जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से!
अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम..
Author: Manish Kumar
| Posted at: 2/22/2024 12:06:00 am |
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अमीन सयानी
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आज से तकरीबन बीस साल पहले जब गीत संगीत से जुड़ा ब्लॉग एक शाम मेरे नाम शुरु किया था तो यहाँ अपनी पसंदीदा ग़ज़लों, कविताओं , किताबों की चर्चा के अलावा एक हसरत ये भी थी कि अमीन सयानी साहब की तरह अपने पसंदीदा गीतों की एक गीतमाला पेश करूँ। वो गीतमाला तो ब्लॉग पर आज तक चल रही है पर उसकी लौ जलाने वाला प्रेरणास्रोत आज इस जहान को विदा कह गया।
दरअसल बचपन में मनोरंजन के नाम पर हमारे पास ज्यादा कुछ नहीं था। बहुत से बहुत सिनेमा हॉल के महीने में एक दो चक्कर लग जाया करते थे। टीवी तो घर में बहुत देर में आया पर एक चीज़ शुरु से हमारे साथ रही और वो था छोटा पर बेहद सुंदर लाल रंग का नालको का ट्रांजिस्टर।
इसी ट्रांजिस्टर पर जब समय मिलता हम हवा महल, मन चाहे गीत, रंग तरंग, अनुरोध गीत और छाया गीत जैसे कार्यक्रम सुना लिया करते थे। ये कार्यक्रम तो कभी छूट भी जाते पर अमीन सयानी साहब की बिनाका गीत माला..... उसे छूटने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था। उनकी आवाज़ में प्रस्तुत वो कार्यक्रम हमारी पीढ़ी के लिए मनोरंजन का पर्याय था।
जितना मुझे याद है बिनाका गीत माला जो बाद में सिबाका और विविध भारती पर कोलगेट गीत माला में तब्दील हो गयी रेडियो सीलोन से हर बुधवार रात आठ बजे आती थी और मैं अपने ट्रांजिस्टर को पंद्रह मिनट पहले ही गोद में रखकर शार्ट वेव के 25 मीटर बैंड पर रेडियो सीलोन को ट्यून करने बैठ जाता था। उस ज़माने में रेडियो सीलोन के स्टेशन को ट्यून करना एक बेहद नाजुक मसला हुआ करता था। जहाँ fine tune से हाथ खिसका नहीं सीलोन से वॉयस आफ अमेरिका पहुँचने में देर नहीं लगती थी। एक बार ट्यूनिंग हो गयी तो परिवार के छोटे बड़े किसी भी सदस्य के लिए ट्रांजिस्टर को हिलाना डुलाना और घुमाना वर्जित हुआ करता था।
जैसे ही कार्यक्रम शुरु होता हम अमीन सयानी की जादुई आवाज़ में मंत्रमुग्ध से पायदानों पर चढ़ते उतरते और उनकी शब्दावली में छलांग मार कर सीधे ऊपर की पायदान पर विराजमान होते गीतों को एकाग्रचित्त सप्ताह दर सप्ताह सुना और गुना करते। साल के अंत में जब वे चोटी के गीत की घोषणा करते हुए कहते कि बहनों और भाइयों वक़्त आ गया है सरताजी बिगुल के बजने का तब मेरा तन मन रोमांचित हो जाता इस आशा में कि क्या मेरा पसंदीदा गीत अबकी बार पहली पायदान पर होगा। कई बार मुझे मायूसी हाथ लगती और मन ही मन उन गुमनाम श्रोता संघों की राय और रिकार्ड बिक्री के आंकड़ों पर खीझ उभरती पर मजाल है कि इन गीतों को क्रमबद्ध पेश करने वाले अमीन सयानी साहब पर मेरे दिल में कभी मलाल का एक कतरा भी आता।
अमीन साहब जैसा उद्घोषक भारतीय रेडियो के इतिहास में न कभी हुआ है न होगा। गीतों से परिचय कराने का उनका नायाब अंदाज़, उनकी आवाज़ की खनखनाहट, शब्दों को खींचने का उनका तरीका, संगीत से जुड़ी हस्तियों के बारे में उनके खज़ाने से निकले रोचक किस्से सब कुछ मन में ऐसा बैठ गया है जो शायद मरते दम तक मेरी यादों में हमेशा बना रहेगा और हाँ उनकी यादों की प्रेरणा से एक शाम मेरे नाम पर वार्षिक गीतमाला भी चलती रहेंगी। आज भले ही 91 वर्षों की लंबी आयु के बाद वो सशरीर हमारे बीच नहीं हैं पर मन में वो हमेशा के लिए बने रहेंगे।
Author: Manish Kumar
| Posted at: 2/18/2019 12:24:00 am |
Filed Under: अपनी बात,
प्रियंका बार्वे
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देश में ग़म का माहौल है। एक साथ इतने सारे परिवारों पर दर्द का तूफान उमड़ पड़ा है। आख़िर कौन हैं ये लोग जिनके घर की रौनक चली गई है? छोटे मोटे मेहनतकश परिवारों के सुपूत जिन पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी, उनकी आशाओं और सपनों का भार था। इन लोगों को देश की राजनीति से मतलब नहीं पर उनके सामने दो सवाल जरूर हैं। एक तो ये कि क्या उनके बेटों की शहादत बिना किसी ठोस प्रतिकार के ही चली जाएगी और दूसरे ये कि क्या जवानों को लाने ले जाने में जो सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई गयी थी वो पर्याप्त थी या उसमें अगर चूकें हुईं तो उसकी जवाबदेही किसकी है और आगे उसे सुधारने के लिए कितनी तत्परता दिखाई जाएगी? सनद रहे कि सी आर पी एफ की टुकड़ियों के साथ ऐसे हादसे छत्तीसगढ़ और झारखंड में पहले भी हो चुके हैं।
चित्र सौजन्य PTI
जिन परिवारों के घर का चिराग असमय बुझ गया है उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि अपने हुक्मरानों पर लोकतांत्रिक तरीके से पूरा दबाव बना कर रखें कि शहीद परिवारों की इन दोनों जायज़ अपेक्षाओं पर समुचित कार्यवाही की जाए।
सोशल मीडिया में लोगों की प्रतिक्रियाएँ ज्यादातर ऐसी हैं जिनका सरोकार इन परिवारों द्वारा सही जा रही पीड़ा से कम और अपने राजनीतिक एजेंडे को साधने से ज्यादा है। उचित प्रतिकार की माँग करने के साथ साथ कुछ लोग सच्चे देशभक्त के तमगे को चमकाने के नाम पर अपने मन की घृणात्मक भड़ाँस की उल्टी करने में लगे हैं तो दूसरी ओर वे लोग हैं जिन्हें इस घटना के दर्द से ज्यादा ये चिंता खाए जा रही है कि कहीं इस मुद्दे से सरकार राजनीतिक फायदा ना उठा ले और वो इस संवेदनशील घड़ी में सरकार के हर कृत्य में मीन मेख निकालते हुए विषवमन कर रहे हैं।
मुझे लगता है कि हमें इन दोनों तरह के लोगों से दूरी बनाए रखने की जरूरत हैं। दुख की इस घड़ी में स्वविवेक और संयम का इस्तेमाल करते हुए वो करें जो आपकी समझ से देशहित में हो। बाकी तो सेना व सरकार पर छोड़ दें क्यूँकि कई चीजें आपके वश में नहीं हैं।
चित्र सौजन्य ANI
ये जो कड़ा वक्त है गुजर ही जाएगा पर जितनी जल्दी ये पीड़ा कम हो उतना ही अच्छा। निदा फ़ाज़ली साहब की ग़ज़ल का एक शेर था जो मेरे आपके दिल के हालातों को बहुत कुछ बयाँ कर रहा है
बेनाम-सा ये दर्द ठहर क्यों नहीं जाता जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नहीं जाता मराठी गायिका प्रियंका बार्वे ने इस शेर में छुपे दर्द को बड़ी संवेदनशीलता के साथ अपनी आवाज़ में उभारा था। इसे सुनते हुए आप उन परिवारों के कष्ट को महसूस कर पाएँगे ऐसी मेरी उम्मीद है..
विनोद खन्ना हमारे बीच नहीं रहे। सोशल मीडिया पर कुछ हफ्ते पहले उनकी बीमारी की हालत में ली गयी तस्वीर उनके चाहने वालों को गहरा धक्का दे गयी थी। लोगों के मन में हमेशा उनके बाँके छबीले नौजवान हीरो की छवि तैरती रही भले ही उन्होंने उम्र के इस पड़ाव में चरित्र अभिनेता का चोला पहन लिया था। उन पर फिल्माए कुछ गीत हमेशा किसी ना किसी वज़ह से मुझे याद रहे। आज उन्हीं चंद गीतों के माध्यम से उनसे जुड़ी अपनी स्मृतियाँ ताजा करना चाहता हूँ।
उस वक्त सारी फिल्में मैं अपने परिवार के साथ सिनेमा हॉल में देखा करता था। विनोद खन्ना की फिल्मों की बात करूँ तो बचपन में मैंने मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथोनी और कुर्बानी देखी थी। यानि तब तक विलेन से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले विनोद देश के चहेते हीरो बन चुके थे।
उस दौर में जब अमिताभ, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, शत्रुघ्न व संजीव कुमार जैसे नायकों का बोलबाला था, आकर्षक कद काठी पर मीठी सी मुस्कुराहट लिए विनोद बिल्कुल अलग से दिखते थे। मुकद्दर का सिकंदर और अमर अकबर एंथोनी में तो अमिताभ इस क़दर छाए रहे कि विनोद का किरदार मेरी स्मृतियों में स्थायी रूप ना ले सका। पर कुर्बानी में फिरोज खान के साथ उनका रोल खासा लोकप्रिय हुआ। कुबुक कुबुक और तुझपे कुरबाँ मेरी जान से ज्यादा जो गीत लंबे समय तक यादों में शामिल रहा वो था जीनत अमान के साथ विनोद खन्ना पर फिल्माया नग्मा। जिसके बोल कुछ यूँ थे हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे.. अगर आपने इसे सुना भी हो तो मनहर उधास की आवाज़ में इसे फिर सुन लीजिए..
