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गुरुवार, जनवरी 24, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान # 6 : तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा Chaav Laaga

संगीतमाला की आज की कड़ी में है अनु मलिक द्वारा संगीत निर्देशित सुरीला युगल गीत चाव लागा जो इस साल इतना बजा और सराहा गया है कि आप इससे भली भांति परिचित होंगे। इसके पहले जब शरद कटारिया, अनु मलिक, वरुण ग्रोवर, पापोन की चौकड़ी दम लगा के हइसा में साथ आई थी तो मोह मोह के धागे सा यादगार गीत बना था।

मोह मोह के धागे एकल गीत था जिसे पापोन और मोनाली ठाकुर ने अलग अलग गाया था जबकि इस बार अनु मलिक ने सुई धागा के इस गीत को पापोन और रोंकिनी के युगल स्वर में गवाया। रोंकिनी की सधी हुई गायिकी तो आपने 2017 में  रफ़ू और पिछले साल तू ही अहम  में सुनी ही होगी। पापोन तो ख़ैर इस संगीतमाला में दो बार पहली बार बर्फी के गीत क्यूँ ना हम तुम और दूसरी बार मोह मोह के धागे के लिए सरताज गीत का गौरव प्राप्त कर ही चुके हैं। 


सुई धागा की कथा एक निम्म मध्यम वर्गीय परिवार की है जिसका चिराग यानि नायक कोई नौकरी करने के बजाए हुनर के बलबूते पर अपने लिए एक अलग मुकाम बनाना चाहता है। उसकी ज़िंदगी तब खुशनुमा रंग ले लेती है जब उसकी नई नवेली पत्नी पूरे जोशो खरोश से उसके सपने को अपना लेती है।

पति पत्नी के पनप रहे इस नए रिश्ते में कभी खराशें आती हैं तो कभी मुलायमियत के पल और इसी को ध्यान में रखते हुए वरुण ग्रोवर ने गीत का मुखड़ा लिखा कभी शीत लागा कभी ताप लागा तेरे साथ का है जो श्राप लागा.. तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा।

गीत  में शीत और ताप.. चाव और घाव.. नींद और जाग की उनकी जुगलबंदी तो कमाल की थी। एक दूसरे को समझते बूझते ये साथी इन प्यार भरी राहों में हल्के हल्के कदम भरना चाहते हैं और इसीलिए कह उठते हैं रास्ते आस्ते चल ज़रा।

वैसे मुखड़े में "साथ का श्राप" थोड़ी ज़्यादा तीखी अभिव्यक्ति हो गयी ऐसा मुझे महसूस हुआ। इसी तरह शहर बिगाड़ने वाली पंक्तियाँ भी उतनी प्रभावी नहीं लगीं। इसीलिए मुझे गीत के दो अंतरों में दूसरा वाला अंतरा ज्यादा बेहतर लगा। वैसे क्या आपको पता है कि वरुण ने इस गीत के लिए एक तीसरा अंतरा भी रचा था। पहले अंतरे की जगह अगर वो इस्तेमाल हो जाता तो ये गीत और निखर उठता। देखिए कितना प्यारा लिखा था वरुण ने

इकटक तुझपे, मन ये टिका है
बाँध ले चाहे, खुल जाने दे
आज मिलावट, थोड़ी कर के 
ख़ुद में मुझको घुल जाने दे
तुझपे ही खेला दाँव रे, दाँव रे
तेरा चाव लागा, जैसे कोई घाव लागा

रोकिनी  व  पापोन 
गिटार की टुनटुनाहट के बीच रोंकिनी के मधुर आलाप से गीत का आगाज़ होता है और फिर गीत पापोन की मुलायम और रोंकिनी के शास्त्रीय रंग में रँगी आवाज़ों में घुलता मिलता आगे बढ़ जाता है। जब मैंने पहली बार ये गीत सुना था तो रोंकिनी जब रास्ते... आस्ते चले ज़रा गाती हैं तो किशोर कुमार का गाया एक गीत जेहन में कौंध उठा था जिसे मैं याद नहीं कर पा रहा था। बाद में मैंने जब रोंकिनी से ये प्रश्न किया तो उन्होंने बताया कि वो हिस्सा उन्हें भी मैं शायर बदनाम की याद दिलाता है। 

