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मंगलवार, अगस्त 07, 2018

घने बदरा... चलिए याद करें बारिश के गीतों को सोना महापात्रा की इस मानसूनी पेशकश के साथ Ghane Badra

सावन की रिमझिम मेरे शहर को आए दिन भिंगो रही है। पिछले महीने शादी में पटना जाना हुआ तो गर्मी और उमस में एक पल चैन की नींद ले पाना दूभर हो गया। वहीं यहाँ राँची में जब से सावन की झड़ी शुरु हुई तो फिर रुक रुक कर फुहारें तन को शीतल कर  ही रही हैं। पिछले हफ्ते से तो आलम ये है कि अगर खिड़की खोल दें तो पंखे बंद कर मोटी चादर ओढ़ने की नौबत आ जा रही है। अब ये सब कह के आपको जलाने का मन नहीं था मेरा। मैं तो आपके मूड को थोड़ा मानसूनी बनाना चाहता था ताकि जब मैं आपसे बरसाती गीतों की चर्चा करूँ तो आप भी कानों में उनकी फुहार सुन मेरे साथ भींगते चलें।



हिंदी फिल्मों में अगर ऐसे गीतों को याद करूँ तो सबसे पहले लता दी के गाए गीत ही ज़हन में मँडराने लगते हैं।  अब भला ओ सजना बरखा बहार आई और रात भी कुछ भींगी भींगी चाँद भी है कुछ मद्धम मद्धम और रिमझिम गिरे सावन जैसे बेमिसाल गीतों को कैसे भुलाया जा सकता है। किशोर दा के गाए बरसाती गीतों का जिक्र तो यहाँ किया ही था। तलत महमूद का लता जी के साथ गाया अहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिए मुझे बेहद प्रिय है। मुकेश ने भी बरखा रानी ज़रा जम के बरसो..मेरा दिलवर जा ना पाए ज़रा झूम कर बरसो से बहुतों का दिल जीता था वहीं रिमझिम के तराने ले के आई बरसात में रफ़ी की आवाज़ थी।

बरसात की यादों से ग़ज़लें भी अछूती नहीं रही हैं। तलत अज़ीज़ की गाई ग़ज़ल रसात की भींगी रातों में फिर कोई सुहानी याद आई हो या फिर जगजीत सिंह की वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी हमेशा से संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करती रही हैं।

वैसे बिना बादल कैसी बारिश? बादल ही तो ये अहसास कराते हैं कि आने वाली बारिश का क्या रूप होगा? इसलिए फिल्मी गीतों में बरखा की तरह काली घटाओं और बादलों का जिक्र आम है और उन्हें पुकारने का सबसे कोमल शब्द रहा है बदरा। बदरा में जितना अपनापन है वो बादल या मेघ में कहाँ? बदरा की बात से मुझे दो और गीत तुरंत याद पड़ते हैं। पहला तो लता जी का गाया नैनों में बदरा छाए, बिजली सी चमके हाए..ऐसे में सजन मोहे गरवा लगा ले और दूसरा आशा जी का गाया फिर से अइयो बदरा बिदेसी तेरे पंखों पे मोती जड़ूँगी भर के जइयो हमारी कलैया मैं तलैया किनारे मिलूँगी।  क्या कमाल के गीत थे ये दोनों भी। जितना भी सुनों मन नहीं भरता।

पर ये तो गुज़रे दिनों की बातें थीं। इस मौसम का मिज़ाज ही कुछ ऐसा है कि आज भी ये लोगों को नए नए गीत रचने को बाध्य कर रहा है और आज ऐसे ही एक गीत को सुनवाने का इरादा है जो कि एक बार फिर  "बदरा" के इर्द गिर्द रचा गया है। इस गीत को गाया है सोना महापात्रा ने और धुन बनाई है राम संपत ने। जी हाँ ये गीत लाल परी मस्तानी श्रृंखला का हिस्सा है जिसमें हर महीने सोना अपनी एक नई पेशकश श्रोताओं के सामने ला रही हैं।
पता नहीं बरखा की बूँदों में ऐसा क्या है कि उनका स्पर्श हमें कभी खुशी के अतिरेक में ले जाता है तो कभी टिप टिप गिरते पानी की ध्वनि मन में उदासी की लहरें पैदा करने लगती हैं और मन उसमें डूबने सा लगता है। मुन्ना धीमन ने बादलों का बिंब लेते हुए ऐसा ही कुछ भाव रचना चाहा है इस गीत में।