विनोद खन्ना के कैरियर के इस दौर में बहुत सारी फिल्में हिट हुयीं पर उनमें ज़्यादातर में एक से ज्यादा हीरो थे। ये वो दौर था जब उन्हें उतनी सही कहानियाँ नहीं मिल पायीं जिसके वो हक़दार थे। फिर भी गुलज़ार ने उन्हें जो मौके मेरे अपने (1971), अचानक (1973) और मीरा (1979) में दिए, उसके साथ उन्होंने पूरा न्याय किया। फिल्म मेरे अपने में किशोर दा का गाया गीत जिसे विनोद जी ने अभिनीत किया था, बरसों मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज के एकाकी दिनों का साथी रहा
कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों पास नहीं तो दूर भी होता लेकिन कोई मेरा अपना
अपने कैरियर के चढ़ाव पर ओशो की शरण में संन्यास लेकर विनोद खन्ना ने अपने प्रशंसकों को चौंका दिया था। मेरे पिता भी ओशो से खासे प्रभावित थे और उनकी लगभग हर किताब उनकी अलमारी की शोभा बढ़ाया करती थी। इसलिए अख़बार में जब भी विनोद के संन्यासी जीवन की ख़बरें आतीं मैं उन्हें चाव से पढ़ता।अमेरिका जाने के पहले उन्होंने गुलज़ार की फिल्म मीरा की थी। गुलज़ार से वो तब कहा करते थे कि मेरा तो मन मीरा का किरदार निभाने को करता है क्यूँकि मैं उसकी भक्ति को अपने भगवान से जोड़ कर देख सकता हूँ। ये उनकी अगाध श्रद्धा का ही परिचायक था कि उन्होंने ओशो के आश्रम में माली से लेकर टॉयलट साफ करने तक के काम किए। वो वापस क्यूँ लौटे ये तो कहना मुश्किल है। क्या गुरु से उनका मोह भंग हुआ या फिर आर्थिक परेशानियाँ इस पर तो अब क़यास ही लगाए जा सकते हैं।
पाँच साल के इस लंबे इंटरवल के बाद फिर बतौर नायक फिल्मों में आने लगे। 1989 में उन्होंने ॠषि कपूर व श्रीदेवी के साथ फिल्म चाँदनी में एक प्यारा सा किरदार निभाया और उन पर फिल्माया ये नग्मा बरसों बेवज़ह आँखें नम करता रहा। बारिश की छनछनाहट के बीच सुरेश वाडकर की डूबती आवाज़..मन तब गुम हो जाता था इस गीत में
लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है वही आग सीने में फिर जल पड़ी है
कॉलेज के ज़माने में जितना समय किशोर, जगजीत और गुलज़ार को सुनने में लगाया उतना पढ़ने में भी लगाया हो इस पर विश्वास तो नहीं होता। शायद लगाया भी हो...पढ़ाई तो भूल भी गयी पर जो वक़्त इनके साथ गुजरा वो हमेशा हमेशा के लिए दिल पे नक़्श हो गया।
अपनी दूसरी पारी में गुलज़ार निर्देशित सिर्फ एक फिल्म की वो थी लेकिन। उस दौर के अभिनेताओं में संजीव कुमार मेरी पहली पसंद थे। देखने वाली बात है कि गुलज़ार ने संजीव कुमार के साथ तो काफी काम किया ही, विनोद को भी कम मौके नहीं दिये। विनोद खन्ना में अपने अन्तर्मन को तलाश करने का जो भाव रहा उसे गुलज़ार ने बारहा टटोलने की कोशिश की। गुलज़ार ने विनोद के अभिनय का वो स्वरूप उभारा जिनसे उनके चाहने वाले अनजान ही रहे हैं। फिल्म लेकिन में ही एक गीत था सुरमयी शाम इस तरह आए साँस लेते हैं जिस तरह साए। सुरेश वाडकर का गाया गीत मेरे लिए क्यूँ खास रहा है उसके बारे में यहाँ मैने लिखा है। गीत का वीडियो यू ट्यूब पर तो है पर शेयर करने के लिए उपलब्ध नहीं है। आज विनोद जी की यादों में इस गीत को भी शामिल कीजिएगा।
कोई आहट नहीं बदन की कोई फिर भी लगता है तू यहीं हैं कहीं वक़्त जाता सुनाई देता है तेरा साया दिखाई देता है जैसे खुशबू नज़र से छू जाए साँस लेते हैं जिस तरह साए
जगजीत की आवाज़ और गुलज़ार के बोलों के साथ सिनेमा के रुपहले पर्दे पर विनोद खन्ना 2002 में फिल्म लीला में नज़र आए । इस फिल्म के तमाम नग्मे शानदार थे पर कल अचानक उनके चले जाने से उस गीत की ये पंक्तियाँ बार बार मन को गीला कर रही थीं..
जाग के काटी सारी रैना नैनों में कल ओस गिरी थी
क्या पता था कि उनका हँसता मुस्कुराता चेहरा यूँ अचानक ही दृष्टिपटल से ओझल हो जाएगा।
बिंदास, खुशमिजाज़, दोस्तों की कद्र और हमेशा मदद करने वाले विनोद खन्ना को ये दुनिया एक छैल छबीले हीरो के रूप में हमेशा याद रखेगी। विनोद खन्ना से जुड़ी आपकी भी कुछ व्यक्तिगत यादे हैं तो जरूर बाँटें..
कुछ दिनों पहले पिंक देखी। एक जरूरी विषय पर ईमानदारी से बनाई गई बेहद कसी हुई फिल्म है पिंक। सबको देखनी चाहिए, कम से कम लड़कों को तो जरूर ही। लड़कियों के प्रति लड़कों की सोच को ये समाज किस तरह परिभाषित करने में मदद करता है या यूँ कहें कि भ्रमित करता है, उससे आप सब वाकिफ़ ही होंगे। पिंक ने इस कहानी के माध्यम से इसी सोच की बखिया उधेड़ने का काम किया है।
दशकों बीत गए और लड़कियों के प्रति हमारी सोच आज भी वहीं की वहीं है। समाज के निचले तबकों में मुखर है तो मध्यम वर्ग में अंदर ही दबी हुई है जो वक़्त आने पर अपने सही रंग दिखाने लगती है। फिर तो लगने लगता है कि इस सोच का पढ़ाई लिखाई से लेना देना है भी या नहीं?
आज वो दिन याद आ रहे हैं जब मैंने इंटर में एक कोचिंग में दाखिला लिया था। जैसा अमूमन होता है, अक्सर ब्रेक में लड़के पढ़ाई के आलावा लड़कियों की भी बाते किया करते थे। किसी भी लड़की का चरित्र चुटकियों में तय कर दिया जाता था और वो भी किस बिना पर? देखिये तो ज़रा ..
जानते हैं इ जो नई वाली आई है ना, एकदमे करप्ट है जी क्यूँ क्या हुआ? देखते नहीं है कइसे सबसे हँस हँस के बात करती है अरे आप भी तो सबसे हँस मुस्कुराकर बात करते हैं ? अरे छोड़िए महाराज है तो उ लइकिए नू..
मतलब ख़ुद करें तो सही और लड़की करे तो लाहौल विला कूवत। मुझे बड़ी कोफ्त होती थी इस दोहरी सोच पर तब भी और आज इतने सालों के बाद भी मुझे नहीं लगता कि कमोबेश स्थिति बदली है। किसी का सबके साथ हँसना मुस्कुराना, हाथ पकड़ लेना, साथ घूमना, खाना पीना सो कॉल्ड हिंट मान लिया जाताा है।
ख़ैर इन्हें तो छोड़िए, अकेली सुनसान सड़कों पर चलना भी कोई हिंट है क्या? आफिस से रात में देर से लौटना कोई हिंट है क्या? मेरी एक सहकर्मी ने बहुत पहले अपने से जुड़ी एक घटना बताई थी जिसमें सुबह की एक प्यारी मार्निंग वॉक, एक कुत्सित दिमाग के व्यक्ति की वहशियाना नज़रों और भद्दी फब्तियों के बीच अपनी हिम्मत बनाए रखते हुए अपना आत्मसम्मान बचा पाने की जद्दोजहद हो गई थी। बिना किसी गलती के ऐसी यंत्रणा क्यूँ झेलनी पड़ती हैं लड़कियों को? डर के साये में क्यूँ छीन लेना चाहते हैं हम उनका मुक्त व्यक्तित्व?
रही बात वैसे पुरुषों के अहम की जो ना सुनने का आदी ही नहीं है। दिल्ली में जिस तरह कुछ दिनों पहले शादी के लिए मना करने की वजह से सरे आम एक महिला की चाकू से गोद गोद कर नृशंस हत्या की गई उसे आप क्या कहेंगे? प्यार ! ऐसा ही प्यार करने वाले बड़ी खुशी से उन चेहरों पर तेजाब फेंक देखते हैं जिसे वो अपना बनाने चाहते थे। ये सब सुन और देख कर क्या आपको नहीं लगता है कि मनुष्य जानवरों से भी बदतर और कुटिल जीव है? क्या हमारे अंदर व्याप्त ये दरिंदगी कभी खत्म होगी? पिंक के गाने के वो बोल याद आ रहे हैं
कारी कारी रैना सारी, सौ अँधेरे क्यूँ लाई, क्यूँ लाई रोशनी के पाँव में ये बेड़ियाँ सी क्यूँ लाई, क्यूँ लाई उजियारे कैसे अंगारे जैसे, छाँव छैली धूप मैली, क्यूँ है री
बस मन में सवाल ही हैं जवाब कोई नहीं......
आज जब की लड़कियाँ पढ़ लिख कर हर क्षेत्र में अपनी काबिलयित का लोहा मनवा रही हैं तो फिर उनसे अपनी हीनता का बोध हटाएँ कैसे? बस जोर आजमाइश से आसान और क्या है। आबरू तो सिर्फ लड़कियों की ही जाती है ना इस दुनिया में। यही वो तरीका है जिसमें बिना मेहनत के किसी स्वाभिमानी स्त्री को अंदर तक तोड़ दिया जाए।
मेरा मानना है कि आप प्रेम उसी से करते हैं, कर सकते हैं जिनकी मन से इज़्ज़त करते हैं। अगर मान लें कि ये प्रेम एकतरफा है तो भी आप उस शख़्स की बेइज़्ज़ती होते कैसे देख सकते हैं। उससे झगड़ा कर सकते हैं, नाराज़ हो सकते हैं पर उसे शारीरिक क्षति कैसे पहुँचा सकते हैं?
आज फिल्मों में ही सही इन बातों को बेबाकी से उठाया तो जा रहा है। लोगों की मानसिकता को बदलने के लिए ये एक अच्छी पहल है और इसलिए मैंने शुरुआत में कहा कि ये फिल्म सबको देखनी चाहिए कम से कम लड़कों को तो जरूर ही। पर ये लड़ाई लंबी है और इसकी शुरुआत हर परिवार से की जानी चाहिए। अपने लड़कों को पालते वक़्त उनमें लड़कियों के प्रति एक स्वच्छ सोच को अंकुरित करना माता पिता का ही तो काम है। परिवार बदलेंगे तभी तो समाज बदलेगा, सोचने का नज़रिया बदलेगा।
अभी तो समाज का पढ़ा लिखा तबका इस पर बहस कर रहा है। पर बदलाव तो उस वर्ग तक पहुँचना चाहिए जो समाज के हाशिये पर है और जिसकी आवाज़ इस देश के हृदय तक जल्दी नहीं पहुँच पाती।
हताशा के इस माहौल में तनवीर गाजी की लिखी ये कविता एक नई उम्मीद जगाती है। मुझे यकीन है की अवसाद के क्षणों में अमिताभ की आवाज़ में आशा के ये स्वर लड़कियों के मन में आत्मविश्वास के साथ जोश की नई लहर जरूर पैदा करेंगे
तू ख़ुद की खोज में निकल, तू किस लिये हताश है तू चल तेरे वजूद की, समय को भी तलाश है जो तुझ से लिपटी बेड़ियाँ, समझ न इन को वस्त्र तू यॆ बेड़ियाँ पिघला के, बना ले इन को शस्त्र तू चरित्र जब पवित्र है, तो क्यूँ है यॆ दशा तेरी यॆ पापियों को हक़ नहीं, कि ले परीक्षा तेरी जला के भस्म कर उसे, जो क्रूरता का जाल है तू आरती की लौ नहीं, तू क्रोध की मशाल है चूनर उड़ा के ध्वज बना, गगन भी कँपकपाएगा अगर तेरी चूनर गिरी, तो एक भूकम्प आएगा । तू ख़ुद की खोज में निकल ...
