जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें...क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों, गजलों और कविताओं के माध्यम से!
अगर साहित्य और संगीत की धारा में बहने को तैयार हैं आप तो कीजिए अपनी एक शाम मेरे नाम..
जगजीत सिंह यूं तो आधुनिक ग़ज़ल के बेताज बादशाह थे पर उन्होंने समय समय पर हिंदी फिल्मों के लिए भी बेहतरीन गीत गाए। अर्थ, साथ साथ, प्रेम गीत, सरफरोश जैसी फिल्मों में उनके गाए गीत तो आज तक बड़े चाव से सुने और गुनगुनाए जाते हैं। पर इन सब से हट कर उन्होंने कुछ ऐसी अनजानी फिल्मों के गीत भी निभाए जो बेहद कम बजट की थीं और ज्यादा नहीं चलीं या फिर ऐसी जो बनने के बाद रिलीज भी नहीं हो पाईं।
एक ऐसी ही फिल्म थी नर्गिस जिसमें राजकपूर की आखिरी फिल्म हिना से मशहूर होने वाली जेबा बख्तियार के साथ थे नसीर और हेमा जी। पर इतने नामचीन कलाकारों के होते हुए भी ये फिल्म रुपहले परदे का मुंह नहीं देख पाई। फिल्म का संगीत दिया था पंचम के मुख्य सहायक बासु चक्रवर्ती ने और बोल थे मजरूह सुल्तानपुरी साहब के।
हालांकि बाद में फिल्म का म्यूजिक एलबम जरूर रिलीज़ हुआ जिसमें जगजीत और लता जी का एक युगल गीत भी था। बासु ने पंचम के लिए तो काम किया ही साथ में वे कम बजट की ऐसी फिल्मों में भी बतौर संगीतकार संगीत देते रहे। मनोहारी सिंह के साथ मिलकर उनका काम सबसे बड़ा रुपैया में काफी सराहा गया था। किशोर लता के युगल स्वरों में दरिया किनारे एक बंगलो की मस्ती को कौन भूल सकता है।
जब मैं रुड़की में था तो मेरे एक मित्र जो कि जगजीत के बड़े प्रशंसक थे ने मुझे अपनी कलेक्शन से ये नग्मा सुनाया। जगजीत की आवाज़ के साथ मुखड़े में मजरूह की कविता मुझे इतनी प्यारी लगी थी कि मैं उनके कमरे से ये पंक्तियां गुनगुनाता हुआ निकला था
शफ़क़ हो, फूल हो, शबनम हो, माहताब हो तुम
नहीं जवाब तुम्हारा, कि लाजवाब हो तुम
मैं कैसे कहूँ जानेमन, तेरा दिल सुने मेरी बात
ये आँखों की सियाही, ये होंठों का उजाला
ये ही हैं मेरे दिन–रात...
शफ़क़ (सूर्य के निकलने और डूबने के समय क्षितिज पर दिखाई देनेवाली लाली), माहताब (चंद्रमा), शबनम (ओस)
जाहिर है कॉलेज के दिन थे तो ऐसी आशिकाना शायरी दिल को ज्यादा ही लुभाती थी।
कुछ दिनों पहले जननी कामाक्षी की आवाज़ में ये मुखड़ा फिर सुना तो वे दिन फिर एक बार याद आ गए। मुंबई में बतौर Information System Auditor के रूप में कार्य कर रहींजननी कामाक्षी कर्नाटक संगीत में तो प्रवीण हैं ही, फिल्मी गीतों, भक्ति संगीत और ग़ज़लों को भी गाहे बगाहे अपनी मधुर आवाज़ से तराशती रहती हैं। तो सुनिए उनके स्वर में जगजीत जी का ये गीत
काश तुझको पता हो, तेरे रुख–ए–रौशन से
तारे खिले हैं, दीये जले हैं, दिल में मेरे कैसे कैसे
महकने लगी हैं वहीं से मेरी रातें
जहाँ से हुआ तेरा साथ, मैं कैसे कहूँ जानेमन
रुख–ए–रौशन (चमकता हुआ चेहरा), गुल (फूल)
पास तेरे आया था मैं तो काँटों पे चलके
लेकिन यहाँ तो कदमों के नीचे फर्श बिछ गये गुल के
के अब ज़िन्दगानी, है फसलें बहाराँ
जो हाथों में रहे तेरा हाथ, मैं कैसे कहूँ जानेमन
बासु ने इस गीत को रचा भी क्या खूब कि बिना किसी संगीत के भी मन इस नग्मे के मीठे मीठे ख्यालातों को सुनकर हल्का हो जाता है। जगजीत की आवाज़ में ये रूमानियत सुनने वालों को एक ऐसे मूड में ले जाती थी जहाँ से निकलने में घंटों लग जाते थे। जननी ने तो इस गीत का सिर्फ मुखड़ा गाया पर वो भी इतने सुर में और अपनी खनकती मधुर आवाज़ के साथ कि जगजीत सुनते तो वे भी बेहद खुश होते।
बरसात की फुहारें रुक रुक कर ही सही मेरे शहर को भिंगो रही हैं। पिछले कुछ दिनों से दिन चढ़ते ही गहरे काले बादल आसमान को घेर लेते हैं। गर्जन तर्जन भी खूब करते हैं। बरसते हैं तो लगता है कि कहर बरपा ही के छोड़ेंगे पर फिर अचानक ही उनका नामालूम कहाँ से कॉल आ जाता है और वे चुपके से खिसक लेते हैं। गनीमत ये है कि वो ठंडी हवाओं को छोड़ जाते हैं जिनके झोंको का सुखद स्पर्श मन को खुशनुमा कर देता है।
ऍसे ही खुशनुमा मौसम में टहलते हुए परसों 1970 की फिल्म अभिनेत्री का ये गीत कानों से टकराया और बारिश से तरंगित नायिका के चंचल मन की आपबीती का ये सुरीला किस्सा सुन मन आनंद से भर उठा। क्या गीत लिखा था मजरूह ने! भला बताइए तो क्या आप विश्वास करेंगे कि एक कम्युनिस्ट विचारधारा वाला शायर जो अपनी इंकलाबी रचनाओ की वज़ह से साल भर जेल की हवा खा चुका हो इतने रूमानी गीत भी लिख सकता है? पर ये भी तो सच है ना कि हर व्यक्ति की शख्सियत के कई पहलू होते हैं।
मजरूह के बोलों को संगीत से सजाया था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी ने। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल कभी भी मेरे पसंदीदा संगीतकार नहीं रहे। इसकी एक बड़ी वजह थी अस्सी और नब्बे के दशक में उनका संगीत जो औसत दर्जे का होने के बावजूद भी कम प्रतिस्पर्धा के चलते लोकप्रिय होता रहा था। फिल्म संगीत की गुणवत्ता में निरंतर ह्रास के उस दौर में उनके इलू इलू से लेकर चोली के पीछे तक सुन सुन के हमारी पीढ़ी बड़ी हुई थी। लक्ष्मी प्यारे के संगीत की मेरे मन में कुछ ऐसी छवि बन गयी थी कि मैंने उनके साठ व सत्तर के दशक में संगीतबद्ध गीतों पर कम ही ध्यान दिया। बाद में मुझे इन दशकों में उनके बनाए हुए कई नायाब गीत सुनने को मिले जो मेरे मन में उनकी छवि को कुछ हद तक बदल पाने में सफल रहे।
लक्ष्मीकांत बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे। जीवकोपार्जन के लिए उन्होंने संगीत सीखा। मेंडोलिन अच्छा बजा लेते थे। एक कार्यक्रम में उनकी स्थिति के बारे में लता जी को बताया गया। फिर लता जी के ही कहने पर उन्हें कुछ संगीतकारों के यहाँ काम मिलने लगा। इसी क्रम में उनकी मुलाकात प्यारेलाल से हुई जिन्हें वॉयलिन में महारत हासिल थी। कुछ दिनों तक दोनों ने साथ साथ कई जगह वादक का काम किया और फिर उनकी जोड़ी बन गयी जो उनकी पहली ही फिल्म पारसमणि में जो चमकी कि फिर चमकती ही चली गयी़। कहते हैं कि उस ज़माने में उनकी कड़की का ये हाल था कि उनके गीत कितने हिट हुए ये जानने के लिए वे गली के नुक्कड़ पर पान दुकानों पर बजते बिनाका गीत माला के गीतों पर कान लगा कर रखते थे।
लक्ष्मी प्यारे को अगर आरंभिक सफलता मिली तो उसमें उनकी मधुर धुनों के साथ लता जी की आवाज़ का भी जबरदस्त हाथ रहा। ऐसा शायद ही होता था कि लता उनकी फिल्मों में गाने के लिए कभी ना कर दें। फिल्म जगत को ये बात पता थी और ये उनका कैरियर ज़माने में सहायक रही।
ओ घटा साँवरी, थोड़ी-थोड़ी बावरी
हो गयी है बरसात क्या हर साँस है बहकी हुई अबकी बरस है ये बात क्या हर बात है बहकी हुई अबकी बरस है ये बात क्या ओ घटा साँवरी... पा के अकेली मुझे, मेरा आँचल मेरे साथ उलझे छू ले अचानक कोई, लट में ऐसे मेरा हाथ उलझे क्यूँ रे बादल तूने.. ए ..ए.. ए.. आह उई ! तूने छुआ मेरा हाथ क्या ओ घटा साँवरी... आवाज़ थी कल यही, फिर भी ऐसे लहकती ना देखी पग में थी पायल मगर, फिर भी ऐसे छनकती ना देखी चंचल हो गये घुँघरू रू.. मे..रे.., घुँघरू मेरे रातों-रात क्या ओ घटा साँवरी... मस्ती से बोझल पवन, जैसे छाया कोई मन पे डोले बरखा की हर बूँद पर, थरथरी सी मेरे तन पे डोले पागल मौसम जारे जा जाजा जा.. जातूलगा मेरे साथ क्या! ओ घटा साँवरी...
तो लौटें आज के इस चुहल भरे सुरीले गीत पर। लक्ष्मी प्यारे ने इस गीत की धुन राग कलावती पर आधारित की थी। बारिश के आते ही नायिका का तन मन कैसे एक मीठी अगन से सराबोर हो जाता है मजरूह ने इसी भाव को इस गीत में बेहद प्यारे तरीके से विस्तार दिया है। लक्ष्मी प्यारे ने लता जी से हर अंतरे की आखिरी पंक्ति में शब्दों के दोहराव से जो प्रभाव उत्पन्न किया है वो लता जी की आवाज़ में और मादक हो उठा है। तो चलिए हाथ भर के फासले पर मँडराते बादल और मस्त पवन के झोंको के बीच सुनें लता जी की लहकती आवाज़ और छनकती पायल को ...