अगर इस गीत की भावनाओं को समझना चाहते हैं तो किसी मानसूनी दिन में सफ़र पर निकलिए। जब इन बादलों की नर्म मुलायम बाहें आपका रास्ता काटेंगी आप खुशी से अंदर तक नम हो जाएँगे। वहीं कभी आपको ये बादल ऐसा भी आभास देगा कि वो अपनी कालिमा के भीतर ढेर सारे दुख समेटे है ठीक वैसे ही जैसे आप अपनी पीड़ा आँखों की कोरों में छुपाए घूमते हैं। इसलिए मुन्ना लिखते हैं

बदरा के सीने में, सीने में जल धड़के
बैठा है नयनों में नयनों में चढ़ चढ़ के
बरसेगा बरसेगा आज नहीं तो कल



सोना की गहरी आवाज़ का मैं हमेशा से शैदाई रहा हूँ। राम संपत की मधुर धुन के बीच वो एक मरहम का काम करती है। संजय दास का बजाया गिटार मूड को अंत तक बनाए रखता है। हालांकि मुझे लगता है कि मुखड़े में एक ही भाव के दोहराव से मुन्ना बच सकते थे। फिर भी कुल मिलाकर ये गीत कानों में एक मीठी छाप छोड़ जाता है। सोना इस गीत के बारे में लिखती हैं कि इसे मुंबई के एक मानसूनी दिन में रचा गया था और आज भी मेरी खिड़की के बाहर बादल ठंडी हवाओं के साथ अठखेलियाँ कर रहे हैं। तो आइए कुछ पल ही सही उड़ें इस घने बदरा के साथ.

बदरा.... बदरा.... बदरा....
छाये रे घने बदरा, छाये रे घने बादल
छाये क्यूँ घने बदरा, छाये क्यूँ घने बादल
कहीं पे बरसने को घूमे ये हुए पागल

अपनी हँसी में भी शामिल किया मुझको
अपनी खुशी में भी हिस्सा दिया मुझको
जहाँ तू अकेला है वहाँ भी मुझे ले चल
छाए रे घने बदरा, छाए रे घने बादल....

बदरा के सीने में, सीने में जल धड़के
बैठा है नयनों में नयनों में चढ़ चढ़ के
बरसेगा बरसेगा आज नहीं तो कल

बदरा.... बदरा.... बदरा....

रविवार, जून 24, 2018

हुण मैं अनहद नाद बजाया.. अपने दिल का हाल सुनाया Anhad Naad by Sona Mohapatra

सोना महापात्रा एक ऐसी आवाज़ की मालकिन हैं जो सुरीलेपन के साथ साथ भरपूर उर्जा से भरी है। उनकी आवाज़ से मेरी पहली दोस्ती उनके गैर फिल्मी एलबम सोना के गीत अभी ना ही आना सजना मोहे थोड़ा मरने दे, इंतजार करने दे से हुई थी और उसके बाद तो ये बंधन फिर छूटा ही नहीं । वो एक ऐसी कलाकार हैं जिन्होंने हिंदी फिल्मी गीतों के इतर अपना मुकाम बनाया। चाहे उनके हिंदी पॉप एलबम हों या टीवी शो सत्यमेव जयते और कोक स्टूडिओ  के लिए उनके गाए गीत उनकी आवाज़ हमेशा चर्चा में रही। हिंदी फिल्मों में उनको अपने हुनर के हिसाब से काम नहीं मिला पर इसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की। अम्बरसरिया, नैना, मन तेरा जो रोग है जैसे यादगार गीतों को आवाज़ देने वाली सोना ने अपने पति और संगीतकार राम संपत के साथ मिलकर  लाल परी मस्तानी के नाम से संगीत की एक नई यात्रा शुरु की है जिसके गीतों में अपने व्यक्तित्व के विविध रंगों को प्रकट करेंगी। अब तक इस श्रृंखला के तीन गीत आ चुके हैं। 

पहला गीत श्याम के रंग में रँगी मीरा का प्रेम अनुरोध था जिसे श्याम पिया के नाम से रिलीज़ किया गया जबकि दूसरा अमीर खुसरों का लिखा गीत तोरी सूरत के बलिहारी  निजामुद्दीन औलिया को समर्पित था। ये गीत तो अपनी जगह प्यारे थे ही पर इस श्रृंखला का जो तीसरा गीत पिछले हफ्ते आया वो एक बार ही सुनकर मन में ऐसा रच बस गया है कि निकलने का नाम ही नहीं लेता। बुल्ले शाह और कबीर के सूफी रंगों में समाया ये गीत है अनहद नाद और इसे लिखा सोना और राम संपत की टीम के स्थायी सदस्य मुन्ना धीमन ने। 