Author: Manish Kumar
| Posted at: 9/20/2014 08:00:00 am |
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कविता,
ब्लागिंग
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कुछ साल पहले तक कार्यालयी जीवन में हिंदी दिवस राजभाषा पखवाड़े के तहत कुछ पुरस्कार अर्जित करने का बस एक अच्छा अवसर हुआ करता था। पर हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए राजभाषा पखवाड़ा मनाना मुझे अब बेतुका सा लगने लगा है। राजभाषा के नाम पर कार्यालयों में जो भाषा परोसी जाती है उससे अन्य आंचलिक भाषाओं को बोलने वालों के मन में उसके प्रति प्यार कैसे पनपेगा ये मेरी समझ के बाहर है। पर सरकारी क़ायदे कानून हैं वो तो चलेंगे ही उससे हिंदी का भला हो ना हो किसको फर्क पड़ता है। दरअसल भाषा का अस्तित्व उसकी ताकत उसे बोलने वाले तय करते हैं और जब तक ये प्रेम जनता में बरक़रार है तब तक इसका कोई बाल भी बाँका नहीं कर सकता। पिछले हफ्ते हिंदी दिवस पर हिंदी से जुड़े मसलों पर समाचार चैनल ABP News पर एक घंटे की परिचर्चा हुई जिसमें प्रसिद्ध गीतकार प्रसून जोशी व नीलेश मिश्र, कवि कुमार विश्वास और पत्रकार पंकज पचौरी ने हिस्सा लिया। चर्चा में तमाम विषय उठाए गए पर जो मुद्दा मेरे दिल के सबसे करीब रहा वो था संचार माध्यमों द्वारा हिंदी वाक्यों में अंग्रेजी के शब्दों का धड़ल्ले से उपयोग।
इस विषय पर मेरी राय प्रसून जी से मिलती जुलती है जिन्होंने कहा कि पारंपरिक भाषा में वैसे शब्द जिनकी उत्पत्ति दूसरे देशों में हुई है उन्हैं वैसे ही स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है। मिसाल के तौर पर ट्रेन, टेलीफोन, सिनेमा, क्रिकेट आदि शब्द हिंदी में ऐसे घुलमिल गए हैं कि उन्हें हिंदी शब्दकोश में अंगीकार करना ही श्रेयस्कर होगा पर इसका मतलब ये भी नहीं कि दूरभाष और चलचित्र का उपयोग ही बंद कर दिया जाए। नीलेश मिश्र ने ये तो कहा कि जहाँ तक सरल शब्द उपलब्ध हों वहाँ अंग्रेजी के शब्द की मिलावट बुरी भी नहीं है। उनके संपादित समाचार पत्र का नाम गाँव कनेक्शन है और रेडियो पर कहानी सुनाते समय उन्हें अवसाद जैसे शब्दों के लिए उन्हें डिप्रेशन कहना ज्यादा अच्छा लगता है।
दरअसल दिक्कत ये है कि इन सरल और कठिन शब्दों की परिभाषा कौन तय करेगा? किसी भी भाषा में अगर आप कोई शब्द इस्तेमाल नहीं करेंगे तो वो देर सबेर अप्रचलित हो ही जाएगा। इसका मतलब तो ये हुआ कि हम धीरे धीरे इन शब्दों को मार कर पूरी भाषा का ही गला घोंट दें? ऊपर नवभारत टाइम्स की सुर्खियाँ देखिए बार्डर पर आमने सामने। एशियन गेम्स आज से।
मतलब सीमा और एशियाई खेल कहना इस अख़बार के लिए दुरुह हो गया। राजस्थान पत्रिका का युवा पृष्ठ कह रहा है - थीम बेस्ड होगा पेंटिंग कम्पटीशन। अब अगर ऐसे शीर्षक आते रहे तो चित्रकला और प्रतियोगिता जैसे सामान्य शब्दों को भी नीलेश मिश्र सरीखे लोग कठिन शब्दों की श्रेणी में ले आएँगे। नीलेश जी से मेरा सीधा सवाल ये है कि क्या अंग्रेजी के समाचार पत्र अपनी भाषा के कठिन शब्दों का सरल हिंदी शब्द में अनुवाद कर कभी अपने शीर्षक लिखेंगे? क्या TOI कभी लिखेगा Armies in front of each other at SEEMA ?क्या एक सामान्य अंग्रेजीभाषी को ऐसा पढ़ना अच्छा लगेगा?
हिंदी और आंचलिक भाषाएँ रोज़गार के अवसर तो अब प्रदान करती नहीं। दसवीं तक छात्र इन्हें पढ़ लेते हैं फिर तो इनका साबका अपनी भाषा से रेडिओ, टीवी व समाचार के माध्यमों से पड़ता है। अगर ये माध्यम भी भाषा की शुद्धता नहीं बरतेंगे तब तो किसी भी भाषा का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। मुझे आज भी याद है कि पिताजी हिंदी के सही वाचन के लिए मुझे आकाशवाणी और बीबीसी की हिंदी सेवा नियमित सुनने की हिदायत देते थे। हर भाषा की एक गरिमा होती है। ये सही है समय के साथ भाषा में अन्य भाषाओं से शब्द जुड़ते चले जाते हैं पर इसका मतलब ये नहीं कि उनका इस तरह प्रयोग हो कि वे भाषा के कलेवर को ही बदल दें। ना ऐसी मिलावट मुझे अंग्रेजी के लिए बर्दाश्त होगी ना हिंदी के लिए।
कुमार विश्वास ने कहा कि उनकी कविता में शुद्ध हिंदी भी रहती है और सामान्य प्रचलित हिंदी भी। यानि वो भाषा को उसके हर रूप में प्रस्तुत करते हैं और उनका अनुभव है कि दोनों तरह की कविताओं को युवाओं से उतना ही प्रेम मिलता है। सच तो ये है कि हमें अच्छी हिंदी को इस तरह प्रचारित प्रसारित करना है कि वो पूरी जनता की आवाज़ बने ना कि उसे हिंग्लिश जैसा बाजारू बना दिया जाए कि जिसे पढ़ते भी शर्म आए।
हिंदों से जुड़े अन्य विषयों पर भी सार्थक चर्चा चली पर वातावरण को हल्का फुल्का बनाया प्रसून जोशी, कुमार विश्वास और नीलेश मिश्र की कविताओं ने। नीलेश मिश्र ने अपनी कविता में मिश्रित भाषा का प्रयोग किया है पर जो शब्द अंग्रेजी से उन्होंने लिए हैं वो कविता की रवानी को बढ़ाते हैं। मुझे तो प्रसून, नीलेश और कुमार विश्वास की अलग अलग अंदाज़ों में लिखी तीनों कविताएँ पसंद आयीं। आशा है आपको भी आएँगी..
प्रसून जोशी की कविता लक्ष्य
लक्ष्य ढूंढ़ते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है इस पल की गरिमा पर जिनका थोड़ा भी अधिकार नहीं है इस क्षण की गोलाई देखो आसमान पर लुढ़क रही है, नारंगी तरुणाई देखो दूर क्षितिज पर बिखर रही है. पक्ष ढूँढते हैं वे जिनको जीवन ये स्वीकार नहीं हैं लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है
नाप-नाप के पीने वालों जीवन का अपमान न करना पल-पल लेखा-जोखा वालों गणित पे यूँ अभिमान न करना नपे-तुले वे ही हैं जिनकी बाहों में संसार नहीं है लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है
ज़िंदा डूबे-डूबे रहते मृत शरीर तैरा करते हैं उथले-उथले छप-छप करते, गोताखोर सुखी रहते हैं स्वप्न वही जो नींद उडा दे, वरना उसमे धार नहीं है लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है
कहाँ पहुँचने की जल्दी है नृत्य भरो इस खालीपन में किसे दिखाना तुम ही हो बस गीत रचो इस घायल मन में पी लो बरस रहा है अमृत ये सावन लाचार नहीं है लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है
कहीं तुम्हारी चिंताओं की गठरी पूँजी ना बन जाए कहीं तुम्हारे माथे का बल शकल का हिस्सा न बन जाए जिस मन में उत्सव होता है वहाँ कभी भी हार नहीं है लक्ष्य ढूँढते हैं वे जिनको वर्तमान से प्यार नहीं है
नीलेश मिश्र की कविता 'बकवास परस्ती'
चल सर से सर टकराते है चल सड़क पे नोट लुटाते हैं चल मोटे स्केच पेन से एक दिन हम चाँद पे पेड़ बनाते हैं जो हँसना भूल गए उनको गुदगुदी जरा कराते हैं चल लड़की छेड़ने वालों पे आज सीटी जरा बजाते हैं इन बिगड़े अमीरजादों से चल भीख जरा मँगवाते हैं पानी में दूध मिलाया क्यूँ चल भैंस से पूछ के आते हैं नुक्कड़ पर ठेले वाले से चल मुफ्त समोसे खाते हैं चल गीत बेतुके लिखते है और गीत बेसुरे गाते हैं क्या करना अक्ल के पंडों का हमें ज्ञान कहाँ हथकंडों का चल बेअक्ली फैलाते हैं चल बातें सस्ती करते हैं चल बकवास परस्ती करते हैं, चल बकवास परस्ती करते हैं
चल तारों का 'बिजनेस' करके सूरज से 'रिच' हो जाते हैं उस पैसे से मंगल ग्रह पे एक 'प्राइमरी' स्कूल चलाते हैं चल रेल की पटरी पे लेटे हम ट्रेन की सीटी बजाते हैं चल इनकम टैक्स के अफसर से क्यूँ है 'इनकम' कम कहते हैंचल किसी गरीब के बच्चे की सपनों की लंगोटी बुनते हैं मुस्कान जरा फेंक आते हैं जहाँ गम हमेशा रहते हैं चल डाल 'सुगर फ्री' की गोली मीठा पान बनाते हैं जो हमको समझे समझदार उसका चेकअप कराते हैं चल 'बोरिंग-बोरिंग' लोगों से बेमतलब मस्ती करते हैं चल बकवास परस्ती करते हैं चल बकवास परस्ती करते हैं।
पुनःश्च : हिंदी के प्रमुख समाचार चैनल ABP News ने गत रविवार हिंदी दिवस के अवसर पर कई और कार्यक्रम किए जिनमें से एक का विषय था कि हिंदी माध्यम से पढ़ कर आपने क्या परेशानियाँ झेलीं और उनसे जूझते हुए कैसे अलग अलग क्षेत्रों में अपना मुकाम बनाया। इस श्रंखला में साथी ब्लॉगर प्रवीण पांडे के आलावा संतोष मिश्र, अमित मित्तल,निखिल सचान के साथ मुझे भी अपनी बात रखने का मौका मिला। ये मेरे लिए अपनी तरह का पहला अनुभव था। वैसे आधे घंटे से चली इस बातचीत को कैसे संपादक पाँच मिनट में उसके मूल तत्त्व को रखते हुए पेश करते हैं इस कला से मेरा पहली बार परिचय हुआ।
साक्षात्कार के दौरान दिए जा रहे कैप्शन में दो तथ्यात्मक त्रुटियाँ रहीं। एक तो ब्लागिंग की शुरुआत जो मैंने 2005 में की को 1995 दिखाया गया और दूसरी IIT Roorkee से किए गए MTech को BTech बताया गया। आधे घंटे की बातचीत को पाँच मिनट में संपादित करने की वज़ह से बहुत सारी बातें उन संदर्भों के बिना आयीं जिनको ध्यान में रखकर वो कही गयी थीं। मसलन स्कूल की बातों को पूरे परिपेक्ष्य में समझने के लिए आपको मेरी ये पोस्ट पढ़नी होगी। नौकरी के सिलसिले में ये बताना शायद मुनासिब हो कि सेल की सामूहिक चर्चा में हिंदी के प्रयोग के पहले अंग्रेजी में दिए साक्षात्कारों की बदौलत मेरा चयन ONGC और NTPC में हो चुका था।
बड़ा अज़ीब सा शीर्षक है ना। पर इस ग़ज़ल के बारे में बात करते वक़्त उससे परिचय की छोटी सी कहानी आपके सम्मुख ना रखूँ तो बात अधूरी रहेगी। बात अस्सी के दशक की है। क्रिकेट या यूँ कहूँ उससे ज्यादा उस वक़्त मैच का आँखों देखा हाल सुनाने वाली क्रिकेट कमेंट्री का मैं दीवाना था। संसार के किसी कोने मैं मैच चल रहा हो कहीं ना कहीं से मैं कमेंट्री को ट्यून कर ही ले लेता था। बीबीसी और रेडियो आस्ट्रेलिया के शार्ट वेव (Short Wave, SW) मीटर बैंड्स जिनसे मैच का प्रसारण होता वो मुझे जुबानी कंठस्थ थे। यही वो वक़्त था जब शारजाह एक दिवसीय क्रिकेट का नया अड्डा बन गया था। दूरदर्शन और आकाशवाणी शारजाह में होने वाले इन मैचों का प्रसारण भी नहीं करते थे। ऐसे ही एक टूर्नामेंट के फाइनल में भारत व पाकिस्तान का मुकाबला था। मेरी बचपन की मित्र मंडली मुझे पूरी आशा से देख रही थी। मैंने भी मैच शुरु होने के साथ ही शार्ट वेव के सारे स्टेशन को एक बार मंथर गति से बारी बारी ट्यून करना शुरु कर दिया।
जिन्हें रेडियो सीलोन या बीबीसी हिंदी सर्विस को सुनने की आदत रही होगी वो भली भाँति जानते होंगे कि उस ज़माने (या शायद आज भी) में शार्ट वेव के किसी स्टेशन को ट्यून करना कोई विज्ञान नहीं बल्कि एक कला हुआ करती थी। मीटर बैंड पर लाल सुई के आ जाने के बाद हाथ के हल्के तेज दबाव से फाइन ट्यूनिंग नॉब को घुमाना और साथ ही ट्राजिस्टर को उचित कोण में घुमाने की प्रक्रिया तब तक चलती रहती थी जब तक आवाज़ में स्थिरता ना आ जाए। ऐसे में किसी ने ट्रांजिस्टर हिला दिया तो सारा गुस्सा उस पर निकाला जाता था।
मेहदी हसन व नसीम बानो चोपड़ा
नॉब घुमाते घुमाते 25 मीटर बैंड पर अचानक ही उर्दू कमेंट्री की आवाज़ सुनाई दी। थोड़ी ही देर में पता लग गया कि ये कमेंट्री रेडियो पाकिस्तान से आ रही है। उसके बाद तो शारजाह में भारत के 125 रनों के जवाब में पाकिस्तान को 87 रन पर आउट करने का वाक़या हो या चेतन शर्मा की आख़िरी गेंद पर छक्का जड़ने का.... सब इसी रेडियो स्टेशन की बदौलत मुझ तक पहुँच सका था। ऐसे ही एक दिन लंच के अवकाश के वक़्त रेडियो पाकिस्तान पर आ रहे एक कार्यक्रम में ये ग़ज़ल पहली बार कानों में पड़ी थी। मेहदी हसन साहब की आवाज़ का ही असर था कि एक बार सुन कर ही ग़ज़ल की उदासी दिल में घर कर गयी थी। तब उर्दू जुबाँ से जगजीत की ग़ज़लों के माध्यम से हल्का फुल्का राब्ता हुआ था तो मीर तकी 'मीर' की लिखी ये ग़ज़ल पूरी तरह कहाँ समझ आती पर जाने क्या असर था इस ग़ज़ल का कि उसके बाद जब भी हसन साहब की आवाज़ कानों में गूँजती...दिल धुआँ धुआँ हो उठता।
अब जब इस ग़ज़ल का जिक्र छिड़ा है तो आइए देखें जनाब मीर तकी 'मीर' ने क्या कहना चाहा है अपनी इस ग़ज़ल में
देख तो दिल कि जाँ से उठता है ये धुआँ सा कहाँ से उठता है
गोर किस दिल-जले की है ये फ़लक शोला इक सुबह याँ से उठता है
मतले के बारे में क्या कहना! असली शेर तो उसके बाद आता है जब मीर पूछते हैं..हमारे चारों ओर फैले आसमाँ में आख़िर ये किस की कब्र है ? जरूर कोई दिलजला रहा होगा वर्ना इस कब्र से रोज़ सुबह एक शोला ( सूरज का गोला) यूँ नहीं उठता।
खाना-ऐ-दिल से जिनहार न जा कोई ऐसे मकान से उठता है
नाला सर खेंचता है जब मेरा शोर एक आसमान से उठता है
मेरे दिल से तुम हरगिज़ अलग ना होना। भला कोई अपने घर से यूँ जुदा होता है। रो रो कर की जा रही ये फ़रियाद मेरे दिल को विकल कर रही है। मुझे आसामाँ से एक आतर्नाद सा उठता महसूस हो रहा है।
लड़ती है उस की चश्म-ऐ-शोख जहाँ इक आशोब वाँ से उठता है
जब भी उस शोख़ नज़र से मेरी निगाह मिलती है दिल में इक घबराहट ...इक बेचैनी सी फैल जाती है।
बैठने कौन दे है फिर उस को जो तेरे आस्तान से उठता है
ऐ ख़ुदा जिस शख़्स से तेरा करम ही उठ गया उसे फिर कहाँ ठौर मिलती है?
