर, जाएगा कहाँ : कैसे सचिन दा की गायिकी ने उन्हें जेल की हवा खाने से बचाया ?

सचिन देव बर्मन के गाए पसंदीदा गीतों की श्रंखला में पिछली पोस्ट में बात हुई फिल्म बंदिनी के गीत मेरे साजन हैं उस पार.... की। आज उसी सिलसिले को बढ़ाते हुए बात करते हैं सचिन दा के गाए फिल्म 'गाइड' के बेहद मशहूर गीत वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर जाएगा कहाँ..... की...।  पर गाइड के इस गीत के बारे में बात करने से पहले ये जानना रोचक रहेगा कि दादा बर्मन को गायिकी का रोग लगा कैसे?
सचिन दा के पिता खुद भी ध्रुपद गायक थे। वे सितार भी बजाते थे। बालक सचिन देव बर्मन पर संगीत की पहली छाया उन्हीं के माध्यम से पड़ी। पर सचिन जिस लोक संगीत के बाद में मर्मज्ञ बने, उसका आरंभिक ज्ञान उन्हें राजपरिवार के लिए काम करने वाले सेवकों की सोहबत से मिला। पहली बार पाँचवी कक्षा में पूजा के अवसर पर सचिन दा ने गीत गाया। स्कूल से जब भी उन्हें वक़्त मिलता वे दोस्तों की मंडली के साथ गाने में तल्लीन हो जाते। बचपन के इन्हीं दिनों की एक मजेदार घटना का जिक्र सचिन दा अपने संस्मरण में कुछ इस तरीके से करते हैं....

"कोमिला से दस मील दूर कमल सागर में एक काली का मंदिर था। पूजा के दिनों में वहाँ एक मेला लगता था। हमारी मित्र मंडली उस मेले में जा पहुँची। हम खूब घूमे, इतना कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। मेला खाली होने लगा तो होश आया और किसी तरह दौड़ कर आखिरी गाड़ी पकड़ी। टिकट लेने के लिए समय ना बचा था। कोमिला उतरे तो टिकट चेकर ने आ घेरा। बहुत हाथ पैर जोड़े पर वो सुनने को तैयार ना हुआ। उलटे स्टेशन मास्टर से कह कर हमें एक कमरे में बंद करा दिया। एक तो घर से अनुमति नहीं ली थी और दूसरे इतनी देर भी हो गई थी, ऊपर से ये नई मुसीबत। मैं रोने लगा। पर मेरे एक मित्र को एक तरकीब सूझी। कुछ दिनों पहले पूजा के अवसर पर स्टेशन मास्टर की माँ उसके घर आई थी और उसका कोई गीत सुनकर भावविभोर हो कर रो पड़ी थी। याद तो नहीं पड़ता पर मेरे मित्र ने मुझसे भाटियाली या बाउल गीत गाने को कहा। मैंने जैसे तैसे रोना रोका और गाने लगा। परिणाम सचमुच अच्छा निकला, थोड़ी ही देर में कमरे के दरवाजे पर आहट हुई और दरवाजा खोलकर स्टेशन मास्टर की माँ अंदर आ गई। उसने अपने बेटे से कह कर हमें छुड़वा ही नहीं दिया बल्कि खाने के लिए मिठाई भी दी।"

तो देखा आपने किस तरह सचिन दा की गायिकी ने उन्हें जेल की हवा खाने से बचाया। सचिन दा पचास और साठ के दशक में मुंबई में बतौर संगीत निर्देशक फिल्मों में संगीत देते रहे पर हर साल कोलकाता जाकर उन्होंने अपने नए नए गीत रिकार्ड किए जिनमें कई बेहद लोकप्रिय हुए। साठ के दशक की शुरुआत में सचिन दा को हृदयाघात हुआ। तबियत खराब होने की वजह से उनका काम रुक गया।  देव आनंद तब गाइड पर फिल्म बनाने की तैयारियों में लगे थे। सारे निर्माता जब सचिन दा से कन्नी काट रहे थे तब देव आनंद ने सचिन दा के स्वस्थ होने का इंतज़ार किया और गाइड की कमान उन्हें ही सौंपी। दादा ने भी गाइड के लिए जो संगीत दिया वो सदा सदा के लिए अजेय अमर हो गया।