पर इससे पहले की हम इस गीत के बारे में कुछ और बातें करें ये जानना आपके लिए दिलचस्प होगा कि आख़िर इस श्रृंखला को सोना ने लाल परी मस्तानी का नाम क्यूँ दिया है? सोना इस बारे में अपने साक्षात्कारों कहती रही हैं कि

"ये दिल्ली की बात है जब मैं एक गेस्ट हाउस में ठहरी थी। वहाँ संसार के विभिन्न भागों से आए अन्य यात्री भी ठहरे थे। उनमें एक फ्रेंच महिला भी थी जो अफगानिस्तान से आई थी। उसने मुझे बताया कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान की जो सीमा है वो सूफी संगीत का एक मुख्य केंद्र था। जब वहाँ तालिबान आए तो उन्होंने संगीत पर रोक लगा दी और औरतों को घर के अंदर बुर्कों में रहने की सख्त ताकीद कर दी। वहाँ एक औरत सदा लाल लिबास में रहती थी। वो एक बेखौफ़ स्त्री थी जो तालिबान की परवाह किए बिना दरगाह में गाती रही। उसके द्वारा बताई ये छवि मेरे दिमाग में छप सी गयी। एक ऐसी स्त्री की छवि जो तालिबान की कालिमा को ललकारती हुई गाती रही , नाचती रही ये कहते हुए कि संगीत हराम नहीं है। पन्द्रह साल पहले की इस घटना ने मेरे दिमाग में लाल परी मस्तानी का रूप गढ़ दिया।
मुझे लाल रंग से प्यार रहा है। हमारी संस्कृति में इसका बहुत महत्त्व रहा है। मेरे लिए लाल रंग शक्ति, नारीत्व और उर्जा का प्रतीक है। मेरे प्रशंसक भी लाल रंग से मेरे प्रेम की वजह से  मुझे लाल परी मस्तानी के नाम से संबोधित करते थे और इसीलिए इस सिलसिले को मैंने लाल परी मस्तानी का नाम दिया है।"

इस गीत का शीर्षक है अनहद नाद। ये अनहद नाद आख़िर है क्या? शाब्दिक रूप से देखें तो अनहद मतलब जिसकी कोई हद ना हो और नाद मतलब ध्वनि। यानि ऐसी ध्वनि जिसका कोई अंत ना हो। अध्यात्म में अनहद नाद उस अवस्था को कहते हैं जब व्यक्ति ध्यान में यूँ मगन हो जाता है कि उसे बाहरी ध्वनियाँ नहीं सुनाई देतीं। मन को इतनी गहरी चुप्पी में ले जाते हैं कि सुनाई देता है तो सिर्फ अंदर का मौन।

ड्रम पर हैं बैंगलोर के यदुनंदन नागराज

मुन्ना धीमन इस गीतों के बोलों में ध्यान की इसी अवस्था का जिक्र करते हुए दिल के  प्रफुल्लित होने की बात करते हैं। इस अवस्था का अहसास कुछ ऐसा है जो बारिश में पेड़ को नहाते वक्त होता होगा, जो रोम रोम के तरंगित होने से होता होगा। मुन्ना ने इस अहसास को दूसरे अंतरे में जिस तरह एक पंक्षी को कंधे पे रखने या नदिया को गोद में उठाने की कल्पना से जोड़ा है उसे सोना की आवाज़ में सुनकर मन सच में आनंद विभोर हो उठता है।
सोना और राजस्थान के ढोल वादक 

राम संपत ने पहली बार इस गीत को सोना और शादाब फरीदी की आवाज़ में कोक स्टूडियो सीजन चार में इस्तेमाल किया था पर वहाँ सोना की बुलंद आवाज़ के सामने शादाब की जुगलबंदी कुछ जम नहीं पाई थी। अपने इस नए रूप में इस बार गीत के वीडियो शूट के लिए जैसलमेर की गडसीसर झील को चुना गया। अब शूटिंग राजस्थान में थी तो संगीत को आंचलिक रंग देने के लिए वहाँ के स्थानीय ढोल वादकों को भी संगीत संयोजन में शामिल किया गया। चानन खाँ, स्वरूप खाँ, पापे खाँ और  सत्तार खाँ की चौकड़ी ने ड्रम्स के साथ गीत में जो रस घोला उसे आप गीत सुनते हुए महसूस कर सकेंगे। पर मुझे संगीत का टुकड़ा जो सबसे अधिक भाया वो था संचित चौधरी की वायलिन पर बजाई कमाल की धुन जो अंतरों के बीच में लगभग 1m 25s-1m 45s में आती है। 