यूँ उठे आह उस गली से हम जैसे कोई जहाँ से उठता है
इश्क इक 'मीर' भारी पत्थर है बोझ कब नातवाँ से उठता है
मैंने तुम्हारी गली से आना जाना क्या छोड़ा, लगता है जैसे ये संसार ही मुझसे छूट गया है। सच तो ये है मीर कि इश्क़ एक ऐसा भारी पत्थर है जिसका बोझ शायद ही कभी इस कमजोर दिल से हट पाए।
वैसे क्या आप जानते हैं कि मीर की इस ग़ज़ल का इस्तेमाल एक हिंदी फिल्म में भी किया गया है। वो फिल्म थी पाकीज़ा। पाकीज़ा में कमाल अमरोही साहब ने फिल्म के संवादों के पीछे ना कई ठुमरियाँ बल्कि ये ग़ज़ल भी डाली है। इधर मीना कुमारी फिल्म के रुपहले पर्दे पर अपने दिल का दर्द बयाँ करती हैं वहीं पीछे से ये नसीम बानो चोपड़ा की आवाज़ में ये ग़ज़ल डूबती उतराती सी बहती चलती है।
वैसे नसीम बानो की गायिकी भी अपने आप में एक पोस्ट की हक़दार है पर वो चर्चा फिर कभी! वैसे आपका इस ग़ज़ल के बारे में क्या ख्याल है?
ज़रा बताइए तो अख़बार शब्द से आपके मन में कैसी भावनाएँ उठती हैं ? चाय की चुस्कियो् के साथ हर सुबह की आपकी ज़रूरत जिसके सानिध्य का आकर्षण कुछ मिनटों के साथ ही फीका पड़ जाता है। देश दुनिया से जोड़ने वाले काग़ज के इन टुकड़ों का भला कोई काव्यात्मक पहलू हो सकता है ....ये सोचते हुए भी अज़ीब सा अनुभव होता है। पर गुलज़ार तो मामूली से मामूली वस्तुओं में भी अपनी कविता के लिए वो बिंब ढूँढ लेते है जो हमारे सामने रहकर भी हमारी सोच में नहीं आ पाती। नहीं समझे कोई बात नहीं ज़रा गुलज़ार की इस त्रिवेणी पर गौर कीजिए
सामने आए मेरे, देखा मुझे, बात भी की मुस्कुराये भी पुराने किसी रिश्ते के लिये
कल का अखबार था बस देख लिया रख भी दिया..
पर रिश्तों के बासीपन से अलग पुराने पड़ते अख़बार का भी हमारी ज़िंदगी में एक अद्भुत मोल रहा है। ज़रा सोचिए तो बचपन से आज तक इस अख़बार को हम कैसे इस्तेमाल करते आ रहे हैं? नागपुर में रहने वाले विवेक राणाडे (Vivek Ranade) , जो प्रोफेशनल ग्राफिक डिजाइनर होने के साथ साथ एक कुशल फोटोग्राफर भी हैं ने इसी थीम को ध्यान में रखते हुए कई चित्र खींचे। वैसे तो ये चित्र अपने आप में एक कहानी कहते हैं पर जब गुलज़ार उस पर अपनी बारीक सोच का कलेवर चढ़ाते हैं तो विचारों की कई कड़ियाँ मन में उभरने लगती हैं। तो आइए देखते हैं कि विवेक और गुलज़ार ने साल के बारह महिनों के लिए अख़बार के किन रूपों को इस अनोखी काव्य चित्र श्रृंखला में सजाया है ?
ख़ुद तो पान खाने की आदत नहीं रहीं पर पान के बीड़े को अख़बार में लपेट अतिथियों तक पहुँचाने का काम कई बार पल्ले पड़ा है ! इसीलिए तो गुलज़ार की इन पंक्तियों का मर्म समझ सकता हूँ जब वो कहते हैं...
ख़बर तो आई थी कि होठ लाल थे उनके 'बनारसी' था कोई दाँतों में चबाया गया
वैसे क्या ये सही नहीं कि चूड़ियाँ भी सालों साल उन कलाइयों में सजने के पहले काग़ज के इन टुकड़ों की सोहबत में रह कर अपनी चमक बरक़रार रख पाती हैं !
ख़बर तो सबको थी कि चूड़ियाँ थी बाहों में ना जाने क्या हुआ कुछ रात ही को टूट गयीं
मुबई की लोकल ट्रेनों में सफ़र करते हुए काग़ज़ के इन टुकड़ों में परोसे गए बड़ा पाव का ज़ायका बरबस याद आता है विवेकराणाडे की इस छवि को देखकर।
ये वादा था कोई भूखा नहीं रहेगा कहीं वो वादा देखा है अख़बार में लपेटा हुआ
शायद ही कोई बचपन ऐसा होगा को जो बरसात में काग़ज़ की नावों और कक्षा के एक कोने
से दूसरे कोने में निशाना साध कर फेंके गए इन रॉकेटों से अछूता रहा हो..पर इन राकेटों से बारूद नहीं शरारत भरा प्यार बरसता था। इसीलिए तो गुलज़ार कहते हैं
असली रॉकेट थे बारूद भरा था उनमें
ये तो बस ख़बरें हैं और अख़बारें हैं
सोचिए तो अगर ये काग़ज़ के पुलिंदे ही ना रहें तो गर्व से फूले इन बैगों, बटुओं और जूतों के सीने क्या अपना मुँह दिखाने लायक रह पाएँगे.. फली फूली रहें जेबें तेरी और तेरे बटवे इन्हीं उम्मीद की ख़बरों से हम भरते रहेंगे
बड़ी काग़ज़ी दोस्ती है नोट के साथ वोट की..:)
ख़बर थी नोट के साथ कुछ वोट भी चले आए
सफेद कपड़ों में सुनते हैं 'ब्लैक मनी' भी थी
काँच की टूटी खिड़कियाँ कबसे अपने बदले जाने की इल्तिजा कर रही हैं। पर घर के मालिक का वो रसूख तो रहा नहीं..दरकती छतें, मटमैली होती दीवारों की ही बारी नहीं आती तो इस फूटे काँच की कौन कहे। उसे तो बस अब अख़बार के इस पैबंद का ही सहारा है। गुलज़ार इस चित्र को अलग पर बेहद मज़ेदार अंदाज़ में आँकते हैं..
ख़ुफिया मीटिंग की हवा भी ना निकलती बाहर इक अख़बार ने झाँका तो ख़बर आई है
याद कीजिए बचपन में बनाए गए उन पंखों को जो हवा देते नहीं पर माँगते जरूर थे :)
हवा से चलती है लेकिन हवा नहीं देती ख़बर के उड़ने से पहले भी ये ख़बर थी हमें
किताबों की जिल्द के लिए अक़्सर मोटे काग़जों की दरकार होती। सबसे पहले पिछले सालों के कैलेंडर की सेंधमारी होती। उनके चुकने पर पत्रिकाओं के रंगीन पृष्ठ निकाले जाते। पर तब श्वेत श्याम का ज़माना था। कॉपियों का नंबर आते आते अख़बार के पन्ने ही काम में आते...
इसी महिने में आज़ादी आई थी पढ़कर कई किताबों ने अख़बार ही लपेट लिए
कई बार अख़बार के पुराने ठोंगो के अंदर की सामग्री चट कर जाने के बाद मेरी नज़रें अनायास ही उन पुरानी ख़बरों पर जा टिकती थीं। कभी कभी तो वो इतनी रोचक होतीं कि उन्हें पूरा पढ़कर ही खाली ठोंगे को ठिकाना लगाया जाता। वैसे क्या आपके साथ ऐसा नहीं हुआ ?
धूप में रखी थी मर्तबान के अंदर अचार से ज़्यादा चटपटी ख़बर मिली
बचपन में माँ की नज़र बचा काग़ज़ में आग लगाना मेरा प्रिय शगल हुआ करता था। दीपावली में अख़बार को मचोड़ कर एक सिरे पर बम की सुतली और दूसरे सिरे पर आग लगाने का उपक्रम सालों साल रोमांच पैदा करता रहा। जितना छोटा अख़बार उतनी तेज दौड़ ! कई बार तो अख़बार की गिरहों में फँसा बम अचानक से फट पड़ता जब हम उसके जलने की उम्मीद छोड़ उसका मुआयना करने उसके पास पहुँचते।
यूँ तो अख़बार जलने से ख़बरें जलती हैं पर कुछ ख़बरें तो दिल ही जला डालती हैं। उनका क्या !