अनु मलिक के संगीत संयोजन में गिटार और बाँसुरी इस गीत में प्रमुखता से बजती है। पहले इंटरल्यूड में गिटार पर अंकुर मुखर्जी की धुन सुनकर मन झूम उठता है वहीं दूसरे में बाँसुरी पर नवीन कुमार की बजाई धुन कानों में मिश्री घोलती है। अचरज ना होगा गर इस गीत की लोकप्रियता इसे फिल्मफेयर एवार्ड के गलियारों तक पहुँचा दे।  

कभी शीत लागा कभी ताप लागा 
तेरे साथ का है जो श्राप लागा 
मनवा बौराया.. 
तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा 

रह जाएँ चल यहीं घर हम तुम ना लौटें 
ढूँढें कोई ना आज रे 
तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा 
तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा 
रास्ते, आस्ते चले ज़रा , रास्ते..., आस्ते चले ज़रा 
तेरा चाव लागा ....

संग में तेरे लागे नया सा 
काम पुराना लोभ पुराने 
दिन में ही आ जा शहर बिगाड़ें 
जो भी सोचे लोग पुराने 
तू नीदें तू ही जाग रे जाग रे 
तेरा चाव लागा ...

देख लिहाज़ की चारदीवारी 
फाँद ली तेरे एक इशारे 
प्रीत की चादर, छोटी मैली 
हमने उस में पैर पसारे 

काफी है तेरा साथ रे साथ रे..   




वार्षिक संगीतमाला 2018  
1. मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
2जब तक जहां में सुबह शाम है तब तक मेरे नाम तू
3.  ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
4.  आज से तेरी, सारी गलियाँ मेरी हो गयी
5.  मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा 
6.  तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा
7.  नीलाद्रि कुमार की अद्भुत संगीत रचना हाफिज़ हाफिज़ 
8.  एक दिल है, एक जान है 
9 . मुड़ के ना देखो दिलबरो
10. पानियों सा... जब कुमार ने रचा हिंदी का नया व्याकरण !
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 
24. वो हवा हो गए देखते देखते
25.  इतनी सुहानी बना हो ना पुरानी तेरी दास्तां

गुरुवार, जनवरी 17, 2019

वार्षिक संगीतमाला 2018 पायदान #11 : तू ही अहम, तू ही वहम Tu Hi Aham

वार्षिक संगीतमाला की 21 वीं सीढ़ी पर एक कव्वाली थी तो 11वीं पायदान पर है एक भजन फिल्म सुई धागा का जिसे संगीतबद्ध किया है अनु मलिक ने, बोल हैं वरुण ग्रोवर के और आवाज़ रोंकिनी गुप्ता की।

किसी देखी हुई फिल्म का एलबम सुनते वक़्त अचानक से कोई गीत अच्छा लगता है और फिर हम सोचते हैं कि अरे ये फिल्म में कहाँ था? कई बार कुछ गीत फिल्मों में संपादन के दौरान ही हट जाते हैं या उनकी कुछ हिस्सा ही फिल्म में शूट होता है। सुई धागा के इस सुरीले भजन को तो मैं फिल्म में देख नहीं पाया पर हो सकता है मेरे ध्यान से रह गया हो या सिर्फ इसकी कुछ पंक्तियाँ इस्तेमाल हुई हों। इस गीत का प्रमोशन भी फिल्म के बाकी गीतों की तरह नहीं किया गया। इसलिए मुझे यकीन है कि आपमें से ज्यादातर लोगों के लिए ये मीठा सा भजन अनसुना होगा। 