जितना प्यारा ये गीत है उतना ही बेसिरपैर का इसका फिल्मांकन है। हेमा मालिनी पर फिल्माए इस गीत की शुरुआत तो बारिश से होती है पर गीत खत्म होते होते ऐसा लगता है कि योग की कक्षा से लौटे हों। बहरहाल एक रोचक तथ्य ये भी है कि इस फिल्म के प्रीमियर पर धरम पा जी ने पहली बार अपनी चंगी कुड़ी हेमा को देखा था।
1957 में एस डी बर्मन साहब की तीन फिल्में प्रदर्शित हुई थीं। प्यासा, पेइंग गेस्ट और नौ दौ ग्यारह। हिट तो ये तीनों फिल्में रहीं। पर इनमें गुरुदत्त की प्यासा हर लिहाज़ से अलहदा फिल्म थी। फिल्म का संगीत भी उतना ही चला। फिल्म के गीतकार थे साहिर लुधियानवी। अक्सर जब गीतकार संगीतकार मिलकर इस तरह की सफल फिल्में देते हैं तो उनकी जोड़ी और पुख्ता हो जाती है पर सचिन दा की उसी साल रिलीज़ फिल्मों में साहिर का नाम नदारद था और उनकी जगह ले ली थी मजरूह सुल्तानपुरी ने।
सचिन दा और साहिर की अनबन की पीछे उनके अहम का टकराव था। साहिर को एक बार ओ पी नैयर ने एक फिल्मी पार्टी में ये कहते सुना था कि मैंने ही सचिन दा को बनाया है। ज़ाहिर है साहिर के मन में ये बात रही होगी कि गीतकार के रूप में उनका योगदान संगीतकार से ज्यादा है। ऐसा कहा जाता है कि प्यासा के निर्माण के दौरान वे अपना पारिश्रमिक सचिन दा से एक रुपये ज्यादा रखने पर अड़े रहे। शायद उनके इस रवैये से सचिन दा खुश नहीं थे।
सचिन दा की मजरूह के साथ आत्मीयता थी। इसलिए जब पेइंग गेस्ट में गीतकार को चुनने का वक़्त आया तो उन्होंने मजरूह को बुला लिया। सचिन दा मजरूह को मुजरू कह कर बुलाते थे। चाय, काफी और पान के साथ दोनों की घंटों सिटिंग चलती। सचिन दा धुन रचते और बोलों से धुन का तालमेल बिठाते। कभी कभी तो एक ही गीत के लिए दस या बीस धुनें बनती। ये सिलसिला तब तक चलता जब तक सचिन दा खुद संतुष्ट नहीं हो जाते। अगर कहीं दिक्कत होती तो मुजरू को बोल बदलने को कहते।
पेइंग गेस्ट के लिए सचिन दा ने एक बेहद मधुर धुन बनाई थी जिस पर मजरूह ने मुखड़ा दिया था चाँद फिर निकला मगर तुम ना आए। विरह की भावना से ओतप्रोत इस गीत में जिस तरह मजरूह ने चाँद जैसे बिम्ब का प्रयोग किया था वो इस गीत को अनुपम बना देता है।
चाँद फिर निकला, मगर तुम न आए जला फिर मेरा दिल, करुँ क्या मैं हाय चाँद फिर निकला …
पर मुझे इस गीत की सबसे दिल को छूती पंक्ति वो लगती है जब मजरूह पहले अंतरे में कहते हैं
ये रात कहती है वो दिन गये तेरे ये जानता है दिल के तुम नहीं मेरे खड़ी मैं हूँ फिर भी निगाहें बिछाये मैं क्या करूँ हाय के तुम याद आए चाँद फिर निकला …
रात के साथ दिन के इस सहज मेल से अच्छे दिन चले जाने का जो भाव पैदा किया मजरूह ने उसका जवाब नहीं।
सुलगते सीने से धुँआ सा उठता है लो अब चले आओ के दम घुटता हैं जला गये तन को बहारों के साये मैं क्या करुँ हाय के तुम याद आए चाँद फिर निकला …
मजरूह अपने साक्षात्कारों में अक्सर कहा करते थे कि सचिन दा को ज्यादा साज़ और साज़िंद पसंद नहीं थे। वे अक्सर कोशिश करते कि कम से कम वाद्य यंत्रों से काम चलाया जाए। शंकर जयकिशन से उलट आर्केस्ट्रा के प्रयोग से वो दूर रहना पसंद करते थे। सचिन दा का मानना था कि गाने पर अगर ज्यादा जेवर चढ़ेगा तो गाना तो फिर दिखेगा ही नहीं। प्रील्यूड व इंटरल्यूड्स को छोड़ दें तो इस गीत में लता की आवाज़ के साथ घटम के आलावा कोई ध्वनि नहीं आती। पर मजरूह के बोल और सचिन दा की मेलोडी इतनी जबरदस्त थी कि वहाँ संगीत का आभाव ज़रा भी नहीं खटकता। यही वजह है कि ये गीत छः दशकों बाद भी हम सबके दिलों पर अपनी गिरफ्त बनाए हुए है।
फिल्म में देव आनंद की प्रतीक्षा करती नूतन के गीत को भावों को अपनी भाव भंगिमा से जोड़ा है कि लता की आवाज़ का दर्द पर्दे पर भी बखूबी उभर आता है। तो आइए सुनते हैं इस गीत को..
सन 1958 में इक फिल्म आई थी काला पानी। नवकेतन का बैनर था और फिल्म के संगीतकार थे, देव आनंद के दिलअजीज़ सचिन देव बर्मन। बतौर नायक देव आनंद ने इस फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार जीता था। फिल्म का संगीत भी काफी मशहूर हुआ था। ये वो दौर था जब सचिन दा और लता दी के बीच की अनबन ज़ारी थी। यही वज़ह थी कि फिल्म में नायिका के सभी गीत आशा जी ने गाए थे। देव आनंद और मधुबाला की मीठी नोंक झोंक से भरा गीत अच्छा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना को तो लोग आज भी याद करते हैं। वहीं नज़र लागी राजा तोरे बँगले पर..होठों पर एक मुस्कुराहट जरूर ले आता है। पर इस फिल्म का सबसे शानदार नग्मा था मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में। याद आया ना आपको हाँ वही हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये।
पर जानते हैं इस गीत की धुन सचिन दा ने कब रची थी? फिल्म के रिलीज़ होने के करीब एक साल पहले। दरअसल बंगाल में ये परंपरा रही है कि वहाँ के संगीतकार हर साल दुर्गा पूजा के समय अपनी नई धुनों के साथ एक एलबम जरूर निकालते थे। सन 1957 के दशहरे में रिलीज़ किये गए एलबम के एक गीत के बोल थे ..घुम भूलेची निझुम इ निशिथे जेगे थाकी और इन्हें लिखा था गौरीप्रसाद मजुमदार ने।सचिन दा ने अपनी इस संगीतबद्ध रचना को खुद ही आवाज़ दी थी । तो सचिन दा की आवाज़ में इस गीत को सुनने के पहले क्यूँ ना इस गीत के भावों से आपका परिचय करा दिया जाए?
पिछले कई दिनों से मैं नींद को भूल सा गया हूँ, रात भर जागता रहता हूँ ठीक उसी तरह जिस तरह प्यार में डूबे ये दो पंक्षी सूने आकाश को ताकते हुए जग रहे हैं।
कोथा दिये चिले, आसिबे गो फीरे चाँद जाबे दूरे, आकाशरो तीरे ताय, तोमारे आमि, बारे बारे पीछू डाकी घुम भूलेची..घुम्म...
तुम कहाँ चले गए लौटने का वादा करके! देखो अब तो चाँद भी खिसकता हुआ आकाश के कोने में जा चुका है और उसके साथ भटकता मेरा मन तुम्हें बार बार पुकार रहा है
ऐके ऐके ओइ डूबे गेलो तारा तबू तूमी ओगो दिले ना तो शारा हाय एलेया जेनो, आलो होए, दिलो फांकी घुम भूलेची..घुम्म...
एक एक कर सारे तारे डूबने लगे हैं और सुबह के धुँधलके में मैं तुम्हें ढूँढ रहा हूँ। रात के इस अंतिम प्रहर में मृगतृष्णा सी तुम्हारी झलक का छलावा रोशनी के आने के बाद टूट चुका है।
काला पानी के गीत में सचिन दा ने इसी धुन का इस्तेमाल किया। अपनी किताब सरगमेर निखद में वे कहते हैं "मैंने इस गीत का मुखड़ा ग़ज़ल की तरह और अंतरा गीत की तरह रचा। मैं जैसा चाहता था रफ़ी ने इस गीत को वैसा ही निभाया।"
सच, रफ़ी साहब ने मजरूह सुल्तानपुरी के बोलों पर जिस तरह इस गीत की अदायगी की उसके लिए प्रशंसा के जितने भी शब्द लिखे जाएँ, कम होंगे। नशे में अपना ग़म गलत करते देव आनंद के दिल की करुण पुकार को पर्दे पर रफ़ी ने अपनी आवाज़ से जीवंत कर दिया था। सचिन दा ने बंगाली गीत में शुरुआत सरोद से की थी पर काला पानी में रफ़ी की आवाज़ के साथ नाममात्र का संगीत रखा। सचिन दा के "घुम्म.." के बाद की कलाकारी को रफ़ी आलाप के साथ "हम.." के बाद ले आए। "चले गए" को वो दुबारा जिस तरह गाते हैं तो कलेजा मुँह को आ जाता है। मजरूह का लिखा दूसरे अंतरा मुझे गीत की जान लगता है खासकर तब जब वो कहते हैं डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले...शीशे में आपको भी उतारे चले गये।
हम बेखुदी में तुमको पुकारे चले गये साग़र में ज़िन्दगी को उतारे चले गये
देखा किये तुम्हें हम, बनके दीवाना उतरा जो नशा तो, हमने ये जाना सारे वो ज़िन्दगी के सहारे चले गये हम बेखुदी में...
तुम तो ना कहो हम, खुद ही से खेलें डूबे नहीं हमीं यूँ, नशे में अकेले शीशे में आपको भी उतारे चले गये हम बेखुदी में...
तो आइए एक बार फिर सुनते हैं रफ़ी साहब के इस गीत को..