हुण मैं अनहद नाद बजाया
अपने दिल का हाल सुनाया
हुण मैं अनहद नाद बजाया
अपने दिल का हाल सुनाया
हाल सुना के लुत्फ़ वो पाया
हो..जो बरखा विच पेड़ नहाया
हाए हाल सुना के लुत्फ़ वो पाया
हो..जो बरखा विच पेड़ नहाया
रोम रोम मेरे घुँघरू छनके
हो.. रोम रोम मेरे घुँघरू छनके
लोग कहें मस्ताना आया हुण मैं अनहद
हुण मैं अनहद नाद बजाया

अपने दिल का हाल सुनाया

नच नच मैं गलियाँ विच घूमा
इसदा उसदा माथा चूमा
हाय नच नच मैं गलियाँ विच घूमा
हो इसदा उसदा माथा चूमा
इक पंछी कंधे पर रक्खा
हो इक पंछी कंधे पर रक्खा
इक नदिया को गोद उठाया
हुण मैं अनहद
हुण मैं अनहद नाद बजाया..नाद बजाया
अपने दिल का हाल सुनाया..हाल सुनाया.

सोना ने जिस मस्ती के साथ इस गीत को निभाया है वो गीत को बार बार सुनने पर मजबूर कर देता है। तो आइए सुनें ये प्यारा सा नग्मा


 

एक शाम मेरे नाम पर सोना महापात्रा

बुधवार, जनवरी 01, 2014

वार्षिक संगीतमाला 2013 पॉयदान संख्या 25 : अम्बरसरिया..मुंडयावे कचिया कलियाँ ना तोड़ (Ambarsariya)

साल का शुभारंभ और स्वागत है आपका एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमाला के नवें वर्ष (9th year) में पिछले साल के 25 बेहतरीन गीतों के साथ। वार्षिक संगीतमाला 2013 की पच्चीस वीं पॉयदान में विराजमान है वो गीत जो पंजाब के गली मोहल्लों में पूरे साल जोर शोर से बजा और इसकी एक खास वज़ह रही गीत में एक ऐसे आंचलिक शब्द का प्रयोग जो पंजाब के एक नामी शहर से जुड़ा हुआ है। वैसे हिंदी फिल्मों में हर साल निर्माता निर्देशक अपनी फिल्मों के गीतों में कुछ अनूठे अनजाने शब्द (चाहे वो आंचलिक भाषाओं से लिए गए हों या विदेशी भाषा से) डलवाते रहें हैं ताकि लोगों की पहले उस गीत और फिर उस फिल्म के प्रति उत्सुकता बढ़े। रॉकस्टार में प्रयुक्त कतिया करूँ हो या फिर दम मारो गम का Te Amo , अपनी इसी नवीनता के कारण ये गीत लोकप्रिय हुए।


फिल्म फुकरे के लिए संगीतकार राम संपत को एक रोमांटिक गीत की तलाश थी तो वो पंजाबी लोक गीत अम्बरसरिया को ढूँढ लाए। गीतकार मुन्ना धीमन ने उस लोक गीत में थोड़ा हिंदी पंजाबी का तड़का लगाया और सोना महापात्रा की जादुई आवाज़ की चाशनी में ये गीत निखर उठा। वैसे किसी हिंदी भाषी से अंबरसरिया का मतलब पूछा जाए तो वो बेचारा या तो आसमान (अम्बर) की ओर ताकेगा या फिर लोहे की छड़ों (सरिया) के बारे में सोचेगा पर पंजाबी में अंबरसरिया का मतलब होता है अमृतसर का लड़का (थोड़े लफंगे वाले भाव में :))

गायिका सोना महापात्रा  इस गीत के बारे में बताती हैं कि
"जब इस फिल्म का एलबम विकसित हो रहा था तब इसमें केवल धूम धड़ाके वाले गाने ही थे। अम्बरसरिया वाला गीत लाने की बात एलबम को पूरा करने के थोड़े ही पहले हुई और मुझे इसे एक लड़की के लिहाज़ से इस गीत में अपने आपको प्रकट करने का मौका मिला। मुझे इस गीत को गाते हुए खूब मजा आया । आजकल के युवाओं की फिल्म होते हुए भी इसमें प्यार के उसी पुराने तौर तरीके को दिखाया गया है जो मन को सोहता है।"