इस गीत की चर्चा शुरु करते हैं गीतकार वरुण ग्रोवर से। तीन साल पहले अनु मलिक के साथ मिलकर उन्होंने मोह मोह के धागे लिखकर श्रोताओं को अपने मोह जाल में फाँस लिया था। उसी साल मसान में दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल से प्रेरित उनका गीत तू किसी रेल सी गुजरती है मुझे बेहद पसंद आया था। वरुण ग्रोवर का नाम मैं जब भी किसी फिल्म की क्रेडिट में देखता हूँ तो मन पहले से ही खुश हो जाता है कि चलो अब कुछ सार्थक गहरे बोलों से मुलाकात होने वाली है।

तू ही अहम के मुखड़े को ही को ही देख लीजिए। इस भजन के पीछे की सोच किसी ऐसे  इंसान की है जिसके मन में भगवान के होने के प्रति पहले कुछ शंका (वहम) थी पर उसका आभास होने से वो एक गौरव, एक शक्ति (अहम) में बदल गयी है। अब उस शक्ति से जुड़ाव हो गया है तो ये भरोसा हो चला है कि आगे का मार्ग भी वही दिखलाएगा। मुझे शब्दों के लिहाज से इस गीत का दूसरे अंतरा सबसे प्रिय है जिसमें वरुण माया मोह में पड़े इंसान की मनोवृतियों को वे खूबसूरत बिंबों से सामने रखते नज़र आते हैं।

अनु मालिक व  वरुण ग्रोवर 
कुछ साल के अज्ञातवास के बाद जबसे अनु मलिक ने दम लगा कर हइसा के संगीत से वापसी की है तबसे उनके गीतों में मेलोडी लौट आई है। पिछले साल की फिल्मों में सुई धागा के साथ साथ जे पी दत्ता की फिल्म पलटन में भी उनका काम सराहनीय था। अगर तू ही अहम की बात करूँ तो  प्रील्यूड व पहले इंटरल्यूड में  गिटार की तरंगों के बीच उभरता रोंकिनी का आलाप, बोलों के पीछे बार बार उभरती बाँसुरी मन को सुकून से भर देती है। दूसरे इंटरल्यूड में बाँसुरी की मोहक तान का तो कहना ही क्या! 

इन सब के आलावा अनु मलिक की तारीफ़ इसलिए भी करनी होगी कि उन्होंने इस शास्त्रीयता के रंग में डूबे इस गीत के लिए एक ऐसी गायिका को चुना जो इस तरह के गीत के साथ पूरी तरह न्याय कर सकती थीं। जी हाँ मैं बात कर रहा हूँ रोंकिनी गुप्ता की जिनके तुम्हारी सुलू के गीत रफ़ू ने पिछले साल इस गीतमाला का सरताज बनने का गौरव प्राप्त किया था।

रोंकिनी गुप्ता 
जो लोग बतौर गायिका रोंकिनी के सांगीतिक सफ़र से परिचित नहीं हैं वो उनके बारे में यहाँ पढ़ सकते हैं। तुम्हारी सुलु का गीत गाते वक़्त सहायक निर्देशक मनन ने  (जो सुई धागा में भी सहायक निर्देशन का काम कर रहे थे) रोकिनी का नाम फिल्म के निर्देशक शरत कटारिया को सुझाया। अनु मलिक चाहते थे कि उनके संगीतबद्ध गीतों को कोई संगीत सीखी हुई तैयार गायिका मिले जिसकी आवाज़ का स्वाद कुछ अलग सा हो। रोंकिनी इन मापदंडों में बिल्कुल खरी उतरीं।  शास्त्रीय गायिकी पर उनकी पकड़ तो सर्वविदित है इसलिए उनके गीतों में संगीतकार कोई ना कोई आलाप डाल ही देते हैं। नतीजा ये  कि आप इस आलाप के साथ ही गीत से बँधने लगते हैं। इस गीत में जब वो परबत तोड़ धरम का ... या मुक्ति जो ये चाहे... गाती हैं तो उनकी आवाज़ का उतार चढ़ाव देखते ही बनता है। इस साल गायिकाओं के गाए बेहतरीन एकल गीतों में इस गीत का नाम भी मन में स्वाभाविक रूप से उठता है।