साठ के दशक में नासिर हुसैन साहब ने एक फिल्म बनाई थी बहारों के सपने। फिल्म का संगीत तो बहुत लोकप्रिय हुआ था पर अपनी लचर पटकथा के कारण फिल्म बॉक्स आफिस पर ढेर हो गयी थी। कल बहुत दिनों बाद इस फिल्म के अपने प्रिय गीत को सुनने का अवसर मिला तो सोचा आज इसी गीत पर आपसे दो बातें कर ली जाएँ। लता की मीठी आवाज़ और मज़रूह के लिखे बोलों पर पंचम की संगीतबद्ध इस मधुर रचना को सुनते ही मेरा इसे गुनगुनाने का दिल करने लगता है। मजरूह साहब ने इतने सहज पर इतने प्यारे बोल लिखे इस गीत के कि क्या कहा जाए। पर पहले बात संगीतकार पंचम की।
1967 में जब ये फिल्म प्रदर्शित हुई थी तो पंचम तीसरी मंजिल की सफलता के बाद धीरे धीरे हिंदी फिल्म संगीत में अपनी पकड़ जमा रहे थे। पर शुरु से ही उनकी छवि पश्चिमी साजों के साथ तरह तरह की आवाज़ों को मिश्रित कर एक नई शैली विकसित करने वाले संगीतकार की बन गयी थी। पर उन्होंने अपनी इस छवि से हटकर जब भी शास्त्रीय या विशुद्ध मेलोडी प्रधान गीतों की रचना की, परिणाम शानदार ही रहे। आजा पिया, तोहे प्यार दूँ... का शुमार पंचम के ऐसे ही गीतों में किया जाता रहा है।
वैसे क्या आपको मालूम है कि इस गीत की धुन इस फिल्म को सोचकर नहीं बनाई गयी थी। सबसे पहले इस धुन का इस्तेमाल फिल्म तीन देवियाँ के पार्श्व संगीत में हुआ था। सचिन देव बर्मन उस फिल्म के संगीतकार थे पर संगीत के जानकारों का मानना है कि उसका पार्श्व संगीत यानि बैकग्राउंड स्कोर पंचम की ही देन थी। हाँ, ये बात जरूर थी कि मजरूह सुल्तानपुरी दोनों फिल्मों के गीतकार थे। हो सकता हूँ मजरूह ने ये गीत तभी लिखा हो और उस फिल्म में ना प्रयुक्त हो पाने की वज़ह से उसका इस्तेमाल यहाँ हुआ हो या फिर उस शुरुआती धुन को पंचम ने इस फिल्म के लिए विकसित किया हो। ख़ैर जो भी हो पंचम को इस बात की शाबासी देनी चाहिए कि उन्होंने मधुर लय में बहते गीत के संगीत संयोजन में लता की आवाज़ को सर्वोपरि रखा। इंटरल्यूड्स में एक जगह संतूर के टुकड़े के साथ बाँसुरी आई तो दूसरी जगह सेक्सो।
गीतकार मज़रूह के कम्युनिस्ट अतीत, गीत लिखने के प्रति उनकी शुरुआती अनिच्छा और प्रगतिशील ग़ज़ल लिखने वालों में फ़ैज़ के समकक्ष ना पहुँच पाने के मलाल जैसी कुछ बातों के बारे में मैं यहाँ पहले भी लिख चुका हूँ। आज आपके सामने उनका परिचय उनके समकालीन शायर निदा फ़ाजली के माध्यम से कराना चाहता हूँ।
निदा फ़ाज़ली ने अपने एक संस्मरण में मजरूह की छवि को बढ़ी खूबसूरती से कुछ यूँ गढ़ा है
"..... शक़्लो सूरत से क़ाबीले दीदार, तरन्नुम से श्रोताओं के दिलदार, बुढ़ापे तक चेहरे की जगमगाहट, पान से लाल होठों की मुस्कुराहट और अपने आँखों की गुनगुनाहट से मज़रूह दूर से ही पहचाने जाते थे। बंबई आने से पहले यूपी के छोटे से इलाके में एक छोटा सा यूनानी दवाखाना चलाते थे। एक स्थानीय मुशायरे में जिगर साहब ने उन्हें सुना और अपने साथ मुंबई के एक बड़े मुशायरे में ले आए। सुंदर आवाज़, ग़ज़ल में उम्र के लिहाज से जवान अल्फाज़, बदन पर सजी लखनवी शेरवानी के अंदाज़ ने स्टेज पर जो जादू जगाया कि पर्दा नशीनों ने नकाबों को उठा दिया।....."
मज़रूह ने जहाँ अपनी शायरी में अरबी फारसी के शब्दों का प्रचुर मात्रा में उपयोग किया वहीं गीतों में यूपी की बोली का। नतीजा ये रहा कि उनकी ग़ज़लों की अपेक्षा गीतों को आम जनता ने हाथों हाथ लिया। अब इस गीत को ही लें, एक प्रेम से भरी नारी की भावनाओं को कितनी सहजता से व्यक्त किया था मजरूह ने। दुख के बदले सुख लेने की बात तो ख़ैर अपनी जगह थी पर उसके साथ मैं भी जीयूँ, तू भी जिए लिखकर मजरूह ने उस भाव को कितना गहरा बना दिया। तीनों अंतरों में सरलता से कही मजरूह की बातें लता जी की आवाज़ में कानों में वो रस बरसाती हैं कि बस मन किसी पर न्योछावर कर देने को जी चाहने लगता है..
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आजा पिया, तोहे प्यार दूँ गोरी बैयाँ , तोपे वार दूँ किसलिए तू, इतना उदास? सूखे सूखे होंठ, अखियों में प्यास किसलिए, किसलिए? जल चुके हैं बदन कई, पिया इसी रात में थके हुए इन हाथों को, दे दे मेरे हाथ में हो सुख मेरा ले ले, मैं दुःख तेरे ले लूँ मैं भी जीयूँ, तू भी जिए होने दे रे, जो ये जुल्मी हैं, पथ तेरे गाँव के पलकों से चुन डालूँगी मैं, कांटे तेरे पाँव के हो लट बिखराए, चुनरिया बिछाए बैठी हूँ मैं, तेरे लिए अपनी तो, जब अखियों से, बह चली धार सी खिल पड़ीं, वहीं इक हँसी , पिया तेरे प्यार की हो मैं जो नहीं हारी, सजन ज़रा सोचो किसलिए, किसलिए?
आजकल कई बार ऐसा देखा गया है कि पुराने मशहूर गीतों व ग़ज़लों को नई फिल्मों में फिर से नए कलाकारों से गवा कर या फिर हूबहू उसी रूप में पेश किया जा रहा है। हैदर में गुलों में रंग भरे गाया तो अरिजित सिंह ने पर याद दिला गए वो मेहदी हसन साहब की। वहीं पुरानी आशिकी में कुमार सानू का गाया धीरे धीरे से मेरी ज़िदगी में आना को तोड़ मरोड़ कर हनी सिंह ने अपने रैप में ढाल लिया है। शुक्र है तनु वेड्स मनु रिटर्न में फिल्म के अंत में कंगना पर आर पार के गाने जा जा जा जा बेवफ़ा का मूल रूप ही बजाया गया। इससे ये हुआ कि कई युवाओं ने पुरानी फिल्म आर पार के सारे गीत सुन डाले। आज आर पार की इस सुरीली और उदास गीत रचना का जिक्र छेड़ते हुए कुछ बातें रिदम किंग कहे जाने वाले नैयर साहब के बारे में भी कर लेते हैं।
ये तो सब जानते है कि आर पार ही वो फिल्म थी जिसने सुरों के जादूगर ओ पी नैयर की नैया पार लगा दी थी। पर उसके पहले नैयर साहब को काफी असफलताएँ भी झेलने पड़ी थीं। नैयर लाहौर में जन्मे और फिर पटियाला में पले बढ़े। घर में सभी पढ़े लिखे और उच्च पदों पर आसीन लोग थे सो संगीत का माहौल ना के बराबर था। ऊपर से उन्हें बचपन में ही ढ़ेर सारी बीमारियों ने धर दबोचा। पर इन सब से जूझते हुए कब संगीत का चस्का लग गया उन्हें ख़ुद ही पता नहीं चला। ये रुझान उन्हें रेडियो तक ले गया जहाँ वे गाने गाया करते थे।
मज़े की बात है कि ओ पी नैयर साहब ने मुंबई का रुख संगीत निर्देशक बनने के लिए नहीं बल्कि हीरो बनने के लिए किया था। स्क्रीन टेस्ट में असफल होने के बाद उन्हें लगा कि वो इस लायक नहीं हैं। फिर संगीत निर्देशक बनने का ख़्वाब जागा पर मुंबई की पहली यात्रा में अपने संगीत निर्देशन वो दो गैर फिल्मी गीत ही रिकार्ड कर पाए जिसमें एक था सी एच आत्मा का गाया प्रीतम आन मिलो। काम नहीं मिलने की वज़ह से नैयर साहब वापस चले गए। पर वो गाना बजते बजते इतना लोकप्रिय हो गया कि उस वक़्त आसमान का निर्देशन कर रहे पंचोली साहब ने उन्हें मुंबई आने का बुलावा भेज दिया। कहते हैं कि नैयर साहब के पास ख़ुशी की ये सौगात ठीक उनकी शादी के दिन पहुँची।
1952 में उन्हें आसमान के आलावा दो फिल्में और मिलीं छम छमा छम और गुरुदत्त की बाज। दुर्भाग्यवश उनकी ये तीनों फिल्में बुरी तरह पिट गयीं। गीता जी नैयर साहब के साथ आसमान में देखो जादू भरे मोरे नैन के लिए काम कर चुकी थीं और उन्हें ऐसा लगा कि नैयर साहब उनकी आवाज़ का सही इस्तेमाल कर पाने की कूवत रखते हैं। जब ओ पी नैयर गुरुदत्त से बाज के लिए अपना बकाया माँगने गए तो उन्होंने उन्हें पैसे तो नहीं दिए पर गीता जी के कहने पर उन्हें अपनी अगली फिल्म आर पार के लिए अनुबंधित कर लिया। नैयर साहब ने बाबूजी धीरे चलना...., सुन सुन सुन जालिमा...., मोहब्बत कर लो जी भर लो अजी किसने देखा है.... जैसे गीतों के बल पर वो धमाल मचाया कि पचास के दशक में आगे चलकर किसी फिल्म के लिए एक लाख रुपये लेने वाले पहले संगीत निर्देशन बन गए।
सुन सुन सुन जालिमा.... का ही एक उदास रूप था जा जा जा ऐ बेवफ़ा... ! पर गीत के मूड के साथ साथ दोनों गीतों के संगीत संयोजन में काफी फर्क था। सुन सुन की तरह जा जा जा में ताल वाद्यों का कहीं इस्तेमाल नहीं हुआ। पूरे गीत में पार्श्व में हल्के हल्के तार वाद्यों की रिदम चलती रहती है जो गीत की उदासी को उभारती है। मजरूह ने गीत के मुखड़े और अंतरों में नायिका के शिकायती तेवर को बरक़रार रखा है। उलाहना भी इसलिए दी जा रही है कि कम से कम वही सुन कर नायक का दिल पसीज़ जाए।
नैयर साहब ने गज़ब का गाना रचा था। मुखड़े का हर जा.. दिल की कचोट को गहराता है वहीं अगली पंक्ति का प्रश्न हताशा के भँवर से निकलता सुनाई देता है।आज भी मन जब यूँ ही उदास होता है तो ये गीत बरबस सामने आ खड़ा होता है.. तो आइए सुनते हैं इस गीत को
जा जा जा जा बेवफ़ा, कैसा प्यार कैसी प्रीत रे तू ना किसी का मीत रे, झूठी तेरी प्यार की कसम दिल पे हर जफ़ा देख ली, बेअसर दुआ देख ली कुछ किया न दिल का ख़याल, जा तेरी वफ़ा देख ली क्यों ना ग़म से आहें भरूँ, याद आ गए क्या करूँ बेखबर बस इतना बता, प्यार में जिऊँ या मरूँ
और अब देखिए हाल ही में आई फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न में कंगना पर इसे कैसे फिल्माया गया है..