फिल्म की कहानी जेल से निकलते हुए गाइड राजू से शुरु होती है जो अपनी पुरानी ज़िंदगी में लौटने की बजाए अपने नए सफ़र की शुरुआत  के लिए एक अनजान डगर पर चल उठता है। सचिन दा ने इस परिस्थिति के लिए एक बार फिर गीतकार शैलेंद्र को याद किया। अपनी आत्मकथा सरगमेर निखाद में वो लिखते हैं कि

जो भी शैलेंद्र ने मेरे लिए लिखा व सीधा और सरल होता था।  यही वज़ह थी कि मैं अपने सीमित हिंदी ज्ञान के बावज़ूद उसके बोलों को मन में पूरी तरह दृश्यांकित कर पाता था।

शैले्द ने जिस खूबसूरती से जीवन के शाश्वत सत्य को, हमारे रहने ना रहने से दुनिया पर पड़ते फर्क को अपने दर्शन के साथ इस गीत में उभारा है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम होगी। इस गीत को अगर आप ध्यान से सुनें तो हर अंतरे की पहली और तीसरी पंक्ति को दो हिस्से में बँटा पाएँगे जिनके बीच और बाद में संगीत के टुकड़े गीत की भावनाओं की गूँज से प्रतीत होते हैं। सचिन दा दूसरी और चौथी पंक्ति में अपनी आवाज़ का सारा दर्द उड़ेल देते हैं। हर अंतरे की पाँचवी पंक्ति के ठीक बीच में नगाड़े की ध्वनि का इस्तेमाल भी बड़ी खूबसूरती से हुआ है। इसी वज़ह से इतने अल्प वाद्य यंत्रों के प्रयोग बावज़ूद ये गीत इतना प्रभावी बन पड़ा है। आख़िर में मुसाफ़िर शब्द को सचिन दा का अलग अलग रूप  में गाना, श्रोता कभी भूल नहीं पाता।

वैसे क्या आप जानते हैं सचिन दा ने इस गीत की आंरंभिक धुन अपने गाए बंगाली गीत  दूर कोन प्रबासे तोमि चले जाइबा रे, तोमि चोले जाइबा रे बंधु रे कबे आइबा रे से ली थी। यकीन नहीं आता तो सचिन दा के गाए इस बाँग्ला गीत को सुनिए।



और अब सुनिए फिल्म गाइड का ये नग्मा


वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर, जाएगा कहाँ
दम लेले घड़ी भर, ये छैयाँ, पाएगा कहाँ
वहाँ कौन है तेरा ...

बीत गये दिन, प्यार के पलछिन
सपना बनी वो रातें
भूल गये वो, तू भी भुला दे
प्यार की वो मुलाक़ातें
सब दूर अँधेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ...

कोई भी तेरी, राह न देखे
नैन बिछाए ना कोई
दर्द से तेरे, कोई ना तड़पा
आँख किसी की ना रोयी
कहे किसको तू मेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ...

कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी
पानी पे लिखी लिखायी
है सबकी देखी, है सबकी जानी
हाथ किसी के न आयी
कुछ तेरा ना मेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ ..

देव आनंद पर फिल्माए गीत को आप यहाँ देख सकते हैं।

सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...

शुक्रवार, सितंबर 13, 2013

मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार, हूँ इस पार : कैसे सचिन दा ने आत्मसात किया अपनी आवाज़ में भाटियाली लोक संगीत ?

ज़रा सोचिए एक ऐसे संगीतकार के बारे में जिसने हिंदी फिल्मों में बीस से भी कम गाने गाए हों पर उसके हर दूसरे गाए गीत में से एक कालजयी साबित हुआ हो। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ पंचम के पिता और त्रिपुरा के राजसी ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाले सचिन देव बर्मन की। सचिन दा के संगीतबद्ध गीतों से कहीं पहले उनकी आवाज़ का मैं कायल हुआ था। जब जब रेडियो पर उनकी आवाज़ सुनी उनके गाए शब्दों की दार्शनिकता और दर्द में अपने आपको डूबता पाया। बहुत दिनों से सोच रहा था कि सचिन दा के गाए गीतों के बारे में एक सिलसिला चलाया जाए जिसमें बातों का के्द्रबिंदु में उनके संगीत के साथ साथ उनकी बेमिसाल गायिकी भी हो।