तो आइए सुनते हैं ये भजन उनकी आवाज़ में। 

तू ही अहम, तू ही वहम
तू ही अहम, तू ही वहम
तुझसे जुड़ा  वास्ता
हम हैं पाखी भटके हुए, तू साँझ का रास्ता
घाट तू ही पानी तू ही प्यास है
तू ही चुप्पी तू अरदास है, तू ही अहम, तू ही वहम

हमको तू ना माने, हम मानेंगे तुझको
घोर अंधेरे में भी पहचानेंगे तुझको
परबत तोड़ धरम का हम पायेंगे तुझको
तू रंग भी बेरंग भी
तू रंग भी बेरंग भी
शंका तू ही आस्था
हम हैं पाखी भटके हुए, तू साँझ का रास्ता
घाट तू ही.. तू अरदास है, तू ही अहम, तू ही वहम

तन ये भोग का आदी, मन ये कीट पतंगा
झूठ के दीवे नाचे, झूठा बने ये मलंगा
मुक्ति जो ये चाहे, तो मारे मोह अड़ंगा
तू ही सदा से दूर था
तू ही सदा से दूर था
तू ही सदा पास था
हम हैं पाखी भटके हुए, तू साँझ का रास्ता
घाट तू ही.. तू अरदास है
तू ही अहम.... तू ही वहम


वार्षिक संगीतमाला 2018  
1. मेरे होना आहिस्ता आहिस्ता 
2जब तक जहां में सुबह शाम है तब तक मेरे नाम तू
3.  ऐ वतन, वतन मेरे, आबाद रहे तू
4.  आज से तेरी, सारी गलियाँ मेरी हो गयी
5.  मनवा रुआँसा, बेकल हवा सा 
6.  तेरा चाव लागा जैसे कोई घाव लागा
7.  नीलाद्रि कुमार की अद्भुत संगीत रचना हाफिज़ हाफिज़ 
8.  एक दिल है, एक जान है 
9 . मुड़ के ना देखो दिलबरो
10. पानियों सा... जब कुमार ने रचा हिंदी का नया व्याकरण !
11 . तू ही अहम, तू ही वहम
12. पहली बार है जी, पहली बार है जी
13. सरफिरी सी बात है तेरी
14. तेरे नाम की कोई धड़क है ना
15. तेरा यार हूँ मैं
16. मैं अपने ही मन का हौसला हूँ..है सोया जहां, पर मैं जगा हूँ 
17. बहुत दुखा रे, बहुत दुखा मन हाथ तोरा जब छूटा
18. खोल दे ना मुझे आजाद कर
19. ओ मेरी लैला लैला ख़्वाब तू है पहला
20. मैनू इश्क़ तेरा लै डूबा  
21. जिया में मोरे पिया समाए 
24. वो हवा हो गए देखते देखते
25.  इतनी सुहानी बना हो ना पुरानी तेरी दास्तां

मंगलवार, मार्च 01, 2016

वार्षिक संगीतमाला 2015 सरताज गीत : मोह मोह के धागे Moh Moh Ke Dhage

दो महीनों की इस संगीत यात्रा के बाद बारी है आज वार्षिक संगीतमाला 2015 के सरताजी बिगुल को बजाने की। संगीतमाला की चोटी पर गाना वो जिसके साथ संगीतकार अनु मलिक ने की है हिंदी फिल्म जगत में शानदार वापसी। शिखर पर एक बार फिर हैं  वरुण ग्रोवर के प्यारे बोल जो पापोन व मोनाली ठाकुर की आवाज़ के माध्यम से दिल में प्रीत का पराग छोड़ जाते हैं। यानि ये कहना बिल्कुल अतिश्योक्ति नहीं होगी कि वो होगा ज़रा पागल जिसने इसे ना चुना :)। तो चलिए आज इस आपको बताते हैं इस गीत की कहानी इसे बनाने वाले किरदारों की जुबानी।