कुछ दिन भी सर्दियों के थे और बर्फ पड़ी थी ऐसे में इक ख़बर मिली तो आग लग गई
साल के समापन का गुलज़ार का अंदाज़ निराला है जैसी भी गुजरी मगर साल गया यार गया Beach पर उड़ता हुआ वो अख़बार गया
आप आशावादी (optimist) हैं या निराशावादी (pessimist) ये तो मुझे नहीं पता पर बचपन में ये प्रश्न मुझे बड़ा परेशान करता था। अक्सर बड़े लोगों के साक्षात्कार पढ़ता तो ये जुमला बारहा दिख ही जाता था किI am an eternal optimist। अपने दिल को टटोलता तो कभी भी इन पंक्तियो को वो पूरी तरह स्वीकार करने को इच्छुक नहीं होता। होता भी कैसे? बचपन से ही उसे अपनी आशाओं को वास्तविकता के तराजू में तौलने की आदत जो हो गई थी। परीक्षा के बाद दोस्त लोग नंबर पूछते तो मैं मन में अंक देने में कंजूस आध्यापक की छवि बनाता और उस हिसाब से गणना कर अपने दोस्तों को अपना अनुमान बता देता। ज़ाहिर है उनके अनुमान मेरे से हमेशा ज्यादा होते पर जब परिणाम आते तो नतीजा उल्टा होता। इंटर में रहा हूँगा जब पहली बार मुझे देखकर एक कन्या ने बड़े प्यार से हाथ हिलाया। प्रचलित जुबान में कहूँ तो wave.. किया। पर जनाब उस का प्रत्युत्तर देने के बजाए मैंने ये देखा कि मेरी नीचे और ऊपर की मंजिल की बॉलकोनी पर कोई लड़का खड़ा तो नहीं है। ऐसे में आप ही बताइए मैं अपने आप को आशावादी कैसे कह सकता हूँ? पर मन ये मानने को तैयार नहीं था कि मैंने नैराश्य की चादर अपने ऊपर ओढ़ रखी है। दिन बीतते गए पर मुझे अपने व्यक्तित्व को परिभाषित करने के लिए उपयुक्त जवाब नहीं मिला और इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान कब ये प्रश्न मुझसे दूर हो गया मुझे पता ही नहीं चला।
और फिर एक दिन अखबार में छपी किसी के ये उक्ति नज़रों से गुजरी
"Success or failure..I will always be pleasantly surprised rather than bitterly disappointed."
और मुझे लगा कि अपने बारे में ये ख्याल मुझे पहले क्यूँ नहीं आया। संयोग देखिए उस दिन के मात्र एक हफ्ते बाद ही बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक कैंपस इंटरव्यू में ये सवाल मुझपे दागा गया Are you an optimist or pessimist ? मैंने भी छूटते ही ऊपर वाली पंक्ति दोहरा दी। अब मुझे क्या पता था कि मैनेजमेंट फिलॉसफी के तहत मेरा जवाब ठीक नहीं बैठेगा। मेरे जवाब के बाद कुछ देर शांति छाई रही फिर उन्होंने मुझे रफा दफ़ा कर दिया। पर इतने दशकों बाद भी मैं अपने फलसफ़े पर कायम हूँ। ख़्वाबों की दुनिया में उड़ने से मुझे कभी परहेज़ नहीं रहा पर पैर धरातल से उखड़े नहीं ये बात भी दिमाग में रही बहुत कुछ मेरी इस कविता की तरह।
वैसे इन सब बातों को आपसे साझा मैं क्यूँ कर रहा हूँ? उसकी वज़ह है आज का वो गीत जो मैं आपको सुनवाने जा रहा हूँ। इस गीत का मर्म भी वही है। जीवन में घट रही तमाम धनात्मक घटनाओं को उतना ही आँकें जिनके लायक वो हैं। नहीं तो अपने सपनों के टूटने की ठेस को शायद आप बर्दाश्त ना कर पाएँ।
ये गीत है फिल्म अनुभव का जिसे लिखा था कपिल कुमार ने और धुन बनाई थी कनु रॉय ने। कपिल कुमार फिल्म उद्योग में एक अनजाना सा नाम हैं। कनु रॉय के साथ उन्होंने दो फिल्मों में काम किया है अनुभवऔर आविष्कार। पर इन कुछ गीतों में ही वो अपनी छाप छोड़ गए। यही हाल संगीतकार कनु रॉय का भी रहा। गिनी चुनी दस से भी कम फिल्मों में काम किया और जो किया भी वो सारे निर्देशक बासु भट्टाचार्य के बैनर तले। बाहर उनको काम ही नहीं मिल पाया। पर इन थोड़ी बहुत फिल्मों से भी अपनी जो पहचान उन्होंने बनाई वो आज भी संगीतप्रेमियों के दिल में क़ायम है।
अब इसी गीत को लें गीत के मुखड़े में मन्ना डे का स्वर उभरता है फिर कहीं और पीछे से कनु की संयोजित वाइलिन और सितार की धुन आपके कानों में पड़ती है। इंटरल्यूड्स में भी यही सितार आपके मन को झंकृत करता है। कनु के संगीत की खासियत ही यही थी कि वे बेहद कम वाद्य यंत्रों में भी सुरीले गीतों को जन्म देते थे। पर सबसे अद्भुत है मन्ना डे की गायिकी । बेहद अनूठे अंदाज़ में उन्होंने गीतकार की भावनाओं को अपनी गायिकी से उभारा है। मन्ना डे साहब हर अंतरे की आखिरी पंक्ति में बदलती लय में लहरों का लगा जो मेला..... या दिल उनसे बहल जाए तो.... गाते हैं तो बस मन एकाकार सा हो जाता है उन शब्दों के साथ।
पिछले हफ्ते अपना 93 वाँ जन्मदिन मनाने वाला ये अनमोल गायक आज भी हमारे बीच है, यह हमारी खुशनसीबी है। मन्ना डे ने शास्त्रीय से लेकर हल्के फुल्के गीतों को जितने बेहतरीन तरीके से निभाया है वो ये साबित करता है उनके जैसा संपूर्ण पार्श्वगायक बिड़ले ही मिलता है।
फिर कहीं... फिर कहीं कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको फिर कहीं कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको फिर कहीं कोई दीप जला, मंदिर ना कहो उसको फिर कहीं ...
मन का समंदर प्यासा हुआ, क्यूँ... किसी से माँगें दुआ मन का समंदर प्यासा हुआ, क्यूँ... किसी से माँगें दुआ लहरों का लगा जो मेला.., तू..फ़ां ना कहो उसको फिर कहीं कोई फूल खिला, चाहत ना कहो उसको फिर कहीं ...
देखें क्यूँ सब वो सपने, खुद ही सजाए जो हमने... देखें क्यूँ सब वो सपने, खुद ही सजाए जो हमने... दिल उनसे बहल जाए तो, राहत ना कहो उसको फिर कहीं ...
फिल्म अनुभव में इस गीत को फिल्माया गया है मेरे चहेते अभिनेता संजीव कुमार और तनुजा पर..
पर कनु रॉय और उनके संगीत का ये सफ़र अभी थमा नहीं है। इस श्रृंखला की अगली कड़ी में चर्चा करेंगे इस तिकड़ी के एक और बेमिसाल गीत की..
गर्मियों के ये दिन बड़े सुहाने चल रहे हैं। वैसे आप जरूर पूछेंगे ये तपती झुलसाती गर्मी मेरे लिए सुहानी कैसे हो गई? आपका पूछना लाज़िमी है। दरअसल पिछले कुछ दिनों से जब जब हमारे शहर का तापमान बढ़ रहा है तब तब तेज़ ठंडी हवाएँ बारिश की फुहार के साथ तन और मन दोनों को शीतल किए दे रही हैं। बारिश से मेरा वैसा लगाव कभी नहीं रहा जैसा अमूमन हर कवि हृदय का होता है। पर जब भी बादलों की हलचल के साथ ठंडी हवा की मस्त बयार शरीर से टकराती है दिल हिलोरें लेने लगता है। ऐसे में मैं हमेशा छत की ओर दौड़ता हूँ इन हवाओं की प्रचंडता को और करीब से महसूस करने के लिए। पता नहीं हवा के इस सुखद स्पर्श में क्या शक्ति है कि मन चाहे कितना भी अवसादग्रस्त क्यूँ ना हो, ऐसी मुलाकातों के बाद तरोताज़ा हो जाया करता है। इन खुशनुमा लमहों में लता जी का गाया फिल्म शागिर्द का ये गीत होठों पर रहता है
उड़ के पवन के रंग चलूँगी
मैं भी तिहारे संग चलूँगी
बस मन को दिक्कत ये आती है कि आगे रुक जा ऐ हवा, थम जा ऐ बहार कहने का दिल नहीं करता..
बचपन की ये आदत कई दशकों के बाद आज भी छूटी नहीं है। वैसे इस आदत के पड़ने का कुछ जिम्मा हमारे देश की विद्युत आपूर्ति करने वाली संस्थाओं को भी जाना चाहिए। जैसा कि भारत में आम है कि जब भी आँधी आती है बिजली या तो चली जाती है या एहतियातन काट दी जाती है। फिर या तो छत या घर की बॉलकोनी, यही जगहें तो बचती है बच्चों को बोरियत से बचने के लिए। उम्र बढ़ती गई और उसकी इक दहलीज़ में आकर आँधी आते ही बिजली का जाना बड़ा भला लगने लगा। हवा के पड़ते थपेड़ों से उड़ते बालों व धूल फाँकती मिचमिचाती आँखों के बीच एकांत में घंटों बीत जाते और मुझे उसका पता भी ना चलता। बिजली आती तो बड़े अनमने मन से अपनी वास्तविक दुनिया में वापस लौटते।
पर तेज़ हवाओं से मेरा ये प्रेम अकेले का थोड़े ही है। आपमें से भी कई लोगों को बहती पवन वैसे ही आनंदित करती होगी जैसा मुझे। इस मनचली हवा के प्रेमियों की बात आती है तो मन लगभग दो दशक पूर्व की स्मृतियों में खो जाता है। बात 1994 की है तब हमारे यहाँ दिल्ली से प्रकाशित टाइम्स आफ इंडिया आया करता था। उसके संपादकीय पृष्ठ पर लेख छपा था सुरेश चोपड़ा (Suresh Chopda) का। शीर्षक था The Wind and I। उस लेख में लिखी चोपड़ा साहब की आरंभिक पंक्तियाँ मुझे इतनी प्यारी और दिल को छूती लगी थीं कि मैंने उसे अपनी डॉयरी के पन्नों में हू बहू उतार लिया था। चोपड़ा साहब ने लिखा था
"There is something so alive and moving in a strong wind, that one of my concept of perfect bliss is to find myself standing alone on a high cliff by the sea with a strong wind hurtling past me with full ferocity. Nothing depresses me more than a windless day, with everything still and the leaves of the trees hanging still and lifeless. Yes give me the wind any day the stronger, wilder and more ferocious the better."