इस श्रंखला में मैंने उनके उन पाँच गीतों का चयन किया है जो मेरे सर्वाधिक प्रिय रहे हैं।  तो आज इस श्रंखला की शुरुआत बंदिनी के गीत 'ओ रे माँझी, ओ रे माँझी, ओ मेरे माँझी...मेरे साजन हैं उस पार' से जो कहानी के निर्णायक मोड़ पर फिल्म समाप्त होने की ठीक पूर्व आता है। बंदिनी छुटपन में तब देखी थी जब दूरदर्शन श्वेत श्याम हुआ करता था। सच कहूँ तो आज फिल्म की कहानी भी ठीक से याद नहीं पर इस गीत और इसका हर एक शब्द दिमाग के कोने कोने में नक़्श है। कोरी भावुकता कह लीजिए या कुछ और, जब भी स्कूल और कॉलेज के ज़माने में इस गीत को सुनता था तो दिल इस क़दर बोझिल हो जाता कि मन अकेले कमरे में आँसू बहाने को करता। क्या बोल लिखे थे शैलेंद्र ने 

मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना..
गुण तो न था कोई भी.. अवगुण मेरे भुला देना।

नदी के जल से धुले सीधे सच्चे शब्द जो सचिन दा की आवाज़ के जादू से दिल में भावनाओं का सैलाब ले आते।

इस गीत को सुनते हुए क्या आपके मन में ये प्रश्न नहीं उठता कि एक नाविक द्वारा गाए जाने वाले गीतों को त्रिपुरा का ये राजकुमार अपनी गायिकी में इतनी अच्छी तरह कैसे समाहित कर पाया?

दरअसल असम, पश्चिम बंगाल, बाँग्लादेश से बहती ब्रह्मपुत्र नदी अपने चौड़े पाटों के बीच लोकसंगीत की एक अद्भुत धारा को पोषित पल्लवित करती है जिसे लोग भाटियाली लोक संगीत के नाम से जानते हैं। अविभाजित भारत में त्रिपुरा और आज का बाँग्लादेश का इलाका एक ही रियासत का हिस्सा रहे थे। 1922 में  इंटर पास करने के बाद सचिन दा बीए करने के लिए कलकत्ता जाना चाहते थे पर उनके पिता ने उन्हें कोमिला बुला लिया।  सत्तर के दशक में लोकप्रिय हिंदी पत्रिका धर्मयुग में दिए साक्षात्कार में सचिन देव बर्मन ने अपने उन दिनों के संस्मरण को बाँटते हुए लिखा था...

"जब एक वर्ष तक मैं पिताजी के पास रहा तब मैंने आसपास का सारा क्षेत्र घूम डाला। मैं मल्लाहों और कोलियों के बीच घूमता और उनसे लोकगीतों के बारे में जानकारी एकत्र करता जाता। मैं वैष्णव और फकीरों के बीच बैठता, उनसे गाने सुनता, उनके साथ हुक्का पीता। उन्हें पता भी नहीं चल पाया कि मैं एक राजकुमार हूँ। सारे नदी नाले जंगल तालाब मेरी पहचान के हो गए। उन दिनों मैंने इतने सारे गीत इकठ्ठा कर डाले कि मैं आज तक उनका उपयोग करता आ रहा हूँ पर भंडार कम ही नहीं होता। चालीस पचास वर्ष पूर्व के गीत आज भी मेरे गले से उसी सहजता से निकलते हैं।"

सो किशोरावस्था में अपने आस पास के संगीत से जुड़ने की वज़ह से सचिन दा के गले में जो सरस्वती विराजमान हुईं उसका रसपान कर आज कई दशकों बाद भी संगीतप्रेमी उसी तरह आनंदित हो रहे हैं जैसा पचास साठ साल पहले उन फिल्मों के प्रदर्शित होने पर हुए थे। तो आइए सचिन दा की करिश्माई आवाज़ के जादू में एक बार और डूबते हैं बंदिनी के इस अमर गीत के साथ...