सही तो कह रही हैं सोना।  मध्यम वर्गीय कॉलोनियों में गली का नुक्कड़, घर की बॉलकोनी और पड़ोसन की छत तो प्यार के बीज को अंकुरित होने के लिए मुनासिब जगहें हुआ करती थीं। अब इस गीत को ही लें, गीत में नायक के तौर तरीकों को समझती हुई हमारी नायिका  अमृतसर के मुंडे को  कुछ यूँ संबोधित कर रही है

गली में मारे फेरे, पास आने को मेरे
कभी परखता नैन मेरे तो, कभी परखता तोर (चाल)
अम्बरसरिया..मुंडयावे कचिया कलियाँ ना तोड़ 
तेरे माँ ने बोले हैं मुझे तीखे से बोल
अम्बरसरिया..हो अम्बरसरिया..


वैसे सोना को गीत की वो पंक्तियाँ सबसे अच्छी लगती हैं जब नायिका कहती है कि पहले तो मैं काजल लगा और चूड़ियाँ पहन कर खूब सजती सँवरती थी पर अब मुझे पता लग गया है कि जिसके पास मेरे जैसे नशीले नैन हों उसे ना तो किसी सूरमे की आवश्यकता है ना किसी साज श्रंगार की।

गोरी गोरी मेरी कलाई ,चूड़ियाँ काली काली
मैं शर्माती रोज़ लगाती ,काजल सुरमा लाली
नहीं मैं सुरमा पा
ना  ,रूप ना मैं चमकाना
नैन नशीले हों अगर तो सुरमे दी कि लोड़

राम संपत ने इस गीत के संगीत में गिटार का खूबसूरत प्रयोग किया है तो आइए सुनते हैं सोना की आवाज़ में ये नग्मा...


वैसे फिल्म फुकरे में प्यार के इस रासायन को पनपता देख पाना भी एक सुखद अनुभव है...


गुरुवार, अगस्त 29, 2013

सोना महापात्रा @ MTV Coke Studio : 'दम दम अंदर' और 'मैं तो पिया से नैना लड़ा आई रे...'

कोक स्टूडिओ (Coke Studio) का भारतीय संस्करण अपने तीसरे साल मे है। विगत दो सालों में अपने अग्रज पाकिस्तानी कोक स्टूडिओ की तुलना में ये फीका ही रहा है। पर अपने शैशव काल से बाहर निकलता हुआ ये कार्यक्रम हर साल कुछ ऐसी प्रस्तुतियाँ जरूर दे जाता है जिससे इसके भविष्य के प्रति और उम्मीद जगती है। इस बार मुझे अपनी चहेती पार्श्व गायिका सोना महापात्रा को इस कार्यक्रम में सुनने का बेसब्री से इंतज़ार था। मुझे हमेशा से लगता रहा है कि सोना की आवाज़ की गुणवत्ता बेमिसाल है और उनकी गायिकी की विस्तृत सीमाओं का हिंदी फिल्म जगत सही ढंग से इस्तेमाल नहीं कर पाया है। संगीतकार राम संपत जिनसे सोना परिणय सूत्र में बँध चुकी हैं इस मामले में अपवाद जरूर हैं पर सोना को अपने हुनर के मुताबिक अन्य संगीतकारों का साथ मिलता रहे तो मेरे जैसे संगीतप्रेमी को ज्यादा खुशी होगी।

 MTV के इस कार्यक्रम में राम संपत ने सोना की आवाज़ का दो बार इस्तेमाल किया और दोनों बार नतीजा शानदार रहा। तो आइए सुनते हैं आज इन दोनों गीतों को ।

पहले गीत में ईश भक्ति का रंग सर चढ़कर बोलता है। गीत की शुरुआत होती है सामंथा एडवर्ड्स की गाई इन पंक्तियों से, जिसमें दुख और सुख दोनों परिस्थितियों में ईश्वर की अनुकंपा से गदगद भक्त के प्रेम को व्यक्त किया गया है। 

When I am weak,
You give me strength,
You give me hope,
When I am down,
In the face of darkness,
You are my guide,
You are my love,
My love divine.
Help me forgive,
When I am hurt,
Help me believe,
When I am lost,
In times of trouble,
You ease my weary mind,
You are my love,
My love divine.