पर जब आज आपसे जब सुरेश चोपड़ा के लेख का जिक्र किया है तो उसके साथ हवा से जुड़े उनके दो मज़ेदार संस्मरणों को भी बताता चलूँ जिन्हें मैं आज तक भुला नहीं पाया हूँ।
सुरेश चोपड़ा तब आकाशवाणी के संवाददाता थे। एक बार उन्हें पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश के मुख्यालय पेशावर में काम के सिलसिले में कुछ महिनों के लिए भेजा गया। पेशावर के सदर इलाके में चोपड़ा साहब अपनी मारुति चला रहे थे कि उनकी नज़र सामने तांगे पर जाती एक युवती पर पड़ी। जैसा कि वहाँ का रिवाज़ है उस युवती ने अपनी आँखों को छोड़ अपना पूरा चेहरा काली मोटी चद्दर से ढका हुआ था। वो लगातार उनकी ओर अपलक देख रही थी। ये समझने का प्रयास करती हुई कि आख़िर पाकिस्तान के इस सुदूर इलाके में एक भारतीय कार् क्या कर रही है? चोपड़ा साहब मन ही मन सोच रहे थे कि काश मैं इस कन्या का चेहरा देख पाता कि इतने में पवन का एक तेज़ झोंका आया। झोंके की तीव्रता इतनी थी कि युवती के चेहरे से चादर अचानक ही हट गई। उसने तुरंत चादर वापस अपनी जगह पर कर ली पर हवा की दया से चोपड़ा साहब के मन की तमन्ना पूरी हो गई और उस चेहरे को वो कभी भूल नहीं पाए।
हवा से जुड़ा एक और दिलचस्प वाक्या सत्तर के दशक में हुआ जब चोपड़ा साहब को भारत चीन सीमा पर स्थित नाथू ला पर भेजा गया। नाथू ला पर भारत और चीन की सेनाओं की टुकड़ी आमने सामने गश्त लगाती है। दोनों सीमाओं के बीच बीस गज का फ़ासला हुआ करता था जो कि No man's land कहलाता था। एक दिन वे फौज से उधार माँगे बाइनोक्यूलर से चीनी टुकड़ीकी गतिविधियों का जायज़ा ले रहे थे। तभी उनकी नज़र एक चीनी सैनिक पर पड़ी जो एक दीवार के सहारे खड़ा होकर हाथ में लिये काग़ज़ को पढ़ रहा था। अचानक ही वहाँ हल्की सी आँधी आ गयी। वो काग़ज़ चीनी सैनिक के हाथ से निकलकर हवा में उड़ने लगा। बहुत देर तक हवा के विपरीत बहाव के बीच काग़ज़ का वो टुकड़ा नो मैन्स लेंड के ऊपर मँडराता रहा। कुछ देर के बाद वो टुकड़ा अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करता हुआ भारतीय हिस्से में आकर गिर गया। वो बड़ा नाटकीय क्षण था। किसी भी हालत में उस पत्र को वापस लौटाया नहीं जा सकता था क्यूँकि जवानों के बीच बातचीत की उस वक़्त सख्त मनाही थी। सेना ने उस टुकड़े को ज़ब्त कर लिया और संदेश का अनुवाद करने के लिए उसे दिल्ली भेज दिया गया।
उस घटना के कई साल बाद जब चोपड़ा जी को सेना क मुख्यालय में जाने का मौका मिला तो उन्हें उस कागज के टुकड़े की याद आई। उन्हें पता लगा कि वो कोई गुप्त संदेश ना होकर एक प्रेम पत्र था जिसका पता चलने के बाद औपचारिक क्षमा के साथ चीनी टुकड़ी को वापस लौटा दिया गया था।
अब हवा क्या जानें सरहद की दीवारों को। वो तो बेखौफ़ उस दिशा में चलती है जिधर उसकी मर्जी हो।चीन से जुड़ी इस घटना को याद करते हुए मुझे अहमद हुसैन मोहम्मद हुसैन की गाई वो ग़ज़ल याद आ रही है जिसमें वो फर्माते हैं
मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा
दश्त मेरा ना ये चमन मेरा
आप भी सुनिए..
तो ये थे हवा के कुछ शरारती कारनामे। क्या आपकी ज़िंदगी में भी इस नटखट हवा से जुड़ी कुछ यादें हैं ..तो बताइए ना हम सुनने को तैयार बैठे हैं..
Author: Manish Kumar
| Posted at: 10/14/2011 01:40:00 pm |
Filed Under: अपनी बात,
जगजीत सिंह
|
दस अक्टूबर को दिल्ली में महरौली की ओर जा रहा था कि ख़बर मिली ... जगजीत सिंह नहीं रहे। ख़बर अप्रत्याशित नहीं थी। हफ़्ते दस दिन पहले ही उनके नजदीकियों से ये सूचना मिल रही थी कि मीडिया द्वारा प्रसारित उनकी "सो कॉल्ड स्टैबिलिटी" में कुछ खास सच्चाई नहीं है और वे वेंटिलेटर पर हैं और यदा कदा ही उनका शरीर हरक़त में आता है। इतना कुछ सुनने के बाद भी कहीं कोई उम्मीद की किरण जरूर थी कि कोई चमत्कार हो जाए। ग़ज़लों को भारत के आम मानस पटल पर जिलाने वाला शख़्स शायद एक बार फिर लाखों करोड़ों ग़ज़ल प्रेमियों की दुआ से जी उठे।
पर भगवान को कुछ और ही मंजूर था। जगजीत चले गए। जगजीत की जिंदगी और उनसे अपने जुड़ाव के बारे में पहले भी इतना लिख चुका हूँ कि अब उन बातों की पुनरावृति आवश्यक नहीं। इतना जरूर कहूँगा कि जगजीत के व्यक्तित्व के कुछ अनछुए पहलू भी थे। भले ही दुनिया ज़हान का दर्द उनकी आवाज़ से टपकता था पर अपनी निजी ज़िदगी के सदमों के बारे में वे अपने करीबियों से भी बात नहीं करते थे। बेटे की असमय मौत, चित्रा जी का गिरता स्वास्थ, बेटी द्वारा आत्महत्या.... मानसिक वेदना देने वाले इन झटकों के बावजूद उनका सांगीतिक सफ़र चलता रहा। नए एलबमों की आवृति में भले कमी आ गई हो पर महिने में दो कान्सर्ट वो कर ही लेते थे। जिस दिन उन्हें ब्रेन स्ट्रोक हुआ, उस दिन भी वो गुलाम अली के साथ एक कार्यक्रम मुंबई में करने वाले थे। आशा जी कहती हैं कि ये अपने में घुलते रहना ही शायद उनकी गिरती तबियत की वज़ह बना।
जगजीत की एक और खासियत थी कि वो बिना किसी लाग लपेट के अपने दिल की बात कहने में यकीन रखते थे। भारत में पाकिस्तानी कलाकारों के कार्यक्रमों पर उन्हें इस लिए ऐतराज रहा क्यूँकि भारतीय कलाकारों को पाकिस्तान में कार्यक्रम करने में हमेशा दिक्कतों का सामना करना पड़ता रहा। अक्सर जगजीत से उनके साक्षात्कारों में ये प्रश्न किया जाता रहा कि हिंदी संगीत जगत में क्या ग़जल अपनी पुरानी प्रतिष्ठा को वापस ला पाएगी? इस बारे में आशान्वित रहते। वे कहा करते थे कि
" ग़ज़लों का दौर फिर आएगा। आज जिस तरह के गीत बन रहे हैं उनमें कविता कम और टपोरीपन ज्यादा है। लोग उन्हीं शब्दों से खेलते है। गीत की जान उसके शब्द ना होकर 'डान्स रिदम' हो गयी हैं जिस पर वे आधारित हैं। आम संगीतप्रेमी का मन इनसे उब रहा है। वे ऐसा कुछ सुनना चाहते हैं जो सार्थक हो और मन को सुकून दे।"
ग़ज़लों की घटती लोकप्रियता के पीछे मीडिया की भूमिका से जगजीत बेहद आहत थे। जगजीत का मानना था कि लोग आज कल संगीत सुनने नहीं बल्कि देखने लगे हैं।
"कैसा भी गायक हो निर्माता पैसे लगाकर एक आकर्षक वीडिओ लगा देते हैं और संगीत चैनल उसे मुफ्त में दिखा देते हैं। इससे गैर फिल्मी ग़ज़लों का टीवी के पर्दे तक पहुँचना मुश्किल हो गया है। रेडिओ की भी वही हालत है। प्राइवेट एफ एम चैनलों के मालिकों और उद्घोषकों को ग़जलों में ना कोई रुचि है ना उसको समझने का कोई तजुर्बा है। मैं तो कई बार ऐसे चैनल के साथ साक्षात्कार करने से साफ़ मना कर देता हूँ क्यूँकि वे ग़ज़लों को अपने कार्यक्रमों मे शामिल नही करते।"
दो साल पहले जगजीत का दिया ये वक्तव्य मुझे सौ फीसदी सही लगता है। मुझे याद है कि जब हमारे घर पर कैसेट खरीद कर ग़ज़लें सुनने का चलन नहीं था तब भी हम विविध भारती के 'रंग तरंग 'कार्यक्रम की बदौलत ढेर सारी ग़ज़लों से रूबरू होते रहते थे। सरकारी चैनलों को छोड़ दे तो निजी चैनल ग़ज़लों के लिए आज भी वही रवैया इख्तियार किए हुए हैं। ऍसी हालत में नई पीढ़ी संगीत की इस विधा से अगर अपरिचित है तो उसमें उनका क्या दोष ?
मीडिया खासकर संगीत के चैनलों चाहे वो निजी रेडिओ या टीवी के हों की इसमें अहम भूमिका है। पिछले कुछ सालों में जब भी टीवी के अलग अलग चैनलौं पर लोक संगीत, सूफ़ी संगीत, शास्त्रीय व पाश्चात्य के फ्यूजन से जुड़े कार्यक्रम आए लोगों ने उसे सराहा। पर ग़ज़लों और नज़्मों को पसंद करने वालों के लिए अभी भी अपने श्रोताओं तक पहुँचने में इलेक्ट्रानिक मीडिआ की तरफ से कोई पहल नहीं हुई है।
जगजीत ने ग़ज़लों के साथ ग़ज़ल गायकों को भी हमेशा बढ़ावा दिया। पिछले साल 'सा रे गा मा पा' में जब रंजीत रजवाड़ा ने जब अपनी ग़ज़ल गायिकी से पूरे भारत को सम्मोहित किया तो गुलाम अली के साथ जगजीत भी उन्हें शाबासी देने पहुँचे। जगजीत ने वहाँ ये भी कहा कि जल्द ही ग़ज़ल गायकों के लिए एक अलग से संगीत कार्यक्रम होगा। पर उनके जीवन में उनका ये सपना साकार रूप नहीं ले सका।
आज जगजीत हमारे बीच नहीं है। उनकी आवाज़ तो हमेशा हमारे साथ रहेगी पर जगजीत सिंह को संगीतप्रेमियों की सच्ची श्रृद्धांजलि यही होगी कि हम सब मिलकर अपने अपने स्तर से संगीत की इस खूबसूरत विधा को हर संभव बढ़ावा दें ताकि नए ग़ज़ल गायक व गायिका जगजीत सिंह के जाने से उपजे शून्य को भर सकें और नई पीढ़ी इन्हें सुनने और समझने के आनंद से वंचित ना रहे।
आज मेरे इस ब्लॉग का पाँचवा जन्मदिन है। विगत पाँच सालों से ब्लॉगिंग को अपनी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बनाया है। इस बात का संतोष है कि अब तक जो कुछ लिखा या प्रस्तुत किया है उसमें मुझे खुद भी आनंद आता रहे। अगर पाँच सालों में बिना किसी विराम के ये निरंतरता इस चिट्ठे पर बनी रही है तो इसके पीछे इसी जज़्बे का हाथ है।
इस मौके पर इस चिट्ठे के तमाम पाठकों, ई मेल सब्सक्राइबरों, फालोवर्स और नेटवर्क ब्लॉग से जुड़े जाने अनजाने लोगों का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने इस चिट्ठे पर अपनी आस्था बनाई हुई है। आपकी मदद से ही अब तक इन 480 पोस्ट और तीन लाख पेज लोड्स का ये सफ़र पूरा हुआ है।
और चिट्ठे के हिंदी और रोमन हिंदी संस्करणों की सब्सक्राइबर संख्या बारह सौ पार कर गई है।
इन पाँच सालों में हिंदी ब्लॉग जगत के उतार चढ़ावों का भी साक्षी रहा हूँ। हिंदी चिट्ठों के संकलको की सहायता से छोटे परिवार को आगे बढ़ते देखा है। संकलक लोकप्रिय हुए। फिर आलोचना के शिकार बने। नए संकलकों ने उनकी जगह ली और एक दिन वे भी उसी हस्र का शिकार हुए जैसे कि उनके पूर्ववर्ती। एक चर्चा मंच था फिर कई हुए। होने ही थे क्यूँकि ब्लॉगिंग कोई ऐसी विधा नहीं है जो कुछ क्षत्रपों द्वारा नियंत्रित और संचालित होती रहे। दुर्भाग्यवश हिंदी में चिट्ठा लिखने वालों में ये प्रवृति इसके शुरुआती दिनों से ही हावी रही। आज भी हिंदी में चिट्ठे लिखने वालों का एक बड़ा वर्ग अपनी लेखनी का इस्तेमाल इसलिए करता है कि उसकी रियासत कुछ और फैले। जब कई रियासतें फैलेंगी तो उनमें पारस्परिक संघर्ष तो होगा ही।
ख़ैर खुशी की बात ये है कि इस उठापटक के बावजूद भी सैकड़ों ऐसे चिट्ठे हैं जो चुपचाप ही सही पर रोचक और स्तरीय सामग्री नेट के हिंदी कोष में जमा करते जा रहे हैं। लोग इस बात को भी समझ चुके हैं कि जैसे जैसे ब्लॉगों की संख्या बढ़ती जाएगी संकलक अपनी उपयोगिता खोते जाएँगे। वैसे भी सोशल नेटवर्किंग के युग में संकलकों से कही ज्यादा आसानी से आप फेसबुक और ट्विटर के ज़रिए अपने पाठकों तक पहुँच सकते हैं। यही वज़ह है कि हिंदी ब्लॉगिंग से जुड़े तमाम लोग इन माध्यमों को तेजी से अपना रहे हैं।
चलते चलते एक बार फिर पिछले साल कही अपनी बात को दोहराना चाहूँगा कि
अपने अनुभवों से इतना कह सकता हूँ कि जैसे जैसे आप अपने विषय वस्तु यानि कान्टेंट में विस्तार करते जाते हैं, कुल पाठकों की संख्या में तो वृद्धि होती है पर उसमें एग्रगेटर से आनेवाले पाठकों का हिस्सा कम होता जाता है। इसलिए सनसनी या बिना मतलब के पचड़ों में पड़ने के बजाए अपने मन की बात कहें और पूरी मेहनत के साथ कहें।
उम्मीद करता हूँ कि संगीत और साहित्य का ये सफ़र आपके स्नेह से इस साल भी खुशनुमा रहेगा...