ओ रे माँझी, ओ रे माँझी, ओ मेरे माँझी,
मेरे साजन हैं उस पार, मैं मन मार हूँ इस पार
ओ मेरे माँझी अब की बार, ले चल पार, ले चल पार
मेरे साजन हैं उस पार..

मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना
गुण तो न था कोई भी अवगुण मेरे भुला देना
मुझे आज की विदा का, मर के भी रहता इंतज़ार
मेरे साजन हैं उस पार..

मत खेल जल जाएगी, कहती है आग मेरे मन की
मैं बंदिनी पिया की, मैं संगिनी हूँ साजन की
मेरा खींचती है आँचल, मनमीत तेरी, हर पुकार
मेरे साजन..ओ रे माँझी...

विमल राय ने इस गीत को जिस खूबसूरती से पर्दे पर उतारा था वो भी देखने के क़ाबिल है। अगर सचिन दा के गाए इस गीत के संगीत पक्ष की ओर ध्यान दें तो पाएँगे कि पूरे गीत में बाँसुरी की मधुर तान तबले की संगत के साथ चलती रहती है। गीत की परिस्थिति के अनुसार स्टीमर के हार्न और ट्रेन की सीटी को गीत में इतने सटीक ढंग से डाला गया है कि अपने साजन से बिछुड़ रही  नायिका के मन में उठ रहा झंझावात जीवंत हो उठता है।


सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की अगली कड़ी में चर्चा होगी उनके गाए एक और बेमिसाल गीत की...

सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...

बुधवार, जून 26, 2013

जलते हैं जिस के लिए, तेरी आँखों के दीये..

कुछ गीत ज़िंदगी में कभी भी सुने जाएँ, कितनी बार भी सुने जाएँ वही तासीर छोड़ते हैं। कुछ दिनों से ऐसा ही एक सदाबहार नग्मा होठों पर जमा हुआ है। 1959 में आई फिल्म सुजाता के इस गीत को गाया था तलत महमूद ने। 

हिंदी फिल्म जगत में तलत महमूद एक ऐसे गायक थे जो फिल्म संगीत में छाने के पहले ही ग़ज़लों की दुनिया में अपना एक अलग नाम बना चुके थे। मात्र सोलह साल की उम्र में आकाशवाणी लखनऊ से दाग़, मीर, ज़िगर मुरादाबादी जैसे नामचीन शायरों की ग़ज़लों को गाकर तलत ने श्रोताओं का दिल जीत लिया था। सन 1944 में उनका गैर फिल्मी गीत तसवीर तेरी दिल मेरा बहला ना सकेगी इतना लोकप्रिय हुआ कि उन्हें बंगाल की फिल्मों में काम करने के लिए कोलकाता में बुलाया गया। पर मुंबई फिल्म जगत में उनका पदार्पण 1949 में फिल्म आरजू के लिए गाए गीत ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल.... से हुआ। पचास और साठ के दशक में तलत ने ऐसे बेशुमार नग्मे दिये जिन्हें संगीतप्रेमी शायद कभी ना भूल पाएँ।
 
तलत एक आकर्षक नौजवान थे। इसी वज़ह से वो गायिकी के साथ अभिनय में भी कूद पड़े। तलत महमूद को अगर फिल्मों में पार्श्व गायन के साथ साथ हीरो बनने का चस्का नहीं लगा होता तो शायद पचास और साठ के दशक में गाए उनके गीतों की सूची और लंबी होती। वैसे तलत महमूद द्वारा की गई गलती बाद में तलत अजीज़ और सोनू निगम ने भी दोहराई और उसका ख़ामियाजा भुगता। साठ के दशक के बाद फिल्म संगीत में आया बदलाव ग़ज़लों के इस बादशाह को नागवार गुजरा और तलत ने फिल्मों में गाना लगभग छोड़ ही दिया।

यूँ तो उनके सदाबहार गीतों की फेरहिस्त में में तुमसे आया ना गया..., शाम - ए - ग़म की कसम..., तसवीर बनाता हूँ..., जाएँ तो जाएँ कहाँ...., दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है... आदि का अक्सर जिक्र आता है पर अगर अपनी पसंद की बात करूँ तो मुझे मेरी याद में तुम ना आँसू बहाना..., इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा.., फिर वही शाम वही ग़म वही तनहाई है...को  गुनगुनाना बेहद पसंद है। पर इनसे भी अच्छा मुझे उनका वो गीत लगता है जिसकी बात मैं आज करने जा रहा हूँ।