सामंथा, राम सम्पत के शब्दों को पूरे हृदय से आत्मसात करती दिखती हैं। मुंबई की ये बहुमुखी प्रतिभा पश्चिमी जॉज़ संगीत के साथ साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में समान रूप से दक्ष हैं। पिछले दो दशकों में वो एक संगीत शिक्षक, संयोजक और गायिका की विविध भूमिकाओं को भली भांति निभाती आयी हैं। सामंथा की गायिकी और राम संपत के खूबसूरत इंटरल्यूड् से स्थिर हुए मन को बदलती रिदम के साथ सोना की आवाज़ नई उमंग का संचार करती है। गीतकार मुन्ना धीमन अपने  शब्दों की लौ से  भक्त को तरंगित अवस्था में ले आते हैं।




दम दम अंदर बोले यार
हरदम अंदर बोले यार
यार में मैं बोलूँ ना बोलूँ
मेरे अंदर बोले यार

घर के अंदर बोले यार
घर के बाहर बोले यार
छत के ऊपर नाचे यार
मंदिर मस्जिद बोले यार

हम ने यार दी नौकरी कर ली
कर ली प्यार दी नौकरी कर ली
उसके द्वार पर जा बैठे हैं
वो खोले ना खोले द्वार
लौ लागी ऐसी लौ लागी
फिरती हूँ मैं भागी भागी
मैं तुलने को राजी राजी
कोई तराजू तौले यार...

When I am weak...

हिंदी और अंग्रेजी शब्दों के मेल कर से बना ये गीत अपने बेहतरीन संगीत संयोजन दिल को सुकून पहुँचाता है।

इसी कार्यक्रम के अंत में सोना महापात्रा  ने अमीर ख़ुसरो साहब की लिखी एक और रचना को पेश किया जिसे खुसरो साहब ने अपने गुरु निजामुद्दिन औलिया के लिए लिखा था। सोना की आवाज़ में जो उर्जा है वो अमीर खुसरों की भावनाओं और गीत के चुलबुलेपन से पूरा न्याय करती दिखती है..

मैं तो पिया से नैना लड़ा आई रे
घर नारी कँवारी कहे सो कहे
मैं तो पिया से नैना लड़ा आई रे
सोहनी सुरतिया मोहनी मुरतिया..
मैं तो हृदय के पीछे समा आई रे..
मैं तो पिया से..
खुसरो निज़ाम के बली बली जैये
मैं तो अनमोल चेली कहा आई रे

सोना इस गीत के बारे में कहती हैं
इस गीत में गिनती गिन कर ऊपर के सुरों तक पहुँचने के बजाए मैंने पूरी तरह गीत के उन्माद में अपने आप को झोंक दिया। अगर मैं ऐसा नहीं करती तो शायद गीत की भावनाओं से मेरा तारतम्य टूट जाता। 
दोनों ही गीतों में कोरस का राम संपत ने बड़ा प्यारा इस्तेमाल किया है।



तो बताइए सोना महापात्रा की गायिकी से सजी जनमाष्टमी की ये भक्तिमय सुबह आपको कैसी लगी?

एक शाम मेरे नाम पर सोना महापात्रा

सोमवार, मई 23, 2011

सोना महापात्रा और इंतज़ार का सुख : अभी ना..ही आना सजना,मोहे थोड़ा मरने दे.

आज के संगीत परिदृश्य में ऐसे गायक गायिका भी तेजी से उभर रहे हैं जिन्होंने हिंदी फिल्म संगीत के इतर भी अपना मुकाम बनाया है। आज की ये पोस्ट भी ऐसी ही एक गायिका के बारे में है जिनका नाम है सोना महापात्रा। सोना आज हिंदी पॉप जगत में जाना हुआ नाम हैं पर उनके संगीत को सिर्फ इसी श्रेणी में परिभाषित करना उनके साथ नाइंसाफी होगी। सोना ने पारम्परिक पॉप संगीत के साथ साथ कुछ ऐसा संगीत भी रचा है जिसमें भारतीयता और पश्चिमी वाद्य यंत्रों का अद्भुत मिश्रण है। पर इससे पहले कि उनकी ऐसे ही एक प्यारे गीत का जिक्र किया जाए, उनकी पारिवारिक और सांगीतिक पृष्ठभूमि के बारे में कुछ बातें जानना आप सब के लिए रोचक रहेगा।

सोना महापात्रा के पिता भारतीय नौ सेना में थे और इसी वज़ह से उनका बचपन भारत और विश्व के विभिन्न देशों में बीता। सोना ने बारह साल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की विधिवत शिक्षा तो ली पर भिन्न भिन्न सांगीतिक परिवेशों में रहने की वज़ह से उन्हें सूफ़ी, लोक व पश्चिमी संगीत से जुड़ने का भी मौका मिला। संगीत में रुचि लेने के साथ वो पढ़ती भी रहीं। पहले इंजीनियरिंग और फिर पुणे से MBA की डिग्री लेने के बाद कुछ दिनों तक उन्होंने एक निजी कंपनी मेरिको में काम भी किया। पर संगीत के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने की उन्हें महात्त्वाकांक्षा ने उन्हें अच्छे वेतन वाली नौकरी से विमुख कर दिया।