पिछले दो हफ्तों से मैं सा रे गा मा पा के अपने पसंदीदा प्रतिभागियों के बारे में लिखता आ रहा हूँ। स्निति और सुगंधा के बाद आज बारी थी इस साल के मेरे सबसे चहेते गायकरंजीत रजवाड़ा की। रंजीत के बारे में सोचकर मन में खुशी और दुख दोनों तरह के भाव आ रहे हैं। खुशी इस सुखद संयोग के लिए कि जब रंजीत की गायिकी के बारे में ये प्रविष्टि लिख रहा था तो मुझे पता चला कि आज ग़ज़लों के राजकुमार कहे जाने वाले इस बच्चे का अठारहवाँ जन्मदिन भी है। और साथ ही मलाल इस बात का भी कि रंजीत को सा रे गा मा पा में सुनने का सौभाग्य अब आगे नहीं मिलेगा क्यूँकि पिछले हफ्ते संगीत के इस मंच से उसकी विदाई हो गई।
पर इस बात का संतोष है कि हिंदी फिल्म संगीत के पार्श्वगायकों को मौका देने वाले सा रे गा मा पा के मंच ने एक ख़ालिस ग़ज़ल गायक को भी अपनी प्रतिभा हम तक पहुँचाने का मौका दिया। आज के मीडिया की सबसे बड़ी कमी यही है कि वे हमारी शानदार सांगीतिक विरासत और विभिन्न विधाओं में महारत हासिल किए हुए कलाकारों को सही मंच प्रदान नहीं करती। शास्त्रीय गायिकी हो या सूफ़ी संगीत, लोकगीत हों या भक्ति संगीत, ग़ज़लें हों या कव्वालियाँ इन्हें भी टीवी और रेडिओ के विभिन्न चैनलों में उतनी ही तवज़्जह की दरक़ार है जितने पुराने नग्मों और आज के हिंदी फिल्म संगीत को। पर मीडिया के संगीत व अन्य चैनल शीला की जवानी और मुन्नी की बदनामी से ही इतने परेशान है कि इस ओर भला उनका ध्यान कहाँ जा पाता है? जब तक संगीत की हमारी इस अनमोल विरासत को फ़नकारों के माध्यम से नई पीढ़ी तक नहीं पहुँचाया जाएगा ये उम्मीद भी कैसे की जा सकती है कि उनकी तथाकथित सांगीतिक अभिरुचि बदलेगी?
इसीलिए जब रंजीत को आडिशन के वक़्त ये दिल ये पागल दिल मेरा ....गाने पर भी चुन लिया गया तो मुझे बेहद खुशी हुई। सा रे गा मा पा में उनका सफ़र और उम्दा हो सकता था अगर माननीय मेन्टरों ने उनकी प्रतिभा से न्याय करते हुए उन्हें सही गीत या ग़ज़लें दी होतीं। आज का युग विशिष्टताओं का युग है। गायिकी के इस दौर में रफ़ी, किशोर , मन्ना डे जैसे हरफ़नमौला गायक आपको कम ही मिलेंगे। पिछले दशक के जाने माने गायकों जैसे सोनू निगम, अभिजीत, उदित नारायण, कुमार शानू, अलका याग्निक, कविता कृष्णामूर्ति फिल्मों में कम और स्टेज शो में ज्यादा सुने जाते है। आज तो हालात ये हैं कि हर नामी संगीतकार खुद ही गायक बन बैठा है। विशाल भारद्वाज, विशाल, शेखर, सलीम,शंकर महादेवन इसकी कुछ जीती जागती मिसालें हैं। इन कठिन हालातों में सिर्फ उन गायकों के लिए पहचान बनाने के अवसर हैं जिनकी गायन शैली विशिष्ट है। सूफ़ियत का तड़का लगाना हो तो राहत फतेह अली खाँ, शफ़क़त अमानत अली, कैलाश खेर, रेखा भारद्वाज,ॠचा शर्मा सरीखी आवाज़ों का सहारा लिया जाता है। ऊँचे सुरों वाले गीत हों तो फिर सुखविंदर और दलेर पाजी अपना कमाल दिखला जाते हैं। मीठे सुर तो श्रेया घोषाल और हिप हॉप तो सुनिधि चौहान। जो जिस श्रेणी में अव्वल है उससे वैसा ही काम लिया जा रहा है।
सा रे गा मा पा के मंच से जब रंजीत रजवाड़ा ने गुलाम अली की तीन चार ग़ज़लें बड़ी काबिलियत से गा लीं तो हमारे मूर्धन्य संगीतकार विशाल जी को लगा कि उनके गायन में कोई विविधता नहीं है। बताइए विविधता की बात वो शख़्स कर रहा है जो खुद सिर्फ हिप हॉप वाले वैसे गीतों को गाता रहा है जिसमें खूब उर्जा (बहुत लोगों को लगेगा कि शोर सही शब्द है) की आवश्यकता होती है। अगर रजवाड़ा से विविधता के नाम पर गुलाम अली के अलावा अन्य मशहूर ग़ज़ल गायकों या पुरानी हिंदी फिल्मों की ग़ज़लें गवाई जाती तो ये फ़नकार समा बाँध देता पर उन्हें कहा गया कि हारमोनियम छोड़ कर कुछ दूसरी तरह का गीत चुनिए। लिहाज़ा रंजीत ने कुछ फिल्मी गीतों पर भी मज़बूरन हाथ आज़माया। नतीजा सिफ़र रहा। वो तो उनकी ग़ज़ल गायिकी से मिल रही लोकप्रियता थी जो उन्हें इतनी साधारण प्रस्तुति के बाद भी बचा ले गई।
रंजीत राजस्थान के एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते हैं। पिता को संगीत का शौक था पर संगीत के क्षेत्र में कुछ करने की ललक को वो फलीभूत ना कर सके। पर बेटे में जब उनको वो प्रतिभा नज़र आई तो उन्हें लगा कि जो वो अपनी ज़िदगी में ना कर पाए शायद बेटा कर दे। रंजीत ने भी होटल में काम करने वाले अपने पिता को निराश नहीं किया। चिरंजी लाल तनवर से संगीत सीख रहे रंजीत ने पहले छोटी मोटी प्रतियोगिताएँ जीती और फिर 2005 में तत्कालीन राष्ट्रपति से बालश्री का खिताब पाया। अगले साल आल इंडिया रेडियो द्वारा भी सर्वश्रेष्ठ गायक का ईनाम भी जीता। लता दी और सोनू निगम जैसे माने हुए कलाकार उन्हें यहाँ आने से पहले सुन चुके हैं। अगर आपने अभी तक रंजीत को गाते देखा सुना नहीं तो ये काम अवश्य करें।
दिखने में दुबले पतले और दमे की बीमारी से पीड़ित जब रंजीत गाते हैं तो एक ओर तो हारमोनियम पर उसकी ऊँगलियाँ थिरकती हैं तो दूसरी तरफ़ ग़ज़ल की भावनाओं के अनुरूप उसकी आँखों की पुतलियाँ। रंजीत ने ग़ज़ल गायिकी के पुराने स्वरूप को बड़े सलीके के साथ इन चंद हफ्तों में संगीत प्रेमी जनता तक पहुँचाने का जो काम किया है, उसके लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। आज अंतरजाल पर जगह जगह लोग रंजीत रजवाड़ा की गायिकी की मिसालें देते नहीं थक रहे हैं और खुशी की बात ये है कि इसका बहुत बड़ा हिस्सा वैसे युवाओं का है जिन्होंने ग़ज़ल को कभी ठीक से सुना ही नहीं।
सा रे गा मा पा के इस सफ़र में रंजीत ने ज्यादातर अपने पसंदीदा ग़ज़ल गायक गुलाम अली की ग़ज़लें गायीं। हंगामा हैं क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है...., चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है..., ये दिल ये पागल दिल मेरा.... , आज जाने की जिद ना करो... इन सब की प्रस्तुतियों में उन्होंने खूब तालियाँ बटोरी पर मुझे उनकी सबसे बेहतरीन प्रस्तुति तब लगी जब उन्होंनेयाद पिया की आएगाया। रघुबीर यादव के सम्मुख गाए इस गीत में रंजीत को दीपक पंडित की वॉयलिन और बाँसुरी पर पारस जैसे नामी साज़कारों के साथ गाने का मौका मिला और उन्होंने इस अवसर पर अपने सुरों में कोई कमी नहीं होने दी। तो सुनिए रंजीत की ये प्रस्तुति
रंजीत आपको एक बार फिर से अपने अठारहवें जन्मदिन की बधाई। मेरी शुभकामना है आप ग़ज़ल गायिकी में जिस मुकाम पर इतनी छोटी उम्र में पहुँचे हैं उसमें आप खूब तरक्की करें और रियाज़ के साथ साथ अपने स्वास्थ का भी ध्यान रखें।
Author: Manish Kumar
| Posted at: 10/19/2010 10:20:00 am |
Filed Under: अपनी बात,
खेल
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अक्टूबर 1982 में होश सँभालने के बाद पहली बार शायद दिल्ली जाना हुआ था। दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतें भी तभी देखी थीं पर सबसे ज्यादा जो बात याद रह गई, वो थी उस रात की! पूरी यात्रा के दौरान पिताजी से यही शिकायत करता रहा था कि पापा अगर आप एक महिने देर से हमें यहाँ लाए होते तो हमें एशियाई खेलों को देखने का मौका मिल जाता। बाद में मेरा मन रखने के लिए पिताजी हमें नवनिर्मित जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम के बाहर ले आए थे।
बाहर से ही दूधिया रोशनी से नहाया हुए स्टेडियम को देखना एक छोटे शहर से आए उस बच्चे के लिए कितना रोमांचकारी रहा होगा ये आप भली भांति समझ सकते हैं। मेरी मनः स्थिति को समझ पिताजी हमें स्टेडियम के अंदर दाखिल कर लेने के जुगाड़ में लग गए थे। अंदर उद्घाटन समारोह की तैयारियाँ जोरों पर थीं।
संयोग से स्टेडियम के बाहर तैनात सुरक्षाकर्मी हमारे प्रदेश का था और पिताजी के कहने पर उसने हमें दस मिनट के लिए अंदर जाने की इज़ाजत दे दी थी। सीढ़ियाँ चढ़कर जब स्टेडियम के अंदर मैंने कदम रखा तो अंदर के उस अलौकिक दृश्य हरी दूब की विशाल आयताकार चादर और उसके चारों और फैला हुआ ट्रैक का कत्थई घेरा और मैदान से आती स्वागतम की मधुर धुन। ... को देख सुन कर मन खुशी से झूम उठा था।
इन्ही स्मृतियों को लिए मैं वापस पटना आ गया था। मन में इन खेलों के प्रति उत्साह का ये आलम था कि अगले महिने जब नवंबर से ये खेल प्रारंभ हुए थे तब मेरा पूरा दिन टेलीविज़न के सामने बैठ कर जाता था। ये बताना आवश्यक होगा कि एशियाई खेलों के साथ ही पटना में रंगीन टेलीविज़न की शुरुआत हुई थी। हमारे घर तब रंगीन क्या, श्वेत श्याम टीवी भी नहीं था। पर हम सुबह आठ बजे ही नहा धो कर पड़ोसी के घर चले जाते और वहाँ अन्य बच्चों के साथ ही जमीन पर बैठ कर खिलाड़ियों के कारनामों को अपलक निहारा करते थे।