पिछली पोस्ट में तीन देवियाँ फिल्म के गीत के बारे में चर्चा करते वक़्त बात हुई थी मज़रूह साहब के बारे में। आज आपसे गुफ़्तगू होगी इसी फिल्म के एक और गीत के बारे में। पर रफ़ी साहब के गाए इस नाज़ुक से नग्मे का जिक्र करूँ, उससे पहले आपको ये बताना चाहूँगा कि मज़रूह साहब कैसे याद करते थे सचिन देव बर्मन साहब के साथ गुजरे उन सालों को।
आपको बता ही चुका हूँ मज़रूह कम्यूनिस्ट विचारधारा से काफी प्रभावित थे। सचिन दा से उनकी पहली मुलाकात वामपंथियों के एक सम्मेलन में कोलकाता में हुई थी। सचिन दा ने मज़रूह से पहले साहिर लुधयानवी के साथ कुछ फिल्मों में काम किया। फिर किसी बात पर उनकी साहिर से अनबन हो गई तो उन्होंने मज़रूह को फिल्म Paying Guest के गाने लिखने के लिए बुलाया।
मज़रूह को परिस्थिति दी गयी कि एक वकील अपनी महबूबा के लिए गा रहा है। मज़रूह ने सोचा वकील है थोड़ा सौम्य होगा तो उसी मिजाज़ का गाना लिख कर दे दिया। निर्देशक उनके इस प्रयास से तनिक भी खुश नहीं हुए कहा पहले फिल्म देखिए फिर गाना लिखिए। मज़रूह ने फिल्म देखी और अपना सिर ठोक लिया। उन्होंने कहा कि आपने मुझसे वकील के लिए गाना लिखने को क्यूँ कहा? सीधे कहते कि एक लोफ़र के लिए गाना लिखना है जो इक लड़की के पीछे पड़ा है और तब मज़रूह ने लिखामाना जनाब ने पुकारा नहीं, क्या मेरा साथ भी गवारा नहींजो बेहद लोकप्रिय हुआ।
बिमल दा की फिल्म में मज़रूह ने सचिन दा के लिए एक गाना लिखा जलते हैं जिसके लिए मेरी आँखों के दीये...। इस कालजयी गीत (जो मुझे बेहद प्रिय है) के बारे में मैंने पहले यहाँ भी लिखा था। पर फिल्म में इस गीत को फिल्माने पर विवाद खड़ा हो गया। फिल्म की परिस्थिति के हिसाब से ये गीत नायक नायिका द्वारा टेलीफोन करते हुए फिल्माया जाना था पर विमल दा जैसे यथार्थवादी निर्देशक फिल्म के नाम पर इतनी सिनेमेटिक लिबर्टी लेने के लिए तैयार नहीं थे। मज़रूह बताते हैं आमतौर पर डरपोक समझे जाने वाले सचिन दा इस बार बहादुरी से अड़ गए और थोड़ी देर इधर उधर टहलने के बाद बिमल दा से बोले "अगर तुम इस फिल्म में मेरा गाना नहीं लेगा तो हम पिक्चर नहीं करेगा"। सचिन दा के इस रूप को देखने के बाद बिमल दा को उनकी बात माननी पड़ी और इतिहास गवाह है कि इस गीत ने कितनी वाहवाहियाँ बटोरीं।
सचिन दा के बारे में मशहूर था कि वो अपने यहाँ आने वालों को चाय नाश्ते के लिए ज़्यादा नहीं पूछते थे। इसी मद्देनज़र मज़रूह साहब ने एक किस्सा बयाँ किया था। वाक़या ये था कि
एक बार सचिन दा , उनका सहायक, साहिर और मज़रूह गाड़ी से चर्चगेट से कहीं जा रहे थे। रास्ते में सचिन दा ने एक केला निकाला और खाने लगे। फिर उन्होंने साहिर से पूछा "कोला लेगा"?साहिर और मज़रूह अचरज़ में पड़ गए कि कहाँ से सचिन दा का दरिया - ए -रहमत जोश मारने लगा ? अभी दोनों इसी असमंजस में थे कि सचिन दा ने कहा ड्राइवर गाड़ी रोको और फिर साहिर की ओर मुख़ातिब होकर बोले जाओ ओ दिखता है... जा कर ले लो।
सचिन दा के बारे में मज़रूह की याद की पोटलियों से निकले कई किस्से और भी हैं पर वो फिर कभी। आइए अब बात की जाए तीन देवियों के इस बेहद प्यारे से नग्मे की।
सचिन दा इस बाद के हिमायती थे कि गीत में उतना ही संगीत दिया जाए जितनी जरूरत हो। कहीं बेख्याल हो कर कहीं छू लिया किसी ने में आप इसका नमूना देख ही चुके हैं पर जहाँ तक ऐसे तो ना देखो की बात है यहाँ सचिन दा की शुरुआती धुन और इंटरल्यूड्स गीत के मूड में और जान डाल देते हैं। राग ख़माज पर आधारित इस गीत को हिंदुस्तानी ज़ुबान की जिस रससिक्त चाशनी में घोला है मज़रूह ने कि बोलों को पढ़कर ही मन में एक ख़ुमार सा छाने लगता है। अब इसी अंतरे को लीजिए यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें..बढ़ के बेखुदी हसीं गेसू खोलें..खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए
अब आप ही बताइए काजल से सजी आँखों के बीच कोई अपनी खूबसूरत लटों को लहरा दे तो आसमान में बदली छाए ना छाए दिल तो इन काली घटाओं के आगोश में भींग ही उठेगा ना। रफ़ी ने इसी चाहत को गीत के हर अंतरे में अपनी अदाएगी के द्वारा इस तरह उभारा मानो वो ख़ुद मदहोशी की हालत में गाना गा रहे हों। तो आइए आज की शाम जाम के तौर पर इस गीत का रसपान किया जाए
ऐसे तो न देखो, कि हमको नशा हो जाए ख़ूबसूरत सी कोई हमसे ख़ता हो जाए
तुम हमें रोको फिर भी हम ना रुकें तुम कहो काफ़िर फिर भी ऐसे झुकें क़दम-ए-नाज़ पे इक सजदा अदा हो जाये ऐसे तो न देखो....
यूँ न हो आँखें रहें काजल घोलें बढ़ के बेखुदी हसीं गेसू खोलें खुल के फिर ज़ुल्फ़ें सियाह काली बला हो जाए ऐसे तो न देखो.....
हम तो मस्ती में जाने क्या क्या कहें लब-ए-नाज़ुक से ऐसा ना हो तुम्हें बेक़रारी का गिला हम से सिवा हो जाये ऐसे तो न देखो.....
फिल्म तीन देवियाँ में ये गीत देव आनंद और नंदा पर फिल्माया गया था।
पिछले हफ्ते गुजरे सालों के सुपरस्टार देवानंद पर फिल्माए गानों को देख रहा था। साठ के दशक में किशोर को देव आनंद की आवाज़ का पर्याय माना जाने लगा था , पर अगर गौर किया जाए तो इसी दौरान मोहम्मद रफ़ी को भी पर्दे पर देव आनंद की आवाज बनने के मौके मिले जिन्हें उन्होंने खूबसूरती से निभाया भी। ऐसी ही एक फिल्म थी 1965 में प्रदर्शित हुई 'तीन देवियाँ' जिसके संगीतकार थे सचिन देव बर्मन और गीतकार मजरूह सुलतानपुरी। फिल्म तो निहायत औसत दर्जे की थी पर इसका संगीत इतना मशहूर हुआ कि फिल्म को हिट करा गया।
मज़रूह साहब कमाल के गीतकार थे। अब आप ही बताइए कि जिस शख़्स ने 1946 में 'शाहजहाँ' के गीतों को लिख कर शोहरत पाई हो और जो उसके पाँच दशकों के बाद भी 'क़यामत से क़यामत तक' और 'जो जीता वही सिंकदर' जैसी फिल्मों के गीतों को लिखकर युवा दिलों पर राज करता रहा ऐसी उपलब्धि उनसे पहले किस गीतकार के हाथ लगी थी? यही वज़ह थी कि किसी गीतकार को अगर फिल्म जगत का सबसे बड़ा 'दादा साहब फालके पुरस्कार' सबसे पहले मिला तो वो मज़रूह साहब ही थे।
पर वास्तव में मज़रूह साहब को अंत तक इस बात का मुगालता रहा कि पुरस्कार मिला भी तो गीतकार की हैसियत से जबकि उनका सपना हमेशा अपने समकालीन फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की तरह एक प्रतिष्ठित ग़ज़लकार बनने का ही था। चालीस के दशक में वो मुंबई एक मुशायरे में शिरक़त करने ही आए थे और उनकी ग़ज़लों से प्रभावित हो कर एक निर्माता नेजब उन्हें गीतकार बनने का मौका दिया तो उन्होंने उसे ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि ये इज़्ज़त की नौकरी नहीं है। पर जिगर मुरादाबादी के ये समझाने पर कि बतौर जीविका चलाने के लिए तुम ये काम करो, बाकी ग़ज़लें लिखते रहो....वो मान गए। पचास के दशक के बाद से ये धारदार कम्युनिस्ट अपनी विचारधारा को कार्यान्वित ना होते देख उसमें सक्रिय भागीदारी से तो विमुख हो ही गया था, साथ ही वक़्त के साथ ग़ज़लों से भी दूर होता चला गया।
गीतकार के रूप में इतनी सफलता हाथ लगी कि उन्हें अपने हुनर पर और समय देने का अवसर ही नहीं मिला। पर जब जब फिल्मों में ग़ज़ल लिखने का उन्हें मौका मिला उन्होंने अपना कौशल दिखाने में कोताही नहीं की। अब तीन देवियाँ फिल्म के इस गीत को लें क्या मतला (प्रारंभिक शेर) लिखा था मज़रूह ने
कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने
मैं तो कहता हूँ बस इसी शेर को गुनगुनाते हुए घंटों निकालें जा सकते हैं। कितनी आम सी बात को इस करीने से पकड़ा मज़रूह साहब ने कि तन मन गुदगुदा उठे। वैसे बाकी के मिसरे भी अच्छे भले हैं और रफ़ी की आवाज़ का साथ पाकर और फड़क उठे हैं।
वैसे मज़रूह अगर सामने होते तो एक बात जरूर पूछता उनसे जब गाना देव आनंद गा
रहे थे तो फिर चौथे मिसरे में 'किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने' कैसे
कह गए? कोई स्त्रीसूचक शब्द जैसे महज़बीं/दिलनशीं और मुनासिब होता। शायद शेर के बहर
यानि मीटर की बंदिशों को तोड़ना उन्हें गवारा ना लगा हो।
कहीं बेख़याल होकर, यूँ ही छू लिया किसी ने
कई ख्वाब देख डाले, यहाँ मेरी बेखुदी ने , कहीं बेख़याल होकर
मेरे दिल मैं कौन है तू, कि हुआ जहाँ अँधेरा
वहीं सौ दिये जलाये, तेरे रुख़1की चाँदनी ने
कभी उस परी का कूचा, कभी इस हसीं की महफ़िल
मुझे दरबदर फिराया, मेरे दिल की सादगी ने
है भला सा नाम उसका, मैं अभी से क्या बताऊं
किया बेक़रार हँसकर, मुझे एक आदमी ने
अरे मुझपे नाज़ वालों, ये नयाज़मन्दियाँ2 क्यों
है यही करम तुम्हारा, तो मुझे ना दोगे जीने
कई ख्वाब.....कहीं बेख़याल होकर
1. चेहरा, 2.अहसान
सचिन देव बर्मन के साथ इसी फिल्म में मजरूह ने एक और प्यारा गीत लिखा था जो मुझे इससे भी प्यारा लगता है। पर अभी मैं आपको इस गीत की ख़ुमारी से जगाना नहीं चाहता तो उस गीत की बातें अगली प्रविष्टि में।
पिछले हफ्ते थाइकैंड की यात्रा पर निकलने की वज़ह से एस डी बर्मन से जुड़ी श्रंखला का आख़िरी भाग आपके सम्मुख पहले नहीं ला सका। जैसा कि मैंने पिछली पोस्ट में जिक्र किया था कि इस कड़ी में मैं उन गीतों की बात करूँगा जिनके बारे में चर्चा करने का अनुरोध आपने अपनी टिप्पणियों में किया है। साथ ही एक सरसरी सी नज़र हिंदी फिल्मों में गाए उनके अन्य गीतों पर भी होगी...
