सलाम मछलीशेहरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सलाम मछलीशेहरी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, सितंबर 16, 2008

बहुत दिनों की बात है, फिज़ा को याद भी नहीं : सुनिए सलाम मछली शेहरी की ये नज़्म

क्या आपके साथ कभी ऍसा हुआ है कि किसी शायर की एक रचना ने बहुत दिनों तक आप पर प्रभाव छोड़ा हो पर फिर कभी आप उसका लिखा ना पढ़ पाए हों, ना सुन पाए हों। आज की नज़्म एक ऍसे ही शायर की है जिनका नाम था सलाम मछली 'शेहरी'। अब शायरों के नाम इस तरह के हो सकते हैं ये न तो तब समझ पाया था और ना आज ही।

आठवीं या नौवीं कक्षा में रहा हूँगा जब बड़ी दी ने एक कैसेट खरीदी थी। नाम था Ecstasies . सच पूछिए तो जिंदगी में पहली बार ग़ज़लों को सुनना इसी समय शुरु हुआ था। ग़ज़लों की कैसेट में ये नज़्म भी थी और जहाँ तक मुझे याद पड़ता है इसे सुनने के पहले तब तक की जिंदगी में सिर्फ मैंने एक और नज़्म बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी सुनी थी। और जैसी की उम्र थी इसे एक बार सुनकर ही मन ऍसा द्रवित हो उठा था, मानो शायर ने जो कहा वो मेरे साथ हुआ हो। सालों ये कैसट घिस घिस कर तब तक सुनी जाती रही जब तक वो खराब नहीं हो गई।

आज सलाम मछली शेहरी की इस नज़्म को दोबारा पढ़ता हूँ तो शायर को सलाम करने को जी चाहता है, लगता है कि शायर ने कितनी सादी जुबान में एक जज़्बाती नज़्म लिखी थी जो बड़ी सहजता से छुटपन में दिल में उतर गई थी।

आप ने भी जगजीत सिंह की दिलकश आवाज़ में इसे सुना ही होगा और नहीं सुना तो एक बार जरूर सुनिए....



बहुत दिनों की बात है
फिज़ा को याद भी नहीं
ये बात आज की नहीं
बहुत दिनों की बात है

शबाब पर बहार थी
फिज़ा भी खुशगवार थी
ना जाने क्यूँ मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा
किसी ने मुझको रोककर
बड़ी अदा से टोककर
कहा के लौट आइए
मेरी कसम न जाइए

पर मुझे खबर न थी
माहौल पे नज़र न थी
ना जाने क्यूँ मचल पड़ा
मैं अपने घर से चल पड़ा
मैं शहर से फिर आ गया
ख़याल था के पा गया
उसे जो मुझसे दूर थी
मगर मेरी ज़रूर थी

और इक हसीन शाम को
मैं चल पड़ा सलाम को

गली का रंग देखकर
नयी तरंग देखकर
मुझे बड़ी ख़ुशी हुई, ख़ुशी हुई
मैं कुछ इसी ख़ुशी में था
किसी ने झाँककर कहा
पराये घर से जाइए
मेरी कसम न आइए

वही हसीन शाम है
बहार जिसका नाम है
चला हूँ घर को छोड़कर
न जाने जाऊँगा किधर
कोई नहीं जो रोककर
कोई नहीं जो टोककर
कहे के लौट आइये
मेरी कसम न जाइये


मेरी कसम न जाइए....

'शेहरी' इस नज़्म के रिकार्ड होने के ग्यारह साल पूर्व यानि १९७३ में ५१ वर्ष की अल्पायु में इस दुनिया जहान से रुखसत हो चुके थे। इस गुमनाम से शायर की मृत्यु के बीस साल बाद इनकी रचनाओं की सुध ली गई। नब्बे के दशक में उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी से इनकी रचनाओं का पहला संग्रह प्रकाशित हुआ था। और १९९८ में दिल्ली के एक प्रकाशक ने इनके बारे में अज़ीज इंदौरी की लिखी एक किताब भी छापी, नाम था सलाम मछली शेहरी : शख्सियत और फ़न। मैं अब तक इनकी कोई किताब नहीं पढ़ पाया हूँ, पर उम्मीद है जल्द ही पढ़ूँगा।
 

मेरी पसंदीदा किताबें...

सुवर्णलता
Freedom at Midnight
Aapka Bunti
Madhushala
कसप Kasap
Great Expectations
उर्दू की आख़िरी किताब
Shatranj Ke Khiladi
Bakul Katha
Raag Darbari
English, August: An Indian Story
Five Point Someone: What Not to Do at IIT
Mitro Marjani
Jharokhe
Mailaa Aanchal
Mrs Craddock
Mahabhoj
मुझे चाँद चाहिए Mujhe Chand Chahiye
Lolita
The Pakistani Bride: A Novel


Manish Kumar's favorite books »

स्पष्टीकरण

इस चिट्ठे का उद्देश्य अच्छे संगीत और साहित्य एवम्र उनसे जुड़े कुछ पहलुओं को अपने नज़रिए से विश्लेषित कर संगीत प्रेमी पाठकों तक पहुँचाना और लोकप्रिय बनाना है। इसी हेतु चिट्ठे पर संगीत और चित्रों का प्रयोग हुआ है। अगर इस चिट्ठे पर प्रकाशित चित्र, संगीत या अन्य किसी सामग्री से कॉपीराइट का उल्लंघन होता है तो कृपया सूचित करें। आपकी सूचना पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी।

एक शाम मेरे नाम Copyright © 2009 Designed by Bie