जिमनास्टिक, घुड़सवारी, नौकायन, गोल्फ, लॉन टेनिस व एथलेटिक्स की विभिन्न प्रतिस्पर्धाएँ क्या होती हैं और कैसे खेली जाती हैं ये मुझे पहली बार इन्ही खेलों के द्वारा पता चला। बीस किमी दौड़ के स्वर्ण पदक विजेता चाँद राम, मध्यम दूरी की धाविका गीता जुत्शी, हमारी गोल्फ टीम तब के हमारे हीरो बन गए थे। वहीं पाकिस्तान से हॉकी के फाइनल में मिली करारी हार जिसमें हमारे गोलकीपर नेगी का लचर प्रदर्शन और कप्तान ज़फर इकबाल का पेनाल्टी स्ट्रोक मिस कर जाना शामिल था, हमें बहुत दिनों तक अखरता रहा था।
इसी लिए जब 28 सालों बाद इतने बड़े स्तर पर राष्टमंडल खेल जैसी खेल प्रतियोगिता की मेज़बानी करने का मौका भारत को मिला तो मुझे हार्दिक खुशी हुई थी। तमाम लोग इस तरह के खेलों को पैसे की बर्बादी बताते रहे हैं पर मेरे मन में इस बात को ले के कभी सुबहा नहीं रहा कि इस तरह के खेलों का आयोजन से देश के प्रतिभावान खिलाड़ियों (जो आधी अधूरी सुविधाओं के बलबूते पर भी अपनी अपनी स्पर्धाओं में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं) को एक अच्छा प्लेटफार्म मिल जाता है। जो रोल मॉडल इन खेलों के ज़रिए चमकते हैं वो कई भावी खिलाड़ियों, युवाओं और बच्चों में एक आशा की किरण, एक सपना जगा जाते हैं कि हम भी कभी उस मुकाम पर पहुँच सकते हैं। इसके अतिरिक्त देश के नागरिकों में ऐसे सफल आयोजन से जिस आत्मगौरव की भावना जाग्रत होती है उसका कोई मोल नहीं है।
पर इन सब बातों का ये मतलब नहीं कि हम इन खेलों के आयोजन में हुए भ्रष्टाचार पर आँखें मूँद लें। दोषियों पर नकेल कसने के लिए जो कार्यवाही चल रही है वो अपने उचित मुकाम पर पहुँचे, यही आशा है।
पिछले दो हफ्तों के आयोजन में कार्यालय से घर आ कर बिताए लमहे मेरे लिए बेहद खुशगवार रहे हैं। तीन दशक पूर्व हुए बचपन के उस अभूतपूर्व अनुभव में फर्क यही था कि इस बार मेरे बचपन को मेरे आठ वर्षीय पुत्र ने जीया और मैं भी उसकी संगत में वही बालक बन गया।
आज मैं कॉमनवेल्थ खेलों से जुड़ी इन यादों को उन खिलाड़ियों, मज़दूरों, देश के विभिन्न भागों से आए कलाकारों, सुरक्षा बलों के जवानों, स्वेच्छा से अपनी सेवाएँ देने वाले बच्चों को समर्पित करना चाहता हूँ जिनकी अथक मेहनत का फल हमने इस अभूतपूर्व आयोजन में देखा। उद्घाटन समारोह में भारत के विविध रंगों का इतना सुरुचिपूर्ण प्रदर्शन बहुत दिनों तक याद रहेगा। इतने सुंदर नृत्य, मन मोहती पोशाकें और सबसे लाजवाब भारतीय रेल के बिंब के ज्ररिए भारत के आम नागरिकों का सम्मान।
हरियाणा और पश्चिमी उत्तरप्रदेश अपनी संकीर्ण सामाजिक पृष्ठभूमि, मादा भ्रूण हत्याओं के लिए बदनाम रहे हैं। पर मुजफ्फरनगर की अलका तोमर और भिवानी की गीता जब अपनी विरोधी पहलवानों को पटखनी दे रही हैं तो मन यही सोच रहा है क्या वे अपने इलाके के लोगों में बच्चियों के लिए नई सोच का सूत्रपात नहीं करेंगी? गौरतलब रहे कि ये महिलाएँ सरकारी मदद से ज्यादा अपने अभिभावकों द्वारा मिले सहयोग से इस मुकाम तक पहुँचने में सफल हुई हैं। ये वो खिलाड़ी हैं जिन्होंने आयातित गद्दों के बजाए मिट्टी के अखाड़ों में कुश्ती की शुरुआत की। जिमनेज्यिम के बजाए खेत खलिहानों में दौड़कर अपनी फिटनेस बनाए रखने की क़वायद की और इन सबसे ज्यादा समाज की परवाह ना करते हुए भी उस स्पर्धा में नाम कमाया जो उनके लिए प्रायः वर्जित थी।
फिर भी जब इनका जज़्बे की मिसाल देखिए। बबिता, गीता की छोटी बहन हैं। चेहरे से अभी भी बच्ची ही दिखती हैं। रजत पदक जीत लिया उन्होंने पर आँखों में आँसू हैं... कुछ गलती हो गई नहीं तो गोल्ड मैं भी ले ही आती..भगवान करे जीत की ये भूख आगे भी बनी रहे...
चलिए परिदृश्य बदलते हैं। बात करते हैं झारखंड की जहाँ हॉकी और तीरंदाजी के प्रतिभावान खिलाड़ियों की अच्छी खासी पौध है। सुविधाओं के नाम पर कुछ एस्ट्रोटर्फ स्टेडियम बने। रख रखाव के आभाव में फट गए हैं पर खिलाड़ी उन्हीं पर अब भी खेलते हैं। स्पोर्ट्स हॉस्टल हैं पर वहाँ खिलाड़ियों को ढंग का भोजन नसीब नहीं है। फिर भी पुरुष और महिला हॉकी टीम में आदिवासी खिलाड़ी अपनी प्रतिभा के बल पर मुकाम बना ही लेते हैं।
दीपिका कुमारी को ही लीजिए पिता आटोरिक्शा चलाते हैं, माँ एक नर्स हैं। बेटी को निशाना साधने का बचपन से ही शौक था। तीर ना सही पत्थर तो थे और लक्ष्य आम का पेड़। पर शीघ्र ही मन में ये आत्मविश्वास समा गया कि अगर मैं ये निशाना अच्छा लगा सकती हूँ तो तीर भी ही निशाने पर ही छोड़ूँगी। एक बार टाटा की तीरंदाजी एकाडमी में प्रवेश मिला तो फिर उसने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। ग्याहरवीं में पढ़नेवाली ये लड़की गेम्स के फाइनल में अपने विरोधी को अपने स्कोर के पास भी नहीं फटकने देती। हमारे सिस्टम में ये चमत्कार नहीं तो और क्या है !
ऐसी कितनी ही कहानियाँ आपको निशानेबाजों, भारत्तोलकों और एथलीट की मिल जाएँगी जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने देश का सर गर्व से ऊँचा किया है। कॉमनवेल्थ खेलों की सफलता का सारा दारोमदार इन खिलाड़ियों पर है। चलते चलते कुछ लमहे जिन्होंने इन खेलों को मेरे लिए कुछ और खास बना दिया। खेल हॉकी, मैच भारत बनाम पाकिस्तान ... भारत के लिए करो या मरो की स्थिति। शुरुआती कुछ मिनट और पाकिस्तान गोल पर ताबड़तोड़ हमले..क्या सुरक्षा पंक्ति, क्या आक्रमण पंक्ति, जगह बदल बदल कर , प्रतिद्वन्दियों को छकाते और मौका पड़ने पर लंबे पॉस देने में भी कोताही नहीं बरतते इन खिलाड़ियों के आक्रमण की लहरें देखते ही बनती थीं। कुछ मिनटों में स्कोर 1-0 से बढ़कर 4-0 हो जाता है और अंततः 7-4 से भारत विजयी होता है। शायद कॉमनवेल्थ हॉकी में अब तक पदकविहीन रही भारतीय टीम के लिए ये एक नई शुरुआत हो.....
खेल हॉकी, मैच भारत बनाम इंग्लैंड... इंग्लैंड 3-0 से आगे। मैं निराश हो कर टीवी बंद करने की गलती कर बैठता हूँ। पुत्र के आग्रह पर पंद्रह मिनट बाद टीवी खोलता हूँ ये क्या स्कोर 3-3 और फिर पेनाल्टी स्ट्रोक का वो ड्रामा। मन में ज़फर इकबाल का भूत फिर उभरता है पर इस बार की पटकथा कुछ और है.....
खेल बैडमिंटन, मैच भारत बनाम मलेशिया मलेशिया 2-0 से आगे। साइना रबर को बचाने के लिए मैदान में उतरती हैं। मलेशिया की अनुभवी खिलाड़ी बड़े कम अंतर से पहला सेट अपने नाम करती हैं। साइना जानती हें कि उनके जीतने से भी अंतिम निर्णय में ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला। पर अगले दो सेटों में जोर लगाती हैं। हर अंक के लिए काँटे की टक्कर, लंबी थका देने वाली रैलियाँ । पर साइना अपना आत्मबल नहीं खोती। यही कहानी वो एकल फाइनल मुकाबले में दोहराती हैं। कितने दिनों बाद देखा है इतने मजबूत इरादों वाला खिलाड़ी......
खेल : टेबल टेनिस, पदक वितरण समारोह पुरुष युगल राष्ट्रधुन के साथ तिरंगे का उठना टेबल टेनिस खिलाड़ी शरद कमल को भावातिरेक कर दे रहा है। भारतीय ध्वज ऊपर उठ रहा है और वो पोडियम पर खड़े हो कर फूट फूट कर रो रहे हैं। खुशी के आँसुओं का सैलाब कितना अनोखा होता है ना....
खेल : एथलेटिक्स, 4 x400 मीटर महिला रिले
पर पूरे खेलों का सबसे आनंददायक क्षण दिया मुझे 4 x400 मीटर की महिला रिले टीम ने। मनजीत कौर, सिनी, अश्विनी और मनदीप की इस चौकड़ी ने जिस तरह से नाइजीरियाई धावकों को पीछे छोड़ा वो अपने आप में एक कमाल था। मनजीत और सिनी ने दूसरे चक्र तक भारत को दूसरे स्थान के करीब रखा था पर अश्विनी ने तीसरे चक्र में पीछे खिसक जाने के बाद जिस तेजी से तीसरे से दूसरे और फिर पहले स्थान पर टीम को ला कर खड़ा कर दिया वो कल्पना से परे था। और मनदीप ने ये बढ़त अंत तक बरकरार रखी...
तो आइए एक बार फिर देखते हें कि ये सब हुआ कैसे..
एक बार फिर से कॉमनवेल्थ के इन महान सिपाहियों को मेरा कोटिशः नमन। आशा है इनकी मेहनत को से हमारा खेल तंत्र और बेहतर ढंग से काम करेगा ताकि सौ करोड़ से ज्यादा आबादी वाले इस देश को ऐसे अनेक गौरवशाली क्षणों देखने और महसूस करने का मौका मिले।
नाको झील: किन्नौर का एक खूबसूरत पड़ाव
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नाको, जो कभी एक छोटा सा गाँव था, आज एक कस्बे का रूप ले चुका है। पर्यटन के
लिहाज़ से देखा जाए तो किन्नौर जिले का आखिरी छोर होने की वजह से, जो भी
रिकांगपिओ स...
इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।