फिल्म सुजाता का ये गीत अपने लाजवाब बोलों की वज़ह से दिल से कभी दूर नहीं होता। क्या मुखड़ा और अंतरा लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने। एक ऐसे गीत की कल्पना जिसकी भावनाओं की उष्मा से प्रियतमा की आँखे जल उठें। भई वाह ! एक ऐसा नग्मा जो दो दिलों की बेचैनी को इतने बेहतरीन अंदाज़ में परिभाषित करता है  
दर्द बन के जो मेरे दिल में रहा ढल ना सका..
जादू बन के तेरी आँखों में रुका चल ना सका 
.....जिसे महसूस कर सुनने वालों की आँखें नम हो जाएँ। सचिन देव बर्मन की बाँसुरी और तलत की थरथराती आवाज़ के साथ मज़रूह के शब्द जब कानों में पड़ते हैं तो मन इस गीत में बहुत देर यूँ ही डूबा रह जाता है।

फिल्म सुजाता में सुनील दत्त और नूतन पर ये गीत फिल्माया था। नूतन के चेहरे की सजीव भाव भंगिमाओं इस गीत की खूबसूरती को बयाँ कर देती हैं..


जलते हैं जिस के लिए, तेरी आँखों के दीये
ढूँढ लाया हूँ वही, गीत मैं तेरे लिए

दर्द बन के जो मेरे दिल में रहा ढल ना सका
जादू बन के तेरी आँखों में रुका चल ना सका
आज लाया हूँ वही गीत मैं तेरे लिए

दिल में रख लेना इसे हाथों से ये छूटे ना कही
गीत नाजुक हैं मेरा शीशे से भी टूटे ना कही
गुनागुनाऊँगा यही गीत मैं तेरे लिए

जब तलक ना ये तेरे रस के भरे होठों से मिले
यूँ ही आवारा फिरेगा ये तेरी जुल्फों के तले
गाये जाऊँगा यही गीत मैं तेरे लिए..

नई आवाजें  जब हिंदी फिल्म संगीत के इन अनमोल गीतों को आगे ले जाती हैं यो मन में बेहद खुशी होती है। स्निति मिश्रा की गायिकी से  करीब एक दशक पहले आपका परिचय कराया था जब वो सा रे गा मा पा में प्रतिभागी के तौर पर हम सबके सामने आयी थीं। देखिए उन्होंने तलत महमूद के इस कालजयी गीत को अपने अंदाज में किस तरह निभाया है?


वैसे तलत महमूद के गाए गीतों में अगर एक गीत का चुनाव करना हो तो आपकी वो पसंद क्या होगी?

शनिवार, नवंबर 14, 2009

'बुढ़िया कबड्डी' और बचपन के वे अनमोल दिन .....

तो आज है बच्चों का दिन यानि बाल दिवस ! तो क्यूँ ना इस दिन बचपन की कुछ बातों को साझा किया जाए एक बेहद दिलअज़ीज़ गीत के साथ। समय के साथ कितना बदल गया है तब और आज का बचपन। तब भी मस्तियाँ और शैतानियाँ होती थीं और आज भी। फर्क आया है इनके तौर तरीकों में, तब के और आज के माहौल में। बचपन की स्मृतियों पर नज़र दौड़ाऊँ तो बहुत सारी बातें अनायास ही मन में आती हैं। पेड़ों पर रस्सी लगा कर झूला झूलना, इमली के पेड़ की डरते डरते चढ़ाई करना, टोकरी को तिरछा कर रस्सी के सहारे चिड़िया को पकड़ने की कोशिश करना, हारने या खेल में ना शामिल किए जाने पर टेसुए बहाना, मन का ना होने पर बार बार घर छोड़ने की धमकी दे डालना और ऐसी ही ना जाने कितनी और बातें। पर आज बात उन खेलों की जिन्हें खेलते हुए बचपन का एक बड़ा हिस्सा बीता।