तो आज की कड़ी की शुरुआत करते हैं निहार रंजन के पसंदीदा बाँग्ला गीत रंगीला रंगीला रंगीला रे..से। बर्मन दा ने अपनी आवाज़ में ये गीत सन 1945 में रिकार्ड किया था और ये बेहद लोकप्रिय भी हुआ था। खागेश देव बर्मन, सचिन दा से जुड़ी अपनी किताब में इस गीत के संदर्भ में लोक संगीत को निभाने में सचिन दा की माहिरी के बारे में संगीतकार व गायक कबीर सुमन को उद्धृत करते हुए कहते हैं
लोक संगीत की नब्ज़ जाने बगैर इस गीत की पंक्ति तुमी होइयो किनर बंधु, आमि गांगेर पानी के बाद ई ई.. स्वर को खींचना एक आम गायक के बस की बात नहीं है। खागेश का मानना है कि इस गीत में कुछ खास शब्दों पर जोर देने के लिए सचिन दा का रुकना और डुबियो गेलो बेला के पहले हे हे ..का प्रयोग डूबते सूरज की स्थिति को गायिकी द्वारा चित्रित करने में सहायक होता है।
इस गीत को पूर्वी बंगाल के कवि जसिमुद्दिन ने लिखा था। बाँग्लादेश में जसिमुद्दिन को लोक या ग्रामीण कवि के रूप में जाना जाता है। रंगीला रे एक नाविक द्वारा गाया भाटियाली प्रेम गीत है जिसमें वो अपनी प्रेमिका से पूछता है कि आख़िर तुम मुझे छोड़ कर कहाँ चली गयी?
बंधु रंगीला रंगीला रंगीला रे आमरे छाड़ियर बंधु कोइ गैला रे
नाविक कहता है कि तुम अगर चंदा हो तो मैं नदी की बहती धारा हूँ। देखना ज्वार भाटा की बेला में हम एक हो जाएँगे। अगर तुम फूल हो तो तुम्हारी सुगंध के पीछे मैं बहती हवा के रूप में देश विदेश तब तक भटकूँगा जब तक पागल ना हो जाऊँ। वैसे बंगाली ना होने के बावज़ूद ये गीत सहज ही मन में बैठ जाता है। आप भी सुनकर देखिए..
वैसे हिंदी फिल्मों में भाटियाली गीतों की परंपरा सचिन दा ने सुजाता में गाए अपने बेहद लोकप्रिय गीत सुन मेरे बंधु रे सुनो मोरे मितवा ...से की। क्या सहज व प्यारे बोल लिखे थे मज़रूह ने इस गीत में...
होता तू पीपल मैं, होती अमरलता तेरी तेरे गले माला बनके, पड़ी मुसकाती रे, सुन मेरे... दीया कहे तू सागर मैं, होती तेरी नदिया लहर लहर करती मैं पिया से मिल जाती.. रे सुन मेरे.
भाटियाली लोक संगीत के बारे में सचिन दा का अपना एक नज़रिया था। उन्होंने लोक संगीत से जुड़े अपने एक लेख में लिखा है..
"मेरे लिए भाटियाली मिट्टी की एक धुन है। इसकी जड़े ज़मीन से निकलती हैं और धरती ही इन धुनों को पोषित पल्लवित करती है। भाटियाली एक तरह से बहती नदी का गीत है। इसके सुर, इसके बोल, इसकी पीड़ा, इसकी खुशियाँ हमें बंगाल की नदियों की याद दिलाती हैं। भाटियाली गीत एक आम किसान का प्रेम गीत भी हो सकता है तो वहीं वो राधा कृष्ण के रास रंग को भी चित्रित कर सकता है। भाटियाली गीतों का मूड, उनकी कैफ़ियत दार्शनिकता में डूबे अकेलेपन को स्वर देती है पर ये दार्शनिकता बाउल गीतों से अलग होती है।"
1969 में आराधना के साथ एक और फिल्म आयी थी जिसका नाम था तलाश जिसका जिक्र हर्षवर्धन ने अपनी टिप्पणी में किया है। इस फिल्म में भी सचिन दा ने अपने अन्य फिल्मी गीतों की तरह पार्श्व से एक गीत गाया था। गीत के बोल थे मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में शीतल छाया तू, दुख के जंगल में। फिल्म के ठीक प्रारंभ में आने वाले इस गीत के बोल लिखे थे गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने। माँ की ममता को सर्वोपरि मानने वाले इस गीत की भावनाओं से भला कौन अपने आपको अलग कर सकता है?
इन गीतों के आलावा सचिन दा ने Eight Days,ताजमहल, प्रेम पुजारी,तेरे मेरे सपने,ज़िंदगी ज़िंदगी व सगीना जैसी फिल्मों में भी पार्श्व गायक की भूमिका अदा की पर इन फिल्मों के लिए उनके गाए गीत उतने चर्चित नहीं रहे। इस प्रविष्टि के साथ सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला का यहीं समापन करता हूँ। आशा है सचिन दा के गाए इन गीतों और उनके पीछे छुपे व्यक्तित्व से जुड़ी बातों को आपने पसंद किया होगा।
सचिन दा की गायिकी से जुड़ी इस श्रंखला की सारी कड़ियाँ...
पंचम और किशोर दा कॉलेज के ज़माने में हमारे कानों लिए वो खुराक हुआ करते थे जिसके बिना नींद हमारी आँखों से कोसों दूर भागती थी। बात नब्बे के दशक के शुरुआती दिनों की है। तब कैसेट्स बेचने वाली दुकानों में अपनी पसंद के गानों की सूची ले जाने और फिर उसे एक खाली कैसेट में रिकार्ड करने का चलन शुरु ही हुआ था। किशोर कुमार की ऐसी ही एक कैसेट मैंने भी तब बनवाई थी। उस सूची में किशोर के सदाबहार नग्मों के आलावा एक ही फिल्म के तीन गाने थे।
पंचम द्वारा संगीत निर्देशित ये फिल्म थी मेरे जीवनसाथी जिसे मैंने उस वक़्त क्या, आज तक नहीं देखा है। पर इस फिल्म के तीन गीतों दीवाना ले के आया है...., ओ मेरे दिल के चैन......... और चला जाता हूँ किसी की धुन में........ को कॉलेज से निकलने के बाद भी मैंने इतना सुना कि वो कैसेट बुरी तरह घिस गई। आज भी जब इन गीतों को सुनता हूँ तो सोचता हूँ कि आख़िर क्या था इन गीतों में जो अपने आने के इतने दशकों बाद भी ये उसी चाव से सुने जा रहे हैं?