अनु मलिक का नाम हिंदी फिल्म संगीत में लीक से हटकर बनी फिल्मों के साथ कम ही जुड़ा है। पर जब जब ऐसा हुआ है उन्होंने अपने हुनर की झलक दिखलाई है। एक शाम मेरे नाम की वार्षिक संगीतमालाओं के एक दशक से लंबे इतिहास में उमराव जान के गीत अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो के लिए वो ये तमगा पहले भी हासिल कर चुके हैं। पर इस बात का उन्हें भी इल्म रहा है कि अपने संगीत कैरियर का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने  बाजार की जरूरतों को पूरा करने में बिता दिया। इतनी शोहरत हासिल करने के बाद भी उनके अंदर कुछ ऐसा करने की ललक बरक़रार है जिसे सुन कर लोग लंबे समय याद रखें। उनकी इसी भूख का परिणाम है फिल्म दम लगा के हईशा  का ये अद्भुत गीत ! 

अनु मलिक ने गीत के मुखड़ा राग यमन में बुना जो आगे जाकर राग पुरिया धनश्री में मिश्रित हो जाता है। इंटरल्यूड्स में एक जगह शहनाई की मधुर धुन है तो दूसरे में बाँसुरी की। पर अनु मलिक की इस रचना की सबसे खूबसूरत बात वो लगती है जब वो मुखड़े के बाद तू होगा ज़रा पागल से गीत को उठाते हैं। पर  ये भी सच है की उनकी इतनी मधुर धुन को अगर वरुण ग्रोवर के लाजवाब शब्दों का साथ नहीं मिला होता तो ये गीत कहाँ अमरत्व को प्राप्त होता ?


वरुण ग्रोवर और अनु मलिक
वैसे इसी अमरत्व की चाह, कुछ अलग करने के जुनून  ने IT BHU के इस इंजीनियर को मुंबई की माया नगरी में ढकेल दिया। यूपी के मध्यम वर्गीय परिवार में पले बढ़े वरुण ग्रोवर का साहित्य से बस इतना नाता रहा कि उन्होंने बचपन में  बालहंस नामक बाल पत्रिका के लिए एक कहानी भेजी थी। हाँ ये जरूर था कि घर में पत्र पत्रिकाएँ व किताबें के आते रहने से उन्हें पढ़ने का शौक़ शुरु से रहा। वरुण कहते हैं कि छोटे शहरों में रहकर कई बार आप बड़ा नहीं सोच पाते। लखनऊ ने उन्हें अपने सहपाठियों की तरह इंजीनियरिंग की राह पकड़ा दी। बनारस गए तो पढ़ाई के साथ नाटकों से जुड़ गए और बतौर लेखक उनके मन में कुछ करने का सपना पलने लगा था। पुणे में नौकरी करते समय उन्होंने सोचा था कि दो तीन साल काम कर कुछ पैसे जमा कर लेंगे और फिर मुंबई की राह पकड़ेंगे। पर ग्यारह महीनों में  सॉफ्टवेयर जगत में काम करते हुए उनका अपनी नौकरी से  मोह भंग हो गया।

लेखक के साथ वरुण को चस्का था कॉमेडी करने का तो मुंबई की फिल्मी दुनिया में उन्हें पहला काम ग्रेट इ्डियन कॉमेडी शो लिखने का मिला। बाद में वो ख़ुद ही स्टैंड अप कॉमेडियन बन गए पर साथ साथ वो फिल्मों में लिखने के लिए अवसर की तलाश कर रहे थे। जिन लोगों के साथ वो काम करना चाहते थे वहाँ पटकथा लिखने का तो नहीं पर गीत रचने का मौका था। सो वो गीतकार बन गए। नो स्मोकिंग के लिए गाना लिखा पर वो उसमें इस्तेमाल नहीं हो सका। फिर अनुराग कश्यप ने उन्हें दि गर्ल इन येलो बूट्स में मौका दिया पर वरुण पहली बार लोगों की नज़र में आए गैंग्स आफ वासीपुर के गीतों की वजह से। फिर दो साल पहले आँखो देखी आई जिसने उनके काम को सराहा गया और आज देखिए इस वार्षिक संगीतमाला की दोनों शीर्ष पायदानों पर उनके गीत राज कर रहे हैं।