बचपन में पहला खेल जो हमनें सीखा था वो था बुढ़िया कबड्डी। अगर आप इस खेल से वाकिफ़ ना हों तो ये बताना जरूरी होगा कि इस खेल में अपनी साँस बिना तोड़े बारी बारी से विपक्षी दल के खिलाड़ियों को दौड़ाना और इन्हें छू कर वापस आना होता था। ऍसा इसलिए किया जाता था ताकि एक गोल रेखा के अंदर खड़ी अपने दल की बुढ़िया को भागने का रास्ता मिल जाए। कबड्डी के इस परिवर्तित रूप में गोल रेखा के अंदर खड़े खिलाड़ी को बुढ़िया क्यूँ कहा जाता था ये अभी भी मेरी समझ के बाहर है।

ज़ाहिर है जितनी लंबी साँस होगी उतने ही अधिक खिलाड़ियों को दौड़ाकर आप बुढ़िया का काम आसान कर सकते थे। अब एक साँस को लेने के लिए कई तरीके थे। सबसे प्रचलित होता था

शैल तीईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई............. या फिर कबड्डी के बाड बड्डी बाड बड्डी बाड बड्डी......

पर इन दोनों तरीकों में साँस में हेर फेर यानि चीटिंग करने की गुंजाइश काफी कम होती थी तो हम लोग इनका इस्तेमाल कम ही करते थे। सबसे मज़ेदार रहता

शैल दल्ले छू दल्ले छू...

बोलना क्यूँकि ये इतनी धीमी गति से बोला जाता कि साँस ले लेने का पता ही न चलता। अगर विपक्षी खिलाड़ी शिकायत करते तो हम अपने दूसरे सहारे प्रकाश लाल की शरण में चले जाते। अब ये न पूछिएगा कि ये प्रकाश लाल कौन था क्यूंकि हम तो उसे जाने बगैर ही उसका मर्सिया पढ़ देते थे यानि

शैल कबड्डी आस लाल मर गया प्रकाश लाल मेरा....लाल लाल लाल लाल...

बुढ़िया कबड्डी का शुमार तो अब लुप्तप्राय खेलों में कर लेना चाहिए। पर गिल्ली डंडा, रस्सी और लट्टू, कंचों पिट्टो, कोनों की अदला बदली और रुमाल ले कर भागने वाले खेल तो कस्बों और गाँवों में जरूर खेले जाते होंगे। आज तो बाजार में हर आयु वर्ग के लिए तरह तरह के आकर्षक खेल हैं खासकर तब जब आपकी जेब में इनके लिए पर्याप्त पैसे हों। वैसे भी आज के बच्चों के हाथ, मोबाइल और कम्प्यूटर के कीबोर्ड में गेम खेलने को इतने सिद्धस्त हो जाते हैं कि उन्हें गिल्ली और डंडे को पकड़ने की जरूरत ही क्या है। पर जो बच्चे इन सुविधाओं से अभी भी दूर हैं उनके लिए तो ये खेल आज भी मौज मस्ती की तरंग जरूर लाते होंगे।

तो आइए आज आपको वो गीत सुनाऊँ जो मुझे अपने बचपन की इन्हीं यादों के बहुत करीब ले जाता है। सुजाता फिल्म के इस गीत के बोल लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी ने और संगीतबद्ध किया था सचिन देव बर्मन साहब ने। गीता दत्त और आशा जी ने जो चुनिंदा युगल गीत गाए हैं उनमें से ये एक था। गायिकी, संगीत और बोल तीनों के लिहाज़ से ये गीत मुझे पसंद हैं ..

 

बचपन के दिन बचपन के दिन
बचपन के दिन भी क्या दिन थे हाय हाय
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन....

वहाँ फिरते थे हम फूलों में पड़े
यहाँ ढूँढते सब हमें छोटे बड़े
थक जाते थे हम कलियाँ चुनते
बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन.....

कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम
छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म
हाय रे हाय हाय हाय हाय रे हाय
कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम
छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म
हाय क्या दिन थे वो भी क्या दिन थे

बचपन के दिन भी क्या दिन थे
उड़ते फिरते तितली बन के बचपन ...

और चलते चलते आज के बचपन को अपने क़ैमरे में क़ैद करने की मेरी कोशिश


तो क्या आपको ये प्रविष्टि आपके बचपन तक खींच कर ले जा सकी ?
 

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