सत्तर का दशक पंचम का उद्भव काल था। पंचम ने इस दौरान जितनी फिल्मों का संगीत निर्देशन किया उसमें ज्यादातर का संगीत सफल रहा। यहाँ तक वैसी फिल्मों का संगीत भी जो अपेक्षा के अनुरूप नहीं चल पायीं। 'मेरे जीवन साथी' इसका जीता जागता उदाहरण है। फिल्म के गाने फिल्म प्रदर्शित होने के कुछ महिने पहले से ही धूम मचाने लगे थे पर गानों ने दर्शकों को जो उम्मीद बँधाई , वो फिल्म में नज़र नहीं आई। नतीजन मेरे जीवन साथी चली नहीं पर इसके गाने चलते रहे और आज तक चल रहे हैं।
फिल्म निर्माता हरीश शाह और राजेश खन्ना ने इस फिल्म के लिए पंचम की बनाई पहली धुन अस्वीकृत कर दी थी और फिर उसके बाद पंचम ने रची ओ मेरे दिल के चैन... । इसके मुखड़े के पहले की धुन पूरे फिल्म की ट्रेडमार्क धुन बन गई और उसका इस्तेमाल अन्य गीतों में भी हुआ। फिल्मफेयर में सितंबर 1973 में छपे आलेख में वी श्रीधर ने जब इस गीत के बारे में पंचम से बात की तो उन्होंने कहा था कि
"इसकी धुन जब अचानक से दिमाग में आई तो मन बेचैन हो उठा। उद्विग्नता इतनी बढ़ गई कि चार बजे सुबह उठकर मैंने उसे गुनगुनाते हुए कैसेट रिकार्डर में टेप किया और फिर अपने संगीत कक्ष में चला गया । इस तरह गीत की पूरी धुन तैयार हुई। उसी शाम ये धुन मैंने मजरूह को थमाई और मिनटों में पूरा गीत बन कर तैयार हो गया।"
मेरे जीवन साथी का दूसरा चर्चित नग्मा दीवाना ले के आया है दिल का तराना... था। संगीत संयोजन में आपको इस गीत में ओ मेरे दिल के चैन से कई समानताएँ सुनाई देंगी। खासकर गीत के पीछे बजने वाला तालवाद्य और इंटरल्यूडस। मजरूह के लिखे इस गीत में बीते हुए कल के लिए हताशा भी है और आने वाले कल के लिए धनात्मक सोच भी। पहले अंतरे के बाद पंचम फिर अपनी सिगनेचर धुन का इस्तेमाल करते है जिसका जिक्र मैंने ऊपर भी किया है। उत्तम सिंह के बजाए वायलिन के खूबसूरत टुकड़े से ये इंटरल्यूड समाप्त होता है।
अगर लोगों की जुबाँ पर ये गाने चढ़े तो उसमें पंचम की कर्णप्रिय धुन, मजरूह
के सहज सपाट बोल और किशोर की बेमिसाल आवाज़ का बड़ा हाथ था। साथ ही ऊँचे
सुरों का ना इस्तेमाल होने की वजह से पंचम के इन गीतों को गुनगुनाना एक आम
संगीत प्रेमी के लिए बेहद आसान रहा।
पर आज की तारीख़ में मेरे जीवन साथी के जिस गीत को मैं बारहा सुनना पसंद करता हूँ वो है किशोर कुमार का गाया चला जाता हूँ ...किसी की धुन में ..धड़कते दिल के ..तराने लिए..। कोई भी सफ़र हो, कैसी भी डगर हो जब भी मन प्रफुल्लित होता है गीत की धुन चुपचाप कब होठों पर रेंगने लगती है पता ही नहीं चलता। किसी गीत के सफल होने में संगीतकार और गीतकार का जबरदस्त योगदान होता है क्यूँकि कोई भी गीत उनके मातृत्व में ही कोख से निकल कर पल बढ़कर तैयार होता है। पर कुछ गीत ऐसे होते हैं जिनकी सफलता की कल्पना, उन्हें हम तक पहुँचाने वाले गायकों के बिना करना मुश्किल हो जाता है। चला जाता हूँ ....को मैं ऐसे ही गीतों की श्रेणी में रखता हूँ। किशोर कुमार इस गीत में अपनी बेमिसाल यूडलिंग से मस्ती और उमंग का जो माहौल रचते हैं उससे मन तो क्या पूरा शरीर ही तरंगित हो जाता है।
आज पंचम हमारे बीच नहीं हैं पर उनके रचे संगीत की लोकप्रियता दशकों बाद भी कम नहीं हुई है। पचास और साठ का दौर हिंदी फिल्म संगीत का स्वर्णिम दौर कहा जाता है। इस दौर में हिंदी फिल्म संगीत के महानतम संगीतकारों का काम श्रोताओं तक पहुँचा। पंचम इस दौर के आखिरी चरण में आए पर जब उनके संगीत की उनके पूर्ववर्ती संगीतकारों से तुलना करता हूँ तो जावेद अख्तर की वो बात याद आ जाती है जो उन्होंने किताब R D Burman The Man, The Music के प्राक्कथन में कही हैं..
"..पंचम के बारे में मैं क्या कहूँ? कुछ लोग एक विशेष कालखंड में सफल होते हैं। जैसे जैसे वक़्त बीतता है, तौर तरीके और शैलियाँ बदलती हैं। पुराने लोग गुजर जाते हैं या स्मृतियों के धुंधलके में खो जाते हैं। उनकी जगह नए लोग ले लेते हैं। हम सिर्फ उन लोगों को याद रख पाते हैं जो ना सिर्फ सफल हुए बल्कि जिन्होंने ऐसा कुछ अभूतपूर्व किया जिससे उनकी कला एक नए स्तर तक पहुँची और जिससे आने वाली पीढ़ियों को अपने हुनर को और तराशने के लिए नई सोच मिली। पंचम ने एक नई आवाज़ और बीट्स से सबका परिचय कराया। पुराने साजों के अलग तरीके से इस्तेमाल के साथ साथ उन्होंने कई नए वाद्य यंत्रों का भी प्रचलन किया। आज हम संगीत में जिन तकनीकी सुविधाओं को सामान्य मानते हैं वो साठ या सत्तर के दशक में थी ही नहीं। ये पंचम की विलक्षणता ही है कि तब भी उनका संगीत ताजा और आज के युग का लगता है।.."
कुछ गीत ज़िंदगी में कभी भी सुने जाएँ, कितनी बार भी सुने जाएँ वही तासीर छोड़ते हैं। कुछ दिनों से ऐसा ही एक सदाबहार नग्मा होठों पर जमा हुआ है। 1959 में आई फिल्म सुजाता के इस गीत को गाया था तलत महमूद ने।
हिंदी फिल्म जगत में तलत महमूद एक ऐसे गायक थे जो फिल्म संगीत में छाने के पहले ही ग़ज़लों की दुनिया में अपना एक अलग नाम बना चुके थे। मात्र सोलह साल की उम्र में आकाशवाणी लखनऊ से दाग़, मीर, ज़िगर मुरादाबादी जैसे नामचीन शायरों की ग़ज़लों को गाकर तलत ने श्रोताओं का दिल जीत लिया था। सन 1944 में उनका गैर फिल्मी गीत तसवीर तेरी दिल मेरा बहला ना सकेगी इतना लोकप्रिय हुआ कि उन्हें बंगाल की फिल्मों में काम करने के लिए कोलकाता में बुलाया गया। पर मुंबई फिल्म जगत में उनका पदार्पण 1949 में फिल्म आरजू के लिए गाए गीत ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल.... से हुआ। पचास और साठ के दशक में तलत ने ऐसे बेशुमार नग्मे दिये जिन्हें संगीतप्रेमी शायद कभी ना भूल पाएँ।
तलत एक आकर्षक नौजवान थे। इसी वज़ह से वो गायिकी के साथ अभिनय में भी कूद पड़े। तलत महमूद को अगर फिल्मों में पार्श्व गायन के साथ साथ हीरो बनने का चस्का नहीं लगा होता तो शायद पचास और साठ के दशक में गाए उनके गीतों की सूची और लंबी होती। वैसे तलत महमूद द्वारा की गई गलती बाद में तलत अजीज़ और सोनू निगम ने भी दोहराई और उसका ख़ामियाजा भुगता। साठ के दशक के बाद फिल्म संगीत में आया बदलाव ग़ज़लों के इस बादशाह को नागवार गुजरा और तलत ने फिल्मों में गाना लगभग छोड़ ही दिया।
यूँ तो उनके सदाबहार गीतों की फेरहिस्त में में तुमसे आया ना गया...,शाम - ए - ग़म की कसम..., तसवीर बनाता हूँ..., जाएँ तो जाएँ कहाँ...., दिल ए नादाँ तुझे हुआ क्या है... आदि का अक्सर जिक्र आता है पर अगर अपनी पसंद की बात करूँ तो मुझे मेरी याद में तुम ना आँसू बहाना..., इतना ना मुझसे तू प्यार बढ़ा.., फिर वही शाम वही ग़म वही तनहाई है...को गुनगुनाना बेहद पसंद है। पर इनसे भी अच्छा मुझे उनका वो गीत लगता है जिसकी बात मैं आज करने जा रहा हूँ।
फिल्म सुजाता का ये गीत अपने लाजवाब बोलों की वज़ह से दिल से कभी दूर नहीं होता। क्या मुखड़ा और अंतरा लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने। एक ऐसे गीत की कल्पना जिसकी भावनाओं की उष्मा से प्रियतमा की आँखे जल उठें। भई वाह ! एक ऐसा नग्मा जो दो दिलों की बेचैनी को इतने बेहतरीन अंदाज़ में परिभाषित करता है दर्द बन के जो मेरे दिल में रहा ढल ना सका.. जादू बन के तेरी आँखों में रुका चल ना सका
.....जिसे महसूस कर सुनने वालों की आँखें नम हो जाएँ। सचिन देव बर्मन की बाँसुरी और तलत की थरथराती आवाज़ के साथ मज़रूह के शब्द जब कानों में पड़ते हैं तो मन इस गीत में बहुत देर यूँ ही डूबा रह जाता है।
फिल्म सुजाता में सुनील दत्त और नूतन पर ये गीत फिल्माया था। नूतन के चेहरे की सजीव भाव भंगिमाओं इस गीत की खूबसूरती को बयाँ कर देती हैं..
जलते हैं जिस के लिए, तेरी आँखों के दीये ढूँढ लाया हूँ वही, गीत मैं तेरे लिए दर्द बन के जो मेरे दिल में रहा ढल ना सका जादू बन के तेरी आँखों में रुका चल ना सका आज लाया हूँ वही गीत मैं तेरे लिए दिल में रख लेना इसे हाथों से ये छूटे ना कही गीत नाजुक हैं मेरा शीशे से भी टूटे ना कही गुनागुनाऊँगा यही गीत मैं तेरे लिए जब तलक ना ये तेरे रस के भरे होठों से मिले यूँ ही आवारा फिरेगा ये तेरी जुल्फों के तले गाये जाऊँगा यही गीत मैं तेरे लिए..
नई आवाजें जब हिंदी फिल्म संगीत के इन अनमोल गीतों को आगे ले जाती हैं यो मन में बेहद खुशी होती है। स्निति मिश्रा की गायिकी से करीब एक दशक पहले आपका परिचय कराया था जब वो सा रे गा मा पा में प्रतिभागी के तौर पर हम सबके सामने आयी थीं। देखिए उन्होंने तलत महमूद के इस कालजयी गीत को अपने अंदाज में किस तरह निभाया है?
वैसे तलत महमूद के गाए गीतों में अगर एक गीत का चुनाव करना हो तो आपकी वो पसंद क्या होगी?