सोना महापात्रा को अपना हुनर दिखाने का पहला मौका वर्ष 2006 में तब मिला जब Sony BMG ने उनका पहला एलबम 'सोना' रिकार्ड करवाया। सोना महापात्रा ने इस एलबम के लिए एड फिल्मों के सफल संगीतकार राम संपत को संगीत निर्देशन के लिए चुना। ये वही राम संपत हैं जिन्हें पीपली लाइव के कुछ गीतों को संगीतबद्ध किया था। संगीतकार राम संपत ने इस एलबम में सोना की गायिकी के बारे में कहा था कि

सोना किसी भी गीत की भावनाओं में अपनी आवाज़ को बड़ी सहजता से ढाल लेती हैं। उनकी आवाज़ में एक ऍसी ईमानदारी है जिसमें ताजगी भरी विलक्षणता के साथ साथ सुरीलापन भी है। उनके गले में एक ओर वही पुरातन सुर हैं तो दूसरी तरफ उनका हृदय आज की नारी का है और शायद यही सम्मिश्रण उन्हें विशिष्ट बनाता है।

यूँ तो एलबम सोना के कई गीत लोकप्रिय हुए पर मुझे उनके इस एलबम का एक गीत बहुत पसंद है। इस गीत को लिखा है मुन्ना धीमन ने। मुन्ना ने इस गीत में प्रेम को एक अलग नज़रिए से देखने की कोशिश की है। वो कहते हैं ना अगर प्रेम में वियोग नहीं हो तो वो प्रेम कैसा ? इंतज़ार की घड़ियाँ भले ही कष्टकर होती हैं पर उन पलों की तड़प, प्रेम की अग्नि को और बढ़ाने का ही तो काम करती है। इसीलिए तो मुन्ना अपने गीत में कहते हैं

अभी ना..ही आना सजना
मोहे थोड़ा मरने दे
इंतज़ार कर..ने दे

सोना इस गीत को ऍसे लहज़े में गाती हैं जो आपको दशकों पहले हिंदी फिल्मों में गाए जाने वाले उप शास्त्रीय संगीत का आभास दिलाता है। राम संपत ने संगीत में गिटार और चुटकी का बेहतरीन प्रयोग किया है। गीत के मुखड़े और इंटरल्यूड्स में गिटार वादक संजय दिवेचा द्वारा बजाई धुन सुनते ही हृदय गीत के मूड में बहने लगता है।

अभी ना..ही आना सजना
अभी ना..ही आना सजना
मोहे थोड़ा मरने दे
इंतज़ार कर..ने दे
अभी नहीं आना सजना

भेजियो संदेशा...
आप नहीं आ..ना
थोड़ी दूर रह के...
मोहे तरसा..ना
अभी तो मैं चा..हूँ
सारी सारी रात जगना
अभी ना..ही आना सजना...

रुक रुक आ..ना धीरे धीरे चल.ना
भूलना डगरिया.., रास्ते बदल..ना
नहीं अभी मो..हे
गरवा नहीं है लगना

अभी ना जगाओ
बने रहो सपना
अभी सन्मुख ना लाओ मुख अपना
अभी तो मैं चाहूँ आस लगाए रखना
अभी ना ही आना सजना



सोना महापात्रा के संगीत का सफ़र उनके पहले एलबम सोना से आगे बढ़कर आज दिलजले तक जा पहुँचा है। फिल्मों में भी उनके गाए गीत यदा कदा सुनने को मिलते रहते हैं। पिछले साल श्रेया के साथ मिलकर गाया उनका गीत बहारा बहारा बेहद लोकप्रिय हुआ था। आशा है कि सोना अपनी गायिकी के द्वारा कुछ अलग हटकर संगीत देने की अपनी प्रवृति को आगे भी बनाए रखेंगी।

गुरुवार, जनवरी 24, 2008

वार्षिक संगीतमाला २००७ : पायदान १६ - रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें...तेरी यादों में हम..