अनु मलिक ने अपने इस गीत के लिए जब पापोन को बुलाया तो वो तुरंत तैयार हो गए। अनु कहते हैं कि पहली बार ही गीत सुनकर पापोन का कहना था कि ये गाना जब आएगा ना तो जान ले लेगा

मोनाली ठाकुर और पापोन
जब गीत का फीमेल वर्सन बनने लगा तो अनु मलिक को मोनाली ठाकुर  की आवाज, की याद आई। ये वही मोनाली हैं जिन्होंने सवार लूँ से कुछ साल पहले लोगों का दिल जीता था।  मोनाली ने इंडियन आइडल में जब हिस्सा लिया था तो अनु जी ने उनसे वादा किया था कि वो अपनी फिल्म में उन्हें गाने का एक मौका जरूर देंगे। अनु मलिक को ये मौका देने में सात साल जरूर लग गए पर जिस तरह के गीत के लिए उन्होंने मोनाली को चुना उसके लिए वो आज भी उनकी शुक्रगुजार हैं। पापोन व मोनाली दोनों ने ही अपने अलग अलग अंदाज़ में इस गीत को बेहद खूबसूरती से निभाया है।

वरुण ने क्या प्यारा गीत लिखा है। सहज शब्दों में इक इक पंक्ति ऐसी जो लगे कि अपने लिए ही कही गई हो। अब बताइए मोह के इन धागों पर किसका वश चला है? एक बार इनमें उलझते गए तो फिर निकलना आसान है क्या? फिर तो हालत ये कि आपका रोम रोम इक तारा बन जाता है जिसकी चमक आप उस प्यारे से बादल में न्योछावर कर देना चाहते हों । अपनी तमाम कमियों और अच्छाइयों के बीच जब कोई आपको पसंद करने लगता है, आपकी अनकही बातों को समझने लगता है तो फिर  व्यक्तित्व की भिन्नताएँ चाहे दिन या रात सी क्यूँ ना हों मिलकर एक सुरमयी शाम की रचना कर ही देती हैं। इसीलिए गीत में वरुण कहते हैं.

हम्म... ये मोह मोह के धागे,तेरी उँगलियों से जा उलझे 
कोई टोह टोह ना लागे, किस तरह गिरह ये सुलझे 
है रोम रोम इक तारा.. 
है रोम रोम इक तारा ,जो बादलों में से गुज़रे.. 

ये मोह मोह के धागे....


तू होगा ज़रा पागल, तूने मुझको है चुना 
तू होगा ज़रा पागल, तूने मुझको है चुना 
कैसे तूने अनकहा, तूने अनकहा सब सुना 
तू होगा ज़रा पागल, तूने मुझको है चुना 
तू दिन सा है, मैं रात आना दोनों  
मिल  जाएँ शामों की तरह 

बिना आगे पीछे सोचे अपने प्रिय के साथ बस यूं ही समय बिताना बिना किसी निश्चित मंजिल के भले ही एक यूटोपियन अहसास हो पर उस बारे में सोचकर ही मन कितना आनंदित हो जाता है...नहीं ?


ये मोह मोह के धागे....
कि ऐसा बेपरवाह मन पहले तो न था 
कि ऐसा बेपरवाह मन पहले तो न था 
चिट्ठियों को जैसे मिल गया ,जैसे इक नया सा पता 
कि ऐसा बेपरवाह मन पहले तो न था 
खाली राहें, हम आँख मूंदे जाएँ 
पहुंचे कहीं तो बेवजह 

ये मोह मोह के धागे। ... 