1965 में एक फिल्म आई थी जिसका नाम था 'मोहब्बत इसको कहते हैं'। अख़्तर मिर्जा द्वारा लिखी और निर्देशित इस छोटे बजट की फिल्म के कुछ गीत बेहद लोकप्रिय हुए थे। वैसे ये बता दूँ की ये वही अख़्तर मिर्जा हैं जिनके सुपुत्र सईद मिर्जा की बनाई फिल्में 'सलीम लँगड़े मत रो', 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यूँ आता है?', 'नसीम' और अस्सी के दशक में सोमवार रात को दूरदर्शन पर आने वाला धारावाहिक 'नुक्कड़' बेहद चर्चित रहे थे।
अख्तर मिर्जा की इस प्रेम कथा पर संगीत रचने का काम सौंपा गया था 'ख़य्याम' साहब को। ख़्य्याम साहब की खासियत रही है कि वो अपने गीत चुने हुए कवियों और शायरों से ही लिखवाते थे। लिहाज़ा इस फिल्म के लिए उन्होंने उस वक़्त के मशहूर शायर मजरूह सुल्तानपुरी को चुना।
प्रेमियों की आपसी चुहल और तकरार पर यूँ तो कितने ही गीत बने हैं पर रफ़ी और सुमन कल्याणपुर द्वारा गाए इस युगल गीत में इतनी मधुरता और सादगी है कि सुनने वाला बस सुनता ही रह जाता है। मोहम्मद रफ़ी ने इस गीत के हर अंतरे को इतना दिल से गाया है कि गीत की पंक्तियों सजीव हो उठती हैं। मुझे नहीं लगता कि कोई भी संगीत प्रेमी इस गीत को सुनते वक़्त गुनगुनाने से अपने आप को रोक सके..
आइए सुनते हैं रफी और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ में ये नग्मा...
तो आज है बच्चों का दिन यानि बाल दिवस ! तो क्यूँ ना इस दिन बचपन की कुछ बातों को साझा किया जाए एक बेहद दिलअज़ीज़ गीत के साथ। समय के साथ कितना बदल गया है तब और आज का बचपन। तब भी मस्तियाँ और शैतानियाँ होती थीं और आज भी। फर्क आया है इनके तौर तरीकों में, तब के और आज के माहौल में। बचपन की स्मृतियों पर नज़र दौड़ाऊँ तो बहुत सारी बातें अनायास ही मन में आती हैं। पेड़ों पर रस्सी लगा कर झूला झूलना, इमली के पेड़ की डरते डरते चढ़ाई करना, टोकरी को तिरछा कर रस्सी के सहारे चिड़िया को पकड़ने की कोशिश करना, हारने या खेल में ना शामिल किए जाने पर टेसुए बहाना, मन का ना होने पर बार बार घर छोड़ने की धमकी दे डालना और ऐसी ही ना जाने कितनी और बातें। पर आज बात उन खेलों की जिन्हें खेलते हुए बचपन का एक बड़ा हिस्सा बीता।
बचपन में पहला खेल जो हमनें सीखा था वो था बुढ़िया कबड्डी। अगर आप इस खेल से वाकिफ़ ना हों तो ये बताना जरूरी होगा कि इस खेल में अपनी साँस बिना तोड़े बारी बारी से विपक्षी दल के खिलाड़ियों को दौड़ाना और इन्हें छू कर वापस आना होता था। ऍसा इसलिए किया जाता था ताकि एक गोल रेखा के अंदर खड़ी अपने दल की बुढ़िया को भागने का रास्ता मिल जाए। कबड्डी के इस परिवर्तित रूप में गोल रेखा के अंदर खड़े खिलाड़ी को बुढ़िया क्यूँ कहा जाता था ये अभी भी मेरी समझ के बाहर है।
ज़ाहिर है जितनी लंबी साँस होगी उतने ही अधिक खिलाड़ियों को दौड़ाकर आप बुढ़िया का काम आसान कर सकते थे। अब एक साँस को लेने के लिए कई तरीके थे। सबसे प्रचलित होता था
शैल तीईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई............. या फिर कबड्डी के बाड बड्डी बाड बड्डी बाड बड्डी......
पर इन दोनों तरीकों में साँस में हेर फेर यानि चीटिंग करने की गुंजाइश काफी कम होती थी तो हम लोग इनका इस्तेमाल कम ही करते थे। सबसे मज़ेदार रहता
शैल दल्ले छू दल्ले छू...
बोलना क्यूँकि ये इतनी धीमी गति से बोला जाता कि साँस ले लेने का पता ही न चलता। अगर विपक्षी खिलाड़ी शिकायत करते तो हम अपने दूसरे सहारे प्रकाश लाल की शरण में चले जाते। अब ये न पूछिएगा कि ये प्रकाश लाल कौन था क्यूंकि हम तो उसे जाने बगैर ही उसका मर्सिया पढ़ देते थे यानि
शैल कबड्डी आस लाल मर गया प्रकाश लाल मेरा....लाल लाल लाल लाल...
बुढ़िया कबड्डी का शुमार तो अब लुप्तप्राय खेलों में कर लेना चाहिए। पर गिल्ली डंडा, रस्सी और लट्टू, कंचों पिट्टो, कोनों की अदला बदली और रुमाल ले कर भागने वाले खेल तो कस्बों और गाँवों में जरूर खेले जाते होंगे। आज तो बाजार में हर आयु वर्ग के लिए तरह तरह के आकर्षक खेल हैं खासकर तब जब आपकी जेब में इनके लिए पर्याप्त पैसे हों। वैसे भी आज के बच्चों के हाथ, मोबाइल और कम्प्यूटर के कीबोर्ड में गेम खेलने को इतने सिद्धस्त हो जाते हैं कि उन्हें गिल्ली और डंडे को पकड़ने की जरूरत ही क्या है। पर जो बच्चे इन सुविधाओं से अभी भी दूर हैं उनके लिए तो ये खेल आज भी मौज मस्ती की तरंग जरूर लाते होंगे।
तो आइए आज आपको वो गीत सुनाऊँ जो मुझे अपने बचपन की इन्हीं यादों के बहुत करीब ले जाता है। सुजाता फिल्म के इस गीत के बोल लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी ने और संगीतबद्ध किया था सचिन देव बर्मन साहब ने। गीता दत्त और आशा जी ने जो चुनिंदा युगल गीत गाए हैं उनमें से ये एक था। गायिकी, संगीत और बोल तीनों के लिहाज़ से ये गीत मुझे पसंद हैं ..
बचपन के दिन बचपन के दिन बचपन के दिन भी क्या दिन थे हाय हाय बचपन के दिन भी क्या दिन थे उड़ते फिरते तितली बन के बचपन....
वहाँ फिरते थे हम फूलों में पड़े यहाँ ढूँढते सब हमें छोटे बड़े थक जाते थे हम कलियाँ चुनते बचपन के दिन भी क्या दिन थे उड़ते फिरते तितली बन के बचपन.....
कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म हाय रे हाय हाय हाय हाय रे हाय कभी रोये तो आप ही हँस दिये हम छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म हाय क्या दिन थे वो भी क्या दिन थे
बचपन के दिन भी क्या दिन थे उड़ते फिरते तितली बन के बचपन ...
और चलते चलते आज के बचपन को अपने क़ैमरे में क़ैद करने की मेरी कोशिश
तो क्या आपको ये प्रविष्टि आपके बचपन तक खींच कर ले जा सकी ?
आदमी की फ़ितरत अज़ीब सी है। चाहता कुछ और है और कहता कुछ और। अब भला जिंदगी की राहों में कोई हसीन हमसफ़र मिल जाए तो इसमें दिक्कत कहाँ हैं जनाब ! पर देखिए अब कोई मिल गया तो इतरा रहे हैं ये कहते हुए कि मैं तो अकेले ही बड़े आराम से था। अब भइया एक अदद दिल की तलाश में मारे मारे फिरोगे और एक के साथ एक फ्री वाली स्कीम में दर्द लाज़िमी तौर पर मिलेगा तो क्या कलपने लगोगे :)?
पर ये तो हमारे आपके दिखाने की बात है। अंदर ही अंदर तो हम दर्द-ए-दिल को भी शिद्दत से महसूस करना चाहते हैं। फ़राज़ ऍसे तो नहीं कह गए
पहले पहल का इश्क़ अभी याद है फ़राज़ दिल खुद से चाहता है कि रुसवाइयाँ भी हों
पर जहाँ ये बात सही है, वहाँ इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि जब हमारी समझ से अपने स्तर से बहुत अच्छा हमें अपना लेता है तो एक ओर तो हमें बड़ी खुशी मिलती है पर दूसरी ओर रह रह कर अंदर की हीन ग्रंथि हमें अपनी तुच्छता का अहसास भी दिलाती रहती है।
तो आज ऍसे ही भावनाओं से ओतप्रोत इस गीत की बात करना चाहता हूँ। इसे लिखा था मजरूह सुल्तानपुरी ने और इसकी धुन बनाई थी चित्रगुप्त ने। मजरूह ने ये गीत शायद ऍसे ही किसी क़िरदार के लिए लिखा होगा। शायद इसलिए कि जिस फिल्म का ये गीत है वो मैंने देखी नहीं। फिल्म का नाम था 'आकाशदीप' जो १९६५ में प्रदर्शित हुई थी। वैसे यू ट्यूब के वीडिओ से ये स्पष्ट है कि इसे फिल्माया गया था धर्मेन्द और नंदा जी पर।
ये गीत रफ़ी साहब के गाए मेरे पसंदीदा गीतों में से एक है तो सुनिए रफ़ी की गायिकी का कमाल ..
वैसे यू ट्यूब के वीडिओ में इस गीत के तीनों अंतरे सुनने को मिलेंगे।
मुझे दर्द-ए-दिल का पता ना था मुझे आप किसलिए मिल गए मैं अकेला यूँ ही मजे में था मुझे आप किसलिए मिल गए....
यूँ ही अपने अपने सफ़र में गुम कही दूर मैं, कही दूर तुम चले जा रहे थे जुदा, जुदा मुझे आप किसलिए मिल गए....
मैं गरीब हाथ बढ़ा तो दूँ तुम्हें पा सकूँ कि ना पा सकूँ मेरी जाँ बहुत हैं ये फ़ासला मुझे आप किसलिए मिल गए....
ना मैं चाँद हूँ, किसी शाम का ना च़राग हूँ, किसी बाम का मैं तो रास्ते का हूँ एक दीया मुझे आप किसलिए मिल गए....