वार्षिक संगीतमाला की इस पायदान पर गीत वो, जिसे पहले तो मैंने रखा था बीसवीं सीढ़ी पर बार-बार सुनने के बाद ये और ज्यादा अच्छा लगने लगा। इस गीत के साथ ही एक नई तिकड़ी का आगमन हो रहा है इस गीतमाला में। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ये गीत, इस साल के सबसे रूमानी गीतों में एक है। इसके बोलों को लिखा चंडीगढ़ के युवा गीतकार मुन्ना धीमन ने। मुन्ना बचपन से ही लेखन में रुचि लेते आए हैं। नाटकों के लिए स्क्रिप्ट से लेकर कैडबरी के एड जिंगल तक की रचना उन्होंने की है।

इस गीत में कहीं कोई बनावटीपन नहीं दिखता। बस निश्चल प्रेम में कहे गए सीधे सच्चे से शब्द जो सीधे दिल पर जाकर लगते हैं और इसलिए असरदार साबित होते हैं।

पर मुन्ना के बोलों को अपनी गहरी संवेदनशील आवाज़ से सँवारा है अमिताभ बच्चन ने। अमिताभ के गाए गंभीर गीतों में मुझे 'सिलसिला ' का उनका गाया गीत नीला आसमान सो गया.... सबसे ज्यादा पसंद है। इस गीत को नीचे के सुरों से जैसे उन्होंने ऊपर की ओर उठाया है वो मन को छू लेता है। अपनी गायिकी में अमिताभ ने मुन्ना के भावों को यथासंभव उभारने की कोशिश की है।

इस गीत के साथ ही पहली बार इस साल आए हैं विशाल भारद्वाज इस गीतमाला में। विशाल ने पिछले साल ओंकारा में अपने बेमिसाल संगीत से सारे सुधी संगीत प्रेमियों का दिल जीत लिया था। विशाल इस गीत के बारे में कहते हैं
"कि जब इस गीत की रिकार्डिंग चल रही थी तो अमित जी ने कहा कि विशाल, तुम्हारे सामने मैं ये गीत गाने में असहज महसूस करूँगा इसलिए तुम स्टूडियो के बाहर ही बैठो।"

विशाल का मत है कि जिस खूबसूरती से अमित जी ने इस गीत को निभाया है कि उन्हें अन्य सितारों के लिए भी पार्श्व गायन करना चाहिए।

किसी ऐसे शख्स जिससे हमने कभी बेइंतहा मोहब्बत की हो, उसे जिंदगी से भौतिक रूप से अलग करना जितना सहज है, उतना ही कठिन है उसे अपनी यादों से जुदा करना। सोते जागते जिंदगी के हर लमहे में वो चेहरा मंडराता ही रहता है। किस हद तक हम इन यादों में डूबते चले जाते हैं वो आप इस गीत के लफ़्जों में महसूस कर सकते हैं
रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें
तेरी यादों में हम...तेरी यादों में हम
रोज़ाना...

उंगली तेरी थामे हुए हर लमहा चलता हूँ मैं
उंगली तेरी थामे हुए हर लमहा चलता हूँ मैं
तुझको लिए घर लौटूँ और, घर से निकलता हूँ मैं
इक पल को भी जाता नहीं तेरे बिन कहीं
यूँ रात दिन, बस तुझमें ही, बस तुझमें ही
लिपटा रहता हूँ मैं
रोज़ाना...रोज़ाना...रोज़ाना..रोज़ाना

रोज़ाना जिये रोज़ाना मरें...
रोज़ाना जलें रोज़ाना घुलें
तेरी यादों में हम...तेरी यादों में हम
रोज़ाना...रोज़ाना...रोज़ाना..हम्म..रोज़ाना

हर दिन तेरी, आँखों से इस, दुनिया को तकता हूँ मैं
तू जिस तरह, रखती थी घर, वैसे ही रखता हूँ मैं
तेरी तरह, संग संग चलें, यादें तेरी
यूँ हर घड़ी, बातों में बस, बातों में तेरी
गुम सा रहता हूँ मैं
रोज़ाना...

कुछ गाऊँ तो याद आते हो
गुनगुनाऊँ तो याद आते हो
कुछ पहनूँ तो याद आते हो
कहीं जाऊँ तो याद आते हो
कुछ खोने पे याद आते हो
कुछ पाऊँ तो याद आते हो

रोज़ाना चले, यादों पर तेरी
ज़िंदगी का सफ़र....
तुझसे है रोशन, तुझसे है जिंदा
ये दिल का शहर... ये दिल का शहर..
रोज़ाना..रोज़ाना..रोज़ाना.........
तो आइए सुनें फिल्म निशब्द से लिया हुआ ये भावपूर्ण गीत




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