 
अनु जी की धुन पर वरुण ने ये गीत पहले पापोन वाले वर्सन के लिए लिखा। मोनाली ठाकुर वाले वर्सन में गीत का बस दूसरा अंतरा बदल जाता है।

कि तेरी झूठी बातें मैं सारी मान लूँ
आँखों से तेरे सच सभी सब कुछ अभी जान लूँ
तेज है धारा, बहते से हम आवारा
आ थम के साँसे ले यहाँ



तो बताइए कैसा लगा आपको ये सरताज नग्मा ? पिछले साल के गीत संगीत की विभिन्न विधाओं में अव्वल रहे कलाकारों की चर्चा के साथ लौटूँगा इस संगीतमाला के पुनरावलोकन में।


वार्षिक संगीतमाला 2015

1  ये मोह मोह के धागे  Moh Moh Ke Dhage

शनिवार, मार्च 10, 2007

वार्षिक संगीतमाला 2006 सरताज गीत: बिटिया होने का सच !

दुख फसाना नहीं की तुझसे कहूँ
दिल भी माना नहीं की तुझसे कहूँ

आज तक अपनी बेकली का सबब
खुद भी जाना नहीं की तुझसे कहूँ

अहमद फराज

ये दुख भी अजीब सी चीज है । एक बार अंदर पलने लगे तो जी घुटता सा रहता है। इच्छा भी नहीं होती कि किसी को कहें। पर दिल की चारदीवारी के अंदर कोई भी बाँध कितना भी ऊँचा क्यूँ ना बनाएँ,...एक दिन तो वो बाँध भरेगा ही और उससे बह कर निकलने वाली पीड़ा दूसरों को भी दर्द में डुबायेगी ही । मेरी इस संगीत श्रृंखला के शिखर पर विराजमान इस गीत में कुछ ऐसी ही पीड़ा अन्तरनिहित है जो गीत के प्रवाह के साथ मन में रिसती हुई नक्श सी हो जाती है ।

आखिर उमराव जान 'अदा' की अमीरन ने उस बाँध के टूट जाने के बाद ही तो ऐसा कहा होगा ।
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो....

तनिक अमीरन को क्षण भर के किए पीछे कर अपने चारों ओर के हालातों पर नजर दौड़ायें तो पाते हैं कि अभी भी हमारे समाज का एक वर्ग लड़की के रूप में जन्म लेने को एक अभिशप्त जिंदगी की शुरुआत मानता है ।

अगर ऐसा नहीं होता तो पंजाब जैसे समृद्ध और अपेक्षाकृत विकसित राज्य में मादा भ्रूण हत्याएँ इतनी ज्यादा क्यूँ कर होतीं ?


दहेज के लोभी अपनी नहीं तो किसी और की बिटिया को क्यूँ जलाते ?

शिक्षा के मंदिर / आश्रमों में भी पढ़ाई की आड़ में यौन शोषण की जुर्रत कोई कैसे करता ?

बलात्कर जैसे घिनौने अपराध के दोषी भी सीना तान के बिना किसी शर्मिन्दगी के न्यायालय में जाते और बेदाग छूट कर कैसे आते ?

रोज-रोज ऐसा देखते हुए भी हमारा समाज चेतनाशून्य सा क्यूँ बना रहता है ?.
सच तो ये है कि मस्तिष्क के किसी कोने में हमारी सोच नहीं बदली है ।

रिचा शर्मा की आवाज में जब भी ये गीत सुनता हूँ ,ये सारे प्रश्न दिलो दिमाग को सोचने पर मजबूर करते हैं ....

ये गीत इसलिए भी मेरी पहली पायदान का गीत है क्यूँकि इस गीत को सुनने के बाद ये जज्बा मजबूत होता है कि जो हो चुका उसे तो नहीं बदल सकते पर आने वाले कल में कुछ तो करें जिससे किसी कि बेटी इस गीत की व्यथा से न गुजरे ।


 