वैसे चलते चलते कुछ बाते संगीतकार चित्रगुप्त यानि चित्रगुप्त श्रीवास्तवके बारे में। यूँ तो चित्रगुप्त भोजपुरी फिल्मों के मूर्धन्य संगीतकार माने जाते हैं, पर हिंदी फिल्मों के लिए भी उन्होंने कुछ नायाब नग्मे दिए। चित्रगुप्त का ताल्लुक बिहार से था और रोचक तथ्य ये है कि मुंबई की मायानगरी में संगीतकार बनने के पहले वो कॉलेज में लेक्चरर थे। वैसे क्या आपको पता है कि चित्रगुप्त की सांगीतिक विरासत को किसने आगे बढ़ाया ? वही 'क़यामत से क़यामत तक ' की संगीतकार जोड़ी आनंद-मिलिंद ने, जो चित्रगुप्त के सुपुत्र हैं।
पिछली पोस्ट में आपने सुना इस गीत को मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में। सुरों की मलिका लता जी ने भी इस प्यारे से गीत को अपना स्वर दिया है। जैसा कि मैंने पहले कहा था कि लता वाले वर्सन का मिज़ाज कुछ दूसरा है।रफ़ी साहब का गाया गीत एक ऊंचा टेम्पो लिए हुए था वहीं मीना कुमारी पर फिल्माया ये गीत उस शांत नदी की धारा की तरह है जिसके हर सिरे से सिर्फ और सिर्फ रूमानियत का प्रवाह होता है।
जहाँ रफ़ी साहब को विभिन्न अंतरों में गीत के बदलते भावों के हिसाब से आवाज़ का लहजा बदलना था वहीं लता इस गीत में अपनी मीठी आवाज़ से प्रेम में आसक्त नायिका के कथ्यों में मिसरी घोलती नज़र आती हैं।
वैसे अंतरजाल पर इस गीत के बारे में ये बहस आम है कि गीत के इन दोनों रूपों में कौन सी प्रस्तुति ज्यादा धारदार थी? दो महान गायकों की ऍसी तुलना मुझे तो बेमानी लगती है, खासकर तब जब दोनों गीतों की परिस्थितियाँ फिल्म 'भीगी रात' में बिल्कुल अलहदा थीं।हाँ, मुझे ये जरूर लगता है कि रफ़ी वाले वर्सन को सफलता पूर्वक निभाने के लिए किसी भी गायक के लिए चुनौतियाँ कही ज़्यादा थीं।
लता रोशन जी की बतौर संगीतकार बेहद इज्जत करती थीं । और यही वज़ह है कि पचास साठ के दशक में बहू बेगम, चित्रलेखा, ममता, ताजमहल में संगीतकार रौशन के लिए गाए उनके गीत हिन्दी पार्श्व फिल्म गायन की अनमोल धरोहर बन गए हैं।
वैसे ये गीत भी अपने आप में लाजवाब है। गीत के शुरुआती हिस्से में लता जी की हमिंग के बीच चाशनी में घुला हुआ उनका स्वर उभरता है तो बस मन में समा बँध जाता है। वैसे इसके बाद कोई कसर बचती भी है तोगीतकार मज़रूह सुल्तानपुरी के कभी नरमी कभी शोखी लिए बोल आपको रूमानी माहौल से निकलने का मौका ही नहीं देते।
हम्म्म्म...हम्म्म्म..हम्म्म्म दिल जो ना कह सका वही राज़-ए-दिल कहने की रात आई दिल जो ना कह सका....
नगमा सा कोई जाग उठा बदन में झंकार की सी थरथरी है तन में झंकार की सी थरथरी है तन में हो प्यार की इन्हीं धड़कती धड़कती फिज़ाओं में, रहने की रात आई दिल जो ना कह सका....
अब तक दबी थी इक मौज़ ए अरमाँ लब तक जो आई बन गई है तूफाँ लब तक जो आई बन गई है तूफाँ हो..,, बात प्यार की बहकती बहकती निगाहों से कहने की रात आई दिल जो ना कह सका....
गुजरे ना ये शब, खोल दूँ ये जुल्फ़ें तुमको छुपा लूँ मूँद के ये पलकें तुमको छुपा लूँ मूँद के ये पलकें हो..बेकरार सी लरज़ती लरज़ती सी छाँव में रहने की रात आई दिल जो ना कह सका....(मौज़ - लहर , लरज़ना - काँपना, थरथराना)
प्रेम रस से सराबोर इस गीत को अगर आप मीना कुमारी और प्रदीप कुमार की अदाकारी के साथ देखना चाहते हैं तो ये रहा इसका वीडिओ लिंक....
पिछले हफ्ते चैनल बदलते बदलते जी टीवी के लिटिल चैम्पस पर उँगलियाँ रुकीं तो रुकी की रुकी रह गईं। एक छोटे बालक को रफी साहब के इस गीत का एक हिस्सा गाते सुना तो मन आह्लादित हो गया। बीते दिनों के इन अनमोल मोतियों को आज के बच्चों के मुख से सुनना असीम संतोष की भावना से मन को भर देता है। कई दिनों के बाद ये गीत जब सुनने को मिला तो ज़ेहन से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। इसलिए सोचा कि क्यूँ ना इस आनंद को आप सब के साथ बाँटा जाए।
जिस गीत के बोल, धुन और गायिकी तीनों ही बेमिसाल हों तो आपको कहने को तो कुछ रह ही नहीं जाता, मन भावनाओं के आवेश से हिलोरें लेने लगता है और गीत खुद बा खुद होठों पर चला आता है ...
दिल जो ना कह सका वही राज़-ए-दिल कहने की रात आई दिल जो ना कह सका....
क्या धुन बनाई थी मुखड़े की संगीतकार रोशन ने कि आदमी मज़रूह सुल्तानपुरी के शब्दों की रवानी के साथ बहता ही चला जाता है। १९६५ में प्रदर्शित फिल्म भींगी रात का ये गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था और उस साल की बिनाका संगीतमाला में पाँचवे स्थान तक जा पहुँचा था। अगर मुखड़े के लिए गीतकार और संगीतकार की जादूगरी को दाद देने का जी चाहता है तो वहीं अंतरे में मोहम्मद रफी साहब की कलाकारी इस गीत को उनके गाए बेहतरीन गीतों में से एक मानने पर मज़बूर कर देती है।
ये गीत फिल्म में प्रदीप कुमार, अशोक कुमार और मीना कुमारी पर फिल्माया गया है।
गीतकार मज़रूह सुल्तानपुरी ने प्रेमिका की बेवफाई टूटे नायक (प्रदीप कुमार) के दिल में उठते मनोभावों को गीत के अलग अलग अंतरों में व्यक्त किया हैं। दिल जो ना कह सका वही राज़-ए-दिल कहने की रात आई दिल जो ना कह सका....
नगमा सा कोई जाग उठा बदन में झंकार की सी, थरथरी है तन में झंकार की सी थरथरी है तन में हो.. मुबारक तुम्हें किसी की लरज़ती सी बाहों में रहने की रात आई दिल जो ना कह सका...
तौबा ये किस ने, अंजुमन सजा के टुकड़े किये हैं गुनचा-ए-वफ़ा के टुकड़े किये हैं गुनचा-ए-वफ़ा के हो..उछालो गुलों के टुकड़े कि रंगीं फ़िज़ाओं में रहने की रात आई, दिल जो ना कह सका....
चलिये मुबारक जश्न दोस्ती का दामन तो थामा आप ने किसी का दामन तो थामा आप ने किसी का हो...हमें तो खुशी यही है तुम्हें भी किसी को अपना कहने की रात आई, दिल जो ना कह सका...
सागर उठाओ दिल का किस को ग़म है आज दिल की क़ीमत जाम से भी कम है आज दिल की क़ीमत जाम से भी कम है पियो चाहे खून-ए-दिल हो हो...के पीते पिलाते ही रहने की रात आई दिल जो ना कह सका...
नायक की दिल की पीड़ा कभी तंज़, कभी उपहास तो कभी गहरी निराशा के स्वरों में गूँजती है और इस गूँज को मोहम्मद रफ़ी अपनी आवाज़ में इस तरह उतारते हैं कि गीत खत्म होने तक नायक का दर्द आपका हो जाता है
तो फिर देर काहे कि सुनिए आप भी इस महान गायक को एक बेमिसाल गीत में
इसी गीत को लता मंगेशकर ने भी गाया है। पर मीना कुमारी वाले गीत का मिज़ाज़ कुछ अलग है। पर उस गीत की बात करेंगे इस कड़ी की अगली पोस्ट में..
ये आफिस के दौरे मेरे इस चिट्ठे की गाड़ी पर बीच - बीच में ब्रेक लगा देते हैं । आज फिर से हाजिर हूँ इस गीत के साथ... याद है ना, पिछली बार की शाम मजाज के जीवन की उदासी ले के आई थी । आज मामला वैसा तो नहीं पर उससे खास जुदा भी नहीं । देखिये ना, जनाब मजरूह सुलतानपुरी अँधेरे के बीच खड़े होकर आवाजें लगा रहे हैं , उस हमसफर के लिये जो ना जाने कहाँ गुम हो गया है ! और तो और शायर के हृदय में छाई इस कालिमा को हटाने में ना सितारों की फौज काम आ रही है ना ही बहारों की खूबसूरती.. अब तो सच्चे दिल से लगाई इस पुकार का ही सहारा है.....शायद पहुँच जाए उन तक...
चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है कहीं से लौट के आओ बहुत अँधेऽऽरा है
कहाँ से लाऊँ, वो रंगत गई बहाऽरों की तुम्हारे साथ गई रोशनी नजाऽरों की मुझे भी पास बुलाओ बहुत अँधेऽऽरा है चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है
सितारों तुमसे, अँधेरे कहाँ सँभलते हैं उन्हीं के नक्शे कदम से चराग जलते हैं उन्हीं को ढ़ूंढ़ के लाओ बहुत अँधेरा है चराग दिल का जलाओ, बहुत अँधेरा है
अब आप सोच रहें होंगे कि इस गीत की याद मुझे अचानक कहाँ से आ गई । सो हुआ ये कि मेरे रोमन हिन्दी ब्लॉग के एक पाठक ने भेंट स्वरूप मुझे ये गीत भेजा । यूँ तो चिराग के बाकी गीत मेरे सुने हुए थे पर ये गीत मैंने पहली बार, उस अनजान मित्र के जरिये ही सुना। एक बार फिर शुक्रिया दोस्त इस प्यारे गीत को मुझ तक पहुँचाने के लिए । अब मुझे कोई गीत अच्छा लगे और वो आप सब के पास ना पहुँचे ये कभी हुआ है भला ? इस गीत को सुनने के लिये यहाँ क्लिक कीजिए ।
चलचित्र चिराग (१९६९) के लिये ये गीत मोहम्मद रफी की आवाज में रिकार्ड किया गया था। धुन बनाई थी मदन मोहन साहब ने ।
नाको झील: किन्नौर का एक खूबसूरत पड़ाव
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नाको, जो कभी एक छोटा सा गाँव था, आज एक कस्बे का रूप ले चुका है। पर्यटन के
लिहाज़ से देखा जाए तो किन्नौर जिले का आखिरी छोर होने की वजह से, जो भी
रिकांगपिओ स...
इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।