जावेद साहब ने इस गीत में एक बिटिया के दर्द को अपनी लेखनी के जादू से इस कदर उभारा है कि इसे सुनने के बाद आँखें नम हुये बिना नहीं रह पातीं । ऋचा जी की गहरी आवाज , अवधी जुबान पर उनकी मजबूत पकड़ और पार्श्व में अनु मलिक का शांत बहता संगीत आपको अवध की उन गलियों में खींचता ले जाता है ।गीत,संगीत और गायिकी के इस बेहतरीन संगम को शायद ही कोई संगीतप्रेमी सुनने से वंचित रहना चाहेगा।



अब जो किये हो दाता, ऐसा ना कीजो
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो ऽऽऽऽ

जो अब किये हो दाता, ऐसा ना कीजो
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो

हमरे सजनवा हमरा दिल ऐसा तोड़िन
उ घर बसाइन हमका रस्ता मा छोड़िन
जैसे कि लल्ला कोई खिलौना जो पावे
दुइ चार दिन तो खेले फिर भूल जावे
रो भी ना पावे ऐसी गुड़िया ना कीजो
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो
जो अब किये हो दाता, ऐसा ना कीजो...

ऐसी बिदाई बोलो देखी कहीं है
मैया ना बाबुल भैया कौनो नहीं है
होऽऽ आँसू के गहने हैं और दुख की है डोली
बन्द किवड़िया मोरे घर की ये बोली
इस ओर सपनों में भी आया ना कीजो
अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो

जो अब किये हो दाता, ऐसा ना कीजो...

बुधवार, फ़रवरी 07, 2007

7 वीं पायदान : अजनबी शहर है, अजनबी शाम है...

सातवीं पायदान पर का गीत मुझे क्यूँ प्रिय है मुझे पता नहीं ! पर इतना जानता हूँ कि जैसे ही इसका मुखड़ा कानों में गूंजता है मन डूब सा जाता है एक अलग अहसास से... जिसे शब्दों में बाँधना मेरे लिए इस वक्त कठिन हो रहा है ।

सोनू निगम ने बड़ी खूबसूरती से गाया है इस गीत को खासकर शुरु की पंक्तियाँ में जब वो ऊपर की ओर अपनी सुरीली तान को खींचते हैं । और इसे अपनी मधुर धुन से संवारा है पहली बार इस गीतमाला में दाखिला ले रहे अनु मलिक ने । गीत के बीच में उन्होंने एक यूरोपीय नृत्य धुन का इस्तेमाल भी किया है ।

और इस तरह की पंक्तियाँ तो इस गीतमाला पर छाये गीतकार की तो खासियत ही हैं

बात है ये इक रात की, आप बादलों पे लेटे थे..
...सर्दी लग रही थी आपको,पतली चाँदनी लपेटे थे
और शाल में ख्वाब के सुलाया था

तो इस गुल को गुलशन करते गुलजार का फिल्म जानेमन के लिए लिखा गीत कुछ यूँ है ।
अजनबी शहर है, अजनबी शाम है
जिंदगीऽऽ अजनबीऽऽऽऽ, क्या तेराऽऽऽ नाम है ?
अजीब है ये जिंदगी ये जिंदगी अजीब है
ये मिलती है बिछड़ती है, बिछड़ के फिर से मिलती है
अजनबी शहर है, अजनबी शाम है

आप के बगैर भी हमें, मीठी लगें उदासियाँ
क्या, ये आपका, आपका कमाल है
शायद आपको खबर नहीं ,
हिल रही है पाँव की जमीं
क्या, ये आपका, आपका ख्याल है
अजनबीऽऽऽऽ शहर मेंऽऽ जिंदगी मिल गई
अजीब है ये जिंदगी, ये जिंदगी अजीब है
मैं समझा था करीब है, ये औरों का नसीब है

अजनबी शहर है, अजनबी शाम है
बात है ये इक रात की, आप बादलों पे लेटे थे
हुं वो याद है आपने बुलाया था
सर्दी लग रही थी आपको,पतली चाँदनी लपेटे थे
और शाल में ख्वाब के सुलाया था
अजनबी ही सही, सांस में सिल गई
अजीब है ये जिंदगी ये जिंदगी अजीब है
मेरी नहीं ये जिंदगी रकीब का नसीब है ।


 

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